बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये/आप-औ’ हम शामियाने हो गये …..हिन्दी गज़ल

इस गज़ल के बारे में :-
मेरी यह गज़ल ‘पाखी’ के मार्च 2009 अंक में प्रकाशित हुई थी। ‘सर्जना’ पर ‘पुनर्प्रकाशन’ के अंतर्गत जारी कर रहा हूँ। यह गज़ल पहली बार प्रकाशित करने के लिए ‘पाखी’ एवं सम्पादक अपूर्व जोशी जी का आभार। गज़ल की राजनीतिक चेतना के बारे में पाठकीय प्रतिक्रियाँ ही उन अर्थों को ध्वनित करेंगी जो शायद गज़ल के शब्दों के अंतराल के बीच हों……………

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सांत्वना के सौ बहाने हो गये।
दरअसल अब वो पुराने हो गये।
बैठते थे मंच के जो मध्य में
पार्श्व में जाकर फसाने हो गये।
संस्था ने एक कम्प्यूटर मँगाया
और दस साथी रवाने हो गये।
चोरियाँ बढ़ने लगी हैं आजकल
अब नगर में पुलिस थाने हो गये।
कल हमारे बीच से उठकर, सियासी-
ओढ़कर चोला सयाने हो गये।
बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये
आप-औ’ हम शामियाने हो गये।
ख्याति पा अब आप हैं पहुँचे हुये
किन्नरों से जाने-माने हो गये।
आप थे जो गुड़ तो घर-घर में रहे
आप अब काजू-मखाने हो गये।

-डॉ. रामकुमार सिंह

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