‘‘कुंई जैसी गहराई मिल जाएगी’’: अनुपम मिश्र जी से रूबरू//जब अनुपम मिश्र जी ने पढ़ाया अपना पाठ ‘राजस्थान की रजत बूंदें’

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सर्जना, 22 फरवरी, 2013। कक्षा 11 वीं के मेरे विद्यार्थियों के लिए यह सुखद और उत्साहजनक है कि स्वयं अनुपम मिश्र जी ने न केवल मेरे साथ उन जिज्ञासाओं पर बातचीत की जो आप लोग कक्षा में पूछा करते हैं बल्कि लगभग 20 मिनिट तक उन्होनें खुद रेखाचित्र बनाकर उस पाठ की बारीकियों को समझाया।
22 फरवरी की शाम ग्वालियर की एक पहाड़ी पर स्थित पर्यावरण-मित्र उपनगर ‘विवेकानंद नीडम’ के शांत और सुरम्य वातावरण में पत्रकार, संस्कृतिकर्मी एवं शिक्षाविद् आदरणीय श्री जयंत तोमर तथा साथी श्री अरविंद जी के साथ मैं जा पहुंचा। जयंत जी ने एक दिन पूर्व बताया था कि अनुपम जी ग्वालियर आ रहे हैं, और चूंकि ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ मैं कक्षा 11 वीं के विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं, तो विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को साथ समेटे श्री अनुपम जी से भेंट और अगर हो सके तो चर्चा की उम्मीद लिये जा पहुंचा।
हम लोग जब पहुंचे तो अनुपम जी की महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। इस दरम्‍यान नीडम के परिवेश और औषधीय हवाओं का आनंद लेते रहे। बैठक के बाद जैसे ही अनुपम जी बाहर निकले, जयंत जी ने मेरी उनसे शैक्षणिक भेंट-परियोजना के बारे में बता दिया। आदरणीय अनुपम जी की उदारता देखिये कि तत्काल स्थल का चुनाव कर बैठ गए और निकाल ली अपने थेले से काली कलम, लगे रजत बूंदों का मर्म हमें समझाने। पाठ के बारे में जो भी सवालात मैं पूछ रहा था, बड़ी तल्लीनता से वे हमें बारीकियां समझाते जा रहे थे। सवाल कुंईयों की वैज्ञानिक संरचना का भी था और चेजारो की कार्यप्रणाली का। वे चेजारो जो कई वर्षों की परम्परा से कुंईयों के निर्माता बने, उनके वर्तमान जीवन के बारे में पूछा। अनुपम जी उतने ही खरेपन के साथ पाठ को समझा रहे थे जितने खरेपन से वे तालाबों के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं।
ये बहुमूल्य समय हमने लिया उस पाठ को आप तक ठीक से पहुंचाने के लिए जिसके बारे में एनसीईआरटी की आपकी पुस्तक का संपादक मंडल लिखता है: – ‘‘राजस्थान की रजत बूँदें। यह रचना एक राज्य विशेष राजस्थान की जल समस्या का समाधान मात्र नहीं है। यह जमीन की अतल गहराइयों में जीवन की पहचान है।यह रचना धीरे-धीरे भाषा की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जो कविता नहीं है,कहानी नहीं है, पर पानी की हर आहट की कलात्मक अभिव्यक्ति है। भाषा में संगीतमय गद्य की पहचान है। इस पहचान से विद्यार्थियों का ताल मिले, यह वितान की उपलब्धि होगी।’’
जब हमने अनुपम जी से आप सबके लिए संदेश मांगा तो उन्होने लिखा कि – ‘‘अपने समाज में, गांव में शहर में सबके साथ मिलकर अपने आसपास की चीजों को समझने की कोशिश करो। सब जगह कुंई जैसी गहराई मिल जायेगी। शोध नहीं श्रृद्धा रखो समाज पर।‘‘
वापस आते वक्त मैं सोच रहा था कि कुछेक व्यक्तित्वों में ही शायद ये गहराई होती है जैसे कि अनुपम जी….।
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आज भी खरे हैं अनुपम मिश्र

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(संकटों को हमारी अपनी भाषा में समझाते हुए)

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(जमीन से जुडे हैं तो बैठ गये उत्‍साही युवकों के बीच)

ग्‍वालियर, 23 फरवरी। उनके स्वभाव में तल्खी नहीं पर वे पानी के खारेपन को दूर करने के लिए पूरे खरेपन से जुटे रहे हैं। प्रभाष जोशी जी ने दशकों पहले उन्हें माध्यमों का लोक सौंपने का हठ किया पर उन्होंने अपने लिये ‘जल’ मार्ग ही चुना। 22 और 23 फरवरी को वे ग्वालियर में थे। संकटों पर अपनी भाषा में संवाद किया। ‘तालों’ के लिए ‘आब’ मांगी उदार प्रकृति से। कान खीचें हम सभी के और भयावह भविष्य की खारी परतों के बीच से एक चिंतन-बिन्दु रजत बूंदों की तरह उतार दिया हम सबके जेहन की कुंईयों में। मौका था श्री जयंत तोमर की पहल पर ‘चर्चा-मंडल’ के एक सादे संवाद कार्यक्रम का। मौजूद थे ग्वालियर शहर के कुछ चिंतनशील प्रबुद्धजन और सामाजिक कार्यकर्ता। एक अनौपचारिक-सी, बेहद आत्मीय और गहरी चर्चा में सभी को लगा कि जल-स्तर नहीं समाज का स्तर घटा है।
वे अनुपम जी ही हो सकते हैं जो कहें कि यदि ईश्वर से पेड़ और पानी मांगा होता तो वह जरूर देता, मगर फोटो का छपना मांगोगे, पैसा मांगोगे तो ईश्वर वही देगा फिर पानी की शिकायत ना करना। वे ही हमें समझा सकते हैं कि प्रकृति का करोड़ों वर्षों का पंचाग हमारे घर में टंगे कलैण्डरसे किस तरह भिन्न है। पानी के पाइप गांव में घर-घर बिछा देना जलसंकट का किस हद तक निदान है, इसकी असलियत वे मृदुता से उघाड़ देते हैं। ‘पानी’ के मुंहबांये खडे़ डरावने संकट के बीच हमारे समाज में बेतुके मुद्दों को वे ही अदृश्य शत्रुओं से तलबारजी कह सकते हैं।
ग्वालियरदां को वे ही समझा सकते हैं कि फतेहपुरसीकरी तक जाओ और केवल यह देखो कि पानी नहीं बचा तो राजधानियां छोड़नी पड़ीं। दिल्लीदां को वे ही बता सकते हैं कि 1911 में अपनी स्थापना से अब तक दिल्ली 800 तालाबों की शवसाधना पर खड़ी है।
राजस्थान के निवासियों की चिर-सहेली ‘भून’ जो अतल गहराईयों से बारहों महीने पानी खींचती है तो इन्द्र से प्रतिस्पर्धा करती है, उसे अनुपम जी ही बारहमासी जीवनदर्शन बना सकते हैं। ‘‘इन्दर थारी एक घड़ी – भूण थारा बारा मास’’।।
ये अनुपम जी ही हैं जो हिमालय को काटने और नदियों को जोड़ने जैसे प्रकृतिविरोधी कार्यों की निस्सारता को त्रिकालदर्शी वेदव्यास की तरह उद्भाषित कर सकते हैं। वे ही शिद्दत से असहज हो सकते हैं इस बात पर कि पानी से ज्यादा हमें जीडीपी के स्तर की चिंता है। या फिर महाराष्ट्र के 22 हजार गॉंवों में टैंकर से पानी पहुँचाने को हम आदर्श व्यवस्था मान लेते हैं। या फिर ग्राम्यजन से संकलित राशि के आधार पर आरओ सिस्टम के जल को घर-घर में सप्लाई करने की पंचवर्षीय आयु वाली मरणासन्न व्यवस्था को जलसंकटर के हल की तरह प्रस्तुत कर लेते हैं। वे बहुत सौम्यता से अपील कर लेते हैं कि न तो चौबीस घंटे खबरें चलाओ और ना पानी। ये विकास का पर्याय नहीं है।
वे कच्छ की बात करते हैं और इधर हमीर-सर उनकी आंखों में चमक लाता है। वे पुरन्दर तहसील की बात बताते हैं और इन्द्र को नगर तोड़ने वाली अवधारणा से जोड़ते हुए हमें मिथकीय ढंग से भी समझा-बुझा लेते हैं। वे इस तरह ही बता देते हैं कि गोवर्धन पर इन्द्र के हमले का अर्थ है कि अच्छा जंगल, पहाड़ और तालाब होंगे तभी बाढ़ से ब्रज बचेगा नही तो द्वारका डूबेगी ही। वे कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों के पानी को अपनी आंखों में दिखा पाते हैं।
डनकी ऑंखों मे सन् 77 का आन्ध्र का साइक्लोन तैरने लगता है और एक युवक प्रभाकर की शवसेना के प्रयास स्मृति में आने लगते हैं तो कभी वे शायद सन् 38 के गुजरात में रविशंकर महाराज की कोशिशों के बारे में बताकर प्रेरित करते हैं।
गांधी जी के हमारे बीच से जाने के वर्ष 48 में जन्में और आपातकाल के वर्ष 77 से गांधी शांति प्रतिष्ठान के पर्यावरण कक्ष से सम्बद्ध अनुपम जी की बातों, स्मृतियों और इतिहास से उठाये गये उदाहरणों में सिर्फ उनके इर्द-गिर्द के तालाब हैं, पानी की बूंदें हैं और जल-संचय को लेकर रचनात्मक चिंता है। वे कहते हैं कि जमीन के ऊपर की तालाब रूपी बाल्टी को भरने लेने के लिए ईश्वर ने कहा था भूतल के नीचे जाकर उसे छलनी करने को नहीं।
अनुपम जी को हम सिर्फ इसलिए नहीं जानते कि ‘सत्यमेव जयते’ का 12 वां एपीसोड ‘पानी’ के मुद्दे पर होना उनकी विराट चिंताओं से आमिर खान के मार्फत हमारी छोटी-सी सहमति है, या फिर अनुपम जी पुनःपुनश्च प्रासंगिकता सिर्फ इसलिए हो उठती हो कि मध्यप्रदेश सरकार ने ‘आज भी खरे हैं तालाब’ की प्रतियां छापकर गांव-गांव में बॉंटने की पहल की है। अनुपम जी के 23 फरवरी के ग्वालियर संवाद को भी सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं मानते कि उनके पिता सतपुड़ा के ‘ऊंघते-अनमने जंगल’ के दृष्टा श्री भवानीप्रसाद मिश्र का यह जन्मशती वर्ष है, याकि 20 फरवरी के आसपास हमारे ग्वालियर में अनुपम जी का होना ग्वालियरवासियों को अपने ‘भवानी दादा’ के जन्मदिवस को याद कर लेने का बहाना भी है, बल्कि हम अनुपम जी को इसलिए भी जानते-मानते हैं कि पिता ने जो कहा कि ‘आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है’’ उसे पुत्र ने रजत-बूंदों की तरह सहेजने में जो खरापन दिखाया वह कहने को विवश करता है कि – ‘आज भी खरें हैं अनुपम मिश्र’
उनके साथ खुलकर संवाद करने और चिंताओं को साझा करने में शामिल रहे – जीवाजी विश्वविद्यालय के भूगर्भविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर मधुमासचन्द्र खरे, प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक श्री जगदीश तोमर, दैनिक भास्कर, ग्वालियर के संपादक श्री सुनील शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार श्री राकेश अचल, कवि श्री पवन करण, महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक श्री सुरेश तोमर, जीवाजी विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग के अधिष्ठाता डॉ एपीएस चौहान, मध्यप्रदेश पत्रकार संघ के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र माथुर, राज्य सहकारी संघ के अध्यक्ष श्री अरुण सिंह तोमर, एवं जीवाजी विश्वविद्यालय के उपकुल सचिव श्री अरुणसिंह चौहान एवं युवा सामाजिक कार्यकर्ता श्री अरविंद आजाद सहित शोधार्थी एवं विद्यार्थी।
-ग्वालियर से डॉ. रामकुमार सिंह-