दो लघुकथाऍं: ‘सरकारी पेड़’ और ‘कम्‍मू की डुकरिया’

‘सरकारी पेड़’

‘‘क्यों रे क्या कर रहा है !!!!!’’
सराय चौकी की पिछली दीवार के किनारे से झांकते हुए सिपाही ने तमककर कहा।
‘‘बेरि टोरि रओं ऐं’’
(बेर तोड़ रहा हूँ)
‘‘ये सरकारी बेर हैं रे!!!!’’
‘‘सिरकारू ऐं ?’’
(सरकारी हैं क्या ?)
‘‘हां’’
‘‘तो……..’’
‘‘तोड़ मत….!! और क्या!!!!’’
‘‘तईं …..जि …..का ……सिरकारू एँ’’
(तो…..ये…..क्या सरकारी हैं?)
‘‘और क्या बक रहा हूं ?’’
‘‘सिरकारू ऐं तोऊ रोकतो????????’’
(सरकारी हैं तो भी रोकते हो?)
……कहता हुआ ठेंगना-स, काला लड़का अपने अण्डरवियर का नाडा पकड़े हुए दूसरी तरफ कूदकर भाग गया।

कम्मू की डुकरिया’

कम्मू की डुकरिया मर गई। डुकरिया की आत्मशांति के लिए मृत्युभोज-परामर्शदात्री-अघोषित-समिति से निम्नलिखित परामर्श प्राप्त हुए-
एक- ‘‘घरघन्ना नई चूलि’’
(हर घर से एक आदमी का नहीं, सपरिवार निमंत्रण हो)
दो- ‘‘पन्द्रे बोरी गलाऊ’’
(15 बोरियां शक्कर के अनुपात में भोजन बने)
तीन – ‘‘नोन ते हिसाब लगाऊ, तीनि कट्टा नोन)
(नमक से अनुपात मिला लो, 3 कट्टे नमक से जितनी सब्जी बने उसी अनुपात से हर माल बने)
चार – ‘‘घलिमा मालपुआ, छुट्टा’’
(मालपुआ छककर, खूब, जितना चाहें)
………अंतिम फैसले की जानकारी नहीं। कम्मू के द्वार से साफा वाले, मूंछ वाले, अलग-अलग पुरा वाले ‘प्रतिष्ठित’ पंच मामला फायनल कर चले गये।
तेरहवीं निबट गई।
कम्मू भी निबट गया।

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कविता : मीडिया-विमर्श …..’लो-प्रोफाइल’

कविता : मीडिया-विमर्श

लो-प्रोफाइल
वह
न तो ब्यूरो में जा पा रहा है
न सिटी-संस्करण में
खास ओहदे पर
यदा-कदा मिल जाती है
लूप लाइन – डेस्क
या फिर लिखते रहो
फीचर टाइप कुछ!
इसमें मुख्य-धारा नाम का
नहीं दिखता उसे कोई फ्यूचर
वह मेहनती है
तथ्यान्वेषी है
प्रभावित कर सकता है नीतियां
सत्ता-शासन के आवरण को
उघाड़कर
मगर पत्र-समूह –
जिसे अब ‘कम्पनी’ कहा जाने लगा है
उसमें वह
स्वत्वाधिकारी के
जन्मदिन, विवाह दिन इत्यादि
याद नहीं रख पाता
हाई-प्रोफाइल पार्टियों में
मैनेजिंग डायरेक्टर को
नहीं कर पाता रिसीव
वह गजब का पत्रकार है,
ऐसा उसे लगता है, औरों को भी
मगर,
‘कम्पनी’ की परिभाषा में
व्ह
‘लो-प्रोफाइल’ है………

ये बुढ़िया शबरी जैसी,राम भी आते होंगे………

”पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।”


कर्नाटक में बैल्‍लारी जिले के हास्‍पेट से हम्‍पी जाकर जब आप तुंगभद्रा पार करते हैं तो हनुमनहल्‍ली गॉंव की ओर जाते हुए आप पाते हैं शबरी की गुफा, पंपा सरोवर और वह स्‍थान जहाँ शबरी राम को बेर खिला रही है। आप पायेंगे कि बस यह घटित होने ही जा रहा है आपके सामने। मैं यहॉं पहुंचा तो पर्यटकों के बाहर मैदान में भोजन बन रहा था। पंपा सरोवर में असंख्‍य श्‍वेत कमल खिले थे। जीवन में पहली बार कमल को छूकर देखा था। एक व्‍यक्‍ित ने कुछ रूपये लेकर कमल और कमलगट्टा लाकर दिये, जो मैंने सहेज कर रख लिए। सामने मंदिर है। शबरी के घर में प्रवेश करता हूं। तो लगता है आज महाप्रभु पधारने वाले हैं कुछ हाथ बंटा लूं, अम्‍मा अकेली है। बगल में ही वह कक्ष भी है जहां के बारे में कहा जाता है कि यहीं बैठकर राम जी ने शबरी के हाथों बेर खाए।

अस्‍तु, हमारे पौराणिक चरित्रों में शबरी विशिष्‍ट है। दालित्‍य और स्‍त्रीत्‍व के दोहरे अभिशाप को भोगती। यहां तक कि त्‍यक्‍त। शबरी को ना तो समीक्षा करना आती है न परीक्षा करना। गुरू से कोई दार्शनिक बहस भी नहीं। अदभुत मायथॉलॉजीकल चरित्र है…… सुतीक्ष्‍ण के बाद। राम आयेंगे। तो खोज शुरू नहीं की। प्रतीक्षा शुरू कर दी। कोई समीक्षा नहीं, परीक्षा नहीं केवल प्रतीक्षा। प्रतीक्षा का परिणाम क्‍या हुआ। लार्ड हिमसेल्‍फ केम टु हर। सिर्फ आये ही नहीं, बेर खाने की कहानी भी विख्‍यात हो गई। ये प्रतीक्षा का परिणाम है। हमारी दुनियां में प्रतीक्षा सूची के परिणाम नहीं निकला करते। सत्‍य की दुनियां में प्रतीक्षा ही परिणाम है। इसका कारण क्‍या है…….प्रतीक्षा की अवधि, ध्‍यान की अवधि है, क्‍यों कि प्रतीक्षा की अवधि कुछ भी न करने की अवधि है, और न करने की अवधि की ध्‍यान की उपलब्‍िध है। कर्ममुक्‍ित की अवधि है। इसलिये प्रतीक्षा का परिणाम महाप्रभु के मुख से नवधाभक्‍ित का उपदेश है।

नाथ सैल पर कपिपति रहई………….

अंजनि पर्वत, ऋष्‍यमूक पर्वत और तुंगभद्रा के पर्वतीय अंचल की सैर……

वही सैल जहॉं से राम को सुग्रीव की मित्रता मिली, इससे भी बढकर उन्‍हें हनुमान से भक्‍त मिले और, सबसे बढकर ये कि शबरी को अपने राम मिले। जी हॉं, हम बात कर रहे हैं कि कर्नाटक में हम्‍पी के निकट स्‍थित सांस्‍कृतिक-पर्यटन के महत्‍वपूर्ण्‍ा स्‍थल ऋष्‍यमूक पर्वत, अंजनि पर्वत, मतंग ऋषि का आश्रम और तुंगभद्रा नदी के उस पार वह गहन प्रांतर जहॉं से राम के सैन्‍य संगठन को मुक्‍त आकाश मिला।

(हनुमान जी के जन्‍मस्‍थल से नीचे की ओर एक विहंगम दृश्‍य : सर्जना)
कर्नाटक के बैल्‍लारी जिले से सडक मार्ग से हॉस्‍पेट पँहुचने पर आप यहॉं बडी ही आसानी से उपलब्‍ध स्‍थानीय वाहनों से यहॉं तक का रास्‍ता तय कर सकते हैं। अंजनि पर्वत वह स्‍थान है जिसे हनुमान जी का जन्‍मस्‍थल कहा जाता है। ऐसे तो देश में ऐसे कई स्‍थान विशेषकर महाराष्‍ट्र से शुरू करते हुए दक्षिण प्रांतों में, ऐसे हैं जिन्‍हें हनुमान जी के जन्‍मस्‍थल के रूप में धार्मिक मान्‍यता है, तथापि इस स्‍थल को मिथकीय इतिहास के भूगोल के अनुसार अधिक प्रामाणिक माना जाता है। अंजनि पर्वत की ऊँचाई काफी अधिक और आप थकान यदि महसूस नहीं कर रहे हैं तो आशय यह है कि आप अधिक उत्‍साहित हैं। हम लोग ऊपर पँहुचे तो रामचरित मानस पाठ चल रहा था, अयोध्‍या के एक संत यहॉं स्‍थान के प्रबंधक हैं। यहॉं के नजदीकी गॉंव का नाम है ‘हनुमनहल्‍ली’ कन्‍नड के मुताबिक इसका अर्थ है – हनुमान का गॉंव ।

(अंजनि-पर्वत पर चढने के लिए प्रवेश द्वार)
ऊँचाई से तुंगभद्रा नदी का मनोरम दृश्‍य है। श्‍यावर्णीय पथरीले पर्वतों की श्रंखला उस भय का आभास करा देती है जिसको महामानव राम ने सहज ही जीत लिया था।
नीचे उतर कर आगे चलें तो मनोरम पंपा सरोवर पहुँचा जा सकता है। स्‍थल से ओर अधिक आगे की यात्रा करेंगे तो ऋष्‍यमूक पर्वत पर जा सकते हैं। एक ओर फटिक सिला है जहॉं राम ने विश्राम किया और मानस में यहॉं का ऋतु वर्णन है। अस्‍तु, हम लोग देर शाम होने के कारण यहीं से वापस लौट आये। आगे के स्‍थलों पर फिर कभी। …..

(अंजनि-पवर्त स्‍थित हनुमंत लाल का दुर्लभ दर्शन, फोटो लेते समय फटकार मिली : सर्जना)