अरविंद कुमार सिंह जी का अचानक मुरैना आगमन और निवास पर बिताये कुछ पल…….ग्वालियर में स्नातक-शिक्षक हिन्दी के आगामी सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविर में अपने पाठ पर चर्चा के लिए डाॅ. रामकुमार सिंह ने किया पधारने का आग्रह

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मुरैना/23 अप्रेल 2016 / राज्यसभा चैनल के संपादक, संसदीय और कृषि मामलों के प्रभारी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा  कृषि पत्रकारिता के देश के शिखर सम्मान चाौधरी चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित और सबसे बढ़कर हमारी पाठ्यपुस्तक कक्षा-8  वीं की ‘बसंत’ में ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनियाँ’ पाठ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह राज्यसभा चैनल की अपनी टीम के साथ देश में जलसंकट की पड़ताल करने निकले हैं। चम्बल, बुंदलेखण्ड से होते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती वे इलाके जहाँ जलसंकट के कारण कृषि और किसानों की चिंता का साझा करना सारे देश की जरूरत बन गई है, हम सबकी ओर से अरविंद जी एक सोद्देश्य यायावर की तरह लम्बी यात्रा पर हैं। ग्वालियर-चम्बल से वे गुजरें और मुरैना में अपने आत्मीयजन को खबर न दें यह संभव ही नहीं, बस! फिर क्या था आज शाम लगभग 8ः30 बजे वे मुरैना में डाॅ. रामकुमार सिंह के निवास पर पधारे। आग्रह करने पर भोजन भी किया और बच्चों को शुभाशीष दिया। कुमारी वैष्णव और शैव ने संगीतमय रामकथा सुनाई तो अपनी प्रिय कलम उन्होंने पुरस्कार में दे दी। डाॅ. रामकुमार सिंह ने उनसे आग्रह किया यदि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों की यात्रा से लौटते समय अथवा जहां भी वे 18 से 29 मई 2016 में हों, कृपया ग्वालियर पधारें और स्नातकशिक्षक- हिन्दी के सेवाकालीन प्रशिक्षण में पधारें। डाॅ. सिंह ने पाठ्यक्रम निदेशक एवं प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 सुश्री राजकुमारी निगम एवं समस्त दल की ओर से उन्हें इस हेतु अतिथि विद्वान के रूप में आमंत्रित किया।

 

मुरैना में 23 अप्रेल की शाम श्री अरविंद कुमार जी साथ ऐतिहासिक क्षण

इस दौरान वे पूरे समय के देश के जलसंकट, जल सहेजने से हम लोगों द्वारा किये गये परहेज के कारण उत्पन्न भयावह स्थिति के बारे में बताते रहे। किस तरह जल को परिवहन से दूर-दूर तक पहुंचाने की स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता और जल को महत्वहीन वस्तु की तरह बहाने के दुष्परिणामों के प्रति उनके स्वयं के देश भर के भ्रमण और जानकारियों ने हमारे रोंगटे खड़े कर दिये। इस दौरान उनके साथियों के अतिरिक्त निवास पर नईदुनिया-जागरण समूह के वन्यजीवन विशेषज्ञ पत्रकार शिवप्रताप सिंह भी उपस्थित रहे।
बातों ही बातों में उनसे चर्चा करने पर जानकारी मिली कि द्विवेदी युग के मूर्धन्य व्यक्तित्व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी पर अभूतपूर्व, दुर्लभ और ऐतिहासिक अभिनंदन ग्रंथ को सामने लाने का महत् कार्य उनके द्वारा किस तरह सम्पन्न हो गया। उनका देश भर में भ्रमण पर रहना, सूक्ष्म-पर्यवेक्षण और जनमानस को कुछ न कुछ प्रदाय करने की उत्कट भावना के चलते ही यह संभव हुआ। गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार से लेकर राष्ट्रपति पुरस्कार और कृषि पत्रकारिता के देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने पर भी अरविंद कुमार जी में वही सादगी बरकार है जो दशकों में कभी नहीं बदली। बिल्कुल भारत रत्न उस्ताद बिसिमिल्लाह खान वाली सादगी। वे कभी पूर्वोत्तर के बोडो इलाके में होते हैं तो कभी तेलंगाना, कभी चम्बल तो कभी मराठवाड़ा। उनकी ग्रामीण चैपालों की श्रृंखला ने राज्यसभा ही नहीं महामहिम को भी अपना प्रभावित दर्शक बना लिया।
लगभग 10 बजे उनका काफिला ग्वालियर की ओर रवाना हो गया। इदम् ज्ञानम् सभाकक्ष उनकी उपस्थिति से धन्य हुआ। जयंत जी द्वारा सूचित करने पर उनका हृदय से आभार।

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2015 में अरविंद कुमार जी को पटना में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 87वें समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश के कृषि पत्रकारिता के शिखर सम्मान, चौ.चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता से  सम्मानित किया। यह पुरस्कार इलेक्ट्रानिक मीडिया श्रेणी में मिला । इस समारोह में बिहार और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी, केंद्रीय कृषि मत्री श्री राधा मोहन सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार और कृषि क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां और कृषि वैज्ञानिक मौजूद थे।

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(भारतीय डाक विभाग की श्री अरविंद कुमार सिंह जी से विशेष आत्मीयता है। क्यों न हो, तकनीकी हमले के दौर में वे ही तो हैं जो चिट्ठियों की हामी भरते है। उनकी पुस्तक भारतीय डाक का अनुवाद भारतीय और विदेशी अनेक भाषाओं में हो चुका है। डाक टिकिट यहां दर्शनीय है।)

हिंदी जगत को एक अनूठी भेंट दी श्री अरविंद कुमार सिंह जी ने

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ – 82 साल बाद फिर से प्रकाशन

हिंदी की इसी ऐतिहासिक धरोहर के लोकार्पण समारोह का आयोजन 20 सितंबर 2015 को

50 प्रवासी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ पर हुआ।

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राजधानी के प्रवासी भवन में ऐतिहासिक द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण के मौके पर साहित्यिक हस्तियों और पत्रकारों के साथ राजधानी में साहित्यप्रेमियों का समागम हुआ। आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में प्रकाशित हिंदी का पहला अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ दशा को प्राप्त था। 83 सालों के बाद इस ग्रंथ को हूबहू पुनर्प्रकाशित करने का काम नेशनल बुक ट्स्ट, इंडिया ने किया । आज के संदर्भ में इस ग्रंथ की उपयोगिता पर मैनेजर पांडेय का एक सारगर्भित लेख भी है।

ग्रंथ के लोकार्पण और विमर्श के मौके पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और विख्यात लेखक डॉ.विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग-प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में विभाजित हो चुकी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान और किसानों के लिए भी लिखते थे। हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्रारंभ द्विवेदी जी से ही हुआ।’’
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मैनेजर पांडे ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि, “यह भारतीय साहित्य का विश्वकोश है।” उन्होंने आचार्य जी की अर्थशास्त्र में रूचि व‘‘संपत्ति शास्त्र’’ के लेखन, उनकी महिला विमर्श और किसानों की समस्या पर लेखन की विस्तृत चर्चा की। इस ग्रंथ में उपयोग की गयीं दुर्लभ चित्रों को अपनी चर्चा का विषय बनाते हुए गांधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र ने इन चित्रों में निहित सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने नंदलाल बोस की कृति ‘‘रूधिर’’ और अप्पा साहब की कृति ‘‘मोलभाव’’ पर विशेष ध्यान दिलाते हुए उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया और कहा कि सकारात्मक कार्य करने वाले जो भी केन्द्र हैं उनका विकेन्द्रीकरण जरूरी है।

‘नीदरलैड से पधारीं प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि हिंदी सही मायने में उन घरों में ताकतवर है जहाँ पर भारतीय संस्कृति बसती है। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की निदेशक व असमिया में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका डॉ. रीटा चौधरी ने कहा कि, यह अवसर न्यास के लिए बेहद गौरवपूर्ण व महत्वपूर्ण है कि हम इस अनूठे ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन के कार्य से जुड़ पाए। ऐसी पुस्तकों का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी होना चाहिए। डॉ. चौधरी ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ हिंदी का ही नहीं बल्कि भारतीयता का ग्रंथ है और उस काल का भारत-दर्शन है।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय ने इन दिनों मुद्रित होने वाले नामी गिरामी लोगों के अभिनंदन ग्रंथों की चर्चा करते हुए कहा कि, “ऐसे ग्रंथों को लोग घर में रखने से परहेज करते हैं, लेकिन आचार्य द्विवेदी की स्मृति में प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य,समाज, भाषा व ज्ञान का विमर्ष है न कि आचार्य द्विवेदी का प्रशंसा-ग्रंथ।” इस ग्रंथ की प्रासंगिकता व इसकी साहित्यिक महत्व को उल्लेखित करते हुए श्री राय ने यहां तक कहा कि, “यह ग्रंथ अपने आप में एक विश्व हिन्दी सम्मेलन है।”
कार्यक्रम के प्रारंभ में पत्रकार गौरव अवस्थी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी स्मृतियों को पावर प्वाइंट के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रेजेंटेशन यह बात उभर कर सामने आयी कि किस तरह से रायबरेली का आम आदमी, मजूदर व किसान भी आचार्य द्विवेदी जी के प्रति स्नेह-भाव रखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने इस ग्रंथ के प्रकाशन के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट और रायबरेली की जनता को धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के संपादकीय और रेल जीवन पर भी काम करने की जरूरत है।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी ने किया।

सन् 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य द्विवेदी के सम्मान में प्रकाशित इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के पत्र के साथ भारत रत्न भगवान दास, ग्रियर्सन, प्रेमंचद, सुमित्रानंदन पंत, काशीप्रसाद जायसवाल,सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उस दौर की तमाम दिग्गज हस्तियों की रचनाएं और लेख है। वैसे तो इस ग्रंथ का नाम अभिनंदन ग्रंथ है और आचार्यजी के सम्मान में प्रकाशित हुआ लेकिन आज कल जैसी परिकल्पना से परे इसमें आचार्य जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ही नहीं साहित्य की तमाम विधाओं पर गहन मंथन है।

इस समारोह में विख्यात लेखक रंजन जैदी, अर्चना राजहंस, योजना के संपादक ऋतेश, राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के महासचिव शिवेंद्र द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे, जय प्रकाश पांडेय, राकेश पांडेय, संपादक प्रदीप जैन, भाषा सहोदरी के संयोजक जयकांत मिश्रा, विख्यात कवि जय सिंह आर्य,देवेंद्र सिंह राजपूत,शाह आलम, विनय द्विवेदी, गणेश शंकर श्रीवास्तव, बरखा वर्षा, तरुण दवे समेत तमाम प्रमुख लोग मौजूद थे।

 

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अरविंद कुमार सिंह का पूर्ण सम्पर्क/पता यहाँ खासतौर पर ‘सर्जना’ के माध्यम से प्रस्तुत है:

अरविंद कुमार सिंह जी

वरिष्ठ संपादक,राज्य सभा टीवी, भारतीय संसद

अध्यक्ष, रायटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली

12 ए, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड, संसद भवन के पास नयी दिल्ली 110001

फोन-9810082873, 9811180970

ईमेल-arvindksingh.rstv@gmail.com, arvind.singh@rstv.nic.in

 

 

इकत्तीस छिपकलियों का भय :

31 साल पहले का एक धुँधला पन्ना

‘‘जमाने के सलीब पर / लटका हुआ मैं
और मेरा अहं : / इकत्तीस छिपकलियों के भय से
सकपकाती प्रतिभा के साथ / पिछले दिनों मेरी शक्ति
रिस-रिस कर चू गई / और अनेक भावात्मक आँखें
मित्र बनकर देखती रहीं / आज
प्रश्‍न है – / इन कीडे मच्छरों के
अभिनंदन स्वीकार करने का / रह जाता है अनुत्तरित।’’
(कवि गोपाल सिंह)

पुस्तकालय के एक पुराने धूल जमे खाने से धूल झड़ाकर उठाता हूँ एक किताब। पुरानी और पतली किताब। नीले रंग की जिल्द लाल धूल से एक अजीब रंग की हो गई है। लेकिन पूरी तरह सुरक्षित। पुराने समय की प्रिंटिग एक अलग तरह का आकर्षण मेरे लिये पैदा कर रही है। किताब का पहला पन्ना पलटता हूँ तो डूबता चला जाता हूँ। मेरे लिए यह किताब एक खास तरह की हो जाती है। लगता है इकत्तीस साल पहले जा खड़ा हूँ। मैं चौंक उठता हूँ इन कविताओं को पढ़ते हुए………..। क्या इतिहास एक बार फिर उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ दो व्यक्ति अलग-अलग समय के होते हुए भी एकाकार हो जाते हैं।
ये किताब है ‘रक्त-संध्या‘। पहले पन्ने पर ही दर्ज है कवि का नाम – गोपाल सिंह, स्नातकोत्तर अध्यापक (हिन्दी), डोनीमलाई कर्नाटक। किताब के छपने की तारीख है – 24 जुलाई 1978। किताब अरविंद प्रिंटिंग प्रेस हैदराबाद में छपी।
कवि गोपाल सिंह ‘अपनी बात‘ में लिखते हैं- ‘’रक्त-संध्या की कुछ कविताएँ 1970 के पूर्व की हैं तब में रांची विश्‍वविद्यालय का छात्र था। संभावना, ‘पुटुष‘ ‘स्थापना‘ आदि पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। स्थानांतरण के कारण कई कविताएँ अव्यवस्थित हो गईं जिनका प्रकाशन नहीं करा सका। मैंने इकतीस वर्ष पार करने के अवसर पर अपनी कविताओं के प्रकाशन का निर्णय किया। इस समय डोनीमलाई (कर्नाटक) में हूँ। यहाँ लिखी गई अधिकांश कविताएँ इस संकलन में शामिल हैं। इसलिए ‘रक्त-संध्या‘ पढ़ते समय यह परिवेश ही आधार होना चाहिए।‘‘ (गोपाल सिंह)
इस तरह पता चलता है कि कवि गोपाल सिंह 31 साल के हो गये थे तब ये किताब सामने आयी थी। यह बात सन् 1978 की है। यह मेरा जन्मवर्ष था। और इस किताब के 31 साल के होने पर सन् 2009 में, मैं उसी पद पर आया जिस पर 31 साल पहले श्री गोपालसिंह थे। यह एक ऐसा साहित्यिक संयोग है जो मेरे लिए विशेष है। उनकी अनेक कविताओं से उस समय यहाँ के क्षेत्र की सुविधाविहीन स्थितियों का पता चलता है। ऐसे कठिन समय में वे यहाँ शिक्षक रहते हुए साहित्य-साधना करते रहे। यह सोचकर ही हृदय भर आता है। उनकी एक कविता में ये 31 छिपकलियों का भय जो उनकी कविताओं में है वह उनकी उम्र के 31 सालों के अलावा दरअसल उस समय यहां की सुविधाहीनता के परिवेश को भी दर्शाता है। उनकी ‘रोजनामचा‘ कविता देखिये-
‘‘मेरे बिस्तर पर /पूरा परिवार /पुस्तकालय / दफ्तर और दवाखाना है : /मेरा रोजनामचा / अब / कड़वी या कषैली /मीठी या तिक्त /गंध नहीं आती/सब बकबासनुमा है/जिंदगी का विस्तार / या / संकुचन / फाहियान से / सोल्झेनित्सिन या/ हेमिंग्वे तक/रहट से उड़नतस्तरी तक / कूद-फाँदकर /बिस्तरनुमा होना है।‘‘
वास्तव में गोपालसिंह जी का अध्ययन और जानकारी भी इसी प्रकार विस्तृत थी। उनके सामने हम आज की पीढ़ी का अध्ययन और ज्ञान बहुत सीमित लगता है। इतना ही नहीं पुस्तक यह भी बताती है कि किस प्रकार उस युग की परिस्थितियों के प्रति यह शिक्षक सचेत था। उनकी एक और कविता है ‘बाजार‘। आज जबकि बाजारवाद का हल्ला है, 31 साल पहले की यह कविता देखिये-
‘‘ यह / बाजार है / यहाँ /सभी चीजें /बिकती हैं / भाषण / प्रमाण-पत्र / टूटता विश्‍वास / खुदगर्जी / दम तोड़ती आस्तिकता-नैतिकता / लापरवाही / बंजारापन/ अंजीर / आम / कपड़ा / और भूख भी। / चीजें गूँगी हैं / विक्रेता बहरा / तमाशाई अंधा /सिर्फ क्रेता की आँखें सतेज हैं / मालूम नहीं कि / लोग चीजों की दोहरी कीमतें क्यों चुकाते हैं‘‘
गोपाल सिंह जी ‘परिवेश‘ कविता एक लम्बी कविता है जो अनायास ही मुक्तिबोध की याद दिला जाती है। सत्तर-अस्सी के दशक का यह परिवेश रूप बदलकर फिर हमारे सामने है –
‘‘घिरे हैं हम सब एक परिवेश से/तकिया कलाम यह परिवेश……….कपड़ा वही है / दोहरी पीठ के बदले में /दोहरी कालर की कमीज है/सिलाई शुल्क वही है / सिर्फ रोशनी नई है / इतिहास नहीं‘
इतिहास नहीं बदलता। यह फिर – फिरकर हमें उन्हीं मोड़ों पर लाकर खड़ा करता है। गोपाल सिंह जी प्रबुद्ध और संघर्षशील शिक्षक रहे होंगे। आजकल वे जहाँ भी होंगे संभवतः सेवानिवृत होकर स्वस्थ जीवन यापन कर रहे होंगे। कविताओं मे उनका युवा-आक्रोश से भरा चेहरा ही हमारे सामने है। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूँ जहाँ सुविधाओं की परवाह न करते हुए गोपालसिंह जी जैसे शिक्षकों ने बैठकर इसकी गरिमा बढ़ाई। बार-बार सोचता हूँ क्या हमारी पीढ़ी अपने अग्रजों का उत्तराधिकार लेने में सफल हो रही है। सन् 1978 में ही ‘चकोर‘ सूर्यप्रताप सिंह, एंड्रूज गंज, नयी दिल्ली-49 इस किताब की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘गोपाल सिंह केन्द्रीय विद्यालय संगठन के उन रचनाधर्मी अध्यापकों में से हैं जो विद्यार्थी, श्यामपट और ग्रहकार्य के अतिरिक्त अपनी प्रतिभा और मेहनत का रचनात्मक उपयोग करना जानते हैं। देश को ऐसे अध्यापकों की आवश्‍यकता है – विशेषकर अहिन्दीभाषी प्रदेशों में। हिन्दी भाषा आज जिस स्थिति से गुजर रही है, जैसी धार और मार सह रही है उसका अंदाज दिल्ली या पटना या भोपाल से नहीं लगाया जा सकता। वह तो डोनीमलाई जैसी जगह का हिन्दी-प्रेमी ही बता सकता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहुँच जाने के बाद भी रसोई में वह अछूत है। देश की मानसिकता बदलेगी- अध्यवसाय चाहिए।‘‘(चकोर सूर्यप्रताप सिंह)
आज इकत्तीस छिपकलियों का डर नहीं। मेरा परिवेश सर्वसुविधायुक्त है। पर मैं अनुभव कर सकता हूँ इस भय को। आज के इस भय में अनेक परिवेशगत भय छुपे हैं। इस देश और समाज के। नमन करता हूँ गोपाल सिंह जी को। 31 – 31 साल के दो कालखंडों को ।

समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे

: तीसरे सप्‍तक में कुँवर नारायण…………..

‘तीसरा सप्‍तक’ उठाता हूँ। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रथम संस्‍करण 1959 में छपा, अज्ञेय के सम्‍पादन में। मेरे हाथ में चौथा संस्‍करण अगस्‍त 1979 है। हर परीक्षा में सप्‍तकों पर प्रश्‍न रहा करते, इसलिए सप्‍तक और अज्ञेय के नाम के प्रति एक आकर्षण इन सवालों ने बना रखा था। अज्ञेय लिखित भूमिका में डूबते-तिरते हुए नामों की सूची पर नजर डालता हूँ वे नाम जो हर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते रहे………..5 वें क्रम पर जाकर ठहरता हूँ, …… कुंवर नारायण। पिछले दिनों उनकी ज्ञानपीठ रचना ‘बाजश्रवा के बहाने पढ़ रहा था। ‘तीसरा सप्‍तक’ हाथ आया तो इस नजरिये के साथ प्रवेश किया कि देखें तो सही शुरूआती कुंवर नारायण से ज्ञानपीठ कुंवर नारायण तक सर्जना के सोपान किस तरह चढ़े हैं।
कुंवर जी के परिचय और वक्‍तव्‍य( 146 से 151) में जो बिंदास लगा वह रेखांकित कर लिया-
एक – ‘’शिक्षा की जो पद्धति स्‍कूल, कॉलेज या विश्‍वविद्यालय में रही, उस से मन सदा विद्रोह करता रहा, इस लिए शायद स्‍कूली अर्थ में कभी भी बहुत उत्‍कृष्‍ट विद्यार्थी नहीं हो सका।‘’
दो- आरम्‍भ से ही पढ़ने और घूमने का बहुत शौक रहा है, और दोनों के लिए पर्याप्‍त अवसर भी मिलता रहा। सन् 1955 ई में चेकोस्‍लोवाकिया, पोलैण्‍ड, रूस और चीन का भ्रमण किया-‘ यह कइ तरह से महत्‍वपूर्ण रहा’
तीन – ‘कविता पहले-पहल सन् 1947 में अंगरेजी में लिखना आरम्‍भ किया, पर शीघ्र ही हिन्‍दी की ओर प्रव्रत्‍ति हुई और तब से नियमित रूप से हिन्‍दी में लिखने लगा।‘
चार – सन् 1956 से, उस पत्रिका के बन्‍द होने तक, युगचेतना के सम्‍पादक मण्‍डल में रहे। अब मोटर के व्‍यवसाय में मुब्‍ितला रहते हैं – और अपनी इस व्‍यस्‍तता से स्‍वयं त्रस्‍त हैं : ‘ फिक्रे-दुनिया में सर खपाता हूँ, मैं कहां और ये बवाल कहां’
पांच – ‘’साहित्‍य जब सीधे जीवन से सम्‍पर्क छोड़कर वादग्रस्‍त होने लगता है, तभी उस में वे तत्‍व उत्‍पन्‍न होते हैं जो उस के स्‍वाभाविक विकास में बाधक हों। जीवन से सम्‍पर्क का अर्थ केवल अनुभव मात्र नहीं, बल्‍िक वह अनुभूति और मनन-शक्‍ित भी है जो अनुभव के प्रति तीव्र और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया कर सके।‘’
छह- ‘ जीवन के इस बहुत बडे ‘कार्निवाल’ में कवि उस बहुरूपिये की तरह है जो हजारों रूपों में लोगों के सामने आता है, जिस का हर मनोरंजक रूप किसी न किसी सतह पर जीवन की एक अनुभूत व्‍याख्‍या है और जिस के हर रूप के पीछे उस का एक अपना गम्‍भीर और असली व्‍यक्‍ित्‍व होता है जो इस सारी विविधता के बुनियादी खेल को समझता है।‘’

कुंवर जी कुल 21 कविताएं तीसरे सप्‍तक में हैं। कुछ ही कविताएं समकालीन कविता के उस रूप का संकेत करती हैं जिसके लिए कुंवर नारायण जाने जाते हैं। मिथकीय चेतना के उच्‍चतम सोपान पर पहुंचे कुंवर नारायण की ‘सम्‍पाती’ जैसी कविता इस लिहाज से रेखांकनीय हो जाती है। शब्‍दों की जो मितव्‍ययता कुंवर जी की खास पहचान है उसका संकेत उनकी प्रारंभिक कविताओं से ही चला आया है। कुछ कविताएं आम आदमी की उदासी की हैं तो कुछ प्रक़ति का नये ढंग से अवलोकन, कुछ बाल कविताएं सी प्रतीत होती हैं, मगर हैं प्रौढ सत्‍य को लेकर। मुझे सर्वाधिक प्रभावित करने वाली दो कविताएं यहां हैं – ‘सम्‍पाती’ और ‘घर रहेंगे’
एक – ‘गहरा स्‍वप्‍न’ : ‘’सत्‍य से कहीं अधिक स्‍वप्‍न वह गहरा था / प्राण जिन प्रपंचों में एक नींद ठहरा था’’
दो – ‘दो बत्‍तखें : ‘दोनों ही बत्‍तख हैं / दोनों ही मानी हैं / छोटी-सी तलैया के/ राजा और रानी हैं’’
तीन- सम्‍पाती : ‘ धीमा कर दो प्रकाश/ घायल, सूर्योन्‍मुख,/ असंतुष्‍ट, उत्‍पाती:/फेनों का विप्‍लव बन/ लहरों पर तितर-बितर/ दग्‍ध-पंख सम्‍पाती :/ठण्‍डे अंधेरे के एक सुखद फाहे को/ जलती शिराओं पर ….. /धीमा कर दो प्रकाश । / मोम की दीवारें /गल न जायें,/ सपनों के लाक्षागृह/ / जल न जायें, / प्‍यार के पैमाने / -दृवित नेत्र – / छल न जायें…./ धीमा कर दो प्रकाश / कॉंच के गुब्‍बारे, / सोने की मछलियॉं /कुछ नकली चेहरे / कुछ मिली-जुली आकृतियाँ, / ओस की बूँदों-से चमक रहे रजत-द्वीप / घुल न जायें…../ धीमा कर दो प्रकाश । / पर्णकुटी की छाया शीतल है, / पॉंवों के नीचे फिर धरती का दृढ़ तल है/ गर्म देह/ नील नयन / क्षितिज पार / उड्डयन,/ प्राणों में एक जलन / उस ज्‍वलन्‍त ऑंधी की/ स्‍मृतियॉं / फिर न मिल जाऍं / धीमा कर दो प्रकाश।’
चार : ”घर रहेंगे, हमीं उन में रह न पायेंगे : समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे :
अनर्गल जिंदगी ढोते हुए किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जायेंगे।
मृत्‍यु होगी खड़ी सन्‍मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविध, स्‍वप्‍न खोके, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।”