बारह दिन बनारस में

सुदामा अंदर देखि डरे……
‘सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो…….
..

‘आदमी का डर’ एक साहित्यिक जुमला हो सकता है। मगर जब ऐसी रेलगाड़ी के डिब्बे में चढ़ना हो जहाँ आदमी की ……और सिर्फ आदमी की मौजूदगी डर का कारण हो जाये तो जुमले का असली मतलब समझ आता है बनारस पहुँचना था 9 तारीख की सुबह । प्रशिक्षण शिविर में समय पर पहुँचने की जिद में बुन्देलखण्ड का आरक्षण उपेक्षित कर पहुंच गये आगरा से गांधीधाम एक्सप्रेस में बैठने। आरक्षण मिल गया था। सोचा सुबह जल्दी पहुंच जायेंगे। एक्सप्रेस के नियत डिब्बे में झाँके तो होश उड़ गयें पटनियां भाइयों से डिब्बा अटा पड़ा था। काहे का रिजर्वेशन साहब ! दोपहर दो बजे तीनों बर्थ खुली और एक एक बर्थडे पर आठ आठ आदमी। न घुसने का रास्ता न सीट तक पहुंचने का। पहुंच भी गये तो मिलना क्या था। घुस भी गये तो टायलेट तक आना पानीपत के युध्द से बड़ा। खास गंध से डिब्बा अटा पड़ा। खिड़की से ही देखकर बिफर पड़े ……डर…..क्रोध घबराहट और मानवीय निवेदन का मिला-जुला रूप देखकर भीतर के लोग सकते में आ गये। सारे लोगों ने मिलकर अंदर खींच लिया।

ताजमहल तबेले और धोबीघाट…..
यमुना के पुल से ताजमहल का नजारा …..आ हा! लगता है शाहेजहाँ की जिंदगी भर की कमाई लगी है मगर नीचे यमुना पर नजर जाते ही मन खट्टा हो गया यमुना को हमने गंदे नाले में तब्दील कर दिया है। जल में धोबीघाट चल रहा था और इस किनारे पर भैंसों के तबले दिख रहे है यह वही जगह है जहाँ स्लमडॉग को फेंका था। आखिरकार भीड़ में फसे हुए सुबहे-बनारस देखते न देखते काशीवासी हो जाने की स्थिति के साथ पहुँच गये। मौका था देश भर के हर हिस्से से आने वाले स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षकों के प्रशिक्षण व सेमीनार का।

कौन-कौन मिले सहभागी ………..
‘लोग मिलते गये कारवां बनता गया’

केन्द्रीय विद्यालय रेल कारखाना देश भर के कोने-कोने से आये हिन्दी शिक्षकों का जमावड़ा होता गया। अगले दिन तक सभी आपस में धीरे-धीरे परिचित हो चले। संख्या का अर्धशतक पूरा हो चला था। सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं के 8-8 9-9 में अकादमिक समूह बने जिनके नाम थे – प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी, प्रेमचंद और भारतेन्दु। काशी बनारस की इस भूमि से जुड़े इन कालजयी साहित्यकारों के नाम के समूह का एक विशेष अपनापन यहाँ लगना स्वाभाविक ही था। निदेशक श्री विजय कुमार जी, सहनिदेशक श्री एस एन शुक्ल, संसाधक डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय और श्री विन्ध्याचल गुप्ता से परिचय हुआ।
49 प्रतिभागी साथियों से मिलकर लगा कि सारे देश का एक छोटा सा रूप सामने है। कोलकाता संभाग से 5 साथी थे। डॉ. श्रीमती रंजना त्रिपाठी, श्रीमती अनुराधा पाण्डेय, श्री अमरनाथ, श्री ब्रजभूषण पाठक और श्री प्रमोद कुमार शर्मा। पटना संभाग से 2 प्रतिभागी डॉ. पूनम चौधरी और डॉ. विनीता राय, हैदराबाद संभाग से 4 प्रतिभागी श्री राजेन्द्र कुमार विश्‍वकर्मा, श्री सत्यनारायण सदानंद, श्री उमेश दोषी और डॉ. जी. मल्लेशम, लखनऊ संभाग से श्रीमती रजनी त्रिवेदी, श्री संतोष कुमार, श्रीमती गायत्रीदेवी, ओर श्री कृष्णकुमार पाण्डेय, गुवाहाटी संभाग से श्री धीरेन्द्र कुमार झा श्रीमती डॉ. निर्मल स्मिता कौल, श्री चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव, श्री कैलाशचन्द्र रैगर, श्री शरीफ आलम, श्री अश्‍विनी कुमार राय, श्री दीपक और श्री रवीन्द्र कुमार, भोपाल संभाग से श्रीमती अमिता शर्मा, श्री विश्‍वम्भर नाथ मिश्र,श्री प्रदीप कुमार सिंह और श्री किशोर पांचाले, सिल्चर संभाग से श्री बी.एल.जे. सारण, श्री मनोज कुमार सिंह, श्री धर्मवीर सिंह, श्री राजेश कुमार त्रिपाठी, श्री शशिभूषण कुमार, और श्री रामनारायण सिंह, बैंगलुरू संभाग से श्री उदयकांत ठाकुर, श्रीमती रेवती अय्यर, श्रीमती एन.सत्यलक्ष्मी, श्रीमती आर. शोभारानी, श्री तेजनारायण सिंह, और डॉ. रामकुमार सिंह (मैं), भुवनेश्‍वर संभाग से श्रीमती प्रणति सुबध्दि, श्री माइकल बैंग, और डॉ. आशुतोष पाण्डेय, चैन्नई संभाग से श्री शत्रुघ्न सिंह, डॉ. उमापति जैन, श्रीमती शोभना पी.के., श्री रतनलाल, श्रीमती शहिनशा शेख और श्रीमती लेखा टी.एल.।

‘शिक्षक बनाये स्वयं को दक्ष और समर्पित : श्री बी एल राय

9 तारीख को पुस्तकालय-कक्ष में परिचय कार्यक्रम और शुभारम्भ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री एल बी राय, मुख्य कार्मिक अधिकारी डीजल रेल कारखाना एवं अध्यक्ष विद्यालय प्रबंधन समिति ने कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में केवि शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सेमीनार का दक्षता विकास में बहुत योगदान है।
पहले सत्र से ही नियमित गतिविधियाँ शुरू हो गयीं। शिविर के निदेशक और संसाधकद्वय ने रूपरेखा तय कर दी।
भोजन के बाद दूसरे सत्र में तीन अक्षरों के उस डरावने शब्द से रचनात्मक सामना हो गया जिसे ‘परीक्षा’ कहते हैं। सार्थक प्रश्‍नावली के रूप में सभी प्रतिभागियों ने पूर्वज्ञान परीक्षा दी।

दूसरा दिन……..
हिन्दी कविता ने तय किये हैं अनेक पड़ाव : डॉ. प्रभाकर सिंह


काशी हिन्दू वि.वि. के हिन्दी विभाग के प्रवक्ता डॉ. प्रभाकर सिंह ने अपने व्याख्यान में धाराप्रवाह रूप से हिन्दी कविता की विकास यात्रा को न केवल सरलता से स्पष्ट किया बल्कि उतनी ही कुशलता से प्रवृत्तियों की विवेचना भी की। काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य तो लिये ही दार्शनिक और पाश्‍चात्य से दृष्टि को समुचित जगह देते हुए समकालीन कविता को समझने के लिए जरूरी दृष्टि को स्पष्ट किया। भारत भर में चलाये जा रहे हिन्दी पाठयक्रम में संकलित आधुनिक कवियों की कविताओं की भी उन्होंने व्याख्या की। खासकर मुक्तिबोध और कुंवर नारायण को समझने में एक नया विजन दिया।
दूसरे सत्र में शिक्षकों की अकादमिक गतिविधियाँ सुचारू रहीं। इस बारे में शिविर पत्रिका में कुछ इस प्रकार वर्णित है- ”भोजनोपरान्त श्रीमती रेवती अय्यर एवं अन्य साथियों द्वारा केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा प्रायोजित थिंक क्वेस्ट डॉट कॉम से संबंधित तमाम उपयोगी जानकारियों एवं उसके विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। इसके पश्‍चात श्रीमती अय्यर द्वारा प्रसाद सदन के प्रतिभागियों को संगणक कक्ष में थिंक क्वेस्ट डॉट कॉम पर विभिन्न प्रायोगिक कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया। डॉ. रामकुमार जी ने भी थिंक डॉट कॉम पर सारगर्भित जानकारी सदन को उपलब्ध कराई।” (पंत समूह का प्रतिवेदन पृष्ठ- 25)

जीवन-कौशलों पर सार्थक बहस …….

11 तारीख की उल्लेखनीय गतिविधियों में से एक है जीवन-कौशलों के बारे में सार्थक बहस । श्री विशम्भर नाथ मिश्र ने जहाँ अपने चिरपरिचित दार्शनिक अदांज में भारतीय ग्रंथों और अंग्रेजी में पाश्‍चात्य दर्शन की परिभाषाओं के साथ अपनी बात रखी। इसके बात एक ऐसे वक्ता से मेरा पहला परिचय हुआ जिसने अंतत: मुझे गहरे तक प्रभावित किया। ये हैं श्री धीरेन्द्र कुमार झा….। यहाँ बोलते हुए श्री झा ने जीवन-कौशलों का एक शिक्षाविद शोधार्थी की तरह तकनीकी ढंग से परिचय दिया। जीवन-कौशलों पर उनका पेपर भी एनसीईआरटी में प्रस्तुत हुआ है ऐसी जानकारी उन्होंने दी।
चूँकि विषय था – जीवन-कौशल जिनमें प्रमुख रूप से हमारे विद्यार्थियों में सामाजिक कौशल, विचार कौशल और वार्ता कौशल विकसित करने का लक्ष्य सामने रखा गया था। ऐसी स्थिति में अपनी बारी आने पर मैंने हनुमान की प्रबंधन क्षमता और जीवन कौशल के माध्यम से विषय को स्पष्ट करने का प्रयास किया जो मित्रों को बहुत पसंद आया। इस बारे में अभिमत रहा – ”डॉ. रामकुमार सिंह ने पाश्‍चात्य व भारतीय जीवन-मूल्यों के बीच सूक्ष्म अंतर स्पष्ट किये। महाबली हनुमान तथा सुग्रीव आदि के माध्यम से अंतर्निहित जीवन-कौशल को स्पष्ट किया।”(स्मारिका पृष्ठ – 26 से साभार)

एनसीएफ के व्यावहारिक पक्ष पर जोर देने की जरूरत : डॉ. निरंजन सहाय
प्रश्‍न पूछना बच्चों का लोकतांत्रिक अधिकार


काशी विद्यापीठ के शिक्षाविद् प्रो. (डॉ.) निरंजन सहाय न केवल राष्ट्रीय पाठयचर्या के विशेषज्ञ हैं बल्कि वे इसकी विभिन्न समितियों तथा हिन्दी पाठयपुस्तक निर्माण कार्य समितियों के सदस्य रहें हैं इस नाते उनसे संवाद होना एक खास उपलब्धि है। 12 तारीख को वे सेमीनार में आये। एनसीएफ-2005 के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाष डालते हुए उन्होंने शिक्षण के क्षेत्र में व्यापक सामाजिक सरोकार की बात करते हुए, बच्चों द्वारा प्रश्‍न पूछने के जनतांत्रिक अधिकार का समर्थन किया। उन्होने रटने की अपेक्षा समझने की प्रक्रिया पर बल दिया। साथ ही ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ने की अनिवार्यता पर बिंदुवार विवेचना व विश्‍लेषण करते हुए यह कहा कि आज की शिक्षा प्रणाली शिक्षक केन्द्रित न होकर सामाजिक सरोकार, पर्यावरण, जैव विविधता,व तात्कालीन परिस्थितियों के प्रति भी केन्द्रित होना चाहिए। तथा आज के अध्यापकों को इस तरह का वातावरण निर्मित करना चाहिए जिससे बच्चे अपने ढंग से विचार व्यक्त कर सकें।
डॉ.निरंजन सहाय आ रहे हैं यह एक दो दिन पहले से चर्चा चल रही थी और मैं अनेक प्रश्‍न उनके सामने रखना चाहता था ताकि सार्थक संवाद के साथ अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सके। परंतु इस दिन संगणक कक्ष में तैनाती होने से संवाद नहीं हो पाया । संसाधक श्री पाण्डेय जी ने बताया कि डॉक्टर साहब ने एक दिन और आने का वायदा किया है।

……और बनारस से रूबरू होने का वक्त

आखिर 14 तारीख को वह दिन आ गया जिसकी सभी को प्रतीक्षा थी। मौका था बनारस भ्रमण का। श्री प्रदीप कुमार सिंह के संयोजन में दल निकल पड़ा। बस सबसे पहले जाकर रूकी कबीर के द्वार पर। मेरे लिए यह अत्यंत हर्ष और भावुकता का विषय था जबकि मैं कबीर के प्राकट्य स्‍थल लहरतारा में खड़ा था। आज जबकि ‘सर्जना’ के लिए यह आलेख लिख रहा हूँ तब कबीर की जयन्ती है। यह एक सुखद संयोग है।

(कबिरा तेरे द्वार पर……-एक)

(कबिरा तेरे द्वार पर…..-दो)

(कबीर प्रतिमा, कबीर प्राकट्य स्‍थली, लहरतारा, काशी)

( कबीर प्राकट्य स्‍थली, लहरतारा, काशी)

यहाँ से हम लोग सीधे सारनाथ रवाना हुए। खास बात यह है बुद्ध से जुड़े इस महान स्थल पर इन दिनों विशेष महोत्सव चल रहा था। सारनाथ में सबसे पहले श्री दिगम्बर जैन मन्दिर के दर्शन किये। यहाँ जैन धर्म के 11 वें तीर्थंकर श्री श्रेयांसनाथ की गर्भ-जन्म व तपोस्थली है। जो सिंहपुरी नाम से ख्यात है।

( श्रीलंका के श्री अंगारिका धर्मपाल की प्रतिमा)

इसी मंदिर के पास स्थित बुद्ध का विशाल मंदिर और उसमें स्थापित भव्य प्रतिमा के दर्शन किये। मंदिर मे बुद्ध की प्रिय शांति बनाये रखने के विशेष निर्देश श्रृध्दालुओं को दिये गये। यहीं प्रांगण में तथागत ने अपने पाँच प्रिय शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया। इस स्थान पर उस वृक्ष के नीचे लगी बुद्ध की सभा को देखकर मैं उसी काल में पहुँच गया और लगा बुध्द मुझसे ही संबोधित हैं।

(बुद्धं शरणम् गच्‍छामि……बुद्ध का प्रथम उपदेश)

(बुद्ध का प्रथम उपदेश – वृक्ष)

(मुख्‍य स्‍थल – ध्‍यानस्‍थ बुद्ध की प्रतिमा)

(मुख्‍य स्‍थल – ध्‍यानस्‍थ बुद्ध मंदिर प्रवेश द्वार)

(बुद्ध और बाजार…….)

(संघ शरणम् गच्‍छामि….सारनाथ में शिक्षकों का दल)

(हम पंखों से नहीं, हौसलों से उडान भरते हैं…तथागत से भेंट करने आये श्री विश्‍वकर्मा)

मेरे मन में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तम्भ को समक्ष में देखेने की बड़ी जिज्ञासा थी। बातचीत में पता चला कि स्तूप से स्तम्भ गिर गया था इसलिए आजकल संग्रहालय में रखा गया है। सभी लोग संग्रहालय की ओर बढ़े। भाई प्रदीप कुमार सिंह जी ने सभी प्रबंध किये। मोबाइल और कैमरे अंदर नहीं ले जा सके तो मुझे कुछ मायूसी हुई। मैं चाहता था कुछ खास फोटोग्राफ सर्जना पर जारी कर सकूँ।
संग्रहालय बड़ा भव्य और अंतर्राष्ट्रीय है। प्रवेश करते ही सामने भारतीय राजसी अस्मिता की पहचान आदमकद अशोक स्तम्भ रखा है ऊपर का चक्र अलग स्थापित है। बाकी संरचना कमोवेश अभी तक सुरक्षित है । संग्रहालय में आधा दर्जन से अधिक वातानुकूलित वीथिकाएँ हैं जहाँ शताब्दियों पार की छोटी बड़ी पाषाण प्रतिमाएं व दुर्लभ पुरातात्विक वस्तुएँ रखी गयीं हैं। खास बात यह है कि एटीएम मशीन की तरह लगे कम्प्यूटरों से किसी भी वीथिका और कृति की विस्तृत जानकारी यहाँ ऑनलाइन की गई है। दो जापानियों युवतियों से शिव की विशाल प्रतिमा के बारे में सांकेतिक बातचीत बड़ी रोचक रही। सभी वीथिकाओं में सर्वप्रधान आकर्षण है बुद्ध की केन्द्रीय विशाल प्रतिमा जो अपने निर्माण काल को ज्यों का त्यों उपस्थित कर देती है। मैं करीबन 30 मिनट पर इस पर सम्मोहित रहा। संसाधक श्री पाण्डेय जी ने झकझोरकर कहा कि अवधूत बनने से काम नहीं चलेगा, परीक्षा में इस यात्रा से सवाल पूछे जाने हैं….सभी का ठहाका गूंज गया। मुझे दो तीन अन्य चीजों ने और आकर्षित किया। महाशिव की दिव्य और भव्य प्रतिमा ने बड़ औदात्य प्रदान किया। इसके अलावा देवनागरी के विभिन्न रूपों के विकासक्रम को प्रवेश वीथिका में ही बांयी ओर एक विशाल पेंटिग की तरह लगाया गया है इसका छायाचित्र नहीं ले पाने का बड़ा खेद है। मैं इसे अपने विद्यार्थियों को बताना चाहता था। संग्रहालय में कुछ मूर्तियों के स्थान रिक्त थे केवल फोटो लगे थे ओर लिखा था कि मूर्ति चीन में चल रही प्रदर्शनी के लिए गई हैं। मैंने गौर किया कि जो मूर्तियां चीन ने चयनित की हैं उन सभी में बुद्ध के चेहरे एन्थ्रोपोलोजिकल ढंग से चीन के मानवीय शक्लों से मिलते हैं। कैसे महामानव को अपने अपने दृष्टिकोंण से दुनियाँ ने देखा है।
संग्रहालय को देख चुकने के बाद सभी चिड़ियाघर देखने गये। मेरी दिलचस्पी इसमें नहीं पुरास्थलों अधिक थी। मैं अपने कुछ साथियों श्री टी एन सिंह जी, श्री विश्‍वकर्मा जी, भाई प्रमोद जी, माइकल सर, और मनोज जी के साथ एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। यहां से निकलकर हम लोग चौखण्डी स्तूप पहुंचे जहां सभी ने भोजन ग्रहण किया। स्तूप पर ऊपर चढ़ने की होड़ शुरू हो गई।

(चौखण्‍डी स्‍तूप, जहां बुद्ध को प्रथम शिष्‍य मिले)

आगे एक स्थान पर बस रुकी। पाण्डेय जी ने बताया कि यह भारत माता का मंदिर है। देखा तो नयी अनुभूति हुई। सोच रहा कि हाथ में झण्डा लिये सिंहवाहिनी मां भारती की मूर्ति होगी। मगर ऐसा नहीं था। फर्श पर संगमरमर से सम्पूर्ण भारत का नक्शा दिव्य ढंग से उकेरा गया था। हिमालय से सागर तक हर स्थल के नाम उकेरे गये थे। यही है हमारी भारत माता। लगा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की बात यहाँ साकार है।
मेरा और कुछ अन्य साथियों का विशेष मन प्रेमचंद के गाँव लमही में जाने का था। प्रसाद जी के घर जाने का था। लेकिन पता चला कि रास्ते में एक पुलिया का निर्माण होने से लमही जाने का रास्ता इस ओर से जाने का बंद है। अगर दूसरे रास्ते से जाते हैं तो तकरीबन 15 किमी से ज्यादा अतिरिक्त लगेगा और जाम भी हो सकता है। इस तरह बस वाले ने असमर्थता जाहिर कर दी। फिर फैसला हुआ कि अंतिम पड़ाव से पहले काशी नरेश के किले की सैर कर ली जाये।
रामनगर पहुंचने में लगभग आधा घंटा लगा। किले की ओर बढ़ते हुए दोनों ओर बने भवनों की संरचना को देखकर अनुमान हो गया कि किस तरह राजा की सवारी निकलती होगी। पता चला यहाँ की रामलीला भारतप्रसिध्द हुआ करती थी। बाद में मुरैना पहुंचने पर मुझे पता चला कि करह आश्रम के संत रामदास जी महाराज भी काशी की रामलीला में राम का पाठ अदा किया करते थे। मुझे बहुत खुशी हुई। अस्तु……किले में अब उजड़ी हुई सल्तनत का ही आभास होता है। वर्तमान राजा श्री अनंत नारायणसिंह एक भाग में निवास करते हैं। शेष हिस्से की पुरानी चीजों जैसे बघ्घियाँ, वेषभूषा, संगीत का सामान, बंदूकें आदि। ज्योतिषी घड़ी अतिविशिष्ट लगी जो आधुनिक विज्ञान को भी बौना कर दे। यहां से भी लोग रेल कारखाना लौट पड़े। मेरे मन में गंगा दर्शन और बीएचयू परिसर में जाने की विशेष उत्कंठा थी जो किसी ओर दिन अकेले ही जाकर पूरा करने की ठानी। कुल मिलाकर यह बनारस दर्शन बड़ा ही रोचक और स्मरणीय रहा।
15 तारीख को भी रोज की तरह सुबह की गतिविधियाँ शुरू हो गई। आज का दिन इसलिए भी खास माना जा रहा था कि सहायक आयुक्त श्रीमती चित्रलेखा गुरुमूर्ति शिविर में आने वाली थीं।
पहले सत्र में मेरा पावर प्वाइंट प्रस्तुतीकरण था। मैंने अपनी प्रिय कविता रघुवीर सहाय की ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ को पढ़ाया। अप्रत्याशित रूप से साथियों ने सराहा और मुझे विशेष स्‍नेह प्राप्त हुआ ।
हिन्दी शिक्षक स्वयं को नयी चुनौतियों में ढालें : शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत
अगले सत्र में सहायक आयुक्त से पहले शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत का सम्बोधन मुझे अत्यंत प्रभावकारी लगा। उन्होंने कहा कि हिन्दी शिक्षकों को समकालीन जरूरत के मुताबिक खुद को ढालना पड़ेगा। हिन्दी भाषा शिक्षक स्वयं को अपडेट रखे। लगातार नयी पुस्तकें पढ़े। आधुनिक तकनीकी ज्ञान से भी लैस हों। श्री पंत ने यह भी कहा कि हिन्दी शिक्षण का क्या प्रयोजन है यह विद्यार्थी के सामने स्पष्ट करना होगा। नही तो हिन्दी धारा में विद्यार्थियों की घटती संख्या चिंताजनक हो जायेगी। श्री पंत ने जिस धाराप्रवाह ढंग से विचार व्यक्त किये वे निश्‍चय ही प्रभावित कर गये।

भाषा के भीतर रचनाप्रक्रिया तक जाने की जरूरत : सहायक आयुक्त श्रीमती चित्रलेखा गुरूमूर्ति
श्रीमती चित्रलेखा गुरूमूर्ति सादा जीवन उच्च विचार से युक्त शिक्षाविद् हैं। सहायक आयुक्त पद पर रहते हुए उनकी सादगी अनुकरणीय हैं हिन्दी के उनके ज्ञान पर साधुवाद है। भाषा शिक्षण की अनेक बारीकियां उन्होने सहज ही बता दीं। ‘मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या’ इस कविता के उदाहरण से उन्होंने बताया कि कविता का शब्दार्थ भर मूल्यवान नहीं है उस स्थिति में जाकर यह समझना होगा जिस स्थिति में मजदूर धनाढयों के निर्माण् को अपने स्वाभिमान के सामने तुच्छ मानता है। उसकी रचनात्मक प्रक्रिया को समझना होगा। निष्चित रूप से श्रीमती गुरूमूर्ति द्वारा सुझायी गई भाषा शिक्षण तकनीक उपयोगी रहीं।

हिन्दी गजल के प्रवर्तक हैं अमीर खुसरो : डॉ. वशिष्ठ अनूप


16 तारीख को शिविर की मुख्य उपलब्धि रही काशी हिन्दू विवि के प्रोफेसर और हिन्दी गजल के विशेषज्ञ होने के साथ साथ गीत गजल के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. वशिष्ठ अनूप से रूबरू होना। अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान में डॉ. साहब ने हिन्दी गजल की जिस यात्रा का विस्तार से वर्णन किया उसने कई नये तथ्यों को उजागर किया। आमतौर से दुष्यंत तक सीमित जानकारी में इस व्याख्यान से बड़ा इजाफा हुआ। डॉ. अनूप की सबसे बड़ी विशेषता खुसरो से लेकर अब तक गजल की हिन्दी धारा की खास पहचान और उसको चिन्हित करने का तरीका। अमीर खुसरो को हिन्दी गजल का प्रवर्तक बताते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में भी भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र से लेकर प्रसाद, निराला, त्रिलोचन शास्त्री और शमशेर तक ने अच्छी गजलें लिखीं हैं। उन्होंने कहा कि इन कवियों का पठन-पाठन करते हुए इस दृष्टिकोंण को भी ध्यान में रखने की आवष्यकता है। डॉ. वषिष्ठ द्वारा दुष्यंत कुमार की गजल ‘कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए’ का कृति केन्द्रित पाठ समालोचनात्मक दृष्टि के वैशिष्टय के साथ किया जिसकी नवीन व्याख्या अत्यंत मौलिक रही।
उनकी स्मृति भी खास है कि अनेक उद्दहरण जुबानी याद हैं। व्याख्यान उपरांत जिज्ञासाओं में डॉ. साहब से मैने निवेदन कि गीत-नवगीत और हिन्दी गजल पर किये जाने वाले शोध-समीक्षा कार्यों में अनेक उदाहरण दोनों हिस्सों में मिलते हैं कही उसी गीत को नवगीत कह दिया गया है तो कहीं गीत के तरह की रचना को हिन्दी गजल में गिना गया है। डॉ. साहब ने बहर (छन्द) के स्वरूप के अलावा गजल की कुछ खास पहचान से भी अवगत कराया और स्पष्ट किया कि यदि ऐसा किया जा रहा है तो यह गलत है।

गद्य साहित्य के केन्द्र में आज अनेक जरूरतें
डॉ. निरंजन सहाय का व्याख्यान

17 तारीख को काशी विद्या पीठ के प्रोफेसर डॉ. निरंजन सहाय एक बार फिर देश भर के कोने कोने से आये हिन्दी शिक्षकों से मुखातिब थे। उन्होंने हिन्दी गद्य लेखन के इतिहास पर विस्तार से प्रकाष डाला। गद्य और कविता के सूक्ष्म अंतर और वर्तमान में गद्य साहित्य के केन्द्र में होने के अलावा इससे जुड़ी अनेक जरूरतों पर भी चर्चा की । डॉ. सहाय का शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोंण अधिक प्रभावी रहता है।
व्याख्यान उपरांत जिज्ञासाओं के क्रम में मैंने समूचे सदन की ओर से पाठयपुस्तकों में गद्य पाठों की कुछ अवधारणात्मक त्रुटियों पर निवेदन किया। दरअसल डॉ. सहाय पाठयपुस्तक निर्माण समिति और राष्ट्रीय पाठयचर्या से जुड़ी अनके परियोजनाओं से सक्रिय रूप से जुडे हैं।
मेरे संगीत अनुराग और वाद्ययंत्र-वादन क्षमता का समुचित उपयोग सुनिश्‍चत करने हेतु प्राचार्य श्री विजय कुमार ने हारमोनियम तबला और अन्य सामग्री मेरे नाम पर जारी कर दी थी। रोज प्रार्थना-सभा में मेरी तैनाती कर दी गई। कि चाहे किसी समूह का आयोजन हो मुझे संगीत अभ्यास कराना ही है। इस स्नेहमय आदेश से हुआ यह कि मेरा कमरा देर रात तक संगीत की स्वरलहरियों से गूँजता रहता था। एक विद्यार्थी और उसके भोजपुरी दल ने रोज समां बांधा। सहभागी शिक्षिकाओं ने भी रोजमर्रा मुझे स्नेह से सराबोर कर रखा था। मेरे मित्र चुहल करते और कहते कि कृष्ण गोपियों से घिरे हैं और ठहाका गूँज उठता।

.इससे पहले शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत का सम्बोधन सुनने को मिला। एक तेजतर्रार शख्सियत होने के साथ-साथ हिन्दी की दशा और दिशा के सम्बन्ध में भी उनकी अद्यतन जानकारी और तेवर निश्चित रूप से हिन्दी शिक्षक के व्यक्तित्व को अधुनातन बनाने में योग दे सकता है।
अगले दिन 17 मई को प्रोफेसर निरंजन सहाय द्वारा गद्य लेखन के इतिहास पर चर्चा हुई। आज प्रो. सहाय ने अपनी जिज्ञासाओं के अलावा पाठ्यपुस्तकों में गंभीर त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने का अवसर प्राप्त हुआ। अनेक तथ्यों को उन्होंनें सकारात्मक ढंग से लिया और सहमति भी व्यक्त की। इस विषय में स्वतंत्र रूप एक लेख लिखा जा सकता है। इसी दिन विदिशा से आये प्राचार्य श्री जी पी यादव ने जिस अंदाज में प्रशासनिक और कार्यालयीन कार्य-व्यवहार से सम्बन्धित प्रश्नों के तार्किक जबाब दिये उस शैली ने निश्चित रूप प्रभाव छोड़ा।
रोजाना गीत-गजल और काव्य-पाठ का दौर चलता ही रहा। अनेक वाकये स्मृति का हिस्सा बनते चले गये।

जब झा बोलते हैं तो सिर्फ झा बोलते हैं…….

वरिष्ठ कवि स्व. पं. छोटेलाल भारद्वाज से एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने समय के उन रचनाकारों का उल्लेख किया जो ‘राम की शक्ति पूजा’ कविता के कंठस्थ होने के कारण उस समय बडे ही प्रभावशाली माने जाते थे। मुझे नहीं पता था कि इस शिविर की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में एक ऐसी शख्सियत से भेंट होगी जिसके व्यक्तित्व में भगतसिंह और मुक्तिबोध सा आक्रोश और ओज है। श्री धीरेन्द्र झा उन व्यक्तियों में से जिनके मुंह से ‘राम की शक्ति-पूजा’ कविता का ओजपूर्ण कंठस्थ पाठ सुनना मेरे जीवन की एक बड़ी उपलब्धि में मानता हूं।
रोज रात हरी घास पर घंटों बैठकर गीतों गजलों और कविताओं का दौर चलता रहा। मेरे साथी होते श्री झा, भाई प्रदीप जी, आशुतोष जी, सिंह साहब, चुम्मन प्रसाद जी, धर्मवीर जी, और शत्रुह्न जी सहित कुछ और साथी। महफिल का सबसे बड़ा आकर्षण मुझे लगता झा साहब से नीरज के गीत….उसी अंदाज में ……जिसमें मैने कभी नीरज जी को आमने-सामने सुना था……। अद्भुत । झा साहब तो बस नीरज में डूब जाते हैं।
और भाई प्रदीप के बारे में क्या कहें……शुद्ध इलाहाबादी अंदाज । अपनी-अपनी प्रेमकथाओं का दौर चला तो रात भर पेट पकडे हंसते रहे। किस तरह भैंस खोने पर गायत्री मंत्र का जाप……..खेत में से निकल कर सामने आ जाना……पेड़ से कूदकर ठीक बीच में आना, एक बार पकडे़ जाने पर चाची का वह जुमला…..’ई का है हो…..’ । और भाई आशुतोष का बचपन का वह प्रेम जो कभी भड़भूंजे पर परवान चढ़ा। लगता है ये सारी कथायें पिरोने पर एक उपन्यास का प्लाट तैयार हो जाये। अद्भुत …..सब।
और चलते-चलते अश्‍िवनी भैया द्वारा पढी गई वो भोजपुरी कविता्…….‘पप्‍पू की दुलहिनि की चरचा कालोनी के घर-घर में………
बारह दिन बाद बापस चला तो लगा उस कमरे में कुछ छूटता जा रहा है। दुनियां कितनी छोटी है या बडी कुछ नहीं कह सकता । मगर मन के किसी कोने में एक बात है कि काश फिर वे क्षण दर्ज हो जायें………………….

झलकियां – कैमरे के कैद क्षण

(केवि,डीरेका के प्राचार्य श्री विजय कुमार, सम्‍बोधित करते हुए)

(प्रात:कालीन सभा का दृश्‍य – डॉ के के पाण्‍डेय प्रतिवेदन का वाचन करते हुए)

(संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्‍डेय, रूपरेखा बताते हुए)

(प्रार्थना सभा – तीन)

(कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक के ……हिन्‍दी शिक्षकों का समागम -एक)

(समागम – दो)

मालवीय जी की छाया में

जैन मंदिर

रामनगर के किले में

बुद्ध का प्रागंण

बीएचयू के बाबा विश्‍वनाथ

बुद्ध की पहली महापंचायत

उपदेश वृक्ष के नीचे

जहां मौन बन गया उपदेश, संबोधि ने रूप लिया अभिव्‍यक्‍ित का

शांत हो वत्‍स। तथागत समाधि में है……

रामनगर के किले का विहंगम दृश्‍य


(श्री विजय कुमार, प्राचार्य केवि,डीरेका, सेमीनार को सम्‍बोधित करते हुए)


(साथी डॉ आतुतोष पाण्‍डेय जी भाजपुरी लोक-संगीत गाते हुए)


(निराला जी पर शोधरत भाई सीपी श्रीवास्‍तव जी, महिलायें जिनका पूर्ण हिन्‍दी नाम लेते संकोच करती हैं)


(जेएनयू, पर्सियन स्‍टडीज विभाग के विद्वान सम्‍बोधित करते हुए)


(ससाधक श्री व्‍ही सी गुप्‍ता सबोधित करते हुए)


(हिन्‍दी विभाग बीएचयू के अध्‍यक्ष डॉ राधेश्‍याम दुबे भक्‍ितकालीन काव्‍य पर प्रकाश डालते हुए)


(साथी मनोज जी अपने विचार रखते हुए)

(श्रीमती रेवती अय़यर के मार्गदर्शन में थिंकक्‍वेस्‍ट कार्य)

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3 responses to “बारह दिन बनारस में

  1. Aapki sarjana se judkar bahut achchha lag raha hai.Aapki anubhutiyaan ,gajal samiksha aur beete palon ko ek baar phir se jine ka sukhad anubhav lazawab hai !
    chalte-chalte ek prashn-hindi me kaise comment post karun?

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