‘मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता’/13 गजलें /डॉ. रामकुमार सिंह

इन गजलों के बारे में –
बहुत दिनों से …..या कहिये वर्षों से जो ‘ओढ़ता-बिछाता’ रहा …..उनमें से कुछ छपीं …..कुछ डायरियों के पन्नों पर बिखरी रहीं। …दुष्यंत से हमेशा प्रभावित रहा हूँ….इन गजलों में भी वह प्रभाव आ जाये तो लाजिमी-सी बात है………..

(एक)

मौत उनकी पारितोषिक हो गयी।
एक कुर्सी रिक्त घोषित हो गयी।

रात को इस घास पर जो ओस थी
आज प्रात: ही विलोपित हो गयी।

आ गयीं जब से जम्हूरी ताकतें
आम जनता और शोषित हो गयी।

कल कराया था इसी ने आचमन
यह नदी जो आज कलुषित हो गयी।

मुल्क के बाबत मिला जो पद उन्हें
मानसिकता अधिक दूषित हो गयी।

यात्री सब मौत के आगोश में –
रेल दुर्घटना सियासत हो गयी।

(दों)

पूछने को अब हजारों प्रश्न हैं।
और,सुलझा देने वाले सन्न हैं।

नौजवां चिल्ला रहे हैं- रोटियाँ
पर सियासी रहनुमा मदमग्न हैं।

पा गये सत्ता हमीं से आज, तो
कामकाजी हाथ उनके सुन्न हैं।

पीढ़ियों से भीख माँगी आजकल
सोमरस पीकर सदन में टुन्न हैं।

संस्था में एक पद है भृत्य का
डिगरियाँ वे देख उसकी खिन्न हैं।

चप्पलें चटकाईं – अनुभव दस बरस
कागजाते-भूख, सब संलग्न हैं।

आयु सीमा-पार उसकी हो गई
यही खामी देख वे प्रसन्न हैं।

(तीन)
अब निकल पाओगे कैसे, आज भी कुहरा तो है।
तुमसे पहले जो गया था राह में बिखरा तो है।

इस तरफ सूराख से आने लगी है रोशनी
आज सूरज मेरे घर के पास से गुजरा तो है।

पक्ष में अपने शराफत की दलीलें अब न दे
कह रहे हैं लोग अक्सर तू बहुत बिगड़ा तो है।

क्या समझकर तोड़ डाला पत्थरों से आईना
सूरतें कायम हैं अब भी कांच का टुकड़ा तो है।

काम कुछ करता नहीं था ये शिकायत थी हमें
अब वो पत्थर फेंकता है कुछ भी हो सुधरा तो है

(चार)

ऐसा बिखरा है समेटा नहीं जाता।
हाल घर का मेरे देखा नहीं जाता।

शख्स घर में हैं जो सभी अलग-अलग
एक ही सूत्र लपेटा नहीं जाता।

साँप उसके मेरे ऑंगन को तक रहे
मेरी चौखट से सपेरा नहीं जाता।

कहा था जिसमें कि मेरे नहीं हो तुम
लिखा वो ख़त मुझे, फेंका नहीं जाता।

नहीं पाबंद हूँ, ऐ वक्त! मुझे छोड़
ढले न शाम, सबेरा नहीं जाता।

बना दिये हैं तेरे पक्के मक़ानात
तेरा ये राह-बसेरा नहीं जाता।

मेरा इतिहास मेरे साथ ही दफन
मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता।

(पाँच)
डूबती सांसों का मंज़र देखते हैं।
वो खड़े होकर समन्दर देखते हैं।

आदमी को आदमी कहते नहीं हैं
जो उसे औलादे-बंदर देखते हैं।

हारकर, मुझको हराने के लिए अब
इस नगर मे वो धुरंधर देखते हैं।

मोल चमड़े का सरल है, इसलिए
मन भुलाकर ज़िश्म सुंदर देखते हैं।

दोस्त! परदे का चलन उनके लिए,जो-
घर में आकर घर के अंदर देखते हैं।

(छह)

उस समंदर से घटा वो रात-दिन उठती रहेगी।
इन दरख्तों से लता ये अंत तक लिपटी रहेगी।

मैं लिये फिरता हूँ तेरी यादगारों का पुलिंदा
चीज़ ये बेज़ान कब तक ज़िश्म से लटकी रहेगी।

जिंदगी अब तक मिटा पायी बनावट की हँसी
ऑंसुओं की खोज में ये जिंदगी मिटती रहेगी।

गीत मेरे याद रख मुझको बुलाने के लिए,जब-
आशियां रह जायेगा ना नाम की तख्ती रहेगी

(सात)
समाज चमत्कृत हो गया
दलित पुरस्कृत हो गया।

दुख ने माँज दिया जिसे
व्यक्ति परिष्कृत हो गया।

साठ वर्ष बाद, अब-
क्या व्यवहृत हो गया।

तात ने नहीं लड़ा चुनाव
वत्स उपकृत हो गया।

(आठ)

जिंदगी इक दौड़ है, रफ्तार की बातें करें।
नफरतों को अलग रख दें, प्यार की बाते करें।

गैरों के ऑंगन में झाँक लिये बहुत दिन
विषय बदलें, आप अपने द्वार की बातें करें।

देखिये सरकार हम ऐसे नहीं हैं, कि-
और बातें छोड़कर बेकार की बातें करें।

अभी तक दरबार की बातें करी हैं
अब चलो घर बैठकर घर-बार की बातें करें।

काम की बातें करेंगे एक दिन तो ठहरिये
आज तो इतवार है इतवार की बातें करें।

दाल आटे की तो सुन लें और जीरे-हींग की
फुरसत में जो हो जायें तो अखबार की बातें करें।

हालात से इस बार चलिये हम लड़ेंगे
बेकार में हर बार क्यों अवतार की बातें करें।

‘शालीनता है नगर में’ ये आकलन है ऊपरी
हृदय में जो उठ रहा उस ज्वार की बातें करें।

ये नहीं स्वीकार कि तलवार की बातें करें
कलम की हो बात तो हथियार की बातें करें।

(नौ)

काम अटका है तो संभल जाइये।
काम चल जाये तो बदल जाइये।

रास्ता बहुत सँकरा है जनाब
मुझे गिराइये और निकल जाइये।

इस तरह कुछ भी नहीं मिलता
खिलौनों के लिए मचल जाइये।

झोंपड़ी से बड़े हैं आपके पाँव
रखना चाहते हैं – महल जाइये।

लोग ऑंखें दिखाने लगते हैं
जहाँ भी आजकल जाइये।

आपके अफ़सरान ने बुलाया है
जाइये – सर के बल जाइये।

(दस)
ऑंकड़े जो प्रश्न में हैं औसतन सारे ग़लत हैं।
प्रश्न का हल खोजने के क़ायदे मेरे ग़लत हैं।

तर्जुमा करना सिखाया जिनकों हमने अभी तक
अब वो कहते हैं तुम्हारी नज्म में हिज्जे ग़लत हैं।

कह रहे हो – ख़ास ही आवाज सुनता है खुदा
तो बताओ उसके दर पे कौन से सज़दे ग़लत हैं।

अब तराना कोई भी हो दौर वो ना आयेगा
लोग अक्सर बात ये कहते हैं पर कहते ग़लत हैं।

(ग्यारह)
कहते हैं लोग मेहनत से क्या नहीं मिलता।
हम खून भी बहायें तो सिला नहीं मिलता।

मुद्दे की अगर बात हो – चर्चा नहीं होती
चर्चा अगर करनी है तो मुद्दा नहीं मिलता।

आवाम के हालात पे ऑंसू बहाये कौन ?
चिल्लाते हैं संसद में वो भत्ता नहीं मिलता।

आबाद मेरा मुल्क तूने कर दिया लीडर !
है घर नहीं, राशन नहीं, कपड़ा नहीं मिलता।

(बारह)
हम जो मिट्टी में पले हैं, पहले तू भी ख़ाक तो बन।
नापना मेरी गिरेबां चल अभी बरबाद तो बन।

हैं निरे तिनके सही, जल जायेंगें लम्हों में, पर-
राख करने को इन्हें तू लपलपाती आग तो बन।

दर्द को महसूस करने का तरीका पूछता है
अभी तक मरहम रहा है अब जरा तू चाक तो बन।

साथ मेरा चाहता, मैं आबे-दरिया की रवानी
तू किनारे की तलब, आ धार बन मझधार तो बन।

इश्क संजीदा नहीं तू तलबगारे-ज़िश्म है
उनके दिल तक जा सके तू आज वो फरियाद तो बन।

(तेरह)
किस क़दर बदली हुई है -कि ये फिजा देखो।
बजूद खुद से ही लगता है अब जुदा देखो।

अभी तक हम जिन्हें देखे नहीं सुहाते थे
आज हम पर हुए हैं बेवज़ह फिदा देखो।

लगी है गिरने पे कम ही, कि उड़ सके थोड़ा
उठेगा फिर कोई उस जैसा जलजला देखो।

दूर रहना कि दब के दम नहीं निकल जाये
शहर में इनका है ऊँचा ही दबदबा देखो।

शख्स जो भाया उसे निगला है छोड़ा ही नहीं
वाह क्या बात है क्या खूब हाजमा देखो।

ये झपटना औ’ लिपटना हमें पसंद नहीं
रखा करिये हमसे आप फासला देखो!

जो नही करना था वही काम किया है तुमने
कर ही डाला है तो करने का लो मज़ा देखो।

हुआ बहुत कि हमें और न उलझाओ प्रिये!
चलो निकलो यहाँ से अपना रास्ता देखो।

कि- ये कमबख्त सूरतें हीं बरग़लायेंगी
सूरते-हज्जाम नहीं – हाथ उस्तरा देखो।

किस तरह देखा था कुछ भी नहीं दिखाई दिया
उस तरह ठीक नहीं अब की इस तरह देखो।

दिया है किसने तुम्हें इस जगह काला-पानी
जरा सोचो तुम अपने हक में फैसला देखो।

गया है कब का नहीं लोटा मेरे घर का दिया
हुआ है क्या वहाँ जाकर जरा माजरा देखो।

– रामकुमार सिंह

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बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये/आप-औ’ हम शामियाने हो गये …..हिन्दी गज़ल

इस गज़ल के बारे में :-
मेरी यह गज़ल ‘पाखी’ के मार्च 2009 अंक में प्रकाशित हुई थी। ‘सर्जना’ पर ‘पुनर्प्रकाशन’ के अंतर्गत जारी कर रहा हूँ। यह गज़ल पहली बार प्रकाशित करने के लिए ‘पाखी’ एवं सम्पादक अपूर्व जोशी जी का आभार। गज़ल की राजनीतिक चेतना के बारे में पाठकीय प्रतिक्रियाँ ही उन अर्थों को ध्वनित करेंगी जो शायद गज़ल के शब्दों के अंतराल के बीच हों……………

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सांत्वना के सौ बहाने हो गये।
दरअसल अब वो पुराने हो गये।
बैठते थे मंच के जो मध्य में
पार्श्व में जाकर फसाने हो गये।
संस्था ने एक कम्प्यूटर मँगाया
और दस साथी रवाने हो गये।
चोरियाँ बढ़ने लगी हैं आजकल
अब नगर में पुलिस थाने हो गये।
कल हमारे बीच से उठकर, सियासी-
ओढ़कर चोला सयाने हो गये।
बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये
आप-औ’ हम शामियाने हो गये।
ख्याति पा अब आप हैं पहुँचे हुये
किन्नरों से जाने-माने हो गये।
आप थे जो गुड़ तो घर-घर में रहे
आप अब काजू-मखाने हो गये।

-डॉ. रामकुमार सिंह