इलाहाबाद के पथ पर ……….

allahabad station
(प्रस्‍थान-बिन्‍दु : इलाहाबाद जंक्‍शन रेलवे स्‍टेशन)
सर्जना, 24 मार्च, 2013। इलाहाबाद के पथ पर आप चलें तो निराला की आंखें रख पाना संभव नहीं, पर आंखों में वे घूमते जरूर हैं। संगम के लिए मैं रवाना हुआ तो दारागंज के उस मुहाने से दॉंई ओर मुड़ गया जहां से बांयी ओर दारागंज है यानी कि निराला जी की यादें। मुझे आनंद भवन में उतना आनंद नहीं जितना त्रासद आकर्षण इस गली में है। संगम स्नान के बाद यहां आने के स्वघोषित वायदे के साथ आगे बढ़ जाता हूं। गंगा का विशाल पाट। एक ही दिन, एक ही क्षण पर नहाने की शपथ लेकर दब मरने वाले श्रृद्धालुओं से आजकल लगभग रिक्त और कमोबेश शांत। रेत पर आगे चलते हुए पहुंचे। गंगा मैया के दरसन हुए। नाविक ने उतराई तय की और हम चढ गये। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को अर्थ देते हुए वह ले चला मुझे भुलावा देकर संगम, यानी मध्य की ओर धीरे-धीरे। गहराईयों से गुजरते हुए संगम उथला है जहां आप आराम से उतरकर डुबकी ले सकते हैं। इस बीच नदी की धार पर आपकी मुलाकात होती है ऐसे पक्षियों से जो धार पर बैठकर आपके फेंके हुए दाने मजे से चुगते है। दाना-पानी का यह रिश्ता अपनी जिंदगी में पहली बाद देखा। हरिवंश राय बच्चन याद आ गये – ‘नादान वहीं पर हाय जहां है दाना’।
संगम में उतरे तो गंगा, जमुना के बीच सरस्वती की खोज किये बगैर पूरी श्रृद्धा से झुक पड़े। मदन मोहन मालवीय जी का पंडा याद आ गया जो कहता था कि जहां सरस्वती ही लुप्त हैं वहां श्लोक शुद्ध कैसे बोल पायें। गंगा मैया का जल उसी को अर्पण किया। खूब नहाये मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह ‘छपाछप’। अंदर के पाप भी साफ करने के लिए गंगाजल पिया, रेत मली। जय – जय हो गई। गंगाजल का पात्र भरा और लौट पड़े। रेत के उस पार सड़क और किला। किले के भीतर अक्षय-वट। भारत का कल्पवृक्ष कहिए। खूब छुआ। नीचे सुरंग में गये उसकी जड़ों तक, यह देखने कि जो बड़े हैं वो कैसे खड़े हैं।
यहां से दारागंज पहुंचे और निराला जी की स्मृतियों से मिले।
इससे पिछले दिन, इलाहाबाद की सड़कों से गुजरते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन एवं संग्रहालय के दरस-परस किये। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के उस वाक्य का स्मरण हो आया जिसमें वे कहते हैं कि हिन्दी वह मूल है जिससे राष्ट्रीयता को सींचा जा सकता है। उनके स्मरण में बनाये गये राजर्षि टंडन चौक पर उनके सानिध्य में बैठा और चल दिया। रिक्शे वाले पर ऐसे स्नेह उमड़ रहा था जैसे सारे रुपये इसे दे दूं, पर सोचा पहले महादेवी जी से ले तो आऊं उनकी स्मृतियों का धन…………

sangam
(सरस्‍वती की खोज में : संगम तट का विहंगम दश्‍य )

nav me 0
(नदी आगे मिलती हैं)

nav me
(ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे : संगम की ओर)

snan
(संगम इसी का नाम है)

pakshee
(नादान वहीं पर हाय जहां पर दाना
– संगम पर पक्षियों का दाना चुगना अद्भुत)

akshya vat
( अक्षय वट को छूकर)

surang
(जडों तक : संगम स्‍थित किले में अक्षय वट के नीचे की सुरंग)

nimbu
(प्रयाग में स्‍थानीय इलाकों से बिकने आने वाले निंबू,
आकार में संतरे से बडे, जय हो)

sammelan 2
(निज भाषा उन्‍नति अहै – हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेनल भवन, इलाहाबाद,
स्‍थापित वर्ष 1910 )

sammelan prayag
(हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन संग्रहालय)

tandan
(राजर्षि की छाया में – श्री पुरुषोत्‍तम दास टंडन स्‍मृति चौक)

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One response to “इलाहाबाद के पथ पर ……….

  1. मौलिक साहित्यिक रचनाओं के लिए पीछे जाना ही होता है , क्या कारण है की अब सृजन मौलिक ना रह कर पूर्व में सृजित रचनाओं पर प्रहार मात्र ही रचनाकार होना रह गया है , या फिर मीडिया के निर्धारित तटबंधों के भीतर लिखना भर उद्देश्य मात्र रह गया है

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