इस तरह मकानात गिराने नहीं आते – एक गेय गजल : रामकुमार सिंह


गेय गजल – संगीतबद्ध पढ़ी जाने को

रिश्ता नहीं होता तो बुलाने नहीं आते
वो फिर से नई बात चलाने नहीं आते।
शब्दों को रोक लें तो आँसू निकल पड़ें
हम सबको अपने दर्द छुपाने नहीं आते।
‘बाजार‘ चला देता है खोटे हों खरे
मैं आदमी हूँ सिक्के चलाने नहीं आते।
‘निर्माण ‘का संकल्प जो लेकर चले होते
इस तरह मकानात गिराने नहीं आते।
हाथों पे भरोसा यदि होता नहीं हमको
लोहे का ये पहाड़ हिलाने नहीं आते।

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