ये लड़की बिल्कुल सीधी चलती है /कभी फिसली तो संभल जायेगी।

चंद गजलें –

एक
ये बैठक भी निकल जायेगी
एक घंटे की आफत है, टल जायेगी।
‘परिपत्र बहुत डराते हैं हमें’
जरा-सी बात मुंह से निकल जायेगी।
ये लड़की बिल्कुल सीधी चलती है
कभी फिसली तो संभल जायेगी।
हर तरफ पानी भर गया, फाइल-
भीगी तो अच्छा है, गल जायेगी।

दो-
फिर कोई सरसराहट दौड़ानी होगी।
बात बहुत जम रही है, हिलानी होगी।
कन्नड़ में ‘कुत्ते’ को ‘नाई’ कहते हैं
ये बात नाई से छुपानी होगी।
स्कूल के पिछवाड़े मिलते हैं दो दिल
ये बात प्राचार्य को बतानी होगी।
उस तरफ के लोग नहीं दिखते हैं
ये ऊंची दीवार गिरानी होगी।

तीन-
नया जाल बिछाना होगा
आदमी को सुलाना होगा।
निरीक्षक आ रहे हैं, कि-
ये सामान हटाना होगा।
स्वागत के बोल गूँजेंगे
बाजा भी बजाना होगा।
साहब ने बजा दी घंटी
प्रहरी को बुलाना होगा।
चलो कवितायें बंद करें।
आज तो नहाना होगा।

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इस तरह मकानात गिराने नहीं आते – एक गेय गजल : रामकुमार सिंह


गेय गजल – संगीतबद्ध पढ़ी जाने को

रिश्ता नहीं होता तो बुलाने नहीं आते
वो फिर से नई बात चलाने नहीं आते।
शब्दों को रोक लें तो आँसू निकल पड़ें
हम सबको अपने दर्द छुपाने नहीं आते।
‘बाजार‘ चला देता है खोटे हों खरे
मैं आदमी हूँ सिक्के चलाने नहीं आते।
‘निर्माण ‘का संकल्प जो लेकर चले होते
इस तरह मकानात गिराने नहीं आते।
हाथों पे भरोसा यदि होता नहीं हमको
लोहे का ये पहाड़ हिलाने नहीं आते।

तुम्हारा काम अब होगा/ वो परसों दिल्ली जायेंगे : हिन्‍दी गजल : डॉं. रामकुमार सिंह


(हिन्‍दी गजल : रिदम के साथ पढ़ी जाने को)

कि-
लीडर आज आयेंगे
हमें भाषण सुनायेंगे।
हमें रोटी का आश्वासन
दुबारा देके जायेंगे।
चलो हम लोग चलते हैं
पुराना गीत गायेंगे।
वहीं बैठे रहो सज्जन!
तुम्हें ऊपर बुलायेंगे।
सतह पर शांति होगी
भीतर कुलबुलायेंगे।
यहां पर फल नही मिलते
चलो लोहा चबायेंगे।
तुम्हारा काम अब होगा
वो परसों दिल्ली जायेंगे।

पुरानी बात बताते होंगे। तो किस तरह लजाते होंगे : कुछ गजलें/डॉ रामकुमार सिंह

छोटे मतलों की लम्बी गजल काफी पहले से लिखी जाती रहीं है। बाद में चुनिंदा शेर संकलित होते रहे हैं। कुछ इसी तरह की गजलें जारी कर रह रहा हूं। एक पुराने से रजिस्टर में कई महीनों पहले लिखीं थीं। आज मिल गई तो, पढ़ लीजिये। परिवेश कर्नाटक से मिला है……

लम्बी गजल – एक

फिर मशीन घरघराई है
पहाड़ की शामत आई है।
टुकडे हो गया कृपण पर्वत
लोहे की खेप उगलवाई है।
मिट्टी को सोने में बदल देंगे
सरकार से बात चलाई है।
लक्ष्य हो गया निर्धारित
खबर भी छपवाई है।
एक नाम मंगवाया था
पूरी सूची चली आई है।
कनिष्ठ बहुत खुश हैं
वरिष्ठों की विदाई है।
इडली खा ली वहीं पर
चटनी थैली में रखवाई है।
यहां लाल धूल बहुत है
कपडों से लिपट आई है।
अंगूर बिक गये अम्मा
कब से दुकान लगाई है।
नारियल ठीक से काटो
बड़ी नाजुक कलाई है।
खा लो, भेलपुरी खा लो
सौम्या ने बनाई है।
चांदी के सिक्के बटेंगे
परियोजना से कमाई है।

लम्बी गजल – दो

पुरानी बात बताते होंगे
तो किस तरह लजाते होंगे।
मैं बहुत छोटा था, वो बड़े
गोद में खिलाते होंगे।
कितने मांसल हैं ये पेड़
व्यायाम को जाते होंगे।
रात की पाली खत्‍म हुई
श्रमिक नीचे आते होंगे।
बहुत बदबू है, सीलन है
महीनों में नहाते होंगे।
वजनदार होती है मिट्टी
कैसे डम्पर में चढ़ाते होंगे।
रात भी बजता है सायरन
कौन लोग बजाते होंगे।
अभी चला गया हुड़गा
अप्पाजी बुलाते होंगे।
पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।
मध्यान्तर में खड़ी है बच्ची
पापा खाना लाते होंगे।
( कन्‍न्‍ड में हुडगा – लडका, अप्‍पाजी- पिताजी)

लम्बी गजल – तीन
एक ही श्रोता है
वह भी सोता है।
किसने मारा है
तू क्यों रोता है।
कल बैठक है
देखें क्या होता है।
मतदान होना है
सबका न्योता है।
सुपारी कट जायेगी
हाथ में सरोता है।
वो प्रेस करता है
कपडे नहीं धोता है।
स्कूल और डाकखाना
साथ बंद होता है।
जो जुटाता है-
वही खोता है।

गजल : चार (पढी जाने को)
हर घर में गाड़ी है
यहां का मजदूर अनाड़ी है।
सब कन्नड़ बोलते हैं
बच्चा भी जुगाड़ी है।
ऊपर चंदन है, लोहा है
नीचे रेलगाड़ी है।
मर्द के मूंछ है, लुंगी है
औरत के गजरा है, साड़ी है।
सांप निकल आते हैं
बंदर हैं, झाड़ी है।
छोटा-सा कस्बा है
लाल रंग की पहाड़ी है।

‘मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता’/13 गजलें /डॉ. रामकुमार सिंह

इन गजलों के बारे में –
बहुत दिनों से …..या कहिये वर्षों से जो ‘ओढ़ता-बिछाता’ रहा …..उनमें से कुछ छपीं …..कुछ डायरियों के पन्नों पर बिखरी रहीं। …दुष्यंत से हमेशा प्रभावित रहा हूँ….इन गजलों में भी वह प्रभाव आ जाये तो लाजिमी-सी बात है………..

(एक)

मौत उनकी पारितोषिक हो गयी।
एक कुर्सी रिक्त घोषित हो गयी।

रात को इस घास पर जो ओस थी
आज प्रात: ही विलोपित हो गयी।

आ गयीं जब से जम्हूरी ताकतें
आम जनता और शोषित हो गयी।

कल कराया था इसी ने आचमन
यह नदी जो आज कलुषित हो गयी।

मुल्क के बाबत मिला जो पद उन्हें
मानसिकता अधिक दूषित हो गयी।

यात्री सब मौत के आगोश में –
रेल दुर्घटना सियासत हो गयी।

(दों)

पूछने को अब हजारों प्रश्न हैं।
और,सुलझा देने वाले सन्न हैं।

नौजवां चिल्ला रहे हैं- रोटियाँ
पर सियासी रहनुमा मदमग्न हैं।

पा गये सत्ता हमीं से आज, तो
कामकाजी हाथ उनके सुन्न हैं।

पीढ़ियों से भीख माँगी आजकल
सोमरस पीकर सदन में टुन्न हैं।

संस्था में एक पद है भृत्य का
डिगरियाँ वे देख उसकी खिन्न हैं।

चप्पलें चटकाईं – अनुभव दस बरस
कागजाते-भूख, सब संलग्न हैं।

आयु सीमा-पार उसकी हो गई
यही खामी देख वे प्रसन्न हैं।

(तीन)
अब निकल पाओगे कैसे, आज भी कुहरा तो है।
तुमसे पहले जो गया था राह में बिखरा तो है।

इस तरफ सूराख से आने लगी है रोशनी
आज सूरज मेरे घर के पास से गुजरा तो है।

पक्ष में अपने शराफत की दलीलें अब न दे
कह रहे हैं लोग अक्सर तू बहुत बिगड़ा तो है।

क्या समझकर तोड़ डाला पत्थरों से आईना
सूरतें कायम हैं अब भी कांच का टुकड़ा तो है।

काम कुछ करता नहीं था ये शिकायत थी हमें
अब वो पत्थर फेंकता है कुछ भी हो सुधरा तो है

(चार)

ऐसा बिखरा है समेटा नहीं जाता।
हाल घर का मेरे देखा नहीं जाता।

शख्स घर में हैं जो सभी अलग-अलग
एक ही सूत्र लपेटा नहीं जाता।

साँप उसके मेरे ऑंगन को तक रहे
मेरी चौखट से सपेरा नहीं जाता।

कहा था जिसमें कि मेरे नहीं हो तुम
लिखा वो ख़त मुझे, फेंका नहीं जाता।

नहीं पाबंद हूँ, ऐ वक्त! मुझे छोड़
ढले न शाम, सबेरा नहीं जाता।

बना दिये हैं तेरे पक्के मक़ानात
तेरा ये राह-बसेरा नहीं जाता।

मेरा इतिहास मेरे साथ ही दफन
मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता।

(पाँच)
डूबती सांसों का मंज़र देखते हैं।
वो खड़े होकर समन्दर देखते हैं।

आदमी को आदमी कहते नहीं हैं
जो उसे औलादे-बंदर देखते हैं।

हारकर, मुझको हराने के लिए अब
इस नगर मे वो धुरंधर देखते हैं।

मोल चमड़े का सरल है, इसलिए
मन भुलाकर ज़िश्म सुंदर देखते हैं।

दोस्त! परदे का चलन उनके लिए,जो-
घर में आकर घर के अंदर देखते हैं।

(छह)

उस समंदर से घटा वो रात-दिन उठती रहेगी।
इन दरख्तों से लता ये अंत तक लिपटी रहेगी।

मैं लिये फिरता हूँ तेरी यादगारों का पुलिंदा
चीज़ ये बेज़ान कब तक ज़िश्म से लटकी रहेगी।

जिंदगी अब तक मिटा पायी बनावट की हँसी
ऑंसुओं की खोज में ये जिंदगी मिटती रहेगी।

गीत मेरे याद रख मुझको बुलाने के लिए,जब-
आशियां रह जायेगा ना नाम की तख्ती रहेगी

(सात)
समाज चमत्कृत हो गया
दलित पुरस्कृत हो गया।

दुख ने माँज दिया जिसे
व्यक्ति परिष्कृत हो गया।

साठ वर्ष बाद, अब-
क्या व्यवहृत हो गया।

तात ने नहीं लड़ा चुनाव
वत्स उपकृत हो गया।

(आठ)

जिंदगी इक दौड़ है, रफ्तार की बातें करें।
नफरतों को अलग रख दें, प्यार की बाते करें।

गैरों के ऑंगन में झाँक लिये बहुत दिन
विषय बदलें, आप अपने द्वार की बातें करें।

देखिये सरकार हम ऐसे नहीं हैं, कि-
और बातें छोड़कर बेकार की बातें करें।

अभी तक दरबार की बातें करी हैं
अब चलो घर बैठकर घर-बार की बातें करें।

काम की बातें करेंगे एक दिन तो ठहरिये
आज तो इतवार है इतवार की बातें करें।

दाल आटे की तो सुन लें और जीरे-हींग की
फुरसत में जो हो जायें तो अखबार की बातें करें।

हालात से इस बार चलिये हम लड़ेंगे
बेकार में हर बार क्यों अवतार की बातें करें।

‘शालीनता है नगर में’ ये आकलन है ऊपरी
हृदय में जो उठ रहा उस ज्वार की बातें करें।

ये नहीं स्वीकार कि तलवार की बातें करें
कलम की हो बात तो हथियार की बातें करें।

(नौ)

काम अटका है तो संभल जाइये।
काम चल जाये तो बदल जाइये।

रास्ता बहुत सँकरा है जनाब
मुझे गिराइये और निकल जाइये।

इस तरह कुछ भी नहीं मिलता
खिलौनों के लिए मचल जाइये।

झोंपड़ी से बड़े हैं आपके पाँव
रखना चाहते हैं – महल जाइये।

लोग ऑंखें दिखाने लगते हैं
जहाँ भी आजकल जाइये।

आपके अफ़सरान ने बुलाया है
जाइये – सर के बल जाइये।

(दस)
ऑंकड़े जो प्रश्न में हैं औसतन सारे ग़लत हैं।
प्रश्न का हल खोजने के क़ायदे मेरे ग़लत हैं।

तर्जुमा करना सिखाया जिनकों हमने अभी तक
अब वो कहते हैं तुम्हारी नज्म में हिज्जे ग़लत हैं।

कह रहे हो – ख़ास ही आवाज सुनता है खुदा
तो बताओ उसके दर पे कौन से सज़दे ग़लत हैं।

अब तराना कोई भी हो दौर वो ना आयेगा
लोग अक्सर बात ये कहते हैं पर कहते ग़लत हैं।

(ग्यारह)
कहते हैं लोग मेहनत से क्या नहीं मिलता।
हम खून भी बहायें तो सिला नहीं मिलता।

मुद्दे की अगर बात हो – चर्चा नहीं होती
चर्चा अगर करनी है तो मुद्दा नहीं मिलता।

आवाम के हालात पे ऑंसू बहाये कौन ?
चिल्लाते हैं संसद में वो भत्ता नहीं मिलता।

आबाद मेरा मुल्क तूने कर दिया लीडर !
है घर नहीं, राशन नहीं, कपड़ा नहीं मिलता।

(बारह)
हम जो मिट्टी में पले हैं, पहले तू भी ख़ाक तो बन।
नापना मेरी गिरेबां चल अभी बरबाद तो बन।

हैं निरे तिनके सही, जल जायेंगें लम्हों में, पर-
राख करने को इन्हें तू लपलपाती आग तो बन।

दर्द को महसूस करने का तरीका पूछता है
अभी तक मरहम रहा है अब जरा तू चाक तो बन।

साथ मेरा चाहता, मैं आबे-दरिया की रवानी
तू किनारे की तलब, आ धार बन मझधार तो बन।

इश्क संजीदा नहीं तू तलबगारे-ज़िश्म है
उनके दिल तक जा सके तू आज वो फरियाद तो बन।

(तेरह)
किस क़दर बदली हुई है -कि ये फिजा देखो।
बजूद खुद से ही लगता है अब जुदा देखो।

अभी तक हम जिन्हें देखे नहीं सुहाते थे
आज हम पर हुए हैं बेवज़ह फिदा देखो।

लगी है गिरने पे कम ही, कि उड़ सके थोड़ा
उठेगा फिर कोई उस जैसा जलजला देखो।

दूर रहना कि दब के दम नहीं निकल जाये
शहर में इनका है ऊँचा ही दबदबा देखो।

शख्स जो भाया उसे निगला है छोड़ा ही नहीं
वाह क्या बात है क्या खूब हाजमा देखो।

ये झपटना औ’ लिपटना हमें पसंद नहीं
रखा करिये हमसे आप फासला देखो!

जो नही करना था वही काम किया है तुमने
कर ही डाला है तो करने का लो मज़ा देखो।

हुआ बहुत कि हमें और न उलझाओ प्रिये!
चलो निकलो यहाँ से अपना रास्ता देखो।

कि- ये कमबख्त सूरतें हीं बरग़लायेंगी
सूरते-हज्जाम नहीं – हाथ उस्तरा देखो।

किस तरह देखा था कुछ भी नहीं दिखाई दिया
उस तरह ठीक नहीं अब की इस तरह देखो।

दिया है किसने तुम्हें इस जगह काला-पानी
जरा सोचो तुम अपने हक में फैसला देखो।

गया है कब का नहीं लोटा मेरे घर का दिया
हुआ है क्या वहाँ जाकर जरा माजरा देखो।

– रामकुमार सिंह