गांधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?

दस साल बाद……इस अग्रलेख के बारे में :-

यह अग्रलेख प्रथम बार 2 अक्टूबर सन् 2000 को नवभारत समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर ‘गांधी जयंती पर विशेष’ सामग्री के रूप में प्रकाशित हुआ था। उस समय नवभारत ग्वालियर संस्करण के सम्पादक श्री राकेश पाठक जी थे जो वर्तमान में आलोक मेहता जी के यशस्वी समूह-सम्पादन में नई दुनिया ग्वालियर संस्करण के सम्पादक हैं। पश्चात यह अग्रलेख डॉ. राम विद्रोही जी के सम्पादन में प्रकाशित दैनिक आचरण तथा श्री रघुवीर सिंह जी के प्रधान सम्पादन में प्रकाशित दैनिक मध्यराज्य में भी अनुप्रकाशित हुआ। आभार व्यक्त करते हुए ‘पुर्नप्रकाशन’ श्रेणी में ‘सर्जना’ पर यथावत जारी कर रहा हूँ। दस साल बाद परिस्थितियाँ बदली हैं। गांधीवाद का बाजारू चेहरा ‘गांधीगिरी’ भी इस दौरान सामने आया। उसके कुछ व्यावाहारिक प्रयोग भी खबरों में आये। हाल ही में प्रसिध्द चिंतक गिरिराज किशोरजी की गांधीजी पर एक और पुस्तक ‘गांधी को फांसी दो’ आयी है। शीर्षक का मतलब यह है कि दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी द्वारा चलाये गये आंदोलन से घबराये गोरों की वहाँ यही आवाज थी। ‘पहला गिरमिटिया’ से लेकर ‘गांधी को फांसी दो’ तक गिरिराज जी की पुस्तकें निश्चित रूप गांधी जी की प्रासंगिकता पर नित नया अनुसंधान है।
….अस्तु बिना कोई परिवर्तन किये जारी किये जा रहे इस अग्रलेख को आप तत्कालीन दृष्टिकोंण से देखें और अग्रलेख की प्रासंगिकता इस 30 जनवरी 2010 को तय करें…………….

गांधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?
(रामकुमार सिंह/ दैनिक नवभारत/ग्वालियर संस्करण/2 अक्टूबर 2010)

कॉलेज के दिनों में हमने कई बार एक नाटक का मंचन किया था जिसकी विषयवस्तु ये थी कि गांधी की प्रतिमा से एक-एक करके घड़ी, चश्मा, लाठी, चादर और धोती तक उतार ली जाती है। ऐसा करने वाले किरदार भले ही शराबी, जुआरी, धूर्त या मवाली प्रकार के दर्शाये गये हों लेकिन वस्तुत: गांधी के चीरहरण को मंचीय अभिव्यक्ति मिलने का स्रोत हम हैं। हमारा समाज, कथित राष्ट्रीय नागरिक, सभ्य और सुसंस्कृत व्यक्ति तथा संसद से लेकर सड़कों तक राष्ट्रपिता का यह देश…।
यदि 2 अक्टूबर 1869 से 30 जनवरी 1948 तक एक मामूली आदमी की कहानी गांधी है, पागलों की तरह हाथ में लाठी लेकर घूमने वाला एक अदना फकीर गांधी है, एक सिरफिरे की गोली से निढाल हो चुका शरीर गांधी है, यदि माल्यार्पण के लिए दीवार पर टंगी तस्वीर का नाम गांधी है, तो निश्चित तौर पर मान लीजिये कि गांधी कभी पैदा ही नहीं हुआ, औपचारिक प्रलाप मत कीजिये, गांधी अप्रासंगिक है।…..मगर आप यदि इससे ज्यादा मानते हैं, आप स्वीकार करते हैं कि गांधी एक समग्र जीवन है, व्यापक चेतना है, दर्शन है और विचारधारा है। आप इस तरह मानते हैं गांधी को, कि यह फटेहालों का लोकतंत्र है, गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की अर्थव्यवस्था है, समता है, रामराज, स्वराज और सुराज गांधी है। शब्दकोश में स्वतंत्रता का अर्थ गांधी है। दलितों का सौजन्य गांधी है। सामाजिक न्याय, समरसता और सर्वोदय गांधी है, ट्रस्टीशिप सिध्दांत गांधी है। यदि ऐसा मानते हैं आप तो यकीन मानिये कि गांधी का दम घुटना अब शुरू हुआ है, आज गांधी अंतिम साँसें ले रहा है। 2 अक्टूबर 1869 इतिहास का दिन नहीं है। गांधी नाम के आदमी का जन्म ऐतिहासिक घटना नहीं है। इतिहास तब घटित हुआ जब गांधी, गांधीवाद बन गया। वह गांधी जो एक सीमाबध्द जीवन का नाम नहीं हो सकता, वह गांधी जो कालजयी विचार बन गया। तो 30 जनवरी 1948 को भी दर्ज मत मानिये। इस दिन भी कोई इतिहास खत्म नहीं हुआ। एक शरीर का स्खलन ऐतिहासिक घटना नहीं हो सकती। काला पृष्ठ तो आज लिखा जा रहा है। जी हाँ, गांधी की कहानी आज अंतिम सांसे ले रही है। जबकि हम पूरे प्राणप्रण से गांधी को दफनाने की तैयारी कर चुके हैं। हम नहीं चाहते कि गांधी जीवित रहे, प्रासंगिक रहे या दुबारा पैदा हो इसलिये गांधी की प्राणवायु को अवरुध्द करने के सारे इंतजामात कर लिए गए हैं। अब हम गांधी को फौलादी ताबूत में जड़ना चाहते हैं। पंडित नेहरू रुंधे गले से जिस गांधी के चिरनिद्रा में विलीन होने की घोषणा न कर सके और जिसे सदैव एक दिये की तरह प्रज्वलित माना, हम नहीं चाहते कि वह दिया अपने छद्म अंत के बाद भी प्रकाशित हो इसलिए उस कथित अंत को वास्तविक अर्थ प्रदान करने की पुरजोर कोशिशें की जा रहीं हैैं। स्वराज और रामराज के रूप में गांधी क्या इसलिए जीवित रहे ताकि शासक और शासित के बीच विभाजित मिथ्या लोकतंत्र देख सके? इसलिये कि अपने सपनों के भारत में राजा ‘राम’ को गरीबी, भुखमरी और असंतोष पर धनुर्विद्या का प्रयोग करने की बजाय संसदीय मंच पर माइक्रोफोन-संधान और जूतमपैजार का अभ्यास करते हुए देख सके?
न्याय, समता और सर्वोदय के रूप में क्या गांधी यहाँ जीवित रह सकेगा जहां सामाजिक समरसता और सौजन्य के लिए कानून अंधा, अपूर्ण और अपंग साबित हो? उस व्यवस्था को स्थापित देख सकेगा जिससे विलंबित न्याय की प्रतीक्षा में ऑंखें मृत हो जाती हों और जिससे न्याय की अपेक्षा वो करे जो जिसके लोहे के पैर, चांदी के हाथ और सोने की जेब हो? जहां अकर्मण्यता इतनी निरीह बना दे कि सभी क्षेत्रों में समानता का स्तर बनाने के लिए ‘दुर्बलों को संरक्षण’ के नाम पर वर्ग-संघर्ष को न्यौता देने के अलावा कोई चारा न रह जाये? क्या गांधी इसलिए जीवित रहे कि दलितों को दिये गये सह-सम्बन्ध के सौम्य प्रतीक ‘हरिजन’ को अभिशाप के मायने मिलते देख सके?
भारतीय परिवेश के सर्वथा अनुकूल गांधीवादी आर्थिक मॉडल व ट्रस्टीशिप सिध्दांत के रूप में गांधी को चिरकाल तक प्रासंगिक रखने की अभिलाषा क्यों की गई? राष्ट्रीय विकास का प्रतीक चरखा क्यों माना गया? छोटे हाथों को स्वालम्बन देने की पुकार क्यों की गई? इसलिए ताकि आज हम अमेरिकी डॉलर के लिए भारतीय दरवाजे खोल दें? इसलिए कि हमारा पहला सरोकार अपने लोगों के जीवन-स्तर में विषमता की अंतहीन खाई को पाटने की बजाये अमीर देशों के लिए बाजार बनकर उपलब्ध हो जाना भर हो?। इसलिए कि हम 85 करोड़ लोगों की सूखी अंतड़ियां भूलकर 15 करोड़ कुबेरों को विदेशी विनिमेश का उपभोक्ता बनाने पर आमादा हो जाये? इस हवा में गांधी सांस ले सकेगा जिसमें अपने लोगों की गरीबी, बेरोजगारी, साधनहीनता और सहायता भूलकर हम विश्व-बैंक, मुद्राकोष और विश्व-व्यापार संगठन की चकाचौंध में विकास का मिथ्या उद्धोष करते फिर रहे हैं। हरेक घर में एक कम्प्यूटर पहुंचाने की बात कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि अभी दस घरों के बीच एक चूल्हा जलाने का प्रबंध भी हम नहीं कर सके हैं। गांधी नहीं रह सकेगा इस तरह जीवित यदि हमने तीन चौथाई लोगों को हाशिये पर उतारने का निश्चय कर लिया है।
राष्ट्र का सच्चा प्रतिनिधि होने के नाते विश्व सम्मेलनों में भी घुटनों तक धोती और पतली चादर ओढ़कर जाने वाला यह नंगा फकीर, हमारा राष्ट्रपिता आज राष्ट्र की दुर्दशा का सहचर बनकर जीवित बना रहता यदि हमने अपनी फटेहाली को छुपाने का प्रबंध न किया होता। काश! हमने क्लिंटन की यात्रा के दौरान अपने पैबंदों की लीपापोती का प्रयत्न न किया होता। अपने बाप को जींस-टी शर्ट पहनाने की कोशिशें न की होती। अमेरिका में गांधी की प्रतिमा स्थापित होने पर खीसें न निपोरी होतीं और इसे भारत के लिए अपार गौरव का विषय कहकर गांधी के सहज महत्त्व को स्वीकार करने से इंकार न किया होता , तो आज गांधी शायद जीवित बना रहता।
राजनीति का धर्म और नैतिकता से तादात्म्य स्थापित करने वाले, राजनीतिक व्यवहार के लिए अहिंसा को वैश्विक मान्यता दिलाने वाले वाले, सत्याग्रह, उपवास और हड़ताल को लोक और तंत्र के बीच वार्तालाप का सशक्त जरिया बनाने वाले गांधी को हम यह दिखाने लिए जीवित रखना चाहते हैं कि उड़ीसा में हमने एक निर्दोष धर्म प्रचारक को उसके मासूम बच्चों सहित जिंदा जला दिया? बिहार को स्वतंत्र शक्तियों की रणभूमि बन जाने दिया? राष्ट्रपिता को हम ये बतायेंगे कि पश्चिम बंगाल में सड़कों पर हुए रक्तपात का कारण राजनीतिक आकाओं द्वारा भरा गया उन्माद मात्र था और जहाँ मुख्यमंत्री ने खुलेआम यह फतवा जारी किया कि हिंसा का प्रत्युत्तार हिंसा से दिया जायेगा? हम गांधी का पुनर्जन्म चाहते हैं ताकि वह धूर्त और स्वार्थी लोगों के हाथों सत्याग्रह का सत्यानाश, हड़ताल की हंसी और उपवास का उपहास देख सके? यदि इसलिये हमें गांधी चाहिये तो व्यर्थ औपचारिकतायें न करें, उसका दम घुट चुका है।
सच तो यही है कि हम गांधी को बीसवीं शताब्दी में ही दफना चुके हैं। हम नहीं चाहते कि वो दुबारा पैदा हो। हमें गवारा नहीं कि हमारे घर में बुध्द या बापू पैदा हों, नंगे फकीर पैदा हों और सिध्दांतों का पाठ पढ़ाते रहें। अब हम वीरप्पन पैदा करना चाहते हैं जिसकी संकुचित भृकुटि से दो-दो राज्य सरकारें गुलाटें खाती रहें। हम नहीं चाहते कि गांधी जीवित रहें, दुबारा आयें या समाधि से निकलें और प्रासंगिक बने रहें, इसीलिये रोज उनके ताबूत में कीलें ठोके जा रहे हैं।

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”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ”/दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति

इस अग्रलेख के बारे में :
तब मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का विद्यार्थी था। पहली बार दुष्यंत कुमार का नाम पता चला जब ग्वालियर में श्रीमती अंजना मिश्र ने ‘दुष्यंत जयंती’ मनाई। मैं और मेरे साथी दुष्यंत को शकुंतला वाला दुष्यंत समझे थे। फिर ‘साये में धूप’ हाथ आयी और एक सिलसिला चल पड़ा। कई गजलों को लयबध्द करके गाया भी। जुमले की तरह दुष्यंत की पंक्तियों का जमकर इस्तेमाल भी किया। एक-दो वर्ष बाद पत्रकारिता करते हुए दुष्यंत पर यह अग्रलेख डॉ. राम विद्रोही जी के सम्पादन में प्रकाशित दैनिक आचरण में प्रकाशित हुआ। बिना कोई परिवर्तन किये आज ज्यों का त्यों रिलीज कर रहा हूँ………………….

दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति
रामकुमार सिंह/ 1 सितम्बर, सन 2000/दैनिक आचरण (ग्वालियर/सागर)/सन्दर्भ : ‘साये में धूप : दुष्यंत कुमार त्यागी/राधाकृष्ण प्रकाशन – सन् 1975

गज़ल की नवीन परम्परा के सूत्रधार और साहित्य के अभिनव आयाम के प्रणेता दुष्यंत को साहित्य-जगत ने मूर्धन्य स्थान दिया, किन्तु उन्हें केवल साहित्य-मनीषी के रूप में निरूपित करना पक्षपात होगा। वस्तुत: वे सामाजिक-राजनीतिक दार्शनिक हैं, साहित्य-सृजनकार बाद में। उनका काव्य मंचीय मनोरंजन अथवा बुध्दि-विलास नहीं, बल्कि उसमें जनाकांक्षाओं की पीड़ा अपने उदात्त रूप में अभिव्यक्त होती है। उनसे अभिनव विचारधारा का स्रोत प्रस्फुटित हुआ है, जिसे दुष्यंतवादी परम्परा कहना होगा।
परतंत्रता की जकड़न से उन्मुक्ति की छटपटाहट के दौरान काव्य, दर्शन, चिंतन और विचार-प्रवाह, सभी पक्ष क्रांति, उद्धोष के वाहक थे। प्रत्येक कोने से मुक्ति की अभिलाषा अपने तीव्रतम आवेग में ज्वार की तरह उमड़ती थी। अपूर्व त्याग के पश्चात जो स्वतंत्र उड़ान भरने की क्षमता राष्ट्र को प्राप्त हुई उस शक्ति का नकारात्मक पक्ष भी सामने आते देर न लगी। इतने कम समय में वे जनाकांक्षायें, आशायें, और चातक-पिपासा धूमिल हो जाएंगी, ऐसा ज्ञात न था। गणतंत्र की ऐसी विडम्बना का स्मरण न था जहाँ आकर सारा विश्वास, दिलासा मृगमरीचिका सिध्द हो गया। इस पीड़ा की अभिव्यक्ति दुष्यंत कुमार के शब्दों में-

”कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए”

जिस दृष्टिकोंण से राष्ट्र ने जनतांत्रिक परम्परा को आत्मसात किया उसके अविलम्ब अवसान ने स्वनिल आश्रय से मोहभंग कर दिया। देखिये-
”ये सोचकर कि दरख्तों में छाँव होती है
यहाँ बबूल के साये में आके बैठ गये”

राष्ट्रोदय के लिए अपने सर्वस्व का मूल्य चुकाकर और निजत्व को विलीन कर जिन आदर्शों को जन्म दिया गया, क्रांतिवीरों को यह आभास न रहा होगा कि निकट भविष्य में वे ही सूत्र स्वार्थ का मंच निर्मित करने में प्रयोग किये जायेंगे-
”धीरे-धीरे भीग रहीं हैं सारी ईंटें पानी में
इनको क्या मालूम कि आगे चलकर इनका क्या होगा”

यथार्थ का जो परिदृश्य उपस्थित हुआ उसकी तीक्ष्ण अभिव्यक्ति देखिये-
”कल नुमाइश में मिला वो चीथडे पहने हुए
मैने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है”

और-
”रोज अखबारों में पढ़कर ये खयाल आया हमें
इस तरफ आती तो हम भी देखते फस्ले बहार”

बहार’ कहाँ अपनी छटा बिखेर रही है, ये बात छुपी नहीं है। जिन मौलिक समस्याओं से निजात पाने की अभिलाषा लिये आंखें बुढ़ा गईं उनका उन्मूलन करने के नाम पर ‘महानिधि पाकर बौराए हुए लम्पटों’ का प्रयास तो देखिये ! वातानुकूलित विचारग्रहों में चाय की चुस्कियों के साथ मूलभूत समस्याओं पर मंत्रणा करने वाले कथित नेतृत्वधारियों पर जब दुष्यंत प्रहार करते हैं तो आश्चर्य है कि उनके शब्द क्यों भीतर तक कचोट नहीं जाते ?-
”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा”

दुष्यंत का पीड़ामय व्यंग्य घिनौनी राजनीति को उजागर करने के लिए पर्याप्त है। वे एक जनसामान्य से कहते हैं कि-
”मस्लहम आमेज होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है”

चरम शक्ति के रूप में उत्तारदायी होने के कारण, दुष्यंत, जन-जन को झकझोरते हैं जिनके स्वार्थपूर्ण एवं संकुचित दृष्टिकोंण व व्यवहार से समग्र राष्ट्र को अवनति में ढकेलने वालों का साहस हिलोरें ले रहा है।-
”इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ”

और-
”इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है”

साथ ही कुछ लोगों के स्वार्थ के लिए अनेक लोगों का चाटुकारिता-उन्माद भी दुष्यंत को असह्य है-
”रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनियाँ
इस बहकती हुई दुनियां को संभालो यारो”

सारे परिदृश्य को देखकर भी जब सत्य का प्राकटय नहीं होता, दर्शन अंधा और चिंतन मूक हो जाता है तो चारणी प्रवृत्ति के विरोध में दुष्यंत आम आदमी से लेकर कवि, दार्शनिक और सम्पूर्ण बुध्दिजीवी वर्ग को कड़े शब्दों में लताड़ते हैं-
”सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं”

”गजब है सच को सच कहते नहीं वो
कुरानो-उपनिषद खोले हुए हैं”

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते हैं
चलो यहां से चलें, हाथ न जल जाएं कहीं”

इस बीच दुष्यंत अपने उत्तारदायित्व को गहनता से अनुभव करते हैं। कोई सम्मोहन उन्हें ‘सत्ता का भोंपू’ नहीं बना पाता –
”मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं।”

यहां आकर दुष्यंत के नजरिये का मूल उद्देश्य पता चलता है। यहीं इस प्रश्न का उत्तार मिलता है कि क्या बात हुई कि दुष्यंत ने शायरी की? यही वो बात है जहां वे मंचीय ग्लैमर या भौतिक वैभव को लूटन के लिए सोचा-समझा माध्यम अपनाने की बजाय ऐसी अभिव्यक्ति चुनते हैं जो उन्हें चारणों की श्रेणी से सर्वथा अलग कर जन-जन के पीड़ामय आक्रोश का दार्शनिक बना देती है। देखिये-
‘मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूँ
हर गज़ल अब सल्तनत के नाम इक बयान है”

इस उत्तरदायित्व को बखूबी निभाते हुए वे एक ओर यथार्थ का चित्रण करते हैं तो दूसरी ओर निवारण का सुझाव भी देते हैं। और उनका एक मत ही काफी है इस बात के लिए कि शासकों और शासितों में विभाजित ‘झूठी जम्हूरियत’ भर्रा उठे-
”अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं”

और देखिये-
”एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है”

तथा-
”कैसे आकाश में सूराख हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”

इसी क्रम में एक अभिनव क्रांतिकारी आशावाद देखिये-
”गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में
सरकार के खिलाफ ये साजिश तो देखिये”

आमूलचूल परिवर्तन की बात कर वे विवादास्पद शख्सियत बनने का लक्ष्य नहीं रखते, बल्कि-
”सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये”

सामाजिक पीड़ा के इस दार्शनिक की एक भी पंक्ति यदि हमें झकझोर न सके तो फिर न तो निजात पाने की अभिलाषा रखें न दर्द का अलाप करें। दुष्यंत कहते हैं-
”आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों मे चीख हरगिज कारगर होगी नहीं”

– डॉ. रामकुमार सिंह

भूषण को किन मायनों में राष्ट्रीय कहें ?

भूषण को किन परिस्थितियों, किस युग और किस प्रकार की काव्य-कला का कवि कहा जाये, इसके लिए जरूरी है उस युग की प्रवृत्तियों को जानना, जिस युग के जनमानस ने अंतत: अपने बीच से भूषण को तैयार कर लिया। आखिर क्या वजह रही कि तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें भारतीय राष्ट्रीयता का कवि कह दिया गया?

रीतिकाल में जब भारत का जनामानस औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त था तब भूषण ने जनता की भावनाओं को अपनी कविता की वाणी दी। नाजीवाद से त्रस्त यहूदी जनता के अनुभव जिस प्रकार कालांतर में सम्पूर्ण मानवता के अनुभव बनकर सामने आये हैं, इस काल में भूषण की कविता भी युगीन दस्तावेज से कम नहीं है। साहित्य, दरअसल इतिहास से अधिक प्रभावी भूमिका इसी कारण निभा पाता है। तो भूषण को यदि याद किया जाता है तो उनके युगबोध के लिये, उनके काव्य की अंतर्वस्तु के लिए और काव्य-कला के लिए। यहां कला-पक्ष की बात गौण कर दें और केवल उनकी कविता के राष्ट्रवादी ओज पर ही बात कर लें तो मैं समझता हूँ कि भूषण का मूल और प्रासंगिक तत्व सामने आ जाता है।

भूषण ने औरंगजेब के क्रूरतापूर्ण व्यवहार का उल्लेख करते हुए बताया है कि उस समय हिन्दुओं के देवस्थानों को गिराया जाता था, देवमूर्तियाँ तोड़ दी जाती थीं । हिन्दुओं के पूज्य पुरुषों , महात्माओं को सताया जाता था। इस इस रूप लें कि एक धर्मान्ध-व्यक्ति का आतंक किस हद तक मानवता को भयाक्रांत कर सकता है –
”देवल गिरावते फिरावते निसान अली

ऐसे समै राव-रानै सबै गए लबकी

गौरा गनपति आय, औरंग को देखि ताप

अपने मुकाम सब मारि गए दबकी”
ऐसे समय शिवाजी जैसे जननायक की आवश्यकता थी जो इन  अत्याचारों पर अंकुश लगाये, या इस प्रकार कहें कि इस विषम परिस्थिति में जनता की आवाज की प्रतीक बन जाये। शिवाजी की प्रशंसा इसलिए भूषण ने की, क्यों कि वे एक समूची संस्कृति के लोकाचारों, मान्यताओं और परम्परा को विनष्ट करने के गैरलोकतांत्रिक कार्य के विरुध्द खड़े थे। शिवाजी द्वारा व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्थाओं की सुरक्षा और सैनिकों को भावनात्मक व रोजगार परक सहारा इस पूरी प्रक्रिया में भूषण की कविता से प्रकट होता है-

”वेद राखे विदित पुरान परसिध्द राखे

राम नाम राख्यो अति रसना सुघर में

हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन की

कांधे में जनेऊ राखो माला राखी गर में”

कोरे यशोगान के रीतिकालीन युग में भूषण को चारण क्यों न कहा जाये? कारण यही है कि रीतिकाल में ‘शिवराज भूषण’, ‘शिवा बावनी’,’ और ‘छत्रसाल दशक’ जैसे वीररस से परिपूर्ण काव्य ग्रंथों की रचना करने वाले भूषण का काव्य शिवाजी आदि जननायकों का कोरा यशोगान नहीं अपितु तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों का यथातथ्य चित्रण है। उनकी रचनाओं का ओजस युगबोध से अनुप्राणित है। ‘शिवराज भूषण’ में कवि ने शिवाजी के जन्म से लेकर ‘हिन्दू पद पदशाही’ की स्थापना तक……जितनी भी ऐतिहासिक घटनाएँ शिवाजी के जीवन सम्बन्धित हैं उनका ओजस्वी भाषा में निरूपण किया है। इन घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हुए कवि ने अपने युगबोध का परिचय दिया है किसी समुदाय की समूची संस्कृति पर हमले की स्थिति कितनी दुखद हो सकती है, यह भूषण की कविता कहती है-

”पीर पयगम्बरा दिगम्बरा दिखाई देत

सिध्द की सिधाई गई, रही बात रब की

काशी हू की कला गई  मथुरा मसीत भई

शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी”

जबरन धर्मान्तरण विश्व के किसी भी कोने में हो आम जनमानस के लिए असह्य है। इसलिए जब भूषण यह कहते हैं कि- ‘शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी” तो इसे एक जघन्य-प्रवृत्ति के आशय में लिया जाना चाहिए, एक वर्ग-विशेष के लिए हर काल की बात नहीं है। यह उस समय की परिस्थितियों में सही-गलत के निर्णय के लिए एक जरूरी बात है।

        भूषण ने अपने काव्य में कुछ ऐतिहासिकता से भरी घटनाओं का भी काव्य में चित्रण किया है। यह चित्रण रोम-रोम में स्फुरण जगा देता है और प्रत्येक भारतीय जनमानस को एक आताताई के विरुध्द खड़े लोकनायक शिवाजी से जोड़ देता है। शिवाजी का औरंगजेब के दरबार में जाना और उचित आसन न दिये जाने पर उनका क्रोध से तमक उठना, परिणामस्वरूप-

”तपक कें लाल मुख सिवा को निरखि भए

स्याह मुख औरंग सिपाह मुख पियरे”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने टिप्पणी की है – ”वे आश्रयदाताओं की प्रशंसा की प्रथा के अनुसरण मात्र नहीं हैं, इन दो वीरों का जिस ? उत्साह से सारी हिन्दू जनता स्मरण करती है, उसी की व्यंजना भूषण ने की है”

        भूषण का यह संकल्प कि किसी अन्य की सराहना नहीं करता – इसीलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, उनका चयन जनभावनाओं को चुनना है –

”और राव राजा एक मन में ल्याऊँ अब

साह कौं सराहौं के सराहौं छत्रसाल कौं”

…..यहाँ एक बात ध्यान में आती है कि अपने आश्रयदाताओं की वीरता के अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन का आक्षेप भूषण पर लगता है। साहित्य को जनभावनाओं की शीर्ष अभिव्यक्ति मानने में क्या समस्या है? आकाश को नाप लेना और तारे तोड लाना मानव की अदम्यता का ही तो प्रतीक है। फिर भूषण के काव्य में वीररस का पूर्ण परिपाक है तथा युध्द का सजीव व रोमांचित करने करने वाला वर्णन है। ‘शिववावनी’ में शिवाजी की सेना का युध्द के लिए प्रयाण करने से लेकर शिवाजी और छत्रसाल की युध्दकला का ब्यौरा उत्साह भरने वाला है। भूषण के सामने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा का प्रश्न था। धार्मिक स्थानों को सायास अपवित्र किया जाना, सांस्कृतिक मानदण्डों की समाप्ति आदि के प्रयास औरंगजेब के कारण हो रहे थे। अत: जनसामान्य का स्वर उकेरने तथा राष्ट्र की एकात्म वीरता की ओजपूर्ण ध्वनि को शब्दरूप प्रदान करने के लिए भूषण ने शिवाजी के यशोगान को अपना आदर्श मानकर जनता को जगाया। इसी कारण भूषण की विषवस्तु किसी जातीयता तक सीमित नहीं कही जा सकती। भूषण ने जिन दो राष्ट्रनायकों को अपने काव्य का मूलाधार बनाया है, वे दोनों- शिवाजी एवं छत्रसाल, भारत के त्रस्त एवं भयभीत राष्ट्र का पुननिर्माण कर रहे थे। यहाँ यह ध्यातव्य है कि भूषण मुस्लिम सभ्यता और संस्कृति का बलपूर्वक प्रचार-प्रसार देखकर उनका मन व्यग्र हो उठा और धर्मविरोधी मुस्लिम साम्राज्य के प्रति भूषण मुखर हो उठे। वस्तुत: उनका विरोध मुसलमानों के प्रति नहीं बल्कि उस अत्याचार के प्रति था। तत्कालीन सभी राजाओ और रावों ने घुटने टेक दिए थे परन्तु शिवाजी को उस चम्पा फूल की तरह भूषण ने माना जिस पर औरंगजेब रूपी भौंरा न बैठ सकने से अभिशापित है-

”सबही कौ रस लैकें बैठि न सकत आय

अलि अवरंगजेब चम्पा सिवराज हैं’