इकत्तीस छिपकलियों का भय :

31 साल पहले का एक धुँधला पन्ना

‘‘जमाने के सलीब पर / लटका हुआ मैं
और मेरा अहं : / इकत्तीस छिपकलियों के भय से
सकपकाती प्रतिभा के साथ / पिछले दिनों मेरी शक्ति
रिस-रिस कर चू गई / और अनेक भावात्मक आँखें
मित्र बनकर देखती रहीं / आज
प्रश्‍न है – / इन कीडे मच्छरों के
अभिनंदन स्वीकार करने का / रह जाता है अनुत्तरित।’’
(कवि गोपाल सिंह)

पुस्तकालय के एक पुराने धूल जमे खाने से धूल झड़ाकर उठाता हूँ एक किताब। पुरानी और पतली किताब। नीले रंग की जिल्द लाल धूल से एक अजीब रंग की हो गई है। लेकिन पूरी तरह सुरक्षित। पुराने समय की प्रिंटिग एक अलग तरह का आकर्षण मेरे लिये पैदा कर रही है। किताब का पहला पन्ना पलटता हूँ तो डूबता चला जाता हूँ। मेरे लिए यह किताब एक खास तरह की हो जाती है। लगता है इकत्तीस साल पहले जा खड़ा हूँ। मैं चौंक उठता हूँ इन कविताओं को पढ़ते हुए………..। क्या इतिहास एक बार फिर उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ दो व्यक्ति अलग-अलग समय के होते हुए भी एकाकार हो जाते हैं।
ये किताब है ‘रक्त-संध्या‘। पहले पन्ने पर ही दर्ज है कवि का नाम – गोपाल सिंह, स्नातकोत्तर अध्यापक (हिन्दी), डोनीमलाई कर्नाटक। किताब के छपने की तारीख है – 24 जुलाई 1978। किताब अरविंद प्रिंटिंग प्रेस हैदराबाद में छपी।
कवि गोपाल सिंह ‘अपनी बात‘ में लिखते हैं- ‘’रक्त-संध्या की कुछ कविताएँ 1970 के पूर्व की हैं तब में रांची विश्‍वविद्यालय का छात्र था। संभावना, ‘पुटुष‘ ‘स्थापना‘ आदि पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। स्थानांतरण के कारण कई कविताएँ अव्यवस्थित हो गईं जिनका प्रकाशन नहीं करा सका। मैंने इकतीस वर्ष पार करने के अवसर पर अपनी कविताओं के प्रकाशन का निर्णय किया। इस समय डोनीमलाई (कर्नाटक) में हूँ। यहाँ लिखी गई अधिकांश कविताएँ इस संकलन में शामिल हैं। इसलिए ‘रक्त-संध्या‘ पढ़ते समय यह परिवेश ही आधार होना चाहिए।‘‘ (गोपाल सिंह)
इस तरह पता चलता है कि कवि गोपाल सिंह 31 साल के हो गये थे तब ये किताब सामने आयी थी। यह बात सन् 1978 की है। यह मेरा जन्मवर्ष था। और इस किताब के 31 साल के होने पर सन् 2009 में, मैं उसी पद पर आया जिस पर 31 साल पहले श्री गोपालसिंह थे। यह एक ऐसा साहित्यिक संयोग है जो मेरे लिए विशेष है। उनकी अनेक कविताओं से उस समय यहाँ के क्षेत्र की सुविधाविहीन स्थितियों का पता चलता है। ऐसे कठिन समय में वे यहाँ शिक्षक रहते हुए साहित्य-साधना करते रहे। यह सोचकर ही हृदय भर आता है। उनकी एक कविता में ये 31 छिपकलियों का भय जो उनकी कविताओं में है वह उनकी उम्र के 31 सालों के अलावा दरअसल उस समय यहां की सुविधाहीनता के परिवेश को भी दर्शाता है। उनकी ‘रोजनामचा‘ कविता देखिये-
‘‘मेरे बिस्तर पर /पूरा परिवार /पुस्तकालय / दफ्तर और दवाखाना है : /मेरा रोजनामचा / अब / कड़वी या कषैली /मीठी या तिक्त /गंध नहीं आती/सब बकबासनुमा है/जिंदगी का विस्तार / या / संकुचन / फाहियान से / सोल्झेनित्सिन या/ हेमिंग्वे तक/रहट से उड़नतस्तरी तक / कूद-फाँदकर /बिस्तरनुमा होना है।‘‘
वास्तव में गोपालसिंह जी का अध्ययन और जानकारी भी इसी प्रकार विस्तृत थी। उनके सामने हम आज की पीढ़ी का अध्ययन और ज्ञान बहुत सीमित लगता है। इतना ही नहीं पुस्तक यह भी बताती है कि किस प्रकार उस युग की परिस्थितियों के प्रति यह शिक्षक सचेत था। उनकी एक और कविता है ‘बाजार‘। आज जबकि बाजारवाद का हल्ला है, 31 साल पहले की यह कविता देखिये-
‘‘ यह / बाजार है / यहाँ /सभी चीजें /बिकती हैं / भाषण / प्रमाण-पत्र / टूटता विश्‍वास / खुदगर्जी / दम तोड़ती आस्तिकता-नैतिकता / लापरवाही / बंजारापन/ अंजीर / आम / कपड़ा / और भूख भी। / चीजें गूँगी हैं / विक्रेता बहरा / तमाशाई अंधा /सिर्फ क्रेता की आँखें सतेज हैं / मालूम नहीं कि / लोग चीजों की दोहरी कीमतें क्यों चुकाते हैं‘‘
गोपाल सिंह जी ‘परिवेश‘ कविता एक लम्बी कविता है जो अनायास ही मुक्तिबोध की याद दिला जाती है। सत्तर-अस्सी के दशक का यह परिवेश रूप बदलकर फिर हमारे सामने है –
‘‘घिरे हैं हम सब एक परिवेश से/तकिया कलाम यह परिवेश……….कपड़ा वही है / दोहरी पीठ के बदले में /दोहरी कालर की कमीज है/सिलाई शुल्क वही है / सिर्फ रोशनी नई है / इतिहास नहीं‘
इतिहास नहीं बदलता। यह फिर – फिरकर हमें उन्हीं मोड़ों पर लाकर खड़ा करता है। गोपाल सिंह जी प्रबुद्ध और संघर्षशील शिक्षक रहे होंगे। आजकल वे जहाँ भी होंगे संभवतः सेवानिवृत होकर स्वस्थ जीवन यापन कर रहे होंगे। कविताओं मे उनका युवा-आक्रोश से भरा चेहरा ही हमारे सामने है। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूँ जहाँ सुविधाओं की परवाह न करते हुए गोपालसिंह जी जैसे शिक्षकों ने बैठकर इसकी गरिमा बढ़ाई। बार-बार सोचता हूँ क्या हमारी पीढ़ी अपने अग्रजों का उत्तराधिकार लेने में सफल हो रही है। सन् 1978 में ही ‘चकोर‘ सूर्यप्रताप सिंह, एंड्रूज गंज, नयी दिल्ली-49 इस किताब की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘गोपाल सिंह केन्द्रीय विद्यालय संगठन के उन रचनाधर्मी अध्यापकों में से हैं जो विद्यार्थी, श्यामपट और ग्रहकार्य के अतिरिक्त अपनी प्रतिभा और मेहनत का रचनात्मक उपयोग करना जानते हैं। देश को ऐसे अध्यापकों की आवश्‍यकता है – विशेषकर अहिन्दीभाषी प्रदेशों में। हिन्दी भाषा आज जिस स्थिति से गुजर रही है, जैसी धार और मार सह रही है उसका अंदाज दिल्ली या पटना या भोपाल से नहीं लगाया जा सकता। वह तो डोनीमलाई जैसी जगह का हिन्दी-प्रेमी ही बता सकता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहुँच जाने के बाद भी रसोई में वह अछूत है। देश की मानसिकता बदलेगी- अध्यवसाय चाहिए।‘‘(चकोर सूर्यप्रताप सिंह)
आज इकत्तीस छिपकलियों का डर नहीं। मेरा परिवेश सर्वसुविधायुक्त है। पर मैं अनुभव कर सकता हूँ इस भय को। आज के इस भय में अनेक परिवेशगत भय छुपे हैं। इस देश और समाज के। नमन करता हूँ गोपाल सिंह जी को। 31 – 31 साल के दो कालखंडों को ।

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समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे

: तीसरे सप्‍तक में कुँवर नारायण…………..

‘तीसरा सप्‍तक’ उठाता हूँ। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रथम संस्‍करण 1959 में छपा, अज्ञेय के सम्‍पादन में। मेरे हाथ में चौथा संस्‍करण अगस्‍त 1979 है। हर परीक्षा में सप्‍तकों पर प्रश्‍न रहा करते, इसलिए सप्‍तक और अज्ञेय के नाम के प्रति एक आकर्षण इन सवालों ने बना रखा था। अज्ञेय लिखित भूमिका में डूबते-तिरते हुए नामों की सूची पर नजर डालता हूँ वे नाम जो हर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते रहे………..5 वें क्रम पर जाकर ठहरता हूँ, …… कुंवर नारायण। पिछले दिनों उनकी ज्ञानपीठ रचना ‘बाजश्रवा के बहाने पढ़ रहा था। ‘तीसरा सप्‍तक’ हाथ आया तो इस नजरिये के साथ प्रवेश किया कि देखें तो सही शुरूआती कुंवर नारायण से ज्ञानपीठ कुंवर नारायण तक सर्जना के सोपान किस तरह चढ़े हैं।
कुंवर जी के परिचय और वक्‍तव्‍य( 146 से 151) में जो बिंदास लगा वह रेखांकित कर लिया-
एक – ‘’शिक्षा की जो पद्धति स्‍कूल, कॉलेज या विश्‍वविद्यालय में रही, उस से मन सदा विद्रोह करता रहा, इस लिए शायद स्‍कूली अर्थ में कभी भी बहुत उत्‍कृष्‍ट विद्यार्थी नहीं हो सका।‘’
दो- आरम्‍भ से ही पढ़ने और घूमने का बहुत शौक रहा है, और दोनों के लिए पर्याप्‍त अवसर भी मिलता रहा। सन् 1955 ई में चेकोस्‍लोवाकिया, पोलैण्‍ड, रूस और चीन का भ्रमण किया-‘ यह कइ तरह से महत्‍वपूर्ण रहा’
तीन – ‘कविता पहले-पहल सन् 1947 में अंगरेजी में लिखना आरम्‍भ किया, पर शीघ्र ही हिन्‍दी की ओर प्रव्रत्‍ति हुई और तब से नियमित रूप से हिन्‍दी में लिखने लगा।‘
चार – सन् 1956 से, उस पत्रिका के बन्‍द होने तक, युगचेतना के सम्‍पादक मण्‍डल में रहे। अब मोटर के व्‍यवसाय में मुब्‍ितला रहते हैं – और अपनी इस व्‍यस्‍तता से स्‍वयं त्रस्‍त हैं : ‘ फिक्रे-दुनिया में सर खपाता हूँ, मैं कहां और ये बवाल कहां’
पांच – ‘’साहित्‍य जब सीधे जीवन से सम्‍पर्क छोड़कर वादग्रस्‍त होने लगता है, तभी उस में वे तत्‍व उत्‍पन्‍न होते हैं जो उस के स्‍वाभाविक विकास में बाधक हों। जीवन से सम्‍पर्क का अर्थ केवल अनुभव मात्र नहीं, बल्‍िक वह अनुभूति और मनन-शक्‍ित भी है जो अनुभव के प्रति तीव्र और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया कर सके।‘’
छह- ‘ जीवन के इस बहुत बडे ‘कार्निवाल’ में कवि उस बहुरूपिये की तरह है जो हजारों रूपों में लोगों के सामने आता है, जिस का हर मनोरंजक रूप किसी न किसी सतह पर जीवन की एक अनुभूत व्‍याख्‍या है और जिस के हर रूप के पीछे उस का एक अपना गम्‍भीर और असली व्‍यक्‍ित्‍व होता है जो इस सारी विविधता के बुनियादी खेल को समझता है।‘’

कुंवर जी कुल 21 कविताएं तीसरे सप्‍तक में हैं। कुछ ही कविताएं समकालीन कविता के उस रूप का संकेत करती हैं जिसके लिए कुंवर नारायण जाने जाते हैं। मिथकीय चेतना के उच्‍चतम सोपान पर पहुंचे कुंवर नारायण की ‘सम्‍पाती’ जैसी कविता इस लिहाज से रेखांकनीय हो जाती है। शब्‍दों की जो मितव्‍ययता कुंवर जी की खास पहचान है उसका संकेत उनकी प्रारंभिक कविताओं से ही चला आया है। कुछ कविताएं आम आदमी की उदासी की हैं तो कुछ प्रक़ति का नये ढंग से अवलोकन, कुछ बाल कविताएं सी प्रतीत होती हैं, मगर हैं प्रौढ सत्‍य को लेकर। मुझे सर्वाधिक प्रभावित करने वाली दो कविताएं यहां हैं – ‘सम्‍पाती’ और ‘घर रहेंगे’
एक – ‘गहरा स्‍वप्‍न’ : ‘’सत्‍य से कहीं अधिक स्‍वप्‍न वह गहरा था / प्राण जिन प्रपंचों में एक नींद ठहरा था’’
दो – ‘दो बत्‍तखें : ‘दोनों ही बत्‍तख हैं / दोनों ही मानी हैं / छोटी-सी तलैया के/ राजा और रानी हैं’’
तीन- सम्‍पाती : ‘ धीमा कर दो प्रकाश/ घायल, सूर्योन्‍मुख,/ असंतुष्‍ट, उत्‍पाती:/फेनों का विप्‍लव बन/ लहरों पर तितर-बितर/ दग्‍ध-पंख सम्‍पाती :/ठण्‍डे अंधेरे के एक सुखद फाहे को/ जलती शिराओं पर ….. /धीमा कर दो प्रकाश । / मोम की दीवारें /गल न जायें,/ सपनों के लाक्षागृह/ / जल न जायें, / प्‍यार के पैमाने / -दृवित नेत्र – / छल न जायें…./ धीमा कर दो प्रकाश / कॉंच के गुब्‍बारे, / सोने की मछलियॉं /कुछ नकली चेहरे / कुछ मिली-जुली आकृतियाँ, / ओस की बूँदों-से चमक रहे रजत-द्वीप / घुल न जायें…../ धीमा कर दो प्रकाश । / पर्णकुटी की छाया शीतल है, / पॉंवों के नीचे फिर धरती का दृढ़ तल है/ गर्म देह/ नील नयन / क्षितिज पार / उड्डयन,/ प्राणों में एक जलन / उस ज्‍वलन्‍त ऑंधी की/ स्‍मृतियॉं / फिर न मिल जाऍं / धीमा कर दो प्रकाश।’
चार : ”घर रहेंगे, हमीं उन में रह न पायेंगे : समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे :
अनर्गल जिंदगी ढोते हुए किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जायेंगे।
मृत्‍यु होगी खड़ी सन्‍मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविध, स्‍वप्‍न खोके, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।”