ये लड़की बिल्कुल सीधी चलती है /कभी फिसली तो संभल जायेगी।

चंद गजलें –

एक
ये बैठक भी निकल जायेगी
एक घंटे की आफत है, टल जायेगी।
‘परिपत्र बहुत डराते हैं हमें’
जरा-सी बात मुंह से निकल जायेगी।
ये लड़की बिल्कुल सीधी चलती है
कभी फिसली तो संभल जायेगी।
हर तरफ पानी भर गया, फाइल-
भीगी तो अच्छा है, गल जायेगी।

दो-
फिर कोई सरसराहट दौड़ानी होगी।
बात बहुत जम रही है, हिलानी होगी।
कन्नड़ में ‘कुत्ते’ को ‘नाई’ कहते हैं
ये बात नाई से छुपानी होगी।
स्कूल के पिछवाड़े मिलते हैं दो दिल
ये बात प्राचार्य को बतानी होगी।
उस तरफ के लोग नहीं दिखते हैं
ये ऊंची दीवार गिरानी होगी।

तीन-
नया जाल बिछाना होगा
आदमी को सुलाना होगा।
निरीक्षक आ रहे हैं, कि-
ये सामान हटाना होगा।
स्वागत के बोल गूँजेंगे
बाजा भी बजाना होगा।
साहब ने बजा दी घंटी
प्रहरी को बुलाना होगा।
चलो कवितायें बंद करें।
आज तो नहाना होगा।

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पुरानी बात बताते होंगे। तो किस तरह लजाते होंगे : कुछ गजलें/डॉ रामकुमार सिंह

छोटे मतलों की लम्बी गजल काफी पहले से लिखी जाती रहीं है। बाद में चुनिंदा शेर संकलित होते रहे हैं। कुछ इसी तरह की गजलें जारी कर रह रहा हूं। एक पुराने से रजिस्टर में कई महीनों पहले लिखीं थीं। आज मिल गई तो, पढ़ लीजिये। परिवेश कर्नाटक से मिला है……

लम्बी गजल – एक

फिर मशीन घरघराई है
पहाड़ की शामत आई है।
टुकडे हो गया कृपण पर्वत
लोहे की खेप उगलवाई है।
मिट्टी को सोने में बदल देंगे
सरकार से बात चलाई है।
लक्ष्य हो गया निर्धारित
खबर भी छपवाई है।
एक नाम मंगवाया था
पूरी सूची चली आई है।
कनिष्ठ बहुत खुश हैं
वरिष्ठों की विदाई है।
इडली खा ली वहीं पर
चटनी थैली में रखवाई है।
यहां लाल धूल बहुत है
कपडों से लिपट आई है।
अंगूर बिक गये अम्मा
कब से दुकान लगाई है।
नारियल ठीक से काटो
बड़ी नाजुक कलाई है।
खा लो, भेलपुरी खा लो
सौम्या ने बनाई है।
चांदी के सिक्के बटेंगे
परियोजना से कमाई है।

लम्बी गजल – दो

पुरानी बात बताते होंगे
तो किस तरह लजाते होंगे।
मैं बहुत छोटा था, वो बड़े
गोद में खिलाते होंगे।
कितने मांसल हैं ये पेड़
व्यायाम को जाते होंगे।
रात की पाली खत्‍म हुई
श्रमिक नीचे आते होंगे।
बहुत बदबू है, सीलन है
महीनों में नहाते होंगे।
वजनदार होती है मिट्टी
कैसे डम्पर में चढ़ाते होंगे।
रात भी बजता है सायरन
कौन लोग बजाते होंगे।
अभी चला गया हुड़गा
अप्पाजी बुलाते होंगे।
पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।
मध्यान्तर में खड़ी है बच्ची
पापा खाना लाते होंगे।
( कन्‍न्‍ड में हुडगा – लडका, अप्‍पाजी- पिताजी)

लम्बी गजल – तीन
एक ही श्रोता है
वह भी सोता है।
किसने मारा है
तू क्यों रोता है।
कल बैठक है
देखें क्या होता है।
मतदान होना है
सबका न्योता है।
सुपारी कट जायेगी
हाथ में सरोता है।
वो प्रेस करता है
कपडे नहीं धोता है।
स्कूल और डाकखाना
साथ बंद होता है।
जो जुटाता है-
वही खोता है।

गजल : चार (पढी जाने को)
हर घर में गाड़ी है
यहां का मजदूर अनाड़ी है।
सब कन्नड़ बोलते हैं
बच्चा भी जुगाड़ी है।
ऊपर चंदन है, लोहा है
नीचे रेलगाड़ी है।
मर्द के मूंछ है, लुंगी है
औरत के गजरा है, साड़ी है।
सांप निकल आते हैं
बंदर हैं, झाड़ी है।
छोटा-सा कस्बा है
लाल रंग की पहाड़ी है।

‘रोशनी की कोपलें’ – हाथों से छूते हुए……….

पुस्तक-समीक्षा – डॉ रामकुमार सिंह
पुस्‍तक – ‘रोशनी की कोपलें(गजल-संग्रह)
सर्जनाकार – डॉ वशिष्‍ठ अनूप
प्रकाशक – उद्भावना प्रकाशन


हने को जो कोंपलें हैं वे कब अंगार बन जायें, कहा नहीं जा सकता। या इस तरह कहिये कि कब अंगारों की तासीर महज ‘कोंपल’ के शीर्षक में रखकर हथेलियों में दे दी जाये….. रोका नहीं जा सकता है। ऐसी ही एक नजीर है वशिष्ठ अनूप का गजल संग्रह – ‘रोशनी की कोपलें’
यह गजल-संग्रह उद्भावना से छपा है। इसमें कुल एक सैकड़ा जमा दो गजलें हैं। हिन्दी गजल की परम्परा में यह संग्रह एक और उपलब्धि है। दुष्यंत के बाद हिन्दी गजल में नई बुनावट को उसी प्रखरता और तल्खी के साथ बनाये रखने का अहसास ‘रोशनी की कोंपलें’ से होता है।
‘समय की पहचान’ की जो बात अनूप वशिष्ठ के विषय में मानी गई है उसे इस तरह के कई शेर सामने लाते हैं –

”हदों के पार होता जा रहा है
समय खूंखार होता जा रहा है”

समय का खूंखार हो जाना इसलिए नहीं कि अंधेरे के नुमांइदे ज्यादा हो गये हैं और रोशनी की कोपलें सूराख तलाशती हों, दरअसल मामला यह निकलता है कि अंधेरे और उजाले के फर्क का श्याम-श्वेत मानदंड समाप्त हो गया है। समय का खूंखार हो जाना जिस अंदाज में वशिष्ठ अनूप परिभाषित करते हैं वो इस दौर की शातिरी को पकडने और खंगालने की प्रक्रिया है –

‘समझना उसको मुश्किल है बड़ा शातिर शिकारी है
वो खंजर बेचने वाला अहिंसा का पुजारी है”

इस माहौल में केवल उदात्त कल्पनाओं वाले कवि के पास वे पैने औजार शायद न हों जो राजनीतिक-चेतना ये युक्त नये गजलकार के पास होते हैं। दुष्यंत ने जिस राजीनीतिक-चेतना का गजल से मजबूत परिचय कराया था वह उतनी ही शिद्दत के साथ अनूप वशिष्ठ के यहां मौजूद है। व्यंग्य की धार भी उसी तरह –

”ये नाले आजकल बनकर समन्दर बात करते हैं
मसीहाओं के जैसे ये सितमगर बात करते हैं
कभी कुर्सी के ऊपर से, कभी टेबुल के नीचे से
हमारे देश की संसद में बंदर बात करते हैं”

इतना ही नहीं, हर स्तर पर शक्ति का केन्द्रीयकरण किस प्रकार लम्पटों के हाथों में है, अनूप इससे बाखबर हैं। वे जानते हैं कि न केवल ये ‘बंदर बात करते हैं’ बल्‍िक ‘बंदरबांट भी करते हैं। अंधेरे के नुमाइंदों और सरमायेदारों के बीच कैसे घोषित-अघोषित अनुबंध हैं, इसकी भी वे खबर रखते हैं-

”कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।”

इस तरह के मकड़जाल में दुष्यंत सड़कों पर लिखे हजारों नारों को न देखने की बात जो कहते है, कुछ उसी लहजे में निकम्माई वादों से सावधान हो जाने की बात या मोहभंग सरीखी कोई चीज अनूप के यहां भी है-

”वादों पर विश्वास हो कैसे
हर वादा इक नारा निकला”

इस मोहभंग के बाजिब कारण भी हैं। नये प्रयासों को कुचलना व्यवस्था के लिए एक शगल से कम नहीं। जिस परकटे परिंद की कोशिश देखने के बीच दुष्यंत को एक मलाल भी था, उसे कुछ इस रूप में अनूप सीधा-सीधा कह देते हैं-

”भिनसार की आंखों में काली रात दीजिए
पंछी जो उड़ना चाहे तो पर काट दीजिए
इंसाफ की खातिर उठे आवाज अगर हो
पिटवाइये लाठी से, हवालात दीजिये”

इस खतरनाक समय में भी रोशनी की कोंपलों का अपनी तरह का वादा है। कोंपलों से जिस ‘मासूमियत’ या ‘कोमलता’ का अहसास होता है, यह लगता है कि इन कोपलों को खुद किसी ‘सुरक्षा-योजना’ की आवश्यकता तो नहीं, लेकिन जब ये कोपलें फूटती हैं, इस तरह कि, जगत के जीर्ण पत्रों को झरातीं हैं। उजाले का पेड़ खुश होता है, जब ये घोषणा सुनता है-
”उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें”

स्मरण रहे कि इस प्रक्रिया जो जन्म देने वाले सर्जनाकार के लिये यह सहज नहीं है। बड़ी बात जो शेर में होती है उसके लिए उतना ही विप्लव रचनाकार सहता है। युवा गजल-गायक हुसैन बंधु गायकी से पहले एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करते हैं जो यहां प्रासंगिक हो उठता है- ”हम गजल कहते हैं तो खून जलता है / लोग समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।’‘ ये मंचीय जुमला कुछ इस तरह साहित्यिक अंदाज में उतनी गहराई से ‘रोशनी की कोपलें’ में नजर आता है-

”उसके मन की पीड़ाओं को कौन समझता है
दुनिया कहती कोयल कितना मीठा गाती है”

आंदोलन, विप्लव-गान, और वैचारिक-क्रांति की सुगबुगाहट अपने सक्रिय-चेहरे से बहुत पहले की उपज होती है। शांति की तलहटी में उथल-पुथल का ज्वार निहित होता है-

”बाहर से खामोश बहुत लगता लेकिन
भीतर से हर वक्त सुलगता रहता है”

इसी तलांतर को महसूस करते हुए अनूप वशिष्‍ठ साहित्य के उस खेल को अस्वीकार करते हैं जो बचाव की मुद्रा में है, वे आक्रमण में ही विजयश्री का वरण मानते हैं, वैचारिक-सर्जना-प्रक्रिया में….

”साहित्य फकत ढाल नहीं आक्रमण भी है
यह आक्रमण हम तुम पे लगातार करेंगे”

दुष्यंत ने इस जमीन पर जिस तपिश को महसूस किया था। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की रेत पर आम आदमी के पांव किस तरह जलते रहे, उसे आगे अनूप भी महसूस करते हैं, लेकिन नया यह जुड़ता है इस जलन के साथ कुछ आशा की ठंडक भी है। नये दौर में कुछ तो ऐसा घटने को है कि यह कहा जा सके-
”रेत पर पांव जलते रहे देर तक
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा”

‘रोशनी की कोपलें’ के बारे यह अत्यंत जरूरी वक्तव्य हो जाता है कि इस किताब में मन-मस्तिष्क के बीच, समाज और भावनाओं के बीच, वैचारिकता और मन-बहलाव के बीच एक गजब का संतुलन है। दुष्यंत जब ‘साये में धूप’ महसूस कर रहे थे तो ‘इश्क पर संजीदा गुफ्तगू’ से ध्यान बखूबी हटाया था। वशिष्ठ अनूप ने राजनीतिक-सामाजिक विमर्श के बीच मन की कोमल भावनाओं को शिद्दत से जगह दी है। सौन्दर्य की उपासना जब वे करते हैं तो गजल अचानक गीत के माधुर्य से भर जाती है। उनकी सर्जना-प्रक्रिया में यह बात शायद इसलिए और समाई हुई है कि उन्हें गीत व गजलों की गेयता से न केवल प्रेम रहा है वरन उनके अध्ययन व विशेषज्ञता के केन्द्रबिन्दु में गीत और गजल दोनों का अकादमिक विस्तार है। एक गजल में वे लिखते हैं-

”एक अनुबंध कर लिया मन में
जुड़ गये दिल के तार हैं चुप-चुप”

सौन्दर्य के उनके प्रतिमान सादा हैं। कबीर की अक्खडता अगर कई गजलों में है तो सौन्दर्य के प्रति सहज आकर्षण-योग भी है-

”अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी”

”””””””वरिष्‍ठ समीक्षकों की नजर में ””””

पुस्तक के फ्लैप पर टिप्पणीकार के रूप में हिन्दी विभाग, बीएचयू के प्रोफेसर डॉ अवधेश प्रधान लिखते हैं – ”वशिष्ठ अनूप की कविता ने गेय कल्पना के पंखों पर उड़ान भरते हुए अहर्निश प्रकृति, व्यक्ति और समाज के जीवंत जीवन का साक्षात्कार किया है। गजल को आशिक और माशूका, साकी और प्यालों के तंग दायरे से निकाल कर उसे खास हिंदी रूप-रंग देने की जो परंपरा चली उसमें वह अधिक से अधिक जीवन के विशेषतः सामाजिक जीवन के निकट आती गई और दुष्यंत कुमार के बाद से तो उसका किसान चेहरा, राजनीतिक चेहरा, क्रांतिकारी चेहरा और निखरता गया है और उसे निखारने वाले युवा गजलकारों में वशिष्ठ अनूप का खास योगदान है। उनकी गजलों में सत्ता की राजनीति के ‘शातिर शिकारियों’ की पहचान है तो उनके खिलाफ असंतोष, विरोध, आंदोलन और क्रांति का आह्वान भी है। कहीं धार्मिक, सामाजिक पाखंडों के विखंडन का कबीराना अंदाज है तो कहीं पर्यावरण की गहरी चिंता है-

”लाख हाथों जगत को जकड़े है
जग को मिथ्या बता रहा है वो
ये न समझो कि काटता जंगल
सबकी सांसे चुरा रहा है वो”

वशिष्ठ अनूप ने चिखलदरा अमरावती के नैसर्गिक सौन्दर्य पर लिखा है जो प्रेयसी के मानवीय सौन्दर्य पर भी। ऐकांतिक प्रेम की पुलक के साथ-साथ व्यापक मानव संबंधों की मिठास के चित्र भी उनकी गजलों में हैं। उनकी गजलों की एक बड़ी विशेषता है भाषा और भाव की सादगी – ‘‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था, मां ने हंसकर दुलारा तो अच्छा लगा।” उनकी गजलों के बारे में उन्हीं के शेर पेश करता हूं –

”एक मां की पुलक, एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल
कैसे जीवन से कविता जुड़ेगी पुनः
प्रश्न का सीधा-सा हल है गजल”

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही प्रोफेसर डॉ बलराज पाण्डेय ने पुस्तकांरभ में 6 पृष्ठीय समालोचनात्मक टिप्पणी रचनाकार की सर्जना के विषय में इस तरह की है-

”अपनी रचनात्मक क्षमता के बल पर वशिष्ठ अनूप ने हिन्दी गजल के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी से छिपाने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनके पास सचेत वर्ग-दृष्टि है। यही वजह है कि उनकी गजलों में विषय की विविधता मिलती है। हम सभी जानते हैं कि दुष्यंत कुमार ने हिन्दी गजल को नयी भाषा दी, नया तेवर दिया, उसे नया आयाम दिया। दुष्यंत कुमार की उस पंरपरा को जिन लोगों ने विकसित किया, उनमें वशिष्ठ अनूप का नाम अग्रणी है। वे अपनी जमीन से जुडे़ हुए रचनाकार हैं। आज जबकि साहित्य भी बाजार की चमक-दमक के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहा है, वशिष्ठ अनूप उस चमक-दमक की वास्तविकता को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि साहित्य की दुनिया में प्रसिद्धि पाने के लिए किस प्रकार के संबंध काम करते हैं, लेकिन उन्होंने इन सभी चीजों से अपने को बचाया है और देश के आम जन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज के प्रभु वर्ग के विरुद्ध मोर्चा खोलते ही हैं, उन साहित्य समीक्षकों की भी खबर लेते हैं, जो गीत और गजल को साहित्य की मुख्यधारा से अलग करके देखते हैं। वे उन लोगों की भी खबर लेते हैं जो गजल विधा में संवेदनात्मक गहराई की संभावना नहीं देखते। गजल क्या होती है, इसे समझाते हुए वे लिखते हैं-

”हैं जडें इसकी कीचड़ के अंदर मगर
रूप-रस-गंध पूरित कमल है गजल
एक मां की पुलक एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल”

इससे स्पष्ट होता है कि वशिष्ठ अनूप की गजलों का आधार किसान की वह संस्कृति है जो कई प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना करती हुई मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित है। यदि हम कलात्मकता की दृष्टि से भी देखें तो विषय को स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ अनूप बिम्ब भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। गजल की पहचान के लिए ‘खेत में लहलहाती फसल’ का बिम्ब अपने आप में कितना अनूठा है’ यह बताने की जरूरत नहीं। अपनी गजल विधा के प्रति वशिष्ठ अनूप इतने समर्पित हैं कि उन्हें यह कतई मंजूर नहीं कि इसे साहित्य की मुख्य-धारा से काट कर देखा जाये। वे गजल के इतिहास को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि इसे ‘राजमहलों में पाला गया, और ‘तबलों की थापों’ पर महफिलों में ठुमके लगाने के लिए, कभी विवश किया गया था, लेकिन गजल की आज वह स्थिति नहीं है। वह अब ‘झोंपड़ी की दुलारी’ है तथा उसमें इतनी ताकत आ गई है कि किसानों-मजदूरों के हक के लिए हमलावर की भूमिका में भी अपने आप को प्रस्तुत कर सकती है। वशिष्ठ अनूप साहस के साथ यह घोषित करते हैं कि आज गजल विधा इतनी समृद्ध हो गई है कि उसमें हम आसानी से कबीर और निराला का दुःख देख सकते हैं, घनानंद के ‘प्रेम की पीर’ देख सकते हैं, साथ ही मीरा और रसखान का प्यार भी देख सकते हैं। इस प्रकार हम निःसंकोच यह कह सकते हैं कि वशिष्ठ अनूप ने गजल विधा को संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर उसे इतना विस्तृत क्षेत्र दिया है, जिसमें वह खुलकर सांस ले सके, खिलखिला सके। वशिष्ठ अनूप उन गजल लिखने वालों को भी एक प्रकार की सीख देते हैं, जो गजल को सिर्फ मनोरंजन करने वाली विधा मानते हैं।
वशिष्ठ अनूप की गजलों में एक और बात हमारा ध्यान खींचती है, वह है युगबोध। हम जानते हैं कि कोई भी रचनाकार तब तक कुछ सार्थक नहीं रच सकता, जब तक कि उसे अपने समय की पहचान न हो। आज जबकि हमारे समाज में सिर्फ पैसे का रिश्ता बचा हुआ है, लोग अपनों से भी नाता तोड़ते जा रहे हैं, हमें अपना घर अच्छा नहीं लगता, वशिष्ठ अनूप ऐसे में भारतीय पर्व त्यौहारों को सांकेतिक रूप से याद करते हैं-

पकवानों की खुशबू में रंगों की मस्ती में
दुश्मन को भी गले लगाना अच्छा लगता है
फास्ट फूड और चमक-दमक वाले इस युग में भी
अम्मा के हाथों का खाना अच्छा लगता है

स्पष्ट है कि वशिष्ठ अनूप को बाजार की चमक-दमक में विश्वास नहीं। ऐसा वही रचनाकार कह सकता है जो बाजार की असलियत जानता हो। हम देखते हैं कि वस्तुओं की गुणवत्ता कम, विज्ञापन ज्यादा हमें प्रभावित कर रहे हैं। वशिष्ठ अनूप बाजार की असलियत इसलिए जान सके हैं क्यों कि उनके पास एक विचारधारा है। उस विचारधारा के आधार पर वस्तुओं का विश्लेषण करने की उनमें क्षमता है और जो रचनाकार ऐसा करने में समर्थ है, उन्हें बाजार की चमक-दमक धोखा नहीं दे सकती। आज सचमुच हमारे मानवीय संबंधों में जो रिक्तता आ गई है, उसमें मां के हाथों का खाना याद करना कितनी बड़ी बात है। ऐसी पंक्तियों को पढ़ते हुए किसे अपनी मां की याद नहीं आयेगी, किसकी आंखें नहीं भर आएंगीं । बहुत सहजता के साथ संवेदना की गहराई में उतरना वशिष्ठ अनूप की अपनी विशेषता है। आपको लगेगा कि बात कितनी छोटी है, वह कितनी हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी है, लेकिन उसी को वशिष्ठ अनूप जब रचना में ढाल देते हैं तो छोटी बात बड़ी बन जाती है और कुछ देर के लिए हम उसकी अर्थवत्ता पर विचार करने के लिए विवश हो जाते हैं।
वशिष्ठ अनूप अपने समय के यथार्थ को पहचानने की भी क्षमता रखते हैं। आज की सत्ता व्यवस्था बहुसंख्यक जनता की मूल समस्याओं से हमारा ध्यान अलग करना चाहती है। वह ऐसे-ऐसे मुद्दों को उछाल देती है कि हम अपनी मूल समस्याएं भूल जाते हैं। सत्ता-व्यवस्था की इस साजिश को वशिष्ठ अनूप खूब पहचानते हैं। इसलिए उनकी गजलों में गरीबों की आवाज मुखर हो पायी है। इसके लिए वे चौराहों से, नुक्कड़ो से बिम्ब लाते हैं-

”भूख मदारी-सी डुगडुगी बजाती जब
नंगा होकर पेट दिखाना पड़ता है
शांति हमें भी अच्छी लगती है लेकिन
हक की खातिर शोर मचाना पड़ता है।”

जहां समस्याओं का चित्रण प्रमुख हो, वहां गजल की संरचना भले ही कमजोर पड़ जाये, वशिष्ठ अनूप इसकी परवाह नहीं करते, क्यों कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने देश की जनता, शोषित-पीड़ित जनता का यथार्थ चित्रण करना होता है। ऐसा नहीं है कि आम जनता का दुःख-दर्द उनके लिए अनचीन्हा, अनपहचाना हो। उसे वे दर्शक के रूप में देर से देखने के पक्षधर नहीं है। उसके वे स्वयं भोक्ता भी हैं। दुःख ही जैसे रचनाकार का दोस्त है। यहाँ प्रेमचंद की ये पंक्तियां याद आती हैं कि ‘दुःख ही कवि के लिए सुख है। प्रेमचंद का मानना है कि कोई भी रचनाकार जिस दिन सुख-वैभव से रिश्ता जोड़ लेगा, उस दिन वह जनता का रचनाकार नहीं रह जायेगा। वशिष्ठ अनूप भी अपनी गजलों में दुःख से रिश्ता जोड़ते हैं। वे कहते हैं-

”कदम-कदम पे दुखों का हुजूम मिलता यूं
युगों के बाद कोई दोस्त ज्यों हहा के मिले”

यहां दुःखों का ऐसा हुजूम है जो कदम-कदम पर मिलता है। हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अधिकतर लोगों के लिए दुःख ही ओढ़ना और बिछौना है। वास्तव में वशिष्ठ अनूप उन्हीं लोगों के दुःख की बात अपनी गजलों में करते हैं। दूसरों का दुःख भी कवि को जब तक अपना दुःख नहीं लगेगा, तब तक उसकी रचना सार्थक नहीं हो सकती।
साम्प्रदायिकता और जातिवाद ने हमारे देश को खोखला बनाया है। इधर क्षेत्रवाद ने भी आक्रामक रुख अख्तियार किया है। आश्चर्य तो यह है कि जो लोग ऐसी राजनीति करने वाली ताकतों को बढ़ावा देते हैं, वही राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के नारे भी उछालते हैं। वशिष्ठ अनूप अपनी गजलों के माध्यम से ऐसी ताकतों के प्रति हमें सावधान करते हैं। इसके लिए वे अपने समाज को भी जिम्मेदार मानते हैं। यह सही है कि यदि देश को तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ जनता उठ खड़ी हो जाये तो ऐसी ताकतें दुबारा सर न उठा सकें। देश और समाज की वर्तमान दुरवस्था के लिए हमारी भी जिम्मेदारी बनती है। वशिष्ठ अनूप का मानना है कि यदि दुनिया से जुल्म को मिटाना है तो सबसे पहले हमें अपने अंदर के डर को मिटाना पड़ेगा। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम दूसरों के भरोसे रहने के आदी हो गये हैं। अपनी समस्याओं को या तो हम नियति मान लेते हैं या इन्तजार करते रहते हैं कि कोई आएगा और हमें मुक्ति दिलाएगा। हम उन ताकतों को नहीं पहचान पाते जो जो हमें बांट रही हैं- कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। सत्ता का यह खेल कोई नया नहीं है, उसकी चाल जरूर नयी-नयी लगती हैं वशिष्ठ अनूप का मानना है कि हम पहले ही अगर नहीं चेत पाये तो भविष्य में किन भयावह परिस्थितियों से सामना करना पड़ेगा, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। वे लिखते हैं-
”पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम
प्यार में डूबी हुई निश्छल हंसी खतरे में है
लोग अब करने लगे हैं अंधेरे को यूं नमन
चांदनी सहमी हुई है रोशनी खतरे में है”

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें बरबस ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘अंधेरा धूप को धमका रहा है और हम चुप हैं’
हमारे परिवार और समाज को पूंजीवादी व्यवस्था ने बहुत प्रभावित किया है। हमारे पारिवारिक रिश्तों में बहुत बड़ी दरार आयी है। माता-पिता, भाई-बहन के रिश्तों को भी हम नफा-नुकसान की दृष्टि से देखने लगे हैं। सबसे खराब स्थिति तो बूढे़ मां-बाप की है। जगह-जगह वृद्धाश्रम तो खोले ही जा रहे हैं, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बूढ़ों की देखभाल के लिए सरकार को कानून बनाना पढ़ रहा है। वशिष्ठ अनूप ने इस विकराल होती समस्या पर भी हमारा ध्यान खींचा है। वे लिखते हैं-

”दुःखी मां-बाप को करके इबादत हो नहीं सकती
खुदा की ऐसे लोगों पर इनायत हो नहीं सकती
बुजुर्गों को पटक देना अनाथालय में ले जाकर
किसी की हो मगर अपनी रवायत हो नहीं सकती”

आज उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बाजारवाद का बोलबाला है। यह पूंजीवाद का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। कहीं-कहीं इसके विरुद्ध आवाजें भी उठी हैं, लेकिन उन्हें दबा दिया गया है। वशिष्ठ अनूप उदारीकरण के खतरों से वाकिफ हैं। …….ऐसी शक्तियों पर वे सीधे प्रहार करते हैं –

”लुटेरों की दुनियां के सरदार हैं वो
हमारी हंसी के खरीदार हैं वो
अमने के पुजारी उन्हें मत समझना
चले बेचने अपने हथियार हैं वो”

वशिष्ठ अनूप बाजारवाद के खतरों को पहचानते हैं। बाजार, जिसकी कोई नैतिकता नहीं होती, जहां आदमी की नहीं, वस्तुओं की महत्ता दिखाई पड़ती है, जहां खरीदने वाले और बेचने वाले की ही सत्ता दिखाई पड़ती है, वहां कविता, गीत और गजल को कौन पूछेगा, दूसरी कलाओं का क्या होगा, विचारहीन बनाने वाली इस व्यवस्था ने हमारे घर को ही बाजार बना दिया है। वशिष्ठ अनूप की बाजार पर यह टिप्पणी बहुत मारक है। वे इस व्यवस्था का विरोध करने वाली शक्तियों के पक्ष में खड़े होने वाले रचनाकार हैं। उनकी गजलों में उनका पक्ष स्पष्ट है। उन्होंने अपनी गजलों में जो सवाल उठाये हैं, उनका जवाब व्यवस्था के पास नहीं हैं। वे कहते हैं-

”क्यों उठ रहीं हैं लपटें, क्यों हुआ है लाल जंगल
देना पड़ेगा उत्तर, करता सवाल जंगल”

वशिष्ठ अनूप के ये शब्द उस आदिवासी जनसमूह की ओर संकेत करते हैं, जहां वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिए सशस्त्र संघर्ष जारी है।
ये गजलें अपने समय, समाज और समग्र वैश्विक संरचना से रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘बन्जारे नयन’ और ‘रोशनी खतरे में है’ के बाद ‘रोशनी की कोंपले’ वशिष्ठ अनूप की गजलों का तीसरा संग्रह है तो तमाम निषेधों के बाबजूद प्रकाश की विजय के प्रति आश्वस्त करता है।

—————–समीक्षा के इधर-उधर——————-

सर्जनाकार के बारे में –
डॉ वशिष्‍ठ अनूप, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग मे प्रोफेसर हैं। गोरखपुर जिले के बड़हलगंज अंतर्गत सहड़ौली दुबेपुरा गांव में जन्मे वशिष्ठ अनूप की प्रारंभिक शिक्षा गांव में तथा स्नातक शिक्षा बड़हलगंज में हुई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए और पी-एच.डी. की। वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर से ‘हिन्दी गजल: उपलब्धियां और संभावनायें’ विषय पर डी.लिट्. उपाधि प्राप्त की। आपने कुछ दिनों तक नेशनल पी.जी. कॉलेज बड़हलगंज और गोरखपुर विवि में तथा 1994 से पूर्वान्चल विवि जौनपुर के अंतर्गत राज पी.जी. कालेज के हिन्दी विभाग में अध्यापन किया। राजा श्रीकृष्णदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हुए। बाद में काशी हिन्‍दू वि.वि. में आ गये।

सर्जनाकार से रूबरू होना – डॉ वशिष्‍ठ अनूप को सुनने-समझने और कई जिज्ञासाओं के समाधान का मौका मुझे मिला वाराणसी में ही। इस बारे में ‘सर्जना’ पर ही देखे-‘बारह दिन बनारस में’ शीर्षक से।

वशिष्ठ अनूप जी के प्रकाशन संसार में….
….बन्जारे नयन (2000), रोशनी खतरे में है (2006) गजल-संग्रह शामिल है। समालोचना ग्रंथो में हिन्दी की जनवादी कविता, जगदीश गुप्त का काव्य-संसार, हिन्दी गजल का स्वरूप और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी गजल की प्रवृत्तियां, हिन्दी गीत का विकास और प्रमुख गीतकार, हिन्दी साहित्य का अभिनव इतिहास, हिन्दी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास, ‘अंधेरे में: पुनर्मूल्यांकन’ ‘असाध्यवीणा’ की साधना साहित 22 पुस्तकों का लेखन व संपादन उनके द्वारा किया गया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीत, गजल, कविता, कहानी और समीक्षाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं।
उनका सम्पर्क : डॉ. वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी – 221005, मोबाइल – 09415895812, ईमेल- vdwiwedi@gmail.com

—– संग्रह से दो कोपलें——-

एक –

जो मुजरिम हैं वही सब बनके पहरेदार बैठे हैं
वहां संसद में कितने देश के गद्दार बैठे हैं।
किसी अजगर-से ये हर ओर फेंटा मार बैठे हैं
समूचे देश की छाती पे कुछ परिवार बैठे हैं।
कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं।
हमारे देश के कानून की महिमा निराली है
जो काबिल लोग हैं वे इन दिनों बेकार बैठे हैं।
नदी के घाट से पूजा घरों तक भेड़ियों के दल
ये साधू-संत भी हाथों में ले हथियार बैठे हैं।
बुराई नग्न तांडव कर रही दिन-रात सड़कों पर
जो अच्छे लोग हैं सीने में ले अंगार बैठे हैं।
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।

दो-
सूखने लगतीं जहां पर हर खुशी की कोपलें
फिर वहीं से फूटतीं हैं जिन्दगी की कोपलें।
वक्त ने जिन पर उगा दी बेबसी की कोपलें
चाहते हैं हम उगें उन पर हंसी की कोपलें।
उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें।
सारी नदियां एक सागर में सिमटती जा रहीं
वह उगाता है लबों पर तिश्नगी की कोपलें।
बस तुम्हारी इक झलक से सिन्धु में उठती लहर
फूटने लगती है दिल में चांदनी की कोपलें।
उनके हाथों पर नई तहरीर लिखनी है हमें
जिनके माथे पर लिखीं बेचारगी की कोपलें।
कुछ नये उद्योग पनपे हैं हमारे देश में
अपहरण, हत्या, डकैती, तस्करी की कोपलें।
भूख से मरते हैं बच्चे और संसद में वहां
बैठकर नेता उगाते मस्करी की कोपलें।
नर्म फूलों पर नहीं तलवार की होती परख
फूटती संघर्ष में ही शायरी की कोपलें।

—— और, चलते-चलते —-

‘सर्जना’ पर बीएचयू के हिन्‍दी अध्‍यापकों के मौलिक व्‍याख्‍यान सहिए कई ऐसी जानाकारियां प्रस्‍तत की गई हैं जो ‘सर्जना’ की खास निधि हैं। हिन्‍दी विभाग बीएचयू के यशस्‍वी विद्यार्थियों का सम्‍पर्क-अंतर्जाल लोकप्रिय बेबसाइट ‘फेसबुक पर उपलब्‍ध है।

हिन्‍दी विभाग के विद्यार्थियों से ‘सर्जना’ की अपील है कि हिन्‍दी विभाग की बेबसाइट पर विभागीय जानकारी हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करने के लिए पहल करे। विवि की बेबसाइट पर अध्‍यापकों के नामों की सूची भी अंग्रेजी में दी गई है। …..साथ ही विवि में होने वाली गोष्‍िठयों आदि के समाचार ‘सर्जना’ को ईमेल करें। छा्त्र-सम्‍पादकों के नाम सहित।

‘मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता’/13 गजलें /डॉ. रामकुमार सिंह

इन गजलों के बारे में –
बहुत दिनों से …..या कहिये वर्षों से जो ‘ओढ़ता-बिछाता’ रहा …..उनमें से कुछ छपीं …..कुछ डायरियों के पन्नों पर बिखरी रहीं। …दुष्यंत से हमेशा प्रभावित रहा हूँ….इन गजलों में भी वह प्रभाव आ जाये तो लाजिमी-सी बात है………..

(एक)

मौत उनकी पारितोषिक हो गयी।
एक कुर्सी रिक्त घोषित हो गयी।

रात को इस घास पर जो ओस थी
आज प्रात: ही विलोपित हो गयी।

आ गयीं जब से जम्हूरी ताकतें
आम जनता और शोषित हो गयी।

कल कराया था इसी ने आचमन
यह नदी जो आज कलुषित हो गयी।

मुल्क के बाबत मिला जो पद उन्हें
मानसिकता अधिक दूषित हो गयी।

यात्री सब मौत के आगोश में –
रेल दुर्घटना सियासत हो गयी।

(दों)

पूछने को अब हजारों प्रश्न हैं।
और,सुलझा देने वाले सन्न हैं।

नौजवां चिल्ला रहे हैं- रोटियाँ
पर सियासी रहनुमा मदमग्न हैं।

पा गये सत्ता हमीं से आज, तो
कामकाजी हाथ उनके सुन्न हैं।

पीढ़ियों से भीख माँगी आजकल
सोमरस पीकर सदन में टुन्न हैं।

संस्था में एक पद है भृत्य का
डिगरियाँ वे देख उसकी खिन्न हैं।

चप्पलें चटकाईं – अनुभव दस बरस
कागजाते-भूख, सब संलग्न हैं।

आयु सीमा-पार उसकी हो गई
यही खामी देख वे प्रसन्न हैं।

(तीन)
अब निकल पाओगे कैसे, आज भी कुहरा तो है।
तुमसे पहले जो गया था राह में बिखरा तो है।

इस तरफ सूराख से आने लगी है रोशनी
आज सूरज मेरे घर के पास से गुजरा तो है।

पक्ष में अपने शराफत की दलीलें अब न दे
कह रहे हैं लोग अक्सर तू बहुत बिगड़ा तो है।

क्या समझकर तोड़ डाला पत्थरों से आईना
सूरतें कायम हैं अब भी कांच का टुकड़ा तो है।

काम कुछ करता नहीं था ये शिकायत थी हमें
अब वो पत्थर फेंकता है कुछ भी हो सुधरा तो है

(चार)

ऐसा बिखरा है समेटा नहीं जाता।
हाल घर का मेरे देखा नहीं जाता।

शख्स घर में हैं जो सभी अलग-अलग
एक ही सूत्र लपेटा नहीं जाता।

साँप उसके मेरे ऑंगन को तक रहे
मेरी चौखट से सपेरा नहीं जाता।

कहा था जिसमें कि मेरे नहीं हो तुम
लिखा वो ख़त मुझे, फेंका नहीं जाता।

नहीं पाबंद हूँ, ऐ वक्त! मुझे छोड़
ढले न शाम, सबेरा नहीं जाता।

बना दिये हैं तेरे पक्के मक़ानात
तेरा ये राह-बसेरा नहीं जाता।

मेरा इतिहास मेरे साथ ही दफन
मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता।

(पाँच)
डूबती सांसों का मंज़र देखते हैं।
वो खड़े होकर समन्दर देखते हैं।

आदमी को आदमी कहते नहीं हैं
जो उसे औलादे-बंदर देखते हैं।

हारकर, मुझको हराने के लिए अब
इस नगर मे वो धुरंधर देखते हैं।

मोल चमड़े का सरल है, इसलिए
मन भुलाकर ज़िश्म सुंदर देखते हैं।

दोस्त! परदे का चलन उनके लिए,जो-
घर में आकर घर के अंदर देखते हैं।

(छह)

उस समंदर से घटा वो रात-दिन उठती रहेगी।
इन दरख्तों से लता ये अंत तक लिपटी रहेगी।

मैं लिये फिरता हूँ तेरी यादगारों का पुलिंदा
चीज़ ये बेज़ान कब तक ज़िश्म से लटकी रहेगी।

जिंदगी अब तक मिटा पायी बनावट की हँसी
ऑंसुओं की खोज में ये जिंदगी मिटती रहेगी।

गीत मेरे याद रख मुझको बुलाने के लिए,जब-
आशियां रह जायेगा ना नाम की तख्ती रहेगी

(सात)
समाज चमत्कृत हो गया
दलित पुरस्कृत हो गया।

दुख ने माँज दिया जिसे
व्यक्ति परिष्कृत हो गया।

साठ वर्ष बाद, अब-
क्या व्यवहृत हो गया।

तात ने नहीं लड़ा चुनाव
वत्स उपकृत हो गया।

(आठ)

जिंदगी इक दौड़ है, रफ्तार की बातें करें।
नफरतों को अलग रख दें, प्यार की बाते करें।

गैरों के ऑंगन में झाँक लिये बहुत दिन
विषय बदलें, आप अपने द्वार की बातें करें।

देखिये सरकार हम ऐसे नहीं हैं, कि-
और बातें छोड़कर बेकार की बातें करें।

अभी तक दरबार की बातें करी हैं
अब चलो घर बैठकर घर-बार की बातें करें।

काम की बातें करेंगे एक दिन तो ठहरिये
आज तो इतवार है इतवार की बातें करें।

दाल आटे की तो सुन लें और जीरे-हींग की
फुरसत में जो हो जायें तो अखबार की बातें करें।

हालात से इस बार चलिये हम लड़ेंगे
बेकार में हर बार क्यों अवतार की बातें करें।

‘शालीनता है नगर में’ ये आकलन है ऊपरी
हृदय में जो उठ रहा उस ज्वार की बातें करें।

ये नहीं स्वीकार कि तलवार की बातें करें
कलम की हो बात तो हथियार की बातें करें।

(नौ)

काम अटका है तो संभल जाइये।
काम चल जाये तो बदल जाइये।

रास्ता बहुत सँकरा है जनाब
मुझे गिराइये और निकल जाइये।

इस तरह कुछ भी नहीं मिलता
खिलौनों के लिए मचल जाइये।

झोंपड़ी से बड़े हैं आपके पाँव
रखना चाहते हैं – महल जाइये।

लोग ऑंखें दिखाने लगते हैं
जहाँ भी आजकल जाइये।

आपके अफ़सरान ने बुलाया है
जाइये – सर के बल जाइये।

(दस)
ऑंकड़े जो प्रश्न में हैं औसतन सारे ग़लत हैं।
प्रश्न का हल खोजने के क़ायदे मेरे ग़लत हैं।

तर्जुमा करना सिखाया जिनकों हमने अभी तक
अब वो कहते हैं तुम्हारी नज्म में हिज्जे ग़लत हैं।

कह रहे हो – ख़ास ही आवाज सुनता है खुदा
तो बताओ उसके दर पे कौन से सज़दे ग़लत हैं।

अब तराना कोई भी हो दौर वो ना आयेगा
लोग अक्सर बात ये कहते हैं पर कहते ग़लत हैं।

(ग्यारह)
कहते हैं लोग मेहनत से क्या नहीं मिलता।
हम खून भी बहायें तो सिला नहीं मिलता।

मुद्दे की अगर बात हो – चर्चा नहीं होती
चर्चा अगर करनी है तो मुद्दा नहीं मिलता।

आवाम के हालात पे ऑंसू बहाये कौन ?
चिल्लाते हैं संसद में वो भत्ता नहीं मिलता।

आबाद मेरा मुल्क तूने कर दिया लीडर !
है घर नहीं, राशन नहीं, कपड़ा नहीं मिलता।

(बारह)
हम जो मिट्टी में पले हैं, पहले तू भी ख़ाक तो बन।
नापना मेरी गिरेबां चल अभी बरबाद तो बन।

हैं निरे तिनके सही, जल जायेंगें लम्हों में, पर-
राख करने को इन्हें तू लपलपाती आग तो बन।

दर्द को महसूस करने का तरीका पूछता है
अभी तक मरहम रहा है अब जरा तू चाक तो बन।

साथ मेरा चाहता, मैं आबे-दरिया की रवानी
तू किनारे की तलब, आ धार बन मझधार तो बन।

इश्क संजीदा नहीं तू तलबगारे-ज़िश्म है
उनके दिल तक जा सके तू आज वो फरियाद तो बन।

(तेरह)
किस क़दर बदली हुई है -कि ये फिजा देखो।
बजूद खुद से ही लगता है अब जुदा देखो।

अभी तक हम जिन्हें देखे नहीं सुहाते थे
आज हम पर हुए हैं बेवज़ह फिदा देखो।

लगी है गिरने पे कम ही, कि उड़ सके थोड़ा
उठेगा फिर कोई उस जैसा जलजला देखो।

दूर रहना कि दब के दम नहीं निकल जाये
शहर में इनका है ऊँचा ही दबदबा देखो।

शख्स जो भाया उसे निगला है छोड़ा ही नहीं
वाह क्या बात है क्या खूब हाजमा देखो।

ये झपटना औ’ लिपटना हमें पसंद नहीं
रखा करिये हमसे आप फासला देखो!

जो नही करना था वही काम किया है तुमने
कर ही डाला है तो करने का लो मज़ा देखो।

हुआ बहुत कि हमें और न उलझाओ प्रिये!
चलो निकलो यहाँ से अपना रास्ता देखो।

कि- ये कमबख्त सूरतें हीं बरग़लायेंगी
सूरते-हज्जाम नहीं – हाथ उस्तरा देखो।

किस तरह देखा था कुछ भी नहीं दिखाई दिया
उस तरह ठीक नहीं अब की इस तरह देखो।

दिया है किसने तुम्हें इस जगह काला-पानी
जरा सोचो तुम अपने हक में फैसला देखो।

गया है कब का नहीं लोटा मेरे घर का दिया
हुआ है क्या वहाँ जाकर जरा माजरा देखो।

– रामकुमार सिंह

बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये/आप-औ’ हम शामियाने हो गये …..हिन्दी गज़ल

इस गज़ल के बारे में :-
मेरी यह गज़ल ‘पाखी’ के मार्च 2009 अंक में प्रकाशित हुई थी। ‘सर्जना’ पर ‘पुनर्प्रकाशन’ के अंतर्गत जारी कर रहा हूँ। यह गज़ल पहली बार प्रकाशित करने के लिए ‘पाखी’ एवं सम्पादक अपूर्व जोशी जी का आभार। गज़ल की राजनीतिक चेतना के बारे में पाठकीय प्रतिक्रियाँ ही उन अर्थों को ध्वनित करेंगी जो शायद गज़ल के शब्दों के अंतराल के बीच हों……………

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सांत्वना के सौ बहाने हो गये।
दरअसल अब वो पुराने हो गये।
बैठते थे मंच के जो मध्य में
पार्श्व में जाकर फसाने हो गये।
संस्था ने एक कम्प्यूटर मँगाया
और दस साथी रवाने हो गये।
चोरियाँ बढ़ने लगी हैं आजकल
अब नगर में पुलिस थाने हो गये।
कल हमारे बीच से उठकर, सियासी-
ओढ़कर चोला सयाने हो गये।
बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये
आप-औ’ हम शामियाने हो गये।
ख्याति पा अब आप हैं पहुँचे हुये
किन्नरों से जाने-माने हो गये।
आप थे जो गुड़ तो घर-घर में रहे
आप अब काजू-मखाने हो गये।

-डॉ. रामकुमार सिंह