आखिर लौटना ही होगा /कविता : डॉ शेषकुमारी सिंह

आखिर लौटना ही होगा ।

आचरण, संस्कार, जड़, ज़मी की ओर
आखिर लौटना ही होगा ।
कुत्सित मानसिकता, कुसंगति, कुप्रवृत्ति,
उद्दंडता को छोड़ना ही होगा ।
व्यर्थ दिखावा, पाश्चात्य संस्कृति, धनलिप्सा से
स्वयं को मोड़ना ही होगा ।
वर्ग-भेद, रूढ़िवादिता, भृष्टाचार व कुंठाओं
को तोड़ना ही होगा ।
भ्रातृत्व-भाव, परस्पर सहयोग, आदर-स्नेह
को ईमानदारी से जोड़ना ही होगा ।
बहुत हो चुकी व्यर्थ आधुनिकता
अब तो कुछ सोचना ही होगा ।
विश्व ज्ञान का दंभ छोड़कर, ‘पड़ोस-कल्चर’
अपनाना ही होगा ।
मत मोड़ो भावी-पीढ़ी को, केवल सुविधाओं की ओर
संघर्ष, अभाव, ज़िम्मेदारी का इनको पाठ ,
पढ़ाना ही होगा ।
कैसे समाज की हो रही है सर्जना, इस पर
विमर्श करना ही होगा ।
भटक गए हैं कहीं राह में , इसका ध्यान
दिलाना ही होगा ।
हे सुसंस्कृति के वाहक, तुमको कुसंस्कृति से
बचाना ही होगा ।
हे शिक्षक, शिक्षा, शिक्षालय अब उचित मार्ग
दिखलाना ही होगा ।
आचरण, संस्कार, जड़, ज़मी की ओर
आखिर लौटना ही होगा ।
डॉ. शेषकुमारी सिंह
केन्द्रीय विद्यालय
वायु सेना केंद्र, ओझर
मुंबई संभाग

Advertisements