‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है।
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पुस्तक-समीक्षा
‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’
पुस्तक : ‘रामदरश मिश्र : सृजन संवाद’
लेखिका : डॉ. सविता मिश्र
प्रकाशक : विमला बुक्स, दिल्ली
मूल्य : तीन सौ रुपये (सजिल्द)
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अध्येता जब एकात्म होकर अपने अभीष्ट संदर्भ का अनुशीलन करता है तो अभिप्राप्त नतीजे रेखांकनीय हो जाते हैं। अध्येता जब स्वयं सर्जनात्मक प्रतिभा रखता हो तो ‘एकात्म होना’ अधिक घनीभूत होता है, साथ ही प्रतिप्रश्नों की द्वंद्वात्मकता के स्थान पर एक ललित-संवाद स्थापित होता है। ‘रामदरश मिश्र : सृजन-संवाद’ पुस्तक में मूल रूप से यही भावभूमि स्थापित होकर आयी है।
डॉ. सविता मिश्र ने रामदरश जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और रचना-संसार से परिचित होते हुए – उसे खंगालते हुए – फिर आत्मसात करते हुए …….और अंतत: विश्लेषित करते हुए जिस सर्जनात्मकता व लालित्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण का परिचय दिया है वह नव-अनुसंधित्सुआें को अपने-अपने ‘समीक्ष्य’ संदर्भों के प्रति एकाकार-भाव से अनुशीलन किये जाने की अभिनव-प्रणाली का बोध कराता है।
हिन्दी साहित्य में रामदरश मिश्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सर्जनाकार, चिंतक व मनीषी होने के साथ ही विभिन्न विधाओं में वे अपनी मौजूदगी भी रखते हैं। लोक-नैकटय को उन्होने विस्मृत नहीं होने दिया है। प्रत्येक सुपरिचित के प्रति नव-दृष्टि अपनी स्वयं की कुछ विशेषताएँ लेकर सामने आती है। प्रकृति की हर नई कोंपल ऑंखे फाड़ते हुए वटवृक्षों को देखती है – नवजिज्ञासु के तौर पर भोले प्रश्न भी करती है। हर जिज्ञासा की प्रतिपूर्ति और प्रत्येक प्रश्न का उत्तार अपने अभीष्ट से भावगत साम्यवस्था की ओर एक कदम होता है। सर्जना के वैराटय से जुड़ी विषयवस्तुओं और उनके ‘फिनेमिना’ पर जब एक अनुशीलनकर्ता संवाद करता है तो कुछ नया भी घटित होता है जो पूर्वकृत सर्जना से सम्बन्धित होते हुए भी कुछ नव्यतम बनकर सामने आता है। तब निर्विवाद रूप से यह कहना होता है कि संवादकर्ता के व्यक्तित्व की छाप ‘सृजन-संवाद’ को शब्दबध्द किये जाते समय आ पड़ती है।
पुस्तक में कुल 19 लेख हैं जो सतरंगी आभा लिये हुए हैं। इनमें भेंटवार्ता, यात्रा, संस्मरण, रेखाचित्र, व्यक्तित्वानुभूति, जीवनी आदि के तत्वों के अलावा रामदरश मिश्र जी के सर्जना-संसार पर चिंतन-मनन और विश्लेषण भी पूरी रचनात्मक प्रासंगिकता के साथ उपलब्ध है। अधिकतर लेख ‘अध्येता-समय’ की डायरी की तरह हैं जो अपने अलग-अलग अस्तित्व को समेटते हुए संकलन के रूप में यहाँ हैं। पहले ही लेख ‘वह दिन’ में लेखिका के स्वतंत्र भावास्फुरण की झलक मिल जाती है। रामदरश जी से भेंटवार्ता के प्रसंगोपरांत यह वर्णन देखें -”साढे ग्यारह वर्षीया अपूर्वा और दस वर्षीया गिन्नी के बाल-सुलभ प्रश्नों और कौतूहल के रंगों में डूबी भीगी-भीगी सी दोपहर ऑटो के साथ-साथ भाग रही थी। बादलों को देखकर मिश्र जी की ‘यायावर बादल’ कविता याद आ रही थी”
रामदरश जी के व्यक्तित्व से परिचित कराते ललित लेखों में – ‘साहित्य का विन्ध्याचल’, ‘ एक गँवई व्यक्तित्व’ आदि हैं। एक स्थान पर रामदरश जी के विषय में लिखा गया है कि- ”महानगर की दीवाली की जगमगाहट के बीच उन्हें याद आने लगती है गाँव की दीवाली और उनकी स्मृति में जगमगा उठते हैं मिट्टी के दीये। दीयों का उजास उनकी शिराओं से फूटने लगता है और स्मृति में उभर आते हैं पूजाभाव से तेल ढारते हुए माँ और भाभी के हाथ।” ‘जहाज का पंछी’ जैसे लेखों की विशेषता यह है कि अनेक कथा-पात्रों को रचने वाले रामदरश जी इसमें स्वयं पात्र बनकर पाठकों के सामने हैं। बालक रामदरश को चलचित्र के रूप में देखना सुहाता है- ”मेले में ‘डह-डह-डग-डग, डह-डह-डग-डग-हुडुक्क, झाल ओर मृदंग के ताल पर नाचते नचनिया, छनछनाती हुई कड़ाहियाँ, गाड़ी की सीटी सुनकर रेलगाड़ी देखने की ललक, उस पर चढ़ने की ललक…..। इसी वर्तुल जिंदगी की गंध समेटे मिश्र जी का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है” A इस दौरान लेखिका की सजग विश्लेषणात्मिका-बुध्दि अपने समीक्ष्य की सामाजिक-चेतना के उत्सों को भी खोजती चलती है- ”उन्होनें अपमान, झिड़की और आत्महीनता से पीड़ित लोगों को रोटी के सवाल से जूझते हुए देखा है। इतना ही नही, यातना का अनवरत सिलसिला उस परिवेश में चलता रहता था। मालगुजारी के लिए कुर्क अमीन का दौरा, दरोगा जी का आतंक, कर्ज की वसूली के लिए किए गए तकाजे…न जाने कितने दर्दों का साक्षी रहा है उनका मन।”
‘प्रकृति के उल्लास में डूबा कवि मन’, ‘कविता की बासंती आभा”, ‘खूशबू घर से आती खुशबुएँ’ आदि लेखों के माध्यम से रामदरश मिश्र जी की कविताओं के प्रकृति-प्रेम का वैशिष्टय और भावनात्मक सौंदर्य तो दृष्टिगोचर होता ही है, लेखिका के स्वयं के प्रकृति-सापेक्ष उल्लास, भाषायी-भंगिमाऐं आदि अनायास प्रकट हो जाते हैं। एकात्मकता के कारण भावस्थ दृष्टि स्वयं लेखिका में उतरती हुई जान पड़ती है जो अध्येताओं में परम्पराओं के विस्तार के लिहाज से शुभ संकेत हुआ करते हैं।
‘रामदरश मिश्र की नारी-मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा’ तथा उनके ‘काव्य में जीवन-मूल्य’ आदि विचारप्रधान शोधात्मक लेख हैं, जिनमें लेखिका की विश्लेषणात्मक शैली का पता चलता है। एक स्थान पर लिखा गया है कि- ”मिश्र जी के उपन्यासों का मूल्यांकन करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे हाशिये पर खड़ी स्त्री को केन्द्र में लाये हैं। शोषण-तंत्रों की भली-भाँति पड़ताल करते हुए उन्होंने स्त्री-मुक्ति का मार्ग सही अथर्ाेंं में प्रशस्त किया है।”
उनके काव्य-संग्रहों की प्रकीर्ण समीक्षाओं से रूपाकार लेकर ”ऐसे में जब कभी’ में बहती रोशनी की नदी’, ‘ऊर्जस्वित बसंत……..जो कभी नहीं झरता (संदर्भ : आम के पत्तो)’, ”उस बच्चे की तलाश में’ – समय की आहटों से गूँजता कविता-संग्रह’, ‘तू ही बता ऐ जिन्दगी : जीवन की सघन गूँज में डूबी गज़लें’ आदि लेख हैं।
मिश्र जी की रचनाधर्मिता के उत्तारकाल (आयु के लिहाज से), उनके काव्य की अंतर्वस्तु, विषय-वैविध्य और संरचना पर ‘आज भी समय सत्य रचती है कलम’ व ‘संरचना-सौंदर्य’ शीर्षक से लेख हैं। मिश्र जी की शब्दावली और तकनीक पर पर्याप्त कोंणों से यहाँ प्रकाश डाला गया है। उनके आत्मकथांश पर ‘कच्चे रास्तों का सफर : जीवनानुभवों से अंतरंग साक्षात्कार’, ललित-निबंध-संग्रह पर ‘छोटे-छोटे सुख – उजास भरी यात्रा’, बारहवें उपन्यास ‘परिवार’ पर ‘परिवार : मानवीय जीवन-मूल्यों की उत्कर्ष यात्रा का दस्तावेज’ , डायरी पर ‘आते-जाते दिन : समय, साहित्य और जीवन से अंतरंग साक्षात्कार’ संग्रहित है।
पुस्तक के अंत में पाठकीय सर्जना-प्रतिभा के अनुरूप लेखिका की दस ऐसी कविताओं को जोड़ा गया है जो रामदरश जी के उपन्यासों को पढ़ते हुए रूपाकार ले चुकी थीं। लेखिका द्वारा किया गया यह विधांतरण औपन्यासिक समाज-चेतस का काव्यरूप तो है ही – रोचक भी है-
”कभी-कभी / पूरे का पूरा ‘पाण्डेपुरवा’ / जम जाता था मन के अन्दर /और दूभर हो उठता है / साँस के लिए रास्ता खोज पाना / पर तभी अचानक / तैरने लगते थे कुछ फाग, शिराओं में / चैत की पूनो खिलखिला उठती थी / और ढूँढ लेती थी तब एक साँस / चुपके से अपना रास्ता………” (‘पानी के प्राचीरों’ के साथ-साथ)
एक विशिष्ट व बहुआयामी रचनाकार, कथाकार व मनीषी – जिसका साहित्य मात्रात्मक व गुणात्मक, दोनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है – उस पर कार्य करतें हुए अकादमिक उपाधि प्राप्त करना एक बिंदु है, तथा इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आनंद, उल्लास व उमंग से भरी यात्रा का विषय बना लेना अध्येता की निजी सफलता है। यही निजी सफलता एक स्वतंत्र विधा का आस्वाद कराते हुए पाठकीय साधारणीकरण के साथ विस्तार पाती है।
‘माइन्ड द टारगेट बट एन्जॉय द जर्नी’ – रूपी तराजू के दोनों पलड़ों पर अपनी पकड़ बनाये रखते हुए लेखिका ने जो सृजन संवाद लिपिबध्द किया है उसमें एक ओर भावों व कल्पना की उड़ान है तो दूसरी तरफ उचित परिप्रेक्ष्य, उध्दरण व सन्दर्भों के लिए सर्तकता का वरण। प्रत्येक ललित लेख में रामदरश जी के सम्बन्ध में प्रतिष्ठित विचारकों के कथन, उनके उपन्यासों के पात्र, पात्रों की परिस्थितियाँ, कविताओं की पंक्तियाँ आदि को इस तरह पिरोया गया है कि कहीं जोड़ नहीं दीख पड़ता। क्या ही बात है कि यात्रा करते हुए मौसम के एक तेवर को देखकर अपने समीक्ष्य-कवि की एक पंक्ति याद आ जाये! पाठक को रामदरश जी के कई पहलुओं से अवगत कराने की ‘आयुर्वेदिक’ तरह की पध्दति इस पुस्तक में दृष्टिगत है।

-डॉ. रामकुमार सिंह

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