‘रोशनी की कोपलें’ – हाथों से छूते हुए……….

पुस्तक-समीक्षा – डॉ रामकुमार सिंह
पुस्‍तक – ‘रोशनी की कोपलें(गजल-संग्रह)
सर्जनाकार – डॉ वशिष्‍ठ अनूप
प्रकाशक – उद्भावना प्रकाशन


हने को जो कोंपलें हैं वे कब अंगार बन जायें, कहा नहीं जा सकता। या इस तरह कहिये कि कब अंगारों की तासीर महज ‘कोंपल’ के शीर्षक में रखकर हथेलियों में दे दी जाये….. रोका नहीं जा सकता है। ऐसी ही एक नजीर है वशिष्ठ अनूप का गजल संग्रह – ‘रोशनी की कोपलें’
यह गजल-संग्रह उद्भावना से छपा है। इसमें कुल एक सैकड़ा जमा दो गजलें हैं। हिन्दी गजल की परम्परा में यह संग्रह एक और उपलब्धि है। दुष्यंत के बाद हिन्दी गजल में नई बुनावट को उसी प्रखरता और तल्खी के साथ बनाये रखने का अहसास ‘रोशनी की कोंपलें’ से होता है।
‘समय की पहचान’ की जो बात अनूप वशिष्ठ के विषय में मानी गई है उसे इस तरह के कई शेर सामने लाते हैं –

”हदों के पार होता जा रहा है
समय खूंखार होता जा रहा है”

समय का खूंखार हो जाना इसलिए नहीं कि अंधेरे के नुमांइदे ज्यादा हो गये हैं और रोशनी की कोपलें सूराख तलाशती हों, दरअसल मामला यह निकलता है कि अंधेरे और उजाले के फर्क का श्याम-श्वेत मानदंड समाप्त हो गया है। समय का खूंखार हो जाना जिस अंदाज में वशिष्ठ अनूप परिभाषित करते हैं वो इस दौर की शातिरी को पकडने और खंगालने की प्रक्रिया है –

‘समझना उसको मुश्किल है बड़ा शातिर शिकारी है
वो खंजर बेचने वाला अहिंसा का पुजारी है”

इस माहौल में केवल उदात्त कल्पनाओं वाले कवि के पास वे पैने औजार शायद न हों जो राजनीतिक-चेतना ये युक्त नये गजलकार के पास होते हैं। दुष्यंत ने जिस राजीनीतिक-चेतना का गजल से मजबूत परिचय कराया था वह उतनी ही शिद्दत के साथ अनूप वशिष्ठ के यहां मौजूद है। व्यंग्य की धार भी उसी तरह –

”ये नाले आजकल बनकर समन्दर बात करते हैं
मसीहाओं के जैसे ये सितमगर बात करते हैं
कभी कुर्सी के ऊपर से, कभी टेबुल के नीचे से
हमारे देश की संसद में बंदर बात करते हैं”

इतना ही नहीं, हर स्तर पर शक्ति का केन्द्रीयकरण किस प्रकार लम्पटों के हाथों में है, अनूप इससे बाखबर हैं। वे जानते हैं कि न केवल ये ‘बंदर बात करते हैं’ बल्‍िक ‘बंदरबांट भी करते हैं। अंधेरे के नुमाइंदों और सरमायेदारों के बीच कैसे घोषित-अघोषित अनुबंध हैं, इसकी भी वे खबर रखते हैं-

”कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।”

इस तरह के मकड़जाल में दुष्यंत सड़कों पर लिखे हजारों नारों को न देखने की बात जो कहते है, कुछ उसी लहजे में निकम्माई वादों से सावधान हो जाने की बात या मोहभंग सरीखी कोई चीज अनूप के यहां भी है-

”वादों पर विश्वास हो कैसे
हर वादा इक नारा निकला”

इस मोहभंग के बाजिब कारण भी हैं। नये प्रयासों को कुचलना व्यवस्था के लिए एक शगल से कम नहीं। जिस परकटे परिंद की कोशिश देखने के बीच दुष्यंत को एक मलाल भी था, उसे कुछ इस रूप में अनूप सीधा-सीधा कह देते हैं-

”भिनसार की आंखों में काली रात दीजिए
पंछी जो उड़ना चाहे तो पर काट दीजिए
इंसाफ की खातिर उठे आवाज अगर हो
पिटवाइये लाठी से, हवालात दीजिये”

इस खतरनाक समय में भी रोशनी की कोंपलों का अपनी तरह का वादा है। कोंपलों से जिस ‘मासूमियत’ या ‘कोमलता’ का अहसास होता है, यह लगता है कि इन कोपलों को खुद किसी ‘सुरक्षा-योजना’ की आवश्यकता तो नहीं, लेकिन जब ये कोपलें फूटती हैं, इस तरह कि, जगत के जीर्ण पत्रों को झरातीं हैं। उजाले का पेड़ खुश होता है, जब ये घोषणा सुनता है-
”उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें”

स्मरण रहे कि इस प्रक्रिया जो जन्म देने वाले सर्जनाकार के लिये यह सहज नहीं है। बड़ी बात जो शेर में होती है उसके लिए उतना ही विप्लव रचनाकार सहता है। युवा गजल-गायक हुसैन बंधु गायकी से पहले एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करते हैं जो यहां प्रासंगिक हो उठता है- ”हम गजल कहते हैं तो खून जलता है / लोग समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।’‘ ये मंचीय जुमला कुछ इस तरह साहित्यिक अंदाज में उतनी गहराई से ‘रोशनी की कोपलें’ में नजर आता है-

”उसके मन की पीड़ाओं को कौन समझता है
दुनिया कहती कोयल कितना मीठा गाती है”

आंदोलन, विप्लव-गान, और वैचारिक-क्रांति की सुगबुगाहट अपने सक्रिय-चेहरे से बहुत पहले की उपज होती है। शांति की तलहटी में उथल-पुथल का ज्वार निहित होता है-

”बाहर से खामोश बहुत लगता लेकिन
भीतर से हर वक्त सुलगता रहता है”

इसी तलांतर को महसूस करते हुए अनूप वशिष्‍ठ साहित्य के उस खेल को अस्वीकार करते हैं जो बचाव की मुद्रा में है, वे आक्रमण में ही विजयश्री का वरण मानते हैं, वैचारिक-सर्जना-प्रक्रिया में….

”साहित्य फकत ढाल नहीं आक्रमण भी है
यह आक्रमण हम तुम पे लगातार करेंगे”

दुष्यंत ने इस जमीन पर जिस तपिश को महसूस किया था। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की रेत पर आम आदमी के पांव किस तरह जलते रहे, उसे आगे अनूप भी महसूस करते हैं, लेकिन नया यह जुड़ता है इस जलन के साथ कुछ आशा की ठंडक भी है। नये दौर में कुछ तो ऐसा घटने को है कि यह कहा जा सके-
”रेत पर पांव जलते रहे देर तक
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा”

‘रोशनी की कोपलें’ के बारे यह अत्यंत जरूरी वक्तव्य हो जाता है कि इस किताब में मन-मस्तिष्क के बीच, समाज और भावनाओं के बीच, वैचारिकता और मन-बहलाव के बीच एक गजब का संतुलन है। दुष्यंत जब ‘साये में धूप’ महसूस कर रहे थे तो ‘इश्क पर संजीदा गुफ्तगू’ से ध्यान बखूबी हटाया था। वशिष्ठ अनूप ने राजनीतिक-सामाजिक विमर्श के बीच मन की कोमल भावनाओं को शिद्दत से जगह दी है। सौन्दर्य की उपासना जब वे करते हैं तो गजल अचानक गीत के माधुर्य से भर जाती है। उनकी सर्जना-प्रक्रिया में यह बात शायद इसलिए और समाई हुई है कि उन्हें गीत व गजलों की गेयता से न केवल प्रेम रहा है वरन उनके अध्ययन व विशेषज्ञता के केन्द्रबिन्दु में गीत और गजल दोनों का अकादमिक विस्तार है। एक गजल में वे लिखते हैं-

”एक अनुबंध कर लिया मन में
जुड़ गये दिल के तार हैं चुप-चुप”

सौन्दर्य के उनके प्रतिमान सादा हैं। कबीर की अक्खडता अगर कई गजलों में है तो सौन्दर्य के प्रति सहज आकर्षण-योग भी है-

”अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी”

”””””””वरिष्‍ठ समीक्षकों की नजर में ””””

पुस्तक के फ्लैप पर टिप्पणीकार के रूप में हिन्दी विभाग, बीएचयू के प्रोफेसर डॉ अवधेश प्रधान लिखते हैं – ”वशिष्ठ अनूप की कविता ने गेय कल्पना के पंखों पर उड़ान भरते हुए अहर्निश प्रकृति, व्यक्ति और समाज के जीवंत जीवन का साक्षात्कार किया है। गजल को आशिक और माशूका, साकी और प्यालों के तंग दायरे से निकाल कर उसे खास हिंदी रूप-रंग देने की जो परंपरा चली उसमें वह अधिक से अधिक जीवन के विशेषतः सामाजिक जीवन के निकट आती गई और दुष्यंत कुमार के बाद से तो उसका किसान चेहरा, राजनीतिक चेहरा, क्रांतिकारी चेहरा और निखरता गया है और उसे निखारने वाले युवा गजलकारों में वशिष्ठ अनूप का खास योगदान है। उनकी गजलों में सत्ता की राजनीति के ‘शातिर शिकारियों’ की पहचान है तो उनके खिलाफ असंतोष, विरोध, आंदोलन और क्रांति का आह्वान भी है। कहीं धार्मिक, सामाजिक पाखंडों के विखंडन का कबीराना अंदाज है तो कहीं पर्यावरण की गहरी चिंता है-

”लाख हाथों जगत को जकड़े है
जग को मिथ्या बता रहा है वो
ये न समझो कि काटता जंगल
सबकी सांसे चुरा रहा है वो”

वशिष्ठ अनूप ने चिखलदरा अमरावती के नैसर्गिक सौन्दर्य पर लिखा है जो प्रेयसी के मानवीय सौन्दर्य पर भी। ऐकांतिक प्रेम की पुलक के साथ-साथ व्यापक मानव संबंधों की मिठास के चित्र भी उनकी गजलों में हैं। उनकी गजलों की एक बड़ी विशेषता है भाषा और भाव की सादगी – ‘‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था, मां ने हंसकर दुलारा तो अच्छा लगा।” उनकी गजलों के बारे में उन्हीं के शेर पेश करता हूं –

”एक मां की पुलक, एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल
कैसे जीवन से कविता जुड़ेगी पुनः
प्रश्न का सीधा-सा हल है गजल”

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही प्रोफेसर डॉ बलराज पाण्डेय ने पुस्तकांरभ में 6 पृष्ठीय समालोचनात्मक टिप्पणी रचनाकार की सर्जना के विषय में इस तरह की है-

”अपनी रचनात्मक क्षमता के बल पर वशिष्ठ अनूप ने हिन्दी गजल के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी से छिपाने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनके पास सचेत वर्ग-दृष्टि है। यही वजह है कि उनकी गजलों में विषय की विविधता मिलती है। हम सभी जानते हैं कि दुष्यंत कुमार ने हिन्दी गजल को नयी भाषा दी, नया तेवर दिया, उसे नया आयाम दिया। दुष्यंत कुमार की उस पंरपरा को जिन लोगों ने विकसित किया, उनमें वशिष्ठ अनूप का नाम अग्रणी है। वे अपनी जमीन से जुडे़ हुए रचनाकार हैं। आज जबकि साहित्य भी बाजार की चमक-दमक के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहा है, वशिष्ठ अनूप उस चमक-दमक की वास्तविकता को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि साहित्य की दुनिया में प्रसिद्धि पाने के लिए किस प्रकार के संबंध काम करते हैं, लेकिन उन्होंने इन सभी चीजों से अपने को बचाया है और देश के आम जन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज के प्रभु वर्ग के विरुद्ध मोर्चा खोलते ही हैं, उन साहित्य समीक्षकों की भी खबर लेते हैं, जो गीत और गजल को साहित्य की मुख्यधारा से अलग करके देखते हैं। वे उन लोगों की भी खबर लेते हैं जो गजल विधा में संवेदनात्मक गहराई की संभावना नहीं देखते। गजल क्या होती है, इसे समझाते हुए वे लिखते हैं-

”हैं जडें इसकी कीचड़ के अंदर मगर
रूप-रस-गंध पूरित कमल है गजल
एक मां की पुलक एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल”

इससे स्पष्ट होता है कि वशिष्ठ अनूप की गजलों का आधार किसान की वह संस्कृति है जो कई प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना करती हुई मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित है। यदि हम कलात्मकता की दृष्टि से भी देखें तो विषय को स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ अनूप बिम्ब भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। गजल की पहचान के लिए ‘खेत में लहलहाती फसल’ का बिम्ब अपने आप में कितना अनूठा है’ यह बताने की जरूरत नहीं। अपनी गजल विधा के प्रति वशिष्ठ अनूप इतने समर्पित हैं कि उन्हें यह कतई मंजूर नहीं कि इसे साहित्य की मुख्य-धारा से काट कर देखा जाये। वे गजल के इतिहास को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि इसे ‘राजमहलों में पाला गया, और ‘तबलों की थापों’ पर महफिलों में ठुमके लगाने के लिए, कभी विवश किया गया था, लेकिन गजल की आज वह स्थिति नहीं है। वह अब ‘झोंपड़ी की दुलारी’ है तथा उसमें इतनी ताकत आ गई है कि किसानों-मजदूरों के हक के लिए हमलावर की भूमिका में भी अपने आप को प्रस्तुत कर सकती है। वशिष्ठ अनूप साहस के साथ यह घोषित करते हैं कि आज गजल विधा इतनी समृद्ध हो गई है कि उसमें हम आसानी से कबीर और निराला का दुःख देख सकते हैं, घनानंद के ‘प्रेम की पीर’ देख सकते हैं, साथ ही मीरा और रसखान का प्यार भी देख सकते हैं। इस प्रकार हम निःसंकोच यह कह सकते हैं कि वशिष्ठ अनूप ने गजल विधा को संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर उसे इतना विस्तृत क्षेत्र दिया है, जिसमें वह खुलकर सांस ले सके, खिलखिला सके। वशिष्ठ अनूप उन गजल लिखने वालों को भी एक प्रकार की सीख देते हैं, जो गजल को सिर्फ मनोरंजन करने वाली विधा मानते हैं।
वशिष्ठ अनूप की गजलों में एक और बात हमारा ध्यान खींचती है, वह है युगबोध। हम जानते हैं कि कोई भी रचनाकार तब तक कुछ सार्थक नहीं रच सकता, जब तक कि उसे अपने समय की पहचान न हो। आज जबकि हमारे समाज में सिर्फ पैसे का रिश्ता बचा हुआ है, लोग अपनों से भी नाता तोड़ते जा रहे हैं, हमें अपना घर अच्छा नहीं लगता, वशिष्ठ अनूप ऐसे में भारतीय पर्व त्यौहारों को सांकेतिक रूप से याद करते हैं-

पकवानों की खुशबू में रंगों की मस्ती में
दुश्मन को भी गले लगाना अच्छा लगता है
फास्ट फूड और चमक-दमक वाले इस युग में भी
अम्मा के हाथों का खाना अच्छा लगता है

स्पष्ट है कि वशिष्ठ अनूप को बाजार की चमक-दमक में विश्वास नहीं। ऐसा वही रचनाकार कह सकता है जो बाजार की असलियत जानता हो। हम देखते हैं कि वस्तुओं की गुणवत्ता कम, विज्ञापन ज्यादा हमें प्रभावित कर रहे हैं। वशिष्ठ अनूप बाजार की असलियत इसलिए जान सके हैं क्यों कि उनके पास एक विचारधारा है। उस विचारधारा के आधार पर वस्तुओं का विश्लेषण करने की उनमें क्षमता है और जो रचनाकार ऐसा करने में समर्थ है, उन्हें बाजार की चमक-दमक धोखा नहीं दे सकती। आज सचमुच हमारे मानवीय संबंधों में जो रिक्तता आ गई है, उसमें मां के हाथों का खाना याद करना कितनी बड़ी बात है। ऐसी पंक्तियों को पढ़ते हुए किसे अपनी मां की याद नहीं आयेगी, किसकी आंखें नहीं भर आएंगीं । बहुत सहजता के साथ संवेदना की गहराई में उतरना वशिष्ठ अनूप की अपनी विशेषता है। आपको लगेगा कि बात कितनी छोटी है, वह कितनी हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी है, लेकिन उसी को वशिष्ठ अनूप जब रचना में ढाल देते हैं तो छोटी बात बड़ी बन जाती है और कुछ देर के लिए हम उसकी अर्थवत्ता पर विचार करने के लिए विवश हो जाते हैं।
वशिष्ठ अनूप अपने समय के यथार्थ को पहचानने की भी क्षमता रखते हैं। आज की सत्ता व्यवस्था बहुसंख्यक जनता की मूल समस्याओं से हमारा ध्यान अलग करना चाहती है। वह ऐसे-ऐसे मुद्दों को उछाल देती है कि हम अपनी मूल समस्याएं भूल जाते हैं। सत्ता-व्यवस्था की इस साजिश को वशिष्ठ अनूप खूब पहचानते हैं। इसलिए उनकी गजलों में गरीबों की आवाज मुखर हो पायी है। इसके लिए वे चौराहों से, नुक्कड़ो से बिम्ब लाते हैं-

”भूख मदारी-सी डुगडुगी बजाती जब
नंगा होकर पेट दिखाना पड़ता है
शांति हमें भी अच्छी लगती है लेकिन
हक की खातिर शोर मचाना पड़ता है।”

जहां समस्याओं का चित्रण प्रमुख हो, वहां गजल की संरचना भले ही कमजोर पड़ जाये, वशिष्ठ अनूप इसकी परवाह नहीं करते, क्यों कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने देश की जनता, शोषित-पीड़ित जनता का यथार्थ चित्रण करना होता है। ऐसा नहीं है कि आम जनता का दुःख-दर्द उनके लिए अनचीन्हा, अनपहचाना हो। उसे वे दर्शक के रूप में देर से देखने के पक्षधर नहीं है। उसके वे स्वयं भोक्ता भी हैं। दुःख ही जैसे रचनाकार का दोस्त है। यहाँ प्रेमचंद की ये पंक्तियां याद आती हैं कि ‘दुःख ही कवि के लिए सुख है। प्रेमचंद का मानना है कि कोई भी रचनाकार जिस दिन सुख-वैभव से रिश्ता जोड़ लेगा, उस दिन वह जनता का रचनाकार नहीं रह जायेगा। वशिष्ठ अनूप भी अपनी गजलों में दुःख से रिश्ता जोड़ते हैं। वे कहते हैं-

”कदम-कदम पे दुखों का हुजूम मिलता यूं
युगों के बाद कोई दोस्त ज्यों हहा के मिले”

यहां दुःखों का ऐसा हुजूम है जो कदम-कदम पर मिलता है। हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अधिकतर लोगों के लिए दुःख ही ओढ़ना और बिछौना है। वास्तव में वशिष्ठ अनूप उन्हीं लोगों के दुःख की बात अपनी गजलों में करते हैं। दूसरों का दुःख भी कवि को जब तक अपना दुःख नहीं लगेगा, तब तक उसकी रचना सार्थक नहीं हो सकती।
साम्प्रदायिकता और जातिवाद ने हमारे देश को खोखला बनाया है। इधर क्षेत्रवाद ने भी आक्रामक रुख अख्तियार किया है। आश्चर्य तो यह है कि जो लोग ऐसी राजनीति करने वाली ताकतों को बढ़ावा देते हैं, वही राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के नारे भी उछालते हैं। वशिष्ठ अनूप अपनी गजलों के माध्यम से ऐसी ताकतों के प्रति हमें सावधान करते हैं। इसके लिए वे अपने समाज को भी जिम्मेदार मानते हैं। यह सही है कि यदि देश को तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ जनता उठ खड़ी हो जाये तो ऐसी ताकतें दुबारा सर न उठा सकें। देश और समाज की वर्तमान दुरवस्था के लिए हमारी भी जिम्मेदारी बनती है। वशिष्ठ अनूप का मानना है कि यदि दुनिया से जुल्म को मिटाना है तो सबसे पहले हमें अपने अंदर के डर को मिटाना पड़ेगा। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम दूसरों के भरोसे रहने के आदी हो गये हैं। अपनी समस्याओं को या तो हम नियति मान लेते हैं या इन्तजार करते रहते हैं कि कोई आएगा और हमें मुक्ति दिलाएगा। हम उन ताकतों को नहीं पहचान पाते जो जो हमें बांट रही हैं- कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। सत्ता का यह खेल कोई नया नहीं है, उसकी चाल जरूर नयी-नयी लगती हैं वशिष्ठ अनूप का मानना है कि हम पहले ही अगर नहीं चेत पाये तो भविष्य में किन भयावह परिस्थितियों से सामना करना पड़ेगा, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। वे लिखते हैं-
”पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम
प्यार में डूबी हुई निश्छल हंसी खतरे में है
लोग अब करने लगे हैं अंधेरे को यूं नमन
चांदनी सहमी हुई है रोशनी खतरे में है”

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें बरबस ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘अंधेरा धूप को धमका रहा है और हम चुप हैं’
हमारे परिवार और समाज को पूंजीवादी व्यवस्था ने बहुत प्रभावित किया है। हमारे पारिवारिक रिश्तों में बहुत बड़ी दरार आयी है। माता-पिता, भाई-बहन के रिश्तों को भी हम नफा-नुकसान की दृष्टि से देखने लगे हैं। सबसे खराब स्थिति तो बूढे़ मां-बाप की है। जगह-जगह वृद्धाश्रम तो खोले ही जा रहे हैं, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बूढ़ों की देखभाल के लिए सरकार को कानून बनाना पढ़ रहा है। वशिष्ठ अनूप ने इस विकराल होती समस्या पर भी हमारा ध्यान खींचा है। वे लिखते हैं-

”दुःखी मां-बाप को करके इबादत हो नहीं सकती
खुदा की ऐसे लोगों पर इनायत हो नहीं सकती
बुजुर्गों को पटक देना अनाथालय में ले जाकर
किसी की हो मगर अपनी रवायत हो नहीं सकती”

आज उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बाजारवाद का बोलबाला है। यह पूंजीवाद का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। कहीं-कहीं इसके विरुद्ध आवाजें भी उठी हैं, लेकिन उन्हें दबा दिया गया है। वशिष्ठ अनूप उदारीकरण के खतरों से वाकिफ हैं। …….ऐसी शक्तियों पर वे सीधे प्रहार करते हैं –

”लुटेरों की दुनियां के सरदार हैं वो
हमारी हंसी के खरीदार हैं वो
अमने के पुजारी उन्हें मत समझना
चले बेचने अपने हथियार हैं वो”

वशिष्ठ अनूप बाजारवाद के खतरों को पहचानते हैं। बाजार, जिसकी कोई नैतिकता नहीं होती, जहां आदमी की नहीं, वस्तुओं की महत्ता दिखाई पड़ती है, जहां खरीदने वाले और बेचने वाले की ही सत्ता दिखाई पड़ती है, वहां कविता, गीत और गजल को कौन पूछेगा, दूसरी कलाओं का क्या होगा, विचारहीन बनाने वाली इस व्यवस्था ने हमारे घर को ही बाजार बना दिया है। वशिष्ठ अनूप की बाजार पर यह टिप्पणी बहुत मारक है। वे इस व्यवस्था का विरोध करने वाली शक्तियों के पक्ष में खड़े होने वाले रचनाकार हैं। उनकी गजलों में उनका पक्ष स्पष्ट है। उन्होंने अपनी गजलों में जो सवाल उठाये हैं, उनका जवाब व्यवस्था के पास नहीं हैं। वे कहते हैं-

”क्यों उठ रहीं हैं लपटें, क्यों हुआ है लाल जंगल
देना पड़ेगा उत्तर, करता सवाल जंगल”

वशिष्ठ अनूप के ये शब्द उस आदिवासी जनसमूह की ओर संकेत करते हैं, जहां वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिए सशस्त्र संघर्ष जारी है।
ये गजलें अपने समय, समाज और समग्र वैश्विक संरचना से रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘बन्जारे नयन’ और ‘रोशनी खतरे में है’ के बाद ‘रोशनी की कोंपले’ वशिष्ठ अनूप की गजलों का तीसरा संग्रह है तो तमाम निषेधों के बाबजूद प्रकाश की विजय के प्रति आश्वस्त करता है।

—————–समीक्षा के इधर-उधर——————-

सर्जनाकार के बारे में –
डॉ वशिष्‍ठ अनूप, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग मे प्रोफेसर हैं। गोरखपुर जिले के बड़हलगंज अंतर्गत सहड़ौली दुबेपुरा गांव में जन्मे वशिष्ठ अनूप की प्रारंभिक शिक्षा गांव में तथा स्नातक शिक्षा बड़हलगंज में हुई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए और पी-एच.डी. की। वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर से ‘हिन्दी गजल: उपलब्धियां और संभावनायें’ विषय पर डी.लिट्. उपाधि प्राप्त की। आपने कुछ दिनों तक नेशनल पी.जी. कॉलेज बड़हलगंज और गोरखपुर विवि में तथा 1994 से पूर्वान्चल विवि जौनपुर के अंतर्गत राज पी.जी. कालेज के हिन्दी विभाग में अध्यापन किया। राजा श्रीकृष्णदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हुए। बाद में काशी हिन्‍दू वि.वि. में आ गये।

सर्जनाकार से रूबरू होना – डॉ वशिष्‍ठ अनूप को सुनने-समझने और कई जिज्ञासाओं के समाधान का मौका मुझे मिला वाराणसी में ही। इस बारे में ‘सर्जना’ पर ही देखे-‘बारह दिन बनारस में’ शीर्षक से।

वशिष्ठ अनूप जी के प्रकाशन संसार में….
….बन्जारे नयन (2000), रोशनी खतरे में है (2006) गजल-संग्रह शामिल है। समालोचना ग्रंथो में हिन्दी की जनवादी कविता, जगदीश गुप्त का काव्य-संसार, हिन्दी गजल का स्वरूप और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी गजल की प्रवृत्तियां, हिन्दी गीत का विकास और प्रमुख गीतकार, हिन्दी साहित्य का अभिनव इतिहास, हिन्दी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास, ‘अंधेरे में: पुनर्मूल्यांकन’ ‘असाध्यवीणा’ की साधना साहित 22 पुस्तकों का लेखन व संपादन उनके द्वारा किया गया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीत, गजल, कविता, कहानी और समीक्षाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं।
उनका सम्पर्क : डॉ. वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी – 221005, मोबाइल – 09415895812, ईमेल- vdwiwedi@gmail.com

—– संग्रह से दो कोपलें——-

एक –

जो मुजरिम हैं वही सब बनके पहरेदार बैठे हैं
वहां संसद में कितने देश के गद्दार बैठे हैं।
किसी अजगर-से ये हर ओर फेंटा मार बैठे हैं
समूचे देश की छाती पे कुछ परिवार बैठे हैं।
कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं।
हमारे देश के कानून की महिमा निराली है
जो काबिल लोग हैं वे इन दिनों बेकार बैठे हैं।
नदी के घाट से पूजा घरों तक भेड़ियों के दल
ये साधू-संत भी हाथों में ले हथियार बैठे हैं।
बुराई नग्न तांडव कर रही दिन-रात सड़कों पर
जो अच्छे लोग हैं सीने में ले अंगार बैठे हैं।
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।

दो-
सूखने लगतीं जहां पर हर खुशी की कोपलें
फिर वहीं से फूटतीं हैं जिन्दगी की कोपलें।
वक्त ने जिन पर उगा दी बेबसी की कोपलें
चाहते हैं हम उगें उन पर हंसी की कोपलें।
उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें।
सारी नदियां एक सागर में सिमटती जा रहीं
वह उगाता है लबों पर तिश्नगी की कोपलें।
बस तुम्हारी इक झलक से सिन्धु में उठती लहर
फूटने लगती है दिल में चांदनी की कोपलें।
उनके हाथों पर नई तहरीर लिखनी है हमें
जिनके माथे पर लिखीं बेचारगी की कोपलें।
कुछ नये उद्योग पनपे हैं हमारे देश में
अपहरण, हत्या, डकैती, तस्करी की कोपलें।
भूख से मरते हैं बच्चे और संसद में वहां
बैठकर नेता उगाते मस्करी की कोपलें।
नर्म फूलों पर नहीं तलवार की होती परख
फूटती संघर्ष में ही शायरी की कोपलें।

—— और, चलते-चलते —-

‘सर्जना’ पर बीएचयू के हिन्‍दी अध्‍यापकों के मौलिक व्‍याख्‍यान सहिए कई ऐसी जानाकारियां प्रस्‍तत की गई हैं जो ‘सर्जना’ की खास निधि हैं। हिन्‍दी विभाग बीएचयू के यशस्‍वी विद्यार्थियों का सम्‍पर्क-अंतर्जाल लोकप्रिय बेबसाइट ‘फेसबुक पर उपलब्‍ध है।

हिन्‍दी विभाग के विद्यार्थियों से ‘सर्जना’ की अपील है कि हिन्‍दी विभाग की बेबसाइट पर विभागीय जानकारी हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करने के लिए पहल करे। विवि की बेबसाइट पर अध्‍यापकों के नामों की सूची भी अंग्रेजी में दी गई है। …..साथ ही विवि में होने वाली गोष्‍िठयों आदि के समाचार ‘सर्जना’ को ईमेल करें। छा्त्र-सम्‍पादकों के नाम सहित।

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‘किसी को तो शिव बनना होगा’

‘किसी को तो शिव बनना होगा : एक चिंतनशील मन की भावुक ‘अपील’
– शेषकुमारी सिंह-

पुस्तक : ‘किसी को तो शिव बनना होगा (कविता-संग्रह)
कवयित्री : डॉ बिनय राजराम
प्रकाशक : अरविन्द प्रकाशन, आगरा

रचनाकार भौतिकवाद की प्रतिस्पर्धा में अकादमिक वातावरण में मूल्यों के लिये चिंतित हैं। शिष्यत्व और गुरुता की पुन:प्रतिष्ठा का प्रश्न है-
”राज-मोह-ग्रस्त द्रोणाचार्य नहीं
सांदीपनी या सुकरात बनना होगा (पृ.-17)
विचारशील की दृष्टि जब प्रकृति, जलचरों व वन्य-जीवों में भी सौहार्द्र देखती है तो मानव के पारस्परिक वैमनस्य पर खेद होता है। ‘मात्स्य-न्याय’ बहुत कुछ समझाता है-
”इन जल-जीवों को देखकर
समझने लगी हूँ अब
नहीं है सौहर्द्र तो
मानसिक ऊर्जा से भरपूर
मानुस में नही है” पृ.-30)

जीवन और परिवेश का यथार्थ विचारशील मन को सिसकाता है। बालक की भांति उजली जीवन-दृष्टि भीतर घुटन महसूस करती है। रचनाकार को लगता है कि चारों ओर एक उमस का मकड़जाल बुन दिया गया है। यहाँ संवेदनाओं की स्थिति ऐसी है जैसे किसी भुतहा खण्डहर महल में कोई बालक मन अनजाने में घुस आया हो। वह भटकता है सिसकता है और बाहर निकलने को तरसते हुए खोजता रास्ता-
”क्या है सच, / कौन बताएगा? / कौन दिखाएगा इस आत्मा को / परम आत्मा का मार्ग” (पृ.37)

जीवन के अनेक द्वंद्वों और प्रश्न-प्रतिप्रश्नों के बीच दार्शनिक तत्व भी पुस्तक की कविताओं में दिखाई देते हैं। सौरमण्डल की व्यवस्था में जीवन का हल खोजते हुए लिखा गया है कि- ”हाँ! है एक उपाय / शाश्वत राह / अपने अक्ष, अपनी धुरी पर / घूमते रहना / बढ़ते चलना / चलते रहना अपनी राह”(पृ.-43)। एक ढंग से कर्मवाद का प्रतिपादन इसमें दिखाई देता है।
धर्म-सम्प्रदाय और आस्था के प्रतीकों के आधार पर समाज को विभाजित करने की मानसिकता से कवियत्री पीड़ा अनुभव करती है। क्या भविष्य को ताक पर रखकर समन्वय का निवाला बनाकर भक्षण कर लिया जायेगा? क्या हम अपने धार्मिक महापुरुषों को बांटेंगे। ‘थम जा री ओ भविष्य-भक्षिणी’ (पृ.-45) कहकर कविता पीड़ा को व्यक्त करती हैं-
”टूटी आस्था ले कर कहाँ जाएगी?
ओ री भविष्य-भक्षिणी राजनीति?”(पृ.-45)
निश्चित रूप से , अलगाववादी राजनीति ने वर्तमान को निशाने पर लिया ही है भविष्य को भी संहेदाहस्पद बना दिया है। कवियत्री एक भावुक ‘अपील’ करती है कि सांस्कृतिक गौरव की रक्षा करने और मानव-समाज को भयानक त्रासदी से बचाने के लिए क्या यह संभव नहीं कि कुछ प्रयास किये जायें और भावी समय को समन्वय की सौगात विरासत में दे जायें।
कविताओं में मानव को सुरक्षित करने की वैश्विक-दृष्टि है। यह पूरी द ुनियाँ के मानव समाज की ही नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्माण्ड के कण-कण को बचाने की मांग करती है। प्रकृति की रचनाधर्मिता को कोई सुनामी न निगल जाये-
”असमय की असमंजस-स्थिति से/ब्रह्माण्ड के कण-कणको / सायास बचाना होगा”(पृ.- 55)
मानवीय संवेदनाओं के साथ स्त्री-चेतना को अभिव्यक्त करने का तरीका भी इन कविताओं में विचारणीय है। पाषाण को प्रतीक बनाकर अहिल्या की पीड़ा और अहिल्या को प्रतीक बनाकर पत्थर की पीड़ा को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है-
”अहिल्या के सुन्दर रूप को / अपने भीतर कैद करने में / कितनी पीड़ा हुई होगी / पाषाण को?”(पृ.-50)
पीड़ा अजन्मा स्त्री से ही शुरू हो जाती है। मां से गुहार करता कन्या-भ्रूण कहता है अपनी मां से कि कुछ भी करो, पृथ्वी से लेकर आकाश तक या परिवार से लेकर ईश्वर तक किसी से भी लड़ो पर कृष्ण बनकर मुझ परीक्षित को बचा लो। जब वह उम्र पाती है तो विकृत मनुष्यों की कुदृष्टि का शिकार होती है। कवियत्री प्रश्न उठाती है कि स्त्री को लेकर विमर्श तो बेमानी है। अभी तक न तो नारी रक्षित है और ना ही आरक्षित। विकृत होते मनुष्य तो गिध्द कहलाने के लायक भी नहीं है। गिध्दराज ने तो सीता की अस्मिता की भरसक रक्षा के प्रयास में अपने प्राण दे दिये थे। लेखिका आह्वान करती है-
”अपनी नन्हीं सीताओं को / अभारतीय, असामाजिक / कुत्सित-कदर्य / ‘विकृत मनुष्य’ की / गिध्द-दृष्टि’ से बचाओ”(82)
छोटी-सी कविता ‘कामधेनु’ स्त्री के साथ हुए छलावे को बखूबी उकेर देती है। आधी आबादी सुबह से शाम तक कामधेनु की भांति केवल देना जानती है। उसका भ्रम टूटता है और वह अपने बंधनों को देखकर समझ जाती है कि कामधेनु का अर्थ बदल गया है-
”काम में पिसती / धेनु सी बँधी वह / धीरे-धीरे समझ गयी कि / कामधेनु का अर्थ बदल गया है”(पृ.-72)
अभियानों और वास्तविकता के भेद सालते हैं। आम आदमी जो ग्राम्य है। ग्रामीण बालक हो स्त्री, और गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करते लोग। इनसे जुड़े मसलों को किस तरह लें। आंकड़ों की सच-झूठ की कारगरता कितनी है। ऐसे कई प्रश्न रचनाशील को झकझोरते हैं-
”जागृति, साक्षरता अधिकार की कथा / आकाश चूमते / पंखों के सपने / या फिर / भरपेट भोजन की बात? / उसकी मासूम मासूम आखों के जलते हुए ठंडे सवाल”
भारतीयता और हिन्दू शब्दों के मायने कवियत्री के लिये व्यापक हैं। समग्र राष्ट्र और समाज की एकता से वे जुड़े हैं। जनजीवन को भावात्म और एकात्म दृष्टि देने के लिए जरूरी है कि कोई तो शिव बनकर प्रतिबध्द हो। स्वतंत्रता की लड़ाई की तरह ही भारतीय अस्मिता और एकता के लिए समर्पण की जरूरत आ पड़ी है। फिर से साख संचित करनी है-
”कैसे बचेगा यह ? / कौन बचाएगा कन्या कुमारी से गंगटोक तक / कच्छ से अरुणान्चल तक फेले / इस आर्यर्वत्त को?”(पृ.-99)
– शेषकुमारी सिंह-

‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है।
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पुस्तक-समीक्षा
‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’
पुस्तक : ‘रामदरश मिश्र : सृजन संवाद’
लेखिका : डॉ. सविता मिश्र
प्रकाशक : विमला बुक्स, दिल्ली
मूल्य : तीन सौ रुपये (सजिल्द)
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अध्येता जब एकात्म होकर अपने अभीष्ट संदर्भ का अनुशीलन करता है तो अभिप्राप्त नतीजे रेखांकनीय हो जाते हैं। अध्येता जब स्वयं सर्जनात्मक प्रतिभा रखता हो तो ‘एकात्म होना’ अधिक घनीभूत होता है, साथ ही प्रतिप्रश्नों की द्वंद्वात्मकता के स्थान पर एक ललित-संवाद स्थापित होता है। ‘रामदरश मिश्र : सृजन-संवाद’ पुस्तक में मूल रूप से यही भावभूमि स्थापित होकर आयी है।
डॉ. सविता मिश्र ने रामदरश जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और रचना-संसार से परिचित होते हुए – उसे खंगालते हुए – फिर आत्मसात करते हुए …….और अंतत: विश्लेषित करते हुए जिस सर्जनात्मकता व लालित्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण का परिचय दिया है वह नव-अनुसंधित्सुआें को अपने-अपने ‘समीक्ष्य’ संदर्भों के प्रति एकाकार-भाव से अनुशीलन किये जाने की अभिनव-प्रणाली का बोध कराता है।
हिन्दी साहित्य में रामदरश मिश्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सर्जनाकार, चिंतक व मनीषी होने के साथ ही विभिन्न विधाओं में वे अपनी मौजूदगी भी रखते हैं। लोक-नैकटय को उन्होने विस्मृत नहीं होने दिया है। प्रत्येक सुपरिचित के प्रति नव-दृष्टि अपनी स्वयं की कुछ विशेषताएँ लेकर सामने आती है। प्रकृति की हर नई कोंपल ऑंखे फाड़ते हुए वटवृक्षों को देखती है – नवजिज्ञासु के तौर पर भोले प्रश्न भी करती है। हर जिज्ञासा की प्रतिपूर्ति और प्रत्येक प्रश्न का उत्तार अपने अभीष्ट से भावगत साम्यवस्था की ओर एक कदम होता है। सर्जना के वैराटय से जुड़ी विषयवस्तुओं और उनके ‘फिनेमिना’ पर जब एक अनुशीलनकर्ता संवाद करता है तो कुछ नया भी घटित होता है जो पूर्वकृत सर्जना से सम्बन्धित होते हुए भी कुछ नव्यतम बनकर सामने आता है। तब निर्विवाद रूप से यह कहना होता है कि संवादकर्ता के व्यक्तित्व की छाप ‘सृजन-संवाद’ को शब्दबध्द किये जाते समय आ पड़ती है।
पुस्तक में कुल 19 लेख हैं जो सतरंगी आभा लिये हुए हैं। इनमें भेंटवार्ता, यात्रा, संस्मरण, रेखाचित्र, व्यक्तित्वानुभूति, जीवनी आदि के तत्वों के अलावा रामदरश मिश्र जी के सर्जना-संसार पर चिंतन-मनन और विश्लेषण भी पूरी रचनात्मक प्रासंगिकता के साथ उपलब्ध है। अधिकतर लेख ‘अध्येता-समय’ की डायरी की तरह हैं जो अपने अलग-अलग अस्तित्व को समेटते हुए संकलन के रूप में यहाँ हैं। पहले ही लेख ‘वह दिन’ में लेखिका के स्वतंत्र भावास्फुरण की झलक मिल जाती है। रामदरश जी से भेंटवार्ता के प्रसंगोपरांत यह वर्णन देखें -”साढे ग्यारह वर्षीया अपूर्वा और दस वर्षीया गिन्नी के बाल-सुलभ प्रश्नों और कौतूहल के रंगों में डूबी भीगी-भीगी सी दोपहर ऑटो के साथ-साथ भाग रही थी। बादलों को देखकर मिश्र जी की ‘यायावर बादल’ कविता याद आ रही थी”
रामदरश जी के व्यक्तित्व से परिचित कराते ललित लेखों में – ‘साहित्य का विन्ध्याचल’, ‘ एक गँवई व्यक्तित्व’ आदि हैं। एक स्थान पर रामदरश जी के विषय में लिखा गया है कि- ”महानगर की दीवाली की जगमगाहट के बीच उन्हें याद आने लगती है गाँव की दीवाली और उनकी स्मृति में जगमगा उठते हैं मिट्टी के दीये। दीयों का उजास उनकी शिराओं से फूटने लगता है और स्मृति में उभर आते हैं पूजाभाव से तेल ढारते हुए माँ और भाभी के हाथ।” ‘जहाज का पंछी’ जैसे लेखों की विशेषता यह है कि अनेक कथा-पात्रों को रचने वाले रामदरश जी इसमें स्वयं पात्र बनकर पाठकों के सामने हैं। बालक रामदरश को चलचित्र के रूप में देखना सुहाता है- ”मेले में ‘डह-डह-डग-डग, डह-डह-डग-डग-हुडुक्क, झाल ओर मृदंग के ताल पर नाचते नचनिया, छनछनाती हुई कड़ाहियाँ, गाड़ी की सीटी सुनकर रेलगाड़ी देखने की ललक, उस पर चढ़ने की ललक…..। इसी वर्तुल जिंदगी की गंध समेटे मिश्र जी का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है” A इस दौरान लेखिका की सजग विश्लेषणात्मिका-बुध्दि अपने समीक्ष्य की सामाजिक-चेतना के उत्सों को भी खोजती चलती है- ”उन्होनें अपमान, झिड़की और आत्महीनता से पीड़ित लोगों को रोटी के सवाल से जूझते हुए देखा है। इतना ही नही, यातना का अनवरत सिलसिला उस परिवेश में चलता रहता था। मालगुजारी के लिए कुर्क अमीन का दौरा, दरोगा जी का आतंक, कर्ज की वसूली के लिए किए गए तकाजे…न जाने कितने दर्दों का साक्षी रहा है उनका मन।”
‘प्रकृति के उल्लास में डूबा कवि मन’, ‘कविता की बासंती आभा”, ‘खूशबू घर से आती खुशबुएँ’ आदि लेखों के माध्यम से रामदरश मिश्र जी की कविताओं के प्रकृति-प्रेम का वैशिष्टय और भावनात्मक सौंदर्य तो दृष्टिगोचर होता ही है, लेखिका के स्वयं के प्रकृति-सापेक्ष उल्लास, भाषायी-भंगिमाऐं आदि अनायास प्रकट हो जाते हैं। एकात्मकता के कारण भावस्थ दृष्टि स्वयं लेखिका में उतरती हुई जान पड़ती है जो अध्येताओं में परम्पराओं के विस्तार के लिहाज से शुभ संकेत हुआ करते हैं।
‘रामदरश मिश्र की नारी-मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा’ तथा उनके ‘काव्य में जीवन-मूल्य’ आदि विचारप्रधान शोधात्मक लेख हैं, जिनमें लेखिका की विश्लेषणात्मक शैली का पता चलता है। एक स्थान पर लिखा गया है कि- ”मिश्र जी के उपन्यासों का मूल्यांकन करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे हाशिये पर खड़ी स्त्री को केन्द्र में लाये हैं। शोषण-तंत्रों की भली-भाँति पड़ताल करते हुए उन्होंने स्त्री-मुक्ति का मार्ग सही अथर्ाेंं में प्रशस्त किया है।”
उनके काव्य-संग्रहों की प्रकीर्ण समीक्षाओं से रूपाकार लेकर ”ऐसे में जब कभी’ में बहती रोशनी की नदी’, ‘ऊर्जस्वित बसंत……..जो कभी नहीं झरता (संदर्भ : आम के पत्तो)’, ”उस बच्चे की तलाश में’ – समय की आहटों से गूँजता कविता-संग्रह’, ‘तू ही बता ऐ जिन्दगी : जीवन की सघन गूँज में डूबी गज़लें’ आदि लेख हैं।
मिश्र जी की रचनाधर्मिता के उत्तारकाल (आयु के लिहाज से), उनके काव्य की अंतर्वस्तु, विषय-वैविध्य और संरचना पर ‘आज भी समय सत्य रचती है कलम’ व ‘संरचना-सौंदर्य’ शीर्षक से लेख हैं। मिश्र जी की शब्दावली और तकनीक पर पर्याप्त कोंणों से यहाँ प्रकाश डाला गया है। उनके आत्मकथांश पर ‘कच्चे रास्तों का सफर : जीवनानुभवों से अंतरंग साक्षात्कार’, ललित-निबंध-संग्रह पर ‘छोटे-छोटे सुख – उजास भरी यात्रा’, बारहवें उपन्यास ‘परिवार’ पर ‘परिवार : मानवीय जीवन-मूल्यों की उत्कर्ष यात्रा का दस्तावेज’ , डायरी पर ‘आते-जाते दिन : समय, साहित्य और जीवन से अंतरंग साक्षात्कार’ संग्रहित है।
पुस्तक के अंत में पाठकीय सर्जना-प्रतिभा के अनुरूप लेखिका की दस ऐसी कविताओं को जोड़ा गया है जो रामदरश जी के उपन्यासों को पढ़ते हुए रूपाकार ले चुकी थीं। लेखिका द्वारा किया गया यह विधांतरण औपन्यासिक समाज-चेतस का काव्यरूप तो है ही – रोचक भी है-
”कभी-कभी / पूरे का पूरा ‘पाण्डेपुरवा’ / जम जाता था मन के अन्दर /और दूभर हो उठता है / साँस के लिए रास्ता खोज पाना / पर तभी अचानक / तैरने लगते थे कुछ फाग, शिराओं में / चैत की पूनो खिलखिला उठती थी / और ढूँढ लेती थी तब एक साँस / चुपके से अपना रास्ता………” (‘पानी के प्राचीरों’ के साथ-साथ)
एक विशिष्ट व बहुआयामी रचनाकार, कथाकार व मनीषी – जिसका साहित्य मात्रात्मक व गुणात्मक, दोनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है – उस पर कार्य करतें हुए अकादमिक उपाधि प्राप्त करना एक बिंदु है, तथा इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आनंद, उल्लास व उमंग से भरी यात्रा का विषय बना लेना अध्येता की निजी सफलता है। यही निजी सफलता एक स्वतंत्र विधा का आस्वाद कराते हुए पाठकीय साधारणीकरण के साथ विस्तार पाती है।
‘माइन्ड द टारगेट बट एन्जॉय द जर्नी’ – रूपी तराजू के दोनों पलड़ों पर अपनी पकड़ बनाये रखते हुए लेखिका ने जो सृजन संवाद लिपिबध्द किया है उसमें एक ओर भावों व कल्पना की उड़ान है तो दूसरी तरफ उचित परिप्रेक्ष्य, उध्दरण व सन्दर्भों के लिए सर्तकता का वरण। प्रत्येक ललित लेख में रामदरश जी के सम्बन्ध में प्रतिष्ठित विचारकों के कथन, उनके उपन्यासों के पात्र, पात्रों की परिस्थितियाँ, कविताओं की पंक्तियाँ आदि को इस तरह पिरोया गया है कि कहीं जोड़ नहीं दीख पड़ता। क्या ही बात है कि यात्रा करते हुए मौसम के एक तेवर को देखकर अपने समीक्ष्य-कवि की एक पंक्ति याद आ जाये! पाठक को रामदरश जी के कई पहलुओं से अवगत कराने की ‘आयुर्वेदिक’ तरह की पध्दति इस पुस्तक में दृष्टिगत है।

-डॉ. रामकुमार सिंह