प्रबंधन-कला, स्वस्थ प्रतियोगिता और उत्तरदायित्व विभाजन प्रभावोत्पादक प्रशिक्षण का आधार: श्री एम.पी. महाजन


चण्डीगढ़(जेडआईईटी से डाॅ. रामकुमार सिंह)। केविसं के सुपरिचित व्यक्तित्व चण्डीगढ़ संभाग के उपायुक्त पद से सेवानिवृत्त एवं जेडआईईटी ग्‍वालियर के पूर्व निदेशक श्री एम.पी. महाजन ने सेवाकालीन प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए चयनित विभिन्न दलों के निदेशक, सम्बद्ध-निदेशक एवं संसाधकों को विषय विशेषज्ञ की हैसियत से प्रथम सत्र को सम्बोधित करते हुए सफल शिविर आयोजित करने के गुर बताये।
श्री महाजन ने कहा कि ज्ञान प्राप्ति भूख की संतुष्टि से अनंत व्यापक विषय है। शिक्षक के ज्ञान को सेवाकालीन प्रशिक्षण के माध्यम से अपडेट करना ही इस प्रकार के शिविरों का लक्ष्य होता है।
उन्होंने कहा कि सभी दल सेवाकालीन प्रशिक्षण के दौरान अपने प्रतिभागियों को अनिवार्य रूप से कक्षाओं में पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रम से अवगत करायें। पुस्तक ज्ञान का आधार संकेत है पूर्ण नहीं। उन्होंने आसपास की चीजों और स्थानीय सामग्री से ही कक्षा में सीखने-सिखाने की रुचिकर प्रक्रिया की वकालत करते हुए कहा कि प्रत्येक पाठ पृथक संवाद है और उसे पढ़ाने का तरीका अद्वितीय और भिन्न है। प्रत्येक शिक्षक पर भी यही तथ्य लागू होता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक को यह समझना होगा कि केवल रटाने की प्रणाली अब नहीं चलेगी। विद्यार्थी पीढ़ी सक्रिय और अपडेट रहने वाले साधनों के सम्पर्क में है। उन्होंने ‘छा जाना’ मुहावरे का अकादमिक उपयोग करते हुए कहा कि शिक्षक वह है जो कक्षा के सभी 40 विद्यार्थियों पर छा जाये। इसके पीछे संकेत यही है कि छत्रछाया का कार्य भी करे और तैयारी करके कक्षा में जाये।
उन्होंनें होने जा रहे सेवाकालीन प्रशिक्षणों हेतु नियत दलों के निदेशको, सम्बद्ध-निदेशकों एवं संसाधकों से सेवाकालीन प्रशिक्षण की प्रभावोत्पादकता और गुणवत्ता बनाये रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रतिभागियों के रिसेप्शन, आवासीय प्रबंध, भोजन-बिजली-पानी, आवश्यक सुविधाओं के साथ ही प्रशिक्षण सामग्री को भी गुणवत्ता के साथ प्रक्रिया में लिया जाये। पाठ्यसामग्री का सफल हस्तातंरण हो और माॅड्यूल आधारित विषयों का ध्यान रखा जाये।
उन्होंने सेवाकालीन प्रशिक्षण की प्रभावोत्पादकता के मूल बिन्दु को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वस्थ प्रतियोगिता समूहों के बीच हो तथा उन्हें सांकेतिक रूप से पुरस्कृत भी किया जा सकता है। समूहों के बीच उत्तरदात्यिव का कुशल विभाजन हो तथा न्यूनतम 4 दिन सांस्कृतिक संध्या का आयोजन भी किया जाये ताकि प्रशिक्षण को समग्रता प्रदान की जा सके। साथ ही ज्ञान के निखार के साथ ही शिक्षक-प्रशिक्षणार्थियों की सृजनात्मक क्षमताओं को भी अभिव्यक्ति के अवसर प्राप्त हों। प्रशिक्षण मे केन्द्रीय विद्यालय संगठन के प्रोटोकाॅल, मूल भावना, सर्वधर्मसमभाव आदि बिन्दुओं को प्रत्येक विषय-प्रस्तुति एवं गतिविधियों में स्वाभाविक रूप से ध्यान रखा जाये।
श्री महाजन ने ख्यात विषय-विशेषज्ञों को आहूत करने, संगणक आधारित सामग्री का विकास करने, समय की पाबंदी, प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी, सकारात्मक मानसिक भूख की संतुष्टि आदि पहलुओं पर प्रशिक्षण शिविर की सफलता को आधारित बताया।

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