इकत्तीस छिपकलियों का भय :

31 साल पहले का एक धुँधला पन्ना

‘‘जमाने के सलीब पर / लटका हुआ मैं
और मेरा अहं : / इकत्तीस छिपकलियों के भय से
सकपकाती प्रतिभा के साथ / पिछले दिनों मेरी शक्ति
रिस-रिस कर चू गई / और अनेक भावात्मक आँखें
मित्र बनकर देखती रहीं / आज
प्रश्‍न है – / इन कीडे मच्छरों के
अभिनंदन स्वीकार करने का / रह जाता है अनुत्तरित।’’
(कवि गोपाल सिंह)

पुस्तकालय के एक पुराने धूल जमे खाने से धूल झड़ाकर उठाता हूँ एक किताब। पुरानी और पतली किताब। नीले रंग की जिल्द लाल धूल से एक अजीब रंग की हो गई है। लेकिन पूरी तरह सुरक्षित। पुराने समय की प्रिंटिग एक अलग तरह का आकर्षण मेरे लिये पैदा कर रही है। किताब का पहला पन्ना पलटता हूँ तो डूबता चला जाता हूँ। मेरे लिए यह किताब एक खास तरह की हो जाती है। लगता है इकत्तीस साल पहले जा खड़ा हूँ। मैं चौंक उठता हूँ इन कविताओं को पढ़ते हुए………..। क्या इतिहास एक बार फिर उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ दो व्यक्ति अलग-अलग समय के होते हुए भी एकाकार हो जाते हैं।
ये किताब है ‘रक्त-संध्या‘। पहले पन्ने पर ही दर्ज है कवि का नाम – गोपाल सिंह, स्नातकोत्तर अध्यापक (हिन्दी), डोनीमलाई कर्नाटक। किताब के छपने की तारीख है – 24 जुलाई 1978। किताब अरविंद प्रिंटिंग प्रेस हैदराबाद में छपी।
कवि गोपाल सिंह ‘अपनी बात‘ में लिखते हैं- ‘’रक्त-संध्या की कुछ कविताएँ 1970 के पूर्व की हैं तब में रांची विश्‍वविद्यालय का छात्र था। संभावना, ‘पुटुष‘ ‘स्थापना‘ आदि पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। स्थानांतरण के कारण कई कविताएँ अव्यवस्थित हो गईं जिनका प्रकाशन नहीं करा सका। मैंने इकतीस वर्ष पार करने के अवसर पर अपनी कविताओं के प्रकाशन का निर्णय किया। इस समय डोनीमलाई (कर्नाटक) में हूँ। यहाँ लिखी गई अधिकांश कविताएँ इस संकलन में शामिल हैं। इसलिए ‘रक्त-संध्या‘ पढ़ते समय यह परिवेश ही आधार होना चाहिए।‘‘ (गोपाल सिंह)
इस तरह पता चलता है कि कवि गोपाल सिंह 31 साल के हो गये थे तब ये किताब सामने आयी थी। यह बात सन् 1978 की है। यह मेरा जन्मवर्ष था। और इस किताब के 31 साल के होने पर सन् 2009 में, मैं उसी पद पर आया जिस पर 31 साल पहले श्री गोपालसिंह थे। यह एक ऐसा साहित्यिक संयोग है जो मेरे लिए विशेष है। उनकी अनेक कविताओं से उस समय यहाँ के क्षेत्र की सुविधाविहीन स्थितियों का पता चलता है। ऐसे कठिन समय में वे यहाँ शिक्षक रहते हुए साहित्य-साधना करते रहे। यह सोचकर ही हृदय भर आता है। उनकी एक कविता में ये 31 छिपकलियों का भय जो उनकी कविताओं में है वह उनकी उम्र के 31 सालों के अलावा दरअसल उस समय यहां की सुविधाहीनता के परिवेश को भी दर्शाता है। उनकी ‘रोजनामचा‘ कविता देखिये-
‘‘मेरे बिस्तर पर /पूरा परिवार /पुस्तकालय / दफ्तर और दवाखाना है : /मेरा रोजनामचा / अब / कड़वी या कषैली /मीठी या तिक्त /गंध नहीं आती/सब बकबासनुमा है/जिंदगी का विस्तार / या / संकुचन / फाहियान से / सोल्झेनित्सिन या/ हेमिंग्वे तक/रहट से उड़नतस्तरी तक / कूद-फाँदकर /बिस्तरनुमा होना है।‘‘
वास्तव में गोपालसिंह जी का अध्ययन और जानकारी भी इसी प्रकार विस्तृत थी। उनके सामने हम आज की पीढ़ी का अध्ययन और ज्ञान बहुत सीमित लगता है। इतना ही नहीं पुस्तक यह भी बताती है कि किस प्रकार उस युग की परिस्थितियों के प्रति यह शिक्षक सचेत था। उनकी एक और कविता है ‘बाजार‘। आज जबकि बाजारवाद का हल्ला है, 31 साल पहले की यह कविता देखिये-
‘‘ यह / बाजार है / यहाँ /सभी चीजें /बिकती हैं / भाषण / प्रमाण-पत्र / टूटता विश्‍वास / खुदगर्जी / दम तोड़ती आस्तिकता-नैतिकता / लापरवाही / बंजारापन/ अंजीर / आम / कपड़ा / और भूख भी। / चीजें गूँगी हैं / विक्रेता बहरा / तमाशाई अंधा /सिर्फ क्रेता की आँखें सतेज हैं / मालूम नहीं कि / लोग चीजों की दोहरी कीमतें क्यों चुकाते हैं‘‘
गोपाल सिंह जी ‘परिवेश‘ कविता एक लम्बी कविता है जो अनायास ही मुक्तिबोध की याद दिला जाती है। सत्तर-अस्सी के दशक का यह परिवेश रूप बदलकर फिर हमारे सामने है –
‘‘घिरे हैं हम सब एक परिवेश से/तकिया कलाम यह परिवेश……….कपड़ा वही है / दोहरी पीठ के बदले में /दोहरी कालर की कमीज है/सिलाई शुल्क वही है / सिर्फ रोशनी नई है / इतिहास नहीं‘
इतिहास नहीं बदलता। यह फिर – फिरकर हमें उन्हीं मोड़ों पर लाकर खड़ा करता है। गोपाल सिंह जी प्रबुद्ध और संघर्षशील शिक्षक रहे होंगे। आजकल वे जहाँ भी होंगे संभवतः सेवानिवृत होकर स्वस्थ जीवन यापन कर रहे होंगे। कविताओं मे उनका युवा-आक्रोश से भरा चेहरा ही हमारे सामने है। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूँ जहाँ सुविधाओं की परवाह न करते हुए गोपालसिंह जी जैसे शिक्षकों ने बैठकर इसकी गरिमा बढ़ाई। बार-बार सोचता हूँ क्या हमारी पीढ़ी अपने अग्रजों का उत्तराधिकार लेने में सफल हो रही है। सन् 1978 में ही ‘चकोर‘ सूर्यप्रताप सिंह, एंड्रूज गंज, नयी दिल्ली-49 इस किताब की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘गोपाल सिंह केन्द्रीय विद्यालय संगठन के उन रचनाधर्मी अध्यापकों में से हैं जो विद्यार्थी, श्यामपट और ग्रहकार्य के अतिरिक्त अपनी प्रतिभा और मेहनत का रचनात्मक उपयोग करना जानते हैं। देश को ऐसे अध्यापकों की आवश्‍यकता है – विशेषकर अहिन्दीभाषी प्रदेशों में। हिन्दी भाषा आज जिस स्थिति से गुजर रही है, जैसी धार और मार सह रही है उसका अंदाज दिल्ली या पटना या भोपाल से नहीं लगाया जा सकता। वह तो डोनीमलाई जैसी जगह का हिन्दी-प्रेमी ही बता सकता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहुँच जाने के बाद भी रसोई में वह अछूत है। देश की मानसिकता बदलेगी- अध्यवसाय चाहिए।‘‘(चकोर सूर्यप्रताप सिंह)
आज इकत्तीस छिपकलियों का डर नहीं। मेरा परिवेश सर्वसुविधायुक्त है। पर मैं अनुभव कर सकता हूँ इस भय को। आज के इस भय में अनेक परिवेशगत भय छुपे हैं। इस देश और समाज के। नमन करता हूँ गोपाल सिंह जी को। 31 – 31 साल के दो कालखंडों को ।

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समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे

: तीसरे सप्‍तक में कुँवर नारायण…………..

‘तीसरा सप्‍तक’ उठाता हूँ। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रथम संस्‍करण 1959 में छपा, अज्ञेय के सम्‍पादन में। मेरे हाथ में चौथा संस्‍करण अगस्‍त 1979 है। हर परीक्षा में सप्‍तकों पर प्रश्‍न रहा करते, इसलिए सप्‍तक और अज्ञेय के नाम के प्रति एक आकर्षण इन सवालों ने बना रखा था। अज्ञेय लिखित भूमिका में डूबते-तिरते हुए नामों की सूची पर नजर डालता हूँ वे नाम जो हर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते रहे………..5 वें क्रम पर जाकर ठहरता हूँ, …… कुंवर नारायण। पिछले दिनों उनकी ज्ञानपीठ रचना ‘बाजश्रवा के बहाने पढ़ रहा था। ‘तीसरा सप्‍तक’ हाथ आया तो इस नजरिये के साथ प्रवेश किया कि देखें तो सही शुरूआती कुंवर नारायण से ज्ञानपीठ कुंवर नारायण तक सर्जना के सोपान किस तरह चढ़े हैं।
कुंवर जी के परिचय और वक्‍तव्‍य( 146 से 151) में जो बिंदास लगा वह रेखांकित कर लिया-
एक – ‘’शिक्षा की जो पद्धति स्‍कूल, कॉलेज या विश्‍वविद्यालय में रही, उस से मन सदा विद्रोह करता रहा, इस लिए शायद स्‍कूली अर्थ में कभी भी बहुत उत्‍कृष्‍ट विद्यार्थी नहीं हो सका।‘’
दो- आरम्‍भ से ही पढ़ने और घूमने का बहुत शौक रहा है, और दोनों के लिए पर्याप्‍त अवसर भी मिलता रहा। सन् 1955 ई में चेकोस्‍लोवाकिया, पोलैण्‍ड, रूस और चीन का भ्रमण किया-‘ यह कइ तरह से महत्‍वपूर्ण रहा’
तीन – ‘कविता पहले-पहल सन् 1947 में अंगरेजी में लिखना आरम्‍भ किया, पर शीघ्र ही हिन्‍दी की ओर प्रव्रत्‍ति हुई और तब से नियमित रूप से हिन्‍दी में लिखने लगा।‘
चार – सन् 1956 से, उस पत्रिका के बन्‍द होने तक, युगचेतना के सम्‍पादक मण्‍डल में रहे। अब मोटर के व्‍यवसाय में मुब्‍ितला रहते हैं – और अपनी इस व्‍यस्‍तता से स्‍वयं त्रस्‍त हैं : ‘ फिक्रे-दुनिया में सर खपाता हूँ, मैं कहां और ये बवाल कहां’
पांच – ‘’साहित्‍य जब सीधे जीवन से सम्‍पर्क छोड़कर वादग्रस्‍त होने लगता है, तभी उस में वे तत्‍व उत्‍पन्‍न होते हैं जो उस के स्‍वाभाविक विकास में बाधक हों। जीवन से सम्‍पर्क का अर्थ केवल अनुभव मात्र नहीं, बल्‍िक वह अनुभूति और मनन-शक्‍ित भी है जो अनुभव के प्रति तीव्र और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया कर सके।‘’
छह- ‘ जीवन के इस बहुत बडे ‘कार्निवाल’ में कवि उस बहुरूपिये की तरह है जो हजारों रूपों में लोगों के सामने आता है, जिस का हर मनोरंजक रूप किसी न किसी सतह पर जीवन की एक अनुभूत व्‍याख्‍या है और जिस के हर रूप के पीछे उस का एक अपना गम्‍भीर और असली व्‍यक्‍ित्‍व होता है जो इस सारी विविधता के बुनियादी खेल को समझता है।‘’

कुंवर जी कुल 21 कविताएं तीसरे सप्‍तक में हैं। कुछ ही कविताएं समकालीन कविता के उस रूप का संकेत करती हैं जिसके लिए कुंवर नारायण जाने जाते हैं। मिथकीय चेतना के उच्‍चतम सोपान पर पहुंचे कुंवर नारायण की ‘सम्‍पाती’ जैसी कविता इस लिहाज से रेखांकनीय हो जाती है। शब्‍दों की जो मितव्‍ययता कुंवर जी की खास पहचान है उसका संकेत उनकी प्रारंभिक कविताओं से ही चला आया है। कुछ कविताएं आम आदमी की उदासी की हैं तो कुछ प्रक़ति का नये ढंग से अवलोकन, कुछ बाल कविताएं सी प्रतीत होती हैं, मगर हैं प्रौढ सत्‍य को लेकर। मुझे सर्वाधिक प्रभावित करने वाली दो कविताएं यहां हैं – ‘सम्‍पाती’ और ‘घर रहेंगे’
एक – ‘गहरा स्‍वप्‍न’ : ‘’सत्‍य से कहीं अधिक स्‍वप्‍न वह गहरा था / प्राण जिन प्रपंचों में एक नींद ठहरा था’’
दो – ‘दो बत्‍तखें : ‘दोनों ही बत्‍तख हैं / दोनों ही मानी हैं / छोटी-सी तलैया के/ राजा और रानी हैं’’
तीन- सम्‍पाती : ‘ धीमा कर दो प्रकाश/ घायल, सूर्योन्‍मुख,/ असंतुष्‍ट, उत्‍पाती:/फेनों का विप्‍लव बन/ लहरों पर तितर-बितर/ दग्‍ध-पंख सम्‍पाती :/ठण्‍डे अंधेरे के एक सुखद फाहे को/ जलती शिराओं पर ….. /धीमा कर दो प्रकाश । / मोम की दीवारें /गल न जायें,/ सपनों के लाक्षागृह/ / जल न जायें, / प्‍यार के पैमाने / -दृवित नेत्र – / छल न जायें…./ धीमा कर दो प्रकाश / कॉंच के गुब्‍बारे, / सोने की मछलियॉं /कुछ नकली चेहरे / कुछ मिली-जुली आकृतियाँ, / ओस की बूँदों-से चमक रहे रजत-द्वीप / घुल न जायें…../ धीमा कर दो प्रकाश । / पर्णकुटी की छाया शीतल है, / पॉंवों के नीचे फिर धरती का दृढ़ तल है/ गर्म देह/ नील नयन / क्षितिज पार / उड्डयन,/ प्राणों में एक जलन / उस ज्‍वलन्‍त ऑंधी की/ स्‍मृतियॉं / फिर न मिल जाऍं / धीमा कर दो प्रकाश।’
चार : ”घर रहेंगे, हमीं उन में रह न पायेंगे : समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे :
अनर्गल जिंदगी ढोते हुए किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जायेंगे।
मृत्‍यु होगी खड़ी सन्‍मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविध, स्‍वप्‍न खोके, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।”

‘रोशनी की कोपलें’ – हाथों से छूते हुए……….

पुस्तक-समीक्षा – डॉ रामकुमार सिंह
पुस्‍तक – ‘रोशनी की कोपलें(गजल-संग्रह)
सर्जनाकार – डॉ वशिष्‍ठ अनूप
प्रकाशक – उद्भावना प्रकाशन


हने को जो कोंपलें हैं वे कब अंगार बन जायें, कहा नहीं जा सकता। या इस तरह कहिये कि कब अंगारों की तासीर महज ‘कोंपल’ के शीर्षक में रखकर हथेलियों में दे दी जाये….. रोका नहीं जा सकता है। ऐसी ही एक नजीर है वशिष्ठ अनूप का गजल संग्रह – ‘रोशनी की कोपलें’
यह गजल-संग्रह उद्भावना से छपा है। इसमें कुल एक सैकड़ा जमा दो गजलें हैं। हिन्दी गजल की परम्परा में यह संग्रह एक और उपलब्धि है। दुष्यंत के बाद हिन्दी गजल में नई बुनावट को उसी प्रखरता और तल्खी के साथ बनाये रखने का अहसास ‘रोशनी की कोंपलें’ से होता है।
‘समय की पहचान’ की जो बात अनूप वशिष्ठ के विषय में मानी गई है उसे इस तरह के कई शेर सामने लाते हैं –

”हदों के पार होता जा रहा है
समय खूंखार होता जा रहा है”

समय का खूंखार हो जाना इसलिए नहीं कि अंधेरे के नुमांइदे ज्यादा हो गये हैं और रोशनी की कोपलें सूराख तलाशती हों, दरअसल मामला यह निकलता है कि अंधेरे और उजाले के फर्क का श्याम-श्वेत मानदंड समाप्त हो गया है। समय का खूंखार हो जाना जिस अंदाज में वशिष्ठ अनूप परिभाषित करते हैं वो इस दौर की शातिरी को पकडने और खंगालने की प्रक्रिया है –

‘समझना उसको मुश्किल है बड़ा शातिर शिकारी है
वो खंजर बेचने वाला अहिंसा का पुजारी है”

इस माहौल में केवल उदात्त कल्पनाओं वाले कवि के पास वे पैने औजार शायद न हों जो राजनीतिक-चेतना ये युक्त नये गजलकार के पास होते हैं। दुष्यंत ने जिस राजीनीतिक-चेतना का गजल से मजबूत परिचय कराया था वह उतनी ही शिद्दत के साथ अनूप वशिष्ठ के यहां मौजूद है। व्यंग्य की धार भी उसी तरह –

”ये नाले आजकल बनकर समन्दर बात करते हैं
मसीहाओं के जैसे ये सितमगर बात करते हैं
कभी कुर्सी के ऊपर से, कभी टेबुल के नीचे से
हमारे देश की संसद में बंदर बात करते हैं”

इतना ही नहीं, हर स्तर पर शक्ति का केन्द्रीयकरण किस प्रकार लम्पटों के हाथों में है, अनूप इससे बाखबर हैं। वे जानते हैं कि न केवल ये ‘बंदर बात करते हैं’ बल्‍िक ‘बंदरबांट भी करते हैं। अंधेरे के नुमाइंदों और सरमायेदारों के बीच कैसे घोषित-अघोषित अनुबंध हैं, इसकी भी वे खबर रखते हैं-

”कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।”

इस तरह के मकड़जाल में दुष्यंत सड़कों पर लिखे हजारों नारों को न देखने की बात जो कहते है, कुछ उसी लहजे में निकम्माई वादों से सावधान हो जाने की बात या मोहभंग सरीखी कोई चीज अनूप के यहां भी है-

”वादों पर विश्वास हो कैसे
हर वादा इक नारा निकला”

इस मोहभंग के बाजिब कारण भी हैं। नये प्रयासों को कुचलना व्यवस्था के लिए एक शगल से कम नहीं। जिस परकटे परिंद की कोशिश देखने के बीच दुष्यंत को एक मलाल भी था, उसे कुछ इस रूप में अनूप सीधा-सीधा कह देते हैं-

”भिनसार की आंखों में काली रात दीजिए
पंछी जो उड़ना चाहे तो पर काट दीजिए
इंसाफ की खातिर उठे आवाज अगर हो
पिटवाइये लाठी से, हवालात दीजिये”

इस खतरनाक समय में भी रोशनी की कोंपलों का अपनी तरह का वादा है। कोंपलों से जिस ‘मासूमियत’ या ‘कोमलता’ का अहसास होता है, यह लगता है कि इन कोपलों को खुद किसी ‘सुरक्षा-योजना’ की आवश्यकता तो नहीं, लेकिन जब ये कोपलें फूटती हैं, इस तरह कि, जगत के जीर्ण पत्रों को झरातीं हैं। उजाले का पेड़ खुश होता है, जब ये घोषणा सुनता है-
”उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें”

स्मरण रहे कि इस प्रक्रिया जो जन्म देने वाले सर्जनाकार के लिये यह सहज नहीं है। बड़ी बात जो शेर में होती है उसके लिए उतना ही विप्लव रचनाकार सहता है। युवा गजल-गायक हुसैन बंधु गायकी से पहले एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करते हैं जो यहां प्रासंगिक हो उठता है- ”हम गजल कहते हैं तो खून जलता है / लोग समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।’‘ ये मंचीय जुमला कुछ इस तरह साहित्यिक अंदाज में उतनी गहराई से ‘रोशनी की कोपलें’ में नजर आता है-

”उसके मन की पीड़ाओं को कौन समझता है
दुनिया कहती कोयल कितना मीठा गाती है”

आंदोलन, विप्लव-गान, और वैचारिक-क्रांति की सुगबुगाहट अपने सक्रिय-चेहरे से बहुत पहले की उपज होती है। शांति की तलहटी में उथल-पुथल का ज्वार निहित होता है-

”बाहर से खामोश बहुत लगता लेकिन
भीतर से हर वक्त सुलगता रहता है”

इसी तलांतर को महसूस करते हुए अनूप वशिष्‍ठ साहित्य के उस खेल को अस्वीकार करते हैं जो बचाव की मुद्रा में है, वे आक्रमण में ही विजयश्री का वरण मानते हैं, वैचारिक-सर्जना-प्रक्रिया में….

”साहित्य फकत ढाल नहीं आक्रमण भी है
यह आक्रमण हम तुम पे लगातार करेंगे”

दुष्यंत ने इस जमीन पर जिस तपिश को महसूस किया था। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की रेत पर आम आदमी के पांव किस तरह जलते रहे, उसे आगे अनूप भी महसूस करते हैं, लेकिन नया यह जुड़ता है इस जलन के साथ कुछ आशा की ठंडक भी है। नये दौर में कुछ तो ऐसा घटने को है कि यह कहा जा सके-
”रेत पर पांव जलते रहे देर तक
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा”

‘रोशनी की कोपलें’ के बारे यह अत्यंत जरूरी वक्तव्य हो जाता है कि इस किताब में मन-मस्तिष्क के बीच, समाज और भावनाओं के बीच, वैचारिकता और मन-बहलाव के बीच एक गजब का संतुलन है। दुष्यंत जब ‘साये में धूप’ महसूस कर रहे थे तो ‘इश्क पर संजीदा गुफ्तगू’ से ध्यान बखूबी हटाया था। वशिष्ठ अनूप ने राजनीतिक-सामाजिक विमर्श के बीच मन की कोमल भावनाओं को शिद्दत से जगह दी है। सौन्दर्य की उपासना जब वे करते हैं तो गजल अचानक गीत के माधुर्य से भर जाती है। उनकी सर्जना-प्रक्रिया में यह बात शायद इसलिए और समाई हुई है कि उन्हें गीत व गजलों की गेयता से न केवल प्रेम रहा है वरन उनके अध्ययन व विशेषज्ञता के केन्द्रबिन्दु में गीत और गजल दोनों का अकादमिक विस्तार है। एक गजल में वे लिखते हैं-

”एक अनुबंध कर लिया मन में
जुड़ गये दिल के तार हैं चुप-चुप”

सौन्दर्य के उनके प्रतिमान सादा हैं। कबीर की अक्खडता अगर कई गजलों में है तो सौन्दर्य के प्रति सहज आकर्षण-योग भी है-

”अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी”

”””””””वरिष्‍ठ समीक्षकों की नजर में ””””

पुस्तक के फ्लैप पर टिप्पणीकार के रूप में हिन्दी विभाग, बीएचयू के प्रोफेसर डॉ अवधेश प्रधान लिखते हैं – ”वशिष्ठ अनूप की कविता ने गेय कल्पना के पंखों पर उड़ान भरते हुए अहर्निश प्रकृति, व्यक्ति और समाज के जीवंत जीवन का साक्षात्कार किया है। गजल को आशिक और माशूका, साकी और प्यालों के तंग दायरे से निकाल कर उसे खास हिंदी रूप-रंग देने की जो परंपरा चली उसमें वह अधिक से अधिक जीवन के विशेषतः सामाजिक जीवन के निकट आती गई और दुष्यंत कुमार के बाद से तो उसका किसान चेहरा, राजनीतिक चेहरा, क्रांतिकारी चेहरा और निखरता गया है और उसे निखारने वाले युवा गजलकारों में वशिष्ठ अनूप का खास योगदान है। उनकी गजलों में सत्ता की राजनीति के ‘शातिर शिकारियों’ की पहचान है तो उनके खिलाफ असंतोष, विरोध, आंदोलन और क्रांति का आह्वान भी है। कहीं धार्मिक, सामाजिक पाखंडों के विखंडन का कबीराना अंदाज है तो कहीं पर्यावरण की गहरी चिंता है-

”लाख हाथों जगत को जकड़े है
जग को मिथ्या बता रहा है वो
ये न समझो कि काटता जंगल
सबकी सांसे चुरा रहा है वो”

वशिष्ठ अनूप ने चिखलदरा अमरावती के नैसर्गिक सौन्दर्य पर लिखा है जो प्रेयसी के मानवीय सौन्दर्य पर भी। ऐकांतिक प्रेम की पुलक के साथ-साथ व्यापक मानव संबंधों की मिठास के चित्र भी उनकी गजलों में हैं। उनकी गजलों की एक बड़ी विशेषता है भाषा और भाव की सादगी – ‘‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था, मां ने हंसकर दुलारा तो अच्छा लगा।” उनकी गजलों के बारे में उन्हीं के शेर पेश करता हूं –

”एक मां की पुलक, एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल
कैसे जीवन से कविता जुड़ेगी पुनः
प्रश्न का सीधा-सा हल है गजल”

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही प्रोफेसर डॉ बलराज पाण्डेय ने पुस्तकांरभ में 6 पृष्ठीय समालोचनात्मक टिप्पणी रचनाकार की सर्जना के विषय में इस तरह की है-

”अपनी रचनात्मक क्षमता के बल पर वशिष्ठ अनूप ने हिन्दी गजल के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी से छिपाने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनके पास सचेत वर्ग-दृष्टि है। यही वजह है कि उनकी गजलों में विषय की विविधता मिलती है। हम सभी जानते हैं कि दुष्यंत कुमार ने हिन्दी गजल को नयी भाषा दी, नया तेवर दिया, उसे नया आयाम दिया। दुष्यंत कुमार की उस पंरपरा को जिन लोगों ने विकसित किया, उनमें वशिष्ठ अनूप का नाम अग्रणी है। वे अपनी जमीन से जुडे़ हुए रचनाकार हैं। आज जबकि साहित्य भी बाजार की चमक-दमक के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहा है, वशिष्ठ अनूप उस चमक-दमक की वास्तविकता को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि साहित्य की दुनिया में प्रसिद्धि पाने के लिए किस प्रकार के संबंध काम करते हैं, लेकिन उन्होंने इन सभी चीजों से अपने को बचाया है और देश के आम जन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज के प्रभु वर्ग के विरुद्ध मोर्चा खोलते ही हैं, उन साहित्य समीक्षकों की भी खबर लेते हैं, जो गीत और गजल को साहित्य की मुख्यधारा से अलग करके देखते हैं। वे उन लोगों की भी खबर लेते हैं जो गजल विधा में संवेदनात्मक गहराई की संभावना नहीं देखते। गजल क्या होती है, इसे समझाते हुए वे लिखते हैं-

”हैं जडें इसकी कीचड़ के अंदर मगर
रूप-रस-गंध पूरित कमल है गजल
एक मां की पुलक एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल”

इससे स्पष्ट होता है कि वशिष्ठ अनूप की गजलों का आधार किसान की वह संस्कृति है जो कई प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना करती हुई मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित है। यदि हम कलात्मकता की दृष्टि से भी देखें तो विषय को स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ अनूप बिम्ब भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। गजल की पहचान के लिए ‘खेत में लहलहाती फसल’ का बिम्ब अपने आप में कितना अनूठा है’ यह बताने की जरूरत नहीं। अपनी गजल विधा के प्रति वशिष्ठ अनूप इतने समर्पित हैं कि उन्हें यह कतई मंजूर नहीं कि इसे साहित्य की मुख्य-धारा से काट कर देखा जाये। वे गजल के इतिहास को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि इसे ‘राजमहलों में पाला गया, और ‘तबलों की थापों’ पर महफिलों में ठुमके लगाने के लिए, कभी विवश किया गया था, लेकिन गजल की आज वह स्थिति नहीं है। वह अब ‘झोंपड़ी की दुलारी’ है तथा उसमें इतनी ताकत आ गई है कि किसानों-मजदूरों के हक के लिए हमलावर की भूमिका में भी अपने आप को प्रस्तुत कर सकती है। वशिष्ठ अनूप साहस के साथ यह घोषित करते हैं कि आज गजल विधा इतनी समृद्ध हो गई है कि उसमें हम आसानी से कबीर और निराला का दुःख देख सकते हैं, घनानंद के ‘प्रेम की पीर’ देख सकते हैं, साथ ही मीरा और रसखान का प्यार भी देख सकते हैं। इस प्रकार हम निःसंकोच यह कह सकते हैं कि वशिष्ठ अनूप ने गजल विधा को संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर उसे इतना विस्तृत क्षेत्र दिया है, जिसमें वह खुलकर सांस ले सके, खिलखिला सके। वशिष्ठ अनूप उन गजल लिखने वालों को भी एक प्रकार की सीख देते हैं, जो गजल को सिर्फ मनोरंजन करने वाली विधा मानते हैं।
वशिष्ठ अनूप की गजलों में एक और बात हमारा ध्यान खींचती है, वह है युगबोध। हम जानते हैं कि कोई भी रचनाकार तब तक कुछ सार्थक नहीं रच सकता, जब तक कि उसे अपने समय की पहचान न हो। आज जबकि हमारे समाज में सिर्फ पैसे का रिश्ता बचा हुआ है, लोग अपनों से भी नाता तोड़ते जा रहे हैं, हमें अपना घर अच्छा नहीं लगता, वशिष्ठ अनूप ऐसे में भारतीय पर्व त्यौहारों को सांकेतिक रूप से याद करते हैं-

पकवानों की खुशबू में रंगों की मस्ती में
दुश्मन को भी गले लगाना अच्छा लगता है
फास्ट फूड और चमक-दमक वाले इस युग में भी
अम्मा के हाथों का खाना अच्छा लगता है

स्पष्ट है कि वशिष्ठ अनूप को बाजार की चमक-दमक में विश्वास नहीं। ऐसा वही रचनाकार कह सकता है जो बाजार की असलियत जानता हो। हम देखते हैं कि वस्तुओं की गुणवत्ता कम, विज्ञापन ज्यादा हमें प्रभावित कर रहे हैं। वशिष्ठ अनूप बाजार की असलियत इसलिए जान सके हैं क्यों कि उनके पास एक विचारधारा है। उस विचारधारा के आधार पर वस्तुओं का विश्लेषण करने की उनमें क्षमता है और जो रचनाकार ऐसा करने में समर्थ है, उन्हें बाजार की चमक-दमक धोखा नहीं दे सकती। आज सचमुच हमारे मानवीय संबंधों में जो रिक्तता आ गई है, उसमें मां के हाथों का खाना याद करना कितनी बड़ी बात है। ऐसी पंक्तियों को पढ़ते हुए किसे अपनी मां की याद नहीं आयेगी, किसकी आंखें नहीं भर आएंगीं । बहुत सहजता के साथ संवेदना की गहराई में उतरना वशिष्ठ अनूप की अपनी विशेषता है। आपको लगेगा कि बात कितनी छोटी है, वह कितनी हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी है, लेकिन उसी को वशिष्ठ अनूप जब रचना में ढाल देते हैं तो छोटी बात बड़ी बन जाती है और कुछ देर के लिए हम उसकी अर्थवत्ता पर विचार करने के लिए विवश हो जाते हैं।
वशिष्ठ अनूप अपने समय के यथार्थ को पहचानने की भी क्षमता रखते हैं। आज की सत्ता व्यवस्था बहुसंख्यक जनता की मूल समस्याओं से हमारा ध्यान अलग करना चाहती है। वह ऐसे-ऐसे मुद्दों को उछाल देती है कि हम अपनी मूल समस्याएं भूल जाते हैं। सत्ता-व्यवस्था की इस साजिश को वशिष्ठ अनूप खूब पहचानते हैं। इसलिए उनकी गजलों में गरीबों की आवाज मुखर हो पायी है। इसके लिए वे चौराहों से, नुक्कड़ो से बिम्ब लाते हैं-

”भूख मदारी-सी डुगडुगी बजाती जब
नंगा होकर पेट दिखाना पड़ता है
शांति हमें भी अच्छी लगती है लेकिन
हक की खातिर शोर मचाना पड़ता है।”

जहां समस्याओं का चित्रण प्रमुख हो, वहां गजल की संरचना भले ही कमजोर पड़ जाये, वशिष्ठ अनूप इसकी परवाह नहीं करते, क्यों कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने देश की जनता, शोषित-पीड़ित जनता का यथार्थ चित्रण करना होता है। ऐसा नहीं है कि आम जनता का दुःख-दर्द उनके लिए अनचीन्हा, अनपहचाना हो। उसे वे दर्शक के रूप में देर से देखने के पक्षधर नहीं है। उसके वे स्वयं भोक्ता भी हैं। दुःख ही जैसे रचनाकार का दोस्त है। यहाँ प्रेमचंद की ये पंक्तियां याद आती हैं कि ‘दुःख ही कवि के लिए सुख है। प्रेमचंद का मानना है कि कोई भी रचनाकार जिस दिन सुख-वैभव से रिश्ता जोड़ लेगा, उस दिन वह जनता का रचनाकार नहीं रह जायेगा। वशिष्ठ अनूप भी अपनी गजलों में दुःख से रिश्ता जोड़ते हैं। वे कहते हैं-

”कदम-कदम पे दुखों का हुजूम मिलता यूं
युगों के बाद कोई दोस्त ज्यों हहा के मिले”

यहां दुःखों का ऐसा हुजूम है जो कदम-कदम पर मिलता है। हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अधिकतर लोगों के लिए दुःख ही ओढ़ना और बिछौना है। वास्तव में वशिष्ठ अनूप उन्हीं लोगों के दुःख की बात अपनी गजलों में करते हैं। दूसरों का दुःख भी कवि को जब तक अपना दुःख नहीं लगेगा, तब तक उसकी रचना सार्थक नहीं हो सकती।
साम्प्रदायिकता और जातिवाद ने हमारे देश को खोखला बनाया है। इधर क्षेत्रवाद ने भी आक्रामक रुख अख्तियार किया है। आश्चर्य तो यह है कि जो लोग ऐसी राजनीति करने वाली ताकतों को बढ़ावा देते हैं, वही राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के नारे भी उछालते हैं। वशिष्ठ अनूप अपनी गजलों के माध्यम से ऐसी ताकतों के प्रति हमें सावधान करते हैं। इसके लिए वे अपने समाज को भी जिम्मेदार मानते हैं। यह सही है कि यदि देश को तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ जनता उठ खड़ी हो जाये तो ऐसी ताकतें दुबारा सर न उठा सकें। देश और समाज की वर्तमान दुरवस्था के लिए हमारी भी जिम्मेदारी बनती है। वशिष्ठ अनूप का मानना है कि यदि दुनिया से जुल्म को मिटाना है तो सबसे पहले हमें अपने अंदर के डर को मिटाना पड़ेगा। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम दूसरों के भरोसे रहने के आदी हो गये हैं। अपनी समस्याओं को या तो हम नियति मान लेते हैं या इन्तजार करते रहते हैं कि कोई आएगा और हमें मुक्ति दिलाएगा। हम उन ताकतों को नहीं पहचान पाते जो जो हमें बांट रही हैं- कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। सत्ता का यह खेल कोई नया नहीं है, उसकी चाल जरूर नयी-नयी लगती हैं वशिष्ठ अनूप का मानना है कि हम पहले ही अगर नहीं चेत पाये तो भविष्य में किन भयावह परिस्थितियों से सामना करना पड़ेगा, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। वे लिखते हैं-
”पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम
प्यार में डूबी हुई निश्छल हंसी खतरे में है
लोग अब करने लगे हैं अंधेरे को यूं नमन
चांदनी सहमी हुई है रोशनी खतरे में है”

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें बरबस ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘अंधेरा धूप को धमका रहा है और हम चुप हैं’
हमारे परिवार और समाज को पूंजीवादी व्यवस्था ने बहुत प्रभावित किया है। हमारे पारिवारिक रिश्तों में बहुत बड़ी दरार आयी है। माता-पिता, भाई-बहन के रिश्तों को भी हम नफा-नुकसान की दृष्टि से देखने लगे हैं। सबसे खराब स्थिति तो बूढे़ मां-बाप की है। जगह-जगह वृद्धाश्रम तो खोले ही जा रहे हैं, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बूढ़ों की देखभाल के लिए सरकार को कानून बनाना पढ़ रहा है। वशिष्ठ अनूप ने इस विकराल होती समस्या पर भी हमारा ध्यान खींचा है। वे लिखते हैं-

”दुःखी मां-बाप को करके इबादत हो नहीं सकती
खुदा की ऐसे लोगों पर इनायत हो नहीं सकती
बुजुर्गों को पटक देना अनाथालय में ले जाकर
किसी की हो मगर अपनी रवायत हो नहीं सकती”

आज उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बाजारवाद का बोलबाला है। यह पूंजीवाद का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। कहीं-कहीं इसके विरुद्ध आवाजें भी उठी हैं, लेकिन उन्हें दबा दिया गया है। वशिष्ठ अनूप उदारीकरण के खतरों से वाकिफ हैं। …….ऐसी शक्तियों पर वे सीधे प्रहार करते हैं –

”लुटेरों की दुनियां के सरदार हैं वो
हमारी हंसी के खरीदार हैं वो
अमने के पुजारी उन्हें मत समझना
चले बेचने अपने हथियार हैं वो”

वशिष्ठ अनूप बाजारवाद के खतरों को पहचानते हैं। बाजार, जिसकी कोई नैतिकता नहीं होती, जहां आदमी की नहीं, वस्तुओं की महत्ता दिखाई पड़ती है, जहां खरीदने वाले और बेचने वाले की ही सत्ता दिखाई पड़ती है, वहां कविता, गीत और गजल को कौन पूछेगा, दूसरी कलाओं का क्या होगा, विचारहीन बनाने वाली इस व्यवस्था ने हमारे घर को ही बाजार बना दिया है। वशिष्ठ अनूप की बाजार पर यह टिप्पणी बहुत मारक है। वे इस व्यवस्था का विरोध करने वाली शक्तियों के पक्ष में खड़े होने वाले रचनाकार हैं। उनकी गजलों में उनका पक्ष स्पष्ट है। उन्होंने अपनी गजलों में जो सवाल उठाये हैं, उनका जवाब व्यवस्था के पास नहीं हैं। वे कहते हैं-

”क्यों उठ रहीं हैं लपटें, क्यों हुआ है लाल जंगल
देना पड़ेगा उत्तर, करता सवाल जंगल”

वशिष्ठ अनूप के ये शब्द उस आदिवासी जनसमूह की ओर संकेत करते हैं, जहां वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिए सशस्त्र संघर्ष जारी है।
ये गजलें अपने समय, समाज और समग्र वैश्विक संरचना से रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘बन्जारे नयन’ और ‘रोशनी खतरे में है’ के बाद ‘रोशनी की कोंपले’ वशिष्ठ अनूप की गजलों का तीसरा संग्रह है तो तमाम निषेधों के बाबजूद प्रकाश की विजय के प्रति आश्वस्त करता है।

—————–समीक्षा के इधर-उधर——————-

सर्जनाकार के बारे में –
डॉ वशिष्‍ठ अनूप, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग मे प्रोफेसर हैं। गोरखपुर जिले के बड़हलगंज अंतर्गत सहड़ौली दुबेपुरा गांव में जन्मे वशिष्ठ अनूप की प्रारंभिक शिक्षा गांव में तथा स्नातक शिक्षा बड़हलगंज में हुई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए और पी-एच.डी. की। वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर से ‘हिन्दी गजल: उपलब्धियां और संभावनायें’ विषय पर डी.लिट्. उपाधि प्राप्त की। आपने कुछ दिनों तक नेशनल पी.जी. कॉलेज बड़हलगंज और गोरखपुर विवि में तथा 1994 से पूर्वान्चल विवि जौनपुर के अंतर्गत राज पी.जी. कालेज के हिन्दी विभाग में अध्यापन किया। राजा श्रीकृष्णदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हुए। बाद में काशी हिन्‍दू वि.वि. में आ गये।

सर्जनाकार से रूबरू होना – डॉ वशिष्‍ठ अनूप को सुनने-समझने और कई जिज्ञासाओं के समाधान का मौका मुझे मिला वाराणसी में ही। इस बारे में ‘सर्जना’ पर ही देखे-‘बारह दिन बनारस में’ शीर्षक से।

वशिष्ठ अनूप जी के प्रकाशन संसार में….
….बन्जारे नयन (2000), रोशनी खतरे में है (2006) गजल-संग्रह शामिल है। समालोचना ग्रंथो में हिन्दी की जनवादी कविता, जगदीश गुप्त का काव्य-संसार, हिन्दी गजल का स्वरूप और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी गजल की प्रवृत्तियां, हिन्दी गीत का विकास और प्रमुख गीतकार, हिन्दी साहित्य का अभिनव इतिहास, हिन्दी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास, ‘अंधेरे में: पुनर्मूल्यांकन’ ‘असाध्यवीणा’ की साधना साहित 22 पुस्तकों का लेखन व संपादन उनके द्वारा किया गया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीत, गजल, कविता, कहानी और समीक्षाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं।
उनका सम्पर्क : डॉ. वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी – 221005, मोबाइल – 09415895812, ईमेल- vdwiwedi@gmail.com

—– संग्रह से दो कोपलें——-

एक –

जो मुजरिम हैं वही सब बनके पहरेदार बैठे हैं
वहां संसद में कितने देश के गद्दार बैठे हैं।
किसी अजगर-से ये हर ओर फेंटा मार बैठे हैं
समूचे देश की छाती पे कुछ परिवार बैठे हैं।
कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं।
हमारे देश के कानून की महिमा निराली है
जो काबिल लोग हैं वे इन दिनों बेकार बैठे हैं।
नदी के घाट से पूजा घरों तक भेड़ियों के दल
ये साधू-संत भी हाथों में ले हथियार बैठे हैं।
बुराई नग्न तांडव कर रही दिन-रात सड़कों पर
जो अच्छे लोग हैं सीने में ले अंगार बैठे हैं।
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।

दो-
सूखने लगतीं जहां पर हर खुशी की कोपलें
फिर वहीं से फूटतीं हैं जिन्दगी की कोपलें।
वक्त ने जिन पर उगा दी बेबसी की कोपलें
चाहते हैं हम उगें उन पर हंसी की कोपलें।
उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें।
सारी नदियां एक सागर में सिमटती जा रहीं
वह उगाता है लबों पर तिश्नगी की कोपलें।
बस तुम्हारी इक झलक से सिन्धु में उठती लहर
फूटने लगती है दिल में चांदनी की कोपलें।
उनके हाथों पर नई तहरीर लिखनी है हमें
जिनके माथे पर लिखीं बेचारगी की कोपलें।
कुछ नये उद्योग पनपे हैं हमारे देश में
अपहरण, हत्या, डकैती, तस्करी की कोपलें।
भूख से मरते हैं बच्चे और संसद में वहां
बैठकर नेता उगाते मस्करी की कोपलें।
नर्म फूलों पर नहीं तलवार की होती परख
फूटती संघर्ष में ही शायरी की कोपलें।

—— और, चलते-चलते —-

‘सर्जना’ पर बीएचयू के हिन्‍दी अध्‍यापकों के मौलिक व्‍याख्‍यान सहिए कई ऐसी जानाकारियां प्रस्‍तत की गई हैं जो ‘सर्जना’ की खास निधि हैं। हिन्‍दी विभाग बीएचयू के यशस्‍वी विद्यार्थियों का सम्‍पर्क-अंतर्जाल लोकप्रिय बेबसाइट ‘फेसबुक पर उपलब्‍ध है।

हिन्‍दी विभाग के विद्यार्थियों से ‘सर्जना’ की अपील है कि हिन्‍दी विभाग की बेबसाइट पर विभागीय जानकारी हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करने के लिए पहल करे। विवि की बेबसाइट पर अध्‍यापकों के नामों की सूची भी अंग्रेजी में दी गई है। …..साथ ही विवि में होने वाली गोष्‍िठयों आदि के समाचार ‘सर्जना’ को ईमेल करें। छा्त्र-सम्‍पादकों के नाम सहित।

”नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”/पुस्तक-समीक्षा/सरस्वती-पुत्र

सरस्वती-पुत्र के बारे में
ये युवा, कवि, कहानीकार और पत्रकारिता में डिग्रीधारी हैं। स्वभाव और रहन-सहन मुक्तिबोध की याद दिलाता है। कई वर्षों से जानता हूँ। इनकी कई रचनायें, कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। थोडे से लापरवाह हैं। मेरे आग्रह पर एक पुस्तक-समीक्षा कई महीनों पहले लिखी थी। ‘सर्जना’ पर जारी कर रहा हूँ।
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कुरुक्षेत्र : युध्द क़ी जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन
रामबरन ‘सरस्वती-पुत्र’

पुस्तक : ‘कुरुक्षेत्र’
कवि : रामधारी सिंह ‘दिनकर’
प्रकाशक : राजपाल एण्ड संस्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली

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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का प्रबंध-काव्य ‘कुरुक्षेत्र’ एक विचार-प्रधान काव्य है। विचारों की सघनता में काव्य की पौराणिक या मिथकीय ऐतिहासिकता के महत्व का परीक्षण करने की आवश्यकता मंद हो जाती है। समूचे प्रबंध की एकता उसके विचारों को लेकर है। जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।
दिनकर जी के ‘कुरुक्षेत्र’ का सृजन उस समय हुआ जब द्वितीय विश्व-युध्द का काल था। दुनियाँ के सामने युध्द क़े भीषण परिणाम उपस्थित थे। इस महायुध्द के अमानवीय कृत्यों ने मानव-समाज को एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। ‘हिरोशिमा’ और ‘नागासाकी’ की आग अभी शांत नहीं हुई थी। संसार की महाशक्तियों में आणविक अस्त्र-शस्त्रों की होड़ बढ़ने लगी। ऐसे समय में युध्द के घातक परिणामों को बताने के लिए दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ का उदय हुआ। महाभारत में कौरवों का विनाश हुआ, किन्तु युध्दिष्ठिर को शांति नहीं मिली। पराजित मारे गये और विजेता जीतकर भी हार गया। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद भी ऐसा ही हुआ। जो हारे, वे राष्ट्र सामाजिक व आर्थिक रूप से कई सदी पीछे पहँच गये। जो विजेता थे वे भी संतुष्ट नहीं थे। इस तरह युध्द की जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन ‘कुरुक्षेत्र’ में मिलता है।
विश्व की महाशक्तिओं रूपी युध्दिष्ठिर को ऐसे भीष्म की आवश्यकता थी नव-विश्व के निर्माण में उसका मार्गदर्शन करे। उन्हें भीष्म मिला या न मिला कुछ नहीं कह सकते, किंतु महाभारत युध्द के बाद ‘कुरुक्षेत्र’ प्रबंध काव्य के युध्दिष्ठिर को भीष्म अवश्य मिला और उसका मार्गदर्शन किया। भीष्म का वह चिंतन समाज के लिए आज भी श्रव्य और अनुकरणीय है।
समूचे प्रबंध में दो पात्र हैं – गंगापुत्र भीष्म और धर्मराज युध्दिष्ठिर। महाभारत की विजय युध्दिष्ठिर को संतोष नहीं दे सकी। उसके मन में कई शंकाएँ बस गईं। भीष्म अपने उपदेश के माध्यम से युध्दिष्ठिर को सांत्वना देते हैं। तब युधिष्ठिर राज-सिंहासन को स्वीकार करने को तैयार होते हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ की मूल कथा की संरचना यही है। किन्तु इसकी समकालीन वैचारिकता के अनेक आयाम हैं।
सम्पूर्ण ‘कुरुक्षेत्र’ भीष्म के चिंतन से भरा पड़ा है। यह चिंतन आदि से अंत तक अनवरत चलता रहता रहा है। युध्द-शांति, राजा-प्रजा और भाग्य-कर्म जैसे द्वंद्वात्मक विषयों को यह अपने में समेटे है। दिनकर का उद्देश्य यही था कि वे अपने विचारों को मानव-समाज तक पहुचा सकें। महाभारत की घटना से जोड़कर तो मात्र काव्य का कलेवर गढ़ा गया है।
कवि के विचार ‘कुरुक्षेत्र’ में युध्द-विरोधी रहे हैं। युध्द के दुष्परिणामों से सम्पूर्ण काव्य भरा पड़ा है। उन्होंने युध्द क़ो निन्दित और क्रूर कर्म माना है। किन्तु, सभी विकल्पो के असफल होने पर युध्द को नकारा नहीं जा सकता। जब अंतिम विकल्प के रूप में युध्द होता है तब शांति होती है। युध्द से सम्बन्धित ऐसे ही विचार भीष्म ने धर्मराज को बताये-
”युध्द को तुम निन्द्य कहते हो, मगर/जब तलक है उठ रही चिनगारियाँ
भिन्न स्वार्थों से कुलिश-संघर्ष की/युध्द तब तक विश्व में अनिवार्य है”
युध्द का असली कारण समाज में ‘असमानता’ है। वह चाहे किसी भी रूप की हो। जब तक समाज में ‘समानता’ की स्थापना नहीं हो सकती, तब तक किसी न किसी रूप में युध्द चलता ही रहेगा।
”शांति नहीं तब तक, जब तक /सुख-भाग न नर का सम हो
नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”
सहज रूप में कोई किसी से लड़ना नहीं चाहता है। व्यक्ति शांति और प्रेम से अपना जीवन जीना चाहता है। ऐसी प्रकृति शांतिप्रिय लोगों में होती है। दुराचारी व्यक्ति सहज शिष्ट-मानव की इस स्वाभाविकता की अवहेलना करता है और युध्द की अनिवार्यता की परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।
”किसी दिन तब महाविस्फोट कोई फूटता है
मनुज ले जान हाथों में दनुज पर टूटता है।”
दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ में ‘सप्तम सर्ग’ का अपना विशिष्ट महत्व है। यह सर्ग प्रबंध का उपसंहार तो है ही, भारत की वर्तमान पीढ़ी को कई संदेश भी देता है। सन्मार्ग पर चलने का ही नाम जीवन है। संसार से पलायन कर जंगल जाने की प्रवृत्ति उचित नहीं है। यह तो जीवन से मुँह मोड़ लेना है। एक तरह की कायरता है, जीवन से निरंतर संघर्ष करते हैं, वे ही लोग समाज के लिए आदर्श हैं। पलायनवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए भीष्म कहते हैं-
”धर्मराज, क्या यती भागता
कभी गेह या वन से?
सदा भागता फिरता है वह
एकमात्र जीवन से”
हिंसा, विनाश, युध्द, असमानता ये सभी व्यक्ति के ‘कर्म-पथ’ से भटकने के परिणाम में घटित होते हैं। मात्र व्यक्तिगत सुखों को भोगने के कारण ही असमानता की जहरीली धारा फूटती है। सभी मनुष्य अपने कर्म में लीन रहें तो समाज से अराजकता को समाप्त किया जा सकता है। कवि ने स्वीकार किया है कि राजा-प्रजा कुछ नहीं होता, ये दोनों ही मनुष्य के रूप हैं। अत: सभी को अपने मानवोचित कर्म के माध्यम से इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में अपना योगदान देना होगा। तभी युध्द, अशांति और संघर्ष से बचा जा सकता है।
‘भाग्यवाद’ और ‘कर्मवाद’ का कवि ने अपने विभिन्न तर्कों से खंडन किया है। ‘कुरुक्षेत्र’ में भाग्य पर कर्म की विजय है। भाग्यवाद केवल प्रंपच और प्रताड़न है। वह पाप का आवरण है। जिससे एक व्यक्ति दूसरे के हिस्से को अतिक्रमित रखना चाहता है। भाग्यवाद का सहारा लेकर दुराचारी व्यक्ति श्रमिक के भाग को स्वयं हड़प जाते हैं। अपने कठोर परिश्रम से व्यक्ति असंभव को संभव कर सकता है। कर्म-पथ पर चलकर भाग्य को बदला जा सकता है। कवि के शब्दों में-
”ब्रद्दमा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है
ब्रद्दमा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी
धोते वीर कु-अंकु भाल का बहा भ्रुवों से पानी”
अपने कर्मानुसार जीवन जीकर ही संसार की विषमता को समाप्त किया जा सकता है। तभी समानता के आधार पर प्रकृति का कण-कण जन-जन का हो सकता है। तभी मानव के अधिकार सुरक्षित हो सकते हैं। अभावों को दूर किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में ही राजा-प्रजा का भेद मिट सकता है। न कोई पूँजीपति होगा न कोई मजदूर। संसार का एक नया रूप होगा। इस तरह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में एक सुखमय और शांतियुक्त समाज की परिकल्पना है।

रामबरन ‘सरस्वती-पुत्र’
पता : लिटिल ऐंजिल कान्वेन्ट स्कूल
गांधी कॉलोनी, मुरैना- 476001
मध्यप्रदेश

”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ”/दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति

इस अग्रलेख के बारे में :
तब मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का विद्यार्थी था। पहली बार दुष्यंत कुमार का नाम पता चला जब ग्वालियर में श्रीमती अंजना मिश्र ने ‘दुष्यंत जयंती’ मनाई। मैं और मेरे साथी दुष्यंत को शकुंतला वाला दुष्यंत समझे थे। फिर ‘साये में धूप’ हाथ आयी और एक सिलसिला चल पड़ा। कई गजलों को लयबध्द करके गाया भी। जुमले की तरह दुष्यंत की पंक्तियों का जमकर इस्तेमाल भी किया। एक-दो वर्ष बाद पत्रकारिता करते हुए दुष्यंत पर यह अग्रलेख डॉ. राम विद्रोही जी के सम्पादन में प्रकाशित दैनिक आचरण में प्रकाशित हुआ। बिना कोई परिवर्तन किये आज ज्यों का त्यों रिलीज कर रहा हूँ………………….

दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति
रामकुमार सिंह/ 1 सितम्बर, सन 2000/दैनिक आचरण (ग्वालियर/सागर)/सन्दर्भ : ‘साये में धूप : दुष्यंत कुमार त्यागी/राधाकृष्ण प्रकाशन – सन् 1975

गज़ल की नवीन परम्परा के सूत्रधार और साहित्य के अभिनव आयाम के प्रणेता दुष्यंत को साहित्य-जगत ने मूर्धन्य स्थान दिया, किन्तु उन्हें केवल साहित्य-मनीषी के रूप में निरूपित करना पक्षपात होगा। वस्तुत: वे सामाजिक-राजनीतिक दार्शनिक हैं, साहित्य-सृजनकार बाद में। उनका काव्य मंचीय मनोरंजन अथवा बुध्दि-विलास नहीं, बल्कि उसमें जनाकांक्षाओं की पीड़ा अपने उदात्त रूप में अभिव्यक्त होती है। उनसे अभिनव विचारधारा का स्रोत प्रस्फुटित हुआ है, जिसे दुष्यंतवादी परम्परा कहना होगा।
परतंत्रता की जकड़न से उन्मुक्ति की छटपटाहट के दौरान काव्य, दर्शन, चिंतन और विचार-प्रवाह, सभी पक्ष क्रांति, उद्धोष के वाहक थे। प्रत्येक कोने से मुक्ति की अभिलाषा अपने तीव्रतम आवेग में ज्वार की तरह उमड़ती थी। अपूर्व त्याग के पश्चात जो स्वतंत्र उड़ान भरने की क्षमता राष्ट्र को प्राप्त हुई उस शक्ति का नकारात्मक पक्ष भी सामने आते देर न लगी। इतने कम समय में वे जनाकांक्षायें, आशायें, और चातक-पिपासा धूमिल हो जाएंगी, ऐसा ज्ञात न था। गणतंत्र की ऐसी विडम्बना का स्मरण न था जहाँ आकर सारा विश्वास, दिलासा मृगमरीचिका सिध्द हो गया। इस पीड़ा की अभिव्यक्ति दुष्यंत कुमार के शब्दों में-

”कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए”

जिस दृष्टिकोंण से राष्ट्र ने जनतांत्रिक परम्परा को आत्मसात किया उसके अविलम्ब अवसान ने स्वनिल आश्रय से मोहभंग कर दिया। देखिये-
”ये सोचकर कि दरख्तों में छाँव होती है
यहाँ बबूल के साये में आके बैठ गये”

राष्ट्रोदय के लिए अपने सर्वस्व का मूल्य चुकाकर और निजत्व को विलीन कर जिन आदर्शों को जन्म दिया गया, क्रांतिवीरों को यह आभास न रहा होगा कि निकट भविष्य में वे ही सूत्र स्वार्थ का मंच निर्मित करने में प्रयोग किये जायेंगे-
”धीरे-धीरे भीग रहीं हैं सारी ईंटें पानी में
इनको क्या मालूम कि आगे चलकर इनका क्या होगा”

यथार्थ का जो परिदृश्य उपस्थित हुआ उसकी तीक्ष्ण अभिव्यक्ति देखिये-
”कल नुमाइश में मिला वो चीथडे पहने हुए
मैने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है”

और-
”रोज अखबारों में पढ़कर ये खयाल आया हमें
इस तरफ आती तो हम भी देखते फस्ले बहार”

बहार’ कहाँ अपनी छटा बिखेर रही है, ये बात छुपी नहीं है। जिन मौलिक समस्याओं से निजात पाने की अभिलाषा लिये आंखें बुढ़ा गईं उनका उन्मूलन करने के नाम पर ‘महानिधि पाकर बौराए हुए लम्पटों’ का प्रयास तो देखिये ! वातानुकूलित विचारग्रहों में चाय की चुस्कियों के साथ मूलभूत समस्याओं पर मंत्रणा करने वाले कथित नेतृत्वधारियों पर जब दुष्यंत प्रहार करते हैं तो आश्चर्य है कि उनके शब्द क्यों भीतर तक कचोट नहीं जाते ?-
”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा”

दुष्यंत का पीड़ामय व्यंग्य घिनौनी राजनीति को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। वे एक जनसामान्य से कहते हैं कि-
”मस्लहम आमेज होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है”

चरम शक्ति के रूप में उत्तारदायी होने के कारण, दुष्यंत, जन-जन को झकझोरते हैं जिनके स्वार्थपूर्ण एवं संकुचित दृष्टिकोंण व व्यवहार से समग्र राष्ट्र को अवनति में ढकेलने वालों का साहस हिलोरें ले रहा है।-
”इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ”

और-
”इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है”

साथ ही कुछ लोगों के स्वार्थ के लिए अनेक लोगों का चाटुकारिता-उन्माद भी दुष्यंत को असह्य है-
”रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनियाँ
इस बहकती हुई दुनियां को संभालो यारो”

सारे परिदृश्य को देखकर भी जब सत्य का प्राकटय नहीं होता, दर्शन अंधा और चिंतन मूक हो जाता है तो चारणी प्रवृत्ति के विरोध में दुष्यंत आम आदमी से लेकर कवि, दार्शनिक और सम्पूर्ण बुध्दिजीवी वर्ग को कड़े शब्दों में लताड़ते हैं-
”सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं”

”गजब है सच को सच कहते नहीं वो
कुरानो-उपनिषद खोले हुए हैं”

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते हैं
चलो यहां से चलें, हाथ न जल जाएं कहीं”

इस बीच दुष्यंत अपने उत्तारदायित्व को गहनता से अनुभव करते हैं। कोई सम्मोहन उन्हें ‘सत्ता का भोंपू’ नहीं बना पाता –
”मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं।”

यहां आकर दुष्यंत के नजरिये का मूल उद्देश्य पता चलता है। यहीं इस प्रश्न का उत्तार मिलता है कि क्या बात हुई कि दुष्यंत ने शायरी की? यही वो बात है जहां वे मंचीय ग्लैमर या भौतिक वैभव को लूटन के लिए सोचा-समझा माध्यम अपनाने की बजाय ऐसी अभिव्यक्ति चुनते हैं जो उन्हें चारणों की श्रेणी से सर्वथा अलग कर जन-जन के पीड़ामय आक्रोश का दार्शनिक बना देती है। देखिये-
‘मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूँ
हर गज़ल अब सल्तनत के नाम इक बयान है”

इस उत्तरदायित्व को बखूबी निभाते हुए वे एक ओर यथार्थ का चित्रण करते हैं तो दूसरी ओर निवारण का सुझाव भी देते हैं। और उनका एक मत ही काफी है इस बात के लिए कि शासकों और शासितों में विभाजित ‘झूठी जम्हूरियत’ भर्रा उठे-
”अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं”

और देखिये-
”एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है”

तथा-
”कैसे आकाश में सूराख हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”

इसी क्रम में एक अभिनव क्रांतिकारी आशावाद देखिये-
”गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में
सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिये”

आमूलचूल परिवर्तन की बात कर वे विवादास्पद शख्सियत बनने का लक्ष्य नहीं रखते, बल्कि-
”सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये”

सामाजिक पीड़ा के इस दार्शनिक की एक भी पंक्ति यदि हमें झकझोर न सके तो फिर न तो निजात पाने की अभिलाषा रखें न दर्द का अलाप करें। दुष्यंत कहते हैं-
”आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों मे चीख हरगिज कारगर होगी नहीं”

– डॉ. रामकुमार सिंह

‘किसी को तो शिव बनना होगा’

‘किसी को तो शिव बनना होगा : एक चिंतनशील मन की भावुक ‘अपील’
– शेषकुमारी सिंह-

पुस्तक : ‘किसी को तो शिव बनना होगा (कविता-संग्रह)
कवयित्री : डॉ बिनय राजराम
प्रकाशक : अरविन्द प्रकाशन, आगरा

रचनाकार भौतिकवाद की प्रतिस्पर्धा में अकादमिक वातावरण में मूल्यों के लिये चिंतित हैं। शिष्यत्व और गुरुता की पुन:प्रतिष्ठा का प्रश्न है-
”राज-मोह-ग्रस्त द्रोणाचार्य नहीं
सांदीपनी या सुकरात बनना होगा (पृ.-17)
विचारशील की दृष्टि जब प्रकृति, जलचरों व वन्य-जीवों में भी सौहार्द्र देखती है तो मानव के पारस्परिक वैमनस्य पर खेद होता है। ‘मात्स्य-न्याय’ बहुत कुछ समझाता है-
”इन जल-जीवों को देखकर
समझने लगी हूँ अब
नहीं है सौहर्द्र तो
मानसिक ऊर्जा से भरपूर
मानुस में नही है” पृ.-30)

जीवन और परिवेश का यथार्थ विचारशील मन को सिसकाता है। बालक की भांति उजली जीवन-दृष्टि भीतर घुटन महसूस करती है। रचनाकार को लगता है कि चारों ओर एक उमस का मकड़जाल बुन दिया गया है। यहाँ संवेदनाओं की स्थिति ऐसी है जैसे किसी भुतहा खण्डहर महल में कोई बालक मन अनजाने में घुस आया हो। वह भटकता है सिसकता है और बाहर निकलने को तरसते हुए खोजता रास्ता-
”क्या है सच, / कौन बताएगा? / कौन दिखाएगा इस आत्मा को / परम आत्मा का मार्ग” (पृ.37)

जीवन के अनेक द्वंद्वों और प्रश्न-प्रतिप्रश्नों के बीच दार्शनिक तत्व भी पुस्तक की कविताओं में दिखाई देते हैं। सौरमण्डल की व्यवस्था में जीवन का हल खोजते हुए लिखा गया है कि- ”हाँ! है एक उपाय / शाश्वत राह / अपने अक्ष, अपनी धुरी पर / घूमते रहना / बढ़ते चलना / चलते रहना अपनी राह”(पृ.-43)। एक ढंग से कर्मवाद का प्रतिपादन इसमें दिखाई देता है।
धर्म-सम्प्रदाय और आस्था के प्रतीकों के आधार पर समाज को विभाजित करने की मानसिकता से कवियत्री पीड़ा अनुभव करती है। क्या भविष्य को ताक पर रखकर समन्वय का निवाला बनाकर भक्षण कर लिया जायेगा? क्या हम अपने धार्मिक महापुरुषों को बांटेंगे। ‘थम जा री ओ भविष्य-भक्षिणी’ (पृ.-45) कहकर कविता पीड़ा को व्यक्त करती हैं-
”टूटी आस्था ले कर कहाँ जाएगी?
ओ री भविष्य-भक्षिणी राजनीति?”(पृ.-45)
निश्चित रूप से , अलगाववादी राजनीति ने वर्तमान को निशाने पर लिया ही है भविष्य को भी संहेदाहस्पद बना दिया है। कवियत्री एक भावुक ‘अपील’ करती है कि सांस्कृतिक गौरव की रक्षा करने और मानव-समाज को भयानक त्रासदी से बचाने के लिए क्या यह संभव नहीं कि कुछ प्रयास किये जायें और भावी समय को समन्वय की सौगात विरासत में दे जायें।
कविताओं में मानव को सुरक्षित करने की वैश्विक-दृष्टि है। यह पूरी द ुनियाँ के मानव समाज की ही नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्माण्ड के कण-कण को बचाने की मांग करती है। प्रकृति की रचनाधर्मिता को कोई सुनामी न निगल जाये-
”असमय की असमंजस-स्थिति से/ब्रह्माण्ड के कण-कणको / सायास बचाना होगा”(पृ.- 55)
मानवीय संवेदनाओं के साथ स्त्री-चेतना को अभिव्यक्त करने का तरीका भी इन कविताओं में विचारणीय है। पाषाण को प्रतीक बनाकर अहिल्या की पीड़ा और अहिल्या को प्रतीक बनाकर पत्थर की पीड़ा को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है-
”अहिल्या के सुन्दर रूप को / अपने भीतर कैद करने में / कितनी पीड़ा हुई होगी / पाषाण को?”(पृ.-50)
पीड़ा अजन्मा स्त्री से ही शुरू हो जाती है। मां से गुहार करता कन्या-भ्रूण कहता है अपनी मां से कि कुछ भी करो, पृथ्वी से लेकर आकाश तक या परिवार से लेकर ईश्वर तक किसी से भी लड़ो पर कृष्ण बनकर मुझ परीक्षित को बचा लो। जब वह उम्र पाती है तो विकृत मनुष्यों की कुदृष्टि का शिकार होती है। कवियत्री प्रश्न उठाती है कि स्त्री को लेकर विमर्श तो बेमानी है। अभी तक न तो नारी रक्षित है और ना ही आरक्षित। विकृत होते मनुष्य तो गिध्द कहलाने के लायक भी नहीं है। गिध्दराज ने तो सीता की अस्मिता की भरसक रक्षा के प्रयास में अपने प्राण दे दिये थे। लेखिका आह्वान करती है-
”अपनी नन्हीं सीताओं को / अभारतीय, असामाजिक / कुत्सित-कदर्य / ‘विकृत मनुष्य’ की / गिध्द-दृष्टि’ से बचाओ”(82)
छोटी-सी कविता ‘कामधेनु’ स्त्री के साथ हुए छलावे को बखूबी उकेर देती है। आधी आबादी सुबह से शाम तक कामधेनु की भांति केवल देना जानती है। उसका भ्रम टूटता है और वह अपने बंधनों को देखकर समझ जाती है कि कामधेनु का अर्थ बदल गया है-
”काम में पिसती / धेनु सी बँधी वह / धीरे-धीरे समझ गयी कि / कामधेनु का अर्थ बदल गया है”(पृ.-72)
अभियानों और वास्तविकता के भेद सालते हैं। आम आदमी जो ग्राम्य है। ग्रामीण बालक हो स्त्री, और गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करते लोग। इनसे जुड़े मसलों को किस तरह लें। आंकड़ों की सच-झूठ की कारगरता कितनी है। ऐसे कई प्रश्न रचनाशील को झकझोरते हैं-
”जागृति, साक्षरता अधिकार की कथा / आकाश चूमते / पंखों के सपने / या फिर / भरपेट भोजन की बात? / उसकी मासूम मासूम आखों के जलते हुए ठंडे सवाल”
भारतीयता और हिन्दू शब्दों के मायने कवियत्री के लिये व्यापक हैं। समग्र राष्ट्र और समाज की एकता से वे जुड़े हैं। जनजीवन को भावात्म और एकात्म दृष्टि देने के लिए जरूरी है कि कोई तो शिव बनकर प्रतिबध्द हो। स्वतंत्रता की लड़ाई की तरह ही भारतीय अस्मिता और एकता के लिए समर्पण की जरूरत आ पड़ी है। फिर से साख संचित करनी है-
”कैसे बचेगा यह ? / कौन बचाएगा कन्या कुमारी से गंगटोक तक / कच्छ से अरुणान्चल तक फेले / इस आर्यर्वत्त को?”(पृ.-99)
– शेषकुमारी सिंह-

‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है।
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पुस्तक-समीक्षा
‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’
पुस्तक : ‘रामदरश मिश्र : सृजन संवाद’
लेखिका : डॉ. सविता मिश्र
प्रकाशक : विमला बुक्स, दिल्ली
मूल्य : तीन सौ रुपये (सजिल्द)
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अध्येता जब एकात्म होकर अपने अभीष्ट संदर्भ का अनुशीलन करता है तो अभिप्राप्त नतीजे रेखांकनीय हो जाते हैं। अध्येता जब स्वयं सर्जनात्मक प्रतिभा रखता हो तो ‘एकात्म होना’ अधिक घनीभूत होता है, साथ ही प्रतिप्रश्नों की द्वंद्वात्मकता के स्थान पर एक ललित-संवाद स्थापित होता है। ‘रामदरश मिश्र : सृजन-संवाद’ पुस्तक में मूल रूप से यही भावभूमि स्थापित होकर आयी है।
डॉ. सविता मिश्र ने रामदरश जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और रचना-संसार से परिचित होते हुए – उसे खंगालते हुए – फिर आत्मसात करते हुए …….और अंतत: विश्लेषित करते हुए जिस सर्जनात्मकता व लालित्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण का परिचय दिया है वह नव-अनुसंधित्सुआें को अपने-अपने ‘समीक्ष्य’ संदर्भों के प्रति एकाकार-भाव से अनुशीलन किये जाने की अभिनव-प्रणाली का बोध कराता है।
हिन्दी साहित्य में रामदरश मिश्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सर्जनाकार, चिंतक व मनीषी होने के साथ ही विभिन्न विधाओं में वे अपनी मौजूदगी भी रखते हैं। लोक-नैकटय को उन्होने विस्मृत नहीं होने दिया है। प्रत्येक सुपरिचित के प्रति नव-दृष्टि अपनी स्वयं की कुछ विशेषताएँ लेकर सामने आती है। प्रकृति की हर नई कोंपल ऑंखे फाड़ते हुए वटवृक्षों को देखती है – नवजिज्ञासु के तौर पर भोले प्रश्न भी करती है। हर जिज्ञासा की प्रतिपूर्ति और प्रत्येक प्रश्न का उत्तार अपने अभीष्ट से भावगत साम्यवस्था की ओर एक कदम होता है। सर्जना के वैराटय से जुड़ी विषयवस्तुओं और उनके ‘फिनेमिना’ पर जब एक अनुशीलनकर्ता संवाद करता है तो कुछ नया भी घटित होता है जो पूर्वकृत सर्जना से सम्बन्धित होते हुए भी कुछ नव्यतम बनकर सामने आता है। तब निर्विवाद रूप से यह कहना होता है कि संवादकर्ता के व्यक्तित्व की छाप ‘सृजन-संवाद’ को शब्दबध्द किये जाते समय आ पड़ती है।
पुस्तक में कुल 19 लेख हैं जो सतरंगी आभा लिये हुए हैं। इनमें भेंटवार्ता, यात्रा, संस्मरण, रेखाचित्र, व्यक्तित्वानुभूति, जीवनी आदि के तत्वों के अलावा रामदरश मिश्र जी के सर्जना-संसार पर चिंतन-मनन और विश्लेषण भी पूरी रचनात्मक प्रासंगिकता के साथ उपलब्ध है। अधिकतर लेख ‘अध्येता-समय’ की डायरी की तरह हैं जो अपने अलग-अलग अस्तित्व को समेटते हुए संकलन के रूप में यहाँ हैं। पहले ही लेख ‘वह दिन’ में लेखिका के स्वतंत्र भावास्फुरण की झलक मिल जाती है। रामदरश जी से भेंटवार्ता के प्रसंगोपरांत यह वर्णन देखें -”साढे ग्यारह वर्षीया अपूर्वा और दस वर्षीया गिन्नी के बाल-सुलभ प्रश्नों और कौतूहल के रंगों में डूबी भीगी-भीगी सी दोपहर ऑटो के साथ-साथ भाग रही थी। बादलों को देखकर मिश्र जी की ‘यायावर बादल’ कविता याद आ रही थी”
रामदरश जी के व्यक्तित्व से परिचित कराते ललित लेखों में – ‘साहित्य का विन्ध्याचल’, ‘ एक गँवई व्यक्तित्व’ आदि हैं। एक स्थान पर रामदरश जी के विषय में लिखा गया है कि- ”महानगर की दीवाली की जगमगाहट के बीच उन्हें याद आने लगती है गाँव की दीवाली और उनकी स्मृति में जगमगा उठते हैं मिट्टी के दीये। दीयों का उजास उनकी शिराओं से फूटने लगता है और स्मृति में उभर आते हैं पूजाभाव से तेल ढारते हुए माँ और भाभी के हाथ।” ‘जहाज का पंछी’ जैसे लेखों की विशेषता यह है कि अनेक कथा-पात्रों को रचने वाले रामदरश जी इसमें स्वयं पात्र बनकर पाठकों के सामने हैं। बालक रामदरश को चलचित्र के रूप में देखना सुहाता है- ”मेले में ‘डह-डह-डग-डग, डह-डह-डग-डग-हुडुक्क, झाल ओर मृदंग के ताल पर नाचते नचनिया, छनछनाती हुई कड़ाहियाँ, गाड़ी की सीटी सुनकर रेलगाड़ी देखने की ललक, उस पर चढ़ने की ललक…..। इसी वर्तुल जिंदगी की गंध समेटे मिश्र जी का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है” A इस दौरान लेखिका की सजग विश्लेषणात्मिका-बुध्दि अपने समीक्ष्य की सामाजिक-चेतना के उत्सों को भी खोजती चलती है- ”उन्होनें अपमान, झिड़की और आत्महीनता से पीड़ित लोगों को रोटी के सवाल से जूझते हुए देखा है। इतना ही नही, यातना का अनवरत सिलसिला उस परिवेश में चलता रहता था। मालगुजारी के लिए कुर्क अमीन का दौरा, दरोगा जी का आतंक, कर्ज की वसूली के लिए किए गए तकाजे…न जाने कितने दर्दों का साक्षी रहा है उनका मन।”
‘प्रकृति के उल्लास में डूबा कवि मन’, ‘कविता की बासंती आभा”, ‘खूशबू घर से आती खुशबुएँ’ आदि लेखों के माध्यम से रामदरश मिश्र जी की कविताओं के प्रकृति-प्रेम का वैशिष्टय और भावनात्मक सौंदर्य तो दृष्टिगोचर होता ही है, लेखिका के स्वयं के प्रकृति-सापेक्ष उल्लास, भाषायी-भंगिमाऐं आदि अनायास प्रकट हो जाते हैं। एकात्मकता के कारण भावस्थ दृष्टि स्वयं लेखिका में उतरती हुई जान पड़ती है जो अध्येताओं में परम्पराओं के विस्तार के लिहाज से शुभ संकेत हुआ करते हैं।
‘रामदरश मिश्र की नारी-मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा’ तथा उनके ‘काव्य में जीवन-मूल्य’ आदि विचारप्रधान शोधात्मक लेख हैं, जिनमें लेखिका की विश्लेषणात्मक शैली का पता चलता है। एक स्थान पर लिखा गया है कि- ”मिश्र जी के उपन्यासों का मूल्यांकन करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे हाशिये पर खड़ी स्त्री को केन्द्र में लाये हैं। शोषण-तंत्रों की भली-भाँति पड़ताल करते हुए उन्होंने स्त्री-मुक्ति का मार्ग सही अथर्ाेंं में प्रशस्त किया है।”
उनके काव्य-संग्रहों की प्रकीर्ण समीक्षाओं से रूपाकार लेकर ”ऐसे में जब कभी’ में बहती रोशनी की नदी’, ‘ऊर्जस्वित बसंत……..जो कभी नहीं झरता (संदर्भ : आम के पत्तो)’, ”उस बच्चे की तलाश में’ – समय की आहटों से गूँजता कविता-संग्रह’, ‘तू ही बता ऐ जिन्दगी : जीवन की सघन गूँज में डूबी गज़लें’ आदि लेख हैं।
मिश्र जी की रचनाधर्मिता के उत्तारकाल (आयु के लिहाज से), उनके काव्य की अंतर्वस्तु, विषय-वैविध्य और संरचना पर ‘आज भी समय सत्य रचती है कलम’ व ‘संरचना-सौंदर्य’ शीर्षक से लेख हैं। मिश्र जी की शब्दावली और तकनीक पर पर्याप्त कोंणों से यहाँ प्रकाश डाला गया है। उनके आत्मकथांश पर ‘कच्चे रास्तों का सफर : जीवनानुभवों से अंतरंग साक्षात्कार’, ललित-निबंध-संग्रह पर ‘छोटे-छोटे सुख – उजास भरी यात्रा’, बारहवें उपन्यास ‘परिवार’ पर ‘परिवार : मानवीय जीवन-मूल्यों की उत्कर्ष यात्रा का दस्तावेज’ , डायरी पर ‘आते-जाते दिन : समय, साहित्य और जीवन से अंतरंग साक्षात्कार’ संग्रहित है।
पुस्तक के अंत में पाठकीय सर्जना-प्रतिभा के अनुरूप लेखिका की दस ऐसी कविताओं को जोड़ा गया है जो रामदरश जी के उपन्यासों को पढ़ते हुए रूपाकार ले चुकी थीं। लेखिका द्वारा किया गया यह विधांतरण औपन्यासिक समाज-चेतस का काव्यरूप तो है ही – रोचक भी है-
”कभी-कभी / पूरे का पूरा ‘पाण्डेपुरवा’ / जम जाता था मन के अन्दर /और दूभर हो उठता है / साँस के लिए रास्ता खोज पाना / पर तभी अचानक / तैरने लगते थे कुछ फाग, शिराओं में / चैत की पूनो खिलखिला उठती थी / और ढूँढ लेती थी तब एक साँस / चुपके से अपना रास्ता………” (‘पानी के प्राचीरों’ के साथ-साथ)
एक विशिष्ट व बहुआयामी रचनाकार, कथाकार व मनीषी – जिसका साहित्य मात्रात्मक व गुणात्मक, दोनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है – उस पर कार्य करतें हुए अकादमिक उपाधि प्राप्त करना एक बिंदु है, तथा इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आनंद, उल्लास व उमंग से भरी यात्रा का विषय बना लेना अध्येता की निजी सफलता है। यही निजी सफलता एक स्वतंत्र विधा का आस्वाद कराते हुए पाठकीय साधारणीकरण के साथ विस्तार पाती है।
‘माइन्ड द टारगेट बट एन्जॉय द जर्नी’ – रूपी तराजू के दोनों पलड़ों पर अपनी पकड़ बनाये रखते हुए लेखिका ने जो सृजन संवाद लिपिबध्द किया है उसमें एक ओर भावों व कल्पना की उड़ान है तो दूसरी तरफ उचित परिप्रेक्ष्य, उध्दरण व सन्दर्भों के लिए सर्तकता का वरण। प्रत्येक ललित लेख में रामदरश जी के सम्बन्ध में प्रतिष्ठित विचारकों के कथन, उनके उपन्यासों के पात्र, पात्रों की परिस्थितियाँ, कविताओं की पंक्तियाँ आदि को इस तरह पिरोया गया है कि कहीं जोड़ नहीं दीख पड़ता। क्या ही बात है कि यात्रा करते हुए मौसम के एक तेवर को देखकर अपने समीक्ष्य-कवि की एक पंक्ति याद आ जाये! पाठक को रामदरश जी के कई पहलुओं से अवगत कराने की ‘आयुर्वेदिक’ तरह की पध्दति इस पुस्तक में दृष्टिगत है।

-डॉ. रामकुमार सिंह