ये फोन

: रामसेवी चौहान की एक कविता


ये फोन भी क्‍या चीज है
समझो तो बड़ी नाचीज है ]
किसी को कभी कुछ भी सुना सकता है
हँसते हुए को कभी भी रूला सकता है
घाव कितने भी पुराने हों कुरेदता क्षण में है
कई सीधे-सादों को भी
भेज देता रण में है
लोग कोसों बैठे भी सुना देते हैं
दुखियों को दूर रहते भी रूला देते हैं
लाख कोशिश करो दूर रहने की
सोचते हैं जरूरत न पड़े कुछ कहने की
फिर भी नहीं जी सकते रहकर मौन
क्‍योंकि हर आदमी के पास है फोन
लोग फोन से उखाड़ते हैं ‘गढ़े मुर्दों को’
गर होते नम्‍बर तो
उठा देते गढ़े मुर्दों को
बताए इन पुतलों को यह कौन
जमाना विज्ञान का
हर आदमी रखता है फोन

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