इकत्तीस छिपकलियों का भय :

31 साल पहले का एक धुँधला पन्ना

‘‘जमाने के सलीब पर / लटका हुआ मैं
और मेरा अहं : / इकत्तीस छिपकलियों के भय से
सकपकाती प्रतिभा के साथ / पिछले दिनों मेरी शक्ति
रिस-रिस कर चू गई / और अनेक भावात्मक आँखें
मित्र बनकर देखती रहीं / आज
प्रश्‍न है – / इन कीडे मच्छरों के
अभिनंदन स्वीकार करने का / रह जाता है अनुत्तरित।’’
(कवि गोपाल सिंह)

पुस्तकालय के एक पुराने धूल जमे खाने से धूल झड़ाकर उठाता हूँ एक किताब। पुरानी और पतली किताब। नीले रंग की जिल्द लाल धूल से एक अजीब रंग की हो गई है। लेकिन पूरी तरह सुरक्षित। पुराने समय की प्रिंटिग एक अलग तरह का आकर्षण मेरे लिये पैदा कर रही है। किताब का पहला पन्ना पलटता हूँ तो डूबता चला जाता हूँ। मेरे लिए यह किताब एक खास तरह की हो जाती है। लगता है इकत्तीस साल पहले जा खड़ा हूँ। मैं चौंक उठता हूँ इन कविताओं को पढ़ते हुए………..। क्या इतिहास एक बार फिर उसी मुकाम पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ दो व्यक्ति अलग-अलग समय के होते हुए भी एकाकार हो जाते हैं।
ये किताब है ‘रक्त-संध्या‘। पहले पन्ने पर ही दर्ज है कवि का नाम – गोपाल सिंह, स्नातकोत्तर अध्यापक (हिन्दी), डोनीमलाई कर्नाटक। किताब के छपने की तारीख है – 24 जुलाई 1978। किताब अरविंद प्रिंटिंग प्रेस हैदराबाद में छपी।
कवि गोपाल सिंह ‘अपनी बात‘ में लिखते हैं- ‘’रक्त-संध्या की कुछ कविताएँ 1970 के पूर्व की हैं तब में रांची विश्‍वविद्यालय का छात्र था। संभावना, ‘पुटुष‘ ‘स्थापना‘ आदि पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं। स्थानांतरण के कारण कई कविताएँ अव्यवस्थित हो गईं जिनका प्रकाशन नहीं करा सका। मैंने इकतीस वर्ष पार करने के अवसर पर अपनी कविताओं के प्रकाशन का निर्णय किया। इस समय डोनीमलाई (कर्नाटक) में हूँ। यहाँ लिखी गई अधिकांश कविताएँ इस संकलन में शामिल हैं। इसलिए ‘रक्त-संध्या‘ पढ़ते समय यह परिवेश ही आधार होना चाहिए।‘‘ (गोपाल सिंह)
इस तरह पता चलता है कि कवि गोपाल सिंह 31 साल के हो गये थे तब ये किताब सामने आयी थी। यह बात सन् 1978 की है। यह मेरा जन्मवर्ष था। और इस किताब के 31 साल के होने पर सन् 2009 में, मैं उसी पद पर आया जिस पर 31 साल पहले श्री गोपालसिंह थे। यह एक ऐसा साहित्यिक संयोग है जो मेरे लिए विशेष है। उनकी अनेक कविताओं से उस समय यहाँ के क्षेत्र की सुविधाविहीन स्थितियों का पता चलता है। ऐसे कठिन समय में वे यहाँ शिक्षक रहते हुए साहित्य-साधना करते रहे। यह सोचकर ही हृदय भर आता है। उनकी एक कविता में ये 31 छिपकलियों का भय जो उनकी कविताओं में है वह उनकी उम्र के 31 सालों के अलावा दरअसल उस समय यहां की सुविधाहीनता के परिवेश को भी दर्शाता है। उनकी ‘रोजनामचा‘ कविता देखिये-
‘‘मेरे बिस्तर पर /पूरा परिवार /पुस्तकालय / दफ्तर और दवाखाना है : /मेरा रोजनामचा / अब / कड़वी या कषैली /मीठी या तिक्त /गंध नहीं आती/सब बकबासनुमा है/जिंदगी का विस्तार / या / संकुचन / फाहियान से / सोल्झेनित्सिन या/ हेमिंग्वे तक/रहट से उड़नतस्तरी तक / कूद-फाँदकर /बिस्तरनुमा होना है।‘‘
वास्तव में गोपालसिंह जी का अध्ययन और जानकारी भी इसी प्रकार विस्तृत थी। उनके सामने हम आज की पीढ़ी का अध्ययन और ज्ञान बहुत सीमित लगता है। इतना ही नहीं पुस्तक यह भी बताती है कि किस प्रकार उस युग की परिस्थितियों के प्रति यह शिक्षक सचेत था। उनकी एक और कविता है ‘बाजार‘। आज जबकि बाजारवाद का हल्ला है, 31 साल पहले की यह कविता देखिये-
‘‘ यह / बाजार है / यहाँ /सभी चीजें /बिकती हैं / भाषण / प्रमाण-पत्र / टूटता विश्‍वास / खुदगर्जी / दम तोड़ती आस्तिकता-नैतिकता / लापरवाही / बंजारापन/ अंजीर / आम / कपड़ा / और भूख भी। / चीजें गूँगी हैं / विक्रेता बहरा / तमाशाई अंधा /सिर्फ क्रेता की आँखें सतेज हैं / मालूम नहीं कि / लोग चीजों की दोहरी कीमतें क्यों चुकाते हैं‘‘
गोपाल सिंह जी ‘परिवेश‘ कविता एक लम्बी कविता है जो अनायास ही मुक्तिबोध की याद दिला जाती है। सत्तर-अस्सी के दशक का यह परिवेश रूप बदलकर फिर हमारे सामने है –
‘‘घिरे हैं हम सब एक परिवेश से/तकिया कलाम यह परिवेश……….कपड़ा वही है / दोहरी पीठ के बदले में /दोहरी कालर की कमीज है/सिलाई शुल्क वही है / सिर्फ रोशनी नई है / इतिहास नहीं‘
इतिहास नहीं बदलता। यह फिर – फिरकर हमें उन्हीं मोड़ों पर लाकर खड़ा करता है। गोपाल सिंह जी प्रबुद्ध और संघर्षशील शिक्षक रहे होंगे। आजकल वे जहाँ भी होंगे संभवतः सेवानिवृत होकर स्वस्थ जीवन यापन कर रहे होंगे। कविताओं मे उनका युवा-आक्रोश से भरा चेहरा ही हमारे सामने है। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूँ जहाँ सुविधाओं की परवाह न करते हुए गोपालसिंह जी जैसे शिक्षकों ने बैठकर इसकी गरिमा बढ़ाई। बार-बार सोचता हूँ क्या हमारी पीढ़ी अपने अग्रजों का उत्तराधिकार लेने में सफल हो रही है। सन् 1978 में ही ‘चकोर‘ सूर्यप्रताप सिंह, एंड्रूज गंज, नयी दिल्ली-49 इस किताब की भूमिका में लिखते हैं- ‘‘गोपाल सिंह केन्द्रीय विद्यालय संगठन के उन रचनाधर्मी अध्यापकों में से हैं जो विद्यार्थी, श्यामपट और ग्रहकार्य के अतिरिक्त अपनी प्रतिभा और मेहनत का रचनात्मक उपयोग करना जानते हैं। देश को ऐसे अध्यापकों की आवश्‍यकता है – विशेषकर अहिन्दीभाषी प्रदेशों में। हिन्दी भाषा आज जिस स्थिति से गुजर रही है, जैसी धार और मार सह रही है उसका अंदाज दिल्ली या पटना या भोपाल से नहीं लगाया जा सकता। वह तो डोनीमलाई जैसी जगह का हिन्दी-प्रेमी ही बता सकता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहुँच जाने के बाद भी रसोई में वह अछूत है। देश की मानसिकता बदलेगी- अध्यवसाय चाहिए।‘‘(चकोर सूर्यप्रताप सिंह)
आज इकत्तीस छिपकलियों का डर नहीं। मेरा परिवेश सर्वसुविधायुक्त है। पर मैं अनुभव कर सकता हूँ इस भय को। आज के इस भय में अनेक परिवेशगत भय छुपे हैं। इस देश और समाज के। नमन करता हूँ गोपाल सिंह जी को। 31 – 31 साल के दो कालखंडों को ।

समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे

: तीसरे सप्‍तक में कुँवर नारायण…………..

‘तीसरा सप्‍तक’ उठाता हूँ। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रथम संस्‍करण 1959 में छपा, अज्ञेय के सम्‍पादन में। मेरे हाथ में चौथा संस्‍करण अगस्‍त 1979 है। हर परीक्षा में सप्‍तकों पर प्रश्‍न रहा करते, इसलिए सप्‍तक और अज्ञेय के नाम के प्रति एक आकर्षण इन सवालों ने बना रखा था। अज्ञेय लिखित भूमिका में डूबते-तिरते हुए नामों की सूची पर नजर डालता हूँ वे नाम जो हर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते रहे………..5 वें क्रम पर जाकर ठहरता हूँ, …… कुंवर नारायण। पिछले दिनों उनकी ज्ञानपीठ रचना ‘बाजश्रवा के बहाने पढ़ रहा था। ‘तीसरा सप्‍तक’ हाथ आया तो इस नजरिये के साथ प्रवेश किया कि देखें तो सही शुरूआती कुंवर नारायण से ज्ञानपीठ कुंवर नारायण तक सर्जना के सोपान किस तरह चढ़े हैं।
कुंवर जी के परिचय और वक्‍तव्‍य( 146 से 151) में जो बिंदास लगा वह रेखांकित कर लिया-
एक – ‘’शिक्षा की जो पद्धति स्‍कूल, कॉलेज या विश्‍वविद्यालय में रही, उस से मन सदा विद्रोह करता रहा, इस लिए शायद स्‍कूली अर्थ में कभी भी बहुत उत्‍कृष्‍ट विद्यार्थी नहीं हो सका।‘’
दो- आरम्‍भ से ही पढ़ने और घूमने का बहुत शौक रहा है, और दोनों के लिए पर्याप्‍त अवसर भी मिलता रहा। सन् 1955 ई में चेकोस्‍लोवाकिया, पोलैण्‍ड, रूस और चीन का भ्रमण किया-‘ यह कइ तरह से महत्‍वपूर्ण रहा’
तीन – ‘कविता पहले-पहल सन् 1947 में अंगरेजी में लिखना आरम्‍भ किया, पर शीघ्र ही हिन्‍दी की ओर प्रव्रत्‍ति हुई और तब से नियमित रूप से हिन्‍दी में लिखने लगा।‘
चार – सन् 1956 से, उस पत्रिका के बन्‍द होने तक, युगचेतना के सम्‍पादक मण्‍डल में रहे। अब मोटर के व्‍यवसाय में मुब्‍ितला रहते हैं – और अपनी इस व्‍यस्‍तता से स्‍वयं त्रस्‍त हैं : ‘ फिक्रे-दुनिया में सर खपाता हूँ, मैं कहां और ये बवाल कहां’
पांच – ‘’साहित्‍य जब सीधे जीवन से सम्‍पर्क छोड़कर वादग्रस्‍त होने लगता है, तभी उस में वे तत्‍व उत्‍पन्‍न होते हैं जो उस के स्‍वाभाविक विकास में बाधक हों। जीवन से सम्‍पर्क का अर्थ केवल अनुभव मात्र नहीं, बल्‍िक वह अनुभूति और मनन-शक्‍ित भी है जो अनुभव के प्रति तीव्र और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया कर सके।‘’
छह- ‘ जीवन के इस बहुत बडे ‘कार्निवाल’ में कवि उस बहुरूपिये की तरह है जो हजारों रूपों में लोगों के सामने आता है, जिस का हर मनोरंजक रूप किसी न किसी सतह पर जीवन की एक अनुभूत व्‍याख्‍या है और जिस के हर रूप के पीछे उस का एक अपना गम्‍भीर और असली व्‍यक्‍ित्‍व होता है जो इस सारी विविधता के बुनियादी खेल को समझता है।‘’

कुंवर जी कुल 21 कविताएं तीसरे सप्‍तक में हैं। कुछ ही कविताएं समकालीन कविता के उस रूप का संकेत करती हैं जिसके लिए कुंवर नारायण जाने जाते हैं। मिथकीय चेतना के उच्‍चतम सोपान पर पहुंचे कुंवर नारायण की ‘सम्‍पाती’ जैसी कविता इस लिहाज से रेखांकनीय हो जाती है। शब्‍दों की जो मितव्‍ययता कुंवर जी की खास पहचान है उसका संकेत उनकी प्रारंभिक कविताओं से ही चला आया है। कुछ कविताएं आम आदमी की उदासी की हैं तो कुछ प्रक़ति का नये ढंग से अवलोकन, कुछ बाल कविताएं सी प्रतीत होती हैं, मगर हैं प्रौढ सत्‍य को लेकर। मुझे सर्वाधिक प्रभावित करने वाली दो कविताएं यहां हैं – ‘सम्‍पाती’ और ‘घर रहेंगे’
एक – ‘गहरा स्‍वप्‍न’ : ‘’सत्‍य से कहीं अधिक स्‍वप्‍न वह गहरा था / प्राण जिन प्रपंचों में एक नींद ठहरा था’’
दो – ‘दो बत्‍तखें : ‘दोनों ही बत्‍तख हैं / दोनों ही मानी हैं / छोटी-सी तलैया के/ राजा और रानी हैं’’
तीन- सम्‍पाती : ‘ धीमा कर दो प्रकाश/ घायल, सूर्योन्‍मुख,/ असंतुष्‍ट, उत्‍पाती:/फेनों का विप्‍लव बन/ लहरों पर तितर-बितर/ दग्‍ध-पंख सम्‍पाती :/ठण्‍डे अंधेरे के एक सुखद फाहे को/ जलती शिराओं पर ….. /धीमा कर दो प्रकाश । / मोम की दीवारें /गल न जायें,/ सपनों के लाक्षागृह/ / जल न जायें, / प्‍यार के पैमाने / -दृवित नेत्र – / छल न जायें…./ धीमा कर दो प्रकाश / कॉंच के गुब्‍बारे, / सोने की मछलियॉं /कुछ नकली चेहरे / कुछ मिली-जुली आकृतियाँ, / ओस की बूँदों-से चमक रहे रजत-द्वीप / घुल न जायें…../ धीमा कर दो प्रकाश । / पर्णकुटी की छाया शीतल है, / पॉंवों के नीचे फिर धरती का दृढ़ तल है/ गर्म देह/ नील नयन / क्षितिज पार / उड्डयन,/ प्राणों में एक जलन / उस ज्‍वलन्‍त ऑंधी की/ स्‍मृतियॉं / फिर न मिल जाऍं / धीमा कर दो प्रकाश।’
चार : ”घर रहेंगे, हमीं उन में रह न पायेंगे : समय होगा, हम अचानक बीत जायेंगे :
अनर्गल जिंदगी ढोते हुए किसी दिन हम एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जायेंगे।
मृत्‍यु होगी खड़ी सन्‍मुख राह रोके, हम जगेंगे यह विविध, स्‍वप्‍न खोके, और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।”

मंथन : दो, यानी कि एक बार फिर बैठे साथ-साथ ….बनारस में


यह बडे़ गौरव की बात है कि दस संभागों से आए 43 प्रतिभागियों का के.वि. डी. रे. का. वाराणसी में सेवाकालीन प्रशिक्षण का आयोजन 23.12.11 से 01.01.12 के मध्य सम्पन्न हुआ है। इस प्रकार के प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षा-जगत् में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु का विविध दृष्टिकोंणों से परिचय, आपसी विचार-विमर्श पाठ्यक्रम में आए पाठों से परिचय तथा अन्यान्य विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। इन उद्देश्यों में निदेशक, सह-निदेशक, संसाधक, अतिथि व्याख्याता तथा प्रतिभागी स्वयं सहायक होते हैं। प्रतिभागियों ने आशा एव ंअपेक्षा है कि उन्होंने अपने दस दिन के प्रवास में जो नया ज्ञान तथा शिक्षण की नवीनतम-तकनीक प्राप्त की है उसे अपने शिक्षण में शिक्षक जब प्रयोग में लाएँगे तभी इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों की उपादेयता व उपयोगिता सिद्ध होगी। मैं निदेशक के रूप में आशा करता हूँ कि इस प्रशिक्षण ने आपको नई ऊर्जा दी होगी, आपको एक नई समझ दी होगी, आपका नवीनीकरण किया होगा जो आपके शिक्षण में अवश्य झलकेगा।
निदेशक के रूप में मैं, के.वि.सं. के अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने हमारे विद्यालय को इस कार्यक्रम के आयोजन के योग्य समझा व समय-समय पर दिशा-निर्देश दिए, जिनसे यह आयोजन सफल हो सका।

शुभकामनाओं सहित,,
(विजय कुमार)
शिविर-निदेशक

‘अद्भुत अंतविर्रोधों के बीच सृजन का तीर्थ है काशी’ – प्रो यादव
उद्घाटन : समाचार

वाराणसी, 23 दिसम्बर।(सर्जना)
सामाजिक आंदोलन किसी भी साहित्य धारा की जनचेतना का निर्माण करते हैं। काशी एक ऐसा नेतृत्वकारी स्थल है जहॉं अनेक अंतविर्रोधों के बीच सृजन की अनेक धाराएं पैदा हुई हैं। काशी ने विभिन्न साहित्यिक आंदोलनो की अगुआई है।
उक्त उद्गार काशी हिन्दू विवि के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रो चौथीराम यादव ने केविसं के स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण के शुभारंभ अवसर पर बाजारवाद के युग में भक्तिकालीन साहित्य के सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन विषय पर अपने व्याख्यान के दौरान व्यक्त किये। उन्होनें कहा कि भक्तिकाल की अंतर्रात्मा सामाजिक न्याय की लड़ाई थी। इस आंदोलन का नेतृत्व हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के दलित वर्ग ने किया। उन्होने कहा यह भी गौरतलब है कि काशी और कांची, जहां ये आंदोलन मुख्य रूप से पनपे, वे दोनो ही सूती वस्त्रोद्योग के केन्द्र थे। उन्होने कहा कि भक्तिकालीन साहित्य का मूल्यांकन समाजशास्‍त्रीय ढंग से किया जाना ही उचित होगा। आज बाजारवाद, विज्ञापन और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सांस्कृतिक हमले का युग है जिसके बीच भक्तिकालीन आंदोलन के मूल्य ही रास्ता दिखा सकते हैं।

दिनांक 23.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन


हिन्दी के स्नातकोत्तर शिक्षकोंका सेवाकालीन प्रशिक्षण 23.11.2012 को के.वि. डीरेका वाराणसी में सम्पन्न हुआ। उद्घाटन काशी हिन्दू विवि के अवकाशप्राप्त प्रो. डॉ. चौथीराम यादव की अध्यक्षता में हुआ। सर्वप्रथम मुख्य अतिथि महोदय ने सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा अन्य अधिकारियों ने पुष्पार्पण किया। माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलन के समय विद्यालय के बच्चों ने सरस्वती वंदना की तथा मुख्य अतिथि के स्वागत में स्वागत-गीत प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. चौथीराम यादव ने प्राचीन साहित्य को समसामयिक दृष्टि से समझने का सुझाव देते हुए कहा कि भक्ति आंदोलन की दार्शनिक व्याख्या करने की आवश्यकता है तथा भक्ति आंदोलन को समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए। यदि प्रारम्भ में ही ऐसा किया गया होता तो संभवतः आज के दलित, स्त्री एवं आदिवासी आंदोलन उतनी त्वरा एवं उद्वेग के साथ खड़े नहीं होते। आज के दौर में नवउदारीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद एवं वैश्विक भूमण्डलीकरण के दौर में यूरो-वर्चस्व से बचने के लिए हमें अपनी मानवतावादी दृष्टि को नयी वैश्विक चुनौतियों के बीच पुनः मूल्यांकित करना होगा। वक्ता महोदय में नागार्जुन जी के साहित्य पर अपने विद्वतापूर्ण विचारों से सभा को लाभान्वित किया। शिविर-निदेशक एवं प्राचार्य श्री विजय कुमार जी ने मुख्य अतिथि तथा प्रतिभागियों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए शिविर के सह-निदेशक श्री एस.एन. शुक्ल जी ने मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच प्रतिभागियों की सक्रिय एवं उत्साही उपस्थिति की प्रशंसा तो की ही, साथ ही उन्होंने प्रतिभागियों को इस बात के लिए भी परामर्श दिया कि आपसी विचार- विमर्श एवं शिविर के मार्गदर्शन के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों को कुछ नवीन सीखकर अपने विद्यालय के अकादमिक तथा सह-अकादमिक माहौल को अधिक उन्नत एवं गौरवपूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्ता जी ने किया।
शिविर निदेशक जी ने अगले कालांश में प्रतिभागियों से व्यक्तिगत उपलब्धियाँ व परिचय प्राप्त किया। प्रतिभागियों से प्रपत्र भरवाये गये जिनमें उनसे शिविर से उनकी अपेक्षाओं की जानकारी ली गई। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों की पूर्वज्ञानपरीक्षा ली गई।
भोजनावकाश के पश्चात निदेशक महोदय ने शिविर की रूपरेखा व उद्देश्यों की विशद व्याख्या की, पुनः चाय के पश्चात संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने प्रतिभागियों का समूहविभाजन किया व समूह कार्य आबंटित किये। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कार्य स्तरीय हो तथा केन्द्रीय विद्यालय संगठन के मानक के अनुरूप हो। // प्रतिवेदक समूह: पंत समूह//

दिनांक 24.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

24.11.2012 के दिन का प्रारंभ योगाभ्यास कार्यक्रम से हुआ। प्रतिभागियों ने श्री शशिभूषण कुमार के निर्देशन में विद्यालय प्रांगण में प्राणायम तथा अनुलोम-विलोम के साथ अन्य विविध योग क्रियाओं का अभ्यास किया। प्रार्थना-सभा में प्रार्थना, समाचार, आदर्श-वाक्य, विशेष-कार्यक्रम तथा प्रतिवेदन की प्रभावी प्रस्तुति पंत सदन की ओर से की गई।
प्रथम कालांश में शिविर निदेशक श्री विजय कुमार जी ने पावर-प्वाइंट की सहायता से अलंकारों की विशद, व्यापक व प्रभावी प्रस्तुति से प्रतिभागियों को लाभान्वित किया। अतिथि व्याख्याता के रूप में पधारे प्रो. अवधेश प्रधान (हिन्दी विभाग, बनारस हिन्दू विवि) ने महाप्राण निराला जी की कविता ‘बादल राग’ के विविध बिन्दुओं पर विद्वतापूर्ण विचार प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण वक्ता महोदय ने तर्कपूर्ण ढंग से किया। कविता के काव्य-सौन्दर्यीय पक्ष पर भी विचार व्यक्त किये। प्रतिभागियों की मांग पर वक्ता महोदय ने फिराक गोरखपुरी की रूबाइयों व गज़ल की कक्षा में किस प्रकार सहज प्रस्तुति की जाये, इस पर अपने विचार प्रस्तुत किये।

चायकाल के पश्चात संसाधक श्री अनिल कुमार पाण्डेय ने गद्यशिक्षण को किस प्रकार रुचिकर बनाया जाये, इस पर अपना वक्तव्य दिया। प्रतिभागियों ने चर्चा में बढ़-चढ़कर भाग लेते हुए अपने-अपने विचारों से चर्चा को लाभकारी बनाया। अगले कालांश में संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्ता ने गजल विधा के विविध पक्षों पर चर्चा प्रारंभ की व विविध गजलों की प्रस्तुति से सदन को इस विधा की सहज व प्रभावी प्रस्तुति की कला से परिचित कराया। प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने विचार प्रस्तुत कर परिचर्चा को विशद व व्यापक रूप दिया।
भोजनावकाश के पश्चात प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूह में बैठकर समूह-कार्य का निष्पादन किया। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों ने श्रीमती रेवती अय्यर के निर्देशन में थिंक-क्वेस्ट सम्बन्धी परियोजना की जानकारी प्राप्त की। संध्याकाल में कविता-पाठ के कार्यक्रम के साथ इस दिनांक के कार्य सम्पन्न हो गये।
// प्रतिवेदक समूह: निराला समूह //

दिनांक 25.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

दिनांक 25.12.2011 को योगाभ्यास के पश्चात प्रातःकालीन प्रार्थना-सभा का आयोजन निराला समूह के प्रतिभागियों द्वारा किया गया। तत्पश्चात शिविर के निदेशक श्री विजय कुमार जी ने प्रतिभागियो का मागदर्शन करते हुए यह निर्देश दिया कि सम्पूर्ण व्याख्यान को आत्मसात करते हुए अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करें।
प्रारंभ में शिविर के संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी द्वारा पावर-प्वाइंट प्रस्तुतिकरण, सांस्कृतिक-संध्या का आयोजन तथा डिजिटल डायरी के बारे में उचित दिशा-निर्देश दिये। तत्पश्चात शिविर के सह-निदेशक श्री एस एन शुक्ला जी ने समस्त प्रतिभागियों को हिन्दी शिक्षण-विधि से परिचित कराते हुए भाषा की सम्प्रेषणीयता पर जोर दिया और इस बात के लिए सभी प्रतिभागियों को प्रेरित किया कि हिन्दी भाषा के माध्यम से देश की एकता, अखण्डता व धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को भी बचाए रखें। तदुपरांत हिन्दी का बहुभाषीय परिवेश और हिन्दी का पठन-पाठन विषय पर श्री धीरेन्द्र कुमार झा एवं श्री धर्मवीर सिंह ने विचार प्रस्तुत किये।
प्रथम सत्र के प्रथम खण्ड में ही अतिथि व्याख्याता के रूप में काशी हिन्दू विवि के डॉ नीरज खरे ने ‘पत्रकारिता के विविध आयाम’ विषय पर अत्यंत ही सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किये। इसके साथ ही मुद्रित माध्यमों की विशेषतायें, समाचार के प्रकार, समाचार के स्रोत, समाचार-लेखन की शैली, लेख, आलेख, फीचर, संपादकीय-लेखन व रिपोर्ट आदि के विशद रूपों से परिचित कराते हुए लेखन-प्रारूप से परिचय कराया, जो प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ही लाभकारी रहा। इसके बाद निराला समूह के प्रतिभागी डॉ रामकुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

भोजनावकाश के पूर्व अगले कालांश में संसाधकद्वय डॉ अनिल कुमार पाण्डये व श्री व्ही सी गुप्ता ने ‘पाठ्यसहगामी क्रियाओं की केन्द्रीय विद्यालय में भूमिका तथा व्यक्तित्व विकास में सहायक’ विषय पर अपना गांभीर्यपूर्ण और सारगर्भित विचार रखें। भोजनावकाश के बाद श्री राजेन्द्र विश्वकर्मा तथा डॉ रामकुमार सिह व दीपक कुमार के द्वारा क्रमशः ‘रूबाइयॉं, ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’, तथा ‘जनसंचार माध्यम’ पाठ का आदर्श पाठ प्रस्तुत किया गया। थिंक-क्वेस्ट तथा संगणक कार्य भी सम्पन्न हुआ।
//प्रतिवेदक समूह: महादेवी वर्मा समूह//

दिनांक 26.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन
केन्द्रीय विद्यालय डीरेका में स्नातकोत्तर शिक्षकों (हिन्दी) का सेवाकालीन प्रशिक्षण का चौथा दिन योगाभ्यास और तत्पश्चात महादेवी वर्मा सदन की ओर से प्रस्तुत आकर्षक प्रार्थना-सभा कार्यक्रम के साथ आरम्भ हुआ।
शिविर निदेशक एवं विद्यालय प्राचार्य श्री विजय कुमार ने गीता के कर्मयोग के उपदेश को समकालीन परिप्रेक्ष्य के अनुरूप परिभाषित करते हुए ‘विपश्यना साधना’ विषय पर बीज व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि- ‘‘तालीम से तबीयत बेहतर होती है’ अर्थात कहने से करना अच्छा होता है। उनके मतानुसार विपश्यना सत्य की उपासना है, आत्मनिरीक्षण की साधना है, जीने का अभ्यास है – शील और सदाचार के साथ। ‘विपश्यना साधना’ केवल आडम्बर नहीं है वरन शिक्षा में नैतिक मूल्यों के विलयन की दृष्टि से भी यह अनिवार्य है। शिक्षा और नैतिकता का यह संयोग ही एक युग में भारत को विश्वगुरू के पद पर सुशोभित किया और मैक्समूलन जैसे जर्मन दार्शनिक को भारत की ओर देखने के लिए विवश किया गया। बकौल सुमित्रानंदन पंत –
‘‘ऐसे मरणोन्मुख जग को कहता मेरा मन
और कौन दे सकता नवजीवन आश्वासन
शान्ति, तृप्ति-निज अन्तर्जीवन के प्रवाह में
भारत के अतिरिक्त आज-जो शाश्वत अक्षर
अन्तर ऐश्वर्यों का ईश्वर है वसुधा पर
कहता मेरा मन, भारत के ही मंगल में
भू मंगल, जन मंगल, दोनों का मंगल है। ‘‘

तत्पश्चात काशी हिन्दू विवि के शिक्षा विभाग की डिप्टी चीफ प्रोक्टर प्रो.(डॉ.) गीता राय ने ‘किशोरावस्था: युवाओं के लिए निर्देशन और परामर्श’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि किशोरावस्था मूलतः तनाव एवं तूफान की अवस्था है जिसमें किशोरों के भीतर शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक दृष्टि से अनेक परिवर्तन होते हैं यथा- शारीरिक व यौवन विकास, मानसिक विकास, इच्छाओं व कल्पनाओं का विकास, वस्त्र-चयन, शारीरिक सौष्ठव एवं बातचीत के लहजे में परिवर्तन तथा भावात्मक अस्थिरता और समूहबद्धता ऐसे परिवर्तन हैं – जो शिक्षक के शिक्षण कार्य के लिए आवश्यक है। वर्तमान वैश्विक एवं सामाजिक परिवर्तनों के चलते विद्यार्थी के मन में गुरू के प्रति वह परम्परागत सम्मान नहीं रह गया है जिसमें शिक्षक अपने को पूर्णतः स्वतंत्र समझता है। शिक्षक के लिए आवश्यक है। कि वह निर्देशन, परामर्श एवं अन्य मनोवैज्ञानिक पद्धतियों का सहारा लेते हुए न केवल अपने शिक्षण को रुचिकर बनायें वरन् विद्यार्थियों के जीवन-दर्शन को एक नवीन दिशा दे सके।

भोजनावकाश के पश्चात् आरम्भ द्वितीय सत्र में विभिन्न प्रतिभागियों द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। क्रमशः सर्वश्री तेजनारायण सिंह, चुम्मनप्रसाद श्रीवास्तव , डॉ ए के पाण्डेय, धर्मवीर सिंह द्वारा प्रस्तुत की गई आदर्श पाठ की प्रस्तुति को अन्य प्रतिभागियों ने व्यापक विचार-विमर्श के द्वारा अधिक विस्तृत एवं नये आयामों से समृद्ध किया। कार्यक्रम के सह-निदेशक श्री एसएस शुक्ल (प्राचार्य, केवि 39 जीटीसी), श्री एसएस यादव (उपप्राचार्य, केविडीरेका) एवं सह संसाधक श्री व्ही सी गुप्ता ने तमाम प्रतिभागियों की आदर्श पाठ प्रस्तुति की कमियों को दूर करते हुए उसे और अधिक रुचिकर व संभावनापूर्ण बनाने पर बल दिया। तत्पश्चात द्वितीय सत्र में ही संसाधक डॉ ए के पाण्डेय ने हिन्दी भाषा-शिक्षण की चुनौतियाँ: और उसकी नवीन प्रविधियाँ’ विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए सदन के तमाम प्रतिभागियों को भाषा- शिक्षण की नवीन प्रविधियों एवं नवीन तकनीक से अवगत कराया गया। अगले कालांश में संसाधक श्री व्ही सी गुप्ता ने पद्य-शिक्षण कौशल के विविध आयामों की जानकारी दी। प्रतिदिन की तरह ही सांस्कृतिक-संध्या का आयोजन एवं तत्पश्चात् डॉ आशुतोष पाण्डेय के औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ शिविर निदेशक महोदय की अनुमति से कार्यक्रम के समापन की घोषणा की गई।
//प्रतिवेदक समूह: प्रेमचंद समूह//

दिनांक 27.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

‘‘हो रहा मन विकल मन के तार खोलने दो।
प्रशिक्षण शिविर के दौरान हुए कार्यक्रम की बात कहने दो।।
उषा की नव-किरणों जोश सबका बढ़ाया।
सरस्वती-वंदना से सबका मन पावन किया।।
प्रेमचंद समूह में प्रार्थना-सभा का भार लिया।
सोत्साह सभी कार्यक्रम प्रस्तुत कर उल्लसित किया।।
हो रहा……।
शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी हुए हर्ष-तरंगों से उद्वेलित।
किया सबका अभिवादन सानंद और प्रफल्लित।।
नित्यम की तरह मुस्कान बिखरे बढ़े निदेशक हर्षित
बढ़ाया ज्ञान प्रशिक्षणार्थियों का, हुए सभी तृप्त।।
राजभाषा कार्यान्वयन एवं संवैधानिक उपबंधों को किया सरलीकृत।
हिन्दी शिक्षक हो, शक्ति अपनी पहचानिए – कर दिया प्रेरित।।
हो रहा….
बोले सह-निदेशक शुक्ल जी धीर गंभीर वाणी से।
हुए प्रभावित सभी प्रशिक्षणार्थी उनके वक्तव्य से।।
विद्यालय प्रबंधन के विविध आयामों के ज्ञान से।
हुए लाभान्वित सभी शिक्षक उत्सुकता से।।
हो रहा….
काशी की धरती है पावन, आकर्षण हिन्दी प्रेमियों की।
शब्दों की तरंगिणी, कविता-वाहिनी साहित्यप्रेमियों की।।
हुए कृतकृत्य शिक्षार्थी, प्रतिभागी मनोजकुमार के सौहार्द से।
अभिसिंचित हुए शिक्षण के विविध अंगों-उपांगों के ज्ञान से।।
हो रहा……
बदल रहा है समय, बदले शिक्षा के विविध आयाम।
शिक्षा बनी शिक्षार्थी-केन्द्रित, बदले जीवन के आयाम।
सतत समग्र मूल्यांकन है आज की सर्वत्र माँग।
निर्मित करती है नवाचार कार्यशैली में।।
संसाधक हमारे विनोद-प्रिय और भाषा के धनी।
दिया सारगर्भित ज्ञान सीसीई पर सभी ने सुनी।।
हो रहा…
शुरू हुई श्रृंखला आदर्श पाठों की अपरान्ह में।
शिक्षक तय करेगा विधि – कहा केके पाण्डेय जी ने गंभीर वाणी में।।
मिश्रा जी आये सोत्साह, प्रस्तुत किया आदर्श पाठ आत्मकथ्य में।
चर्चा छिड़ी, मची हलचल, श्री झा व धर्मवीर के तर्कों से।।
समाधान किया गुप्त जी अपने शेरो-शायरी से।
हो रहा…
फिर मंच पर बढ़े दोशी जी, डाला प्रकाश नवाचार विधियों पर।
पुरानी पद्धतियाँ, नये सिरे से सोचा तर्कवादियों ने सुनकर।।
रामकुमार बड़े उत्साही, बढ़ाया ज्ञान रचनात्मक मूल्यांकन पर।
दिया शिक्षक-हित चंद बातें रेवती ने जोड़कर।।
धीर-गंभीर सत्यनारायण जी, आए किया आदर्श पाठ ‘यमराज की दिशा’ पर।
ठाकुर जी ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ के साथ आये, अगले सोपान पर।।
हो रहा……
भोजनावकाश उपरांत संलग्न हुए शिक्षार्थी समूह-कार्य में।
ज्ञान का भंडार लिए हम बैठे परीक्षा काल मे।।
आशंका और कौतुहल के बीच पर्चे बँटे शिक्षार्थी में।
मनोयोग से लिख डाला उत्तर हमने सीमित समय में।।
हो रहा….
बनारस की रंगीन शाम में ढल गया प्रशिक्षण शिविर।
महिला एवं पुरुष मंडल ने लिया रस डूबकर।।
गीत एवं कविताओं में गोते लगाये सबने जी भरकर।।
सम्पन्न हुआ पांचवा दिन धन्यवाद ज्ञापन पर।
हो रहा मन……….
कलयुग का आह्वान है ओ प्रतिभाओ आगे आओ।
ज्ञानदान दे, समय दान दे, जन-मंगल इतिहास रचाओ।
अरे! स्वार्थ के सगे सभी हैं, कौन किसे याद रखता है।
जो समाज के लिए समर्पित, उनकी ही चर्चा होनी है।।
हो रहा……
//प्रतिवेदक समूह: भारतेन्दु समूह//
दिनांक 28.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

दिन ने थोड़ी सिरहन के साथ मुस्कुराते हुए अपनी खुशनुमा आँखें खोलीं, दिवस का प्रारंभ आलसेच्छा को तोड़ते हुए योगाभ्यास से हुआ और शिविरार्थियों में नवप्राण व नवीन ऊर्जा का संचार हुआ।
शिविर का शुभारंभ भारतेन्दु सदन द्वारा प्रार्थना-सभा की आकर्षक व अत्यंत सुंदर प्रस्तुति द्वारा हुआ। तत्पश्चात् निदेशक व प्राचार्य, एवं उप-प्राचार्य द्वारा राष्ट्रगान के गौरवशाली 100 वर्ष पूरे होने पर इसके इतिहास, प्रस्तुति-समय व शुद्ध उच्चारण पर तथ्यपूर्ण तथा तार्किक व्याख्यान दिया गया। इसके बाद श्री अमरनाथ द्वारा आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की गई।
चायकाल के उपरांत काशी हिन्दू विवि से पधारे अतिथि वक्ता डॉ. प्रभाकर सिंह ने कक्षा- 11वी, 12 वीं की पाठ्यपुस्तकों में चयनित कविताओं व पाठों को साहित्येतिहास के आईने मे देखते हुए अपना विद्वतापूर्ण एवं सारगर्भित व्याख्यान दिया। इस क्रम में उन्होंने कविताओं को लोक व भाषा के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों के आग्रह पर स्त्री-विमर्श पर सूक्ष्म एवं सारपूर्ण बात रखी। तदुपरांत संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय द्वारा शिक्षा-संहिता व लेखा-संहिता पर पर ज्ञानयुक्त व्याख्यान दिया।
सत्र के उत्तरार्ध में शिक्षकों द्वारा आदर्श-पाठ के प्रस्तुति की गई जिसमें श्रीमती अमिता शर्मा, श्रीमती प्रणति सुबुद्धि और श्रीमती स्मिता कौल द्वारा आदर्श-पाठ की प्रेरक प्रस्तुति की गई। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों द्वारा समूहकार्य एवं संगणक कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न किये गए।
सत्र के अवसान काल में मृदुभाषी व मितभाषी उपप्राचार्य श्री सदानंद सिंह यादव द्वारा अत्यंत सुंदर और मर्मस्पर्शी गीत की प्रस्तुति की गई।
दिनांक 28.12.11 की सांध्य-बेला ने श्रीमती अनुराधा पाण्डेय के संचालन एवं नेतृत्व में भव्य-काव्य संध्या का अयोजन किया गया, जिसमें प्रमुख रूप से रामनारायण सिंह ने ‘कहानी एक जैसी है हमारी भी तुम्हारी भी’ तथा विश्वम्भर नाथ मिश्र द्वारा नरोत्तम दास के पद व रामचरित मानस का आरंभिक वंदना की प्रस्तुति की। इसके अतिरिक्त अन्य प्रशिक्षणार्थियों द्वारा भी विभिन्न काव्य-प्रस्तुतियाँ की गईं। अंत में श्रीमती रेवती अय्यर द्वारा औपचारिक धन्यवाद-ज्ञापन के साथ दिनांक 28.12.11 के कार्यक्रम सफल व सार्थक रूप में सम्पन्न हुए।
//प्रतिवेदक समूह: पंत समूह//

दिनांक 29.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

इस दिन की प्रातःकालीन बेला में योगाभ्यास से प्रतिभागियों ने नवीन ऊर्जा प्राप्त की। स्वल्पाहार के पश्चात पंत सदन ने प्रार्थना-सभा के विविध कार्यक्रम प्रस्तुत किये। संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय ने नागार्जुन व त्रिलोचन के जीवन के संस्मरणों की प्रस्तुति से सभागार को साहित्यमय कर दिया। निदेशक महोदय ने पद-परिचय व कक्षा- 9 वीं, व 10 वीं के पाठ्यक्रम के आलोक में अन्य व्याकरणिक पक्षों पर प्रकाश डाला। काशी हिन्दू विवि से पधारे विषय-विशेषज्ञ महोदय ने हिन्दी साहित्य के इतिहास एवं गजल विधा के विकास पर प्रकाश डालते हुए उसकी प्रवृत्तियों की जानकारी दी। प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण किया गया। संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्त ने यात्रा-संस्मरण पर अपने अनुभव के साथ समय की माँग की बताकर इसके विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रतिभागियों की ओर से परिचर्चा में सहभागिता दर्ज कराई गई। भोजनावकाश के पश्चात आदर्श-पाठ के क्रम में डॉ विनीता राय, डॉ पूनम चौधरी, रजनी त्रिवेदी, अश्विनी राय तथा राजेश त्रिपाठी ने आदर्श पाठ प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों ने भी पाठों पर अपनी ओर से सुझाव दिये। सह-निदेशक श्री एस एस शुक्ल जी ने आदर्श-पाठ योजना पर सुझाव से युक्त टिप्पणी दी। पाठ-योजना की प्रस्तुतियों के पश्चात प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूहों में बैठकर समूह-कार्य निष्पादित किए। बचे समय में संगणक पर अभ्यास किया गया। अंत में सभागार मे पुनः एकत्र होने पर निदेशक महोदय ने सभी को निदेशक महोदय ने निर्देश दिया कि समूहकार्य मौलिक, प्रभावी व छात्रों को ध्यान में रखकर पूर्ण किये जाएँ।
संध्याकाल में सांस्कृतिक-कार्यक्रम आयोजित किये गये जिसके अंतर्गत भोजपुरी गीत, एकल-अभिनय व गजलों की प्रस्तुति उल्लेखनीय है।
//प्रतिवेदक समूह: निराला समूह//

दिनांक 30.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

इस दिन का प्रारंभ भी योगाभ्यास से हुआ। प्रतिभागियों ने सूर्योदय के साथ योगाभ्यास किया। प्रातःकालीन सभा की प्रस्तुति निराला सदन द्वारा की गई। प्रथम सत्र के प्रारंभ में शिविर के निदेशक श्री विजय कुमार ने एनसीएफ 2005 पर प्रकाश डाला। एनसीएफ को आधुनिक शिक्षा के लिए वरदानतुल्य बताया। इसी सत्र में स्काउट एवं गाइड के विषय में पधारे विषय-विशेषज्ञ श्री वी.वी दुबे, वरिष्ठ प्रशिक्षक डीरेका, सिविल डिफेन्स एवं श्री प्रमोद कुमार, जिला मुख्यालय आयुक्त, भारत स्काउट एवं गाइड, डीरेका, वाराणसी ने जानकारी दी गई। स्काउट सिर्फ संगठन ही नहीं, अपितु मानवसेवा का अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। स्काउट एवं गाइड की सीमा सम्पूर्ण विश्व तक फैली हुई है। बच्चों से लेकर युवाओं तक सभी जुड़े हैं।
चायकाल के पश्चात संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने प्राथमिक उपचार विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने प्राथमिक उपचार में न सिर्फ चोट व दुर्घटना के विषय में बताया, अपितु हड्डी टूटने से लेकर शरीर के किसी भी अंग तक की प्राथमिक चिकित्सा से जुड़ी बातें बताईं। भोजनावकाश के बाद प्रतिभागियों के द्वारा आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की गई। इसमें श्री संजय कुमार सिंह, डॉ के के पाण्डेय, श्रीमती प्रणति सुबुद्धि, श्रीमती टी. लेखा, श्री रवीन्द्र कुमार, श्री प्रमोद कुमार शर्मा, श्री रामनारायण ने आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की। प्रतिभागियों ने पावर-प्वाइंट द्वारा अपने आदर्श-पाठ की प्रस्तुति दी। चायकाल के पश्चात सभी प्रतिभागियों ने समूह के साथ बैठकर संगणक कार्य का निष्पादन किया। संगणक कार्य अभ्यास के पश्चात श्री व्ही.सी. गुप्ता ने आदर्श पाठ पर प्रकाश डालते हुए दिन भर की गतिविधियों की संक्षिप्त समीक्षा के साथ ही दिनांक 30.12.2011 के कार्य पूर्ण होने की घोषणा की।
//प्रतिवेदक समूह: महादेवी समूह//

दिनांक 31.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

प्रातःकालीन योगाभ्यास के साथ शिविर के नवें दिन का शुभारम्भ हुआ। प्रतिभागियों ने योग के विविध उपादानों से परिचय प्राप्त हुआ। प्रार्थना-सभा के विविध कार्यक्रमों – प्रार्थना, अध्यापक-प्रतिज्ञा, आदर्श वाक्य, विशेष कार्यक्रम, तथा प्रतिवेदन-वाचन की प्रभावशाली प्रस्तुति महादेवी सदन की ओर से की गई। निदेशक महोदय ने प्रतिभागियों का कुशल-क्षेम पूछा तथा अपठित शिक्षण के संदर्भ में विस्तृत जानकारी प्रदान की। महोदय ने स्पष्ट किया कि अपठित का निरंतर व सतत अभ्यास कक्षा में आवश्यक है। सह-निदेशक श्री एस एन शुक्ल जी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पद्य-शिक्षण के संदर्भ में आवश्यक जानकारी दी। अतिथि वक्ता के रूप में पधारे डॉ. तीरविजय सिंह, संपादक अमर उजाला, ने पत्रकारिता के व्यावहारिक पक्ष पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। पत्रकारों के जीवन में आने वाली कठिनाईयों तथा उनकों किन-किन सावधानियों को बरतने की आवश्यकता है। इस पर ध्यान आकृष्ट किया।

प्रतिभागियों ने तरह-तरह की शंकाएँ व्यक्त कीं, जिसका निराकरण उन्होंनंे सफलतापूर्वक किया। अगले कालांश में संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने केन्द्रीय विद्यालयों में पाठ्य-सहगामी क्रियाओं की स्थिति तथा उसके लाभों के संदर्भ में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई। अगले कालांश में श्री संतोष कुमार में ‘कविता के बहाने’ का आदर्श पाठ प्रस्तुत किया, जिसमें प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने सुझाव दिये। भोजनावकाश के बाद प्रतिभागियों ने आबंटित कार्य को पूरा किया। समूह कार्य के समय पर पूरा हो जाने पर संसाधक श्री व्ही सी गुप्त ने प्रतिभागियों व प्रभारियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों की उत्तर-परीक्षा के द्वितीय चरण को सम्पन्न कराया गया। संध्याकाल में प्रतिभागियों ने काव्य-संध्या का आयोजन किया जिसमें एकल अभिनय व लोकगीतों द्वारा इस व्यावाहारिक विधा की प्रस्तुति की गई।
//प्रतिवेदक समूह: प्रेमचंद समूह//

दिनांक 01.01.2012 की कार्यवाही का प्रतिवेदन

प्रातःकाल का शुभारम्भ योगाभ्यास से हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने योग की विविध मुद्राओं का अभ्यास किया। अल्पाहार के पश्चात प्रेमचंद सदन की ओर से प्रार्थना -सभा के सभी कार्यक्रम – प्रार्थना, प्रतिज्ञा, आदर्श वाक्य, विशेष कार्यक्रम, प्रतिवेदन तथा राष्ट्रगान की प्रस्तुति की गई। शिविर निदेशक एवं प्राचार्य श्री विजय कुमार ने प्रार्थना-सभा के कार्यक्रमों की गुणवत्ता तथा विद्यालयी जीवन में इसकी महत्ता व उपादेयता पर अपना सारगर्भित भाषण दिया। अतिथि के रूप में पधारे विषय-विशेषज्ञ ने गद्य-शिक्षण की विविध बारीकियों की विस्तार से चर्चा की। चर्चा को सह-निदेशक ने आगे बढ़ाते हुए वाचन-पक्ष पर विशेष ध्यान देने का संदेश दिया। प्रतिभागियों ने चर्चा में भाग लेते हुए अपनी-अपनी जिज्ञासाओं से तथा उनके सर्वमान्य निष्कर्ष से शिविर को लाभान्वित किया। संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय तथा व्ही.सी. गुप्त ने संश्लेषित शिक्षा क्या है ? उससे लाभ तथा केन्द्रीय सरकार तथा केन्द्रीय मा.शि.मं. से निःशक्तजनों को दी जाने वाली विविध छूट की जानकारी से प्रतिभागियों को अवगत कराया। भोजनावकाश के पश्चात समापन समारोह का आयोजन किया गया। जिसके मुख्य अतिथि विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्री एल वी राय, मुख्य कार्मिक अधिकारी, डीरेका थे। समापन समारोह में शिविर निदेशक श्री विजय कुमार ने दस दिन के शिविर की उपलब्धियों से अवगत कराया। प्रतिभागियों की ओर से विभिन्न समूहों के प्रभारियों – श्रीमती शोभारानी, डॉ के के पाण्डेय, श्रीमती एन एस कौल, श्री चुम्मनप्रसाद श्रीवास्तव एवं डॉ विनीता राय ने शिविर के अनुभव व्यक्त किये। मुख्य अतिथि महोदय ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किये व अपने अध्यक्षीय भाषण में बताया कि शिविर में जिस प्रकार की शिक्षण-तकनीक व विषय-ज्ञान प्रतिभागियों ने अर्जित किया है यदि वे इसका प्रयोग अपने विद्यालयों ने निष्ठा से करेंगे तो निस्संदेह समाज व विद्यार्थियों का कल्याण होगा। उन्होंने प्राचार्य महोदय को इस सफल आयोजन पर बधाई दी व भविष्य में इसी उत्साह से कार्य करते रहने का संदेश दिया। सहनिदेशक श्री एस एन शुक्ल जी ने कार्य के सफल निष्पादन हेतु संसाधकद्वय, विद्यालयकर्मियों, भोजन तथा अन्य व्यवस्थाओं में लगे लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया। //प्रतिवेदक समूह: भारतेन्दु समूह//

क्षणिकाएं


(त्रयी : शिविर निदेशक, सह निदेशक एवं उपप्राचार्य)


(हे गंगा जीवन का दिशा बदल दो : उत्‍तरायणी गंगा शूलटंकेश्‍वर स्‍थल पर रात्रि समय हम साथ साथ, संसाधकद्वय, पूस्‍ताकलयाध्‍यक्ष एवं शिक्षक साथी)


(गंगा आरती के वैश्‍िवक आयोजन का आनंद लेते हुए साथी)


(बनारस की पुण्‍य देहरी पुनरागमन की कामना के साथ)

प्रेमचंद के घर में ………


गॉंव में एक ऊंचा प्रवेश द्वार। अगल-बगल खडे़ हैं पत्‍थर के बैल, होरी जैसे किसान और बूढ़ी काकी जैसी कुछ पथरीली मूर्तियाँ। जी हॉं आप प्रवेश कर रहे हैं लमही गॉंव में। जहॉं प्रेमचंद और उनके परिवार तो कोई नहीं, हॉं लहलाती पीली सरसों है, प्रेमचंद के नाम से पुस्‍तकालय, पैत्रक घर के बोर्ड और ……
… स्‍वयंसेवक के बतौर प्रेमचंद स्‍मारक ट्रस्‍ट का काम देखने वाले दुबे जी।
एक कमरे में सजाई हुई हैं प्रेमचंद की अनेक प्रकाशित किताबें, उनकी तस्‍वीरें और तरह-तरह की चीजें जिससे माहौल पूरा म्‍यूजियम जैसा लगे।
बरहाल इतना तो है कि यहॉं आकर आप महसूस कर सकते हैं कि प्रेमचंद कितने आम आदमी रहे होंगे। महान लेखन आसमान से नहीं उतरते। कलाकार जितना आम आदमी के बीच से होगा उतना ही काल से होड़ करने वाला होगा।
पिछली बार बारह दिन बनारस में बिताए तो लमही तक आने की लालसा शेष रह गई थी। बनारस अजूबा इस मामले में है कि ये अनेक महानतम स्‍थानों, (जिनमें साहित्‍यिक मसले सर्वाधिक हैं ही) का ऐसा गुच्‍छ है कि क्‍य कहें। तो आखिरकार लगभग अर्धशतकीय शिक्षक साथियों के साथ आ धमके प्रेमचंद की स्‍मृतियों से रूबरू होने।
प्रांगण में प्रेमचंद की मूर्ति स्‍थापित है। जीर्णाद्धार के बाद यहां के कक्ष इत्‍यादि नये कलेवर में हैं। दो कमरे है जिनमें एक पुस्‍तकालय बना दिया गया है। प्रेमचंद को जो चीजें या जिस तरह की चीजें पसंद रहीं उनका नमूना रख दिया गया है। ट्रस्‍ट का काम देख रहे दुबे जी अपने हाथ प्रेमचंद के कागजातों और पाण्‍डुलिपियों की छायाप्रति जैसी अनेक चीजें रखते हैं और सैलानियों को दिखाते रहते हैं। मौका मिला तो सर्जना के लिए उनसे बातचीत रिकार्ड कर ली।
बरहाल, लमही के लम्‍हे……बस इसलिए यादगार हैं कि जाते हुए साल 2011 को विदाई यहीं दी…..प्रेमचंद के घर में।


(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)


(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)


(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)


(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)


(लमही गॉंव की सरसों ‘हो गई सबसे सयानी’)


(लमही गॉव के बीच लगा बोर्ड)


(मुंशी प्रेमचंद के पैत्रक घर के बोर्ड के पास श्री धीरेन्‍द्र कुमार झा व श्री टी एन सिंह के साथ)


(प्रेमचंद जी के पैत्रक घर में स्‍थापित उनकी प्रतिमा)


(प्रेमचंद स्‍मारक ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष श्री दुबे जी से चर्चा)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)


(प्रेमचंद जी के पैतृक घर में श्री विजय कुमार, डॉ विनीता राय व अन्‍य साथी)

पत्‍थरों पर इतिहास – हम्‍पी : द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन

जब ठहरी निगाह…………….
बैंगलूर हवाई अड्डे पर उपरी तल्‍ले पर मंहगी सजी-दुकान पर एक किताब कांच में सजी है। आकार बडी रामायण सरीखा। निगाह ठहर जाती है। किताब पर एक चित्र है –पथरीला। अंग्रेजी की इस किताब का शीर्षक है – द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन। किताब हम्‍पी के बारे में है।

किताब देखकर हम्‍पी के प्रति आकर्षण बढ गया । लगा कि इतने दिनों से दोणिमलै में हूं। महज डेढ- दो घंटे के फासले पर हम्‍पी है। वहां तुंगभद्रा बांध के विद्यालय में भी कुछ अरसा पढा चुका हूं। मगर हम्‍पी जाने का योग न बना सका। आखिर एक दिन चलने का भूत सवार हुआ और निकल पडा पत्‍थरों पर इतिहास देखने।

कॉमिक्‍स से इतिहास तक……….

बचपन से ही तेनालीराम की चतुराई सुनते रहे। और मनोमष्‍ितष्‍क के मिथकीय साहित्‍य में बीरबल के बगल तेनालीराम विराजते रहे। विजयनगर साम्राज्‍य के बारे में इतिहास की किताबें बताती हैं कि इस राज्‍य की स्‍थापना हरिहर और बुक्‍का नाम के दो भाइयों ने की। ये दोनो भाई वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरूद्रदेव की सेवा में थे। दक्षिण भारत पर मुस्‍िलम प्रभुत्‍व हो गया तो दोनों भाई वहां से कैद कर दिल्‍ली लाए गए, परन्‍तु जब दक्षिण में वहां शांति और सुव्‍यवस्‍था बनाए रखना कठिन हो गया तो तुगलक सुल्‍तान ने हरिहर और बुक्‍का को मुक्‍त कर उन्‍हें रायचुर दोआब का सामन्‍त बनाकर भेज दिया(जब भी गुंतकल स्‍टेशन की प्रतीक्षा में रायचुर स्‍टेशन से ही ताकना शुरू करता हूं तो रायचुर रेलवे बोर्ड देखकर लगता है रायचुर के उस प्रभावशाली दोआब का ऐतिहासिक हिस्‍सा बन गया हूं तो राजाओं के शक्‍ति-प्रदर्शन का केन्‍द्र रहा) । कहा जाता है कि इन दोनों भाइयों का परम सहायक तथा नेता उस समय का प्रकाण्‍ड पंडित विद्यारण्‍ड था। जिसने इस वंश की उसी प्रकार सहायता की जिस प्रकार आचार्य कौटिल्‍य ने चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य की की थी। अपने गुरू तथा सहायक के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे पर विद्यानगर अथवा विजयनगर नामक नगर की नींव डाली। मुहम्‍मद बिन तुगलक के शासन-काल के अंतिम भाग में हरिहर ने अपने को स्‍वतन्‍त्र शासक घोषित कर दिया। विजयनगर में सन् 1336 से 1416 तक चार राज्‍यवंशों ने शासन किया। इनमें सन् 1505 ई से 1570 ई के तृतीय राजवंश का सबसे अधिक योग्‍य तथा प्रतिभाशाली शासक कृष्‍णदेव राय था। उसे सम्‍भवत सन् 1509 ई से 1530 ई तक शासन किया। इतिहास विवरणों के अनुसार वह बड़ा ही वीर,साहसी तथा न्‍यायप्रिय शासक था। वह एक महान विजेता तथा सफल शासक था। उसने उड़ीसा के राय को युद्ध में परास्‍त कर वहाँ की राजकुमारी के साथ विवाह किया। 1520 ई में उसने बीजापुर के सुल्‍तान आदिलशाह पर भी विजय प्राप्‍त की और उसके राज्‍य को लूटा। पश्‍चिमी समुद्र तट पर बसे हुए पुर्तगालियों के साथ उसकी मैत्री थी। इस प्रकार कृष्‍णदेव राय ने अपने बाहुबल से अपने राज्‍य की सीमा से बड़ी वृद्धि की। इससे पड़ोसी मुस्‍लिम शासकों को बड़ी ईर्ष्‍या उत्‍पन्‍न हुई और वे विजयनगर के विरूद्ध संगठित होने लगे। इतिहास यह भी बताता है कि कृष्‍णदेव राय की मृत्‍यु के उपरान्‍त सदाशिव के मंत्री राम राय ने पड़ोसी मुसलमान राज्‍यों के साथ युद्ध किया और मुसलमानों साथ बड़ा अत्‍याचार किया। मुसलमान राज्‍यों के लिए यह असह्य हो गया और अपने मतभेद भुलाकर बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्‍डा तथा बीदर ने विजयनगर के विरूद्ध एक संघ बनाया। केवल बरार का सुल्‍तान इस संघ से अलग रहा।

और वो दिन जब दुनिया का एक महान सुव्‍यवस्‍िथत नगर अचानक धराशायी कर दिया गया…………………………………..

सन् 1564 ई के अंतिम सप्‍ताह में मुसलमानों ने विजयनगर राज्‍य पर आक्रमण कर दिया। तालीकोट नामक स्‍थान पर, जो कृष्‍णा नदी के किनारे पर स्‍िथत है, दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध आरम्‍भ हो गया। रामराय युद्ध में परास्‍त हो गया और उसका वध कर दिया गया। हिन्‍दुओं का बड़ी नृशंसतापूर्वक बध कर दिया गया। इसके बाद विजयी सेना ने विजयनगर की ओर कूच किया और नगर को खूब लूटा। शत्रु विजयनगर को नष्‍ट करने आये थे। अतएव उन्‍होंने यथाशक्‍ित उसका विनाश किया।

कर्नाटक के सांस्‍कृतिक उत्‍सवों, राजकीय महोत्‍सवों और राज्‍य की स्‍थापना की वर्षगाँठ के अवसरों पर जो कार्यक्रम और गीत मैं सुना करता हूँ उनमें विजयनगर की सांस्‍कृतिक विरासत निवासियों के रग-रग में बसी है। वे अपनी अस्‍मिता और आत्‍मगौरव के साथ इसे सम्‍बद्ध करते हैं, खासकर जो सांस्‍कृतिक पहचान इसकी रही।

फोटो – गैलरी / हम्‍पी और उसके आसपास

(तुंगभद्रा तट पर विजयनगर, हम्‍पी)


(तुंगभद्रा तट)


(उग्र नरसिंह मंदिर)


(मीनाक्षी मंदिर)


(तुंगभद्रा में स्‍नान करता राजकीय हाथी, जापानी बालक, सर्जना के कैमरे में)


(हम्‍पी का विश्‍व प्रसिद्ध पत्‍थर का रथ, स्‍टोन व्‍हील)


(हम्‍पी के विटृठल मंदिर का प्रांगण)


(विटठल मंदिर का तोरण द्वार)

दो कविताएं मिलीं – ‘सर्जना’ / ‘ आओ जिंदगी को रिचार्ज करें

सर्जना –

सर्जना मन का घरौंदा है
इसे बना लो
सर्जना रचना का संसार है
इसे बसा लो
सर्जना भावों का ज्‍वार है
इसे उमडने दो
सर्जना मन की टीस है
इसे निकलने दो
सर्जना व्‍यथा और पीडा की अभिव्‍यक्‍ति है
इसे बहने दो
सर्जना परिवर्तन्‍ा का आह्वान है
इसे होने दो
सर्जना क्रांति का शंखनाद है
इसे बजने दो
सर्जना विरूदावली है
सर्जना कोमलकांत पदावली है
सर्जना मानवता का आराधन है
सर्जना जोडने का एक साधन है
सर्जना मूल्‍यों का संचार है
सर्जना गुणों का आधार है
सर्जना एक सुंदर सा सपना है
सर्जना एक संसार नितांत अपना है
सर्जना शाम की सुरीली तान है
सर्जना जीवन की मधुर जान है
सर्जना इंसानियत की धरोहर है
सर्जना हर युग के लिए मनोहर है
सर्जना बिना संसार अधूरा है
सर्जना से ही संसार पूरा है

अमरनाथ, बिलागुडी छावनी


आओ जिंदगी को रिचार्ज करें –


चुप क्‍यूं हो
कुछ तो बोलो
आखिर अपना मुंह तो खोलो
क्‍यूं हो ऐसे बेहाल
बीत जायेगा ये काल
गुस्‍सा छोडो, मत हो लाल
आओ कुछ ऐसा काम करें
किसी की जिंदगी में रंग भरें
दें उसे खुशियां हजार
ताकि हासिल हों दुआएं बार-बार

उमर फारूख, दोणिमलै, कर्नाटक