अरविंद कुमार सिंह जी का अचानक मुरैना आगमन और निवास पर बिताये कुछ पल…….ग्वालियर में स्नातक-शिक्षक हिन्दी के आगामी सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविर में अपने पाठ पर चर्चा के लिए डाॅ. रामकुमार सिंह ने किया पधारने का आग्रह

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मुरैना/23 अप्रेल 2016 / राज्यसभा चैनल के संपादक, संसदीय और कृषि मामलों के प्रभारी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा  कृषि पत्रकारिता के देश के शिखर सम्मान चाौधरी चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित और सबसे बढ़कर हमारी पाठ्यपुस्तक कक्षा-8  वीं की ‘बसंत’ में ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनियाँ’ पाठ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह राज्यसभा चैनल की अपनी टीम के साथ देश में जलसंकट की पड़ताल करने निकले हैं। चम्बल, बुंदलेखण्ड से होते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती वे इलाके जहाँ जलसंकट के कारण कृषि और किसानों की चिंता का साझा करना सारे देश की जरूरत बन गई है, हम सबकी ओर से अरविंद जी एक सोद्देश्य यायावर की तरह लम्बी यात्रा पर हैं। ग्वालियर-चम्बल से वे गुजरें और मुरैना में अपने आत्मीयजन को खबर न दें यह संभव ही नहीं, बस! फिर क्या था आज शाम लगभग 8ः30 बजे वे मुरैना में डाॅ. रामकुमार सिंह के निवास पर पधारे। आग्रह करने पर भोजन भी किया और बच्चों को शुभाशीष दिया। कुमारी वैष्णव और शैव ने संगीतमय रामकथा सुनाई तो अपनी प्रिय कलम उन्होंने पुरस्कार में दे दी। डाॅ. रामकुमार सिंह ने उनसे आग्रह किया यदि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों की यात्रा से लौटते समय अथवा जहां भी वे 18 से 29 मई 2016 में हों, कृपया ग्वालियर पधारें और स्नातकशिक्षक- हिन्दी के सेवाकालीन प्रशिक्षण में पधारें। डाॅ. सिंह ने पाठ्यक्रम निदेशक एवं प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 सुश्री राजकुमारी निगम एवं समस्त दल की ओर से उन्हें इस हेतु अतिथि विद्वान के रूप में आमंत्रित किया।

 

मुरैना में 23 अप्रेल की शाम श्री अरविंद कुमार जी साथ ऐतिहासिक क्षण

इस दौरान वे पूरे समय के देश के जलसंकट, जल सहेजने से हम लोगों द्वारा किये गये परहेज के कारण उत्पन्न भयावह स्थिति के बारे में बताते रहे। किस तरह जल को परिवहन से दूर-दूर तक पहुंचाने की स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता और जल को महत्वहीन वस्तु की तरह बहाने के दुष्परिणामों के प्रति उनके स्वयं के देश भर के भ्रमण और जानकारियों ने हमारे रोंगटे खड़े कर दिये। इस दौरान उनके साथियों के अतिरिक्त निवास पर नईदुनिया-जागरण समूह के वन्यजीवन विशेषज्ञ पत्रकार शिवप्रताप सिंह भी उपस्थित रहे।
बातों ही बातों में उनसे चर्चा करने पर जानकारी मिली कि द्विवेदी युग के मूर्धन्य व्यक्तित्व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी पर अभूतपूर्व, दुर्लभ और ऐतिहासिक अभिनंदन ग्रंथ को सामने लाने का महत् कार्य उनके द्वारा किस तरह सम्पन्न हो गया। उनका देश भर में भ्रमण पर रहना, सूक्ष्म-पर्यवेक्षण और जनमानस को कुछ न कुछ प्रदाय करने की उत्कट भावना के चलते ही यह संभव हुआ। गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार से लेकर राष्ट्रपति पुरस्कार और कृषि पत्रकारिता के देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने पर भी अरविंद कुमार जी में वही सादगी बरकार है जो दशकों में कभी नहीं बदली। बिल्कुल भारत रत्न उस्ताद बिसिमिल्लाह खान वाली सादगी। वे कभी पूर्वोत्तर के बोडो इलाके में होते हैं तो कभी तेलंगाना, कभी चम्बल तो कभी मराठवाड़ा। उनकी ग्रामीण चैपालों की श्रृंखला ने राज्यसभा ही नहीं महामहिम को भी अपना प्रभावित दर्शक बना लिया।
लगभग 10 बजे उनका काफिला ग्वालियर की ओर रवाना हो गया। इदम् ज्ञानम् सभाकक्ष उनकी उपस्थिति से धन्य हुआ। जयंत जी द्वारा सूचित करने पर उनका हृदय से आभार।

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2015 में अरविंद कुमार जी को पटना में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 87वें समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश के कृषि पत्रकारिता के शिखर सम्मान, चौ.चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता से  सम्मानित किया। यह पुरस्कार इलेक्ट्रानिक मीडिया श्रेणी में मिला । इस समारोह में बिहार और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी, केंद्रीय कृषि मत्री श्री राधा मोहन सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार और कृषि क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां और कृषि वैज्ञानिक मौजूद थे।

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(भारतीय डाक विभाग की श्री अरविंद कुमार सिंह जी से विशेष आत्मीयता है। क्यों न हो, तकनीकी हमले के दौर में वे ही तो हैं जो चिट्ठियों की हामी भरते है। उनकी पुस्तक भारतीय डाक का अनुवाद भारतीय और विदेशी अनेक भाषाओं में हो चुका है। डाक टिकिट यहां दर्शनीय है।)

हिंदी जगत को एक अनूठी भेंट दी श्री अरविंद कुमार सिंह जी ने

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ – 82 साल बाद फिर से प्रकाशन

हिंदी की इसी ऐतिहासिक धरोहर के लोकार्पण समारोह का आयोजन 20 सितंबर 2015 को

50 प्रवासी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ पर हुआ।

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राजधानी के प्रवासी भवन में ऐतिहासिक द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण के मौके पर साहित्यिक हस्तियों और पत्रकारों के साथ राजधानी में साहित्यप्रेमियों का समागम हुआ। आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में प्रकाशित हिंदी का पहला अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ दशा को प्राप्त था। 83 सालों के बाद इस ग्रंथ को हूबहू पुनर्प्रकाशित करने का काम नेशनल बुक ट्स्ट, इंडिया ने किया । आज के संदर्भ में इस ग्रंथ की उपयोगिता पर मैनेजर पांडेय का एक सारगर्भित लेख भी है।

ग्रंथ के लोकार्पण और विमर्श के मौके पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और विख्यात लेखक डॉ.विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग-प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में विभाजित हो चुकी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान और किसानों के लिए भी लिखते थे। हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्रारंभ द्विवेदी जी से ही हुआ।’’
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मैनेजर पांडे ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि, “यह भारतीय साहित्य का विश्वकोश है।” उन्होंने आचार्य जी की अर्थशास्त्र में रूचि व‘‘संपत्ति शास्त्र’’ के लेखन, उनकी महिला विमर्श और किसानों की समस्या पर लेखन की विस्तृत चर्चा की। इस ग्रंथ में उपयोग की गयीं दुर्लभ चित्रों को अपनी चर्चा का विषय बनाते हुए गांधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र ने इन चित्रों में निहित सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने नंदलाल बोस की कृति ‘‘रूधिर’’ और अप्पा साहब की कृति ‘‘मोलभाव’’ पर विशेष ध्यान दिलाते हुए उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया और कहा कि सकारात्मक कार्य करने वाले जो भी केन्द्र हैं उनका विकेन्द्रीकरण जरूरी है।

‘नीदरलैड से पधारीं प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि हिंदी सही मायने में उन घरों में ताकतवर है जहाँ पर भारतीय संस्कृति बसती है। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की निदेशक व असमिया में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका डॉ. रीटा चौधरी ने कहा कि, यह अवसर न्यास के लिए बेहद गौरवपूर्ण व महत्वपूर्ण है कि हम इस अनूठे ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन के कार्य से जुड़ पाए। ऐसी पुस्तकों का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी होना चाहिए। डॉ. चौधरी ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ हिंदी का ही नहीं बल्कि भारतीयता का ग्रंथ है और उस काल का भारत-दर्शन है।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय ने इन दिनों मुद्रित होने वाले नामी गिरामी लोगों के अभिनंदन ग्रंथों की चर्चा करते हुए कहा कि, “ऐसे ग्रंथों को लोग घर में रखने से परहेज करते हैं, लेकिन आचार्य द्विवेदी की स्मृति में प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य,समाज, भाषा व ज्ञान का विमर्ष है न कि आचार्य द्विवेदी का प्रशंसा-ग्रंथ।” इस ग्रंथ की प्रासंगिकता व इसकी साहित्यिक महत्व को उल्लेखित करते हुए श्री राय ने यहां तक कहा कि, “यह ग्रंथ अपने आप में एक विश्व हिन्दी सम्मेलन है।”
कार्यक्रम के प्रारंभ में पत्रकार गौरव अवस्थी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी स्मृतियों को पावर प्वाइंट के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रेजेंटेशन यह बात उभर कर सामने आयी कि किस तरह से रायबरेली का आम आदमी, मजूदर व किसान भी आचार्य द्विवेदी जी के प्रति स्नेह-भाव रखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने इस ग्रंथ के प्रकाशन के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट और रायबरेली की जनता को धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के संपादकीय और रेल जीवन पर भी काम करने की जरूरत है।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी ने किया।

सन् 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य द्विवेदी के सम्मान में प्रकाशित इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के पत्र के साथ भारत रत्न भगवान दास, ग्रियर्सन, प्रेमंचद, सुमित्रानंदन पंत, काशीप्रसाद जायसवाल,सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उस दौर की तमाम दिग्गज हस्तियों की रचनाएं और लेख है। वैसे तो इस ग्रंथ का नाम अभिनंदन ग्रंथ है और आचार्यजी के सम्मान में प्रकाशित हुआ लेकिन आज कल जैसी परिकल्पना से परे इसमें आचार्य जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ही नहीं साहित्य की तमाम विधाओं पर गहन मंथन है।

इस समारोह में विख्यात लेखक रंजन जैदी, अर्चना राजहंस, योजना के संपादक ऋतेश, राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के महासचिव शिवेंद्र द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे, जय प्रकाश पांडेय, राकेश पांडेय, संपादक प्रदीप जैन, भाषा सहोदरी के संयोजक जयकांत मिश्रा, विख्यात कवि जय सिंह आर्य,देवेंद्र सिंह राजपूत,शाह आलम, विनय द्विवेदी, गणेश शंकर श्रीवास्तव, बरखा वर्षा, तरुण दवे समेत तमाम प्रमुख लोग मौजूद थे।

 

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अरविंद कुमार सिंह का पूर्ण सम्पर्क/पता यहाँ खासतौर पर ‘सर्जना’ के माध्यम से प्रस्तुत है:

अरविंद कुमार सिंह जी

वरिष्ठ संपादक,राज्य सभा टीवी, भारतीय संसद

अध्यक्ष, रायटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली

12 ए, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड, संसद भवन के पास नयी दिल्ली 110001

फोन-9810082873, 9811180970

ईमेल-arvindksingh.rstv@gmail.com, arvind.singh@rstv.nic.in

 

 

समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे

: तीसरे सप्‍तक में कुँवर नारायण…………..

‘तीसरा सप्‍तक’ उठाता हूँ। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रथम संस्‍करण 1959 में छपा, अज्ञेय के सम्‍पादन में। मेरे हाथ में चौथा संस्‍करण अगस्‍त 1979 है। हर परीक्षा में सप्‍तकों पर प्रश्‍न रहा करते, इसलिए सप्‍तक और अज्ञेय के नाम के प्रति एक आकर्षण इन सवालों ने बना रखा था। अज्ञेय लिखित भूमिका में डूबते-तिरते हुए नामों की सूची पर नजर डालता हूँ वे नाम जो हर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते रहे………..5 वें क्रम पर जाकर ठहरता हूँ, …… कुंवर नारायण। पिछले दिनों उनकी ज्ञानपीठ रचना ‘बाजश्रवा के बहाने पढ़ रहा था। ‘तीसरा सप्‍तक’ हाथ आया तो इस नजरिये के साथ प्रवेश किया कि देखें तो सही शुरूआती कुंवर नारायण से ज्ञानपीठ कुंवर नारायण तक सर्जना के सोपान किस तरह चढ़े हैं।
कुंवर जी के परिचय और वक्‍तव्‍य( 146 से 151) में जो बिंदास लगा वह रेखांकित कर लिया-
एक – ‘’शिक्षा की जो पद्धति स्‍कूल, कॉलेज या विश्‍वविद्यालय में रही, उस से मन सदा विद्रोह करता रहा, इस लिए शायद स्‍कूली अर्थ में कभी भी बहुत उत्‍कृष्‍ट विद्यार्थी नहीं हो सका।‘’
दो- आरम्‍भ से ही पढ़ने और घूमने का बहुत शौक रहा है, और दोनों के लिए पर्याप्‍त अवसर भी मिलता रहा। सन् 1955 ई में चेकोस्‍लोवाकिया, पोलैण्‍ड, रूस और चीन का भ्रमण किया-‘ यह कइ तरह से महत्‍वपूर्ण रहा’
तीन – ‘कविता पहले-पहल सन् 1947 में अंगरेजी में लिखना आरम्‍भ किया, पर शीघ्र ही हिन्‍दी की ओर प्रव्रत्‍ति हुई और तब से नियमित रूप से हिन्‍दी में लिखने लगा।‘
चार – सन् 1956 से, उस पत्रिका के बन्‍द होने तक, युगचेतना के सम्‍पादक मण्‍डल में रहे। अब मोटर के व्‍यवसाय में मुब्‍ितला रहते हैं – और अपनी इस व्‍यस्‍तता से स्‍वयं त्रस्‍त हैं : ‘ फिक्रे-दुनिया में सर खपाता हूँ, मैं कहां और ये बवाल कहां’
पांच – ‘’साहित्‍य जब सीधे जीवन से सम्‍पर्क छोड़कर वादग्रस्‍त होने लगता है, तभी उस में वे तत्‍व उत्‍पन्‍न होते हैं जो उस के स्‍वाभाविक विकास में बाधक हों। जीवन से सम्‍पर्क का अर्थ केवल अनुभव मात्र नहीं, बल्‍िक वह अनुभूति और मनन-शक्‍ित भी है जो अनुभव के प्रति तीव्र और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया कर सके।‘’
छह- ‘ जीवन के इस बहुत बडे ‘कार्निवाल’ में कवि उस बहुरूपिये की तरह है जो हजारों रूपों में लोगों के सामने आता है, जिस का हर मनोरंजक रूप किसी न किसी सतह पर जीवन की एक अनुभूत व्‍याख्‍या है और जिस के हर रूप के पीछे उस का एक अपना गम्‍भीर और असली व्‍यक्‍ित्‍व होता है जो इस सारी विविधता के बुनियादी खेल को समझता है।‘’

कुंवर जी कुल 21 कविताएं तीसरे सप्‍तक में हैं। कुछ ही कविताएं समकालीन कविता के उस रूप का संकेत करती हैं जिसके लिए कुंवर नारायण जाने जाते हैं। मिथकीय चेतना के उच्‍चतम सोपान पर पहुंचे कुंवर नारायण की ‘सम्‍पाती’ जैसी कविता इस लिहाज से रेखांकनीय हो जाती है। शब्‍दों की जो मितव्‍ययता कुंवर जी की खास पहचान है उसका संकेत उनकी प्रारंभिक कविताओं से ही चला आया है। कुछ कविताएं आम आदमी की उदासी की हैं तो कुछ प्रक़ति का नये ढंग से अवलोकन, कुछ बाल कविताएं सी प्रतीत होती हैं, मगर हैं प्रौढ सत्‍य को लेकर। मुझे सर्वाधिक प्रभावित करने वाली दो कविताएं यहां हैं – ‘सम्‍पाती’ और ‘घर रहेंगे’
एक – ‘गहरा स्‍वप्‍न’ : ‘’सत्‍य से कहीं अधिक स्‍वप्‍न वह गहरा था / प्राण जिन प्रपंचों में एक नींद ठहरा था’’
दो – ‘दो बत्‍तखें : ‘दोनों ही बत्‍तख हैं / दोनों ही मानी हैं / छोटी-सी तलैया के/ राजा और रानी हैं’’
तीन- सम्‍पाती : ‘ धीमा कर दो प्रकाश/ घायल, सूर्योन्‍मुख,/ असंतुष्‍ट, उत्‍पाती:/फेनों का विप्‍लव बन/ लहरों पर तितर-बितर/ दग्‍ध-पंख सम्‍पाती :/ठण्‍डे अंधेरे के एक सुखद फाहे को/ जलती शिराओं पर ….. /धीमा कर दो प्रकाश । / मोम की दीवारें /गल न जायें,/ सपनों के लाक्षागृह/ / जल न जायें, / प्‍यार के पैमाने / -दृवित नेत्र – / छल न जायें…./ धीमा कर दो प्रकाश / कॉंच के गुब्‍बारे, / सोने की मछलियॉं /कुछ नकली चेहरे / कुछ मिली-जुली आकृतियाँ, / ओस की बूँदों-से चमक रहे रजत-द्वीप / घुल न जायें…../ धीमा कर दो प्रकाश । / पर्णकुटी की छाया शीतल है, / पॉंवों के नीचे फिर धरती का दृढ़ तल है/ गर्म देह/ नील नयन / क्षितिज पार / उड्डयन,/ प्राणों में एक जलन / उस ज्‍वलन्‍त ऑंधी की/ स्‍मृतियॉं / फिर न मिल जाऍं / धीमा कर दो प्रकाश।’
चार : ”घर रहेंगे, हमीं उन में रह न पायेंगे : समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे :
अनर्गल जिंदगी ढोते हुए किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जायेंगे।
मृत्‍यु होगी खड़ी सन्‍मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविध, स्‍वप्‍न खोके, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।”

‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है।
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पुस्तक-समीक्षा
‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’
पुस्तक : ‘रामदरश मिश्र : सृजन संवाद’
लेखिका : डॉ. सविता मिश्र
प्रकाशक : विमला बुक्स, दिल्ली
मूल्य : तीन सौ रुपये (सजिल्द)
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अध्येता जब एकात्म होकर अपने अभीष्ट संदर्भ का अनुशीलन करता है तो अभिप्राप्त नतीजे रेखांकनीय हो जाते हैं। अध्येता जब स्वयं सर्जनात्मक प्रतिभा रखता हो तो ‘एकात्म होना’ अधिक घनीभूत होता है, साथ ही प्रतिप्रश्नों की द्वंद्वात्मकता के स्थान पर एक ललित-संवाद स्थापित होता है। ‘रामदरश मिश्र : सृजन-संवाद’ पुस्तक में मूल रूप से यही भावभूमि स्थापित होकर आयी है।
डॉ. सविता मिश्र ने रामदरश जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और रचना-संसार से परिचित होते हुए – उसे खंगालते हुए – फिर आत्मसात करते हुए …….और अंतत: विश्लेषित करते हुए जिस सर्जनात्मकता व लालित्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण का परिचय दिया है वह नव-अनुसंधित्सुआें को अपने-अपने ‘समीक्ष्य’ संदर्भों के प्रति एकाकार-भाव से अनुशीलन किये जाने की अभिनव-प्रणाली का बोध कराता है।
हिन्दी साहित्य में रामदरश मिश्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सर्जनाकार, चिंतक व मनीषी होने के साथ ही विभिन्न विधाओं में वे अपनी मौजूदगी भी रखते हैं। लोक-नैकटय को उन्होने विस्मृत नहीं होने दिया है। प्रत्येक सुपरिचित के प्रति नव-दृष्टि अपनी स्वयं की कुछ विशेषताएँ लेकर सामने आती है। प्रकृति की हर नई कोंपल ऑंखे फाड़ते हुए वटवृक्षों को देखती है – नवजिज्ञासु के तौर पर भोले प्रश्न भी करती है। हर जिज्ञासा की प्रतिपूर्ति और प्रत्येक प्रश्न का उत्तार अपने अभीष्ट से भावगत साम्यवस्था की ओर एक कदम होता है। सर्जना के वैराटय से जुड़ी विषयवस्तुओं और उनके ‘फिनेमिना’ पर जब एक अनुशीलनकर्ता संवाद करता है तो कुछ नया भी घटित होता है जो पूर्वकृत सर्जना से सम्बन्धित होते हुए भी कुछ नव्यतम बनकर सामने आता है। तब निर्विवाद रूप से यह कहना होता है कि संवादकर्ता के व्यक्तित्व की छाप ‘सृजन-संवाद’ को शब्दबध्द किये जाते समय आ पड़ती है।
पुस्तक में कुल 19 लेख हैं जो सतरंगी आभा लिये हुए हैं। इनमें भेंटवार्ता, यात्रा, संस्मरण, रेखाचित्र, व्यक्तित्वानुभूति, जीवनी आदि के तत्वों के अलावा रामदरश मिश्र जी के सर्जना-संसार पर चिंतन-मनन और विश्लेषण भी पूरी रचनात्मक प्रासंगिकता के साथ उपलब्ध है। अधिकतर लेख ‘अध्येता-समय’ की डायरी की तरह हैं जो अपने अलग-अलग अस्तित्व को समेटते हुए संकलन के रूप में यहाँ हैं। पहले ही लेख ‘वह दिन’ में लेखिका के स्वतंत्र भावास्फुरण की झलक मिल जाती है। रामदरश जी से भेंटवार्ता के प्रसंगोपरांत यह वर्णन देखें -”साढे ग्यारह वर्षीया अपूर्वा और दस वर्षीया गिन्नी के बाल-सुलभ प्रश्नों और कौतूहल के रंगों में डूबी भीगी-भीगी सी दोपहर ऑटो के साथ-साथ भाग रही थी। बादलों को देखकर मिश्र जी की ‘यायावर बादल’ कविता याद आ रही थी”
रामदरश जी के व्यक्तित्व से परिचित कराते ललित लेखों में – ‘साहित्य का विन्ध्याचल’, ‘ एक गँवई व्यक्तित्व’ आदि हैं। एक स्थान पर रामदरश जी के विषय में लिखा गया है कि- ”महानगर की दीवाली की जगमगाहट के बीच उन्हें याद आने लगती है गाँव की दीवाली और उनकी स्मृति में जगमगा उठते हैं मिट्टी के दीये। दीयों का उजास उनकी शिराओं से फूटने लगता है और स्मृति में उभर आते हैं पूजाभाव से तेल ढारते हुए माँ और भाभी के हाथ।” ‘जहाज का पंछी’ जैसे लेखों की विशेषता यह है कि अनेक कथा-पात्रों को रचने वाले रामदरश जी इसमें स्वयं पात्र बनकर पाठकों के सामने हैं। बालक रामदरश को चलचित्र के रूप में देखना सुहाता है- ”मेले में ‘डह-डह-डग-डग, डह-डह-डग-डग-हुडुक्क, झाल ओर मृदंग के ताल पर नाचते नचनिया, छनछनाती हुई कड़ाहियाँ, गाड़ी की सीटी सुनकर रेलगाड़ी देखने की ललक, उस पर चढ़ने की ललक…..। इसी वर्तुल जिंदगी की गंध समेटे मिश्र जी का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है” A इस दौरान लेखिका की सजग विश्लेषणात्मिका-बुध्दि अपने समीक्ष्य की सामाजिक-चेतना के उत्सों को भी खोजती चलती है- ”उन्होनें अपमान, झिड़की और आत्महीनता से पीड़ित लोगों को रोटी के सवाल से जूझते हुए देखा है। इतना ही नही, यातना का अनवरत सिलसिला उस परिवेश में चलता रहता था। मालगुजारी के लिए कुर्क अमीन का दौरा, दरोगा जी का आतंक, कर्ज की वसूली के लिए किए गए तकाजे…न जाने कितने दर्दों का साक्षी रहा है उनका मन।”
‘प्रकृति के उल्लास में डूबा कवि मन’, ‘कविता की बासंती आभा”, ‘खूशबू घर से आती खुशबुएँ’ आदि लेखों के माध्यम से रामदरश मिश्र जी की कविताओं के प्रकृति-प्रेम का वैशिष्टय और भावनात्मक सौंदर्य तो दृष्टिगोचर होता ही है, लेखिका के स्वयं के प्रकृति-सापेक्ष उल्लास, भाषायी-भंगिमाऐं आदि अनायास प्रकट हो जाते हैं। एकात्मकता के कारण भावस्थ दृष्टि स्वयं लेखिका में उतरती हुई जान पड़ती है जो अध्येताओं में परम्पराओं के विस्तार के लिहाज से शुभ संकेत हुआ करते हैं।
‘रामदरश मिश्र की नारी-मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा’ तथा उनके ‘काव्य में जीवन-मूल्य’ आदि विचारप्रधान शोधात्मक लेख हैं, जिनमें लेखिका की विश्लेषणात्मक शैली का पता चलता है। एक स्थान पर लिखा गया है कि- ”मिश्र जी के उपन्यासों का मूल्यांकन करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे हाशिये पर खड़ी स्त्री को केन्द्र में लाये हैं। शोषण-तंत्रों की भली-भाँति पड़ताल करते हुए उन्होंने स्त्री-मुक्ति का मार्ग सही अथर्ाेंं में प्रशस्त किया है।”
उनके काव्य-संग्रहों की प्रकीर्ण समीक्षाओं से रूपाकार लेकर ”ऐसे में जब कभी’ में बहती रोशनी की नदी’, ‘ऊर्जस्वित बसंत……..जो कभी नहीं झरता (संदर्भ : आम के पत्तो)’, ”उस बच्चे की तलाश में’ – समय की आहटों से गूँजता कविता-संग्रह’, ‘तू ही बता ऐ जिन्दगी : जीवन की सघन गूँज में डूबी गज़लें’ आदि लेख हैं।
मिश्र जी की रचनाधर्मिता के उत्तारकाल (आयु के लिहाज से), उनके काव्य की अंतर्वस्तु, विषय-वैविध्य और संरचना पर ‘आज भी समय सत्य रचती है कलम’ व ‘संरचना-सौंदर्य’ शीर्षक से लेख हैं। मिश्र जी की शब्दावली और तकनीक पर पर्याप्त कोंणों से यहाँ प्रकाश डाला गया है। उनके आत्मकथांश पर ‘कच्चे रास्तों का सफर : जीवनानुभवों से अंतरंग साक्षात्कार’, ललित-निबंध-संग्रह पर ‘छोटे-छोटे सुख – उजास भरी यात्रा’, बारहवें उपन्यास ‘परिवार’ पर ‘परिवार : मानवीय जीवन-मूल्यों की उत्कर्ष यात्रा का दस्तावेज’ , डायरी पर ‘आते-जाते दिन : समय, साहित्य और जीवन से अंतरंग साक्षात्कार’ संग्रहित है।
पुस्तक के अंत में पाठकीय सर्जना-प्रतिभा के अनुरूप लेखिका की दस ऐसी कविताओं को जोड़ा गया है जो रामदरश जी के उपन्यासों को पढ़ते हुए रूपाकार ले चुकी थीं। लेखिका द्वारा किया गया यह विधांतरण औपन्यासिक समाज-चेतस का काव्यरूप तो है ही – रोचक भी है-
”कभी-कभी / पूरे का पूरा ‘पाण्डेपुरवा’ / जम जाता था मन के अन्दर /और दूभर हो उठता है / साँस के लिए रास्ता खोज पाना / पर तभी अचानक / तैरने लगते थे कुछ फाग, शिराओं में / चैत की पूनो खिलखिला उठती थी / और ढूँढ लेती थी तब एक साँस / चुपके से अपना रास्ता………” (‘पानी के प्राचीरों’ के साथ-साथ)
एक विशिष्ट व बहुआयामी रचनाकार, कथाकार व मनीषी – जिसका साहित्य मात्रात्मक व गुणात्मक, दोनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है – उस पर कार्य करतें हुए अकादमिक उपाधि प्राप्त करना एक बिंदु है, तथा इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आनंद, उल्लास व उमंग से भरी यात्रा का विषय बना लेना अध्येता की निजी सफलता है। यही निजी सफलता एक स्वतंत्र विधा का आस्वाद कराते हुए पाठकीय साधारणीकरण के साथ विस्तार पाती है।
‘माइन्ड द टारगेट बट एन्जॉय द जर्नी’ – रूपी तराजू के दोनों पलड़ों पर अपनी पकड़ बनाये रखते हुए लेखिका ने जो सृजन संवाद लिपिबध्द किया है उसमें एक ओर भावों व कल्पना की उड़ान है तो दूसरी तरफ उचित परिप्रेक्ष्य, उध्दरण व सन्दर्भों के लिए सर्तकता का वरण। प्रत्येक ललित लेख में रामदरश जी के सम्बन्ध में प्रतिष्ठित विचारकों के कथन, उनके उपन्यासों के पात्र, पात्रों की परिस्थितियाँ, कविताओं की पंक्तियाँ आदि को इस तरह पिरोया गया है कि कहीं जोड़ नहीं दीख पड़ता। क्या ही बात है कि यात्रा करते हुए मौसम के एक तेवर को देखकर अपने समीक्ष्य-कवि की एक पंक्ति याद आ जाये! पाठक को रामदरश जी के कई पहलुओं से अवगत कराने की ‘आयुर्वेदिक’ तरह की पध्दति इस पुस्तक में दृष्टिगत है।

-डॉ. रामकुमार सिंह