”नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”/पुस्तक-समीक्षा/सरस्वती-पुत्र

सरस्वती-पुत्र के बारे में
ये युवा, कवि, कहानीकार और पत्रकारिता में डिग्रीधारी हैं। स्वभाव और रहन-सहन मुक्तिबोध की याद दिलाता है। कई वर्षों से जानता हूँ। इनकी कई रचनायें, कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। थोडे से लापरवाह हैं। मेरे आग्रह पर एक पुस्तक-समीक्षा कई महीनों पहले लिखी थी। ‘सर्जना’ पर जारी कर रहा हूँ।
—————————–
कुरुक्षेत्र : युध्द क़ी जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन
रामबरन ‘सरस्वती-पुत्र’

पुस्तक : ‘कुरुक्षेत्र’
कवि : रामधारी सिंह ‘दिनकर’
प्रकाशक : राजपाल एण्ड संस्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली

————

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का प्रबंध-काव्य ‘कुरुक्षेत्र’ एक विचार-प्रधान काव्य है। विचारों की सघनता में काव्य की पौराणिक या मिथकीय ऐतिहासिकता के महत्व का परीक्षण करने की आवश्यकता मंद हो जाती है। समूचे प्रबंध की एकता उसके विचारों को लेकर है। जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।
दिनकर जी के ‘कुरुक्षेत्र’ का सृजन उस समय हुआ जब द्वितीय विश्व-युध्द का काल था। दुनियाँ के सामने युध्द क़े भीषण परिणाम उपस्थित थे। इस महायुध्द के अमानवीय कृत्यों ने मानव-समाज को एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। ‘हिरोशिमा’ और ‘नागासाकी’ की आग अभी शांत नहीं हुई थी। संसार की महाशक्तियों में आणविक अस्त्र-शस्त्रों की होड़ बढ़ने लगी। ऐसे समय में युध्द के घातक परिणामों को बताने के लिए दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ का उदय हुआ। महाभारत में कौरवों का विनाश हुआ, किन्तु युध्दिष्ठिर को शांति नहीं मिली। पराजित मारे गये और विजेता जीतकर भी हार गया। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद भी ऐसा ही हुआ। जो हारे, वे राष्ट्र सामाजिक व आर्थिक रूप से कई सदी पीछे पहँच गये। जो विजेता थे वे भी संतुष्ट नहीं थे। इस तरह युध्द की जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन ‘कुरुक्षेत्र’ में मिलता है।
विश्व की महाशक्तिओं रूपी युध्दिष्ठिर को ऐसे भीष्म की आवश्यकता थी नव-विश्व के निर्माण में उसका मार्गदर्शन करे। उन्हें भीष्म मिला या न मिला कुछ नहीं कह सकते, किंतु महाभारत युध्द के बाद ‘कुरुक्षेत्र’ प्रबंध काव्य के युध्दिष्ठिर को भीष्म अवश्य मिला और उसका मार्गदर्शन किया। भीष्म का वह चिंतन समाज के लिए आज भी श्रव्य और अनुकरणीय है।
समूचे प्रबंध में दो पात्र हैं – गंगापुत्र भीष्म और धर्मराज युध्दिष्ठिर। महाभारत की विजय युध्दिष्ठिर को संतोष नहीं दे सकी। उसके मन में कई शंकाएँ बस गईं। भीष्म अपने उपदेश के माध्यम से युध्दिष्ठिर को सांत्वना देते हैं। तब युधिष्ठिर राज-सिंहासन को स्वीकार करने को तैयार होते हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ की मूल कथा की संरचना यही है। किन्तु इसकी समकालीन वैचारिकता के अनेक आयाम हैं।
सम्पूर्ण ‘कुरुक्षेत्र’ भीष्म के चिंतन से भरा पड़ा है। यह चिंतन आदि से अंत तक अनवरत चलता रहता रहा है। युध्द-शांति, राजा-प्रजा और भाग्य-कर्म जैसे द्वंद्वात्मक विषयों को यह अपने में समेटे है। दिनकर का उद्देश्य यही था कि वे अपने विचारों को मानव-समाज तक पहुचा सकें। महाभारत की घटना से जोड़कर तो मात्र काव्य का कलेवर गढ़ा गया है।
कवि के विचार ‘कुरुक्षेत्र’ में युध्द-विरोधी रहे हैं। युध्द के दुष्परिणामों से सम्पूर्ण काव्य भरा पड़ा है। उन्होंने युध्द क़ो निन्दित और क्रूर कर्म माना है। किन्तु, सभी विकल्पो के असफल होने पर युध्द को नकारा नहीं जा सकता। जब अंतिम विकल्प के रूप में युध्द होता है तब शांति होती है। युध्द से सम्बन्धित ऐसे ही विचार भीष्म ने धर्मराज को बताये-
”युध्द को तुम निन्द्य कहते हो, मगर/जब तलक है उठ रही चिनगारियाँ
भिन्न स्वार्थों से कुलिश-संघर्ष की/युध्द तब तक विश्व में अनिवार्य है”
युध्द का असली कारण समाज में ‘असमानता’ है। वह चाहे किसी भी रूप की हो। जब तक समाज में ‘समानता’ की स्थापना नहीं हो सकती, तब तक किसी न किसी रूप में युध्द चलता ही रहेगा।
”शांति नहीं तब तक, जब तक /सुख-भाग न नर का सम हो
नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”
सहज रूप में कोई किसी से लड़ना नहीं चाहता है। व्यक्ति शांति और प्रेम से अपना जीवन जीना चाहता है। ऐसी प्रकृति शांतिप्रिय लोगों में होती है। दुराचारी व्यक्ति सहज शिष्ट-मानव की इस स्वाभाविकता की अवहेलना करता है और युध्द की अनिवार्यता की परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।
”किसी दिन तब महाविस्फोट कोई फूटता है
मनुज ले जान हाथों में दनुज पर टूटता है।”
दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ में ‘सप्तम सर्ग’ का अपना विशिष्ट महत्व है। यह सर्ग प्रबंध का उपसंहार तो है ही, भारत की वर्तमान पीढ़ी को कई संदेश भी देता है। सन्मार्ग पर चलने का ही नाम जीवन है। संसार से पलायन कर जंगल जाने की प्रवृत्ति उचित नहीं है। यह तो जीवन से मुँह मोड़ लेना है। एक तरह की कायरता है, जीवन से निरंतर संघर्ष करते हैं, वे ही लोग समाज के लिए आदर्श हैं। पलायनवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए भीष्म कहते हैं-
”धर्मराज, क्या यती भागता
कभी गेह या वन से?
सदा भागता फिरता है वह
एकमात्र जीवन से”
हिंसा, विनाश, युध्द, असमानता ये सभी व्यक्ति के ‘कर्म-पथ’ से भटकने के परिणाम में घटित होते हैं। मात्र व्यक्तिगत सुखों को भोगने के कारण ही असमानता की जहरीली धारा फूटती है। सभी मनुष्य अपने कर्म में लीन रहें तो समाज से अराजकता को समाप्त किया जा सकता है। कवि ने स्वीकार किया है कि राजा-प्रजा कुछ नहीं होता, ये दोनों ही मनुष्य के रूप हैं। अत: सभी को अपने मानवोचित कर्म के माध्यम से इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में अपना योगदान देना होगा। तभी युध्द, अशांति और संघर्ष से बचा जा सकता है।
‘भाग्यवाद’ और ‘कर्मवाद’ का कवि ने अपने विभिन्न तर्कों से खंडन किया है। ‘कुरुक्षेत्र’ में भाग्य पर कर्म की विजय है। भाग्यवाद केवल प्रंपच और प्रताड़न है। वह पाप का आवरण है। जिससे एक व्यक्ति दूसरे के हिस्से को अतिक्रमित रखना चाहता है। भाग्यवाद का सहारा लेकर दुराचारी व्यक्ति श्रमिक के भाग को स्वयं हड़प जाते हैं। अपने कठोर परिश्रम से व्यक्ति असंभव को संभव कर सकता है। कर्म-पथ पर चलकर भाग्य को बदला जा सकता है। कवि के शब्दों में-
”ब्रद्दमा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है
ब्रद्दमा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी
धोते वीर कु-अंकु भाल का बहा भ्रुवों से पानी”
अपने कर्मानुसार जीवन जीकर ही संसार की विषमता को समाप्त किया जा सकता है। तभी समानता के आधार पर प्रकृति का कण-कण जन-जन का हो सकता है। तभी मानव के अधिकार सुरक्षित हो सकते हैं। अभावों को दूर किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में ही राजा-प्रजा का भेद मिट सकता है। न कोई पूँजीपति होगा न कोई मजदूर। संसार का एक नया रूप होगा। इस तरह दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में एक सुखमय और शांतियुक्त समाज की परिकल्पना है।

रामबरन ‘सरस्वती-पुत्र’
पता : लिटिल ऐंजिल कान्वेन्ट स्कूल
गांधी कॉलोनी, मुरैना- 476001
मध्यप्रदेश

Advertisements

2 responses to “”नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”/पुस्तक-समीक्षा/सरस्वती-पुत्र

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s