‘निराला’-घर: स्मृति का ‘रवि हुआ अस्त’ ! //सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जहां रहे //संकरी गली का बंद मकान, ताला-शेष

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(इलाहाबाद के दारागंज इलाके मे वह मकान जहां कभी निराला जी रहा करते थे)

सर्जना, 24 मार्च,2013। इलाहाबाद के दारागंज इलाके की एक गली और उसकी एक और उप-गली, संकरी, बहुत संकरी, इतनी संकरी कि निराला के ओज और औदात्य के बल पर ही इसके संकरेपन का फैलाव महसूस किया जा सकता है। इस संकरी गली का एक बंद मकान, जहां निराला की स्मृतियों का रवि-अस्त ! होने की त्रासद सूचना देता है एक ताला।
काफी देर यहां बैठा सोचता रहा कि सर्जना की गंगा जो विश्व का विशालतम मैदान बना देती है वह किस तरह एक नाखून से निकलती है।
इतने में उनके पडोस के मकान से एक नवयुवक आ जाता है और कुछ आधी-अधूरी सूचनायें जो उसके बाबा से सुनता रहा बचपन से, बताने लगता है निराला जी के बारे में। कहता है कि यह मकान पडोस वाले वैद्यजी का हुआ करता था जिसमें निराला जी रहते थे। उनकी एक आदमकद पेंटिंग रखी थी इस घर में । आखिरी बार वह भी यहां से उठा ली गई, शायद किसी संग्रहालय के लिए। अब शेष है तो सिर्फ बाहर लटकाता ताला। दारागंज के पहलवान और हलवाई खूब निकटता महसूस करते रहे होंगे निराला से, पता नहीं उनके समय में या स्मृति-शेष हो जाने के बाद। सुनते हैं कि निराला जी ने इस गली के बाहर वाले हलवाई से कह रखा था कि जब भी कोई उनके निवास का पता पूछे तो पहले उसे मिठाई खिलाना फिर पता देना।
पूछा मैने भी लगभग उसी स्थल के हलवाई से कि निराला जी का मकान कहां है। उसने बताया ये पुराना मकान भी और मुख्य गली से काफी आगे चलकर बना हुआ उनके दत्तक पौत्र श्री अखिलेश त्रिपाठी का नया घर। लिखा वहां भी ‘निराला-निवास’ है। गया तो पता चला कि अखिलेश जी सपत्नीक बाजार गये हैं। उनकी बेटी ने मोबाइल नम्बर दिया तो बात की। उनके आने में विलम्ब था और कमबख्त रेलगाडी उसी दिन सही समय पर थी तो अखिलेश जी से रूबरू नहीं हो सके।
निराला जहां से गुजरते थे, जहां पहलवानी शौक फरमाते थे, या जहां अक्सर हुआ करते थे, वहां की सूचना देते कुछ सार्वजनिक स्थल मुख्य सड़क पर बनाये गये हैं, मसलन निराला चौक और उनकी एक प्रतिमा। निराला के नाम पर कुछ कवि सम्मेलन होने की सूचनाएं भी आप पढ सकते हैं दीवारों पर, फलेक्स के बैनरों पर। पर ये सब उस खालीपन को नहीं भर पा रहे थे जो उस मकान से बाहर की तरफ झांक रहा था और मेरे भीतर घुसा जा रहा था।
ठीक सूर्यास्त के समय धीरे-धीरे लौट रहा था दारागंज से यह सोचते हुए कि जहां शक्ति-पूजा हो वहां सूर्यास्त नहीं हो सकता। हुई जय हे! पुरषोत्तम नवीन निराला की।
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(निराला की अनुभूति शेष – वह गली)

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(समय का ताला – सबसे बडा, सबसे निराला)

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(दारागंज और संगम घाट के लिए मार्ग – एक गली सरस्‍वती की खोज में
और दूसरी सरस्‍वतीपु्त्र की)

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(गुजर गया वह वक्‍त – निराला जहां से गुजरते थे)

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ओ विप्‍लव के वीर……- दारागंज स्‍िथत निराला जी की प्रतिमा

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इलाहाबाद के पथ पर ……….

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(प्रस्‍थान-बिन्‍दु : इलाहाबाद जंक्‍शन रेलवे स्‍टेशन)
सर्जना, 24 मार्च, 2013। इलाहाबाद के पथ पर आप चलें तो निराला की आंखें रख पाना संभव नहीं, पर आंखों में वे घूमते जरूर हैं। संगम के लिए मैं रवाना हुआ तो दारागंज के उस मुहाने से दॉंई ओर मुड़ गया जहां से बांयी ओर दारागंज है यानी कि निराला जी की यादें। मुझे आनंद भवन में उतना आनंद नहीं जितना त्रासद आकर्षण इस गली में है। संगम स्नान के बाद यहां आने के स्वघोषित वायदे के साथ आगे बढ़ जाता हूं। गंगा का विशाल पाट। एक ही दिन, एक ही क्षण पर नहाने की शपथ लेकर दब मरने वाले श्रृद्धालुओं से आजकल लगभग रिक्त और कमोबेश शांत। रेत पर आगे चलते हुए पहुंचे। गंगा मैया के दरसन हुए। नाविक ने उतराई तय की और हम चढ गये। जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को अर्थ देते हुए वह ले चला मुझे भुलावा देकर संगम, यानी मध्य की ओर धीरे-धीरे। गहराईयों से गुजरते हुए संगम उथला है जहां आप आराम से उतरकर डुबकी ले सकते हैं। इस बीच नदी की धार पर आपकी मुलाकात होती है ऐसे पक्षियों से जो धार पर बैठकर आपके फेंके हुए दाने मजे से चुगते है। दाना-पानी का यह रिश्ता अपनी जिंदगी में पहली बाद देखा। हरिवंश राय बच्चन याद आ गये – ‘नादान वहीं पर हाय जहां है दाना’।
संगम में उतरे तो गंगा, जमुना के बीच सरस्वती की खोज किये बगैर पूरी श्रृद्धा से झुक पड़े। मदन मोहन मालवीय जी का पंडा याद आ गया जो कहता था कि जहां सरस्वती ही लुप्त हैं वहां श्लोक शुद्ध कैसे बोल पायें। गंगा मैया का जल उसी को अर्पण किया। खूब नहाये मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह ‘छपाछप’। अंदर के पाप भी साफ करने के लिए गंगाजल पिया, रेत मली। जय – जय हो गई। गंगाजल का पात्र भरा और लौट पड़े। रेत के उस पार सड़क और किला। किले के भीतर अक्षय-वट। भारत का कल्पवृक्ष कहिए। खूब छुआ। नीचे सुरंग में गये उसकी जड़ों तक, यह देखने कि जो बड़े हैं वो कैसे खड़े हैं।
यहां से दारागंज पहुंचे और निराला जी की स्मृतियों से मिले।
इससे पिछले दिन, इलाहाबाद की सड़कों से गुजरते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन एवं संग्रहालय के दरस-परस किये। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के उस वाक्य का स्मरण हो आया जिसमें वे कहते हैं कि हिन्दी वह मूल है जिससे राष्ट्रीयता को सींचा जा सकता है। उनके स्मरण में बनाये गये राजर्षि टंडन चौक पर उनके सानिध्य में बैठा और चल दिया। रिक्शे वाले पर ऐसे स्नेह उमड़ रहा था जैसे सारे रुपये इसे दे दूं, पर सोचा पहले महादेवी जी से ले तो आऊं उनकी स्मृतियों का धन…………

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(सरस्‍वती की खोज में : संगम तट का विहंगम दश्‍य )

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(नदी आगे मिलती हैं)

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(ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे : संगम की ओर)

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(संगम इसी का नाम है)

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(नादान वहीं पर हाय जहां पर दाना
– संगम पर पक्षियों का दाना चुगना अद्भुत)

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( अक्षय वट को छूकर)

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(जडों तक : संगम स्‍थित किले में अक्षय वट के नीचे की सुरंग)

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(प्रयाग में स्‍थानीय इलाकों से बिकने आने वाले निंबू,
आकार में संतरे से बडे, जय हो)

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(निज भाषा उन्‍नति अहै – हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेनल भवन, इलाहाबाद,
स्‍थापित वर्ष 1910 )

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(हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन संग्रहालय)

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(राजर्षि की छाया में – श्री पुरुषोत्‍तम दास टंडन स्‍मृति चौक)

‘‘कुंई जैसी गहराई मिल जाएगी’’: अनुपम मिश्र जी से रूबरू//जब अनुपम मिश्र जी ने पढ़ाया अपना पाठ ‘राजस्थान की रजत बूंदें’

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सर्जना, 22 फरवरी, 2013। कक्षा 11 वीं के मेरे विद्यार्थियों के लिए यह सुखद और उत्साहजनक है कि स्वयं अनुपम मिश्र जी ने न केवल मेरे साथ उन जिज्ञासाओं पर बातचीत की जो आप लोग कक्षा में पूछा करते हैं बल्कि लगभग 20 मिनिट तक उन्होनें खुद रेखाचित्र बनाकर उस पाठ की बारीकियों को समझाया।
22 फरवरी की शाम ग्वालियर की एक पहाड़ी पर स्थित पर्यावरण-मित्र उपनगर ‘विवेकानंद नीडम’ के शांत और सुरम्य वातावरण में पत्रकार, संस्कृतिकर्मी एवं शिक्षाविद् आदरणीय श्री जयंत तोमर तथा साथी श्री अरविंद जी के साथ मैं जा पहुंचा। जयंत जी ने एक दिन पूर्व बताया था कि अनुपम जी ग्वालियर आ रहे हैं, और चूंकि ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ मैं कक्षा 11 वीं के विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं, तो विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को साथ समेटे श्री अनुपम जी से भेंट और अगर हो सके तो चर्चा की उम्मीद लिये जा पहुंचा।
हम लोग जब पहुंचे तो अनुपम जी की महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। इस दरम्‍यान नीडम के परिवेश और औषधीय हवाओं का आनंद लेते रहे। बैठक के बाद जैसे ही अनुपम जी बाहर निकले, जयंत जी ने मेरी उनसे शैक्षणिक भेंट-परियोजना के बारे में बता दिया। आदरणीय अनुपम जी की उदारता देखिये कि तत्काल स्थल का चुनाव कर बैठ गए और निकाल ली अपने थेले से काली कलम, लगे रजत बूंदों का मर्म हमें समझाने। पाठ के बारे में जो भी सवालात मैं पूछ रहा था, बड़ी तल्लीनता से वे हमें बारीकियां समझाते जा रहे थे। सवाल कुंईयों की वैज्ञानिक संरचना का भी था और चेजारो की कार्यप्रणाली का। वे चेजारो जो कई वर्षों की परम्परा से कुंईयों के निर्माता बने, उनके वर्तमान जीवन के बारे में पूछा। अनुपम जी उतने ही खरेपन के साथ पाठ को समझा रहे थे जितने खरेपन से वे तालाबों के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं।
ये बहुमूल्य समय हमने लिया उस पाठ को आप तक ठीक से पहुंचाने के लिए जिसके बारे में एनसीईआरटी की आपकी पुस्तक का संपादक मंडल लिखता है: – ‘‘राजस्थान की रजत बूँदें। यह रचना एक राज्य विशेष राजस्थान की जल समस्या का समाधान मात्र नहीं है। यह जमीन की अतल गहराइयों में जीवन की पहचान है।यह रचना धीरे-धीरे भाषा की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जो कविता नहीं है,कहानी नहीं है, पर पानी की हर आहट की कलात्मक अभिव्यक्ति है। भाषा में संगीतमय गद्य की पहचान है। इस पहचान से विद्यार्थियों का ताल मिले, यह वितान की उपलब्धि होगी।’’
जब हमने अनुपम जी से आप सबके लिए संदेश मांगा तो उन्होने लिखा कि – ‘‘अपने समाज में, गांव में शहर में सबके साथ मिलकर अपने आसपास की चीजों को समझने की कोशिश करो। सब जगह कुंई जैसी गहराई मिल जायेगी। शोध नहीं श्रृद्धा रखो समाज पर।‘‘
वापस आते वक्त मैं सोच रहा था कि कुछेक व्यक्तित्वों में ही शायद ये गहराई होती है जैसे कि अनुपम जी….।
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