गांधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?

दस साल बाद……इस अग्रलेख के बारे में :-

यह अग्रलेख प्रथम बार 2 अक्टूबर सन् 2000 को नवभारत समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर ‘गांधी जयंती पर विशेष’ सामग्री के रूप में प्रकाशित हुआ था। उस समय नवभारत ग्वालियर संस्करण के सम्पादक श्री राकेश पाठक जी थे जो वर्तमान में आलोक मेहता जी के यशस्वी समूह-सम्पादन में नई दुनिया ग्वालियर संस्करण के सम्पादक हैं। पश्चात यह अग्रलेख डॉ. राम विद्रोही जी के सम्पादन में प्रकाशित दैनिक आचरण तथा श्री रघुवीर सिंह जी के प्रधान सम्पादन में प्रकाशित दैनिक मध्यराज्य में भी अनुप्रकाशित हुआ। आभार व्यक्त करते हुए ‘पुर्नप्रकाशन’ श्रेणी में ‘सर्जना’ पर यथावत जारी कर रहा हूँ। दस साल बाद परिस्थितियाँ बदली हैं। गांधीवाद का बाजारू चेहरा ‘गांधीगिरी’ भी इस दौरान सामने आया। उसके कुछ व्यावाहारिक प्रयोग भी खबरों में आये। हाल ही में प्रसिध्द चिंतक गिरिराज किशोरजी की गांधीजी पर एक और पुस्तक ‘गांधी को फांसी दो’ आयी है। शीर्षक का मतलब यह है कि दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी द्वारा चलाये गये आंदोलन से घबराये गोरों की वहाँ यही आवाज थी। ‘पहला गिरमिटिया’ से लेकर ‘गांधी को फांसी दो’ तक गिरिराज जी की पुस्तकें निश्चित रूप गांधी जी की प्रासंगिकता पर नित नया अनुसंधान है।
….अस्तु बिना कोई परिवर्तन किये जारी किये जा रहे इस अग्रलेख को आप तत्कालीन दृष्टिकोंण से देखें और अग्रलेख की प्रासंगिकता इस 30 जनवरी 2010 को तय करें…………….

गांधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?
(रामकुमार सिंह/ दैनिक नवभारत/ग्वालियर संस्करण/2 अक्टूबर 2010)

कॉलेज के दिनों में हमने कई बार एक नाटक का मंचन किया था जिसकी विषयवस्तु ये थी कि गांधी की प्रतिमा से एक-एक करके घड़ी, चश्मा, लाठी, चादर और धोती तक उतार ली जाती है। ऐसा करने वाले किरदार भले ही शराबी, जुआरी, धूर्त या मवाली प्रकार के दर्शाये गये हों लेकिन वस्तुत: गांधी के चीरहरण को मंचीय अभिव्यक्ति मिलने का स्रोत हम हैं। हमारा समाज, कथित राष्ट्रीय नागरिक, सभ्य और सुसंस्कृत व्यक्ति तथा संसद से लेकर सड़कों तक राष्ट्रपिता का यह देश…।
यदि 2 अक्टूबर 1869 से 30 जनवरी 1948 तक एक मामूली आदमी की कहानी गांधी है, पागलों की तरह हाथ में लाठी लेकर घूमने वाला एक अदना फकीर गांधी है, एक सिरफिरे की गोली से निढाल हो चुका शरीर गांधी है, यदि माल्यार्पण के लिए दीवार पर टंगी तस्वीर का नाम गांधी है, तो निश्चित तौर पर मान लीजिये कि गांधी कभी पैदा ही नहीं हुआ, औपचारिक प्रलाप मत कीजिये, गांधी अप्रासंगिक है।…..मगर आप यदि इससे ज्यादा मानते हैं, आप स्वीकार करते हैं कि गांधी एक समग्र जीवन है, व्यापक चेतना है, दर्शन है और विचारधारा है। आप इस तरह मानते हैं गांधी को, कि यह फटेहालों का लोकतंत्र है, गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की अर्थव्यवस्था है, समता है, रामराज, स्वराज और सुराज गांधी है। शब्दकोश में स्वतंत्रता का अर्थ गांधी है। दलितों का सौजन्य गांधी है। सामाजिक न्याय, समरसता और सर्वोदय गांधी है, ट्रस्टीशिप सिध्दांत गांधी है। यदि ऐसा मानते हैं आप तो यकीन मानिये कि गांधी का दम घुटना अब शुरू हुआ है, आज गांधी अंतिम साँसें ले रहा है। 2 अक्टूबर 1869 इतिहास का दिन नहीं है। गांधी नाम के आदमी का जन्म ऐतिहासिक घटना नहीं है। इतिहास तब घटित हुआ जब गांधी, गांधीवाद बन गया। वह गांधी जो एक सीमाबध्द जीवन का नाम नहीं हो सकता, वह गांधी जो कालजयी विचार बन गया। तो 30 जनवरी 1948 को भी दर्ज मत मानिये। इस दिन भी कोई इतिहास खत्म नहीं हुआ। एक शरीर का स्खलन ऐतिहासिक घटना नहीं हो सकती। काला पृष्ठ तो आज लिखा जा रहा है। जी हाँ, गांधी की कहानी आज अंतिम सांसे ले रही है। जबकि हम पूरे प्राणप्रण से गांधी को दफनाने की तैयारी कर चुके हैं। हम नहीं चाहते कि गांधी जीवित रहे, प्रासंगिक रहे या दुबारा पैदा हो इसलिये गांधी की प्राणवायु को अवरुध्द करने के सारे इंतजामात कर लिए गए हैं। अब हम गांधी को फौलादी ताबूत में जड़ना चाहते हैं। पंडित नेहरू रुंधे गले से जिस गांधी के चिरनिद्रा में विलीन होने की घोषणा न कर सके और जिसे सदैव एक दिये की तरह प्रज्वलित माना, हम नहीं चाहते कि वह दिया अपने छद्म अंत के बाद भी प्रकाशित हो इसलिए उस कथित अंत को वास्तविक अर्थ प्रदान करने की पुरजोर कोशिशें की जा रहीं हैैं। स्वराज और रामराज के रूप में गांधी क्या इसलिए जीवित रहे ताकि शासक और शासित के बीच विभाजित मिथ्या लोकतंत्र देख सके? इसलिये कि अपने सपनों के भारत में राजा ‘राम’ को गरीबी, भुखमरी और असंतोष पर धनुर्विद्या का प्रयोग करने की बजाय संसदीय मंच पर माइक्रोफोन-संधान और जूतमपैजार का अभ्यास करते हुए देख सके?
न्याय, समता और सर्वोदय के रूप में क्या गांधी यहाँ जीवित रह सकेगा जहां सामाजिक समरसता और सौजन्य के लिए कानून अंधा, अपूर्ण और अपंग साबित हो? उस व्यवस्था को स्थापित देख सकेगा जिससे विलंबित न्याय की प्रतीक्षा में ऑंखें मृत हो जाती हों और जिससे न्याय की अपेक्षा वो करे जो जिसके लोहे के पैर, चांदी के हाथ और सोने की जेब हो? जहां अकर्मण्यता इतनी निरीह बना दे कि सभी क्षेत्रों में समानता का स्तर बनाने के लिए ‘दुर्बलों को संरक्षण’ के नाम पर वर्ग-संघर्ष को न्यौता देने के अलावा कोई चारा न रह जाये? क्या गांधी इसलिए जीवित रहे कि दलितों को दिये गये सह-सम्बन्ध के सौम्य प्रतीक ‘हरिजन’ को अभिशाप के मायने मिलते देख सके?
भारतीय परिवेश के सर्वथा अनुकूल गांधीवादी आर्थिक मॉडल व ट्रस्टीशिप सिध्दांत के रूप में गांधी को चिरकाल तक प्रासंगिक रखने की अभिलाषा क्यों की गई? राष्ट्रीय विकास का प्रतीक चरखा क्यों माना गया? छोटे हाथों को स्वालम्बन देने की पुकार क्यों की गई? इसलिए ताकि आज हम अमेरिकी डॉलर के लिए भारतीय दरवाजे खोल दें? इसलिए कि हमारा पहला सरोकार अपने लोगों के जीवन-स्तर में विषमता की अंतहीन खाई को पाटने की बजाये अमीर देशों के लिए बाजार बनकर उपलब्ध हो जाना भर हो?। इसलिए कि हम 85 करोड़ लोगों की सूखी अंतड़ियां भूलकर 15 करोड़ कुबेरों को विदेशी विनिमेश का उपभोक्ता बनाने पर आमादा हो जाये? इस हवा में गांधी सांस ले सकेगा जिसमें अपने लोगों की गरीबी, बेरोजगारी, साधनहीनता और सहायता भूलकर हम विश्व-बैंक, मुद्राकोष और विश्व-व्यापार संगठन की चकाचौंध में विकास का मिथ्या उद्धोष करते फिर रहे हैं। हरेक घर में एक कम्प्यूटर पहुंचाने की बात कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि अभी दस घरों के बीच एक चूल्हा जलाने का प्रबंध भी हम नहीं कर सके हैं। गांधी नहीं रह सकेगा इस तरह जीवित यदि हमने तीन चौथाई लोगों को हाशिये पर उतारने का निश्चय कर लिया है।
राष्ट्र का सच्चा प्रतिनिधि होने के नाते विश्व सम्मेलनों में भी घुटनों तक धोती और पतली चादर ओढ़कर जाने वाला यह नंगा फकीर, हमारा राष्ट्रपिता आज राष्ट्र की दुर्दशा का सहचर बनकर जीवित बना रहता यदि हमने अपनी फटेहाली को छुपाने का प्रबंध न किया होता। काश! हमने क्लिंटन की यात्रा के दौरान अपने पैबंदों की लीपापोती का प्रयत्न न किया होता। अपने बाप को जींस-टी शर्ट पहनाने की कोशिशें न की होती। अमेरिका में गांधी की प्रतिमा स्थापित होने पर खीसें न निपोरी होतीं और इसे भारत के लिए अपार गौरव का विषय कहकर गांधी के सहज महत्त्व को स्वीकार करने से इंकार न किया होता , तो आज गांधी शायद जीवित बना रहता।
राजनीति का धर्म और नैतिकता से तादात्म्य स्थापित करने वाले, राजनीतिक व्यवहार के लिए अहिंसा को वैश्विक मान्यता दिलाने वाले वाले, सत्याग्रह, उपवास और हड़ताल को लोक और तंत्र के बीच वार्तालाप का सशक्त जरिया बनाने वाले गांधी को हम यह दिखाने लिए जीवित रखना चाहते हैं कि उड़ीसा में हमने एक निर्दोष धर्म प्रचारक को उसके मासूम बच्चों सहित जिंदा जला दिया? बिहार को स्वतंत्र शक्तियों की रणभूमि बन जाने दिया? राष्ट्रपिता को हम ये बतायेंगे कि पश्चिम बंगाल में सड़कों पर हुए रक्तपात का कारण राजनीतिक आकाओं द्वारा भरा गया उन्माद मात्र था और जहाँ मुख्यमंत्री ने खुलेआम यह फतवा जारी किया कि हिंसा का प्रत्युत्तार हिंसा से दिया जायेगा? हम गांधी का पुनर्जन्म चाहते हैं ताकि वह धूर्त और स्वार्थी लोगों के हाथों सत्याग्रह का सत्यानाश, हड़ताल की हंसी और उपवास का उपहास देख सके? यदि इसलिये हमें गांधी चाहिये तो व्यर्थ औपचारिकतायें न करें, उसका दम घुट चुका है।
सच तो यही है कि हम गांधी को बीसवीं शताब्दी में ही दफना चुके हैं। हम नहीं चाहते कि वो दुबारा पैदा हो। हमें गवारा नहीं कि हमारे घर में बुध्द या बापू पैदा हों, नंगे फकीर पैदा हों और सिध्दांतों का पाठ पढ़ाते रहें। अब हम वीरप्पन पैदा करना चाहते हैं जिसकी संकुचित भृकुटि से दो-दो राज्य सरकारें गुलाटें खाती रहें। हम नहीं चाहते कि गांधी जीवित रहें, दुबारा आयें या समाधि से निकलें और प्रासंगिक बने रहें, इसीलिये रोज उनके ताबूत में कीलें ठोके जा रहे हैं।

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