”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ”/दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति

इस अग्रलेख के बारे में :
तब मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का विद्यार्थी था। पहली बार दुष्यंत कुमार का नाम पता चला जब ग्वालियर में श्रीमती अंजना मिश्र ने ‘दुष्यंत जयंती’ मनाई। मैं और मेरे साथी दुष्यंत को शकुंतला वाला दुष्यंत समझे थे। फिर ‘साये में धूप’ हाथ आयी और एक सिलसिला चल पड़ा। कई गजलों को लयबध्द करके गाया भी। जुमले की तरह दुष्यंत की पंक्तियों का जमकर इस्तेमाल भी किया। एक-दो वर्ष बाद पत्रकारिता करते हुए दुष्यंत पर यह अग्रलेख डॉ. राम विद्रोही जी के सम्पादन में प्रकाशित दैनिक आचरण में प्रकाशित हुआ। बिना कोई परिवर्तन किये आज ज्यों का त्यों रिलीज कर रहा हूँ………………….

दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति
रामकुमार सिंह/ 1 सितम्बर, सन 2000/दैनिक आचरण (ग्वालियर/सागर)/सन्दर्भ : ‘साये में धूप : दुष्यंत कुमार त्यागी/राधाकृष्ण प्रकाशन – सन् 1975

गज़ल की नवीन परम्परा के सूत्रधार और साहित्य के अभिनव आयाम के प्रणेता दुष्यंत को साहित्य-जगत ने मूर्धन्य स्थान दिया, किन्तु उन्हें केवल साहित्य-मनीषी के रूप में निरूपित करना पक्षपात होगा। वस्तुत: वे सामाजिक-राजनीतिक दार्शनिक हैं, साहित्य-सृजनकार बाद में। उनका काव्य मंचीय मनोरंजन अथवा बुध्दि-विलास नहीं, बल्कि उसमें जनाकांक्षाओं की पीड़ा अपने उदात्त रूप में अभिव्यक्त होती है। उनसे अभिनव विचारधारा का स्रोत प्रस्फुटित हुआ है, जिसे दुष्यंतवादी परम्परा कहना होगा।
परतंत्रता की जकड़न से उन्मुक्ति की छटपटाहट के दौरान काव्य, दर्शन, चिंतन और विचार-प्रवाह, सभी पक्ष क्रांति, उद्धोष के वाहक थे। प्रत्येक कोने से मुक्ति की अभिलाषा अपने तीव्रतम आवेग में ज्वार की तरह उमड़ती थी। अपूर्व त्याग के पश्चात जो स्वतंत्र उड़ान भरने की क्षमता राष्ट्र को प्राप्त हुई उस शक्ति का नकारात्मक पक्ष भी सामने आते देर न लगी। इतने कम समय में वे जनाकांक्षायें, आशायें, और चातक-पिपासा धूमिल हो जाएंगी, ऐसा ज्ञात न था। गणतंत्र की ऐसी विडम्बना का स्मरण न था जहाँ आकर सारा विश्वास, दिलासा मृगमरीचिका सिध्द हो गया। इस पीड़ा की अभिव्यक्ति दुष्यंत कुमार के शब्दों में-

”कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए”

जिस दृष्टिकोंण से राष्ट्र ने जनतांत्रिक परम्परा को आत्मसात किया उसके अविलम्ब अवसान ने स्वनिल आश्रय से मोहभंग कर दिया। देखिये-
”ये सोचकर कि दरख्तों में छाँव होती है
यहाँ बबूल के साये में आके बैठ गये”

राष्ट्रोदय के लिए अपने सर्वस्व का मूल्य चुकाकर और निजत्व को विलीन कर जिन आदर्शों को जन्म दिया गया, क्रांतिवीरों को यह आभास न रहा होगा कि निकट भविष्य में वे ही सूत्र स्वार्थ का मंच निर्मित करने में प्रयोग किये जायेंगे-
”धीरे-धीरे भीग रहीं हैं सारी ईंटें पानी में
इनको क्या मालूम कि आगे चलकर इनका क्या होगा”

यथार्थ का जो परिदृश्य उपस्थित हुआ उसकी तीक्ष्ण अभिव्यक्ति देखिये-
”कल नुमाइश में मिला वो चीथडे पहने हुए
मैने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है”

और-
”रोज अखबारों में पढ़कर ये खयाल आया हमें
इस तरफ आती तो हम भी देखते फस्ले बहार”

बहार’ कहाँ अपनी छटा बिखेर रही है, ये बात छुपी नहीं है। जिन मौलिक समस्याओं से निजात पाने की अभिलाषा लिये आंखें बुढ़ा गईं उनका उन्मूलन करने के नाम पर ‘महानिधि पाकर बौराए हुए लम्पटों’ का प्रयास तो देखिये ! वातानुकूलित विचारग्रहों में चाय की चुस्कियों के साथ मूलभूत समस्याओं पर मंत्रणा करने वाले कथित नेतृत्वधारियों पर जब दुष्यंत प्रहार करते हैं तो आश्चर्य है कि उनके शब्द क्यों भीतर तक कचोट नहीं जाते ?-
”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा”

दुष्यंत का पीड़ामय व्यंग्य घिनौनी राजनीति को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। वे एक जनसामान्य से कहते हैं कि-
”मस्लहम आमेज होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है”

चरम शक्ति के रूप में उत्तारदायी होने के कारण, दुष्यंत, जन-जन को झकझोरते हैं जिनके स्वार्थपूर्ण एवं संकुचित दृष्टिकोंण व व्यवहार से समग्र राष्ट्र को अवनति में ढकेलने वालों का साहस हिलोरें ले रहा है।-
”इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ”

और-
”इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है”

साथ ही कुछ लोगों के स्वार्थ के लिए अनेक लोगों का चाटुकारिता-उन्माद भी दुष्यंत को असह्य है-
”रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनियाँ
इस बहकती हुई दुनियां को संभालो यारो”

सारे परिदृश्य को देखकर भी जब सत्य का प्राकटय नहीं होता, दर्शन अंधा और चिंतन मूक हो जाता है तो चारणी प्रवृत्ति के विरोध में दुष्यंत आम आदमी से लेकर कवि, दार्शनिक और सम्पूर्ण बुध्दिजीवी वर्ग को कड़े शब्दों में लताड़ते हैं-
”सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं”

”गजब है सच को सच कहते नहीं वो
कुरानो-उपनिषद खोले हुए हैं”

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते हैं
चलो यहां से चलें, हाथ न जल जाएं कहीं”

इस बीच दुष्यंत अपने उत्तारदायित्व को गहनता से अनुभव करते हैं। कोई सम्मोहन उन्हें ‘सत्ता का भोंपू’ नहीं बना पाता –
”मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं।”

यहां आकर दुष्यंत के नजरिये का मूल उद्देश्य पता चलता है। यहीं इस प्रश्न का उत्तार मिलता है कि क्या बात हुई कि दुष्यंत ने शायरी की? यही वो बात है जहां वे मंचीय ग्लैमर या भौतिक वैभव को लूटन के लिए सोचा-समझा माध्यम अपनाने की बजाय ऐसी अभिव्यक्ति चुनते हैं जो उन्हें चारणों की श्रेणी से सर्वथा अलग कर जन-जन के पीड़ामय आक्रोश का दार्शनिक बना देती है। देखिये-
‘मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूँ
हर गज़ल अब सल्तनत के नाम इक बयान है”

इस उत्तरदायित्व को बखूबी निभाते हुए वे एक ओर यथार्थ का चित्रण करते हैं तो दूसरी ओर निवारण का सुझाव भी देते हैं। और उनका एक मत ही काफी है इस बात के लिए कि शासकों और शासितों में विभाजित ‘झूठी जम्हूरियत’ भर्रा उठे-
”अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं”

और देखिये-
”एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है”

तथा-
”कैसे आकाश में सूराख हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”

इसी क्रम में एक अभिनव क्रांतिकारी आशावाद देखिये-
”गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में
सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिये”

आमूलचूल परिवर्तन की बात कर वे विवादास्पद शख्सियत बनने का लक्ष्य नहीं रखते, बल्कि-
”सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये”

सामाजिक पीड़ा के इस दार्शनिक की एक भी पंक्ति यदि हमें झकझोर न सके तो फिर न तो निजात पाने की अभिलाषा रखें न दर्द का अलाप करें। दुष्यंत कहते हैं-
”आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों मे चीख हरगिज कारगर होगी नहीं”

– डॉ. रामकुमार सिंह