अरविंद कुमार सिंह जी का अचानक मुरैना आगमन और निवास पर बिताये कुछ पल…….ग्वालियर में स्नातक-शिक्षक हिन्दी के आगामी सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविर में अपने पाठ पर चर्चा के लिए डाॅ. रामकुमार सिंह ने किया पधारने का आग्रह

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मुरैना/23 अप्रेल 2016 / राज्यसभा चैनल के संपादक, संसदीय और कृषि मामलों के प्रभारी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा  कृषि पत्रकारिता के देश के शिखर सम्मान चाौधरी चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित और सबसे बढ़कर हमारी पाठ्यपुस्तक कक्षा-8  वीं की ‘बसंत’ में ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनियाँ’ पाठ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह राज्यसभा चैनल की अपनी टीम के साथ देश में जलसंकट की पड़ताल करने निकले हैं। चम्बल, बुंदलेखण्ड से होते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती वे इलाके जहाँ जलसंकट के कारण कृषि और किसानों की चिंता का साझा करना सारे देश की जरूरत बन गई है, हम सबकी ओर से अरविंद जी एक सोद्देश्य यायावर की तरह लम्बी यात्रा पर हैं। ग्वालियर-चम्बल से वे गुजरें और मुरैना में अपने आत्मीयजन को खबर न दें यह संभव ही नहीं, बस! फिर क्या था आज शाम लगभग 8ः30 बजे वे मुरैना में डाॅ. रामकुमार सिंह के निवास पर पधारे। आग्रह करने पर भोजन भी किया और बच्चों को शुभाशीष दिया। कुमारी वैष्णव और शैव ने संगीतमय रामकथा सुनाई तो अपनी प्रिय कलम उन्होंने पुरस्कार में दे दी। डाॅ. रामकुमार सिंह ने उनसे आग्रह किया यदि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों की यात्रा से लौटते समय अथवा जहां भी वे 18 से 29 मई 2016 में हों, कृपया ग्वालियर पधारें और स्नातकशिक्षक- हिन्दी के सेवाकालीन प्रशिक्षण में पधारें। डाॅ. सिंह ने पाठ्यक्रम निदेशक एवं प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 सुश्री राजकुमारी निगम एवं समस्त दल की ओर से उन्हें इस हेतु अतिथि विद्वान के रूप में आमंत्रित किया।

 

मुरैना में 23 अप्रेल की शाम श्री अरविंद कुमार जी साथ ऐतिहासिक क्षण

इस दौरान वे पूरे समय के देश के जलसंकट, जल सहेजने से हम लोगों द्वारा किये गये परहेज के कारण उत्पन्न भयावह स्थिति के बारे में बताते रहे। किस तरह जल को परिवहन से दूर-दूर तक पहुंचाने की स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता और जल को महत्वहीन वस्तु की तरह बहाने के दुष्परिणामों के प्रति उनके स्वयं के देश भर के भ्रमण और जानकारियों ने हमारे रोंगटे खड़े कर दिये। इस दौरान उनके साथियों के अतिरिक्त निवास पर नईदुनिया-जागरण समूह के वन्यजीवन विशेषज्ञ पत्रकार शिवप्रताप सिंह भी उपस्थित रहे।
बातों ही बातों में उनसे चर्चा करने पर जानकारी मिली कि द्विवेदी युग के मूर्धन्य व्यक्तित्व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी पर अभूतपूर्व, दुर्लभ और ऐतिहासिक अभिनंदन ग्रंथ को सामने लाने का महत् कार्य उनके द्वारा किस तरह सम्पन्न हो गया। उनका देश भर में भ्रमण पर रहना, सूक्ष्म-पर्यवेक्षण और जनमानस को कुछ न कुछ प्रदाय करने की उत्कट भावना के चलते ही यह संभव हुआ। गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार से लेकर राष्ट्रपति पुरस्कार और कृषि पत्रकारिता के देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने पर भी अरविंद कुमार जी में वही सादगी बरकार है जो दशकों में कभी नहीं बदली। बिल्कुल भारत रत्न उस्ताद बिसिमिल्लाह खान वाली सादगी। वे कभी पूर्वोत्तर के बोडो इलाके में होते हैं तो कभी तेलंगाना, कभी चम्बल तो कभी मराठवाड़ा। उनकी ग्रामीण चैपालों की श्रृंखला ने राज्यसभा ही नहीं महामहिम को भी अपना प्रभावित दर्शक बना लिया।
लगभग 10 बजे उनका काफिला ग्वालियर की ओर रवाना हो गया। इदम् ज्ञानम् सभाकक्ष उनकी उपस्थिति से धन्य हुआ। जयंत जी द्वारा सूचित करने पर उनका हृदय से आभार।

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2015 में अरविंद कुमार जी को पटना में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 87वें समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश के कृषि पत्रकारिता के शिखर सम्मान, चौ.चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता से  सम्मानित किया। यह पुरस्कार इलेक्ट्रानिक मीडिया श्रेणी में मिला । इस समारोह में बिहार और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी, केंद्रीय कृषि मत्री श्री राधा मोहन सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार और कृषि क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां और कृषि वैज्ञानिक मौजूद थे।

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(भारतीय डाक विभाग की श्री अरविंद कुमार सिंह जी से विशेष आत्मीयता है। क्यों न हो, तकनीकी हमले के दौर में वे ही तो हैं जो चिट्ठियों की हामी भरते है। उनकी पुस्तक भारतीय डाक का अनुवाद भारतीय और विदेशी अनेक भाषाओं में हो चुका है। डाक टिकिट यहां दर्शनीय है।)

हिंदी जगत को एक अनूठी भेंट दी श्री अरविंद कुमार सिंह जी ने

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ – 82 साल बाद फिर से प्रकाशन

हिंदी की इसी ऐतिहासिक धरोहर के लोकार्पण समारोह का आयोजन 20 सितंबर 2015 को

50 प्रवासी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ पर हुआ।

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राजधानी के प्रवासी भवन में ऐतिहासिक द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण के मौके पर साहित्यिक हस्तियों और पत्रकारों के साथ राजधानी में साहित्यप्रेमियों का समागम हुआ। आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में प्रकाशित हिंदी का पहला अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ दशा को प्राप्त था। 83 सालों के बाद इस ग्रंथ को हूबहू पुनर्प्रकाशित करने का काम नेशनल बुक ट्स्ट, इंडिया ने किया । आज के संदर्भ में इस ग्रंथ की उपयोगिता पर मैनेजर पांडेय का एक सारगर्भित लेख भी है।

ग्रंथ के लोकार्पण और विमर्श के मौके पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और विख्यात लेखक डॉ.विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग-प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में विभाजित हो चुकी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान और किसानों के लिए भी लिखते थे। हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्रारंभ द्विवेदी जी से ही हुआ।’’
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मैनेजर पांडे ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि, “यह भारतीय साहित्य का विश्वकोश है।” उन्होंने आचार्य जी की अर्थशास्त्र में रूचि व‘‘संपत्ति शास्त्र’’ के लेखन, उनकी महिला विमर्श और किसानों की समस्या पर लेखन की विस्तृत चर्चा की। इस ग्रंथ में उपयोग की गयीं दुर्लभ चित्रों को अपनी चर्चा का विषय बनाते हुए गांधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र ने इन चित्रों में निहित सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने नंदलाल बोस की कृति ‘‘रूधिर’’ और अप्पा साहब की कृति ‘‘मोलभाव’’ पर विशेष ध्यान दिलाते हुए उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया और कहा कि सकारात्मक कार्य करने वाले जो भी केन्द्र हैं उनका विकेन्द्रीकरण जरूरी है।

‘नीदरलैड से पधारीं प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि हिंदी सही मायने में उन घरों में ताकतवर है जहाँ पर भारतीय संस्कृति बसती है। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की निदेशक व असमिया में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका डॉ. रीटा चौधरी ने कहा कि, यह अवसर न्यास के लिए बेहद गौरवपूर्ण व महत्वपूर्ण है कि हम इस अनूठे ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन के कार्य से जुड़ पाए। ऐसी पुस्तकों का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी होना चाहिए। डॉ. चौधरी ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ हिंदी का ही नहीं बल्कि भारतीयता का ग्रंथ है और उस काल का भारत-दर्शन है।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय ने इन दिनों मुद्रित होने वाले नामी गिरामी लोगों के अभिनंदन ग्रंथों की चर्चा करते हुए कहा कि, “ऐसे ग्रंथों को लोग घर में रखने से परहेज करते हैं, लेकिन आचार्य द्विवेदी की स्मृति में प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य,समाज, भाषा व ज्ञान का विमर्ष है न कि आचार्य द्विवेदी का प्रशंसा-ग्रंथ।” इस ग्रंथ की प्रासंगिकता व इसकी साहित्यिक महत्व को उल्लेखित करते हुए श्री राय ने यहां तक कहा कि, “यह ग्रंथ अपने आप में एक विश्व हिन्दी सम्मेलन है।”
कार्यक्रम के प्रारंभ में पत्रकार गौरव अवस्थी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी स्मृतियों को पावर प्वाइंट के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रेजेंटेशन यह बात उभर कर सामने आयी कि किस तरह से रायबरेली का आम आदमी, मजूदर व किसान भी आचार्य द्विवेदी जी के प्रति स्नेह-भाव रखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने इस ग्रंथ के प्रकाशन के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट और रायबरेली की जनता को धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के संपादकीय और रेल जीवन पर भी काम करने की जरूरत है।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी ने किया।

सन् 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य द्विवेदी के सम्मान में प्रकाशित इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के पत्र के साथ भारत रत्न भगवान दास, ग्रियर्सन, प्रेमंचद, सुमित्रानंदन पंत, काशीप्रसाद जायसवाल,सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उस दौर की तमाम दिग्गज हस्तियों की रचनाएं और लेख है। वैसे तो इस ग्रंथ का नाम अभिनंदन ग्रंथ है और आचार्यजी के सम्मान में प्रकाशित हुआ लेकिन आज कल जैसी परिकल्पना से परे इसमें आचार्य जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ही नहीं साहित्य की तमाम विधाओं पर गहन मंथन है।

इस समारोह में विख्यात लेखक रंजन जैदी, अर्चना राजहंस, योजना के संपादक ऋतेश, राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के महासचिव शिवेंद्र द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे, जय प्रकाश पांडेय, राकेश पांडेय, संपादक प्रदीप जैन, भाषा सहोदरी के संयोजक जयकांत मिश्रा, विख्यात कवि जय सिंह आर्य,देवेंद्र सिंह राजपूत,शाह आलम, विनय द्विवेदी, गणेश शंकर श्रीवास्तव, बरखा वर्षा, तरुण दवे समेत तमाम प्रमुख लोग मौजूद थे।

 

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अरविंद कुमार सिंह का पूर्ण सम्पर्क/पता यहाँ खासतौर पर ‘सर्जना’ के माध्यम से प्रस्तुत है:

अरविंद कुमार सिंह जी

वरिष्ठ संपादक,राज्य सभा टीवी, भारतीय संसद

अध्यक्ष, रायटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली

12 ए, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड, संसद भवन के पास नयी दिल्ली 110001

फोन-9810082873, 9811180970

ईमेल-arvindksingh.rstv@gmail.com, arvind.singh@rstv.nic.in

 

 

शिक्षा एवं प्रशिक्षण आंचलिक संस्थान चण्डीगढ़ में तीन दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम दिनांक 1 मई 2016 से

समाचार । चण्डीगढ़/ग्वालियर।  शिक्षा एवं प्रशिक्षण आंचलिक संस्थान चण्डीगढ़  में हिन्दी के सेवाकालीन प्रशिक्षण कार्य हेतु पाठ्यक्रम निदेशक, सम्बद्ध-निदेशक एवं संसाधकों का तीन दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम दिनांक 1 मई 2016 से 3 मई 2016 तक आयोजित किया जायेगा। शिक्षा एवं प्रशिक्षण आंचलिक संस्थान चण्डीगढत्र में उक्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम की संयोजिका श्रीमती सुनीता गुसाईं, स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी ने बताया कि संस्थान के निदेशक श्री जगदीश मोहन रावत के कुशल दिशा-निर्देशन में उक्त उन्मुखीकरण सफलतापूर्वक सम्पादित होगा। उक्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे देश के विभिन्न हिस्सों के पाठ्यक्रम दलों के मध्य अपेक्षित पाठ्यसामग्री विकसित करने हेतु कार्य-विभाजन कर दिया गया है।

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श्री जगदीश मोहन रावत, निदेशक

शिक्षा एवं प्रशिक्षण आंचलिक संस्थान चण्डीगढ़

Tele: 0172- 2621364 & 2621302

zietchdacad@gmail.com

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श्रीमती सुनीता गुसाईं, स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी

शिक्षा एवं प्रशिक्षण आंचलिक संस्थान चण्डीगढ़

विस्तृत परिपत्र डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें। download ZIET circular

उक्त उन्मुखीकरण कार्यक्रम में भाग लेने हेतु केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 की प्राचार्य एवं पाठ्यक्रम निदेशक सुश्री राजकुमारी निगम, पाठ्यक्रम के सम्बद्ध निदेशक श्री एम.के.मीना, प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय छाबरा एवं संसाधकत्रय श्री धर्मेन्द्र भारद्वाज, डाॅ. अश्विनी शिवहरे, डाॅ. रामकुमार सिंह शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान चण्डीगढ़ जायेंगे।

सेवाकालीन प्रशिक्षण हेतु केविसं द्वारा कार्यक्रम जारी

समाचार। नई दिल्ली/ग्वालियर/चण्डीगढ़   केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा इस सत्र के लिए विभिन्न विषयों एवं पदों के शिक्षकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण हेतु कार्यक्रम, स्थल एवं संसाधक दलों की घोषणा कर दी है।
विस्तृत परिपत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
इसी क्रम में स्नातक शिक्षक हिन्दी के प्रशिक्षण कार्य हेतु भी विभिन्न संसाधक दलों की सूची जारी कर दी गई है। आंचलिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण केन्द्र चण्डीगढ़ अंतर्गत केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 ग्वालियर में दिनांक 18 मई 2016 से 29 मई 2016 तक आयोजित प्रशिक्षण के लिए निदेशक, सम्बद्ध-निदेशक एवं संसाधकत्रय के नामों नियत किये गये हैं। जो इस प्रकार हैं:

1-राजकुमारी निगम (निदेशक)

प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1, ग्वालियर, (प्रशिक्षण स्थल)

mob. 9425767050  

email  kv1gwl@gmail.com

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स्नातक शिक्षक हिन्दी के आयोजित होने जा रहे सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविर की निदेशक एंव प्राचार्य राजकुमारी निगम देश के प्रारंभिक एवं प्रतिष्ठित केन्द्रीय विद्यालयों में गण्य केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 की प्राचार्य हैं। वे विषय विशेषज्ञ होने के साथ ही कुशल प्रशासनिक क्षमता से युक्त हैं। गत वर्ष आपके ही निर्देशन में स्नातकोत्तर शिक्षक हिन्दी का सेवाकालीन प्रशिक्षण सफलतापूर्वक संपादित हुआ जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। आप स्नातक शिक्षक हिन्दी के आयोजित होने जा रहे शिविर के 5 सदस्यीय मुख्य दल का निर्देशन कर रहीं हैं।

2-श्री एम.के. मीना (सम्बद्ध-निदेशक)
प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय सीटीपीपी, छाबरा

mob.09414569343, 09549634244

email- mkmeena777@gmail.com

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श्री एम.के. मीना, पुरातात्विक महत्व और शौर्य की भूमि राजस्थान में स्थित केन्द्रीय विद्यालय सीटीपीपी छाबरा के प्राचार्य हैं। आप हिन्दी भाषा के विशेषज्ञ होने के साथ ही प्रशासनिक एवं अकादमिक गुणों से सम्पन्न व्यक्तित्व के धनी है। स्नातक-शिक्षक हिन्दी हेतु केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 ग्वालियर में प्रस्तावित सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविर के सम्बद्ध निदेशक के रूप में आपको दायित्व सौंपा गया है। आप केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा प्रदत्त इस प्रकार के विभिन्न दायित्वों का सफलतापूर्वक निष्पादन करते रहे हैं।

3-श्री धमेन्द्र भारद्वाज (संसाधक )
स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी
केन्द्रीय विद्यालय तालबेहट

mob-9893000998

email-kvshindi@gmail.com

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हिन्दी विषय के संसाधन सम्पन्न विशेषज्ञ श्री भारद्वाज विज्ञानसम्मत प्रतिभा के भी अद्भुत धनी रहे हैं। आपने केन्द्रीय विद्यालय संगठन में दिनांक 26 मार्च 2009 से सेवा प्रारम्भ की है। संसाधक के रूप में गत वर्ष केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 ग्वालियर में आयोजित स्नातकोत्तर शिक्षक हिन्दी का सेवाकालीन प्रशिक्षण वर्तमान निदेशक सुश्री राजकुमारी निगम के कुशल मार्गदर्शन में बखूबी सम्पादित कर चुके हैं। सत्र 2014-15 में भी यह भूमिका आपने निभाकर पर्याप्त अनुभव अर्जित किया है।

4-डाॅ अश्विनी कुमार शिवहरे (संसाधक )

स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी,
केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक5, ग्वालियर

मोबा. 7415598511

email-ashwinishivahare@yahoo.com

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डाॅ अश्विनी कुमार शिवहरे देश के प्रतिष्ठित इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी विषय में शोध-उपाधिधारक हैं। आप यूजीसी नेट द्वारा कनिष्ठ अनुसंधान अध्येता रहे हैं। आपका शोधकार्य एवं विशेषज्ञता हिन्दी के उपन्यासों में साहित्यिक मूल्यों की खोज-खबर है। दिनांक 27 जुलाई 2009 से केन्द्रीय विद्यालय संगठन में स्नातकोत्तर शिक्षक हिन्दी के रूप में सेवायें दे रहे डाॅ अश्विनी कुमारउपन्यास, कहानी सहित गद्य विधाओं में गहरी रुचि रखते हैं।
5- डाॅ. रामकुमार सिंह (संसाधक )

स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी,

केन्द्रीय विद्यालय मुरैना

mob-9301369969

email- singh.rk2009@rediffmail.com

web-www.ramkumarsingh.com

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अपनी नवाचारी परियोजना के लिए एनसीईआरटी नई दिल्ली का वर्ष 2012 का राष्ट्रीय पुरस्कार केन्द्रीय विद्यालय संगठन बैंगलौर संभाग अंतर्गत के.वि. दोणिमलै के लिए प्राप्त कर चुके डाॅ. रामकुमार सिंह युवा शिक्षाविद् के रूप में ख्यात हैं। हिन्दी महाकाव्यों में सामाजिक चेतना के अनुसंधान पर जीवाजी विश्वविद्यालय से वर्ष 2009 में डाॅक्टरेट उपाधि प्राप्त डाॅ. रामकुमार सिंह यूजीसी-नेट के साथ ही हिन्दी, राजनीति विज्ञान, संगीत, गणित, शिक्षा, व संगणक विज्ञान में उपाधिधारक हैं। ललित कला, एवं सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्तम्भ-लेखक रहे डाॅ. सिंह विभिन्न मंचों से कवि-सम्मेलनों में शामिल, समाचार-पत्रों के विशेष अभियानों और दूरदर्शन पर साहित्यिक परिचर्चाओं  में आमंत्रित, मंच-संचालक के रूप में ख्याति, बाल-मनोविज्ञान के कुशल अध्येता, दक्षिण भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिए कार्यरत बहुभाषी कक्षा में भाषा-अध्यापन के विशेषज्ञ रहे हैं। थियेटर/नाटक लेखन में आपकी दक्षता है। । हिन्दी नाटक – ‘बेटी, सड़क और काले हाथ’ तथा ‘ब्रह्मराक्षस’ केन्द्रीय विद्यालय संगठन की राष्ट्रीय सामाजिक प्रदर्शनी में राष्ट्रीय स्तर पर ग्वालियर एवं चंडीगढ़ में प्रदर्शित हो चुके हैं। संगीत में गहरी रुचि, अनेक मंचों से गायन, वादन आदि में सम्मिलित। आप 7 फरवरी, 2009 से स्नातकोत्तर शिक्षक-हिन्दी के पद पर सेवारत
हैं, और जानकारी ‘सर्जना’ तथा ‘विकीपीडिया’ पर(प्रस्तुति सर्जना टीम)

मंथन : दो, यानी कि एक बार फिर बैठे साथ-साथ ….बनारस में


यह बडे़ गौरव की बात है कि दस संभागों से आए 43 प्रतिभागियों का के.वि. डी. रे. का. वाराणसी में सेवाकालीन प्रशिक्षण का आयोजन 23.12.11 से 01.01.12 के मध्य सम्पन्न हुआ है। इस प्रकार के प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षा-जगत् में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु का विविध दृष्टिकोंणों से परिचय, आपसी विचार-विमर्श पाठ्यक्रम में आए पाठों से परिचय तथा अन्यान्य विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। इन उद्देश्यों में निदेशक, सह-निदेशक, संसाधक, अतिथि व्याख्याता तथा प्रतिभागी स्वयं सहायक होते हैं। प्रतिभागियों ने आशा एव ंअपेक्षा है कि उन्होंने अपने दस दिन के प्रवास में जो नया ज्ञान तथा शिक्षण की नवीनतम-तकनीक प्राप्त की है उसे अपने शिक्षण में शिक्षक जब प्रयोग में लाएँगे तभी इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों की उपादेयता व उपयोगिता सिद्ध होगी। मैं निदेशक के रूप में आशा करता हूँ कि इस प्रशिक्षण ने आपको नई ऊर्जा दी होगी, आपको एक नई समझ दी होगी, आपका नवीनीकरण किया होगा जो आपके शिक्षण में अवश्य झलकेगा।
निदेशक के रूप में मैं, के.वि.सं. के अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने हमारे विद्यालय को इस कार्यक्रम के आयोजन के योग्य समझा व समय-समय पर दिशा-निर्देश दिए, जिनसे यह आयोजन सफल हो सका।

शुभकामनाओं सहित,,
(विजय कुमार)
शिविर-निदेशक

‘अद्भुत अंतविर्रोधों के बीच सृजन का तीर्थ है काशी’ – प्रो यादव
उद्घाटन : समाचार

वाराणसी, 23 दिसम्बर।(सर्जना)
सामाजिक आंदोलन किसी भी साहित्य धारा की जनचेतना का निर्माण करते हैं। काशी एक ऐसा नेतृत्वकारी स्थल है जहॉं अनेक अंतविर्रोधों के बीच सृजन की अनेक धाराएं पैदा हुई हैं। काशी ने विभिन्न साहित्यिक आंदोलनो की अगुआई है।
उक्त उद्गार काशी हिन्दू विवि के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रो चौथीराम यादव ने केविसं के स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण के शुभारंभ अवसर पर बाजारवाद के युग में भक्तिकालीन साहित्य के सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन विषय पर अपने व्याख्यान के दौरान व्यक्त किये। उन्होनें कहा कि भक्तिकाल की अंतर्रात्मा सामाजिक न्याय की लड़ाई थी। इस आंदोलन का नेतृत्व हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के दलित वर्ग ने किया। उन्होने कहा यह भी गौरतलब है कि काशी और कांची, जहां ये आंदोलन मुख्य रूप से पनपे, वे दोनो ही सूती वस्त्रोद्योग के केन्द्र थे। उन्होने कहा कि भक्तिकालीन साहित्य का मूल्यांकन समाजशास्‍त्रीय ढंग से किया जाना ही उचित होगा। आज बाजारवाद, विज्ञापन और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सांस्कृतिक हमले का युग है जिसके बीच भक्तिकालीन आंदोलन के मूल्य ही रास्ता दिखा सकते हैं।

दिनांक 23.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन


हिन्दी के स्नातकोत्तर शिक्षकोंका सेवाकालीन प्रशिक्षण 23.11.2012 को के.वि. डीरेका वाराणसी में सम्पन्न हुआ। उद्घाटन काशी हिन्दू विवि के अवकाशप्राप्त प्रो. डॉ. चौथीराम यादव की अध्यक्षता में हुआ। सर्वप्रथम मुख्य अतिथि महोदय ने सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा अन्य अधिकारियों ने पुष्पार्पण किया। माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलन के समय विद्यालय के बच्चों ने सरस्वती वंदना की तथा मुख्य अतिथि के स्वागत में स्वागत-गीत प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. चौथीराम यादव ने प्राचीन साहित्य को समसामयिक दृष्टि से समझने का सुझाव देते हुए कहा कि भक्ति आंदोलन की दार्शनिक व्याख्या करने की आवश्यकता है तथा भक्ति आंदोलन को समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए। यदि प्रारम्भ में ही ऐसा किया गया होता तो संभवतः आज के दलित, स्त्री एवं आदिवासी आंदोलन उतनी त्वरा एवं उद्वेग के साथ खड़े नहीं होते। आज के दौर में नवउदारीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद एवं वैश्विक भूमण्डलीकरण के दौर में यूरो-वर्चस्व से बचने के लिए हमें अपनी मानवतावादी दृष्टि को नयी वैश्विक चुनौतियों के बीच पुनः मूल्यांकित करना होगा। वक्ता महोदय में नागार्जुन जी के साहित्य पर अपने विद्वतापूर्ण विचारों से सभा को लाभान्वित किया। शिविर-निदेशक एवं प्राचार्य श्री विजय कुमार जी ने मुख्य अतिथि तथा प्रतिभागियों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए शिविर के सह-निदेशक श्री एस.एन. शुक्ल जी ने मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच प्रतिभागियों की सक्रिय एवं उत्साही उपस्थिति की प्रशंसा तो की ही, साथ ही उन्होंने प्रतिभागियों को इस बात के लिए भी परामर्श दिया कि आपसी विचार- विमर्श एवं शिविर के मार्गदर्शन के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों को कुछ नवीन सीखकर अपने विद्यालय के अकादमिक तथा सह-अकादमिक माहौल को अधिक उन्नत एवं गौरवपूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्ता जी ने किया।
शिविर निदेशक जी ने अगले कालांश में प्रतिभागियों से व्यक्तिगत उपलब्धियाँ व परिचय प्राप्त किया। प्रतिभागियों से प्रपत्र भरवाये गये जिनमें उनसे शिविर से उनकी अपेक्षाओं की जानकारी ली गई। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों की पूर्वज्ञानपरीक्षा ली गई।
भोजनावकाश के पश्चात निदेशक महोदय ने शिविर की रूपरेखा व उद्देश्यों की विशद व्याख्या की, पुनः चाय के पश्चात संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने प्रतिभागियों का समूहविभाजन किया व समूह कार्य आबंटित किये। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कार्य स्तरीय हो तथा केन्द्रीय विद्यालय संगठन के मानक के अनुरूप हो। // प्रतिवेदक समूह: पंत समूह//

दिनांक 24.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

24.11.2012 के दिन का प्रारंभ योगाभ्यास कार्यक्रम से हुआ। प्रतिभागियों ने श्री शशिभूषण कुमार के निर्देशन में विद्यालय प्रांगण में प्राणायम तथा अनुलोम-विलोम के साथ अन्य विविध योग क्रियाओं का अभ्यास किया। प्रार्थना-सभा में प्रार्थना, समाचार, आदर्श-वाक्य, विशेष-कार्यक्रम तथा प्रतिवेदन की प्रभावी प्रस्तुति पंत सदन की ओर से की गई।
प्रथम कालांश में शिविर निदेशक श्री विजय कुमार जी ने पावर-प्वाइंट की सहायता से अलंकारों की विशद, व्यापक व प्रभावी प्रस्तुति से प्रतिभागियों को लाभान्वित किया। अतिथि व्याख्याता के रूप में पधारे प्रो. अवधेश प्रधान (हिन्दी विभाग, बनारस हिन्दू विवि) ने महाप्राण निराला जी की कविता ‘बादल राग’ के विविध बिन्दुओं पर विद्वतापूर्ण विचार प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण वक्ता महोदय ने तर्कपूर्ण ढंग से किया। कविता के काव्य-सौन्दर्यीय पक्ष पर भी विचार व्यक्त किये। प्रतिभागियों की मांग पर वक्ता महोदय ने फिराक गोरखपुरी की रूबाइयों व गज़ल की कक्षा में किस प्रकार सहज प्रस्तुति की जाये, इस पर अपने विचार प्रस्तुत किये।

चायकाल के पश्चात संसाधक श्री अनिल कुमार पाण्डेय ने गद्यशिक्षण को किस प्रकार रुचिकर बनाया जाये, इस पर अपना वक्तव्य दिया। प्रतिभागियों ने चर्चा में बढ़-चढ़कर भाग लेते हुए अपने-अपने विचारों से चर्चा को लाभकारी बनाया। अगले कालांश में संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्ता ने गजल विधा के विविध पक्षों पर चर्चा प्रारंभ की व विविध गजलों की प्रस्तुति से सदन को इस विधा की सहज व प्रभावी प्रस्तुति की कला से परिचित कराया। प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने विचार प्रस्तुत कर परिचर्चा को विशद व व्यापक रूप दिया।
भोजनावकाश के पश्चात प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूह में बैठकर समूह-कार्य का निष्पादन किया। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों ने श्रीमती रेवती अय्यर के निर्देशन में थिंक-क्वेस्ट सम्बन्धी परियोजना की जानकारी प्राप्त की। संध्याकाल में कविता-पाठ के कार्यक्रम के साथ इस दिनांक के कार्य सम्पन्न हो गये।
// प्रतिवेदक समूह: निराला समूह //

दिनांक 25.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

दिनांक 25.12.2011 को योगाभ्यास के पश्चात प्रातःकालीन प्रार्थना-सभा का आयोजन निराला समूह के प्रतिभागियों द्वारा किया गया। तत्पश्चात शिविर के निदेशक श्री विजय कुमार जी ने प्रतिभागियो का मागदर्शन करते हुए यह निर्देश दिया कि सम्पूर्ण व्याख्यान को आत्मसात करते हुए अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करें।
प्रारंभ में शिविर के संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी द्वारा पावर-प्वाइंट प्रस्तुतिकरण, सांस्कृतिक-संध्या का आयोजन तथा डिजिटल डायरी के बारे में उचित दिशा-निर्देश दिये। तत्पश्चात शिविर के सह-निदेशक श्री एस एन शुक्ला जी ने समस्त प्रतिभागियों को हिन्दी शिक्षण-विधि से परिचित कराते हुए भाषा की सम्प्रेषणीयता पर जोर दिया और इस बात के लिए सभी प्रतिभागियों को प्रेरित किया कि हिन्दी भाषा के माध्यम से देश की एकता, अखण्डता व धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को भी बचाए रखें। तदुपरांत हिन्दी का बहुभाषीय परिवेश और हिन्दी का पठन-पाठन विषय पर श्री धीरेन्द्र कुमार झा एवं श्री धर्मवीर सिंह ने विचार प्रस्तुत किये।
प्रथम सत्र के प्रथम खण्ड में ही अतिथि व्याख्याता के रूप में काशी हिन्दू विवि के डॉ नीरज खरे ने ‘पत्रकारिता के विविध आयाम’ विषय पर अत्यंत ही सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किये। इसके साथ ही मुद्रित माध्यमों की विशेषतायें, समाचार के प्रकार, समाचार के स्रोत, समाचार-लेखन की शैली, लेख, आलेख, फीचर, संपादकीय-लेखन व रिपोर्ट आदि के विशद रूपों से परिचित कराते हुए लेखन-प्रारूप से परिचय कराया, जो प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ही लाभकारी रहा। इसके बाद निराला समूह के प्रतिभागी डॉ रामकुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

भोजनावकाश के पूर्व अगले कालांश में संसाधकद्वय डॉ अनिल कुमार पाण्डये व श्री व्ही सी गुप्ता ने ‘पाठ्यसहगामी क्रियाओं की केन्द्रीय विद्यालय में भूमिका तथा व्यक्तित्व विकास में सहायक’ विषय पर अपना गांभीर्यपूर्ण और सारगर्भित विचार रखें। भोजनावकाश के बाद श्री राजेन्द्र विश्वकर्मा तथा डॉ रामकुमार सिह व दीपक कुमार के द्वारा क्रमशः ‘रूबाइयॉं, ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’, तथा ‘जनसंचार माध्यम’ पाठ का आदर्श पाठ प्रस्तुत किया गया। थिंक-क्वेस्ट तथा संगणक कार्य भी सम्पन्न हुआ।
//प्रतिवेदक समूह: महादेवी वर्मा समूह//

दिनांक 26.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन
केन्द्रीय विद्यालय डीरेका में स्नातकोत्तर शिक्षकों (हिन्दी) का सेवाकालीन प्रशिक्षण का चौथा दिन योगाभ्यास और तत्पश्चात महादेवी वर्मा सदन की ओर से प्रस्तुत आकर्षक प्रार्थना-सभा कार्यक्रम के साथ आरम्भ हुआ।
शिविर निदेशक एवं विद्यालय प्राचार्य श्री विजय कुमार ने गीता के कर्मयोग के उपदेश को समकालीन परिप्रेक्ष्य के अनुरूप परिभाषित करते हुए ‘विपश्यना साधना’ विषय पर बीज व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि- ‘‘तालीम से तबीयत बेहतर होती है’ अर्थात कहने से करना अच्छा होता है। उनके मतानुसार विपश्यना सत्य की उपासना है, आत्मनिरीक्षण की साधना है, जीने का अभ्यास है – शील और सदाचार के साथ। ‘विपश्यना साधना’ केवल आडम्बर नहीं है वरन शिक्षा में नैतिक मूल्यों के विलयन की दृष्टि से भी यह अनिवार्य है। शिक्षा और नैतिकता का यह संयोग ही एक युग में भारत को विश्वगुरू के पद पर सुशोभित किया और मैक्समूलन जैसे जर्मन दार्शनिक को भारत की ओर देखने के लिए विवश किया गया। बकौल सुमित्रानंदन पंत –
‘‘ऐसे मरणोन्मुख जग को कहता मेरा मन
और कौन दे सकता नवजीवन आश्वासन
शान्ति, तृप्ति-निज अन्तर्जीवन के प्रवाह में
भारत के अतिरिक्त आज-जो शाश्वत अक्षर
अन्तर ऐश्वर्यों का ईश्वर है वसुधा पर
कहता मेरा मन, भारत के ही मंगल में
भू मंगल, जन मंगल, दोनों का मंगल है। ‘‘

तत्पश्चात काशी हिन्दू विवि के शिक्षा विभाग की डिप्टी चीफ प्रोक्टर प्रो.(डॉ.) गीता राय ने ‘किशोरावस्था: युवाओं के लिए निर्देशन और परामर्श’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि किशोरावस्था मूलतः तनाव एवं तूफान की अवस्था है जिसमें किशोरों के भीतर शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक दृष्टि से अनेक परिवर्तन होते हैं यथा- शारीरिक व यौवन विकास, मानसिक विकास, इच्छाओं व कल्पनाओं का विकास, वस्त्र-चयन, शारीरिक सौष्ठव एवं बातचीत के लहजे में परिवर्तन तथा भावात्मक अस्थिरता और समूहबद्धता ऐसे परिवर्तन हैं – जो शिक्षक के शिक्षण कार्य के लिए आवश्यक है। वर्तमान वैश्विक एवं सामाजिक परिवर्तनों के चलते विद्यार्थी के मन में गुरू के प्रति वह परम्परागत सम्मान नहीं रह गया है जिसमें शिक्षक अपने को पूर्णतः स्वतंत्र समझता है। शिक्षक के लिए आवश्यक है। कि वह निर्देशन, परामर्श एवं अन्य मनोवैज्ञानिक पद्धतियों का सहारा लेते हुए न केवल अपने शिक्षण को रुचिकर बनायें वरन् विद्यार्थियों के जीवन-दर्शन को एक नवीन दिशा दे सके।

भोजनावकाश के पश्चात् आरम्भ द्वितीय सत्र में विभिन्न प्रतिभागियों द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। क्रमशः सर्वश्री तेजनारायण सिंह, चुम्मनप्रसाद श्रीवास्तव , डॉ ए के पाण्डेय, धर्मवीर सिंह द्वारा प्रस्तुत की गई आदर्श पाठ की प्रस्तुति को अन्य प्रतिभागियों ने व्यापक विचार-विमर्श के द्वारा अधिक विस्तृत एवं नये आयामों से समृद्ध किया। कार्यक्रम के सह-निदेशक श्री एसएस शुक्ल (प्राचार्य, केवि 39 जीटीसी), श्री एसएस यादव (उपप्राचार्य, केविडीरेका) एवं सह संसाधक श्री व्ही सी गुप्ता ने तमाम प्रतिभागियों की आदर्श पाठ प्रस्तुति की कमियों को दूर करते हुए उसे और अधिक रुचिकर व संभावनापूर्ण बनाने पर बल दिया। तत्पश्चात द्वितीय सत्र में ही संसाधक डॉ ए के पाण्डेय ने हिन्दी भाषा-शिक्षण की चुनौतियाँ: और उसकी नवीन प्रविधियाँ’ विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए सदन के तमाम प्रतिभागियों को भाषा- शिक्षण की नवीन प्रविधियों एवं नवीन तकनीक से अवगत कराया गया। अगले कालांश में संसाधक श्री व्ही सी गुप्ता ने पद्य-शिक्षण कौशल के विविध आयामों की जानकारी दी। प्रतिदिन की तरह ही सांस्कृतिक-संध्या का आयोजन एवं तत्पश्चात् डॉ आशुतोष पाण्डेय के औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ शिविर निदेशक महोदय की अनुमति से कार्यक्रम के समापन की घोषणा की गई।
//प्रतिवेदक समूह: प्रेमचंद समूह//

दिनांक 27.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

‘‘हो रहा मन विकल मन के तार खोलने दो।
प्रशिक्षण शिविर के दौरान हुए कार्यक्रम की बात कहने दो।।
उषा की नव-किरणों जोश सबका बढ़ाया।
सरस्वती-वंदना से सबका मन पावन किया।।
प्रेमचंद समूह में प्रार्थना-सभा का भार लिया।
सोत्साह सभी कार्यक्रम प्रस्तुत कर उल्लसित किया।।
हो रहा……।
शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी हुए हर्ष-तरंगों से उद्वेलित।
किया सबका अभिवादन सानंद और प्रफल्लित।।
नित्यम की तरह मुस्कान बिखरे बढ़े निदेशक हर्षित
बढ़ाया ज्ञान प्रशिक्षणार्थियों का, हुए सभी तृप्त।।
राजभाषा कार्यान्वयन एवं संवैधानिक उपबंधों को किया सरलीकृत।
हिन्दी शिक्षक हो, शक्ति अपनी पहचानिए – कर दिया प्रेरित।।
हो रहा….
बोले सह-निदेशक शुक्ल जी धीर गंभीर वाणी से।
हुए प्रभावित सभी प्रशिक्षणार्थी उनके वक्तव्य से।।
विद्यालय प्रबंधन के विविध आयामों के ज्ञान से।
हुए लाभान्वित सभी शिक्षक उत्सुकता से।।
हो रहा….
काशी की धरती है पावन, आकर्षण हिन्दी प्रेमियों की।
शब्दों की तरंगिणी, कविता-वाहिनी साहित्यप्रेमियों की।।
हुए कृतकृत्य शिक्षार्थी, प्रतिभागी मनोजकुमार के सौहार्द से।
अभिसिंचित हुए शिक्षण के विविध अंगों-उपांगों के ज्ञान से।।
हो रहा……
बदल रहा है समय, बदले शिक्षा के विविध आयाम।
शिक्षा बनी शिक्षार्थी-केन्द्रित, बदले जीवन के आयाम।
सतत समग्र मूल्यांकन है आज की सर्वत्र माँग।
निर्मित करती है नवाचार कार्यशैली में।।
संसाधक हमारे विनोद-प्रिय और भाषा के धनी।
दिया सारगर्भित ज्ञान सीसीई पर सभी ने सुनी।।
हो रहा…
शुरू हुई श्रृंखला आदर्श पाठों की अपरान्ह में।
शिक्षक तय करेगा विधि – कहा केके पाण्डेय जी ने गंभीर वाणी में।।
मिश्रा जी आये सोत्साह, प्रस्तुत किया आदर्श पाठ आत्मकथ्य में।
चर्चा छिड़ी, मची हलचल, श्री झा व धर्मवीर के तर्कों से।।
समाधान किया गुप्त जी अपने शेरो-शायरी से।
हो रहा…
फिर मंच पर बढ़े दोशी जी, डाला प्रकाश नवाचार विधियों पर।
पुरानी पद्धतियाँ, नये सिरे से सोचा तर्कवादियों ने सुनकर।।
रामकुमार बड़े उत्साही, बढ़ाया ज्ञान रचनात्मक मूल्यांकन पर।
दिया शिक्षक-हित चंद बातें रेवती ने जोड़कर।।
धीर-गंभीर सत्यनारायण जी, आए किया आदर्श पाठ ‘यमराज की दिशा’ पर।
ठाकुर जी ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ के साथ आये, अगले सोपान पर।।
हो रहा……
भोजनावकाश उपरांत संलग्न हुए शिक्षार्थी समूह-कार्य में।
ज्ञान का भंडार लिए हम बैठे परीक्षा काल मे।।
आशंका और कौतुहल के बीच पर्चे बँटे शिक्षार्थी में।
मनोयोग से लिख डाला उत्तर हमने सीमित समय में।।
हो रहा….
बनारस की रंगीन शाम में ढल गया प्रशिक्षण शिविर।
महिला एवं पुरुष मंडल ने लिया रस डूबकर।।
गीत एवं कविताओं में गोते लगाये सबने जी भरकर।।
सम्पन्न हुआ पांचवा दिन धन्यवाद ज्ञापन पर।
हो रहा मन……….
कलयुग का आह्वान है ओ प्रतिभाओ आगे आओ।
ज्ञानदान दे, समय दान दे, जन-मंगल इतिहास रचाओ।
अरे! स्वार्थ के सगे सभी हैं, कौन किसे याद रखता है।
जो समाज के लिए समर्पित, उनकी ही चर्चा होनी है।।
हो रहा……
//प्रतिवेदक समूह: भारतेन्दु समूह//
दिनांक 28.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

दिन ने थोड़ी सिरहन के साथ मुस्कुराते हुए अपनी खुशनुमा आँखें खोलीं, दिवस का प्रारंभ आलसेच्छा को तोड़ते हुए योगाभ्यास से हुआ और शिविरार्थियों में नवप्राण व नवीन ऊर्जा का संचार हुआ।
शिविर का शुभारंभ भारतेन्दु सदन द्वारा प्रार्थना-सभा की आकर्षक व अत्यंत सुंदर प्रस्तुति द्वारा हुआ। तत्पश्चात् निदेशक व प्राचार्य, एवं उप-प्राचार्य द्वारा राष्ट्रगान के गौरवशाली 100 वर्ष पूरे होने पर इसके इतिहास, प्रस्तुति-समय व शुद्ध उच्चारण पर तथ्यपूर्ण तथा तार्किक व्याख्यान दिया गया। इसके बाद श्री अमरनाथ द्वारा आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की गई।
चायकाल के उपरांत काशी हिन्दू विवि से पधारे अतिथि वक्ता डॉ. प्रभाकर सिंह ने कक्षा- 11वी, 12 वीं की पाठ्यपुस्तकों में चयनित कविताओं व पाठों को साहित्येतिहास के आईने मे देखते हुए अपना विद्वतापूर्ण एवं सारगर्भित व्याख्यान दिया। इस क्रम में उन्होंने कविताओं को लोक व भाषा के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों के आग्रह पर स्त्री-विमर्श पर सूक्ष्म एवं सारपूर्ण बात रखी। तदुपरांत संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय द्वारा शिक्षा-संहिता व लेखा-संहिता पर पर ज्ञानयुक्त व्याख्यान दिया।
सत्र के उत्तरार्ध में शिक्षकों द्वारा आदर्श-पाठ के प्रस्तुति की गई जिसमें श्रीमती अमिता शर्मा, श्रीमती प्रणति सुबुद्धि और श्रीमती स्मिता कौल द्वारा आदर्श-पाठ की प्रेरक प्रस्तुति की गई। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों द्वारा समूहकार्य एवं संगणक कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न किये गए।
सत्र के अवसान काल में मृदुभाषी व मितभाषी उपप्राचार्य श्री सदानंद सिंह यादव द्वारा अत्यंत सुंदर और मर्मस्पर्शी गीत की प्रस्तुति की गई।
दिनांक 28.12.11 की सांध्य-बेला ने श्रीमती अनुराधा पाण्डेय के संचालन एवं नेतृत्व में भव्य-काव्य संध्या का अयोजन किया गया, जिसमें प्रमुख रूप से रामनारायण सिंह ने ‘कहानी एक जैसी है हमारी भी तुम्हारी भी’ तथा विश्वम्भर नाथ मिश्र द्वारा नरोत्तम दास के पद व रामचरित मानस का आरंभिक वंदना की प्रस्तुति की। इसके अतिरिक्त अन्य प्रशिक्षणार्थियों द्वारा भी विभिन्न काव्य-प्रस्तुतियाँ की गईं। अंत में श्रीमती रेवती अय्यर द्वारा औपचारिक धन्यवाद-ज्ञापन के साथ दिनांक 28.12.11 के कार्यक्रम सफल व सार्थक रूप में सम्पन्न हुए।
//प्रतिवेदक समूह: पंत समूह//

दिनांक 29.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

इस दिन की प्रातःकालीन बेला में योगाभ्यास से प्रतिभागियों ने नवीन ऊर्जा प्राप्त की। स्वल्पाहार के पश्चात पंत सदन ने प्रार्थना-सभा के विविध कार्यक्रम प्रस्तुत किये। संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय ने नागार्जुन व त्रिलोचन के जीवन के संस्मरणों की प्रस्तुति से सभागार को साहित्यमय कर दिया। निदेशक महोदय ने पद-परिचय व कक्षा- 9 वीं, व 10 वीं के पाठ्यक्रम के आलोक में अन्य व्याकरणिक पक्षों पर प्रकाश डाला। काशी हिन्दू विवि से पधारे विषय-विशेषज्ञ महोदय ने हिन्दी साहित्य के इतिहास एवं गजल विधा के विकास पर प्रकाश डालते हुए उसकी प्रवृत्तियों की जानकारी दी। प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण किया गया। संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्त ने यात्रा-संस्मरण पर अपने अनुभव के साथ समय की माँग की बताकर इसके विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रतिभागियों की ओर से परिचर्चा में सहभागिता दर्ज कराई गई। भोजनावकाश के पश्चात आदर्श-पाठ के क्रम में डॉ विनीता राय, डॉ पूनम चौधरी, रजनी त्रिवेदी, अश्विनी राय तथा राजेश त्रिपाठी ने आदर्श पाठ प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों ने भी पाठों पर अपनी ओर से सुझाव दिये। सह-निदेशक श्री एस एस शुक्ल जी ने आदर्श-पाठ योजना पर सुझाव से युक्त टिप्पणी दी। पाठ-योजना की प्रस्तुतियों के पश्चात प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूहों में बैठकर समूह-कार्य निष्पादित किए। बचे समय में संगणक पर अभ्यास किया गया। अंत में सभागार मे पुनः एकत्र होने पर निदेशक महोदय ने सभी को निदेशक महोदय ने निर्देश दिया कि समूहकार्य मौलिक, प्रभावी व छात्रों को ध्यान में रखकर पूर्ण किये जाएँ।
संध्याकाल में सांस्कृतिक-कार्यक्रम आयोजित किये गये जिसके अंतर्गत भोजपुरी गीत, एकल-अभिनय व गजलों की प्रस्तुति उल्लेखनीय है।
//प्रतिवेदक समूह: निराला समूह//

दिनांक 30.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

इस दिन का प्रारंभ भी योगाभ्यास से हुआ। प्रतिभागियों ने सूर्योदय के साथ योगाभ्यास किया। प्रातःकालीन सभा की प्रस्तुति निराला सदन द्वारा की गई। प्रथम सत्र के प्रारंभ में शिविर के निदेशक श्री विजय कुमार ने एनसीएफ 2005 पर प्रकाश डाला। एनसीएफ को आधुनिक शिक्षा के लिए वरदानतुल्य बताया। इसी सत्र में स्काउट एवं गाइड के विषय में पधारे विषय-विशेषज्ञ श्री वी.वी दुबे, वरिष्ठ प्रशिक्षक डीरेका, सिविल डिफेन्स एवं श्री प्रमोद कुमार, जिला मुख्यालय आयुक्त, भारत स्काउट एवं गाइड, डीरेका, वाराणसी ने जानकारी दी गई। स्काउट सिर्फ संगठन ही नहीं, अपितु मानवसेवा का अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। स्काउट एवं गाइड की सीमा सम्पूर्ण विश्व तक फैली हुई है। बच्चों से लेकर युवाओं तक सभी जुड़े हैं।
चायकाल के पश्चात संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने प्राथमिक उपचार विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने प्राथमिक उपचार में न सिर्फ चोट व दुर्घटना के विषय में बताया, अपितु हड्डी टूटने से लेकर शरीर के किसी भी अंग तक की प्राथमिक चिकित्सा से जुड़ी बातें बताईं। भोजनावकाश के बाद प्रतिभागियों के द्वारा आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की गई। इसमें श्री संजय कुमार सिंह, डॉ के के पाण्डेय, श्रीमती प्रणति सुबुद्धि, श्रीमती टी. लेखा, श्री रवीन्द्र कुमार, श्री प्रमोद कुमार शर्मा, श्री रामनारायण ने आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की। प्रतिभागियों ने पावर-प्वाइंट द्वारा अपने आदर्श-पाठ की प्रस्तुति दी। चायकाल के पश्चात सभी प्रतिभागियों ने समूह के साथ बैठकर संगणक कार्य का निष्पादन किया। संगणक कार्य अभ्यास के पश्चात श्री व्ही.सी. गुप्ता ने आदर्श पाठ पर प्रकाश डालते हुए दिन भर की गतिविधियों की संक्षिप्त समीक्षा के साथ ही दिनांक 30.12.2011 के कार्य पूर्ण होने की घोषणा की।
//प्रतिवेदक समूह: महादेवी समूह//

दिनांक 31.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

प्रातःकालीन योगाभ्यास के साथ शिविर के नवें दिन का शुभारम्भ हुआ। प्रतिभागियों ने योग के विविध उपादानों से परिचय प्राप्त हुआ। प्रार्थना-सभा के विविध कार्यक्रमों – प्रार्थना, अध्यापक-प्रतिज्ञा, आदर्श वाक्य, विशेष कार्यक्रम, तथा प्रतिवेदन-वाचन की प्रभावशाली प्रस्तुति महादेवी सदन की ओर से की गई। निदेशक महोदय ने प्रतिभागियों का कुशल-क्षेम पूछा तथा अपठित शिक्षण के संदर्भ में विस्तृत जानकारी प्रदान की। महोदय ने स्पष्ट किया कि अपठित का निरंतर व सतत अभ्यास कक्षा में आवश्यक है। सह-निदेशक श्री एस एन शुक्ल जी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पद्य-शिक्षण के संदर्भ में आवश्यक जानकारी दी। अतिथि वक्ता के रूप में पधारे डॉ. तीरविजय सिंह, संपादक अमर उजाला, ने पत्रकारिता के व्यावहारिक पक्ष पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। पत्रकारों के जीवन में आने वाली कठिनाईयों तथा उनकों किन-किन सावधानियों को बरतने की आवश्यकता है। इस पर ध्यान आकृष्ट किया।

प्रतिभागियों ने तरह-तरह की शंकाएँ व्यक्त कीं, जिसका निराकरण उन्होंनंे सफलतापूर्वक किया। अगले कालांश में संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने केन्द्रीय विद्यालयों में पाठ्य-सहगामी क्रियाओं की स्थिति तथा उसके लाभों के संदर्भ में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई। अगले कालांश में श्री संतोष कुमार में ‘कविता के बहाने’ का आदर्श पाठ प्रस्तुत किया, जिसमें प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने सुझाव दिये। भोजनावकाश के बाद प्रतिभागियों ने आबंटित कार्य को पूरा किया। समूह कार्य के समय पर पूरा हो जाने पर संसाधक श्री व्ही सी गुप्त ने प्रतिभागियों व प्रभारियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों की उत्तर-परीक्षा के द्वितीय चरण को सम्पन्न कराया गया। संध्याकाल में प्रतिभागियों ने काव्य-संध्या का आयोजन किया जिसमें एकल अभिनय व लोकगीतों द्वारा इस व्यावाहारिक विधा की प्रस्तुति की गई।
//प्रतिवेदक समूह: प्रेमचंद समूह//

दिनांक 01.01.2012 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

प्रातःकाल का शुभारम्भ योगाभ्यास से हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने योग की विविध मुद्राओं का अभ्यास किया। अल्पाहार के पश्चात प्रेमचंद सदन की ओर से प्रार्थना -सभा के सभी कार्यक्रम – प्रार्थना, प्रतिज्ञा, आदर्श वाक्य, विशेष कार्यक्रम, प्रतिवेदन तथा राष्ट्रगान की प्रस्तुति की गई। शिविर निदेशक एवं प्राचार्य श्री विजय कुमार ने प्रार्थना-सभा के कार्यक्रमों की गुणवत्ता तथा विद्यालयी जीवन में इसकी महत्ता व उपादेयता पर अपना सारगर्भित भाषण दिया। अतिथि के रूप में पधारे विषय-विशेषज्ञ ने गद्य-शिक्षण की विविध बारीकियों की विस्तार से चर्चा की। चर्चा को सह-निदेशक ने आगे बढ़ाते हुए वाचन-पक्ष पर विशेष ध्यान देने का संदेश दिया। प्रतिभागियों ने चर्चा में भाग लेते हुए अपनी-अपनी जिज्ञासाओं से तथा उनके सर्वमान्य निष्कर्ष से शिविर को लाभान्वित किया। संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय तथा व्ही.सी. गुप्त ने संश्लेषित शिक्षा क्या है ? उससे लाभ तथा केन्द्रीय सरकार तथा केन्द्रीय मा.शि.मं. से निःशक्तजनों को दी जाने वाली विविध छूट की जानकारी से प्रतिभागियों को अवगत कराया। भोजनावकाश के पश्चात समापन समारोह का आयोजन किया गया। जिसके मुख्य अतिथि विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्री एल वी राय, मुख्य कार्मिक अधिकारी, डीरेका थे। समापन समारोह में शिविर निदेशक श्री विजय कुमार ने दस दिन के शिविर की उपलब्धियों से अवगत कराया। प्रतिभागियों की ओर से विभिन्न समूहों के प्रभारियों – श्रीमती शोभारानी, डॉ के के पाण्डेय, श्रीमती एन एस कौल, श्री चुम्मनप्रसाद श्रीवास्तव एवं डॉ विनीता राय ने शिविर के अनुभव व्यक्त किये। मुख्य अतिथि महोदय ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किये व अपने अध्यक्षीय भाषण में बताया कि शिविर में जिस प्रकार की शिक्षण-तकनीक व विषय-ज्ञान प्रतिभागियों ने अर्जित किया है यदि वे इसका प्रयोग अपने विद्यालयों ने निष्ठा से करेंगे तो निस्संदेह समाज व विद्यार्थियों का कल्याण होगा। उन्होंने प्राचार्य महोदय को इस सफल आयोजन पर बधाई दी व भविष्य में इसी उत्साह से कार्य करते रहने का संदेश दिया। सहनिदेशक श्री एस एन शुक्ल जी ने कार्य के सफल निष्पादन हेतु संसाधकद्वय, विद्यालयकर्मियों, भोजन तथा अन्य व्यवस्थाओं में लगे लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया। //प्रतिवेदक समूह: भारतेन्दु समूह//

क्षणिकाएं


(त्रयी : शिविर निदेशक, सह निदेशक एवं उपप्राचार्य)


(हे गंगा जीवन का दिशा बदल दो : उत्‍तरायणी गंगा शूलटंकेश्‍वर स्‍थल पर रात्रि समय हम साथ साथ, संसाधकद्वय, पूस्‍ताकलयाध्‍यक्ष एवं शिक्षक साथी)


(गंगा आरती के वैश्‍िवक आयोजन का आनंद लेते हुए साथी)


(बनारस की पुण्‍य देहरी पुनरागमन की कामना के साथ)

हिन्दी शिक्षकों का संगम : श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास की त्रिस्तरीय ऊर्जा

प्रस्तुति: डॉ. शेषकुमारी सिंह(स्‍नातक शिक्षिका,हिन्‍दी,केवि-वायुसेनाकेन्‍द्र, ओझर, मुम्‍बई संभाग)

(केन्द्रीय विद्यालय ओल्ड कैंट इलाहाबाद में स्नातक हिन्दी शिक्षकों का प्रशिक्षण शिविर 8 जून से 19 जून 2011 तक आयोजित किया गया था। इस शिविर में हिन्दी शिक्षण के विविध आयामों पर कई अच्छे नतीजे सामने आये। शिक्षक दिवस आ रहा है। इसलिए एक और पोस्ट शिक्षा के बारे में जारी की जा रही है। शिविर के अकादमिक उपलब्धियों और छायाचित्र गैलरी यहां आमंत्रित सर्जनाकार डॉ. शेषकुमारी सिंह के सौजन्य से उपलब्ध है। आशा है सभी हिन्दी साथी इसका अवलोकन कर प्रतिक्रिया से अवगत करायेंगे – संपादक डॉ. रामकुमार सिंह)

8 जून 2011 को सेवाकालीन हिन्दी स्नातकोत्तर शिक्षक प्रशिक्षण शिविर का शुभारम्भ मुख्य अतिथि माननीय डॉ पी के तिवारी, सेवानिवृत उपायुक्त केविसं, के करकमलों से विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप-प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर शिविर निदेशक श्री बी दयाल, सह-निदेशक श्री रामजी गिरि, संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला, श्रीमती अंजुम एवं श्रीमती इंदिरा सिंह के द्वारा भी मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर भावांजलि प्रस्तुत की गई।
शिविर निदेशक श्री बी दयाल प्राचार्य केवि ओल्ड कैंट इलाहाबाद ने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए शिविर के उद्देश्य एवं उसकी सार्थकता पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात शिविर के प्रतिभागियों के द्वारा अपना अपना परिचय प्रस्तुत किया गया। माननीय मुख्य अतिथि डॉ पी के तिवारी ने प्रतिभागियों को आशीर्वचन देते हुए शिविर की सफलता की कामना की। कार्यक्रम के अंत में सह निदेशक श्री रामजी गिरि ने मुख्य अतिथि के प्रति आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती मधुश्री शुक्ला के द्वारा किया गया। स्वल्पाहार के पश्चात सभी प्रतिभागी पूर्व परीक्षा में सम्मिलित हुए।

भोजनोपरांत द्वितीय सत्र में प्राचार्य श्री बी दयाल केवि ओल्ड कैंट ने पावर प्वांइट के माध्यम से दो रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारियां दीं, जिनका सार था कि हमें अपने विद्यार्थियों को प्रसन्न रहने और सकारात्मक सोच विकसित करने की प्रेरणा देनी चाहिए। इस उपयोगी जानकारी के उपरांत सांयकालीन चाय के उपरांत संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला ने प्रतिभागियों का समूह विभाजन किया। सत्य, निष्ठा, न्याय, ईमान, अहिंसा समूह में सात-सात प्रतिभागियों को बांटकर संसाधिका महोदया ने प्रत्येक समूह को कार्य आबंटित किये। – सत्य समूह का प्रतिवेदन।
9 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ सत्य समूह की प्रार्थना-सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत श्री राजीव कुमार सिंह जी ने लयबद्ध कवितावाचन किया जिसका शीर्षक था- दीवानों की हस्ती। प्रार्थना-सभ की समाप्ति श्री गंगाधार जी द्वारा दिनांक 8 जून के प्रतिवेदन वाचन के साथ हुई।

दिन के प्रथम सत्र में शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने ‘आओ सीखें’ के अन्तर्गत सभी प्रतिभागियों को सफल अध्यापक बनने की प्रेरणा दी। श्री राजीव कुमार जी ने कबीर के पद पढ़ाये। तत्पश्चात सह निदेशक श्री राम जी गिरि ने वैयक्तिक भिन्नताओं के आधार पर शिक्षण विषय पर प्रकाश डालते हुए विभिन्न छात्रों के लिए अपनाई जाने वाली विभिन्न युक्तियां बताईं। मध्यान्ह भोजन के पश्चात दिवस के द्वितीय सत्र में शिविर की संसाधिका श्रीमती अंजुम जी ने आदर्श पाठ-योजना के रूप में ‘अलंकार’ प्रकरण पढ़ाया। इस कक्षा में सभी प्रशिक्षणार्थियों ने पूर्ण सहभागिता का प्रदर्शन किया। जिससे कक्षा के बाद संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला ने सफल शिक्षक के गुण बताये तथा समय के साथ नवाचारी बनने की प्रेरणा दी। तत्पश्चात श्री माणिक कुमार जी, स्नातकोत्तर शिक्षक- संगणक विज्ञान, ने संगणक की मूलभूत अवधारणाओं से सभी को अवगत कराया तथा इसका व्यावहारिक अभ्यास भी कराया। सूचना एवं तकनीक के युग की ओर चरण बढ़ाने के उत्साह तथा रुचिकर संगणक शिक्षा के साथ दिवस के प्रशिक्षण को विराम मिला। – निष्ठा समूह का प्रतिवेदन


(मार्गदर्शन)

11 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ निष्ठा समूह की प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत श्री एस एल पाण्डेय जी ने स्वरचित कविता के माध्यम से प्रयाग प्रशस्ति का सुमधुर स्वर में गायन किया। प्रतिवेदन श्रीमती गीता सबरवाल जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया। सभा का संचालन श्री एम ए नकवी के द्वारा किया गया।
दिन के प्रथम सत्र में शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने सर्वे के आधार पर पढ़ाये जाने वाले शिविर पाठ्यक्रम की चर्चा की एवं दो प्रेरणादायी कहानियों – ‘एक मेढ़क की कहानी’ और ‘मेरा कुत्ता पानी पर चलता है’ का बड़ा ही सुन्दर एवं प्रभावशाली वाचन किया। इसके पश्चात श्री माणिक कुमार जी ने बराह साफ्टवेयर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां अत्यन्त सरल पद्धति से प्रदान की जिसकी सभी प्रतिभागियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।


(जिज्ञासा और अभिव्‍यक्‍ित)

भोजनावकाश के बाद दिन के दूसरे सत्र में निष्ठा समूह से श्रीमती गीता सबरवाल जी ने कविवर देव के पाठ सवैया और कवित्त पर अत्यन्त रुचिकर, आकर्षक व विद्वतापूर्ण शैली में आदर्श पाठ प्रस्तुत किया। तत्पश्चात संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला जी ने आदर्श पाठ के रूप में शिल्प-सौन्दर्य के तत्वों पर प्रकाश डाला। इसी श्रंखला में संसाधिका श्रीमती अंजुम जी ने समास प्रकरण पर आदर्श पाठ प्रस्तुत किया। दिन के आखिरी चरण में विद्यालय के प्राचार्य व शिविर निदेशक जी ने वाच्य और पंचमाक्षरों के विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी बड़ी ही रोचक शैली में प्रदान की। – ईमान समूह का प्रतिवेदन

11 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ ‘ईमान’ समूह की प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। प्रार्थनासभा में पश्चात शिविर के सहायक निदेशक श्री रामजी गिरि द्वारा रूपरेखा से अवगत कराया गया। तत्पश्चात शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने अपनी चिर परिचित शैली में प्रभावी शिक्षक के सामान्य गुणों की चर्चा की। इसके बाद सहायक निदेशक द्वारा गद्य की विभिन्न विधाऐं, गद्य रचनाओं के सोदाहरण प्रस्तुत की। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों ने संगणक कार्य किया। भोजनावकाश के बाद श्रीमती इंदिरा सिंह ने भाषा कौशल का विकास के विषय में प्रभावी विचार प्रकट किये। प्रतिभागियों को उत्साही बनाया। शिविर के प्रतिभागियों द्वारा आदर्श पाठ प्रस्तुत किये गये। उसमें सर्वश्री पीआर सिंह, डॉ वेदप्रकाश मिश्र तथा मनोज जी ने भाग लिया। अंत में शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने र के प्रयोग की सम्पूर्ण जानकारी दी। – अहिंसा समूह का प्रतिवेदन
12 जून को शिविरार्थी श्री राम जी गिरि के निर्देशन में प्रातःकाल इलाहाबाद दर्शन को बस द्वारा निकल पड़े।


(चलो इलाहाबाद दर्शन को…)

सर्वप्रथम प्रशिक्षणार्थी पवित्र संगम स्थल पहुंचे। संगम स्नान कर सभी श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास की त्रिस्तरीय ऊर्जा से परिपूर्ण होकर अक्षय वट, पातालपुरी पहुंचे।


(जाना था गंगा पार……)


(प्रसीद….प्रसीद प्रभो मन्‍मथारि)


(आस्‍था, धर्म और कला)

इसके बाद संगम से लगभग 55 किमी दूर सीतामढ़ी पहुंचे। वहां सीताजी की अत्यंत आकर्षक प्रतिमा तथा 108 फीट ऊंचे हनुमान जी की दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन किये। स्थल बड़ा ही मनोरम और पवित्र था।


(भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्‍द्र के काज संवारे)


(सत समा गया सत्‍ता के अंक विवर में /पर सीता की रवि की किरण अभेद तिमिर में //-‘सीतायन’ से, सीताजी के पाताल-प्रवेश की पंक्‍ितयां)

दोपहर बाद सभी प्रशिक्षणार्थी शिविर में वापस लौट आये। भोजनावकाश के बाद पुनः इलाहाबाद स्थित स्वराज भवन एवं आनंद भवन का भ्रमण किया।


(इलाहाबाद के ऐतिहासिक परिसर – अपने कैमरे में कैद….एक)


(इलाहाबाद के ऐतिहासिक परिसर – अपने कैमरे में कैद……दो)


(चित्र गवाह हैं इतिहास के)


(साथ-साथ बने एतिहासिक स्‍थलों के साक्षी्)

बहुत सारी स्मृतियां एवं छायाचित्रों साथ सभी शिक्षक- शिक्षिकाएं संसाधकगण सहित लौट आये और इस प्रकार एक और सफल दिवस का समापन हुआ। – न्याय समूह का प्रतिवेदन
13 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ अहिंसा समूह की प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति में श्रीमती मधु मैडम ने अपने मधुर कंठ से एक कविता सुनाई जिसका विषय था- राष्ट्रीय एकता। सभा का संचालन श्री विनोद कुमार दुबे ने किया। तत्पश्चात शिविर निदेशक श्री बी दयाल ने अपनी चिरपरिचित शैली में प्रभावी शिक्षक के सामान्य गुणों की चर्चा की।
इसके बाद श्री गंगाधर जी द्वारा आदर्श पाठ-योजना की रोचक प्रस्तुति की गई। इसका विषय था – उपभोक्तावाद की संस्कृति। इसी मध्य शिक्षाधिकारी श्री के एस यादव का आगमन हुआ और उनका स्वागत शिविर निदेशक बी दयाल जी के द्वारा किया गया। शिक्षाअधिकारी श्री यादव से सभी का संक्षिप्त परिचय कराया गया इसके बाद उन्होंने अपने वक्तव्य में सभी को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने उत्तम स्वास्थ्य और छात्रों के संतुलित विकास पर बल दिया। भोजनावकाश के बाद श्रीमती प्रमिला जैन ने मेघ आए, श्री नकवी जी ने सूरदास और राजीव सिंह द्वारा बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता पर आदर्श पाठ-योजना प्रस्तुत की। अंतिम सत्र में संगणक शिक्षक श्री माणिकजी द्वारा पावरप्वाइंट का सैद्धांतिक और व्यावहारिक ज्ञान दिया। तत्पश्चात सभी प्रतिभागी सीखे हुए ज्ञान को स्वयं कम्प्यूटर चलाकर प्रयोग करने में लग गये। – सत्य समूह का प्रतिवेदन


(विद्वतजन की वाणी…)

14 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ न्याय समूह द्वारा प्रार्थना सभा से हुआ। इसके बाद प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों एवं विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। इसके बाद शिविर निदेशक श्री बी दयाल ने प्रमुख अतिथि डॉ सूर्य नारायण सिंह, प्रो. इलाहाबाद विवि, का स्वागत किया। मुख्य अतिथि प्रो सिंह ने हिन्दी गद्य की नवीन प्रवृत्तियां विषय पर उत्कृष्ट एवं विस्तृत व्याख्या की। इसके बाद शिविर के सह-निदेशक श्री रामजी गिरि ने सोद्देश्य ग्रहकार्य एवं उसकी अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए संतुलित ग्रहकार्य देने की अनुशंसा की। इसी के साथ प्रथम सत्र समाप्त हुआ।
अपरान्ह सत्र में श्रीमती मधुराज पल खन्ना, राजेश कुमार शुक्ल, नाहरसिंह मीणा, शेषकुमारी सिंह एवं हरिशंकर द्विवेदी जी द्वारा आदर्श पाठ-योजना की उत्कृष्ट प्रस्तुति की गई। इसके बाद संगणक शिक्षक श्री माणिक जी ने प्रतिभागियों के बीच दो समूह बनाकर बराह सॉफ्टवेयर के प्रयोग के संदर्भ में खेल विधि द्वारा प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतिभागियों ने बहुत ही उत्साह के साथ प्रतियोगिता में भाग लेते हुए अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया। दोनों समूहों के अंक बराबर रहे। इसके बाद उत्साहवर्धन के लिए सभी प्रतिभागियों के बीच शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी द्वारा मिष्ठान्न का वितरण किया गया। इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक दिवस की समाप्ति हुई। – निष्ठा समूह का प्रतिवेदन
15 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ सत्य समूह द्वारा प्रार्थना-सभा से हुआ। समूह द्वारा प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों एवं विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई।
प्रथम सत्र की शुरूआत संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ल ने जीवन में खुश रहने के उपाय के जीवंत व्याख्यान से किया। डॉ रामकिशोर, प्रो. इलाहाबाद विवि, ने विशेष अतिथि के रूप में भाषा, शब्द, ध्वनि बोली धातु लिंग तथा स्त्री विमर्श आंदोलन आदि दुरूह विषयों पर अपनी विशद चर्चा रूपी व्याख्यान से प्रतिभागियों को भाषा-विज्ञान की सुरसरिता में अवगाहन कराते हुए सबका ज्ञान संवर्धन किया। संसाधिका श्रीमती इंदिरा सिंह ने अपठित गद्यांश पर अपने ज्ञान को वितरित किया। अपरान्हकालीन बेला में विभिन्न प्रतिभागियों ने अपने-अपने आदर्श पाठों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। संगणक शिक्षक श्री माणिक कुमार जी ने सबको इंटरनेट की प्रारंभिक जानकारी दी।
सांन्ध्यकालीन बेला में काव्यगोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से की गई। इसमें विभिन्न प्रतिभागियों के साथ संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ल, सह निदेशक श्री रामजीगिरि तथा निदेशक श्री बी दयाल जी ने अपनी काव्य-रचना कौशल का परिचय दिया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने की। इसका अद्भुत संचालन कर श्री वेदप्रकाश मिश्र जी ने विलक्षण काव्य-शक्ति का परिचय दिया। -ईमान समूह का प्रतिवेदन


(विद्वतजन की वाणी…)

16 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ निष्ठा समूह द्वारा प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना प्रतिज्ञा सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई जिसका विषय था – गांव की ओर लौटने की चाह। प्रतिवेदन की प्रस्तुति श्री एस एल पाण्डेय जी के द्वारा प्रस्तुत की गई।
इसके बाद अतिथि वक्ता डॉ लालसा यादव, प्रवक्ता, इलाहाबाद विवि के द्वारा स्त्री-विमर्श विषय पर बहुत ही उत्कृष्ट व्याख्यान की प्रस्तुति की गई। उन्होंने आदिकाल से आधुनिक युग की नारी तक की यात्रा बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
तदुपरांत श्री ओ पी पाण्डेय द्वारा ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’ श्रीमती शेषकुमारी सिंह द्वारा सूरदास तथा डॉ गीताकुमारी द्वारा कृष्णभक्ति पर रसखान विषय की आदर्श पाठ योजना प्रस्तुत की गई।


(दुतरफा सम्‍प्रेषण – कभी प्रश्‍न तो कभी गीत के रूप में)

भोजनावकाश उपरांत शिविर के सह-निदेशक श्री रामजी गिरि ने छात्रों की परीक्षा संबंधी दबाब, उनके कारण, उनको दूर करने की युक्तियां आदि पर गहन विचार प्रस्तुत कर अनेक समस्याओं का समाधान किया। तदुपरांत संसाधिका श्रीमती अंजुम ने हिन्दी के प्रति उदासीनता तथा उसके प्रति रुचि जगाने के उपाय विषय पर श्रेष्ठ व्याख्यान प्रस्तुत किया। अंत में कम्पयूटर संसाधक श्री आरके चौहान जी के द्वारा थिंक-क्वेस्ट की व्यापक जानकारी द्वारा प्रतिभागियों की समस्याओं का सहज निवारण किया। – अहिंसा समूह का प्रतिवेदन
17 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ ईमान समूह द्वारा प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। इसके बाद निदेशक श्री बी दयाल जी ने विद्यार्थियों के जीवन विकास व मार्गदर्शन कैसे करना चाहिए इस विषय पर अतिमहत्वपूर्ण सुझाव दिये। इसके बाद प्रशिक्षार्णियों के द्वारा आदर्श पाठ योजना प्रस्तुत की गई। इस क्रम में श्रीमती सीमा, श्रीमती विद्या पाण्डेय, श्री आर आर पाण्डेय, श्रीमती जी आर किशोरी, श्रीमती अरुणिमा वर्मा के द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। तदुपरांत शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने काव्य-शिक्षण के उद्देश्यों की विधि का स्पष्टीकरण किया। दूसरे सत्र में श्रीमती इंदिरा सिंह जी ने जीवन-कौशल के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। तदुपरांत श्री चौहान ने थिंक-क्वेस्ट प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी।

18 जून को प्रातःकालीन सभा शुभारम्भ अहिंसा समूह द्वारा प्रार्थना -सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के बाद विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। प्रतिवेदन की प्रस्तुति श्री प्रमोद सिंह द्वारा की गई।
निदेशक श्री बी दयाल जी ने विचार-गरल विषय पर महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों द्वारा आदर्श पाठयोजना प्रस्तुत की गई। श्रीमती रीना भट्टाचार्य, श्रीमती अरुणिमा वर्मा, श्रीमती पूनम शुक्ला के द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। तदुपरांत प्रशिक्षण के दौरान पठित पाठों पर आधारित परीक्षा का आयोजन किया गया।
दूसरे सत्र में निदेशक श्री बी दयाल ने वर्तनी एवं उच्चारण सम्बन्धी अशुद्धियों पर अभूतपूर्व व्याख्यान दिया। तदुपरांत श्री माणिक कुमार ने संगणक प्रयोग सम्बन्धी कठिनाईयों का निवारण किया। – सत्य समूह का प्रतिवेदन

19 जून को न्याय समूह द्वारा प्रार्थना-सभा का संचालन किया गया। प्रतिवेदन श्री ओमप्रकाश पाण्डे द्वारा प्रस्तुत किया गया। विशेष कार्यक्रम में श्रीमती शेषकुमारी सिंह द्वारा ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत का सुमधुर गायन किया गया। प्रार्थना-सभा के सभी कार्यक्रम प्रभावशाली रहे। शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने गुण नामकरण एवं प्रभाव शब्द शक्तियां एवं उनसे ध्वनित अर्थ, समास- अर्थ महत्व तथा पहचान एवं उपवाक्य तथा उनके भेदों पर प्रकाश डालते हुए सारगर्भित परिचर्चा प्रस्तुत की गई। इसके उपरांत सम्पूर्ण प्रशिक्षण शिविर के दौरान पढ़ाए गए विषयों का पुनरावलोकन किया गया। भोजनोपरांत संगणक शिक्षक श्री माणिकजी ने थिंकक्वेस्ट पर प्रतिभागियों को उपयोगी जानकारी दी। अपरान्ह सत्र में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किये गए।


(मनीषियों से प्राप्‍त किये प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र)

सभी प्रतिभागियों ने सुव्यवस्थित शिविर प्रबंधन एवं बारह दिवसीय अनवरत चलने वाले ज्ञान यज्ञ की प्रशंसा की। विभिन्न संभागों से आए हुए प्रतिभागियों ने शिविर निदेशक श्री बी दयाल, सह निदेशक श्री रामजीगिरि एवं संसाधक त्रय – श्रीमती मधु शुक्ल, श्रीमती इन्दिरा सिंह एवं श्रीमती अंजुम के प्रति आभार व्यक्त किया।


( इलाहाबाद में, उद्यान में)

और चलते…..चलते…..

(संगम ……इस रूप में)

बारह दिन बनारस में

सुदामा अंदर देखि डरे……
‘सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो…….
..

‘आदमी का डर’ एक साहित्यिक जुमला हो सकता है। मगर जब ऐसी रेलगाड़ी के डिब्बे में चढ़ना हो जहाँ आदमी की ……और सिर्फ आदमी की मौजूदगी डर का कारण हो जाये तो जुमले का असली मतलब समझ आता है बनारस पहुँचना था 9 तारीख की सुबह । प्रशिक्षण शिविर में समय पर पहुँचने की जिद में बुन्देलखण्ड का आरक्षण उपेक्षित कर पहुंच गये आगरा से गांधीधाम एक्सप्रेस में बैठने। आरक्षण मिल गया था। सोचा सुबह जल्दी पहुंच जायेंगे। एक्सप्रेस के नियत डिब्बे में झाँके तो होश उड़ गयें पटनियां भाइयों से डिब्बा अटा पड़ा था। काहे का रिजर्वेशन साहब ! दोपहर दो बजे तीनों बर्थ खुली और एक एक बर्थडे पर आठ आठ आदमी। न घुसने का रास्ता न सीट तक पहुंचने का। पहुंच भी गये तो मिलना क्या था। घुस भी गये तो टायलेट तक आना पानीपत के युध्द से बड़ा। खास गंध से डिब्बा अटा पड़ा। खिड़की से ही देखकर बिफर पड़े ……डर…..क्रोध घबराहट और मानवीय निवेदन का मिला-जुला रूप देखकर भीतर के लोग सकते में आ गये। सारे लोगों ने मिलकर अंदर खींच लिया।

ताजमहल तबेले और धोबीघाट…..
यमुना के पुल से ताजमहल का नजारा …..आ हा! लगता है शाहेजहाँ की जिंदगी भर की कमाई लगी है मगर नीचे यमुना पर नजर जाते ही मन खट्टा हो गया यमुना को हमने गंदे नाले में तब्दील कर दिया है। जल में धोबीघाट चल रहा था और इस किनारे पर भैंसों के तबले दिख रहे है यह वही जगह है जहाँ स्लमडॉग को फेंका था। आखिरकार भीड़ में फसे हुए सुबहे-बनारस देखते न देखते काशीवासी हो जाने की स्थिति के साथ पहुँच गये। मौका था देश भर के हर हिस्से से आने वाले स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षकों के प्रशिक्षण व सेमीनार का।

कौन-कौन मिले सहभागी ………..
‘लोग मिलते गये कारवां बनता गया’

केन्द्रीय विद्यालय रेल कारखाना देश भर के कोने-कोने से आये हिन्दी शिक्षकों का जमावड़ा होता गया। अगले दिन तक सभी आपस में धीरे-धीरे परिचित हो चले। संख्या का अर्धशतक पूरा हो चला था। सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं के 8-8 9-9 में अकादमिक समूह बने जिनके नाम थे – प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी, प्रेमचंद और भारतेन्दु। काशी बनारस की इस भूमि से जुड़े इन कालजयी साहित्यकारों के नाम के समूह का एक विशेष अपनापन यहाँ लगना स्वाभाविक ही था। निदेशक श्री विजय कुमार जी, सहनिदेशक श्री एस एन शुक्ल, संसाधक डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय और श्री विन्ध्याचल गुप्ता से परिचय हुआ।
49 प्रतिभागी साथियों से मिलकर लगा कि सारे देश का एक छोटा सा रूप सामने है। कोलकाता संभाग से 5 साथी थे। डॉ. श्रीमती रंजना त्रिपाठी, श्रीमती अनुराधा पाण्डेय, श्री अमरनाथ, श्री ब्रजभूषण पाठक और श्री प्रमोद कुमार शर्मा। पटना संभाग से 2 प्रतिभागी डॉ. पूनम चौधरी और डॉ. विनीता राय, हैदराबाद संभाग से 4 प्रतिभागी श्री राजेन्द्र कुमार विश्‍वकर्मा, श्री सत्यनारायण सदानंद, श्री उमेश दोषी और डॉ. जी. मल्लेशम, लखनऊ संभाग से श्रीमती रजनी त्रिवेदी, श्री संतोष कुमार, श्रीमती गायत्रीदेवी, ओर श्री कृष्णकुमार पाण्डेय, गुवाहाटी संभाग से श्री धीरेन्द्र कुमार झा श्रीमती डॉ. निर्मल स्मिता कौल, श्री चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव, श्री कैलाशचन्द्र रैगर, श्री शरीफ आलम, श्री अश्‍विनी कुमार राय, श्री दीपक और श्री रवीन्द्र कुमार, भोपाल संभाग से श्रीमती अमिता शर्मा, श्री विश्‍वम्भर नाथ मिश्र,श्री प्रदीप कुमार सिंह और श्री किशोर पांचाले, सिल्चर संभाग से श्री बी.एल.जे. सारण, श्री मनोज कुमार सिंह, श्री धर्मवीर सिंह, श्री राजेश कुमार त्रिपाठी, श्री शशिभूषण कुमार, और श्री रामनारायण सिंह, बैंगलुरू संभाग से श्री उदयकांत ठाकुर, श्रीमती रेवती अय्यर, श्रीमती एन.सत्यलक्ष्मी, श्रीमती आर. शोभारानी, श्री तेजनारायण सिंह, और डॉ. रामकुमार सिंह (मैं), भुवनेश्‍वर संभाग से श्रीमती प्रणति सुबध्दि, श्री माइकल बैंग, और डॉ. आशुतोष पाण्डेय, चैन्नई संभाग से श्री शत्रुघ्न सिंह, डॉ. उमापति जैन, श्रीमती शोभना पी.के., श्री रतनलाल, श्रीमती शहिनशा शेख और श्रीमती लेखा टी.एल.।

‘शिक्षक बनाये स्वयं को दक्ष और समर्पित : श्री बी एल राय

9 तारीख को पुस्तकालय-कक्ष में परिचय कार्यक्रम और शुभारम्भ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री एल बी राय, मुख्य कार्मिक अधिकारी डीजल रेल कारखाना एवं अध्यक्ष विद्यालय प्रबंधन समिति ने कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में केवि शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सेमीनार का दक्षता विकास में बहुत योगदान है।
पहले सत्र से ही नियमित गतिविधियाँ शुरू हो गयीं। शिविर के निदेशक और संसाधकद्वय ने रूपरेखा तय कर दी।
भोजन के बाद दूसरे सत्र में तीन अक्षरों के उस डरावने शब्द से रचनात्मक सामना हो गया जिसे ‘परीक्षा’ कहते हैं। सार्थक प्रश्‍नावली के रूप में सभी प्रतिभागियों ने पूर्वज्ञान परीक्षा दी।

दूसरा दिन……..
हिन्दी कविता ने तय किये हैं अनेक पड़ाव : डॉ. प्रभाकर सिंह


काशी हिन्दू वि.वि. के हिन्दी विभाग के प्रवक्ता डॉ. प्रभाकर सिंह ने अपने व्याख्यान में धाराप्रवाह रूप से हिन्दी कविता की विकास यात्रा को न केवल सरलता से स्पष्ट किया बल्कि उतनी ही कुशलता से प्रवृत्तियों की विवेचना भी की। काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य तो लिये ही दार्शनिक और पाश्‍चात्य से दृष्टि को समुचित जगह देते हुए समकालीन कविता को समझने के लिए जरूरी दृष्टि को स्पष्ट किया। भारत भर में चलाये जा रहे हिन्दी पाठयक्रम में संकलित आधुनिक कवियों की कविताओं की भी उन्होंने व्याख्या की। खासकर मुक्तिबोध और कुंवर नारायण को समझने में एक नया विजन दिया।
दूसरे सत्र में शिक्षकों की अकादमिक गतिविधियाँ सुचारू रहीं। इस बारे में शिविर पत्रिका में कुछ इस प्रकार वर्णित है- ”भोजनोपरान्त श्रीमती रेवती अय्यर एवं अन्य साथियों द्वारा केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा प्रायोजित थिंक क्वेस्ट डॉट कॉम से संबंधित तमाम उपयोगी जानकारियों एवं उसके विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। इसके पश्‍चात श्रीमती अय्यर द्वारा प्रसाद सदन के प्रतिभागियों को संगणक कक्ष में थिंक क्वेस्ट डॉट कॉम पर विभिन्न प्रायोगिक कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया। डॉ. रामकुमार जी ने भी थिंक डॉट कॉम पर सारगर्भित जानकारी सदन को उपलब्ध कराई।” (पंत समूह का प्रतिवेदन पृष्ठ- 25)

जीवन-कौशलों पर सार्थक बहस …….

11 तारीख की उल्लेखनीय गतिविधियों में से एक है जीवन-कौशलों के बारे में सार्थक बहस । श्री विशम्भर नाथ मिश्र ने जहाँ अपने चिरपरिचित दार्शनिक अदांज में भारतीय ग्रंथों और अंग्रेजी में पाश्‍चात्य दर्शन की परिभाषाओं के साथ अपनी बात रखी। इसके बात एक ऐसे वक्ता से मेरा पहला परिचय हुआ जिसने अंतत: मुझे गहरे तक प्रभावित किया। ये हैं श्री धीरेन्द्र कुमार झा….। यहाँ बोलते हुए श्री झा ने जीवन-कौशलों का एक शिक्षाविद शोधार्थी की तरह तकनीकी ढंग से परिचय दिया। जीवन-कौशलों पर उनका पेपर भी एनसीईआरटी में प्रस्तुत हुआ है ऐसी जानकारी उन्होंने दी।
चूँकि विषय था – जीवन-कौशल जिनमें प्रमुख रूप से हमारे विद्यार्थियों में सामाजिक कौशल, विचार कौशल और वार्ता कौशल विकसित करने का लक्ष्य सामने रखा गया था। ऐसी स्थिति में अपनी बारी आने पर मैंने हनुमान की प्रबंधन क्षमता और जीवन कौशल के माध्यम से विषय को स्पष्ट करने का प्रयास किया जो मित्रों को बहुत पसंद आया। इस बारे में अभिमत रहा – ”डॉ. रामकुमार सिंह ने पाश्‍चात्य व भारतीय जीवन-मूल्यों के बीच सूक्ष्म अंतर स्पष्ट किये। महाबली हनुमान तथा सुग्रीव आदि के माध्यम से अंतर्निहित जीवन-कौशल को स्पष्ट किया।”(स्मारिका पृष्ठ – 26 से साभार)

एनसीएफ के व्यावहारिक पक्ष पर जोर देने की जरूरत : डॉ. निरंजन सहाय
प्रश्‍न पूछना बच्चों का लोकतांत्रिक अधिकार


काशी विद्यापीठ के शिक्षाविद् प्रो. (डॉ.) निरंजन सहाय न केवल राष्ट्रीय पाठयचर्या के विशेषज्ञ हैं बल्कि वे इसकी विभिन्न समितियों तथा हिन्दी पाठयपुस्तक निर्माण कार्य समितियों के सदस्य रहें हैं इस नाते उनसे संवाद होना एक खास उपलब्धि है। 12 तारीख को वे सेमीनार में आये। एनसीएफ-2005 के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाष डालते हुए उन्होंने शिक्षण के क्षेत्र में व्यापक सामाजिक सरोकार की बात करते हुए, बच्चों द्वारा प्रश्‍न पूछने के जनतांत्रिक अधिकार का समर्थन किया। उन्होने रटने की अपेक्षा समझने की प्रक्रिया पर बल दिया। साथ ही ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ने की अनिवार्यता पर बिंदुवार विवेचना व विश्‍लेषण करते हुए यह कहा कि आज की शिक्षा प्रणाली शिक्षक केन्द्रित न होकर सामाजिक सरोकार, पर्यावरण, जैव विविधता,व तात्कालीन परिस्थितियों के प्रति भी केन्द्रित होना चाहिए। तथा आज के अध्यापकों को इस तरह का वातावरण निर्मित करना चाहिए जिससे बच्चे अपने ढंग से विचार व्यक्त कर सकें।
डॉ.निरंजन सहाय आ रहे हैं यह एक दो दिन पहले से चर्चा चल रही थी और मैं अनेक प्रश्‍न उनके सामने रखना चाहता था ताकि सार्थक संवाद के साथ अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सके। परंतु इस दिन संगणक कक्ष में तैनाती होने से संवाद नहीं हो पाया । संसाधक श्री पाण्डेय जी ने बताया कि डॉक्टर साहब ने एक दिन और आने का वायदा किया है।

……और बनारस से रूबरू होने का वक्त

आखिर 14 तारीख को वह दिन आ गया जिसकी सभी को प्रतीक्षा थी। मौका था बनारस भ्रमण का। श्री प्रदीप कुमार सिंह के संयोजन में दल निकल पड़ा। बस सबसे पहले जाकर रूकी कबीर के द्वार पर। मेरे लिए यह अत्यंत हर्ष और भावुकता का विषय था जबकि मैं कबीर के प्राकट्य स्‍थल लहरतारा में खड़ा था। आज जबकि ‘सर्जना’ के लिए यह आलेख लिख रहा हूँ तब कबीर की जयन्ती है। यह एक सुखद संयोग है।

(कबिरा तेरे द्वार पर……-एक)

(कबिरा तेरे द्वार पर…..-दो)

(कबीर प्रतिमा, कबीर प्राकट्य स्‍थली, लहरतारा, काशी)

( कबीर प्राकट्य स्‍थली, लहरतारा, काशी)

यहाँ से हम लोग सीधे सारनाथ रवाना हुए। खास बात यह है बुद्ध से जुड़े इस महान स्थल पर इन दिनों विशेष महोत्सव चल रहा था। सारनाथ में सबसे पहले श्री दिगम्बर जैन मन्दिर के दर्शन किये। यहाँ जैन धर्म के 11 वें तीर्थंकर श्री श्रेयांसनाथ की गर्भ-जन्म व तपोस्थली है। जो सिंहपुरी नाम से ख्यात है।

( श्रीलंका के श्री अंगारिका धर्मपाल की प्रतिमा)

इसी मंदिर के पास स्थित बुद्ध का विशाल मंदिर और उसमें स्थापित भव्य प्रतिमा के दर्शन किये। मंदिर मे बुद्ध की प्रिय शांति बनाये रखने के विशेष निर्देश श्रृध्दालुओं को दिये गये। यहीं प्रांगण में तथागत ने अपने पाँच प्रिय शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया। इस स्थान पर उस वृक्ष के नीचे लगी बुद्ध की सभा को देखकर मैं उसी काल में पहुँच गया और लगा बुध्द मुझसे ही संबोधित हैं।

(बुद्धं शरणम् गच्‍छामि……बुद्ध का प्रथम उपदेश)

(बुद्ध का प्रथम उपदेश – वृक्ष)

(मुख्‍य स्‍थल – ध्‍यानस्‍थ बुद्ध की प्रतिमा)

(मुख्‍य स्‍थल – ध्‍यानस्‍थ बुद्ध मंदिर प्रवेश द्वार)

(बुद्ध और बाजार…….)

(संघ शरणम् गच्‍छामि….सारनाथ में शिक्षकों का दल)

(हम पंखों से नहीं, हौसलों से उडान भरते हैं…तथागत से भेंट करने आये श्री विश्‍वकर्मा)

मेरे मन में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तम्भ को समक्ष में देखेने की बड़ी जिज्ञासा थी। बातचीत में पता चला कि स्तूप से स्तम्भ गिर गया था इसलिए आजकल संग्रहालय में रखा गया है। सभी लोग संग्रहालय की ओर बढ़े। भाई प्रदीप कुमार सिंह जी ने सभी प्रबंध किये। मोबाइल और कैमरे अंदर नहीं ले जा सके तो मुझे कुछ मायूसी हुई। मैं चाहता था कुछ खास फोटोग्राफ सर्जना पर जारी कर सकूँ।
संग्रहालय बड़ा भव्य और अंतर्राष्ट्रीय है। प्रवेश करते ही सामने भारतीय राजसी अस्मिता की पहचान आदमकद अशोक स्तम्भ रखा है ऊपर का चक्र अलग स्थापित है। बाकी संरचना कमोवेश अभी तक सुरक्षित है । संग्रहालय में आधा दर्जन से अधिक वातानुकूलित वीथिकाएँ हैं जहाँ शताब्दियों पार की छोटी बड़ी पाषाण प्रतिमाएं व दुर्लभ पुरातात्विक वस्तुएँ रखी गयीं हैं। खास बात यह है कि एटीएम मशीन की तरह लगे कम्प्यूटरों से किसी भी वीथिका और कृति की विस्तृत जानकारी यहाँ ऑनलाइन की गई है। दो जापानियों युवतियों से शिव की विशाल प्रतिमा के बारे में सांकेतिक बातचीत बड़ी रोचक रही। सभी वीथिकाओं में सर्वप्रधान आकर्षण है बुद्ध की केन्द्रीय विशाल प्रतिमा जो अपने निर्माण काल को ज्यों का त्यों उपस्थित कर देती है। मैं करीबन 30 मिनट पर इस पर सम्मोहित रहा। संसाधक श्री पाण्डेय जी ने झकझोरकर कहा कि अवधूत बनने से काम नहीं चलेगा, परीक्षा में इस यात्रा से सवाल पूछे जाने हैं….सभी का ठहाका गूंज गया। मुझे दो तीन अन्य चीजों ने और आकर्षित किया। महाशिव की दिव्य और भव्य प्रतिमा ने बड़ औदात्य प्रदान किया। इसके अलावा देवनागरी के विभिन्न रूपों के विकासक्रम को प्रवेश वीथिका में ही बांयी ओर एक विशाल पेंटिग की तरह लगाया गया है इसका छायाचित्र नहीं ले पाने का बड़ा खेद है। मैं इसे अपने विद्यार्थियों को बताना चाहता था। संग्रहालय में कुछ मूर्तियों के स्थान रिक्त थे केवल फोटो लगे थे ओर लिखा था कि मूर्ति चीन में चल रही प्रदर्शनी के लिए गई हैं। मैंने गौर किया कि जो मूर्तियां चीन ने चयनित की हैं उन सभी में बुद्ध के चेहरे एन्थ्रोपोलोजिकल ढंग से चीन के मानवीय शक्लों से मिलते हैं। कैसे महामानव को अपने अपने दृष्टिकोंण से दुनियाँ ने देखा है।
संग्रहालय को देख चुकने के बाद सभी चिड़ियाघर देखने गये। मेरी दिलचस्पी इसमें नहीं पुरास्थलों अधिक थी। मैं अपने कुछ साथियों श्री टी एन सिंह जी, श्री विश्‍वकर्मा जी, भाई प्रमोद जी, माइकल सर, और मनोज जी के साथ एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। यहां से निकलकर हम लोग चौखण्डी स्तूप पहुंचे जहां सभी ने भोजन ग्रहण किया। स्तूप पर ऊपर चढ़ने की होड़ शुरू हो गई।

(चौखण्‍डी स्‍तूप, जहां बुद्ध को प्रथम शिष्‍य मिले)

आगे एक स्थान पर बस रुकी। पाण्डेय जी ने बताया कि यह भारत माता का मंदिर है। देखा तो नयी अनुभूति हुई। सोच रहा कि हाथ में झण्डा लिये सिंहवाहिनी मां भारती की मूर्ति होगी। मगर ऐसा नहीं था। फर्श पर संगमरमर से सम्पूर्ण भारत का नक्शा दिव्य ढंग से उकेरा गया था। हिमालय से सागर तक हर स्थल के नाम उकेरे गये थे। यही है हमारी भारत माता। लगा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की बात यहाँ साकार है।
मेरा और कुछ अन्य साथियों का विशेष मन प्रेमचंद के गाँव लमही में जाने का था। प्रसाद जी के घर जाने का था। लेकिन पता चला कि रास्ते में एक पुलिया का निर्माण होने से लमही जाने का रास्ता इस ओर से जाने का बंद है। अगर दूसरे रास्ते से जाते हैं तो तकरीबन 15 किमी से ज्यादा अतिरिक्त लगेगा और जाम भी हो सकता है। इस तरह बस वाले ने असमर्थता जाहिर कर दी। फिर फैसला हुआ कि अंतिम पड़ाव से पहले काशी नरेश के किले की सैर कर ली जाये।
रामनगर पहुंचने में लगभग आधा घंटा लगा। किले की ओर बढ़ते हुए दोनों ओर बने भवनों की संरचना को देखकर अनुमान हो गया कि किस तरह राजा की सवारी निकलती होगी। पता चला यहाँ की रामलीला भारतप्रसिध्द हुआ करती थी। बाद में मुरैना पहुंचने पर मुझे पता चला कि करह आश्रम के संत रामदास जी महाराज भी काशी की रामलीला में राम का पाठ अदा किया करते थे। मुझे बहुत खुशी हुई। अस्तु……किले में अब उजड़ी हुई सल्तनत का ही आभास होता है। वर्तमान राजा श्री अनंत नारायणसिंह एक भाग में निवास करते हैं। शेष हिस्से की पुरानी चीजों जैसे बघ्घियाँ, वेषभूषा, संगीत का सामान, बंदूकें आदि। ज्योतिषी घड़ी अतिविशिष्ट लगी जो आधुनिक विज्ञान को भी बौना कर दे। यहां से भी लोग रेल कारखाना लौट पड़े। मेरे मन में गंगा दर्शन और बीएचयू परिसर में जाने की विशेष उत्कंठा थी जो किसी ओर दिन अकेले ही जाकर पूरा करने की ठानी। कुल मिलाकर यह बनारस दर्शन बड़ा ही रोचक और स्मरणीय रहा।
15 तारीख को भी रोज की तरह सुबह की गतिविधियाँ शुरू हो गई। आज का दिन इसलिए भी खास माना जा रहा था कि सहायक आयुक्त श्रीमती चित्रलेखा गुरुमूर्ति शिविर में आने वाली थीं।
पहले सत्र में मेरा पावर प्वाइंट प्रस्तुतीकरण था। मैंने अपनी प्रिय कविता रघुवीर सहाय की ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ को पढ़ाया। अप्रत्याशित रूप से साथियों ने सराहा और मुझे विशेष स्‍नेह प्राप्त हुआ ।
हिन्दी शिक्षक स्वयं को नयी चुनौतियों में ढालें : शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत
अगले सत्र में सहायक आयुक्त से पहले शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत का सम्बोधन मुझे अत्यंत प्रभावकारी लगा। उन्होंने कहा कि हिन्दी शिक्षकों को समकालीन जरूरत के मुताबिक खुद को ढालना पड़ेगा। हिन्दी भाषा शिक्षक स्वयं को अपडेट रखे। लगातार नयी पुस्तकें पढ़े। आधुनिक तकनीकी ज्ञान से भी लैस हों। श्री पंत ने यह भी कहा कि हिन्दी शिक्षण का क्या प्रयोजन है यह विद्यार्थी के सामने स्पष्ट करना होगा। नही तो हिन्दी धारा में विद्यार्थियों की घटती संख्या चिंताजनक हो जायेगी। श्री पंत ने जिस धाराप्रवाह ढंग से विचार व्यक्त किये वे निश्‍चय ही प्रभावित कर गये।

भाषा के भीतर रचनाप्रक्रिया तक जाने की जरूरत : सहायक आयुक्त श्रीमती चित्रलेखा गुरूमूर्ति
श्रीमती चित्रलेखा गुरूमूर्ति सादा जीवन उच्च विचार से युक्त शिक्षाविद् हैं। सहायक आयुक्त पद पर रहते हुए उनकी सादगी अनुकरणीय हैं हिन्दी के उनके ज्ञान पर साधुवाद है। भाषा शिक्षण की अनेक बारीकियां उन्होने सहज ही बता दीं। ‘मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या’ इस कविता के उदाहरण से उन्होंने बताया कि कविता का शब्दार्थ भर मूल्यवान नहीं है उस स्थिति में जाकर यह समझना होगा जिस स्थिति में मजदूर धनाढयों के निर्माण् को अपने स्वाभिमान के सामने तुच्छ मानता है। उसकी रचनात्मक प्रक्रिया को समझना होगा। निष्चित रूप से श्रीमती गुरूमूर्ति द्वारा सुझायी गई भाषा शिक्षण तकनीक उपयोगी रहीं।

हिन्दी गजल के प्रवर्तक हैं अमीर खुसरो : डॉ. वशिष्ठ अनूप


16 तारीख को शिविर की मुख्य उपलब्धि रही काशी हिन्दू विवि के प्रोफेसर और हिन्दी गजल के विशेषज्ञ होने के साथ साथ गीत गजल के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. वशिष्ठ अनूप से रूबरू होना। अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान में डॉ. साहब ने हिन्दी गजल की जिस यात्रा का विस्तार से वर्णन किया उसने कई नये तथ्यों को उजागर किया। आमतौर से दुष्यंत तक सीमित जानकारी में इस व्याख्यान से बड़ा इजाफा हुआ। डॉ. अनूप की सबसे बड़ी विशेषता खुसरो से लेकर अब तक गजल की हिन्दी धारा की खास पहचान और उसको चिन्हित करने का तरीका। अमीर खुसरो को हिन्दी गजल का प्रवर्तक बताते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में भी भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र से लेकर प्रसाद, निराला, त्रिलोचन शास्त्री और शमशेर तक ने अच्छी गजलें लिखीं हैं। उन्होंने कहा कि इन कवियों का पठन-पाठन करते हुए इस दृष्टिकोंण को भी ध्यान में रखने की आवष्यकता है। डॉ. वषिष्ठ द्वारा दुष्यंत कुमार की गजल ‘कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए’ का कृति केन्द्रित पाठ समालोचनात्मक दृष्टि के वैशिष्टय के साथ किया जिसकी नवीन व्याख्या अत्यंत मौलिक रही।
उनकी स्मृति भी खास है कि अनेक उद्दहरण जुबानी याद हैं। व्याख्यान उपरांत जिज्ञासाओं में डॉ. साहब से मैने निवेदन कि गीत-नवगीत और हिन्दी गजल पर किये जाने वाले शोध-समीक्षा कार्यों में अनेक उदाहरण दोनों हिस्सों में मिलते हैं कही उसी गीत को नवगीत कह दिया गया है तो कहीं गीत के तरह की रचना को हिन्दी गजल में गिना गया है। डॉ. साहब ने बहर (छन्द) के स्वरूप के अलावा गजल की कुछ खास पहचान से भी अवगत कराया और स्पष्ट किया कि यदि ऐसा किया जा रहा है तो यह गलत है।

गद्य साहित्य के केन्द्र में आज अनेक जरूरतें
डॉ. निरंजन सहाय का व्याख्यान

17 तारीख को काशी विद्या पीठ के प्रोफेसर डॉ. निरंजन सहाय एक बार फिर देश भर के कोने कोने से आये हिन्दी शिक्षकों से मुखातिब थे। उन्होंने हिन्दी गद्य लेखन के इतिहास पर विस्तार से प्रकाष डाला। गद्य और कविता के सूक्ष्म अंतर और वर्तमान में गद्य साहित्य के केन्द्र में होने के अलावा इससे जुड़ी अनेक जरूरतों पर भी चर्चा की । डॉ. सहाय का शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोंण अधिक प्रभावी रहता है।
व्याख्यान उपरांत जिज्ञासाओं के क्रम में मैंने समूचे सदन की ओर से पाठयपुस्तकों में गद्य पाठों की कुछ अवधारणात्मक त्रुटियों पर निवेदन किया। दरअसल डॉ. सहाय पाठयपुस्तक निर्माण समिति और राष्ट्रीय पाठयचर्या से जुड़ी अनके परियोजनाओं से सक्रिय रूप से जुडे हैं।
मेरे संगीत अनुराग और वाद्ययंत्र-वादन क्षमता का समुचित उपयोग सुनिश्‍चत करने हेतु प्राचार्य श्री विजय कुमार ने हारमोनियम तबला और अन्य सामग्री मेरे नाम पर जारी कर दी थी। रोज प्रार्थना-सभा में मेरी तैनाती कर दी गई। कि चाहे किसी समूह का आयोजन हो मुझे संगीत अभ्यास कराना ही है। इस स्नेहमय आदेश से हुआ यह कि मेरा कमरा देर रात तक संगीत की स्वरलहरियों से गूँजता रहता था। एक विद्यार्थी और उसके भोजपुरी दल ने रोज समां बांधा। सहभागी शिक्षिकाओं ने भी रोजमर्रा मुझे स्नेह से सराबोर कर रखा था। मेरे मित्र चुहल करते और कहते कि कृष्ण गोपियों से घिरे हैं और ठहाका गूँज उठता।

.इससे पहले शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत का सम्बोधन सुनने को मिला। एक तेजतर्रार शख्सियत होने के साथ-साथ हिन्दी की दशा और दिशा के सम्बन्ध में भी उनकी अद्यतन जानकारी और तेवर निश्चित रूप से हिन्दी शिक्षक के व्यक्तित्व को अधुनातन बनाने में योग दे सकता है।
अगले दिन 17 मई को प्रोफेसर निरंजन सहाय द्वारा गद्य लेखन के इतिहास पर चर्चा हुई। आज प्रो. सहाय ने अपनी जिज्ञासाओं के अलावा पाठ्यपुस्तकों में गंभीर त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने का अवसर प्राप्त हुआ। अनेक तथ्यों को उन्होंनें सकारात्मक ढंग से लिया और सहमति भी व्यक्त की। इस विषय में स्वतंत्र रूप एक लेख लिखा जा सकता है। इसी दिन विदिशा से आये प्राचार्य श्री जी पी यादव ने जिस अंदाज में प्रशासनिक और कार्यालयीन कार्य-व्यवहार से सम्बन्धित प्रश्नों के तार्किक जबाब दिये उस शैली ने निश्चित रूप प्रभाव छोड़ा।
रोजाना गीत-गजल और काव्य-पाठ का दौर चलता ही रहा। अनेक वाकये स्मृति का हिस्सा बनते चले गये।

जब झा बोलते हैं तो सिर्फ झा बोलते हैं…….

वरिष्ठ कवि स्व. पं. छोटेलाल भारद्वाज से एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने समय के उन रचनाकारों का उल्लेख किया जो ‘राम की शक्ति पूजा’ कविता के कंठस्थ होने के कारण उस समय बडे ही प्रभावशाली माने जाते थे। मुझे नहीं पता था कि इस शिविर की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में एक ऐसी शख्सियत से भेंट होगी जिसके व्यक्तित्व में भगतसिंह और मुक्तिबोध सा आक्रोश और ओज है। श्री धीरेन्द्र झा उन व्यक्तियों में से जिनके मुंह से ‘राम की शक्ति-पूजा’ कविता का ओजपूर्ण कंठस्थ पाठ सुनना मेरे जीवन की एक बड़ी उपलब्धि में मानता हूं।
रोज रात हरी घास पर घंटों बैठकर गीतों गजलों और कविताओं का दौर चलता रहा। मेरे साथी होते श्री झा, भाई प्रदीप जी, आशुतोष जी, सिंह साहब, चुम्मन प्रसाद जी, धर्मवीर जी, और शत्रुह्न जी सहित कुछ और साथी। महफिल का सबसे बड़ा आकर्षण मुझे लगता झा साहब से नीरज के गीत….उसी अंदाज में ……जिसमें मैने कभी नीरज जी को आमने-सामने सुना था……। अद्भुत । झा साहब तो बस नीरज में डूब जाते हैं।
और भाई प्रदीप के बारे में क्या कहें……शुद्ध इलाहाबादी अंदाज । अपनी-अपनी प्रेमकथाओं का दौर चला तो रात भर पेट पकडे हंसते रहे। किस तरह भैंस खोने पर गायत्री मंत्र का जाप……..खेत में से निकल कर सामने आ जाना……पेड़ से कूदकर ठीक बीच में आना, एक बार पकडे़ जाने पर चाची का वह जुमला…..’ई का है हो…..’ । और भाई आशुतोष का बचपन का वह प्रेम जो कभी भड़भूंजे पर परवान चढ़ा। लगता है ये सारी कथायें पिरोने पर एक उपन्यास का प्लाट तैयार हो जाये। अद्भुत …..सब।
और चलते-चलते अश्‍िवनी भैया द्वारा पढी गई वो भोजपुरी कविता्…….‘पप्‍पू की दुलहिनि की चरचा कालोनी के घर-घर में………
बारह दिन बाद बापस चला तो लगा उस कमरे में कुछ छूटता जा रहा है। दुनियां कितनी छोटी है या बडी कुछ नहीं कह सकता । मगर मन के किसी कोने में एक बात है कि काश फिर वे क्षण दर्ज हो जायें………………….

झलकियां – कैमरे के कैद क्षण

(केवि,डीरेका के प्राचार्य श्री विजय कुमार, सम्‍बोधित करते हुए)

(प्रात:कालीन सभा का दृश्‍य – डॉ के के पाण्‍डेय प्रतिवेदन का वाचन करते हुए)

(संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्‍डेय, रूपरेखा बताते हुए)

(प्रार्थना सभा – तीन)

(कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक के ……हिन्‍दी शिक्षकों का समागम -एक)

(समागम – दो)

मालवीय जी की छाया में

जैन मंदिर

रामनगर के किले में

बुद्ध का प्रागंण

बीएचयू के बाबा विश्‍वनाथ

बुद्ध की पहली महापंचायत

उपदेश वृक्ष के नीचे

जहां मौन बन गया उपदेश, संबोधि ने रूप लिया अभिव्‍यक्‍ित का

शांत हो वत्‍स। तथागत समाधि में है……

रामनगर के किले का विहंगम दृश्‍य


(श्री विजय कुमार, प्राचार्य केवि,डीरेका, सेमीनार को सम्‍बोधित करते हुए)


(साथी डॉ आतुतोष पाण्‍डेय जी भाजपुरी लोक-संगीत गाते हुए)


(निराला जी पर शोधरत भाई सीपी श्रीवास्‍तव जी, महिलायें जिनका पूर्ण हिन्‍दी नाम लेते संकोच करती हैं)


(जेएनयू, पर्सियन स्‍टडीज विभाग के विद्वान सम्‍बोधित करते हुए)


(ससाधक श्री व्‍ही सी गुप्‍ता सबोधित करते हुए)


(हिन्‍दी विभाग बीएचयू के अध्‍यक्ष डॉ राधेश्‍याम दुबे भक्‍ितकालीन काव्‍य पर प्रकाश डालते हुए)


(साथी मनोज जी अपने विचार रखते हुए)

(श्रीमती रेवती अय़यर के मार्गदर्शन में थिंकक्‍वेस्‍ट कार्य)