एक ऐसा जीवन जो सिर्फ विद्यार्थियों के लिए लिख दिया गया


प्रो. चन्द्रपाल सिंह
(मेरा यह आलेख मध्‍यप्रदेश शासन, जनसम्‍पर्क विभाग की मुखपत्रिका – मध्‍यप्रदेश संदेश के जुलाई अंक में प्रमुखता से प्रकाशित है। ई-पत्रिका का प्रष्‍ठ क्रमांक 20-21 अवलोकनीय है।)

एक आयोजन चल रहा है एक उन्नत भाल तपस्वी सरीखा व्यक्ति अंचल भर के मेधावी विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा के लिए वार्षिक राशि दे रहा है। राशि भी उसकी अपनी पेंशन से। जब तक वेतन मिला उसे बांट दिया, अब पेंशन है तो वह भी विद्यार्थिंयों के लिए। मंच पर प्रदेश के कुछ जाने पहचाने नाम है मंत्री, आएएस अफसर आदि-आदि। यह व्यक्ति अंचल भर के एक सैकडा से अधिक मेधावी विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के नाम सहित उनके अंकों का प्रतिशत दशमलव सहित बोल रहा है। हाथ में कोई सूची नहीं। शतावधानी व्यक्तियों के बारे में सुना करते थे। देखा तो रहा नहीं गया। कार्यक्रम के उपरांत अचानक मंच पर बैठे कोई प्रमुख अतिथि उठते हैं और इस व्यक्तित्व के चरण छूते हैं। पूरा टाउन हॉल भाव-विभोर है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ही वे अनोखे व्यक्तित्व है जिन्होंने अपने जीवन को अनुशासन का पर्याय बना दिया। हम बचपन में सुना करते थे कि शिवपुरी में एक ऐसे आदर्श शिक्षक है जिन्होंने शिक्षक प्रतिबद्ध पेशे के लिए विवाह नहीं किया, लोग उन्हें नियत स्थान पर देखकर अपनी घडी मिला लेते हैं, उन्हें दुनिया भर के देशों की ढेर सारी जानकारी कंठस्थ हैं। हिन्दी और अंग्रेजी व्याख्यान दें तो श्रोता समय भूल जाते हैं। उस समय जब हम विवेकानंद जी के शिकागो भाषण के बारे में चकित होते तो हमारे शिक्षक प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह को साकार देखने की सलाह देते। वर्ष 2003 में उनसे भेंट के लगभग 4 साल बाद जब उनसे ग्रहनगर मुरैना में ही भेंट हुई तो एक निमिष में नाम सहित मुझे पुकार लेना उनकी दिव्य स्मृति का प्रभाव मुझे कौंधा गया। उनकी इस अद्भुत स्मृति से दुनिया भर के उनके प्रशंसक अभिभूत है। उन्हें सेवानिवृत्ति के उपरांत चम्बल की धरा पर ही भेज दिया और आज उनकी दिनचर्या सैकडों विद्यार्थियों, जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा राज्य प्रशासनिक सेवा सहित देश-प्रदेश से अनगिनत प्रतिभाओं के समग्र गुरुत्व का प्रतीक बना दिया है। नियत समय से नियत समय उनकी एक-सी दिनचर्या तय है। कुछ वर्षों से उनके नाम पर युवाओं ने प्रो. चन्द्रपाल सिंह सिकरवार मानव-मूल्य संवर्धन पुरस्कार भी शुरू किया है। उनका नाम पद्मश्री से नवाजे जाने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है।
आप कल्पना कीजिये ऐसे आदर्श शिक्षक की जिसने 47 वर्षों तक निर्बाध रूप से केवल और केवल ऐसा शिक्षण कार्य किया जो अनोखा कीर्तिमान बन गया। उनके कीर्तिमानों को उनके प्रशंसक और अनुयायी अलिखित विश्वकीर्तिमान का नाम देते है। क्यों प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ने सारे जीवन भर स्वयं को प्रशंसित करने वाले किसी कीर्तिमान के लिए कोई झोली नहीं फैलाई। यहाँ तक कि गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड से पत्र आने के बाबजूद प्रविष्टि नहीं की। उनके कीर्तिमानों में आठ कीर्तिमान तो एक शिक्षक की भूमिका के लिए हैं और दो कीर्तिमान साहित्यकार की भूमिका के लिए। ये कुछ इस तरह हैं-
पहला कीर्तिमान: कर्तव्‍यनिष्ठा –
मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में प्रोफेसर के रूप में अपनी 41 वर्ष की शासकीय् सेवा में उन्होंने अपनी कक्षा का एक भी पीरियड नहीं छोडा। राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी को छोडकर उन्होंने अपनी कक्षाएं रविवार एवं अवकाश के दिनों में भी लीं। कक्षाएं न छूट जायें इसलिए वे अपने एकमात्र छोटे भाई की शादी में नहीं गये। इसका उन्हें कोई मलाल नहीं। पिता से कह दिया था कि मैने कर्तव्य को चुना है और मैं खुश हूँ।
दूसरा कीर्तिमान: वेतन के अलावा कोई धन नहीं –
अपने 41 वर्ष के सेवाकाल में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपने वेतन के अलावा अन्य कोई राशि जीवन में भी नहीं ली। न तो कभी टीएडीए और न कभी मेडीकल बिल का भुगतान लिया। उन्होंने पीठीसीन अधिकारी तथा प्रशिक्षक के रूप में अनेक विधानसभा एवं लोकसभा के निर्वाचन में कार्य किया लेकिन पैसे के भुगतान हेतु बिल नहीं भरा।
तीसरा कीर्तमान: अधिकतम विद्यार्थियों का अधिकतम हित –
अपने पूरे जीवनकाल में वे गरीब एवं जरूरत मंद विद्यार्थियों को प्रारंभ से अब तक आर्थिक सहायता देते रहे हैं जो कि प्रवेश शुल्क, पुस्तकों हेतु धन देना, परीक्षा शुल्क आदि के रूप में है। अनेक गरीब अभिभावकों को धन देते रहे हैं जिससे उनके बच्चे उच्च शिक्षा के अध्ययन हेतु बाहर जा सकें या वे रहने के लिये मकान बनवा सकें अथवा वे अपने पुत्र-पुत्रियों की शादी कर सकें। वे अपने वेतन का पचास प्रतिशन इन परिहित के कार्यों पर व्यय करते थे। अब पेंशन का पचास प्रतिशत गरीब विद्यार्थियों एंव जरूरतमंदरों पर खर्च करते हैं।
चौथा कीर्तिमान: सदाचरण और समय की पाबंदी –
एक ऐसे युग में जबकि घोर अपशब्दों को साहित्य और सिनेमा तक में मान्यता दी जा रही है प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह एक ऐसा अप्रतिम उदाहरण हैं जिन्होने अपने सारे जीवन में एक भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया है। उनकी दिनचर्या का अनुशासन और सादा जीवन देखकर काई भी दंग रह सकता है। अच्छाई के माध्यम से बुराई पर जीत को उन्होंने अपना संकल्प बनाया ही नहीं अपने जीवन में सिद्ध कर दिखाया।शिवपुरी के लोग अपनी घडियां उनकी दिनचर्या से मिलाते थे। वे समय के इतने पाबंद है कि कुछ भी हो वे समय पर निर्धारित स्थान पर हमेशा उपस्थित रहते हैं। वे सिर्फ इसलिए ईश प्रार्थना करते रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य कभी खराब न हो ताकि वे जीवन में कभी भी कक्षा में अनुपस्थित नहीं हों और आश्चर्य नहीं है कि ईश्वर ने उन्हे इसके लिए तथास्तु कह दिया।
पांचवा कीर्तिमान: इंग्लिश अशोसियेशन –
धाराप्रवाह अंग्रेजी व्याख्यान के लिए युवाओं में खासे लोकप्रिय और आदरणीय प्रो चन्द्रपाल सिंह ने भारतीय विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास हेतु पीजी कॉलेज शिवपुरी में इंग्लिस अशोसियेशन प्रारंभ किया तथा व्यक्तित्व विकास की विभिन्न विधाओं में चालीस वर्ष तक लगातार और निर्बाध निःशुल्क शिक्षा देते रहे।
छठवां कीर्तिमान: सामान्य ज्ञान की कक्षाएं –
उनका सारा जीवन एक सी दिनचर्या के लिए कई दशकों से विख्यात है। वे पीजी कॉलेज शिवपुरी में शाम को चार से छहबजे तक सामान्य ज्ञान की निःशुल्क कक्षाएं लेते थे जिनमें पांच सौ से अधिक विद्यार्थी जमीन पर बैठते थे और प्रतियोगिता परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते थे।
सातवां कीर्तिमान: शासकीय सेवा का रिकार्ड –
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार ने सन् 1964 से अंग्रेजी के व्याख्याता के रूप में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपनी शिक्षकीय यात्रा शुरू की। और लगातार 41 साल तक इसी महाविद्यालय में पढाते हुए सेवानिवृत हुए। इस दौरान वे नगर में अपार लोकप्रियता और श्रृद्धा का केन्द्र रहे। सेवानिवृत होने के बाद वे मुरैना में प्रतिदिन निष्ठा एवं उत्साह के साथ 8 पीरियड रोज पढाते हैं – साक्षात्कार हेतु तैयारी कराते हैं एवं मार्ग दर्शन देते है। उनके ये सभी कार्य पूर्ण रूपेण निःशुल्क हैं।
आठवां कीर्तिमान: कर्मचारी एवं व्यावसायियों के लिए निःशुल्क कक्षाएं –
कर्मचारी एवं व्यावसायियों को प्रति रविवार निःशुल्क कक्षाएं 11 से 3 बजे तक 6 पीरियड लेते हैं। निःशुल्क अंग्रेजी पढाते हैं। ये कक्षाएं जनवरी से मई तक चलती है। इस कक्षा में आप चम्बल संभागीय मुख्यालय के अनेक प्रशासनिक अधिकारियों को सहज विद्यार्थी के रूप में प्रो चन्द्रपाल सिंह की अपार मेधा और वात्सल्य का अमृतपान करते हुए देख सकते हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी उनके कीर्तिमान अनूठे है। हर साल एक नियत तिथि को उनकी एक किताब वे खुद प्रकाशित करते है। वे स्वयं एक हजार प्रतियां अपने शिष्यों और प्रशंसकों को वितरित करते हैं। उन्होंने 27 साहित्‍यिक पुस्तके लिखी हैं जिनमें 25 हिन्दी में तथा 2 अंग्रेजी में। उनकी 27 पुस्तकों की 27 हजार प्रतियां छपी। उन्होंने साहित्य की हर विधा पर लिखा है। जैसे कविता, नाटक, उपन्यास, निबंध, कहानी, खण्डकाव्य्, संस्मरण आदि।
पहला अलिखित विश्व कीर्तिमान –
उनकी हिन्दी की 25 साहित्यिक पुस्तकों में से एक है ’’सारा जहाँ हमारा ‘‘। इस पुस्तक में 207 कविताएं हैं। विश्व में कुल देश 207 हैं। उन्होंने विश्व के प्रत्येक देश पर पूर्ण जानकारी देते हुए एक कविता लिखी है फलस्वरूप 207 कविताएं हैं। ये सारी जानकारी उन्हें कंठस्थ है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस पुस्तक को सराहते हुए उन्हें पत्र भेजा जिसमें उन्होंने इस पुस्तक से बहुत प्रभावित होने की बात स्वीकारी है। खास बात यह कि के लिये गिनेज बुक ऑफ रिकार्डस से भी पत्र् आया है। याद्यपि उन्होंने प्रविष्टि नहीं की है यह कहते हुए कि गिनेज बुक ऑफ रिर्कास में विश्व में सबसे लम्बा या विश्व में सबसे छोटा आदि की तरह के बिन्दुओं पर विचार किया जाता है।
दूसरा अलिखित विश्वकीर्तिमान-
प्रो. सिकरवार का द्वितीय् अलिखित कीर्तिमान यह है कि उन्होंने अपनी 27 साहित्यिक पुस्तकों में किसी का भी कोई भौतिक मूल्य् नहीं रखा है। सभी 27 पुस्तकों का नैतिक मूल्य् है जैसे-कर्तव्यनिष्‍ठा, ईमानदारी, परहित, भाईचारा, देशभक्ति मेहनत आदि । प्रो. सिकरवार की साहित्‍ियक यात्रा सन् 1964 में प्रारंभ हुई। पहली पुस्तक जंगल के फूल 1982 में छपी। तब से उनका यह सृजन एक निश्चित गति से चल रहा है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह के जीवन और साहित्य को पूरे विश्व से प्रशंसा प्राप्त हुई है। दुनियां भर के अनेक राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों, पाश्चात्य देशों के पुस्तकालयों और विश्व के सर्वाधिक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से अनेक प्रशंसा-पत्र और साधुवाद पत्र प्राप्त हुए है। जो उनके कक्ष में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं। इनमें से अनेक पत्रों का मजमून पढने का सौभाग्य इस लेखक को भी प्राप्त हुए।
प्रेरक कायर्क्रम की नियतता का कीर्तिमान –
प्रो. सिकरवार हर साल जुलाई के अंतिम रविवार को प्रतिभा समान समारोह का आयोजन करते हैं। इसमें मुरैना जिले के स्कूल, कॉलेज तथा यूनीवर्सिटी के टॉपर्स को एक हजार रूपये प्रति विद्यार्थी तथा 1 प्रमाण पत्र् प्रदान किया जाता है। वे स्वयं की इस आयोजन के आयोजक प्रायोजक आदि होते है। बिना किसी अन्य की आर्थिक सहायता से होने वाले उनके आयोजन में वे स्वयं ही मंच संचालक होते है। खास बात यह है सभी गणमान्य अतिथियों की तरह ही दर्शक वर्ग का स्थान आदि पहले से सुनिश्चित होता है। उनका आयोजन किसी अतिथि की बाट नहीं जोहता और नियत समय पर मिनिट और सेंकड के हिसाब से शुरू हो जाता है। इसी कायर्क्रम में वे मध्‍यप्रदेश के शिक्षाविदो जैसे कुलपति, प्राचार्य, प्रोफेसर, डीलिट, पीएचडी, अभिभावकगण, मेडीकल, इंजीनियरिंग, यूपीएससी तथा पीएससी से चयनित व्‍यक्‍ितयों का अभिनंदन करते हैं। पूरे कार्यक्रम के खर्चे का वहन स्‍वयं करते हैं। इस कार्यक्रम को पिछले 6 वर्षों से टाउन हॉल, जीवाजी गंज मुरैना में करते हैं। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने किसी भी अत्याधुनिक सुविधा का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं किया। वे मोबाइल नहीं रखते है। उनक पते पर दूरभाष क्रमांक पर बातचीत या उनसे मिलने का समय भी नियत है। न उससे पहले और न उसके बाद। उनका पता है- श्रीराम कुटीर, टी.एस.एस. महाविद्यालय के समीप, गणेशपुरा मुरैना (म.प्र.) फोन नं. 07532-226639

जीवन पर एक दृष्टि:
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार का जन्म 3 मई सन् 1943 को बागचीनी, जिला मुरैना में हुआ। उनकी हाईस्कूल तक शिक्षा मुरैना, भिण्ड एवं झाबुआ मध्‍यप्रदेश में हुई। प्री-यूनीवर्सिटी एवं बीए पीजी कॉलेज मुरैना से किया। एमए अंग्रेजी में एमएलबी कालेज ग्वालियर में टॉप किया। एमए राजनीति शास्त्र में उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये । सम्मान स्वरूप उन्हें जीवाजी विश्वविद्यालय द्वारा 3 गोल्ड मेडल प्रदान किये गये। विश्व प्रसिद्ध् अंग्रेजी साहित्यकार टॉमस हार्डी पर उन्होंने पीएचडी की तथा महानतम अंग्रेजी नाटककार, विलियम शैक्सपियर पर उन्होंने डीलिट की। प्रो. सिकरवार अंग्रेजी में डीलिट करने वाले चम्बल संभाग के पहले व्यक्ति रहे। उनके मार्गदर्शन में 11 शोधार्थी अंग्रेजी में पीएचडी कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में वे वर्ष 1964 से 2005 तक रहे। इस दौरान वे यूपीएससी, पीएससी तथा विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं हेतु वे निःशुल्क मार्गदर्शन देते रहे। निःशुल्क कैरियर गायडेंस देना उनका महत्वपूर्ण कार्य है। उनके द्वारा पढाए गये हजारों विद्यार्थी विभिन्न सेवाओं के लिये चयनित हुए हैं तथा हो रहे हैं। जीवाजी विश्वविद्यालय् की महासभा के प्रो. सिकरवार 2 बार सदस्य् कला संकाय् के एक बार डीन तथा कार्यपरिषद के एक बार सदस्य रहे हैं। अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष के रूप में वे सन् 2005 में लगभग 41 वर्ष की शासकीय् सेवा के बाद सेवा निवृत्त हुए। शिवपुरी के नागरिकों ने उनके सेवानिवृत्ति के दिन अत्यन्त गरिमामय तरीके से नागरिक अभिनन्दन किया, । सेवानिवृत होने के बाद वे चम्बल संभाग के मुख्यालय मुरैना को गौरवान्वित करते हुए निःशुल्क अध्यापन कार्य कर रहे है। वे प्रतिदिन साढे दस बजे से डेढ बजे तक 4 पीरियड लगातार अंग्रेजी तथा सामान्य् ज्ञान की कक्षा प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठ रहे विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क लेते हैं। तथा शाम को 5 बजे से 8 बजे तक पीरियड प्रतिदिन साक्षात्कार की तैयारी कराते हैं और कैरियर गाइडेन्स देते हैं। इस तरह प्रतिदिन 8 पीडियड में पूर्ण निष्ठा के साथ निःशुल्क शिक्षण, साक्षात्कार की तैयारी तथा कैरियर गाइडेन्स का कार्य करते हैं। उनके सफल विद्यार्थियों की संख्या गिनना और सूची बनाना एक मुश्किल काम है।

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”नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”/पुस्तक-समीक्षा/सरस्वती-पुत्र

सरस्वती-पुत्र के बारे में
ये युवा, कवि, कहानीकार और पत्रकारिता में डिग्रीधारी हैं। स्वभाव और रहन-सहन मुक्तिबोध की याद दिलाता है। कई वर्षों से जानता हूँ। इनकी कई रचनायें, कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। थोडे से लापरवाह हैं। मेरे आग्रह पर एक पुस्तक-समीक्षा कई महीनों पहले लिखी थी। ‘सर्जना’ पर जारी कर रहा हूँ।
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कुरुक्षेत्र : युध्द क़ी जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन
रामबरन ‘सरस्वती-पुत्र’

पुस्तक : ‘कुरुक्षेत्र’
कवि : रामधारी सिंह ‘दिनकर’
प्रकाशक : राजपाल एण्ड संस्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली

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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का प्रबंध-काव्य ‘कुरुक्षेत्र’ एक विचार-प्रधान काव्य है। विचारों की सघनता में काव्य की पौराणिक या मिथकीय ऐतिहासिकता के महत्व का परीक्षण करने की आवश्यकता मंद हो जाती है। समूचे प्रबंध की एकता उसके विचारों को लेकर है। जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।
दिनकर जी के ‘कुरुक्षेत्र’ का सृजन उस समय हुआ जब द्वितीय विश्व-युध्द का काल था। दुनियाँ के सामने युध्द क़े भीषण परिणाम उपस्थित थे। इस महायुध्द के अमानवीय कृत्यों ने मानव-समाज को एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। ‘हिरोशिमा’ और ‘नागासाकी’ की आग अभी शांत नहीं हुई थी। संसार की महाशक्तियों में आणविक अस्त्र-शस्त्रों की होड़ बढ़ने लगी। ऐसे समय में युध्द के घातक परिणामों को बताने के लिए दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ का उदय हुआ। महाभारत में कौरवों का विनाश हुआ, किन्तु युध्दिष्ठिर को शांति नहीं मिली। पराजित मारे गये और विजेता जीतकर भी हार गया। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद भी ऐसा ही हुआ। जो हारे, वे राष्ट्र सामाजिक व आर्थिक रूप से कई सदी पीछे पहँच गये। जो विजेता थे वे भी संतुष्ट नहीं थे। इस तरह युध्द की जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन ‘कुरुक्षेत्र’ में मिलता है।
विश्व की महाशक्तिओं रूपी युध्दिष्ठिर को ऐसे भीष्म की आवश्यकता थी नव-विश्व के निर्माण में उसका मार्गदर्शन करे। उन्हें भीष्म मिला या न मिला कुछ नहीं कह सकते, किंतु महाभारत युध्द के बाद ‘कुरुक्षेत्र’ प्रबंध काव्य के युध्दिष्ठिर को भीष्म अवश्य मिला और उसका मार्गदर्शन किया। भीष्म का वह चिंतन समाज के लिए आज भी श्रव्य और अनुकरणीय है।
समूचे प्रबंध में दो पात्र हैं – गंगापुत्र भीष्म और धर्मराज युध्दिष्ठिर। महाभारत की विजय युध्दिष्ठिर को संतोष नहीं दे सकी। उसके मन में कई शंकाएँ बस गईं। भीष्म अपने उपदेश के माध्यम से युध्दिष्ठिर को सांत्वना देते हैं। तब युधिष्ठिर राज-सिंहासन को स्वीकार करने को तैयार होते हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ की मूल कथा की संरचना यही है। किन्तु इसकी समकालीन वैचारिकता के अनेक आयाम हैं।
सम्पूर्ण ‘कुरुक्षेत्र’ भीष्म के चिंतन से भरा पड़ा है। यह चिंतन आदि से अंत तक अनवरत चलता रहता रहा है। युध्द-शांति, राजा-प्रजा और भाग्य-कर्म जैसे द्वंद्वात्मक विषयों को यह अपने में समेटे है। दिनकर का उद्देश्य यही था कि वे अपने विचारों को मानव-समाज तक पहुचा सकें। महाभारत की घटना से जोड़कर तो मात्र काव्य का कलेवर गढ़ा गया है।
कवि के विचार ‘कुरुक्षेत्र’ में युध्द-विरोधी रहे हैं। युध्द के दुष्परिणामों से सम्पूर्ण काव्य भरा पड़ा है। उन्होंने युध्द क़ो निन्दित और क्रूर कर्म माना है। किन्तु, सभी विकल्पो के असफल होने पर युध्द को नकारा नहीं जा सकता। जब अंतिम विकल्प के रूप में युध्द होता है तब शांति होती है। युध्द से सम्बन्धित ऐसे ही विचार भीष्म ने धर्मराज को बताये-
”युध्द को तुम निन्द्य कहते हो, मगर/जब तलक है उठ रही चिनगारियाँ
भिन्न स्वार्थों से कुलिश-संघर्ष की/युध्द तब तक विश्व में अनिवार्य है”
युध्द का असली कारण समाज में ‘असमानता’ है। वह चाहे किसी भी रूप की हो। जब तक समाज में ‘समानता’ की स्थापना नहीं हो सकती, तब तक किसी न किसी रूप में युध्द चलता ही रहेगा।
”शांति नहीं तब तक, जब तक /सुख-भाग न नर का सम हो
नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”
सहज रूप में कोई किसी से लड़ना नहीं चाहता है। व्यक्ति शांति और प्रेम से अपना जीवन जीना चाहता है। ऐसी प्रकृति शांतिप्रिय लोगों में होती है। दुराचारी व्यक्ति सहज शिष्ट-मानव की इस स्वाभाविकता की अवहेलना करता है और युध्द की अनिवार्यता की परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।
”किसी दिन तब महाविस्फोट कोई फूटता है
मनुज ले जान हाथों में दनुज पर टूटता है।”
दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ में ‘सप्तम सर्ग’ का अपना विशिष्ट महत्व है। यह सर्ग प्रबंध का उपसंहार तो है ही, भारत की वर्तमान पीढ़ी को कई संदेश भी देता है। सन्मार्ग पर चलने का ही नाम जीवन है। संसार से पलायन कर जंगल जाने की प्रवृत्ति उचित नहीं है। यह तो जीवन से मुँह मोड़ लेना है। एक तरह की कायरता है, जीवन से निरंतर संघर्ष करते हैं, वे ही लोग समाज के लिए आदर्श हैं। पलायनवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए भीष्म कहते हैं-
”धर्मराज, क्या यती भागता
कभी गेह या वन से?
सदा भागता फिरता है वह
एकमात्र जीवन से”
हिंसा, विनाश, युध्द, असमानता ये सभी व्यक्ति के ‘कर्म-पथ’ से भटकने के परिणाम में घटित होते हैं। मात्र व्यक्तिगत सुखों को भोगने के कारण ही असमानता की जहरीली धारा फूटती है। सभी मनुष्य अपने कर्म में लीन रहें तो समाज से अराजकता को समाप्त किया जा सकता है। कवि ने स्वीकार किया है कि राजा-प्रजा कुछ नहीं होता, ये दोनों ही मनुष्य के रूप हैं। अत: सभी को अपने मानवोचित कर्म के माध्यम से इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में अपना योगदान देना होगा। तभी युध्द, अशांति और संघर्ष से बचा जा सकता है।
‘भाग्यवाद’ और ‘कर्मवाद’ का कवि ने अपने विभिन्न तर्कों से खंडन किया है। ‘कुरुक्षेत्र’ में भाग्य पर कर्म की विजय है। भाग्यवाद केवल प्रंपच और प्रताड़न है। वह पाप का आवरण है। जिससे एक व्यक्ति दूसरे के हिस्से को अतिक्रमित रखना चाहता है। भाग्यवाद का सहारा लेकर दुराचारी व्यक्ति श्रमिक के भाग को स्वयं हड़प जाते हैं। अपने कठोर परिश्रम से व्यक्ति असंभव को संभव कर सकता है। कर्म-पथ पर चलकर भाग्य को बदला जा सकता है। कवि के शब्दों में-
”ब्रद्दमा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है
ब्रद्दमा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी
धोते वीर कु-अंकु भाल का बहा भ्रुवों से पानी”
अपने कर्मानुसार जीवन जीकर ही संसार की विषमता को समाप्त किया जा सकता है। तभी समानता के आधार पर प्रकृति का कण-कण जन-जन का हो सकता है। तभी मानव के अधिकार सुरक्षित हो सकते हैं। अभावों को दूर किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में ही राजा-प्रजा का भेद मिट सकता है। न कोई पूँजीपति होगा न कोई मजदूर। संसार का एक नया रूप होगा। इस तरह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में एक सुखमय और शांतियुक्त समाज की परिकल्पना है।

रामबरन ‘सरस्वती-पुत्र’
पता : लिटिल ऐंजिल कान्वेन्ट स्कूल
गांधी कॉलोनी, मुरैना- 476001
मध्यप्रदेश