पुरानी बात बताते होंगे। तो किस तरह लजाते होंगे : कुछ गजलें/डॉ रामकुमार सिंह

छोटे मतलों की लम्बी गजल काफी पहले से लिखी जाती रहीं है। बाद में चुनिंदा शेर संकलित होते रहे हैं। कुछ इसी तरह की गजलें जारी कर रह रहा हूं। एक पुराने से रजिस्टर में कई महीनों पहले लिखीं थीं। आज मिल गई तो, पढ़ लीजिये। परिवेश कर्नाटक से मिला है……

लम्बी गजल – एक

फिर मशीन घरघराई है
पहाड़ की शामत आई है।
टुकडे हो गया कृपण पर्वत
लोहे की खेप उगलवाई है।
मिट्टी को सोने में बदल देंगे
सरकार से बात चलाई है।
लक्ष्य हो गया निर्धारित
खबर भी छपवाई है।
एक नाम मंगवाया था
पूरी सूची चली आई है।
कनिष्ठ बहुत खुश हैं
वरिष्ठों की विदाई है।
इडली खा ली वहीं पर
चटनी थैली में रखवाई है।
यहां लाल धूल बहुत है
कपडों से लिपट आई है।
अंगूर बिक गये अम्मा
कब से दुकान लगाई है।
नारियल ठीक से काटो
बड़ी नाजुक कलाई है।
खा लो, भेलपुरी खा लो
सौम्या ने बनाई है।
चांदी के सिक्के बटेंगे
परियोजना से कमाई है।

लम्बी गजल – दो

पुरानी बात बताते होंगे
तो किस तरह लजाते होंगे।
मैं बहुत छोटा था, वो बड़े
गोद में खिलाते होंगे।
कितने मांसल हैं ये पेड़
व्यायाम को जाते होंगे।
रात की पाली खत्‍म हुई
श्रमिक नीचे आते होंगे।
बहुत बदबू है, सीलन है
महीनों में नहाते होंगे।
वजनदार होती है मिट्टी
कैसे डम्पर में चढ़ाते होंगे।
रात भी बजता है सायरन
कौन लोग बजाते होंगे।
अभी चला गया हुड़गा
अप्पाजी बुलाते होंगे।
पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।
मध्यान्तर में खड़ी है बच्ची
पापा खाना लाते होंगे।
( कन्‍न्‍ड में हुडगा – लडका, अप्‍पाजी- पिताजी)

लम्बी गजल – तीन
एक ही श्रोता है
वह भी सोता है।
किसने मारा है
तू क्यों रोता है।
कल बैठक है
देखें क्या होता है।
मतदान होना है
सबका न्योता है।
सुपारी कट जायेगी
हाथ में सरोता है।
वो प्रेस करता है
कपडे नहीं धोता है।
स्कूल और डाकखाना
साथ बंद होता है।
जो जुटाता है-
वही खोता है।

गजल : चार (पढी जाने को)
हर घर में गाड़ी है
यहां का मजदूर अनाड़ी है।
सब कन्नड़ बोलते हैं
बच्चा भी जुगाड़ी है।
ऊपर चंदन है, लोहा है
नीचे रेलगाड़ी है।
मर्द के मूंछ है, लुंगी है
औरत के गजरा है, साड़ी है।
सांप निकल आते हैं
बंदर हैं, झाड़ी है।
छोटा-सा कस्बा है
लाल रंग की पहाड़ी है।

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