‘सर्जना’

‘सर्जना’ मानव और उसकी रचनात्मक शक्ति की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। ‘सर्जना’ मात्र आनंद की वस्तु नहीं है। प्रत्येक काल में इसने समाज को एक नयी अनुभूति से ऊर्जस्वित किया है।
वर्तमान समय में ‘सर्जना’, जिसे हम यहाँ साहित्यिक सर्जना के अर्थ में प्रयुक्त कर रहे हैं, अपना रूप देहवादी या रीति-काल की पुन:प्रस्तुति के रूप में अधिकाधिक दिखाई पड़ती है। नवलेखन की मूल प्रवृत्तिायों में इस मान लिया जाये तो अधिक अनुचित नहीं होगा। यद्यपि इसके स्वरूप, भंगिमा, भाषा, तेवर और समकालीन समाज की दुरूहता को स्पष्ट किये बिना एक शब्द में इसे परिभाषित कर देना भी इसके साथ अन्याय होगा। ‘सर्जना’ पृष्ठ पर हम न केवल सर्जना को समेटेंगे बल्कि उन पर विचार भी करेगें। अतिथियों का भी स्वागत होगा…..विशेषकर नवलेखकों का और नवलेखन को एक सार्थन समालोचना-दृष्टि भी प्राप्त हो यह प्रयास रहेगा।

-डॉ. रामकुमार सिंह

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