हाथ हिलाता है स्कूल का पेड़ /नई पत्ती निकल आई है : Farewell special

बचपन की सुनहरी स्‍मृतियों को साथ लेकर जिस स्‍कूल में जीवन में एक बड़ा हिस्‍सा बीता हो वहॉं से जाते समय जो भावनाएं उमड़तीं हैं उन्‍हें शब्‍दबद्ध करना बहुत मुश्‍किल है। फिर भी ये विदाई गीत कक्षा 12 वीं के विद्यार्थी जो जा रहें हैं उनके लिए लिखा और संगीतबद्ध किया है। 11 वीं विद्यार्थी उनके लिए गा रहे हैं, ……….
विदाई गीत :

जाओगे तुम यहॉं से
सोचोगे हम कहॉं
सुनहरे पल जो आए थे
यहॉ तुमने बिताए थे
याद करोगे वहां।।।।।
नये जीवन की सौगातें
तुम्हें बाहर बुलाती हैं
ये स्कूल की दीवारें
नहीं तुमको भुलाती हैं
जाओ तुम चाहे जहां।।।।
तुम्हारे दोस्त ये सारे
नहीं तुमको सताएंगे
तुम्हें खुद ही वहां जाकर
ये इतने याद आएंगे
भूल न जाना वहां।।।।
go out to serve your country and Countrymen

हिन्दी गजल : पढ़े जाने को

इम्तिहान की घड़ी आई है।
आज वरिष्ठों की विदाई है।
मैं जिसे डांटता था वो लड़की
आखिरी हस्ताक्षर लेने आई है।
गुस्सा होते थे बड़े सर
उनकी भी आंख भर आई है।
जहां बैठता था वो बैंच
खाली-खाली नजर आई है।
बहुत बातूनी थी मेरा दोस्त
उसके दिल में भी रुलाई है।
हाथ हिलाता है स्कूल का पेड़
नई पत्ती निकल आई है।
बहुत छोटी है ये दुनियां
फिर मिलें – ये उम्मीद जताई है।

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इकत्तीस छिपकलियों का भय :

31 साल पहले का एक धुँधला पन्ना

‘‘जमाने के सलीब पर / लटका हुआ मैं
और मेरा अहं : / इकत्तीस छिपकलियों के भय से
सकपकाती प्रतिभा के साथ / पिछले दिनों मेरी शक्ति
रिस-रिस कर चू गई / और अनेक भावात्मक आँखें
मित्र बनकर देखती रहीं / आज
प्रश्‍न है – / इन कीडे मच्छरों के
अभिनंदन स्वीकार करने का / रह जाता है अनुत्तरित।’’
(कवि गोपाल सिंह)

पुस्तकालय के एक पुराने धूल जमे खाने से धूल झड़ाकर उठाता हूँ एक किताब। पुरानी और पतली किताब। नीले रंग की जिल्द लाल धूल से एक अजीब रंग की हो गई है। लेकिन पूरी तरह सुरक्षित। पुराने समय की प्रिंटिग एक अलग तरह का आकर्षण मेरे लिये पैदा कर रही है। किताब का पहला पन्ना पलटता हूँ तो डूबता चला जाता हूँ। मेरे लिए यह किताब एक खास तरह की हो जाती है। लगता है इकत्तीस साल पहले जा खड़ा हूँ। मैं चौंक उठता हूँ इन कविताओं को पढ़ते हुए………..। क्या इतिहास एक बार फिर उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ दो व्यक्ति अलग-अलग समय के होते हुए भी एकाकार हो जाते हैं।
ये किताब है ‘रक्त-संध्या‘। पहले पन्ने पर ही दर्ज है कवि का नाम – गोपाल सिंह, स्नातकोत्तर अध्यापक (हिन्दी), डोनीमलाई कर्नाटक। किताब के छपने की तारीख है – 24 जुलाई 1978। किताब अरविंद प्रिंटिंग प्रेस हैदराबाद में छपी।
कवि गोपाल सिंह ‘अपनी बात‘ में लिखते हैं- ‘’रक्त-संध्या की कुछ कविताएँ 1970 के पूर्व की हैं तब में रांची विश्‍वविद्यालय का छात्र था। संभावना, ‘पुटुष‘ ‘स्थापना‘ आदि पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। स्थानांतरण के कारण कई कविताएँ अव्यवस्थित हो गईं जिनका प्रकाशन नहीं करा सका। मैंने इकतीस वर्ष पार करने के अवसर पर अपनी कविताओं के प्रकाशन का निर्णय किया। इस समय डोनीमलाई (कर्नाटक) में हूँ। यहाँ लिखी गई अधिकांश कविताएँ इस संकलन में शामिल हैं। इसलिए ‘रक्त-संध्या‘ पढ़ते समय यह परिवेश ही आधार होना चाहिए।‘‘ (गोपाल सिंह)
इस तरह पता चलता है कि कवि गोपाल सिंह 31 साल के हो गये थे तब ये किताब सामने आयी थी। यह बात सन् 1978 की है। यह मेरा जन्मवर्ष था। और इस किताब के 31 साल के होने पर सन् 2009 में, मैं उसी पद पर आया जिस पर 31 साल पहले श्री गोपालसिंह थे। यह एक ऐसा साहित्यिक संयोग है जो मेरे लिए विशेष है। उनकी अनेक कविताओं से उस समय यहाँ के क्षेत्र की सुविधाविहीन स्थितियों का पता चलता है। ऐसे कठिन समय में वे यहाँ शिक्षक रहते हुए साहित्य-साधना करते रहे। यह सोचकर ही हृदय भर आता है। उनकी एक कविता में ये 31 छिपकलियों का भय जो उनकी कविताओं में है वह उनकी उम्र के 31 सालों के अलावा दरअसल उस समय यहां की सुविधाहीनता के परिवेश को भी दर्शाता है। उनकी ‘रोजनामचा‘ कविता देखिये-
‘‘मेरे बिस्तर पर /पूरा परिवार /पुस्तकालय / दफ्तर और दवाखाना है : /मेरा रोजनामचा / अब / कड़वी या कषैली /मीठी या तिक्त /गंध नहीं आती/सब बकबासनुमा है/जिंदगी का विस्तार / या / संकुचन / फाहियान से / सोल्झेनित्सिन या/ हेमिंग्वे तक/रहट से उड़नतस्तरी तक / कूद-फाँदकर /बिस्तरनुमा होना है।‘‘
वास्तव में गोपालसिंह जी का अध्ययन और जानकारी भी इसी प्रकार विस्तृत थी। उनके सामने हम आज की पीढ़ी का अध्ययन और ज्ञान बहुत सीमित लगता है। इतना ही नहीं पुस्तक यह भी बताती है कि किस प्रकार उस युग की परिस्थितियों के प्रति यह शिक्षक सचेत था। उनकी एक और कविता है ‘बाजार‘। आज जबकि बाजारवाद का हल्ला है, 31 साल पहले की यह कविता देखिये-
‘‘ यह / बाजार है / यहाँ /सभी चीजें /बिकती हैं / भाषण / प्रमाण-पत्र / टूटता विश्‍वास / खुदगर्जी / दम तोड़ती आस्तिकता-नैतिकता / लापरवाही / बंजारापन/ अंजीर / आम / कपड़ा / और भूख भी। / चीजें गूँगी हैं / विक्रेता बहरा / तमाशाई अंधा /सिर्फ क्रेता की आँखें सतेज हैं / मालूम नहीं कि / लोग चीजों की दोहरी कीमतें क्यों चुकाते हैं‘‘
गोपाल सिंह जी ‘परिवेश‘ कविता एक लम्बी कविता है जो अनायास ही मुक्तिबोध की याद दिला जाती है। सत्तर-अस्सी के दशक का यह परिवेश रूप बदलकर फिर हमारे सामने है –
‘‘घिरे हैं हम सब एक परिवेश से/तकिया कलाम यह परिवेश……….कपड़ा वही है / दोहरी पीठ के बदले में /दोहरी कालर की कमीज है/सिलाई शुल्क वही है / सिर्फ रोशनी नई है / इतिहास नहीं‘
इतिहास नहीं बदलता। यह फिर – फिरकर हमें उन्हीं मोड़ों पर लाकर खड़ा करता है। गोपाल सिंह जी प्रबुद्ध और संघर्षशील शिक्षक रहे होंगे। आजकल वे जहाँ भी होंगे संभवतः सेवानिवृत होकर स्वस्थ जीवन यापन कर रहे होंगे। कविताओं मे उनका युवा-आक्रोश से भरा चेहरा ही हमारे सामने है। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूँ जहाँ सुविधाओं की परवाह न करते हुए गोपालसिंह जी जैसे शिक्षकों ने बैठकर इसकी गरिमा बढ़ाई। बार-बार सोचता हूँ क्या हमारी पीढ़ी अपने अग्रजों का उत्तराधिकार लेने में सफल हो रही है। सन् 1978 में ही ‘चकोर‘ सूर्यप्रताप सिंह, एंड्रूज गंज, नयी दिल्ली-49 इस किताब की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘गोपाल सिंह केन्द्रीय विद्यालय संगठन के उन रचनाधर्मी अध्यापकों में से हैं जो विद्यार्थी, श्यामपट और ग्रहकार्य के अतिरिक्त अपनी प्रतिभा और मेहनत का रचनात्मक उपयोग करना जानते हैं। देश को ऐसे अध्यापकों की आवश्‍यकता है – विशेषकर अहिन्दीभाषी प्रदेशों में। हिन्दी भाषा आज जिस स्थिति से गुजर रही है, जैसी धार और मार सह रही है उसका अंदाज दिल्ली या पटना या भोपाल से नहीं लगाया जा सकता। वह तो डोनीमलाई जैसी जगह का हिन्दी-प्रेमी ही बता सकता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहुँच जाने के बाद भी रसोई में वह अछूत है। देश की मानसिकता बदलेगी- अध्यवसाय चाहिए।‘‘(चकोर सूर्यप्रताप सिंह)
आज इकत्तीस छिपकलियों का डर नहीं। मेरा परिवेश सर्वसुविधायुक्त है। पर मैं अनुभव कर सकता हूँ इस भय को। आज के इस भय में अनेक परिवेशगत भय छुपे हैं। इस देश और समाज के। नमन करता हूँ गोपाल सिंह जी को। 31 – 31 साल के दो कालखंडों को ।