हाथ हिलाता है स्कूल का पेड़ /नई पत्ती निकल आई है : Farewell special

बचपन की सुनहरी स्‍मृतियों को साथ लेकर जिस स्‍कूल में जीवन में एक बड़ा हिस्‍सा बीता हो वहॉं से जाते समय जो भावनाएं उमड़तीं हैं उन्‍हें शब्‍दबद्ध करना बहुत मुश्‍किल है। फिर भी ये विदाई गीत कक्षा 12 वीं के विद्यार्थी जो जा रहें हैं उनके लिए लिखा और संगीतबद्ध किया है। 11 वीं विद्यार्थी उनके लिए गा रहे हैं, ……….
विदाई गीत :

जाओगे तुम यहॉं से
सोचोगे हम कहॉं
सुनहरे पल जो आए थे
यहॉ तुमने बिताए थे
याद करोगे वहां।।।।।
नये जीवन की सौगातें
तुम्हें बाहर बुलाती हैं
ये स्कूल की दीवारें
नहीं तुमको भुलाती हैं
जाओ तुम चाहे जहां।।।।
तुम्हारे दोस्त ये सारे
नहीं तुमको सताएंगे
तुम्हें खुद ही वहां जाकर
ये इतने याद आएंगे
भूल न जाना वहां।।।।
go out to serve your country and Countrymen

हिन्दी गजल : पढ़े जाने को

इम्तिहान की घड़ी आई है।
आज वरिष्ठों की विदाई है।
मैं जिसे डांटता था वो लड़की
आखिरी हस्ताक्षर लेने आई है।
गुस्सा होते थे बड़े सर
उनकी भी आंख भर आई है।
जहां बैठता था वो बैंच
खाली-खाली नजर आई है।
बहुत बातूनी थी मेरा दोस्त
उसके दिल में भी रुलाई है।
हाथ हिलाता है स्कूल का पेड़
नई पत्ती निकल आई है।
बहुत छोटी है ये दुनियां
फिर मिलें – ये उम्मीद जताई है।

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हिन्दी में कन्नड़ बोलेंगे, अम्मा से बतियायेंगे : संस्‍कृति-भूमि कर्नाटक से एक गीत

नवगीत : कर्नाटक की संस्कृति को यह नवगीत समर्पित है———

जिसके द्वारो चौक पुरा है, हम उसके घर जायेंगे।
बालों में जो फूल लगाती , उससे मिलकर आयेंगे।
बहुत दिनों तक रोटी खाई , अब हम चावल खायेंगे।
हिन्दी में कन्नड़ बोलेंगे, अम्मा से बतियायेंगे।

सांभर,उपमा, इडली, डोसा थाली में लगवायेंगे।
दीप जला जिसकी देहरी परए आसन वहीं जमायेंगे।
अब तो हम लुंगी पहनेंगेए माथे तिलक लगायेंगे
स्वामी शरणम् अइयप्पा का नारा खूब लगायेंगे।

फिर दिल्ली में बात चली है ………..

यह नवगीत कुछ महीनों पहले लिखा था, जाने कौन-सी लहर में लिख दिया था। अभी तक केवल अभिन्न प्रेरक व मित्र हितेंद्र जी को फोन पर सुनाया था। लगता है आज इसे जारी करने का समय आ गया है.। बाबा नागार्जुन को समर्पित है…….

फिर दिल्ली में बात चली है सारा सिस्टम बदलेगा
संविधान संसोधन होगा औ‘ सरक्यूलर निकलेगा।
फिर दिल्ली में………
कोई अफसर नहीं हिलेगा, बाबूजी भी बैठेंगे
कार्यालय के बाहर प्रहरी नहीं किसी से ऐंठेंगे।
कोई खिड़की बंद न होगी, सारे काम फटाफट हों
डण्डे वाला कोई न होगा, ना लोहे के फाटक हों।
बंद लिफाफे नहीं चलेंगे, ना अब कोई बहकेगा
संविधान संसोधन…………….
फिर दिल्ली में………..
गांव-गांव में सड़क बनेगी, पहुंच मार्ग निर्मित होंगे
फसल हाथ की हाथ बिकेगी, पूरे दाम निहित होंगे
नाली डम्बर-रोड खरंजा सरपंचों का खेल नहीं
ऑडीटर जनता ही होगी शिकवा थाना जेल नहीं।
अब केवल प्रधान का बंगला नहीं गांव में चमकेगा
संविधान संसोधन………..
फिर दिल्ली में…….
सारे मंत्री ‘युवक’ होंगे दौड़भाग करने वाले
मोटे-मोटे घर बैठेंगे पैसे पर मरने वाले।
जिनके चेहरे कुटिल न होंगे जनता पढ़ लेगी जिनको
आसंदी पर वही जमेंगे बत्ती-लाल मिले उनको।
हथियारों से घिरे न होंगे ना बड़ा काफिला निकलेगा
संविधान संसोधन…..
फिर दिल्ली में……
कितना सुंदर सपना है ये कितनी बढ़िया है युक्ति
लिखते-लिखते याद आ गई कवि प्रसाद की ये पंक्ति –
मिला कहां वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया
जल्दी सपना पूरा होगा शीघ्र सितारा चमकेगा
संविधान संसोधन होगा……..
फिर दिल्ली में ……..