‘जीवन-मूल्यों को बचाये रखना आज की सबसे बडी जरूरत’/चौथा मानव मूल्य संवर्द्धन पुरस्कार सेवानिवृत पुलिस अधीक्षक श्री के डी पाराशर को

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सर्जना। 30 दिसम्बर। मुरैना/ग्वालियर। मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा रखते हुए कर्तव्य निर्वहन के लिए ‘परहित’ संस्था मुरैना द्वारा प्रतिवर्ष दिया जाने वाला ‘चन्द्रपाल सिंह सिकरवार मानव मूल्य संवर्द्धन पुरस्कार-2012, सेवानिवृत पुलिस अधीक्षक श्री के डी पाराशर को पुलिस सेवा के दौरान उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता के लिए प्रदान किया गया। इस मौके पर मुख्य वक्ता के रूप में प्रखर राष्ट्रीय चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील पाण्डेय, हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली, तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो चन्द्रपाल सिंह सिकरवार सहित विभिन्न गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता ग्वालियर रेन्ज के डीआईजी श्री हरीसिंह यादव ने की।
मुरैना नगर के खचाखच भरे टाउन हाल में मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित कर रहे हिन्दुस्तान टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील पाण्डेय ने कहा कि वर्तमान सभ्यता पंचतत्व को संकट में डालने वाली है। आज मूल्यों का संकट है। पश्चिम से प्रेेरित बाजारवाद और जीवनमूल्य दोनों विरोधी तत्व है। विज्ञापनों का यह युग उन विक्रतियों का उत्प्रेरक है जिसका भारतीय जीवन दृष्टि में निषेध है। उन्होंने कहा कि इस दुर्भाग्य के समय में ऐसे आयोजन ताजा हवा के झोंके की तरह हैं।
आयोजन के मुख्य आदर्श डॉ चन्द्रपाल सिंह सिकरवार आज आदमी की भीड है, लेकिन भीड में आदमी नहीं है। उन्होनें कहा कि जो औरों के लिए जीते हैं वे ही सच्चे अर्थों में महान कहलाते हैं। उन्होंने कहा कि जो मूल्य केवल शब्दकोश की शोभा बढा रहे हैं उन्हें जीवन में उतारना है।
पुरस्कार प्राप्त करने पर श्री केडी पाराशन ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उन्होनें केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है। अपने पिता की कही बात को जीवन भर आदर्श बनाया। उन्होंने परहित संस्था और डॉ चन्द्रपाल सिंह सिकरवार के प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन भी किया।
आयोजन की अध्यक्षता कर रहे डीआईजी ग्वालियर रेंज श्री हरीसिंह यादव ने अपने चिरपरिचित चुटीले अंदाज, कविताओं और व्यंग्योक्तियों से सभा को मोहित कर लिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आज पुरस्कृत श्री पाराशर के पिता ने उनमें ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता के बीज डाले उसी प्रकार आज के हर पिता को अपने पुत्र-पुत्रियों को संस्कारित करना होगा। यही संस्कार होंगे तो समाज में अनहोनी घटनायें नहीं होंगी। उन्होंने मुरैना से जुडे अपने संस्मरण सुनाए साथ ही पुरस्कृत श्री केडी पराशर के साथ पुराने दिनों की याद भी ताजा की।
परहित संस्थान की ओर से कार्यक्रम का संचालन श्री प्रदीप व्यास ने किया। कार्यक्रम को श्री हरिश्चन्द्र शर्मा, डॉ रमेशसिंह सिकरवार आदि ने भी सम्बोधित किया । आयोजन में नगर के गणमान्य जन, पत्रकार गण और भारी संख्या में जनसमुदाया उपस्थित था। सभी के लिए प्रीतिभोज का आयोजन भी कार्यक्रम उपरांत किया गया।
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मुसल्‍मान कवियों की कृष्‍णभक्‍ित

मुसल्‍मान कवियों की कृष्‍णभक्‍ित (लेखक : स्‍वामी श्री पारसनथजी सरस्‍वती)

//गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित ‘कल्याण’ के एक अत्‍यंत पुराने और जीर्ण-शीर्ण अंक (भाग-28, संख्‍या-3) के एक आलेख से मैं बचपन में बहुत प्रभावित हुआ था। आगे चलकर इसी प्रभाव ने मुझे सूफी संतों के दर्शन को समझने के लिए जिज्ञासु बनाया। भारत में रामचरित-मानस के उच्‍चकोटि के प्रवक्‍ता श्री राजेश्‍वरानंद सरस्‍वती एक मुस्‍िलम बालक से हिन्‍दुओं के अत्‍यंत सम्‍मानित संन्‍यासी बनने तक की यात्रा के वर्तमान अप्रतिम उदाहरण हैं। जिन्‍हें मैं प्रत्‍यक्ष अनेक बार सोत्‍साह सुनता रहा हूँ। मेरे पिता की दैनिक पूजा में राजेश जी की अनेक पंक्‍ितयां शामिल हैं – यथा : ”लेत सदा सुधि दीन की सहज दया के धाम / जननि-जनक राजेश के जय श्री सीताराम।”
अस्‍तु, आज इस दुर्लभ अंक के लेख को सर्जना पर जारी कर रहा हूँ, लेखक के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए…………मुझे लगता है देश के वर्तमान वातावरण में ऐसी जानकारी हमारे हृदय को समन्‍वय के उच्‍चकोटि के भाव से भर देती है। लेख का साहित्‍यिक पक्ष ही देखें, ऐतिहासिक तथ्‍यों की प्रामाणिकता के विषय में सर्जना को जानकारी नहीं है, लेख ज्‍यों का त्‍यों लिया गया है।//

सच्‍चिदानंदस्‍वरूप श्रीकृष्‍णचंद की महिमा,उदारता तथा रूपमाधुरी का वर्णन अगणित मुसल्‍मान कवियों ने किया है। परंतु प्रकाशित साहित्‍य में कुछ ही मुस्‍िलम कवियों की भक्‍ितमयी कविता उपलब्‍ध होती है। वे सब श्रीकृष्‍णप्रेम में पागल हुए हैं। पुरुषों ही नहीं, कुछ इस्‍लामी देवियों ने भी, दिल खोलकर श्रीकृष्‍णभक्‍ित को अपनाया है। श्रीकृष्‍ण के प्रेम में एक मुस्‍िलम महिला तो इतनी दीवानी हो गई थी कि उसके प्रेम के सामने मीरा का प्रेम भी धुँधला-सा दिखाई देता है। उसका नाम था ‘ताजबीबी’। वह थी बादशाह शाहजहॉं की प्राणप्‍यारी बेगम जिसकी कब्र के लिए आगरे में ‘ताजरोजा’ बनबाया गया था। वह विश्‍वविख्‍यात प्रासाद तीस साल में, तीस करोड की लागत से, तीस हजार मजदूरों के दैनिक काम से बना था। ‘ताज’ का एक उद्गार नमूने के लिए उपस्‍थित किया जाता है। आप देखें कि कितना प्रेम है और कितनी श्रृद्धा है- ”सुनो दिलजानी मॉंडे दिलदी कहानी, तुव दस्‍तहू बिकाँनी, बदनामी हूँ सहूँगी मैं। देव-पूजा की ठॉंनी, मैं निवाज हू भुलॉंनी, तजे कलमा-कुरान, तॉंडे़ गुनन गहूँगी मैं।। सॉंवला सलोना सिर ‘ताज’ सिर कुल्‍लेदार, तेरे नेह-दाग में, निदाघ हो दहूँगी मैं। नंद के फरजंद, कुरबॉंन तॉंडी सूरत पर,
तेरे नाल प्‍यारे, हिन्‍दुवॉंनी बन रहूँगी मैं।।
‘ताज’ जैसा हृदय आज किसके पास है।


……. हजरत ‘नफीस’ को तो मुरलीमनोहर इतने प्‍यारे हैं कि वे उनको देखते-देखते थकते ही नहीं। आप फरमाते हैं- कन्‍हइया की ऑंखें, हिरन-सी नसीली। कन्‍हइया की शोखी, कली-सी रसीली।। …… एक मुसल्‍मान फकीर ‘कारे खॉं’ का श्रीकृष्‍णप्रेम उन्‍हीं के शब्‍दों में देखिये- ” ‘कारे’ के करार मॉंहि, क्‍यों दिलदार हुए। ऐरे नँदलाल क्‍यों हमारी बार बार की।।”
….. मौलाना आजाद अजीमाबादी की कृष्‍णभक्‍ित देखिये। वे मुरलीमनोहर की मुरली के लिए फरमाते हैं- ”बजानेवाले के है करिश्‍मे जो आप हैं महब बेखुदी में। न राग में है, न रंग में है जो आग है उनकी बॉंसुरी में।।
हुआ न गाफिल, रही तलाशी
गया न मथुरा, गया न काशी।। मैं क्‍यों कहीं की खाक उडाता मेरा कन्‍हइया तो है मुझी में।।”
….. ‘रसखान’ के श्रीकृष्‍णप्रेम की थाह तो मापी ही नहीं जा सकती। ‘ ”मानुष हौं, तो वही ‘रसखान’
बसौं मिलि गोकुल गॉंव के ग्‍वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मझारन।। पाहन हौं, तो वही गिरि को जो धरो सिर छत्र पुरन्‍दर धारन। जो खग हौं तो बसेरा करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।।” …. ‘लाला मूसा’ को सर्वत्र श्रीकृष्‍ण-दर्शन हो रहा था, फरमाते हैं आप- ‘जहाँ देख वहॉं मौजूद, मेरा कृष्‍ण प्‍यारा है। उसी का सारा जल्‍वा, इस जहॉं में आशकारा है।
….. मियॉं वाहिद अली तो श्रीकृष्‍ण के लिये सारा संसार त्‍यागने पर उतारू हैं। आप की बात आपके ही शब्‍दों में सुनिये- ”सुंदर सुजान पर मंद मुस्‍कान पर
बॉंसुरी की तान पर ठौरन ठगी रहे। मूरति बिसाल पर कंचन की माल पर
खंजन-सी चाल पर खौरन सजी रहे।। भौंहें धनु मैनपर लोनें जुग नैन पर प्रेम भरे बैन पर ‘वाहिद’ पगी रहे। चंचल से तन पर सॉंवरे बदन पर
नंद के ललन पर लगन लगी रहे।।”
….. आलम खॉं देख रहे हैं – श्‍यामसुंदर का गायें चराकर शाम को गोकुल लौटना –
”मुकता मनि पीत, हरी बनमाल नभ में ‘सुर-चाप’ प्रकास कियो जनु। भूषन दामिनी-से दीपित हैं धुर वासित चंदन खौर कियो तनु।। ‘आलम’ धार सुधा मुरली बरसा पपिहा, ब्रजनारिन को पनु। आवत हैं वन ते, जसुधा-धन री सजनी घनस्‍याम सदा घनु।।”
…. आगरे के प्रसिद्ध कवि मियॉं ‘नजीर’ का बेनजीर कृष्‍णप्रेम उन्‍हीं के द्वारा सुन लीजिये –
”कितने तो मुरली धुन से हो गये धुनी। कितनों की सुधि बिसर गयी, जिस जिसने धुन सुनी।। क्‍या नर से लेकर नारियॉं, क्‍या रिसी औ मुनी।
तब कहने वाले कह उठे, जय जय हरी हरी। ऐसी बजाई कृष्‍ण कन्‍हइया ने बॉंसुरी।।”
…… ‘महबूब’ द्वारा गोपाल के गोपालन का दृश्‍य देखिये %
‘आगे धाय धेनु घेरी वृन्‍दावन में हरि ने
टेर टेर बेर बेर लागे गाय गिनने चूम पुचकार अंगोछे से पोंछ-पोंछ छूते हैं गौके चरन
बुलावें सुबचन ते।।’

…. बिलग्रामवासी सैयद अब्‍दुल जलील जब चारों अन्‍धकार-ही-अन्‍धकार देखते हैं तब कातर स्‍वर से मनमोहन पुकार कर कहते हैं –
”अधम अधारन-नमवॉं सुनकर तोर। अधम काम की बटियॉं गहि मन मोर।। मन बच कायिक निसि दिन अधमी काज। करत करत मन मरिगो हो महाराज। बिलगराम का बासी मीर जलील। तुम्‍हरि सरन गहि आयो हे गुन सील।।”
…… अकबर बादशाह के एक मंत्री, अब्‍दुलरहीम खानेखाना ‘रहीम’ – श्रीकृष्‍ण के कमलनयन पर मोहित होकर कहते हैं-
”कमलदल नैननि की उनमानि। बिसरत नाहिं मदनमोहन की मंद-मंद मुसिकानि। ये दसनन दुति चपला हू ते चारू चपल चमकानि।। बसुधा की बसकरी मधुरता, सुधा-पगी बतरानि। चढी रहै चित उर बिसाल की मुकत माल पैहरानि।। अनुदिन श्रीवृन्‍दावन में ते आवन-जावन जानि। अब ‘रहीम’ चित ते न टरति है, सकल स्‍याम की बानि।। रहीम साहब फिर फरमाते हैं-
‘कहि ‘रहीम’ मन आपनों, हमने कियो चकोर। निसि बासर लागौ रहे, कृष्‍न चंद की ओर।। रहिमन कोई क्‍या करै, ज्‍वारी-चोर-लबार। जो पत राखनहार है, माखन-चाखन हार।।
रहीम जी की दृष्‍िट में श्‍याम और राम में कोई अन्‍तर न था। वे दोनों रूपों के समान पुजारी थे। जब आगरे से रहीम को भिखारी बनाकर निकाल दिया गया तब वे चित्रकूट पहुँचे और उन्‍होंने एक दोहा कहा- ” चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस। जा पै विपदा परत है, सो आवै यहि देस।।”
….. आधुनिक मुस्‍लिम कवियों में भी अनेक ऐसे कवि रहे हैं जिनको श्रीकृष्‍ण के प्रति अथाह प्रेम है। बिहार के ‘मीर साहब’ ने श्रीकृष्‍णप्रेम पर अनेक कविताएँ रची हैं। प्रसिद्ध हिंदी लेखक मौलवी जहूर बख्‍श ने राम और श्‍याम की तारीफ में अनेक सफे रँगे हैं-

दतिया निवासी श्रीनवीसबख्‍स ‘फलक’ जी तो अपने जीवन को एकमात्र राधारानी के भरोसे पर ही कायम रखते हैं-
” राज के भरोसे कोऊ, काज के भरोसे कोऊ, साज के भरोसे कोऊ, कोऊ बर बानी के। देह के भरोसे कोऊ, गेह के भरोसे कोऊ नेह के भरोसे कोऊ, कोऊ गुरू ग्‍यानी के। नाम के भरोसे कोऊ, ग्राम के भरोसे कोऊ दाम के भरोसे कोऊ, कीरत कहानी के।। ब्रज है भरोसे सदा स्‍याम ब्रजराज के तौ ‘फलक’ भरोसे एक राधा-ब्रजरानी के।।”

अनेक मुसलमान गायक, वादक और अभिनेता बिना किसी भेद के श्रीकृष्‍ण के पुजारी हैं। पंजाब के मौलाना जफरअली साहब फरमाते हैं कि –
”अगर कृष्‍ण की तालीम आम हो जाए। तो काम फितनगारों का तमाम हो जाए।। मिट जाए ब्रहम्‍न और शेख का झगडा। जमाना दोनों घर का गुलाम हो जाए। विदेशी की लडाई की धज्‍जी उड जाए। जहॉं यह तेग दुदुम का तमाम हो जाए।। वतन की खाक से जर्रा बन जाए चॉंद। बुलंद इस कदर उसका मुकाम हो जाए। है इस तराने में बांसुरी की गूंज। खुदा करे वह मकबूल आम हो जाए।।”
मुसल्‍मान कवियों ने बडे प्रेम से श्रीकृष्‍ण को अपनाया है और साथ ही हिन्‍दी साहित्‍य को भी अपनाया है। ऐसे मुसल्‍मानों पर हम गर्व कर सकते हैं और उनको धन्‍यवाद भी दे सकते हैं।
आधुनिक हिन्‍दी के जन्‍मदाता बाबू हरिश्‍चन्‍द्र ने ठीक ही कहा है- ‘इन्‍ह मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्‍दू वारिये।’
सच है-
‘जाति-पाति पूँछे नहि कोई। हरिको भजै सो हरि का होई।।’
(मूल लेखक – स्‍वामी श्री पारसनाथ जी सरस्‍वती, ‘कल्‍याण’ – गीताप्रेस गोरखपुर से साभार, शोध एवं प्रस्‍तुति : सर्जना)

ठा. सम्‍भर सिंह सम्‍मान 2012

मुरैना। देश के महान शिक्षाविद एवं अपना सर्वस्‍व विद्यार्थियों के लिए समर्पित करने वाले देश-विदेश में चर्चित रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ चन्‍द्रपाल सिंह सिकरवार द्वारा प्रतिवर्ष जुलाई माह के अंतिम रविवार को प्रदान किये जाने वाले ठा. सम्‍भर सिंह सम्‍मान से सम्‍मानित होने वाले व्‍यक्‍ितयों में डॉ रामकुमार सिंह भी सम्‍मिलित रहे। उन्‍हें यह सम्‍मान उच्‍च शिक्षा में योगदान के लिए प्रदान किया गया है। कार्यक्रम, श्री बी ए परमार, जिला न्‍यायाधीश-सतर्कता,जिला ग्‍वालियर की अध्‍यक्षता में आयोजित हुआ।इसमें मुख्‍य अतिथि के रूप में कलेक्‍टर मुरैना श्री डी डी अग्रवाल, तथा विशिष्‍ट अतिथि के रूप में सर्व श्री डीके नायक, प्रभारी जिला न्‍यायाधीश, जयदेवन ए- आइपीएस, श्री अभिषेक सिंह आयएएस उपस्‍िथत थे।

यमलोक में पार्टी (डॉ. रामकुमार सिंह द्वारा लिखित प्रहसन नाटक)


पहला दृश्‍य
(यमराज का दरबार। वे प्रसन्‍न नजर आ रहे हैं। चित्रगुप्‍त चश्‍मा लगाए हिसाब-किताब कर रहे हैं।)
यम : यम हैं हम। चित्रगुप्‍त, हम अत्‍यधिक प्रसन्‍न हैं। यमलोक में खूब चहल-पहल है। यहॉं नागरिकों की संख्‍या बढ़ती ही जा रही है। चित्रगुप्‍त : ठीक कहा महाराज। जितनी ज्‍यादा जनता, उतने ज्‍यादा वोट।
यम : चित्रगुप्‍त, आज यमलोक में एक पार्टी का आयोजन किया जाय, जिसमें देवता, दैत्‍य,ऋषि सभी शामिल हों। चित्रगुप्‍त : ठीक कहा महाराज। जनाधार के लिए हर वर्ग और समुदाय के लोग होने ही चाहिए।
महाराज अभी-अभी हमारे यमदूत जिस चटोरे मानव को लेकर आए हैं उसके हाथ में मृत्‍युलोक के लजीज व्‍यंजनों का आकर्षक छपाई वाला एक मीनू-कार्ड है महाराज।
आपकी आज्ञा हो तो इस बार पृथ्‍वी-लोक का उगाया और पकाया गया अन्‍न ही पार्टी का मुख्‍य आकर्षण्‍ा रख दिया जाए।
यम : वाह, वाह। अति उत्‍तम विचार है। हमने भी काफी दिनों से ह्रीम-क्रीम नहीं खाई। चित्रगुप्‍त : ह्रीम-क्रीम नहीं, आइसक्रीम महाराज।
यम : हुं हुं (खांसते हुए) वही , वही।

दूसरा दृश्‍य
(यमलोक में पार्टी चल रही है। ब्रह्मा जी,शंकर जी और देवराज इन्‍द्र सहित सभी देवता आए हैं। कुंभकर्ण भी नींद से जागकर आ गया है। अन्‍य दैत्‍य भी हैं। खाने-पीने के लिए मशहूर अगस्‍त्‍य ऋषि भी पधार चुके हैं, धुंआधार पार्टी चल रही है। शिवजी के भूत-प्रेत डीजे की धुन पर डांस कर रहे हैं। अचानक कोई पेट पकड़ लेता है तो कोई उल्‍िटयॉं करने लगता है। कोई वॉशरूम की तरफ भागता है)

तीसरा दृश्‍य
चित्रगुप्‍त बदहवास भागता हुआ यमराज को खबर करता है।
चित्रगुप्‍त: महाराज, महाराज। गजब हो क्‍या। यम : भारत की बिजली-समस्‍या के ब्‍लैक-आउट से बड़ा क्‍या गजब हो सकता है चित्रगुप्‍त। बोलो, कुपोषित मानव की तरह तुम्‍हारा चेहरा क्‍यों उतरा हुआ है।
चित्रगुप्‍त : महाराज, पार्टी में कई लोगों का पेट खराब हो गया है।, उल्‍िटयॉं हो रही हैं। बड़े-बडे़ दिग्‍गज वॉशरूम की तरफ दौड़ रहे हैं।
यमराज : (चौंकते हुए) ऍं, इसका क्‍या कारण है चित्रगुप्‍त।
चित्रगुप्‍त : महाराज, बिना उगाया अन्‍न और बिना श्रम के पकाया जाने वाला खाद्य खाने वाले देवता जो सदैव अभिनेताओं द्वारा अनुशंसित वाटर-फिल्‍टर का ही पानी पीते हैं, उनके सहित विभिन्‍न दैत्‍य, और लम्‍बी डकार लेने वाले चिरंजीवी ऋषि, ये सभी मृत्‍युलोक के भोजन से बीमार पड़ गये हैं, महाराज।
यम: क्‍या कहते हो।।।।।
चित्रगुप्‍त : सत्‍य कहता हूँ महाराज, देवताओं ने 20 मिनिट में पिज्‍जा हाजिर करवाया था। अब इतनी ही देर में एम्‍बुलैंस बुलाने की जरूरत आ पड़ी है। सारे देवता झिंगा-लाला हो रहे हैं, अब गए कि तब गए।।। ऊपर से पूरा फास्‍ट-फूड मीनू चाट गए हैं।
यम : ग्रहों की क्‍या स्‍थिति है चित्रगुप्‍त : बुरा हाल है महाराज, सबसे ज्‍यादा कुशल पाचन-तंत्र वाले शनि की दशा खराब चल रही है। शनि चाट-पानीपूरी, नूडल्‍स और पावभाजी का बड़ा शौकीन है। अब औंधे मुँह डला है। पृथ्‍वीलोक का कोई भी डॉक्‍टर ‘सत्‍यमेव जयते’ के इश्‍यू की वजह से शनि का फोन रिसीव नहीं कर रहा है।
यम : अगस्‍त्‍य ऋषि तो समु्द्र पीकर पचा गए थे………
चित्रगुप्‍त : मगर रासायनिक कोल्‍ड-ड्रिंक्‍स नहीं पचा सके महाराज। 30 मिनिट का रास्‍ता 3 मिनिट में तय करते हुए बस आपके पास आते ही होंगे।
यम : इससे तो लगता है……धरती लोक के खाद्य-पदार्थ सिर्फ दैत्‍य ही पचा सकते हैं…..
चित्रगुप्‍त : गलतफहमी में न रहें महाराज। कुंभकर्ण को भी एसिडिटी हो गई है। उसकी नींद भी उड़ गई है। दैत्‍यलोक से उसके फेमिली डॉक्‍टर का कहना है कि नींद की दवाईयॉं मृत्‍युलोक से ही लानी पड़ेंगीं। लेकिन कुंभकर्ण के लायक डोज उपलब्‍ध ही नहीं है। सरकारी अस्‍पताल की दवाईंयॉं ब्‍लैक में चली गई हैं। एन्‍टा-एसिडों में भी मिलावट की खबर है।
यम : ऐसा क्‍या खा लिया उसने……. चित्रगुप्‍त : महाराज, प्रतिबंधित खोए की मिठाईयॉं खा गया महाराज, कहता था – ‘कुछ मीठा हो जाए’। यह भी कहता था – ‘हर एक स्‍वीट जरूरी होता है’। आखिरकार हालत खराब।।। यम : तो क्‍या धरती पर मिठाइयॉं भी दूषित हो गई हैं। वहॉ भगवान का भोग नहीं लगाते क्‍या।।।।।। चित्रगुप्‍त : लगाते हैं महाराज।।।।
यम : फिर भगवान अब तक कैसे बचे हैं।।।।।
चित्रगुप्‍त : भोग लगाकर वापस उठा लिया जाता है महाराज, इसलिए भगवान अब तक वहॉं से नहीं उठे हैं।
यम : हूँ……संभवत: इसीलिए धरतीलोक भगवान भरोसे चल रहा है। चित्रगुप्‍त : महाराज, पितामह ब्रह्माजी ने नारद की अध्‍यक्षता में एक जॉंच-कमेटी बनाई है जो मामले की जॉंच करने जा रही है, सरक्‍यूलर रेडी है, आपके हस्‍ताक्षर चाहिए। यम : अवश्‍य, अवश्‍य…(एक बहुत लम्‍बे पेन से सिंहासन पर बैठे हुए दूर से ही हस्‍ताक्ष्‍ार करते हैं)


चौथा दृश्‍य
(ब्रह्माजी और यमराज विराजमान हैं। नारद अपने जॉंच दल के साथ आते हैं। साथ में एक खाद्य अधिकारी और डाक्‍टर भी है।)

नारद : नारायण, नारायण। परमपिता और यमराज की जय हो। (रिपोर्ट की कॉपी लेकर पढ़ते हैं।)आज इस सदन के प्रश्‍नकाल में उठे सवालों के जबाब में जॉंच दल की रिपोर्ट लेकर में उपस्‍थित हूँ। महाराज, रिपोर्ट में हमेशा की तरह कई चौंकाने वाले तथ्‍य सामने आए हैं। मृत्‍युलोक में अन्‍न उगाने से लेकर ही रसायनों का उपयोग शुरू हो जाता है। दूध, घी, खोया, ये सभी रासायनिक विधि से बनाए जा रहे हैं। कृत्रिम रंग और कृत्रिम स्‍वाद जोरों पर है। विज्ञापनों का खर्च भी मिलावट कर पूरा किया जा रहे है। अनाप-शनाप तरीके से जनता-जनार्दन मिलावटी खाद्य-पदार्थों को मुँह में ठूँसे जा रहे हैं।
माननीय महोदय, यमलोक की पार्टी में ब्रह्माजी के दॉंत न होने से ऑंतें सुरक्षित बच गईं। पालनहार विष्‍णु धरती के एक शुद्धभोजी विद्यालय के एनुएल फंक्‍शन में गए हुए थे। अत: सुरक्षित हैं। पार्टी में भगवान शंकर को छोड़कर इस जहर को कोई नहीं पचा सका है। देवताओं के राजा इन्‍द्र भी हर मौसम आम का मजा ले रहे है, अब आम आदमी के अस्‍तपाल में भर्ती हैं।
ब्रह्मा जी : हूँ…..खाद्य विभाग और औषधि विभाग की तैनाती का क्‍या हुआ।।। नारद जी : जनता-जनार्दन जागरूक नहीं है परमपिता,ये खाद्य अधिकारी मिलावट में भी मिले हुए हैं। ये जो डॉक्‍टर हमें धरतीलोक पर मिले हैं, वे भी मिलावटी औषधियों कमीशन मिलाए हुए हैं। इस मिली-जुली रिपोर्ट में जो भी परिणाम मिला है सब मिलावट को उत्‍तरदायी मानता है।
यम : (अपना सिर पकड़ते हुए) : ओह। ……अब समझ में आया हमारे यमलोक में इतनी जनसंख्‍या क्‍यों बढ़ रही है।
(पटाक्षेप)

एनसीईआरटी द्वारा पुरस्‍कृत परियोजना का सारांश

Development of activity-based text material for multi-lingual groups
बहुभाषी समूहों के लिए गतिविधि-आधारित मुद्रित पाठ्यवस्‍तु का विकास


1. परिचयात्‍मक :- केन्द्रीय विद्यालय दोणिमलै में परियोजना का लक्ष्य-समूह विशिष्ट है। विशिष्ट व अद्वितीय परिस्थितियों में अधिगम के स्थानांतरण की विशिष्टीकृत प्रविधियों को लेकर शिक्षक दैनंदिन चुनौतियों का सामना कर रहे थे। मातृभाषा से इतर भाषा में अनुवाद के माध्यम से अधिगम का स्थानांतरण उन कक्षाओं में एक सीमा तक प्रभावी हो सकता है जहाँ कक्षा में मातृभाषा से इतर भाषा में अधिगम प्राप्त करने वाले विद्यार्थी एकरूपता के साथ किसी एक भाषा को बोलने वाले हों, किन्तु हमारे विशेष संदर्भ के विद्यार्थियों का लक्ष्य-समूह एक ही समय में विभिन्न भाषाभाषी है। इनमें कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बंगाली सहित अनेक मातृभाषाओं व घरेलू भाषाओं के विद्यार्थी हैं।
राष्ट्रीय पाठ्यश्चर्या-2005 अपने घनीभूत निष्कर्षों से हमारा मार्ग आलोकित करती है। एक ओर यह सुझाती है कि बहुभाषिकता बच्चे की अस्मिता का निर्माण करती है, तो दूसरी ओर यह सचेत भी करती है कि बच्चे की मातृभाषा(ओं) को नकारना या उनको मिटाने के प्रयास उसके व्यक्तित्व में हस्तक्षेप की तरह लगते हैं। प्रभावी समझ और भाषा(ओं) के प्रयोग के माध्यम से बच्चे विचारों, व्यक्तियों और वस्तुओं तथा अपने आसपास के संसार से अपने आपको जोड़ पाते हैं।
स्नातकोत्तर शिक्षक हिन्दी, डॉ रामकुमार सिंह ने गणित के कालखण्ड में अपने ‘अरेंजमेंट-क्लास’ के दौरान अवलोकन किया कि उच्च कक्षा के विद्यार्थी गणित की कुछ समस्याओं को समझाने के लिए एक-दूसरे से स्थानीय मिश्रित भाषा का प्रयोग कर रहें हैं, जो प्रथम-दृष्ट्या एक अप्रत्याशित संवाद-शैली लगी। कक्षा-अध्यापक के रूप में शिक्षक ने अवलोकन किया कि कक्षा- 8 वीं में निश्चित ‘रोटेशनवाइज सीटिंग अरेंजमेंट’ तय करने पर भी समान मातृभाषा वाले विद्यार्थी शिक्षक के आने तक आसपास बैठे संवाद करते मिलते है जो शिक्षक के आने पर तेजी से पुनः अपने स्थान पर चले जाते हैं। अन्य शिक्षकों से विचार-विमर्श करने पर भी अनुभव इसी प्रकार के मिले। प्राचार्या श्रीमती निर्मला कुमारी एम ने इन अनुभवों को सकारात्मक गंभीरता से लेकर अवलोकन के निर्देश दिये। इसी दौरान एनसीईआरटी की नवाचारी परियोजना के पटल ने विचार को मुक्त आकाश दे दिया। अनुसंधान तार्किक रूप क्रियात्मक अनुसंधान (Action research) का एक वैशिष्ट्यपूर्ण रूप होगा, यह तय कर लिया गया।
2. उद्देश्‍य : सीखने की प्रक्रिया का अंतिम निर्णायक तत्व यही माना जाना चाहिए की शिक्षक की क्रियाओं पर अंततः विद्यार्थी की प्रतिक्रिया किस रूप में उत्साहजनक है। हमारे विशिष्ट संदर्भ में इस उत्तेजक प्रतिक्रिया एक बड़ा हिस्सा कहीं भाषायी अवरोध के कारण तो नहीं दबा हुआ, यह देखना परियोजना का महत्वपूर्ण और प्राथमिक संस्कार था ।
हमारे सामने तार्किक रूप से यह देखने का उद्देश्य भी था कि यदि विद्यार्थी को शब्द-चित्र की पहचान उसके अनुभवों का संयोजन है जो उसे आगे का ज्ञान से जोड़ता है तो हमारे सामने अपनी बहुभाषी कक्षा के प्रत्येक सदस्य की विशिष्टता को ध्यान में रखना एक चुनौती थी, कम से कम एक भाषा-समूह को एक इकाई मानते हुए भी। तो क्या हर भाषा-भाषी विद्यार्थी के लिए गतिविधि का चयन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा।
गतिविधियों को लेकर यह भी आवश्यक था कि हमारी विशिष्ट कक्षा में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया केवल सामान्य अकादमिक न होकर सामुदायिक,सांस्कृतिक और भाषायी सौहार्द का जरिया भी तो बन सके। जैसा कि इस प्रकार के वातावरण में उद्देश्य होना चाहिए।
इतना ही नहीं, इस परिवेश का ध्यान रखा जाना विभिन्न गतिविधियों के माध्यम शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध को भी तय करता है। हमारे विशिष्ट परिप्रेक्ष्य में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
राष्ट्रीय पाठ्श्चर्या-2005 तक आते हुए निश्चित रूप से यह तथ्य और मजबूती से स्थापित हुआ कि सीखने की प्रक्रिया किस प्रकार गतिविधियों के माध्यम से जीवंतता पाते हुए कक्षा की दीवारों से बाहर जाती है।
इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए परियोजना का शीर्षक विहित किया गया। इस शीर्षक में निहित है कि-
1. बहुभाषी कक्षा में विद्यार्थियों के सीखने व उन्हें सिखाने की प्रक्रिया को चुनौती के रूप लेना।
2. पाठ्यवस्तु को विद्यार्थियों को हृदयंगम् कराने के लिए इस प्रकार गतिविधि की योजना करना ताकि विभिन्न मातृभाषा वर्ग की शक्ति का लाभ उठाते हुए कक्षा में अधिगम का स्तर उठाया जा सके।
नवाचारी परियोजना की अभिकल्पना करते समय तार्किक रूप से हमारे समक्ष कुछ प्रमुख बिन्दु इस प्रकार थे-
1. विद्यालय की प्रत्येक कक्षा की बहुभाषिकता: जैसा कि इंगित किया है कि केन्द्रीय विद्यालय दोणिमलै की प्रत्येक कक्षा का बहुभाषी वातावरण विशिष्ट रूप से तार्किक पटल है।
2. अनुवाद की समस्या: बहुभाषी कक्षा में माध्यम की भाषा के साथ-साथ प्रभावी सम्प्रेषण हेतु मातृभाषा में अनुवाद किस प्रकार किया जाए।
3. कक्षा की न्यूनतम ग्रहणशीलता तय करना: अलग-अलग मातृभाषायी संस्कार-चित्रों को लेकर एक ही कक्षा में उपस्थित विद्यार्थियों के समुच्चय की न्यूनतम ग्रहणशील संवेदना (Common Minimum Receiving Sensitivity)– CMRS नामक मौलिक पद का सृजन परियोजना की तार्किक समुपस्थित कs प्रस्थान हेतु किया गया।
4. मंदगति अधिगम की धारणा बहुभाषी कक्षा के अनुसार तय करना।
5. कक्षा प्रबंधन को बहुभाषी परिवेश के अनुसार ढालकर उसका अधिगम के लिए सकारात्मक दोहन करना।
इसका उद्देश्य यह भी था कि यह आलोकित करे, कि- बहुभाषिक कक्षाओं विशेषकर दक्षिण-भारतीय परिवेश में कक्षाओं में शिक्षण की वैशिष्ट्ययुक्त परिस्थितियाँ क्या हैं तथा इन परिस्थितियों में शिक्षण के लिए शिक्षकों के सामने क्या-क्या चुनौतियाँ उपस्थित हैं? केन्द्रीय विद्यालय दोणिमलै जैसे परियोजना-क्षेत्र इस संदर्भ में वस्तुनिष्ठ रूप से ऐसे मार्गदर्शी अनुभव संजोने के उपयुक्त स्थल हैं जहाँ विद्यार्थियों और शिक्षकों के पास बहुभाषिक संरचना की संपदा उपलब्ध है। यह परियोजना एनसीएफ-2005 तथा तदनुरूप सीसीई ग्रेडिंग पद्धति के प्रकाश में नये आयामों को अंशदान देने वाली सिद्ध हो सके।

3.प्रविधि एवं मानव व गैर-मानव संसाधन –
क-क्षेत्र एवं लक्ष्य-समूह के स्तर पर : परियोजना का क्षेत्र केन्द्रीय विद्यालय दोणिमलै रखा गया। विद्यालय में प्रथम चरण में कक्षा-3 से कक्षा-12 वीं तक की 20 कक्षाओं के कुल 685 विद्यार्थियों का भाषा-सर्वेक्षण किया गया। इन कक्षाओं में से नवाचारी प्रयोग के लिए चुनी गई विभिन्न 10 नमूना कक्षाएँ प्रयोग एवं अनुसंधान के लिए चयनित की गईं। इसमें 10 प्रकार से अधिक विविध मातृभाषाओं वाले कुल 291 विद्यार्थियों की भाषाई संरचना का सांख्यिकीय अध्ययन किया गया।
ख- परियोजना-दल के स्तर पर : बिन्दु क्रमांक 4 (ग) के अनुसार गठित 11 सदस्यीय परियोजना दल के अलावा 3 अन्य कक्षा-शिक्षक, 02 विशेष आमंत्रित सदस्यों का सहयोग भी लिया गया।
ग-मित्र-छात्र दल के स्तर पर : परियोजना में अध्ययन-अनुसंधान के लिए प्रत्येक कक्षा से विद्यार्थियों का दल निर्मित किया गया।
घ-तकनीक एवं प्रणाली के स्तर पर : परियोजना संचालन में तथ्य-संकलन, समूह-चर्चा, परियोजना-दल का आंतरिक-संवाद, परियोजना-दल एवं छात्र-मित्र दल से संवाद। विशेष परियोजना-कक्ष में विद्यार्थियों के साक्षात्कार एवं चर्चाएँ, कक्षाओं में विशेष उद्देश्य के साथ परियोजना-दल द्वारा नियमित शिक्षण। दृश्य-श्रव्य अनुभव वास्तविक अनुभव के अत्यंत निकट होते हैं। यह ध्यान में रखते हुए गतिविधि का एक हिस्सा डिस्प्ले आधारित रखा गया। वस्तुनिष्ठ संवादों का अभिलेखीकरण एवं दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग आदि प्रणाली व कार्य-तकनीक का इस्तेमाल किया गया। परियोजना की सम्पूर्ण अवधि में विद्यार्थियों की गतिविधियों, साक्षात्कार, संवाद आदि की लगभग 15 घंटे की वीडियो रिकॉर्डिंग की 16 जीबी परिमाण की 6 डीवीडी संलग्न की गई हैं, जो परियोजना के प्रत्यक्ष क्रियान्वयन का प्रमाण हैं, साथ ही कई नये तथ्यों पर सीधा प्रकाश भी डालती हैं।
अपनी मौलिक आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यान्वयन के चरण स्पष्ट रूप से संचालित किये गये। इस दौरान लगातार गतिविधियाँ होने से सभी 10 प्रायोगिक कक्षाओं का वातावरण अभूतपूर्व हो गया :-
1. कक्षा-अध्यापकों के माध्यम से प्रत्येक कक्षा की भाषायी स्थिति का आंकलन प्रारूप एफ-1ए तथा एफ-1 बी के अनुसार किया गया। चुनी गई कुल 10 कक्षाओं के 685 विद्यार्थियों की बहुभाषिक स्थिति अपने आप में अद्वितीय है। इसमें 10 से अधिक प्रकार की मातृभाषा वाले विद्यार्थियों के 10 से अधिक प्रकार की अन्य भाषाज्ञान का पता चलता है। 10 कक्षाओं को 11 संकाय सदस्यों द्वारा ‘प्रत्येक एक’के अनुसार चुना गया।
2. सबसे पहले किसी एक कक्षा को संबंधित संकाय सदस्य ने प्रयोग के लिए चुना। उस कक्षा का भाषा-सर्वेक्षण संकाय-सदस्य को सौंप दिया गया। इस प्रकार कुल 10 कक्षाओं में प्रयोग हुए।
3. शिक्षक ने सर्वप्रथम प्रारूप- एफ-2 ए के अनुसार कक्षा को तीन हिस्सों में बाँटा। इसमें भाषायी आधार को विशेष ध्यान में रखते हुए चुनौतीपूर्ण, औसत और सहज अधिगम वाले विद्यार्थी समूह वगीकृत किये गये।
4. प्रारूप एफ-2 बी के अनुसार संवाद-मित्र : सभी 10 कक्षाओं में शिक्षकों द्वारा भाषायी आधार पर समूह बनाते हुए एक-एक मेधावी भाषा-संवाद-मित्र (दल-नायक) चुने गए।
5. पाठ्यपुस्तक में संकलित पाठ्यक्रम-आधारित वे अवधारणायें या प्रकरण चुने गए, जो आगामी मूल्यांकन (सीसीई कक्षाओं में संकलित मूल्यांकन-2 व रचनात्मक-मूल्यांकन-3/4) का हेतु हैं, ताकि कक्षाओं की स्वाभाविक गतिशीलता में प्रयोगों के कारण समय-सीमा प्रभावित न हो। गतिविधियों के स्तर भी अलग-अलग रखे गए- यथा- कक्षा-कक्ष स्वाभाविक शिक्षण, उपकरणों के माध्यम से प्रदर्शन-विधि, कक्षा-कक्ष के बाहर गतिविधि, समूह-विभाजन एवं विद्यार्थियों से साक्ष्य-पूर्ण संवाद।
6. अनुसंधित्सु संकाय-सदस्यों को इस सम्बन्ध में सचेत रहते हुए सभी अवलोकनों को प्रारूप एफ-3ए तथा एफ-3 बी में पंजीबद्ध करने के लिए कहा गया कि कक्षा में बहुभाषी परिवेश को ध्यान में रखकर कक्षा की न्यूनतम ग्रहणशील संवेदना (सीएमआरएस) में प्रयोगपूर्व व पश्चात क्या परिवर्तन होता है।
7. प्रत्येक समूह के विद्यार्थियों की तीन-तीन स्कैनिंग पूर्व व पश्चात की गईं। इसमें लिखित और मौखिक दोनों प्रदर्शनों को समान महत्व दिया गया। आवश्यकतानुसार मूल्यांकन में ग्रेडिंग पद्धति वाली लचीली सीमा का भी पालन किया गया। प्रयोग पश्चात भी तीन-तीन स्कैनिंग की गईं। विद्यार्थियों द्वारा बताए गए तथ्यों को सीधे साक्ष्य के रूप में विजुअल रिकॉर्ड भी किया गया।
8. अध्ययन के ये सभी चरण इस प्रकार निर्धारित किये गए जिससे अध्ययन व्यक्तिपरक हो और परिणाम समूह/कक्षा सम्प्रेषणपरक। अर्थात जानने की दिशा यह थी कि बहुभाषी कक्षा में अधिगम की चुनौतियां क्या हों और गतिविधियों का भाषा-समूह पर क्या प्रभाव है।
4.परिणाम एवं प्राप्‍तियॉं :- इस परियोजना के खण्ड 3.3 की विभिन्न गतिविधियों और विभिन्न भाषा समूहों के साथ एक जैसा प्रयोग करने पर यह तथ्य सामने आया कि :-
1. बहुभाषी कक्षा में विद्यार्थियों की ओर उनकी मातृभाषा में संकल्पना को पहुँचाने अथवा बहुभाषायी कक्षा-परिवेश को ध्यान में रखकर की गई गतिविधि से वे तथ्यपरक और आत्मपरक रूप से उसे हृदयंग करने में सक्षम होते हैं।
2. उच्चतर कक्षाओं की अपेक्षा माध्यमिक व प्राथमिक कक्षाओं में विद्यार्थी अधिगम्यता में उल्लेखनीय परिणाम स्पष्टतः सामने हैं।
3. गणित व अन्य तकनीकी विषयों में विशेषतः मंदगति अधिगम वाले विद्यार्थियों के लिए मातृभाषा आधारित गतिविधियाँ उल्लेखनीय भूमिका निभाती हैं।
4. इस परियोजना के दो पक्ष- मातृभाषा/मूल भाषा ज्ञान के आधार पर अध्यापन एवं गतिविधियों का विस्तार, दोनों ही अधिगम्यता को बढ़ाने वाले सिद्ध होते हैं। परियोजना अपने परिणामों में यह अनुशंसा रखने की स्थिति में है कि गतिविधियों को बढ़ाया जाना बहुभाषी-कक्षा की अधिगम्यता को बढ़ाने में अत्‍यंत कारगर, और कहीं-कहीं एकमात्र विकल्‍प है।
5. परियोजना मौलिक रूप इस विशिष्ट परिस्थिति में बहुभाषी-कक्षा की जिस न्यूनतम ग्रहणशील संवेदना (Common Minimum Receiving Sensitivity (CMRS) की बात करती है, वह पूर्वज्ञान की अवधारणा में परिवर्तन करने वाला कारक है। बहुभाषी कक्षा में विद्यार्थियों का पूर्वज्ञान तय करते समय शिक्षक इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकता कि उसके सामने अलग-अलग भाषा-संस्कार चित्रों के विद्यार्थी हैं। अतः उसकी पाठ-योजना का प्रस्थान-बिन्दु निर्धारित करने में यह परियोजना महत्वपूर्ण परिणाम दे रही है।

5.शैक्षणिक सुधार के क्षेत्र में सुझाव :- यह परियोजना बहुभाषी कक्षा में भाषायी आधार पर अधिगम-प्रक्रिया के निर्धारण तथा गतिविधियों द्वारा सर्वभाषाभाषी-समुदाय के प्रति अधिगम्यता को सरलीकृत रूप में पहुँचाने की वकालत करती है। साथ ही मूल भाषायी-संस्कारों की उपेक्षा का विरोध करती है।
परियोजना संस्थागत-सुधार को जिस रूप में पुष्ट करती है उससे संस्था की सामाजिक-मानवीय गरिमा में अभिवृद्धि तय की जा सकती है। विद्यार्थियो के मातृभाषायी संस्कारों को समुचित अनुशासन के साथ अधिगम प्रक्रिया में स्थान देकर संस्था राष्ट्रीय पाठश्चर्या-2005 एवं व्यापक व सतत मूल्यांकन (सीसीई) की मूल भावना को ही एक आयाम देने का कार्य करती है। वास्तव में परियोजना की प्रेरणा से संस्था में अधिक गतिविधियों के विस्तार, प्रदर्शन-विधियों, कक्षा के बाहर की गतिविधियों एवं मूल्यांकन के नये आयामों का जगह मिलती है। परियोजना इन्हीं उद्देश्यों से संस्थागत सुधार में स्वयं को सफल मानती है।
यदि संस्थान इस परियोजना की संस्तुतियों के आधार पर स्थानीय भाषा के समुचित उपयोग के अवसर प्रदान करता है तो समाज में शिक्षण संस्थानो के प्रति, चाहे वे किसी भी माध्यम में शिक्षा दे रही हैं, उनके प्रति एक लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक सम्मान की भावना पैदा होती है जो समाज में एक समरसता पैदा करती है। विभिन्न समुदायों को निकट लाती है और राष्ट्रीय एकता के एक महत्वपूर्ण आधार भाषा को उपेक्षित होने से बचाती हैं। परियोजना का यह स्पष्ट मंतव्य सामने आया है कि विभिन्न भाषाओं की अस्मिता को बचाये रखने और भारतीय भाषाओं की सुरक्षा के लिहाज से यह कदम अत्यंत दूरगामी होगा, ताकि अपनी मातृभाषा की लिपि से दूर हो चुके हमारे विद्यार्थी भविष्य में सर्वथा मूल भाषायी संस्कारों को न खो बैठें।
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An innovative project By K.V. Donimalai-583118,Distt-Bellary,Karnataka.
Team Leader – Mrs. Nirmala Kumari M., Principal
Coordinator – Dr. Ramkumar Singh, PGT-Hindi
Faculty Members – Mr. T.V.Loganathan, PGT- Commerce; Mr. PIT Raja, PGT (Biology); Mr. Ajmer Singh, PGT-Computer Science; Mr.MS Kumar Swamy, TGT-Mathematics; Mr. Balendra Pratap Singh, TGT- Social Studies; Mr. Roopchand, TGT-Sanskrit, Mr. Abdul Gaffur, PRT; Mr. Kasim Mansoor, PRT; Mr. K.Akhil, PRT
राष्ट्रीय पाठश्चर्या-2005 के भाषा सम्बन्धी अध्याय 3.1 के महत्वपूर्ण सुझाव अवलोकनीय

“Teaching is undertaken so that learning can occur. Hence the sources of any lesson can best be judged in terms of the learning that results from it, in terms of the learners’ reactions to the teacher’s reaction.” ‘Class room interaction’ , Ann malamath – Thomas; ELBS with Oxford university press.(Page no 5)
“ Word recognition is the only means to the appreciation of written material. For the most part of the word recognition skills are useful only with words already in child’s speaking vocabulary.” _ “Sight words are the basis of all word recognition activities. Repetition appears to be necessary in the rote learning of sight vocabulary. Avtive response ensure the learner is attending to the teaching situations and also aids learning.”- ‘Reading: Teaching and Learning’ Page no 122, Terry D. Johnson ; English language book society and Macmillan Education 1982.
“ Life of people can be improved only when they are enabled to solve their problems, economic, social religious and political. The problem today is, how our schools can best help all our children and youth to participate effectively and with the personal satisfaction in the enduring process of learning. How can teachers sensitize them to the intolerable disparities of human circumstance, stimulate in them a feeling of personal responsibility for remedying the evils they see, give them knowledge and skills necessary for intelligent judgement and action and inculcate in them unfailing loyalty to democratic ideals and practices? This is the problem of our generation.” ‘Working with community and teaching education’, Page no 20, J. S. Grewal & B. S. Gupta; Ram Prasad and sons ; Bhopal

“Common Minimum Receiving Sensitivity (CMRS) : कक्षा की न्यूनतम ग्रहणशील संवेदना से आशय है कि कक्षा के विद्यार्थी अधिगम प्राप्त करते समय न्यूनतम रूप से जिन सम्प्रेषणों को ग्रहण कर लेने में सक्षम होते हैं। इसके लिए विभिन्न आधार हो सकते हैं। यथा कक्षा में मंदगति अधिगम वाले विद्यार्थियों, औसत अधिगम वाले विद्यार्थियों व सहज अधिगम वाले विद्यार्थियों में स्पष्टतः ग्रहणशीलता Receiving Sensitivity का मान अलग-अलग होगा। इस स्थिति में कक्षा की न्यूनतम ग्रहणशील संवेदना उस अंतिम विद्यार्थी की ग्रहणशीलता के तुल्य होगी जिके प्रति सबसे कम अधिगम का स्थानांतरण हुआ है। बहुभाषी कक्षा में सीएमआरएस को बढ़ाना हमारी परियोजना का तार्किक लक्ष्य था। तथा इसके लिए उपकरण मातृभाषा रखा गया। इस पद का मान बढ़ाने का आशय एक साथ कई मंदगति अधिगम विद्यार्थियों के लिए अधिगम के स्थानांतरण में मात्रात्मक और गुणात्मक अभिवृद्धि करना है ताकि कक्षा की सीएमआरएस में सामूहिक प्रयासों से अभिवृद्धि हो। क्यों कि इसे बढ़ाने का अन्य तरीका केवल मंदगति अधिगम विद्यार्थियों में से प्रत्येक पर व्यक्तिगत शिक्षण करना है जो कि कक्षा की सामूहिक अवधारणा के साथ व्यावहारिक दृष्टि से संभव नहीं होता है।

—– शुभम—–

डॉ. रामकुमार सिंह की परियोजना को एनसीईआरटी का राष्ट्रीय पुरस्कार

नवाचार के क्षेत्र में प्रयोग एवं अभ्यास के लिए एनसीईआरटी की राष्ट्रीय सेमीनार में लिया हिस्सा



नई दिल्‍ली/ग्वालियर/मुरैना/दोणिमलै। भारत में शिक्षा के क्षेत्र में नवाचारी प्रयोगों की खोजबीन और अभ्यास के लिए प्रतिवर्ष दिये जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कारों की श्रेणी में मुरैना निवासी डॉ. रामकुमार सिंह, पीजीटी-हिन्दी, केविसं की परियोजना को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया है।
एनसीईआरटी के अध्यापक शिक्षा एवं विस्तार विभाग द्वारा 5 से 6 जून 2012 को एनसीईआरटी,नई दिल्ली स्‍थित चाचा नेहरू भवन, सीआईईटी में आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में परियोजना दल के मुख्य अन्वेषक एवं समन्वयक के रूप में डॉ. सिंह को प्रजेन्टेशन के लिए आमंत्रित किया गया था।
डॉ. सिंह की परियोजना के तहत 11 सदस्यीय दल ने ”चैलेन्जेज फॉर ट्रान्सफर ऑफ लर्निंग टुवर्ड्स मल्टीलिंग्वल टारगेट ग्रुप एण्ड कनवर्टिंग द टेक्स्ट इन टु एक्टिविटी बेस्ड कम्यूनिकेबल कन्स्प्ट” शीर्षक से 10 से अधिक भारतीय भाषाओं के 2 सैकड़ा विद्यार्थियों के साथ प्रयोग करते हुए मातृभाषाओं के सम्बन्ध उल्लेखनीय अनुशंसाऍं एनसीईआरटी के समक्ष रखी थीं जिन्हें महत्वपूर्ण माना गया। पुरस्कार के तहत 20 हजार रूपये की राशि परियोजना संचालन के लिए सम्बन्धित विद्यालय को प्रदान करने की घोषणा भी की गई है।
उल्लेखनीय है कि डॉ. रामकुमार सिंह की परियोजना केन्द्रीय विद्यालय दोणिमलै, कर्नाटक में संचालित की गई थी। हाल ही में डॉ सिंह स्थानांतरित होकर केन्द्रीय विद्यालय मुरैना में पदांकित किये गये हैं।

ये फोन

: रामसेवी चौहान की एक कविता


ये फोन भी क्‍या चीज है
समझो तो बड़ी नाचीज है ]
किसी को कभी कुछ भी सुना सकता है
हँसते हुए को कभी भी रूला सकता है
घाव कितने भी पुराने हों कुरेदता क्षण में है
कई सीधे-सादों को भी
भेज देता रण में है
लोग कोसों बैठे भी सुना देते हैं
दुखियों को दूर रहते भी रूला देते हैं
लाख कोशिश करो दूर रहने की
सोचते हैं जरूरत न पड़े कुछ कहने की
फिर भी नहीं जी सकते रहकर मौन
क्‍योंकि हर आदमी के पास है फोन
लोग फोन से उखाड़ते हैं ‘गढ़े मुर्दों को’
गर होते नम्‍बर तो
उठा देते गढ़े मुर्दों को
बताए इन पुतलों को यह कौन
जमाना विज्ञान का
हर आदमी रखता है फोन