श्री अरविंद कुमार सिंह जी से रूबरू होकर प्रमुदित हुए मेरे विद्यार्थी

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केवि मुरैना। 25 अक्‍टूबर 2013। जिसका पाठ पढते हो वही लेखक एक दिन आमने-सामने हो और उन सवालों के बीच से शिक्षक हट जाये जो बच्‍चे सीधे पाठ के लेखक से करना चाहते हों तो है ना एक अचरज, रोमांच और आनंददायक क्षण। ऐसा ही एक दिन बीता केन्‍द्रीय विद्यालय के कक्षा 8 वीं व 9 वीं के विद्यार्थियों का। तारीख 25 अक्‍टूबर को मैं और मेरे विद्यार्थी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनिया’ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह जी की। वे आये। समय पर आये। ठीक 1 बजे पूरी आत्‍मीयता, उदारता और सरलता के साथ राज्‍यसभा चैनल की चौपाल यूनिट के अपने सहयोगियों के साथ केन्‍द्रीय विद्यालय मुरैना प्रांगण में। हमारी नवाचारी कक्षा गतिविधि के लिए 8 वीं की कुमारी दुर्गेश और उसके साथियों के आमंत्रण पर आये वे। बच्‍चे ऐसे आंखे फाडकर इस क्षण के साक्षी बनने की कोशिश कर रहे थे जैसे उनकी किताब बसंत भाग दो साकार होकर उनसे बतिया रही हो। और लीजिये शुरू हुआ सवालों का सिलसिला, किसी ने उन्‍हें अपना आदर्श मानकर उनसे उनका आदर्श पूछ डाला तो किसी ने जानना चाहा कि चिट्ठियों पर ही उन्‍होने 10 साल तक इतनी खोजबीन करने की क्‍यों ठानी। कोई पूछ रहा था उनके खट्ठे मीठे अनुभव तो कोई इस बात को लेकर हैरान था कि किन किन संस्‍थाओं से जुडकर वे अपना बहुआयामी व्‍यक्‍ितत्‍व संभाले हुए हुए हैं मसलन पत्रकारिता, लेखन, शोध और देश विदेश का खूब भ्रमण।
अरविंद जी ने चिट्ठी पत्री का इतिहास तो बताया ही, सवालों की झडी लगाने वाले सभी बच्‍चों की भूरि भूरि प्रशंसा कर उनका उत्‍साह भी बढाया। आखिर बच्‍चे तो ठाने बैठे थे कि अरविंद जी को अपने हाथों से बनी एक चिट्ठी देंगे और उनसे भी एक स्‍नेह संदेश लेंगे। दोनों ही सपनों को साकार देखना एक नया इतिहास दर्ज होने जैसा था।
बच्‍चों ने एक पेंटिंग ‘मेरे सपने ‘ भी अरविंद जी को दी। जिसे उन्‍होने खूब सराहा। उन्‍होने बच्‍चों के साथ स्‍वल्‍पाहार भी लिया और उन्‍हें बुलाकर ह्रदय से भी लगाया।
इस अवसर पर हुई गरमागरम चर्चा में उनके साथ मंच साझा किया मुरैना के वरिष्‍ठ शिक्षाविद डॉ शंकरसिंह तोमर,डॉ लक्ष्‍मीनाराण मित्‍तल, व केवि प्राचार्य श्रीमती उषारानी शर्मा ने। इस आयोजन में उन्‍हें सुनने वालों में खासतौर पर आये दैनिक भास्‍कर से सर्वश्री रजनीश दुबे, विनोद त्रिपाठी और श्री सुमित दुबे । भाई सुमित जी ने ही मुरैना में अरविंद जी के प्रवेश पर अगवानी भी की। हां इस मौके पर जयंत तोमर जी नहीं आ सके।
अरविंद जी ने अपने राज्‍यसभा चैनल के चौपाल ऐपीसोड को भी यहीं शूट किया। इसमें चर्चा में शामिल हुए उनके साथ डॉ शंकरसिंह जी, डॉ एल एन मित्‍तल जी, श्रीमती उषा रानी शर्मा जी और उनका यह अकिंचन अनुज ………
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‘निराला’-घर: स्मृति का ‘रवि हुआ अस्त’ ! //सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जहां रहे //संकरी गली का बंद मकान, ताला-शेष

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(इलाहाबाद के दारागंज इलाके मे वह मकान जहां कभी निराला जी रहा करते थे)

सर्जना, 24 मार्च,2013। इलाहाबाद के दारागंज इलाके की एक गली और उसकी एक और उप-गली, संकरी, बहुत संकरी, इतनी संकरी कि निराला के ओज और औदात्य के बल पर ही इसके संकरेपन का फैलाव महसूस किया जा सकता है। इस संकरी गली का एक बंद मकान, जहां निराला की स्मृतियों का रवि-अस्त ! होने की त्रासद सूचना देता है एक ताला।
काफी देर यहां बैठा सोचता रहा कि सर्जना की गंगा जो विश्व का विशालतम मैदान बना देती है वह किस तरह एक नाखून से निकलती है।
इतने में उनके पडोस के मकान से एक नवयुवक आ जाता है और कुछ आधी-अधूरी सूचनायें जो उसके बाबा से सुनता रहा बचपन से, बताने लगता है निराला जी के बारे में। कहता है कि यह मकान पडोस वाले वैद्यजी का हुआ करता था जिसमें निराला जी रहते थे। उनकी एक आदमकद पेंटिंग रखी थी इस घर में । आखिरी बार वह भी यहां से उठा ली गई, शायद किसी संग्रहालय के लिए। अब शेष है तो सिर्फ बाहर लटकाता ताला। दारागंज के पहलवान और हलवाई खूब निकटता महसूस करते रहे होंगे निराला से, पता नहीं उनके समय में या स्मृति-शेष हो जाने के बाद। सुनते हैं कि निराला जी ने इस गली के बाहर वाले हलवाई से कह रखा था कि जब भी कोई उनके निवास का पता पूछे तो पहले उसे मिठाई खिलाना फिर पता देना।
पूछा मैने भी लगभग उसी स्थल के हलवाई से कि निराला जी का मकान कहां है। उसने बताया ये पुराना मकान भी और मुख्य गली से काफी आगे चलकर बना हुआ उनके दत्तक पौत्र श्री अखिलेश त्रिपाठी का नया घर। लिखा वहां भी ‘निराला-निवास’ है। गया तो पता चला कि अखिलेश जी सपत्नीक बाजार गये हैं। उनकी बेटी ने मोबाइल नम्बर दिया तो बात की। उनके आने में विलम्ब था और कमबख्त रेलगाडी उसी दिन सही समय पर थी तो अखिलेश जी से रूबरू नहीं हो सके।
निराला जहां से गुजरते थे, जहां पहलवानी शौक फरमाते थे, या जहां अक्सर हुआ करते थे, वहां की सूचना देते कुछ सार्वजनिक स्थल मुख्य सड़क पर बनाये गये हैं, मसलन निराला चौक और उनकी एक प्रतिमा। निराला के नाम पर कुछ कवि सम्मेलन होने की सूचनाएं भी आप पढ सकते हैं दीवारों पर, फलेक्स के बैनरों पर। पर ये सब उस खालीपन को नहीं भर पा रहे थे जो उस मकान से बाहर की तरफ झांक रहा था और मेरे भीतर घुसा जा रहा था।
ठीक सूर्यास्त के समय धीरे-धीरे लौट रहा था दारागंज से यह सोचते हुए कि जहां शक्ति-पूजा हो वहां सूर्यास्त नहीं हो सकता। हुई जय हे! पुरषोत्तम नवीन निराला की।
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(निराला की अनुभूति शेष – वह गली)

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(समय का ताला – सबसे बडा, सबसे निराला)

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(दारागंज और संगम घाट के लिए मार्ग – एक गली सरस्‍वती की खोज में
और दूसरी सरस्‍वतीपु्त्र की)

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(गुजर गया वह वक्‍त – निराला जहां से गुजरते थे)

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ओ विप्‍लव के वीर……- दारागंज स्‍िथत निराला जी की प्रतिमा

इलाहाबाद के पथ पर ……….

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(प्रस्‍थान-बिन्‍दु : इलाहाबाद जंक्‍शन रेलवे स्‍टेशन)
सर्जना, 24 मार्च, 2013। इलाहाबाद के पथ पर आप चलें तो निराला की आंखें रख पाना संभव नहीं, पर आंखों में वे घूमते जरूर हैं। संगम के लिए मैं रवाना हुआ तो दारागंज के उस मुहाने से दॉंई ओर मुड़ गया जहां से बांयी ओर दारागंज है यानी कि निराला जी की यादें। मुझे आनंद भवन में उतना आनंद नहीं जितना त्रासद आकर्षण इस गली में है। संगम स्नान के बाद यहां आने के स्वघोषित वायदे के साथ आगे बढ़ जाता हूं। गंगा का विशाल पाट। एक ही दिन, एक ही क्षण पर नहाने की शपथ लेकर दब मरने वाले श्रृद्धालुओं से आजकल लगभग रिक्त और कमोबेश शांत। रेत पर आगे चलते हुए पहुंचे। गंगा मैया के दरसन हुए। नाविक ने उतराई तय की और हम चढ गये। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को अर्थ देते हुए वह ले चला मुझे भुलावा देकर संगम, यानी मध्य की ओर धीरे-धीरे। गहराईयों से गुजरते हुए संगम उथला है जहां आप आराम से उतरकर डुबकी ले सकते हैं। इस बीच नदी की धार पर आपकी मुलाकात होती है ऐसे पक्षियों से जो धार पर बैठकर आपके फेंके हुए दाने मजे से चुगते है। दाना-पानी का यह रिश्ता अपनी जिंदगी में पहली बाद देखा। हरिवंश राय बच्चन याद आ गये – ‘नादान वहीं पर हाय जहां है दाना’।
संगम में उतरे तो गंगा, जमुना के बीच सरस्वती की खोज किये बगैर पूरी श्रृद्धा से झुक पड़े। मदन मोहन मालवीय जी का पंडा याद आ गया जो कहता था कि जहां सरस्वती ही लुप्त हैं वहां श्लोक शुद्ध कैसे बोल पायें। गंगा मैया का जल उसी को अर्पण किया। खूब नहाये मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह ‘छपाछप’। अंदर के पाप भी साफ करने के लिए गंगाजल पिया, रेत मली। जय – जय हो गई। गंगाजल का पात्र भरा और लौट पड़े। रेत के उस पार सड़क और किला। किले के भीतर अक्षय-वट। भारत का कल्पवृक्ष कहिए। खूब छुआ। नीचे सुरंग में गये उसकी जड़ों तक, यह देखने कि जो बड़े हैं वो कैसे खड़े हैं।
यहां से दारागंज पहुंचे और निराला जी की स्मृतियों से मिले।
इससे पिछले दिन, इलाहाबाद की सड़कों से गुजरते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन एवं संग्रहालय के दरस-परस किये। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के उस वाक्य का स्मरण हो आया जिसमें वे कहते हैं कि हिन्दी वह मूल है जिससे राष्ट्रीयता को सींचा जा सकता है। उनके स्मरण में बनाये गये राजर्षि टंडन चौक पर उनके सानिध्य में बैठा और चल दिया। रिक्शे वाले पर ऐसे स्नेह उमड़ रहा था जैसे सारे रुपये इसे दे दूं, पर सोचा पहले महादेवी जी से ले तो आऊं उनकी स्मृतियों का धन…………

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(सरस्‍वती की खोज में : संगम तट का विहंगम दश्‍य )

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(नदी आगे मिलती हैं)

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(ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे : संगम की ओर)

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(संगम इसी का नाम है)

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(नादान वहीं पर हाय जहां पर दाना
– संगम पर पक्षियों का दाना चुगना अद्भुत)

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( अक्षय वट को छूकर)

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(जडों तक : संगम स्‍थित किले में अक्षय वट के नीचे की सुरंग)

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(प्रयाग में स्‍थानीय इलाकों से बिकने आने वाले निंबू,
आकार में संतरे से बडे, जय हो)

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(निज भाषा उन्‍नति अहै – हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेनल भवन, इलाहाबाद,
स्‍थापित वर्ष 1910 )

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(हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन संग्रहालय)

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(राजर्षि की छाया में – श्री पुरुषोत्‍तम दास टंडन स्‍मृति चौक)

‘‘कुंई जैसी गहराई मिल जाएगी’’: अनुपम मिश्र जी से रूबरू//जब अनुपम मिश्र जी ने पढ़ाया अपना पाठ ‘राजस्थान की रजत बूंदें’

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सर्जना, 22 फरवरी, 2013। कक्षा 11 वीं के मेरे विद्यार्थियों के लिए यह सुखद और उत्साहजनक है कि स्वयं अनुपम मिश्र जी ने न केवल मेरे साथ उन जिज्ञासाओं पर बातचीत की जो आप लोग कक्षा में पूछा करते हैं बल्कि लगभग 20 मिनिट तक उन्होनें खुद रेखाचित्र बनाकर उस पाठ की बारीकियों को समझाया।
22 फरवरी की शाम ग्वालियर की एक पहाड़ी पर स्थित पर्यावरण-मित्र उपनगर ‘विवेकानंद नीडम’ के शांत और सुरम्य वातावरण में पत्रकार, संस्कृतिकर्मी एवं शिक्षाविद् आदरणीय श्री जयंत तोमर तथा साथी श्री अरविंद जी के साथ मैं जा पहुंचा। जयंत जी ने एक दिन पूर्व बताया था कि अनुपम जी ग्वालियर आ रहे हैं, और चूंकि ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ मैं कक्षा 11 वीं के विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं, तो विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को साथ समेटे श्री अनुपम जी से भेंट और अगर हो सके तो चर्चा की उम्मीद लिये जा पहुंचा।
हम लोग जब पहुंचे तो अनुपम जी की महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। इस दरम्‍यान नीडम के परिवेश और औषधीय हवाओं का आनंद लेते रहे। बैठक के बाद जैसे ही अनुपम जी बाहर निकले, जयंत जी ने मेरी उनसे शैक्षणिक भेंट-परियोजना के बारे में बता दिया। आदरणीय अनुपम जी की उदारता देखिये कि तत्काल स्थल का चुनाव कर बैठ गए और निकाल ली अपने थेले से काली कलम, लगे रजत बूंदों का मर्म हमें समझाने। पाठ के बारे में जो भी सवालात मैं पूछ रहा था, बड़ी तल्लीनता से वे हमें बारीकियां समझाते जा रहे थे। सवाल कुंईयों की वैज्ञानिक संरचना का भी था और चेजारो की कार्यप्रणाली का। वे चेजारो जो कई वर्षों की परम्परा से कुंईयों के निर्माता बने, उनके वर्तमान जीवन के बारे में पूछा। अनुपम जी उतने ही खरेपन के साथ पाठ को समझा रहे थे जितने खरेपन से वे तालाबों के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं।
ये बहुमूल्य समय हमने लिया उस पाठ को आप तक ठीक से पहुंचाने के लिए जिसके बारे में एनसीईआरटी की आपकी पुस्तक का संपादक मंडल लिखता है: – ‘‘राजस्थान की रजत बूँदें। यह रचना एक राज्य विशेष राजस्थान की जल समस्या का समाधान मात्र नहीं है। यह जमीन की अतल गहराइयों में जीवन की पहचान है।यह रचना धीरे-धीरे भाषा की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जो कविता नहीं है,कहानी नहीं है, पर पानी की हर आहट की कलात्मक अभिव्यक्ति है। भाषा में संगीतमय गद्य की पहचान है। इस पहचान से विद्यार्थियों का ताल मिले, यह वितान की उपलब्धि होगी।’’
जब हमने अनुपम जी से आप सबके लिए संदेश मांगा तो उन्होने लिखा कि – ‘‘अपने समाज में, गांव में शहर में सबके साथ मिलकर अपने आसपास की चीजों को समझने की कोशिश करो। सब जगह कुंई जैसी गहराई मिल जायेगी। शोध नहीं श्रृद्धा रखो समाज पर।‘‘
वापस आते वक्त मैं सोच रहा था कि कुछेक व्यक्तित्वों में ही शायद ये गहराई होती है जैसे कि अनुपम जी….।
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आज भी खरे हैं अनुपम मिश्र

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(संकटों को हमारी अपनी भाषा में समझाते हुए)

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(जमीन से जुडे हैं तो बैठ गये उत्‍साही युवकों के बीच)

ग्‍वालियर, 23 फरवरी। उनके स्वभाव में तल्खी नहीं पर वे पानी के खारेपन को दूर करने के लिए पूरे खरेपन से जुटे रहे हैं। प्रभाष जोशी जी ने दशकों पहले उन्हें माध्यमों का लोक सौंपने का हठ किया पर उन्होंने अपने लिये ‘जल’ मार्ग ही चुना। 22 और 23 फरवरी को वे ग्वालियर में थे। संकटों पर अपनी भाषा में संवाद किया। ‘तालों’ के लिए ‘आब’ मांगी उदार प्रकृति से। कान खीचें हम सभी के और भयावह भविष्य की खारी परतों के बीच से एक चिंतन-बिन्दु रजत बूंदों की तरह उतार दिया हम सबके जेहन की कुंईयों में। मौका था श्री जयंत तोमर की पहल पर ‘चर्चा-मंडल’ के एक सादे संवाद कार्यक्रम का। मौजूद थे ग्वालियर शहर के कुछ चिंतनशील प्रबुद्धजन और सामाजिक कार्यकर्ता। एक अनौपचारिक-सी, बेहद आत्मीय और गहरी चर्चा में सभी को लगा कि जल-स्तर नहीं समाज का स्तर घटा है।
वे अनुपम जी ही हो सकते हैं जो कहें कि यदि ईश्वर से पेड़ और पानी मांगा होता तो वह जरूर देता, मगर फोटो का छपना मांगोगे, पैसा मांगोगे तो ईश्वर वही देगा फिर पानी की शिकायत ना करना। वे ही हमें समझा सकते हैं कि प्रकृति का करोड़ों वर्षों का पंचाग हमारे घर में टंगे कलैण्डरसे किस तरह भिन्न है। पानी के पाइप गांव में घर-घर बिछा देना जलसंकट का किस हद तक निदान है, इसकी असलियत वे मृदुता से उघाड़ देते हैं। ‘पानी’ के मुंहबांये खडे़ डरावने संकट के बीच हमारे समाज में बेतुके मुद्दों को वे ही अदृश्य शत्रुओं से तलबारजी कह सकते हैं।
ग्वालियरदां को वे ही समझा सकते हैं कि फतेहपुरसीकरी तक जाओ और केवल यह देखो कि पानी नहीं बचा तो राजधानियां छोड़नी पड़ीं। दिल्लीदां को वे ही बता सकते हैं कि 1911 में अपनी स्थापना से अब तक दिल्ली 800 तालाबों की शवसाधना पर खड़ी है।
राजस्थान के निवासियों की चिर-सहेली ‘भून’ जो अतल गहराईयों से बारहों महीने पानी खींचती है तो इन्द्र से प्रतिस्पर्धा करती है, उसे अनुपम जी ही बारहमासी जीवनदर्शन बना सकते हैं। ‘‘इन्दर थारी एक घड़ी – भूण थारा बारा मास’’।।
ये अनुपम जी ही हैं जो हिमालय को काटने और नदियों को जोड़ने जैसे प्रकृतिविरोधी कार्यों की निस्सारता को त्रिकालदर्शी वेदव्यास की तरह उद्भाषित कर सकते हैं। वे ही शिद्दत से असहज हो सकते हैं इस बात पर कि पानी से ज्यादा हमें जीडीपी के स्तर की चिंता है। या फिर महाराष्ट्र के 22 हजार गॉंवों में टैंकर से पानी पहुँचाने को हम आदर्श व्यवस्था मान लेते हैं। या फिर ग्राम्यजन से संकलित राशि के आधार पर आरओ सिस्टम के जल को घर-घर में सप्लाई करने की पंचवर्षीय आयु वाली मरणासन्न व्यवस्था को जलसंकटर के हल की तरह प्रस्तुत कर लेते हैं। वे बहुत सौम्यता से अपील कर लेते हैं कि न तो चौबीस घंटे खबरें चलाओ और ना पानी। ये विकास का पर्याय नहीं है।
वे कच्छ की बात करते हैं और इधर हमीर-सर उनकी आंखों में चमक लाता है। वे पुरन्दर तहसील की बात बताते हैं और इन्द्र को नगर तोड़ने वाली अवधारणा से जोड़ते हुए हमें मिथकीय ढंग से भी समझा-बुझा लेते हैं। वे इस तरह ही बता देते हैं कि गोवर्धन पर इन्द्र के हमले का अर्थ है कि अच्छा जंगल, पहाड़ और तालाब होंगे तभी बाढ़ से ब्रज बचेगा नही तो द्वारका डूबेगी ही। वे कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों के पानी को अपनी आंखों में दिखा पाते हैं।
डनकी ऑंखों मे सन् 77 का आन्ध्र का साइक्लोन तैरने लगता है और एक युवक प्रभाकर की शवसेना के प्रयास स्मृति में आने लगते हैं तो कभी वे शायद सन् 38 के गुजरात में रविशंकर महाराज की कोशिशों के बारे में बताकर प्रेरित करते हैं।
गांधी जी के हमारे बीच से जाने के वर्ष 48 में जन्में और आपातकाल के वर्ष 77 से गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण कक्ष से सम्बद्ध अनुपम जी की बातों, स्मृतियों और इतिहास से उठाये गये उदाहरणों में सिर्फ उनके इर्द-गिर्द के तालाब हैं, पानी की बूंदें हैं और जल-संचय को लेकर रचनात्मक चिंता है। वे कहते हैं कि जमीन के ऊपर की तालाब रूपी बाल्टी को भरने लेने के लिए ईश्वर ने कहा था भूतल के नीचे जाकर उसे छलनी करने को नहीं।
अनुपम जी को हम सिर्फ इसलिए नहीं जानते कि ‘सत्यमेव जयते’ का 12 वां एपीसोड ‘पानी’ के मुद्दे पर होना उनकी विराट चिंताओं से आमिर खान के मार्फत हमारी छोटी-सी सहमति है, या फिर अनुपम जी पुनःपुनश्च प्रासंगिकता सिर्फ इसलिए हो उठती हो कि मध्यप्रदेश सरकार ने ‘आज भी खरे हैं तालाब’ की प्रतियां छापकर गांव-गांव में बॉंटने की पहल की है। अनुपम जी के 23 फरवरी के ग्वालियर संवाद को भी सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं मानते कि उनके पिता सतपुड़ा के ‘ऊंघते-अनमने जंगल’ के दृष्टा श्री भवानीप्रसाद मिश्र का यह जन्मशती वर्ष है, याकि 20 फरवरी के आसपास हमारे ग्वालियर में अनुपम जी का होना ग्वालियरवासियों को अपने ‘भवानी दादा’ के जन्मदिवस को याद कर लेने का बहाना भी है, बल्कि हम अनुपम जी को इसलिए भी जानते-मानते हैं कि पिता ने जो कहा कि ‘आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है’’ उसे पुत्र ने रजत-बूंदों की तरह सहेजने में जो खरापन दिखाया वह कहने को विवश करता है कि – ‘आज भी खरें हैं अनुपम मिश्र’
उनके साथ खुलकर संवाद करने और चिंताओं को साझा करने में शामिल रहे – जीवाजी विश्वविद्यालय के भूगर्भविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर मधुमासचन्द्र खरे, प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक श्री जगदीश तोमर, दैनिक भास्कर, ग्वालियर के संपादक श्री सुनील शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार श्री राकेश अचल, कवि श्री पवन करण, महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक श्री सुरेश तोमर, जीवाजी विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग के अधिष्ठाता डॉ एपीएस चौहान, मध्यप्रदेश पत्रकार संघ के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र माथुर, राज्य सहकारी संघ के अध्यक्ष श्री अरुण सिंह तोमर, एवं जीवाजी विश्वविद्यालय के उपकुल सचिव श्री अरुणसिंह चौहान एवं युवा सामाजिक कार्यकर्ता श्री अरविंद आजाद सहित शोधार्थी एवं विद्यार्थी।
-ग्वालियर से डॉ. रामकुमार सिंह-

रामबरन शर्मा को मध्य‍भारतीय हिन्दी साहित्‍य सभा ग्‍वालियर का युवा साहित्‍यकार सम्‍मान-2013

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मध्‍यभारतीय हिन्‍दी साहित्‍य सभा, ग्‍वालियर द्वारा दिया जाने वाला युवा साहित्‍यकार सम्‍मान 2013 मुरैना के युवा कहानीकार, कवि एवं समीक्षक रामबरन शर्मा सरस्‍वीपुत्र को प्रदान किया गया। निराला जयंती और बसंत पंचमी के अवसर पर संस्‍था के दौलतगंज स्‍थित पुस्‍तकालय सह सभाभवन में एक आयोजन के दौरान उन्‍हें यह सम्‍मान प्रदान किया गया। आयोजन की अध्‍यक्षता कर रहे निराला सृजनपीठ भोपाल के निदेशक डॉ दिवाकर वर्मा एवं मुख्‍य अतिथि के रूप में उपस्‍थित राजा मानसिंह संगीत विवि की कुलपति डॉ (श्रीमती) स्‍वतंत्र वर्मा के हाथों यह सम्‍मान दिया गया।
दौलतगंज स्‍थित, वर्ष 1902 में स्‍थापित एवं अनेक राष्‍ट्रीय साहित्‍यकारों की उपस्‍थित और स्‍मृतियों को समेटने वाले भवन में आयोजित समारोह में नगर के प्रतिष्‍ठित वरिष्‍ठ कविगण, साहित्‍यप्रेमी एवं विद्यार्थीगण उपस्‍थित थे। आयोजन में सम्‍मान-पत्र एवं 1100 रूपये नगद राशि प्रदान की गई।

कार्यक्रम को सम्‍बोधित करते हुए निराला सृजनपीठ के निदेशक श्री वर्मा ने महाप्राण निराला को मार्क्‍सवादी अर्थ में प्रगतिशील कहे जाने के पुनॅमूल्‍यांकन की आवश्‍यकता बल दिया। उन्‍होने निराला जी के स्‍वाभिमान एवं हिन्‍दी व साहित्‍यकारों के प्रति गौरवभाव के लिए सचेत रहने व विद्रोही प्रकृति पर प्रकाश डालतें हुए मुख्‍य वक्‍तव्‍य दिया।
कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि की आसंदी से डॉ स्‍वतंत्र शर्मा ने कहा कि साहित्‍य और संगीत का पर्यायबोधक सम्‍बन्‍ध है। संगीतकार साहित्‍य से अपना उपजीव्‍य लेता है। उन्‍होने इलाहाबाद में अपने बचपन की यादों में अनेक वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों के सानिध्‍य का उल्‍लेख किया। विशेषकर महादेवी वर्मा जी के अनेक गीतों को संगीतबद्ध किये जाने की यादों को ताजा किया। महादेवी जी के एक गीत का भी उन्‍होने सस्‍वर गायन किया।
इससे पूर्व सम्‍मानित होने पर युवा साहित्‍यकार रामबरन सरस्‍वतीपुत्र ने अपने विचार व्‍यक्‍त करने के साथ ही कवितापाठ से सभी को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। सरस्‍वती शिशु मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा सरस्‍वतीवंदना प्रस्‍तुत की गई। तथा विद्वतजन व विदुषियों ने निराला के चर्चित-अचर्चित गीतों के पाठ से सभा को आनंदित किया। आभार अध्‍यक्ष बसंत पुरोहित ने किया।

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(सर्जना के लिए कार्यक्रम स्‍थल से डॉ रामकुमार सिंह)

पाठ के लेखक और तुम्हारे शिक्षक की परस्पर भेंट: वाह! क्या बात है/खोज-खबर: पाठ से आगे

कक्षा-8 वीं के प्यारे विद्यार्थियो,
तुम लोग तो जानते ही हो कि हर पाठ से आगे जाकर हम खुले आकाश के नीचे कुछ खोज-खबर लेने में जुट जाते हैं। तुमने कई बार लेखकों-कवियों के बारे में पूछ-पूछकर हमें भी अपना-सा जिज्ञासु बना ही दिया। तो लो हमने भी ठान लिया कि समय-समय पर उन तमाम सवालों से आगे जाकर उन्हीं लेखकों-कवियों से तुम्हारा सामना करायेंगे या तुम्हारे प्रतिनिधि बनकर वो सब जानने की कोशिश करेंगे जो तुम लोग हम शिक्षकों से पूछा करते हो।
इसी टोह में हमने मुलाकात की तुम्हारे प्रिय पाठ ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनियाँ’ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह जी से।
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पहले बताते हैं कि हमें वे कौन-सी बातें उन्होंने बताईं जो तुम्हारे पाठ से आगे की हैं और जो तुम्हारी आंखों में चमक पैदा कर देंगी।
पहली बात उनकी मूल पुस्तक नेशनल बुक ट्रस्ट से अंग्रेजी में प्रकाशित है ‘द हिस्ट्री ऑफ इंडियन पोस्ट’ उसी के एक अध्याय का यह पाठ तुम्हारी पुस्तक बसंत भाग-तीन में संकलित है। उन्होने अपने बैग से वह पुस्तक मुझे दिखाई। अच्छा लगा। उन्होने एक बात और बताई कि ‘द पोस्टमेन’ अध्याय डाकिया के नाम से तुम्हें आगे किताबों में पढने को मिलेगा। उन्होंने एक बात और बताई कि समुद्री मार्ग से पुराने समय में जो पत्राचार होता था वे उस पर खोजबीन कर रहे हैं। उस पर भी किताब लिख रहे हैं।
अब एक और सबसे मजेदार बात कि हमने उनसे दो ऐसे प्रश्न पूछे जो आप हमसे पूछते हो कि लेखक को कैसे पता चला होगा कि भारत में प्रतिदिन ‘‘साढे चार करोड चिट्ठियां डाक में डाली जाती हैं’’???? मैंने उन्हीं से पूछ लिया । उन्होंने बताया कि डाक भवन, नई दिल्ली के जो उच्च अधिकारी हैं उनके माध्यम से यह जानकारी उन्हें मिली जो उन्होंने शोध कर अपनी पुस्तक में लिखी है।
आओ, अब मैं तुम्हें उनका संक्षिप्त परिचय देता हूँ। जो तुम्हारी पुस्तक में नहीं है। 7 अप्रेल सन् 1965 को उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले में जन्मे श्री अरविंद जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कला स्नातक हैं। वे बीते करीब 30 सालों से हिन्दी पत्रकारिता व लेखन से जुड़े हैं। वे जनसत्ता एक्सप्रेस, चौथी दुनिया, अमर-उजाला, इंडियन एक्सप्रेस में कार्य के साथ-साथ हरिभूमि के दिल्ली संस्करण में संपादक भी रहे हैं। वर्तमान में वे राज्यसभा चैनल के विशेष संवाददाता भी हैं। साथ ही रेलवे बोर्ड के परामर्शदाता भी हैं। वे महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा सम्मानित, हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा हिन्दी पत्रकारिता में योगदान के लिए पुरस्कृत होने के साथ-साथ अनेके प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।
हाँ, चलते चलते डॉ जयंत जी का आभार जिन्होनें मुझे उनका मित्र बनाया।
अगली बार नयी खोज-खबर के साथ,
आपका
राम सर
देखिये उन्‍होंने हमारी पोस्‍ट को चेहरे की किताब यानी कि फेसबुक पर बांटा, नई जानकारी भी दी, अपने बारे में;;;;;; और तुम लोगों से मिलने का वायदा भी किया है।

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