अरविंद कुमार सिंह जी का अचानक मुरैना आगमन और निवास पर बिताये कुछ पल…….ग्वालियर में स्नातक-शिक्षक हिन्दी के आगामी सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविर में अपने पाठ पर चर्चा के लिए डाॅ. रामकुमार सिंह ने किया पधारने का आग्रह

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मुरैना/23 अप्रेल 2016 / राज्यसभा चैनल के संपादक, संसदीय और कृषि मामलों के प्रभारी, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा  कृषि पत्रकारिता के देश के शिखर सम्मान चाौधरी चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित और सबसे बढ़कर हमारी पाठ्यपुस्तक कक्षा-8  वीं की ‘बसंत’ में ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनियाँ’ पाठ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह राज्यसभा चैनल की अपनी टीम के साथ देश में जलसंकट की पड़ताल करने निकले हैं। चम्बल, बुंदलेखण्ड से होते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती वे इलाके जहाँ जलसंकट के कारण कृषि और किसानों की चिंता का साझा करना सारे देश की जरूरत बन गई है, हम सबकी ओर से अरविंद जी एक सोद्देश्य यायावर की तरह लम्बी यात्रा पर हैं। ग्वालियर-चम्बल से वे गुजरें और मुरैना में अपने आत्मीयजन को खबर न दें यह संभव ही नहीं, बस! फिर क्या था आज शाम लगभग 8ः30 बजे वे मुरैना में डाॅ. रामकुमार सिंह के निवास पर पधारे। आग्रह करने पर भोजन भी किया और बच्चों को शुभाशीष दिया। कुमारी वैष्णव और शैव ने संगीतमय रामकथा सुनाई तो अपनी प्रिय कलम उन्होंने पुरस्कार में दे दी। डाॅ. रामकुमार सिंह ने उनसे आग्रह किया यदि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों की यात्रा से लौटते समय अथवा जहां भी वे 18 से 29 मई 2016 में हों, कृपया ग्वालियर पधारें और स्नातकशिक्षक- हिन्दी के सेवाकालीन प्रशिक्षण में पधारें। डाॅ. सिंह ने पाठ्यक्रम निदेशक एवं प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-1 सुश्री राजकुमारी निगम एवं समस्त दल की ओर से उन्हें इस हेतु अतिथि विद्वान के रूप में आमंत्रित किया।

 

मुरैना में 23 अप्रेल की शाम श्री अरविंद कुमार जी साथ ऐतिहासिक क्षण

इस दौरान वे पूरे समय के देश के जलसंकट, जल सहेजने से हम लोगों द्वारा किये गये परहेज के कारण उत्पन्न भयावह स्थिति के बारे में बताते रहे। किस तरह जल को परिवहन से दूर-दूर तक पहुंचाने की स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। पर्यावरण के प्रति हमारी उदासीनता और जल को महत्वहीन वस्तु की तरह बहाने के दुष्परिणामों के प्रति उनके स्वयं के देश भर के भ्रमण और जानकारियों ने हमारे रोंगटे खड़े कर दिये। इस दौरान उनके साथियों के अतिरिक्त निवास पर नईदुनिया-जागरण समूह के वन्यजीवन विशेषज्ञ पत्रकार शिवप्रताप सिंह भी उपस्थित रहे।
बातों ही बातों में उनसे चर्चा करने पर जानकारी मिली कि द्विवेदी युग के मूर्धन्य व्यक्तित्व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी पर अभूतपूर्व, दुर्लभ और ऐतिहासिक अभिनंदन ग्रंथ को सामने लाने का महत् कार्य उनके द्वारा किस तरह सम्पन्न हो गया। उनका देश भर में भ्रमण पर रहना, सूक्ष्म-पर्यवेक्षण और जनमानस को कुछ न कुछ प्रदाय करने की उत्कट भावना के चलते ही यह संभव हुआ। गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार से लेकर राष्ट्रपति पुरस्कार और कृषि पत्रकारिता के देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने पर भी अरविंद कुमार जी में वही सादगी बरकार है जो दशकों में कभी नहीं बदली। बिल्कुल भारत रत्न उस्ताद बिसिमिल्लाह खान वाली सादगी। वे कभी पूर्वोत्तर के बोडो इलाके में होते हैं तो कभी तेलंगाना, कभी चम्बल तो कभी मराठवाड़ा। उनकी ग्रामीण चैपालों की श्रृंखला ने राज्यसभा ही नहीं महामहिम को भी अपना प्रभावित दर्शक बना लिया।
लगभग 10 बजे उनका काफिला ग्वालियर की ओर रवाना हो गया। इदम् ज्ञानम् सभाकक्ष उनकी उपस्थिति से धन्य हुआ। जयंत जी द्वारा सूचित करने पर उनका हृदय से आभार।

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2015 में अरविंद कुमार जी को पटना में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 87वें समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश के कृषि पत्रकारिता के शिखर सम्मान, चौ.चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि पत्रकारिता से  सम्मानित किया। यह पुरस्कार इलेक्ट्रानिक मीडिया श्रेणी में मिला । इस समारोह में बिहार और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी, केंद्रीय कृषि मत्री श्री राधा मोहन सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार और कृषि क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां और कृषि वैज्ञानिक मौजूद थे।

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(भारतीय डाक विभाग की श्री अरविंद कुमार सिंह जी से विशेष आत्मीयता है। क्यों न हो, तकनीकी हमले के दौर में वे ही तो हैं जो चिट्ठियों की हामी भरते है। उनकी पुस्तक भारतीय डाक का अनुवाद भारतीय और विदेशी अनेक भाषाओं में हो चुका है। डाक टिकिट यहां दर्शनीय है।)

हिंदी जगत को एक अनूठी भेंट दी श्री अरविंद कुमार सिंह जी ने

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ – 82 साल बाद फिर से प्रकाशन

हिंदी की इसी ऐतिहासिक धरोहर के लोकार्पण समारोह का आयोजन 20 सितंबर 2015 को

50 प्रवासी भवन, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ पर हुआ।

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राजधानी के प्रवासी भवन में ऐतिहासिक द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण के मौके पर साहित्यिक हस्तियों और पत्रकारों के साथ राजधानी में साहित्यप्रेमियों का समागम हुआ। आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में प्रकाशित हिंदी का पहला अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ दशा को प्राप्त था। 83 सालों के बाद इस ग्रंथ को हूबहू पुनर्प्रकाशित करने का काम नेशनल बुक ट्स्ट, इंडिया ने किया । आज के संदर्भ में इस ग्रंथ की उपयोगिता पर मैनेजर पांडेय का एक सारगर्भित लेख भी है।

ग्रंथ के लोकार्पण और विमर्श के मौके पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और विख्यात लेखक डॉ.विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग-प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में विभाजित हो चुकी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान और किसानों के लिए भी लिखते थे। हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्रारंभ द्विवेदी जी से ही हुआ।’’
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मैनेजर पांडे ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि, “यह भारतीय साहित्य का विश्वकोश है।” उन्होंने आचार्य जी की अर्थशास्त्र में रूचि व‘‘संपत्ति शास्त्र’’ के लेखन, उनकी महिला विमर्श और किसानों की समस्या पर लेखन की विस्तृत चर्चा की। इस ग्रंथ में उपयोग की गयीं दुर्लभ चित्रों को अपनी चर्चा का विषय बनाते हुए गांधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र ने इन चित्रों में निहित सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने नंदलाल बोस की कृति ‘‘रूधिर’’ और अप्पा साहब की कृति ‘‘मोलभाव’’ पर विशेष ध्यान दिलाते हुए उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया और कहा कि सकारात्मक कार्य करने वाले जो भी केन्द्र हैं उनका विकेन्द्रीकरण जरूरी है।

‘नीदरलैड से पधारीं प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि हिंदी सही मायने में उन घरों में ताकतवर है जहाँ पर भारतीय संस्कृति बसती है। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की निदेशक व असमिया में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका डॉ. रीटा चौधरी ने कहा कि, यह अवसर न्यास के लिए बेहद गौरवपूर्ण व महत्वपूर्ण है कि हम इस अनूठे ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन के कार्य से जुड़ पाए। ऐसी पुस्तकों का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी होना चाहिए। डॉ. चौधरी ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ हिंदी का ही नहीं बल्कि भारतीयता का ग्रंथ है और उस काल का भारत-दर्शन है।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय ने इन दिनों मुद्रित होने वाले नामी गिरामी लोगों के अभिनंदन ग्रंथों की चर्चा करते हुए कहा कि, “ऐसे ग्रंथों को लोग घर में रखने से परहेज करते हैं, लेकिन आचार्य द्विवेदी की स्मृति में प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य,समाज, भाषा व ज्ञान का विमर्ष है न कि आचार्य द्विवेदी का प्रशंसा-ग्रंथ।” इस ग्रंथ की प्रासंगिकता व इसकी साहित्यिक महत्व को उल्लेखित करते हुए श्री राय ने यहां तक कहा कि, “यह ग्रंथ अपने आप में एक विश्व हिन्दी सम्मेलन है।”
कार्यक्रम के प्रारंभ में पत्रकार गौरव अवस्थी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी स्मृतियों को पावर प्वाइंट के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रेजेंटेशन यह बात उभर कर सामने आयी कि किस तरह से रायबरेली का आम आदमी, मजूदर व किसान भी आचार्य द्विवेदी जी के प्रति स्नेह-भाव रखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने इस ग्रंथ के प्रकाशन के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट और रायबरेली की जनता को धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के संपादकीय और रेल जीवन पर भी काम करने की जरूरत है।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी ने किया।

सन् 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य द्विवेदी के सम्मान में प्रकाशित इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के पत्र के साथ भारत रत्न भगवान दास, ग्रियर्सन, प्रेमंचद, सुमित्रानंदन पंत, काशीप्रसाद जायसवाल,सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उस दौर की तमाम दिग्गज हस्तियों की रचनाएं और लेख है। वैसे तो इस ग्रंथ का नाम अभिनंदन ग्रंथ है और आचार्यजी के सम्मान में प्रकाशित हुआ लेकिन आज कल जैसी परिकल्पना से परे इसमें आचार्य जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ही नहीं साहित्य की तमाम विधाओं पर गहन मंथन है।

इस समारोह में विख्यात लेखक रंजन जैदी, अर्चना राजहंस, योजना के संपादक ऋतेश, राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के महासचिव शिवेंद्र द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे, जय प्रकाश पांडेय, राकेश पांडेय, संपादक प्रदीप जैन, भाषा सहोदरी के संयोजक जयकांत मिश्रा, विख्यात कवि जय सिंह आर्य,देवेंद्र सिंह राजपूत,शाह आलम, विनय द्विवेदी, गणेश शंकर श्रीवास्तव, बरखा वर्षा, तरुण दवे समेत तमाम प्रमुख लोग मौजूद थे।

 

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अरविंद कुमार सिंह का पूर्ण सम्पर्क/पता यहाँ खासतौर पर ‘सर्जना’ के माध्यम से प्रस्तुत है:

अरविंद कुमार सिंह जी

वरिष्ठ संपादक,राज्य सभा टीवी, भारतीय संसद

अध्यक्ष, रायटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली

12 ए, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड, संसद भवन के पास नयी दिल्ली 110001

फोन-9810082873, 9811180970

ईमेल-arvindksingh.rstv@gmail.com, arvind.singh@rstv.nic.in

 

 

श्री अरविंद कुमार सिंह जी से रूबरू होकर प्रमुदित हुए मेरे विद्यार्थी

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केवि मुरैना। 25 अक्‍टूबर 2013। जिसका पाठ पढते हो वही लेखक एक दिन आमने-सामने हो और उन सवालों के बीच से शिक्षक हट जाये जो बच्‍चे सीधे पाठ के लेखक से करना चाहते हों तो है ना एक अचरज, रोमांच और आनंददायक क्षण। ऐसा ही एक दिन बीता केन्‍द्रीय विद्यालय के कक्षा 8 वीं व 9 वीं के विद्यार्थियों का। तारीख 25 अक्‍टूबर को मैं और मेरे विद्यार्थी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे ‘चिट्ठियों की अनूठी दुनिया’ के लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह जी की। वे आये। समय पर आये। ठीक 1 बजे पूरी आत्‍मीयता, उदारता और सरलता के साथ राज्‍यसभा चैनल की चौपाल यूनिट के अपने सहयोगियों के साथ केन्‍द्रीय विद्यालय मुरैना प्रांगण में। हमारी नवाचारी कक्षा गतिविधि के लिए 8 वीं की कुमारी दुर्गेश और उसके साथियों के आमंत्रण पर आये वे। बच्‍चे ऐसे आंखे फाडकर इस क्षण के साक्षी बनने की कोशिश कर रहे थे जैसे उनकी किताब बसंत भाग दो साकार होकर उनसे बतिया रही हो। और लीजिये शुरू हुआ सवालों का सिलसिला, किसी ने उन्‍हें अपना आदर्श मानकर उनसे उनका आदर्श पूछ डाला तो किसी ने जानना चाहा कि चिट्ठियों पर ही उन्‍होने 10 साल तक इतनी खोजबीन करने की क्‍यों ठानी। कोई पूछ रहा था उनके खट्ठे मीठे अनुभव तो कोई इस बात को लेकर हैरान था कि किन किन संस्‍थाओं से जुडकर वे अपना बहुआयामी व्‍यक्‍ितत्‍व संभाले हुए हुए हैं मसलन पत्रकारिता, लेखन, शोध और देश विदेश का खूब भ्रमण।
अरविंद जी ने चिट्ठी पत्री का इतिहास तो बताया ही, सवालों की झडी लगाने वाले सभी बच्‍चों की भूरि भूरि प्रशंसा कर उनका उत्‍साह भी बढाया। आखिर बच्‍चे तो ठाने बैठे थे कि अरविंद जी को अपने हाथों से बनी एक चिट्ठी देंगे और उनसे भी एक स्‍नेह संदेश लेंगे। दोनों ही सपनों को साकार देखना एक नया इतिहास दर्ज होने जैसा था।
बच्‍चों ने एक पेंटिंग ‘मेरे सपने ‘ भी अरविंद जी को दी। जिसे उन्‍होने खूब सराहा। उन्‍होने बच्‍चों के साथ स्‍वल्‍पाहार भी लिया और उन्‍हें बुलाकर ह्रदय से भी लगाया।
इस अवसर पर हुई गरमागरम चर्चा में उनके साथ मंच साझा किया मुरैना के वरिष्‍ठ शिक्षाविद डॉ शंकरसिंह तोमर,डॉ लक्ष्‍मीनाराण मित्‍तल, व केवि प्राचार्य श्रीमती उषारानी शर्मा ने। इस आयोजन में उन्‍हें सुनने वालों में खासतौर पर आये दैनिक भास्‍कर से सर्वश्री रजनीश दुबे, विनोद त्रिपाठी और श्री सुमित दुबे । भाई सुमित जी ने ही मुरैना में अरविंद जी के प्रवेश पर अगवानी भी की। हां इस मौके पर जयंत तोमर जी नहीं आ सके।
अरविंद जी ने अपने राज्‍यसभा चैनल के चौपाल ऐपीसोड को भी यहीं शूट किया। इसमें चर्चा में शामिल हुए उनके साथ डॉ शंकरसिंह जी, डॉ एल एन मित्‍तल जी, श्रीमती उषा रानी शर्मा जी और उनका यह अकिंचन अनुज ………
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‘‘कुंई जैसी गहराई मिल जाएगी’’: अनुपम मिश्र जी से रूबरू//जब अनुपम मिश्र जी ने पढ़ाया अपना पाठ ‘राजस्थान की रजत बूंदें’

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सर्जना, 22 फरवरी, 2013। कक्षा 11 वीं के मेरे विद्यार्थियों के लिए यह सुखद और उत्साहजनक है कि स्वयं अनुपम मिश्र जी ने न केवल मेरे साथ उन जिज्ञासाओं पर बातचीत की जो आप लोग कक्षा में पूछा करते हैं बल्कि लगभग 20 मिनिट तक उन्होनें खुद रेखाचित्र बनाकर उस पाठ की बारीकियों को समझाया।
22 फरवरी की शाम ग्वालियर की एक पहाड़ी पर स्थित पर्यावरण-मित्र उपनगर ‘विवेकानंद नीडम’ के शांत और सुरम्य वातावरण में पत्रकार, संस्कृतिकर्मी एवं शिक्षाविद् आदरणीय श्री जयंत तोमर तथा साथी श्री अरविंद जी के साथ मैं जा पहुंचा। जयंत जी ने एक दिन पूर्व बताया था कि अनुपम जी ग्वालियर आ रहे हैं, और चूंकि ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ मैं कक्षा 11 वीं के विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं, तो विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को साथ समेटे श्री अनुपम जी से भेंट और अगर हो सके तो चर्चा की उम्मीद लिये जा पहुंचा।
हम लोग जब पहुंचे तो अनुपम जी की महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। इस दरम्‍यान नीडम के परिवेश और औषधीय हवाओं का आनंद लेते रहे। बैठक के बाद जैसे ही अनुपम जी बाहर निकले, जयंत जी ने मेरी उनसे शैक्षणिक भेंट-परियोजना के बारे में बता दिया। आदरणीय अनुपम जी की उदारता देखिये कि तत्काल स्थल का चुनाव कर बैठ गए और निकाल ली अपने थेले से काली कलम, लगे रजत बूंदों का मर्म हमें समझाने। पाठ के बारे में जो भी सवालात मैं पूछ रहा था, बड़ी तल्लीनता से वे हमें बारीकियां समझाते जा रहे थे। सवाल कुंईयों की वैज्ञानिक संरचना का भी था और चेजारो की कार्यप्रणाली का। वे चेजारो जो कई वर्षों की परम्परा से कुंईयों के निर्माता बने, उनके वर्तमान जीवन के बारे में पूछा। अनुपम जी उतने ही खरेपन के साथ पाठ को समझा रहे थे जितने खरेपन से वे तालाबों के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं।
ये बहुमूल्य समय हमने लिया उस पाठ को आप तक ठीक से पहुंचाने के लिए जिसके बारे में एनसीईआरटी की आपकी पुस्तक का संपादक मंडल लिखता है: – ‘‘राजस्थान की रजत बूँदें। यह रचना एक राज्य विशेष राजस्थान की जल समस्या का समाधान मात्र नहीं है। यह जमीन की अतल गहराइयों में जीवन की पहचान है।यह रचना धीरे-धीरे भाषा की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जो कविता नहीं है,कहानी नहीं है, पर पानी की हर आहट की कलात्मक अभिव्यक्ति है। भाषा में संगीतमय गद्य की पहचान है। इस पहचान से विद्यार्थियों का ताल मिले, यह वितान की उपलब्धि होगी।’’
जब हमने अनुपम जी से आप सबके लिए संदेश मांगा तो उन्होने लिखा कि – ‘‘अपने समाज में, गांव में शहर में सबके साथ मिलकर अपने आसपास की चीजों को समझने की कोशिश करो। सब जगह कुंई जैसी गहराई मिल जायेगी। शोध नहीं श्रृद्धा रखो समाज पर।‘‘
वापस आते वक्त मैं सोच रहा था कि कुछेक व्यक्तित्वों में ही शायद ये गहराई होती है जैसे कि अनुपम जी….।
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एक ऐसा जीवन जो सिर्फ विद्यार्थियों के लिए लिख दिया गया


प्रो. चन्द्रपाल सिंह
(मेरा यह आलेख मध्‍यप्रदेश शासन, जनसम्‍पर्क विभाग की मुखपत्रिका – मध्‍यप्रदेश संदेश के जुलाई अंक में प्रमुखता से प्रकाशित है। ई-पत्रिका का प्रष्‍ठ क्रमांक 20-21 अवलोकनीय है।)

एक आयोजन चल रहा है एक उन्नत भाल तपस्वी सरीखा व्यक्ति अंचल भर के मेधावी विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा के लिए वार्षिक राशि दे रहा है। राशि भी उसकी अपनी पेंशन से। जब तक वेतन मिला उसे बांट दिया, अब पेंशन है तो वह भी विद्यार्थिंयों के लिए। मंच पर प्रदेश के कुछ जाने पहचाने नाम है मंत्री, आएएस अफसर आदि-आदि। यह व्यक्ति अंचल भर के एक सैकडा से अधिक मेधावी विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के नाम सहित उनके अंकों का प्रतिशत दशमलव सहित बोल रहा है। हाथ में कोई सूची नहीं। शतावधानी व्यक्तियों के बारे में सुना करते थे। देखा तो रहा नहीं गया। कार्यक्रम के उपरांत अचानक मंच पर बैठे कोई प्रमुख अतिथि उठते हैं और इस व्यक्तित्व के चरण छूते हैं। पूरा टाउन हॉल भाव-विभोर है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ही वे अनोखे व्यक्तित्व है जिन्होंने अपने जीवन को अनुशासन का पर्याय बना दिया। हम बचपन में सुना करते थे कि शिवपुरी में एक ऐसे आदर्श शिक्षक है जिन्होंने शिक्षक प्रतिबद्ध पेशे के लिए विवाह नहीं किया, लोग उन्हें नियत स्थान पर देखकर अपनी घडी मिला लेते हैं, उन्हें दुनिया भर के देशों की ढेर सारी जानकारी कंठस्थ हैं। हिन्दी और अंग्रेजी व्याख्यान दें तो श्रोता समय भूल जाते हैं। उस समय जब हम विवेकानंद जी के शिकागो भाषण के बारे में चकित होते तो हमारे शिक्षक प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह को साकार देखने की सलाह देते। वर्ष 2003 में उनसे भेंट के लगभग 4 साल बाद जब उनसे ग्रहनगर मुरैना में ही भेंट हुई तो एक निमिष में नाम सहित मुझे पुकार लेना उनकी दिव्य स्मृति का प्रभाव मुझे कौंधा गया। उनकी इस अद्भुत स्मृति से दुनिया भर के उनके प्रशंसक अभिभूत है। उन्हें सेवानिवृत्ति के उपरांत चम्बल की धरा पर ही भेज दिया और आज उनकी दिनचर्या सैकडों विद्यार्थियों, जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा राज्य प्रशासनिक सेवा सहित देश-प्रदेश से अनगिनत प्रतिभाओं के समग्र गुरुत्व का प्रतीक बना दिया है। नियत समय से नियत समय उनकी एक-सी दिनचर्या तय है। कुछ वर्षों से उनके नाम पर युवाओं ने प्रो. चन्द्रपाल सिंह सिकरवार मानव-मूल्य संवर्धन पुरस्कार भी शुरू किया है। उनका नाम पद्मश्री से नवाजे जाने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है।
आप कल्पना कीजिये ऐसे आदर्श शिक्षक की जिसने 47 वर्षों तक निर्बाध रूप से केवल और केवल ऐसा शिक्षण कार्य किया जो अनोखा कीर्तिमान बन गया। उनके कीर्तिमानों को उनके प्रशंसक और अनुयायी अलिखित विश्वकीर्तिमान का नाम देते है। क्यों प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ने सारे जीवन भर स्वयं को प्रशंसित करने वाले किसी कीर्तिमान के लिए कोई झोली नहीं फैलाई। यहाँ तक कि गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड से पत्र आने के बाबजूद प्रविष्टि नहीं की। उनके कीर्तिमानों में आठ कीर्तिमान तो एक शिक्षक की भूमिका के लिए हैं और दो कीर्तिमान साहित्यकार की भूमिका के लिए। ये कुछ इस तरह हैं-
पहला कीर्तिमान: कर्तव्‍यनिष्ठा –
मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में प्रोफेसर के रूप में अपनी 41 वर्ष की शासकीय् सेवा में उन्होंने अपनी कक्षा का एक भी पीरियड नहीं छोडा। राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी को छोडकर उन्होंने अपनी कक्षाएं रविवार एवं अवकाश के दिनों में भी लीं। कक्षाएं न छूट जायें इसलिए वे अपने एकमात्र छोटे भाई की शादी में नहीं गये। इसका उन्हें कोई मलाल नहीं। पिता से कह दिया था कि मैने कर्तव्य को चुना है और मैं खुश हूँ।
दूसरा कीर्तिमान: वेतन के अलावा कोई धन नहीं –
अपने 41 वर्ष के सेवाकाल में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपने वेतन के अलावा अन्य कोई राशि जीवन में भी नहीं ली। न तो कभी टीएडीए और न कभी मेडीकल बिल का भुगतान लिया। उन्होंने पीठीसीन अधिकारी तथा प्रशिक्षक के रूप में अनेक विधानसभा एवं लोकसभा के निर्वाचन में कार्य किया लेकिन पैसे के भुगतान हेतु बिल नहीं भरा।
तीसरा कीर्तमान: अधिकतम विद्यार्थियों का अधिकतम हित –
अपने पूरे जीवनकाल में वे गरीब एवं जरूरत मंद विद्यार्थियों को प्रारंभ से अब तक आर्थिक सहायता देते रहे हैं जो कि प्रवेश शुल्क, पुस्तकों हेतु धन देना, परीक्षा शुल्क आदि के रूप में है। अनेक गरीब अभिभावकों को धन देते रहे हैं जिससे उनके बच्चे उच्च शिक्षा के अध्ययन हेतु बाहर जा सकें या वे रहने के लिये मकान बनवा सकें अथवा वे अपने पुत्र-पुत्रियों की शादी कर सकें। वे अपने वेतन का पचास प्रतिशन इन परिहित के कार्यों पर व्यय करते थे। अब पेंशन का पचास प्रतिशत गरीब विद्यार्थियों एंव जरूरतमंदरों पर खर्च करते हैं।
चौथा कीर्तिमान: सदाचरण और समय की पाबंदी –
एक ऐसे युग में जबकि घोर अपशब्दों को साहित्य और सिनेमा तक में मान्यता दी जा रही है प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह एक ऐसा अप्रतिम उदाहरण हैं जिन्होने अपने सारे जीवन में एक भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया है। उनकी दिनचर्या का अनुशासन और सादा जीवन देखकर काई भी दंग रह सकता है। अच्छाई के माध्यम से बुराई पर जीत को उन्होंने अपना संकल्प बनाया ही नहीं अपने जीवन में सिद्ध कर दिखाया।शिवपुरी के लोग अपनी घडियां उनकी दिनचर्या से मिलाते थे। वे समय के इतने पाबंद है कि कुछ भी हो वे समय पर निर्धारित स्थान पर हमेशा उपस्थित रहते हैं। वे सिर्फ इसलिए ईश प्रार्थना करते रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य कभी खराब न हो ताकि वे जीवन में कभी भी कक्षा में अनुपस्थित नहीं हों और आश्चर्य नहीं है कि ईश्वर ने उन्हे इसके लिए तथास्तु कह दिया।
पांचवा कीर्तिमान: इंग्लिश अशोसियेशन –
धाराप्रवाह अंग्रेजी व्याख्यान के लिए युवाओं में खासे लोकप्रिय और आदरणीय प्रो चन्द्रपाल सिंह ने भारतीय विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास हेतु पीजी कॉलेज शिवपुरी में इंग्लिस अशोसियेशन प्रारंभ किया तथा व्यक्तित्व विकास की विभिन्न विधाओं में चालीस वर्ष तक लगातार और निर्बाध निःशुल्क शिक्षा देते रहे।
छठवां कीर्तिमान: सामान्य ज्ञान की कक्षाएं –
उनका सारा जीवन एक सी दिनचर्या के लिए कई दशकों से विख्यात है। वे पीजी कॉलेज शिवपुरी में शाम को चार से छहबजे तक सामान्य ज्ञान की निःशुल्क कक्षाएं लेते थे जिनमें पांच सौ से अधिक विद्यार्थी जमीन पर बैठते थे और प्रतियोगिता परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते थे।
सातवां कीर्तिमान: शासकीय सेवा का रिकार्ड –
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार ने सन् 1964 से अंग्रेजी के व्याख्याता के रूप में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपनी शिक्षकीय यात्रा शुरू की। और लगातार 41 साल तक इसी महाविद्यालय में पढाते हुए सेवानिवृत हुए। इस दौरान वे नगर में अपार लोकप्रियता और श्रृद्धा का केन्द्र रहे। सेवानिवृत होने के बाद वे मुरैना में प्रतिदिन निष्ठा एवं उत्साह के साथ 8 पीरियड रोज पढाते हैं – साक्षात्कार हेतु तैयारी कराते हैं एवं मार्ग दर्शन देते है। उनके ये सभी कार्य पूर्ण रूपेण निःशुल्क हैं।
आठवां कीर्तिमान: कर्मचारी एवं व्यावसायियों के लिए निःशुल्क कक्षाएं –
कर्मचारी एवं व्यावसायियों को प्रति रविवार निःशुल्क कक्षाएं 11 से 3 बजे तक 6 पीरियड लेते हैं। निःशुल्क अंग्रेजी पढाते हैं। ये कक्षाएं जनवरी से मई तक चलती है। इस कक्षा में आप चम्बल संभागीय मुख्यालय के अनेक प्रशासनिक अधिकारियों को सहज विद्यार्थी के रूप में प्रो चन्द्रपाल सिंह की अपार मेधा और वात्सल्य का अमृतपान करते हुए देख सकते हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी उनके कीर्तिमान अनूठे है। हर साल एक नियत तिथि को उनकी एक किताब वे खुद प्रकाशित करते है। वे स्वयं एक हजार प्रतियां अपने शिष्यों और प्रशंसकों को वितरित करते हैं। उन्होंने 27 साहित्‍यिक पुस्तके लिखी हैं जिनमें 25 हिन्दी में तथा 2 अंग्रेजी में। उनकी 27 पुस्तकों की 27 हजार प्रतियां छपी। उन्होंने साहित्य की हर विधा पर लिखा है। जैसे कविता, नाटक, उपन्यास, निबंध, कहानी, खण्डकाव्य्, संस्मरण आदि।
पहला अलिखित विश्व कीर्तिमान –
उनकी हिन्दी की 25 साहित्यिक पुस्तकों में से एक है ’’सारा जहाँ हमारा ‘‘। इस पुस्तक में 207 कविताएं हैं। विश्व में कुल देश 207 हैं। उन्होंने विश्व के प्रत्येक देश पर पूर्ण जानकारी देते हुए एक कविता लिखी है फलस्वरूप 207 कविताएं हैं। ये सारी जानकारी उन्हें कंठस्थ है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस पुस्तक को सराहते हुए उन्हें पत्र भेजा जिसमें उन्होंने इस पुस्तक से बहुत प्रभावित होने की बात स्वीकारी है। खास बात यह कि के लिये गिनेज बुक ऑफ रिकार्डस से भी पत्र् आया है। याद्यपि उन्होंने प्रविष्टि नहीं की है यह कहते हुए कि गिनेज बुक ऑफ रिर्कास में विश्व में सबसे लम्बा या विश्व में सबसे छोटा आदि की तरह के बिन्दुओं पर विचार किया जाता है।
दूसरा अलिखित विश्वकीर्तिमान-
प्रो. सिकरवार का द्वितीय् अलिखित कीर्तिमान यह है कि उन्होंने अपनी 27 साहित्यिक पुस्तकों में किसी का भी कोई भौतिक मूल्य् नहीं रखा है। सभी 27 पुस्तकों का नैतिक मूल्य् है जैसे-कर्तव्यनिष्‍ठा, ईमानदारी, परहित, भाईचारा, देशभक्ति मेहनत आदि । प्रो. सिकरवार की साहित्‍ियक यात्रा सन् 1964 में प्रारंभ हुई। पहली पुस्तक जंगल के फूल 1982 में छपी। तब से उनका यह सृजन एक निश्चित गति से चल रहा है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह के जीवन और साहित्य को पूरे विश्व से प्रशंसा प्राप्त हुई है। दुनियां भर के अनेक राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों, पाश्चात्य देशों के पुस्तकालयों और विश्व के सर्वाधिक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से अनेक प्रशंसा-पत्र और साधुवाद पत्र प्राप्त हुए है। जो उनके कक्ष में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं। इनमें से अनेक पत्रों का मजमून पढने का सौभाग्य इस लेखक को भी प्राप्त हुए।
प्रेरक कायर्क्रम की नियतता का कीर्तिमान –
प्रो. सिकरवार हर साल जुलाई के अंतिम रविवार को प्रतिभा समान समारोह का आयोजन करते हैं। इसमें मुरैना जिले के स्कूल, कॉलेज तथा यूनीवर्सिटी के टॉपर्स को एक हजार रूपये प्रति विद्यार्थी तथा 1 प्रमाण पत्र् प्रदान किया जाता है। वे स्वयं की इस आयोजन के आयोजक प्रायोजक आदि होते है। बिना किसी अन्य की आर्थिक सहायता से होने वाले उनके आयोजन में वे स्वयं ही मंच संचालक होते है। खास बात यह है सभी गणमान्य अतिथियों की तरह ही दर्शक वर्ग का स्थान आदि पहले से सुनिश्चित होता है। उनका आयोजन किसी अतिथि की बाट नहीं जोहता और नियत समय पर मिनिट और सेंकड के हिसाब से शुरू हो जाता है। इसी कायर्क्रम में वे मध्‍यप्रदेश के शिक्षाविदो जैसे कुलपति, प्राचार्य, प्रोफेसर, डीलिट, पीएचडी, अभिभावकगण, मेडीकल, इंजीनियरिंग, यूपीएससी तथा पीएससी से चयनित व्‍यक्‍ितयों का अभिनंदन करते हैं। पूरे कार्यक्रम के खर्चे का वहन स्‍वयं करते हैं। इस कार्यक्रम को पिछले 6 वर्षों से टाउन हॉल, जीवाजी गंज मुरैना में करते हैं। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने किसी भी अत्याधुनिक सुविधा का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं किया। वे मोबाइल नहीं रखते है। उनक पते पर दूरभाष क्रमांक पर बातचीत या उनसे मिलने का समय भी नियत है। न उससे पहले और न उसके बाद। उनका पता है- श्रीराम कुटीर, टी.एस.एस. महाविद्यालय के समीप, गणेशपुरा मुरैना (म.प्र.) फोन नं. 07532-226639

जीवन पर एक दृष्टि:
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार का जन्म 3 मई सन् 1943 को बागचीनी, जिला मुरैना में हुआ। उनकी हाईस्कूल तक शिक्षा मुरैना, भिण्ड एवं झाबुआ मध्‍यप्रदेश में हुई। प्री-यूनीवर्सिटी एवं बीए पीजी कॉलेज मुरैना से किया। एमए अंग्रेजी में एमएलबी कालेज ग्वालियर में टॉप किया। एमए राजनीति शास्त्र में उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये । सम्मान स्वरूप उन्हें जीवाजी विश्वविद्यालय द्वारा 3 गोल्ड मेडल प्रदान किये गये। विश्व प्रसिद्ध् अंग्रेजी साहित्यकार टॉमस हार्डी पर उन्होंने पीएचडी की तथा महानतम अंग्रेजी नाटककार, विलियम शैक्सपियर पर उन्होंने डीलिट की। प्रो. सिकरवार अंग्रेजी में डीलिट करने वाले चम्बल संभाग के पहले व्यक्ति रहे। उनके मार्गदर्शन में 11 शोधार्थी अंग्रेजी में पीएचडी कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में वे वर्ष 1964 से 2005 तक रहे। इस दौरान वे यूपीएससी, पीएससी तथा विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं हेतु वे निःशुल्क मार्गदर्शन देते रहे। निःशुल्क कैरियर गायडेंस देना उनका महत्वपूर्ण कार्य है। उनके द्वारा पढाए गये हजारों विद्यार्थी विभिन्न सेवाओं के लिये चयनित हुए हैं तथा हो रहे हैं। जीवाजी विश्वविद्यालय् की महासभा के प्रो. सिकरवार 2 बार सदस्य् कला संकाय् के एक बार डीन तथा कार्यपरिषद के एक बार सदस्य रहे हैं। अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष के रूप में वे सन् 2005 में लगभग 41 वर्ष की शासकीय् सेवा के बाद सेवा निवृत्त हुए। शिवपुरी के नागरिकों ने उनके सेवानिवृत्ति के दिन अत्यन्त गरिमामय तरीके से नागरिक अभिनन्दन किया, । सेवानिवृत होने के बाद वे चम्बल संभाग के मुख्यालय मुरैना को गौरवान्वित करते हुए निःशुल्क अध्यापन कार्य कर रहे है। वे प्रतिदिन साढे दस बजे से डेढ बजे तक 4 पीरियड लगातार अंग्रेजी तथा सामान्य् ज्ञान की कक्षा प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठ रहे विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क लेते हैं। तथा शाम को 5 बजे से 8 बजे तक पीरियड प्रतिदिन साक्षात्कार की तैयारी कराते हैं और कैरियर गाइडेन्स देते हैं। इस तरह प्रतिदिन 8 पीडियड में पूर्ण निष्ठा के साथ निःशुल्क शिक्षण, साक्षात्कार की तैयारी तथा कैरियर गाइडेन्स का कार्य करते हैं। उनके सफल विद्यार्थियों की संख्या गिनना और सूची बनाना एक मुश्किल काम है।