ये बुढ़िया शबरी जैसी,राम भी आते होंगे………

”पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।”


कर्नाटक में बैल्‍लारी जिले के हास्‍पेट से हम्‍पी जाकर जब आप तुंगभद्रा पार करते हैं तो हनुमनहल्‍ली गॉंव की ओर जाते हुए आप पाते हैं शबरी की गुफा, पंपा सरोवर और वह स्‍थान जहाँ शबरी राम को बेर खिला रही है। आप पायेंगे कि बस यह घटित होने ही जा रहा है आपके सामने। मैं यहॉं पहुंचा तो पर्यटकों के बाहर मैदान में भोजन बन रहा था। पंपा सरोवर में असंख्‍य श्‍वेत कमल खिले थे। जीवन में पहली बार कमल को छूकर देखा था। एक व्‍यक्‍ित ने कुछ रूपये लेकर कमल और कमलगट्टा लाकर दिये, जो मैंने सहेज कर रख लिए। सामने मंदिर है। शबरी के घर में प्रवेश करता हूं। तो लगता है आज महाप्रभु पधारने वाले हैं कुछ हाथ बंटा लूं, अम्‍मा अकेली है। बगल में ही वह कक्ष भी है जहां के बारे में कहा जाता है कि यहीं बैठकर राम जी ने शबरी के हाथों बेर खाए।

अस्‍तु, हमारे पौराणिक चरित्रों में शबरी विशिष्‍ट है। दालित्‍य और स्‍त्रीत्‍व के दोहरे अभिशाप को भोगती। यहां तक कि त्‍यक्‍त। शबरी को ना तो समीक्षा करना आती है न परीक्षा करना। गुरू से कोई दार्शनिक बहस भी नहीं। अदभुत मायथॉलॉजीकल चरित्र है…… सुतीक्ष्‍ण के बाद। राम आयेंगे। तो खोज शुरू नहीं की। प्रतीक्षा शुरू कर दी। कोई समीक्षा नहीं, परीक्षा नहीं केवल प्रतीक्षा। प्रतीक्षा का परिणाम क्‍या हुआ। लार्ड हिमसेल्‍फ केम टु हर। सिर्फ आये ही नहीं, बेर खाने की कहानी भी विख्‍यात हो गई। ये प्रतीक्षा का परिणाम है। हमारी दुनियां में प्रतीक्षा सूची के परिणाम नहीं निकला करते। सत्‍य की दुनियां में प्रतीक्षा ही परिणाम है। इसका कारण क्‍या है…….प्रतीक्षा की अवधि, ध्‍यान की अवधि है, क्‍यों कि प्रतीक्षा की अवधि कुछ भी न करने की अवधि है, और न करने की अवधि की ध्‍यान की उपलब्‍िध है। कर्ममुक्‍ित की अवधि है। इसलिये प्रतीक्षा का परिणाम महाप्रभु के मुख से नवधाभक्‍ित का उपदेश है।

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नाथ सैल पर कपिपति रहई………….

अंजनि पर्वत, ऋष्‍यमूक पर्वत और तुंगभद्रा के पर्वतीय अंचल की सैर……

वही सैल जहॉं से राम को सुग्रीव की मित्रता मिली, इससे भी बढकर उन्‍हें हनुमान से भक्‍त मिले और, सबसे बढकर ये कि शबरी को अपने राम मिले। जी हॉं, हम बात कर रहे हैं कि कर्नाटक में हम्‍पी के निकट स्‍थित सांस्‍कृतिक-पर्यटन के महत्‍वपूर्ण्‍ा स्‍थल ऋष्‍यमूक पर्वत, अंजनि पर्वत, मतंग ऋषि का आश्रम और तुंगभद्रा नदी के उस पार वह गहन प्रांतर जहॉं से राम के सैन्‍य संगठन को मुक्‍त आकाश मिला।

(हनुमान जी के जन्‍मस्‍थल से नीचे की ओर एक विहंगम दृश्‍य : सर्जना)
कर्नाटक के बैल्‍लारी जिले से सडक मार्ग से हॉस्‍पेट पँहुचने पर आप यहॉं बडी ही आसानी से उपलब्‍ध स्‍थानीय वाहनों से यहॉं तक का रास्‍ता तय कर सकते हैं। अंजनि पर्वत वह स्‍थान है जिसे हनुमान जी का जन्‍मस्‍थल कहा जाता है। ऐसे तो देश में ऐसे कई स्‍थान विशेषकर महाराष्‍ट्र से शुरू करते हुए दक्षिण प्रांतों में, ऐसे हैं जिन्‍हें हनुमान जी के जन्‍मस्‍थल के रूप में धार्मिक मान्‍यता है, तथापि इस स्‍थल को मिथकीय इतिहास के भूगोल के अनुसार अधिक प्रामाणिक माना जाता है। अंजनि पर्वत की ऊँचाई काफी अधिक और आप थकान यदि महसूस नहीं कर रहे हैं तो आशय यह है कि आप अधिक उत्‍साहित हैं। हम लोग ऊपर पँहुचे तो रामचरित मानस पाठ चल रहा था, अयोध्‍या के एक संत यहॉं स्‍थान के प्रबंधक हैं। यहॉं के नजदीकी गॉंव का नाम है ‘हनुमनहल्‍ली’ कन्‍नड के मुताबिक इसका अर्थ है – हनुमान का गॉंव ।

(अंजनि-पर्वत पर चढने के लिए प्रवेश द्वार)
ऊँचाई से तुंगभद्रा नदी का मनोरम दृश्‍य है। श्‍यावर्णीय पथरीले पर्वतों की श्रंखला उस भय का आभास करा देती है जिसको महामानव राम ने सहज ही जीत लिया था।
नीचे उतर कर आगे चलें तो मनोरम पंपा सरोवर पहुँचा जा सकता है। स्‍थल से ओर अधिक आगे की यात्रा करेंगे तो ऋष्‍यमूक पर्वत पर जा सकते हैं। एक ओर फटिक सिला है जहॉं राम ने विश्राम किया और मानस में यहॉं का ऋतु वर्णन है। अस्‍तु, हम लोग देर शाम होने के कारण यहीं से वापस लौट आये। आगे के स्‍थलों पर फिर कभी। …..

(अंजनि-पवर्त स्‍थित हनुमंत लाल का दुर्लभ दर्शन, फोटो लेते समय फटकार मिली : सर्जना)

पत्‍थरों पर इतिहास – हम्‍पी : द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन

जब ठहरी निगाह…………….
बैंगलूर हवाई अड्डे पर उपरी तल्‍ले पर मंहगी सजी-दुकान पर एक किताब कांच में सजी है। आकार बडी रामायण सरीखा। निगाह ठहर जाती है। किताब पर एक चित्र है –पथरीला। अंग्रेजी की इस किताब का शीर्षक है – द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन। किताब हम्‍पी के बारे में है।

किताब देखकर हम्‍पी के प्रति आकर्षण बढ गया । लगा कि इतने दिनों से दोणिमलै में हूं। महज डेढ- दो घंटे के फासले पर हम्‍पी है। वहां तुंगभद्रा बांध के विद्यालय में भी कुछ अरसा पढा चुका हूं। मगर हम्‍पी जाने का योग न बना सका। आखिर एक दिन चलने का भूत सवार हुआ और निकल पडा पत्‍थरों पर इतिहास देखने।

कॉमिक्‍स से इतिहास तक……….

बचपन से ही तेनालीराम की चतुराई सुनते रहे। और मनोमष्‍ितष्‍क के मिथकीय साहित्‍य में बीरबल के बगल तेनालीराम विराजते रहे। विजयनगर साम्राज्‍य के बारे में इतिहास की किताबें बताती हैं कि इस राज्‍य की स्‍थापना हरिहर और बुक्‍का नाम के दो भाइयों ने की। ये दोनो भाई वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरूद्रदेव की सेवा में थे। दक्षिण भारत पर मुस्‍िलम प्रभुत्‍व हो गया तो दोनों भाई वहां से कैद कर दिल्‍ली लाए गए, परन्‍तु जब दक्षिण में वहां शांति और सुव्‍यवस्‍था बनाए रखना कठिन हो गया तो तुगलक सुल्‍तान ने हरिहर और बुक्‍का को मुक्‍त कर उन्‍हें रायचुर दोआब का सामन्‍त बनाकर भेज दिया(जब भी गुंतकल स्‍टेशन की प्रतीक्षा में रायचुर स्‍टेशन से ही ताकना शुरू करता हूं तो रायचुर रेलवे बोर्ड देखकर लगता है रायचुर के उस प्रभावशाली दोआब का ऐतिहासिक हिस्‍सा बन गया हूं तो राजाओं के शक्‍ति-प्रदर्शन का केन्‍द्र रहा) । कहा जाता है कि इन दोनों भाइयों का परम सहायक तथा नेता उस समय का प्रकाण्‍ड पंडित विद्यारण्‍ड था। जिसने इस वंश की उसी प्रकार सहायता की जिस प्रकार आचार्य कौटिल्‍य ने चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य की की थी। अपने गुरू तथा सहायक के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे पर विद्यानगर अथवा विजयनगर नामक नगर की नींव डाली। मुहम्‍मद बिन तुगलक के शासन-काल के अंतिम भाग में हरिहर ने अपने को स्‍वतन्‍त्र शासक घोषित कर दिया। विजयनगर में सन् 1336 से 1416 तक चार राज्‍यवंशों ने शासन किया। इनमें सन् 1505 ई से 1570 ई के तृतीय राजवंश का सबसे अधिक योग्‍य तथा प्रतिभाशाली शासक कृष्‍णदेव राय था। उसे सम्‍भवत सन् 1509 ई से 1530 ई तक शासन किया। इतिहास विवरणों के अनुसार वह बड़ा ही वीर,साहसी तथा न्‍यायप्रिय शासक था। वह एक महान विजेता तथा सफल शासक था। उसने उड़ीसा के राय को युद्ध में परास्‍त कर वहाँ की राजकुमारी के साथ विवाह किया। 1520 ई में उसने बीजापुर के सुल्‍तान आदिलशाह पर भी विजय प्राप्‍त की और उसके राज्‍य को लूटा। पश्‍चिमी समुद्र तट पर बसे हुए पुर्तगालियों के साथ उसकी मैत्री थी। इस प्रकार कृष्‍णदेव राय ने अपने बाहुबल से अपने राज्‍य की सीमा से बड़ी वृद्धि की। इससे पड़ोसी मुस्‍लिम शासकों को बड़ी ईर्ष्‍या उत्‍पन्‍न हुई और वे विजयनगर के विरूद्ध संगठित होने लगे। इतिहास यह भी बताता है कि कृष्‍णदेव राय की मृत्‍यु के उपरान्‍त सदाशिव के मंत्री राम राय ने पड़ोसी मुसलमान राज्‍यों के साथ युद्ध किया और मुसलमानों साथ बड़ा अत्‍याचार किया। मुसलमान राज्‍यों के लिए यह असह्य हो गया और अपने मतभेद भुलाकर बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्‍डा तथा बीदर ने विजयनगर के विरूद्ध एक संघ बनाया। केवल बरार का सुल्‍तान इस संघ से अलग रहा।

और वो दिन जब दुनिया का एक महान सुव्‍यवस्‍िथत नगर अचानक धराशायी कर दिया गया…………………………………..

सन् 1564 ई के अंतिम सप्‍ताह में मुसलमानों ने विजयनगर राज्‍य पर आक्रमण कर दिया। तालीकोट नामक स्‍थान पर, जो कृष्‍णा नदी के किनारे पर स्‍िथत है, दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध आरम्‍भ हो गया। रामराय युद्ध में परास्‍त हो गया और उसका वध कर दिया गया। हिन्‍दुओं का बड़ी नृशंसतापूर्वक बध कर दिया गया। इसके बाद विजयी सेना ने विजयनगर की ओर कूच किया और नगर को खूब लूटा। शत्रु विजयनगर को नष्‍ट करने आये थे। अतएव उन्‍होंने यथाशक्‍ित उसका विनाश किया।

कर्नाटक के सांस्‍कृतिक उत्‍सवों, राजकीय महोत्‍सवों और राज्‍य की स्‍थापना की वर्षगाँठ के अवसरों पर जो कार्यक्रम और गीत मैं सुना करता हूँ उनमें विजयनगर की सांस्‍कृतिक विरासत निवासियों के रग-रग में बसी है। वे अपनी अस्‍मिता और आत्‍मगौरव के साथ इसे सम्‍बद्ध करते हैं, खासकर जो सांस्‍कृतिक पहचान इसकी रही।

फोटो – गैलरी / हम्‍पी और उसके आसपास

(तुंगभद्रा तट पर विजयनगर, हम्‍पी)


(तुंगभद्रा तट)


(उग्र नरसिंह मंदिर)


(मीनाक्षी मंदिर)


(तुंगभद्रा में स्‍नान करता राजकीय हाथी, जापानी बालक, सर्जना के कैमरे में)


(हम्‍पी का विश्‍व प्रसिद्ध पत्‍थर का रथ, स्‍टोन व्‍हील)


(हम्‍पी के विटृठल मंदिर का प्रांगण)


(विटठल मंदिर का तोरण द्वार)