‘पत्थर पर घास’/कविता-संग्रह/डॉ. रामकुमार सिंह

इस संग्रह के बारे में……..
18 साल पहले …..
चम्बल के मुख्यालय मुरैना की सड़क – एम.एस. रोड पर कक्षा-नवमीं का एक विद्यार्थी जा रहा है। उसके साथ उसका एक पड़ोसी……….मित्र भी। उसने पूछा कि ‘पत्थर पर घास’ मुहावरे का अर्थ क्या है। उस विद्यार्थी ने जबाब दिया….’असंभव को संभव बना देना’ । गलत!! ……….वह बोला….सही उत्तर है – मूर्खतापूर्ण प्रयास करना।
अब……….
‘पत्थर पर घास’ संग्रह को ‘सर्जना’ पर जारी करते हुए मुझे प्रसन्नता है। इस संग्रह की ज्यादातर कवितायें मेरे विद्यार्थी जीवन में लिखी गईं हैं। जिन कविताओं में विमर्श है वे बाद की हैं। उसी समय से मैं…..यानी वह विद्यार्थी यह सोचता रहा कि ‘पत्थर पर घास’ क्यों नहीं उग सकती। मुझे नहीं पता कि मैं सही था या वह । समकालीन जीवन को देखकर लगता है बदलाव के प्रयास मूर्खतापूर्ण ही तो नहीं। लेकिन मन कहता है कि पत्थर पर घास उग आयेगी ….शायद। यह संग्रह मेरे उसी बालसखा को समर्पित है। एक दुर्घटना में उसकी रीढ़ की हड्डी को क्षति हुई। जल्द ही उस मित्र का छायाचित्र व विवरण ‘सर्जना’ पर दूँगा। ————–

कविता : रामकुमार सिंह
पत्थर पर घास -एक


वह निर्लिप्त भाव से जुटा था
चाहता था पत्थर पर घास उगाना
एक गंभीर संतोष,
सतत उपक्रम
और मौन।
यथार्थ का बंजर धरातल
किस नमी में
किस प्रकाश से
किस हवा में
संभव हो सकेगा पत्थर पर घास उगाना
केवल वो बीज पर्याप्त नहीं
जो उसने छाती से लगा रखा था
उसे बँधाया गया था ढांढस
दिखाई गई थी एक आस
कि पहले भी जो कर चुके हैं प्रयास,
विचारों की शक्ति से
असंभव को संभव कर दिखाने का
वो सफल हो सके हैं
उगाने में
पत्थर पर घास

———————————-

चार कविताएँ : रामकुमार सिंह

जल-रेखाचित्र

मैंने खूब साधा
तुम्हें
कभी तुम्हारे हाथ थामता हूँ, तो-
चरण अदृश्य हो जाते हैं
कभी मस्तक टटोला, तो-
ज्ञात हुआ कि-
तुम्हारी बाँह हवा हो गयी है
मेरे मनोभावों की करते हुए अवहेलना
तुम्हारे अंग-उपांग
एक-एक करके
होते जा रहे हैं ओझल
कर रहा हूँ भरसक प्रयास, पर-
नहीं कर पा रहा हूँ पूर्ण
आकृति तुम्हारी
तुम हो
मेरी मेज पर
जल-बूँद की खींचातानी से बने
रेखाचित्र।

आप


आपकी उपस्थिति मात्र
मेरे लिए
भय का सरोकार है
निर्मूल आशंका है, या-
व्यक्तित्व का प्रकार है
या तो आप धन्य हैं,या-
मुझे धिक्कार है

दृष्टि

नेपथ्य में दृष्टि
अनेक वस्तुएँ चिपकी हैं दीवार पर
शून्य में भी पर्याप्त आधार है
पर फिसलती है निरंतर
रुकेगी अवरोध से या अभीष्ट पर
यदि नहीं
तो फिर क्या है यह दृष्टि?
अर्धमृत ऑंखें
मृत दृश्यों में
जीवन खोज रही हैं

दायरे

मैंने अपने दायरे नहीं बनाये
इसलिए, ताकि-
आपके दायरों में आ-जा सकूँ
इसलिए, ताकि-
मेरा दायराविहीन व्यक्तित्व
आपकी प्रेरणा(?) बन सके
और-
आप भी समझ सकें
सबकी जरूरतें, सबके दायरे
पर, मेरे प्रयास-
खोखले सिध्द हुए हैं
आप अपने दायरे
तय किये हुए हैं
————————–

मीडिया-विमर्श : छह कविताएँ /रामकुमार सिंह

जमात

तुम्हारी आधी से अधिक योग्यता
समाप्त हो चुकी है
इसलिए कि-
जिनकी तुमने अधीनता स्वीकार की है
अर्थात जो तुम्हारे प्रमुख हैं, और-
तुम जिनके कार्यालयीन हो
वे
उसी जमात के हैं
जिसके विरुध्द तुम
जंग छेड़ने की सोच रहे हो(!)

प्रबंधन वाले

वह
सक्रिय, कर्तव्यनिष्ठ और ऊर्जावान
पत्रकार है, जिसमें क्षमता है-
सशक्त लेखन की
लेकिन अब तक
कुछ भी ऐसा लिखा नहीं
क्यों?
क्या वाकई ‘सत्य’ बाजार गया है
दरअसल-
उसकी कलम को आग उगलनी थी
जिनके सम्मुख, वे ही-
कलम के लिए
स्याही का प्रबंध कर रहे हैं

सम्पादक का वक्तव्य

“केवल सच लिखना
उसकी खूबी है
सच्चाई का मुरब्बा बना देना
हमारी मजबूरी है
मीठे सच में वजन नहीं होता
कड़वा सच हजम नहीं होता
इसलिये-
सत्यशोधकों ने पढ़ना छोड़ दिया है
मेरे मित्र ने लिखना छोड़ दिया है”

गलत नहीं था

ताबड़तोड़ गालियाँ
जी हाँ! मुझसे ही मुखातिब था
लेकिन मुझे याद नहीं कि
मैंने कभी उसे कोई हानि पहुँचाई हो
उसके जाने के बाद
मेरे नजदीक आकर
‘जानकारों’ ने मुझे बताया कि
इस आदमी को इसी काम के लिए
‘जिसने’ नियुक्त किया है
उसके विषय तुमने
दैनिक पत्र में
कुछ ऐसा लिख दिया
जो
गलत नहीं था

यह अंक

”वे बड़े ही स्वार्थी
धूर्त और राष्ट्रीय कलंक हैं”
इस माह के अंक में छपा है
शायद हाल ही में
विश्वस्त सूत्र
उजागर करके लाये होंगे?
नहीं, ये बात नहीं
इस अंक के लिए
उनसे तयशुदा
विज्ञापन प्राप्त नहीं हुआ
—————————–
लम्बी कविता : रामकुमार सिंह

नीड़ और धुँधलके की सड़क

पंछी बैचेन हो जाता है
आकाश में
यहाँ-वहाँ उद्यम करते
तब
वह लौट पड़ता है
नीड़ में, शाम के धुँधलके के साथ
अपूर्व आनंद का अनुभव होता है उसे
संभवत:
इसी क्षण के लिए
बनाया था नीड़
तिनके-तिनके जुटाकर
बड़े ही जतन से
जटिल श्रम से।
कई पंछी तो-
नीड़-निर्माण के उपक्रम में ही चल बसे
अब उन नीड़ों में रहते हैं
उनके कथित परिजन।
मेरे सभी परिचितों में से अधिकतर
विविधतापूर्ण संसार रचना चाहते हैं
अपने ‘नीड’ में ही।
बाहर निकलना तो मजबूरी
नीड़ को ‘मेंटेन’ जो रखना है
बैचेनी होती है मुझे
जब भी खुद को
‘घर’ में ही पाता हूँ
निकल पड़ता हूँ सड़क पर
रिक्शेवाले की आग्रहपूर्ण दृष्टि
हो जाती है निष्फल
विवश हूँ, क्या कि
हूँ, गंतव्यहीन भ्रमण पर
चाल में छलावा आवश्यक, ताकि
अवांछित न लगूँ
नीड़ों में दुबके पंछियों को
जो ‘बेकार’ से भय खाते हैं।
लगभग नगर परिक्रमा करनी है
सड़क से
अन्य रास्ते भी फूटे हैं इधर-उधर
पर सबका आमंत्रण बेकार
मुझ-से दिखने वाले
कुछ दिशाहीन लोग
मुड़ते गये इन रास्तों में-
धुँधलके के साथ
जो मुझसे कम सावधान थे
तकते रहे वे कि
मैं उन्हीं में से किसी का
हमराह बन जाऊँगा।
वे समझते नही कि
हर गंतव्यहीन भ्रमण
आवारगी नहीं होता
शहर की रंगीनियों का
निर्लिप्त दर्शक, मैं
चलता जाता हूँ, निरंतर
इसी बीच
अच्छा लगता है यह देखना, कि-
सारे पंछी नीड़ों में मगन हैं, अपने-अपने
गर्वीले, आवृत, परिबध्द और इठलाते
उन्हें ज्ञात नहीं कि-
मेरा अनुसंधान जारी है, उन पर
अन्यथा दुस्वार हो जाता
मेरा सरकारी सड़क पर निकलना।
‘मैं हाथ से निकलता जा रहा हूँ’
ऐसा कहते हुए सुना है मैंने
अपने परिजनों को
शायद इसीलिए
मेरा विलंब उनकी व्याकुलता है
आजकल, कभी भी प्रतिबंधित हो सकता है
मेरा घर से निकल पाना
रात गहराने लगी है
मुझे और अच्छी लगने लगी
धँधलके की सड़क
पर सक्रिय हो उठे हैं
मुझे सड़क से खदेड़ने वाले
मुझे सड़क पर खोजने वाले
घर लौटना अब मेरी मजबूरी है
सड़क पर रुकने नहीं देंगे
कुत्तो, सरकार और
चौबंद नीड़ों की सुरक्षा को लेकर
भयभीत रहने वाले पंछी।
आखिरकार मुझे
लौटना ही पड़ता है
घर की तरफ
मैं कभी ठीक से नहीं जान पाया
तिनकों से बनी गोल-गोल आकृति, और-
नीड़ का अंतर
चारदीवारी से बने मकानात, और-
घर का अंतर

दो कवितायें : रामकुमार सिंह

ऐसे ही न कहो

तस्वीर के दोनों रुख
तुम्हारे सामने हैं
विवेक ही निर्धारित करेगा
नीर क्या और क्षीर क्या
यूँ ही न कहो, कि-
अब वो वक्त नहीं लौटेगा
कोई कारण नहीं बनता,कि-
तुम्हारी संभावनाओं की अनदेखी-मात्र
पर्याप्त हो उत्साह के दुर्ग को
धराशायी करने में
कभी सम्मुख तो कभी पार्श्व में
रिक्तियाँ ढूँढते तुम्हारे खोखले प्रयास
अब तो इतर-मोहभंग हो जाने तो, ताकि-
वह मरीचिका जो नहीं रहने देती
तुम्हें अडिग
स्वतंत्र कर दे तुम्हें
आपाधापी में तुमने सदैव उपेक्षा की
तुम वही हो, यकीनन वही
जो तुम्हें होना चाहिए
बस, अपना दर्पण बदल दो

अप्रकट अंतर

उबलता जल और भाप
दोनों का परिताप समान, किन्तु-
दोनों की अवस्थायें भिन्न
ऐसा क्यों?
वह क्या है
जो उत्तारदायी है
इस भिन्नता के लिए
सामान्य यंत्रों की समझ से परे
वह अत्यल्प गुप्त-ऊर्जा
जिसके होने से
भाप पा गई ऊँचाई
और देखता रह गया
उबलता जल
उसे नाप सके
विशिष्ट यंत्र
विचार करना चाहिए
उबलते जल को
उस नगण्य ऊर्जा पर
जो उसे समतापीय भाप
बना सकती है
…….
‘एक अपेक्षा’ के लिए
समान योग्यताओं में से
कर देती है जो
‘चयनित’ और ‘वंचित’ का अंतर
वह कौन-सी अप्रकट योग्यता है
जिसे देख सकीं पारखी निगाहें
विचार करना चाहिए
‘वंचित’ योग्य को
क्या है वह नगण्य अप्रकट ऊर्जा
जो उसे ‘चयनित’ बना देगी
———————————-

चार कविताएँ : रामकुमार सिंह

उपहार

गहन स्तब्धता
शून्य में अनंतबोध
अपने ही अस्तित्व में संदेह
अनुभव का वैचित्र्य
स्वतंत्र हृदय बोझिल मस्तिष्क
साँसों की सरसराहट-
कोलाहल सी प्रतीत होती है
सुदूर, किन्तु निकट ही-
विशाल निकुंज में
चिरपरिचित स्वर की
अपरिचित ध्वनि
अवाक्-सा कर जाती है
मुखर-विचार के तंतुओं को…
व्यस्तता से परिपूर्ण जीवन को
निर्जन एकांत का उपहार

हस्ताक्षर

तुम बार-बार कर रहे हो
अभ्यास
हस्ताक्षर करने का
ऐसे नहीं, ऐसे
यूँ नहीं, वैसे
गति, लय व ताल के साथ, पर-
हर बार कुछ कमी।
कभी प्रकार पर चिंतित, तो कभी-
‘स्मूद’ न होना खल जाता
संक्षिप्त-सुंदर ठीक रहेंगे, या-
गोल-मोल जटिल
कभी जान पड़े प्रभावशाली, तो-
पुन: वैसे ही न बन पड़े
उफ! कितने आकुल हो तुम
शायद बनना चाहते हो
‘समय के हस्ताक्षर’

विकृति

कुंठा, ग्लानि, और-
उपेक्षा की पीड़ा ने
बना दिया उसे
क्षुब्ध, क्रुध्द और-
चिड़चिड़ा
तुमने उसकी
जाने किन ‘जरूरतों’ को ताड़ा, कि-
अम्बार लगा दिये
भारी-भरकम ‘पूर्तियों’ के
वो भी भौतिक
पर मुझे लगता है कि-
उसकी बीमारी और बढ़ती जा रही है
तुम्हार ‘क्षतिपूर्ति’
‘विकृति’ बनती जा रही है

आपके घर में

आपके घर में
बड़ी अज़ीब बात
सुख के लिए
निकटता की तलाश
और निकट लाने में
जो वस्तु एकमात्र सक्षम पाई
वह है दु:ख
जैसे-
संकट में एकता
और भय से श्रध्दा उपजे
बड़ी अजीब बात
आपके घर में
——————————-

चार कविताएँ : रामकुमार सिंह

वो क्या है?


न सम्बन्धित, न प्रभारी
न पुलिसिया, न अखबारी
न नौकरशाह, न जनता का आदमी
न आम आदमी, न व्यवस्था का आदमी
कोई नहीं सुन रहा तुम्हारी बात
आखिर क्यों?
जरा दिमाग पर जोर डालो
जिसकी रपट लिये घूम रहे हो तुम
जिसके सताये हुए हो तुम
वो कौन है? वो क्या है?

दो दृश्य

आलीशान इलाजगाह
लाइन लगवाता कीपर
निर्दयी चिकित्सक
निष्ठुर सहायक
स्वच्छता पर गर्व करते कर्मचारी
यहाँ-वहाँ मूक परिचारिकाएँ
और
दवाइयों की लम्बी सूची पर-
कैमिस्ट का भावशून्य चेहरा
इधर-
रिक्साचालन-आय से दारू पीता आदमी
दीपावली पर मिट्टी के दिये बेचकर
जुटाये थे जो रुपये
सारे स्वाहा प्रथम दृश्य पर
जाते-जाते दुत्कार मिली
वैल्यू-एडेड टैक्स की तरह

…धारी

”हम सभी जानते हैं, कि-
तुम पर जुल्म हुआ है
तुम्हारा चीखना-चिल्लाना
बाजिब है
उसने तुम्हें इतनी जोर से रोने दिया
यह छूट काफी नहीं क्या?
अब
उसकी रपट दर्ज कराने की मजाल
मत कर देना!”
”क्यों ?
क्या वो-
धनुर्धारी है?
बंदूकधारी है?
या
टाडा-पोटा धारी है?”
”नहीं
सत्ताधारी है!!”

चार कविताएँ : रामकुमार सिंह

तिलमिलाहट
मैं सामान्य महसूस करता हूँ
जब देखता हूँ कि-
अच्छे लोग राजनीति में
कम ही जा रहे हैं
मैं चकित नहीं होता
जब पाता हँ कि-
एक अच्छे-से उम्मीदवार का
टिकिट काट दिया जाता है
मुझे खेद नहीं होता
जब मेरे सामने है कि-
सिर्फ बाहुबली ही
चुनाव लड़ रहे हैं
पर मैं
तिलमिला उठता हूँ
तब, जब-
प्रचार के दौरान
देशभक्ति-गीतों का उपयोग होता है

वह फिर भी देगा

ठीक पाँच बरस बाद
दोबारा मिले हैं
उससे आप
वह जो
अपनी दैनंदिन क्रियाओं
में ही रत है बरसों से
वह जो
हर संकट के समय
बीच सड़क पर गोबर कर देता है
वह फिर भी देगा
अपना मत
वह फिर भी देगा

हम लोग

नामदेव से रामदेव तक, श्रृ से-
हम झुके हुए लोग
‘नाच’ को ‘महारास’ कहते, रस में-
हम पके हुए लोग
××××××××
बिछायी जाती बिसातें
हम बिछे हुए लोग
उखाड़ी जाती पटरियाँ
हम उखडे हुए लोग
‘राष्ट्र’ में ‘महाराष्ट्र’ उचकाते
हम उचके हुए लोग
‘भारत’ में ‘महाभारत’ मनाते
हम युरत
हम आत्मध्वंसक
हम बिगड़े हुए लोग

माइक पर

माइक बोल रहा है-
आपका अपना
जाना पहँचाना
कतर्व्यनिष्ठ, जुझारू
संघर्षशील, और-
गरीब (?) प्रत्याशी
जिसका चुनाव-चिन्ह है
‘बँगला’
इन्हें वोट दें और..
(इनके चुनाव-चिन्ह को
साकार करें)

किताब और खेत

लाओ मास्टरजी!
तुम्हारा बैग मैं ले चलूँ
हरभजना बोला
नहीं भाई!
इसमें ठूँस-ठूँसकर भरी हैं
पत्रिकायें – किताबें
देख! कुछ तो बाहर झाँक रही हैं
अभी पानी चला है
भीगे खेत में तुझसे गिर पड़ेंगीं
झाँकने दो – गिरने दो मास्टरजी
ये किताबें भी तो देखें-
खेत कैसा होता है
——————–

दो कविताएँ : रामकुमार सिंह

खुली मुट्ठी

तमाम आपाधापी
उधेड़बुन, और-
रस्साकस्सी के बीच
आश्वस्त था वह, कि-
चिर-भविष्य सानुकूल है
यह देगा, अवश्य ही
मूल्य
उसके परिश्रम, और-
त्याग का
वर-प्राप्ति हेतु तप नहीं किया
वह नितांत स्वार्थ होता
पर-
बहुत काल तक करता रहा ‘मजूरी’
क्या निरर्थक ही? जो-
निज अस्तित्व मात्र का
उत्तारदायित्व-निवर्हन थी ?
औरों के प्रति कर्तव्यबोध से
निरंतर बिंधे रहने का अहसास
‘सक्रिय-जिन्न’ की भाँति
चढ़ाता-उतारता रहा
खम्बे पर, बारबार-लगातार
भौंतरे वर्तमान से
भविष्य के गर्भ को कोलते हुए
समय रिसता रहा, चुपके से
आहिस्ता-आहिस्ता
रेत-भरी मुट्ठी से रेत की तरह
खुली मुट्ठी
खाक की!!

दीवार

आप ‘स्तरीय’ हैं
‘आम’ में सम्मिलित गिना जाना
आपके लिए नागवार है
यही कारण है कि-
आजकल अपने परित:
कंक्रीट की मोटी-मोटी, ऊँची-ऊँची
दीवारों का निमार्ण करवा रहे हैं
और भीतर-
कर रहे हैं एकत्रित, उनको
जिन्हें आप मानते हैं-
अपना समस्तरीय, समस्थानिक, आदि-आदि
मैं इनमें नहीं
कतई नहीं
मगर
एक दिन आप
अपनी ही रची भूल-भुलैया में
सिहर उठेंगे
स्मरण हो आयेगा
विश्वसनीय स्नेह और सत्यनिष्ठा का
आप चीखेंगे, चिल्लायेंगे
पर
नहीं पहुँचेगी आपकी आवाज
मुझ तक
इतिहास मुझे सिध्द-दोष नहीं मानेगा
क्यों कि
न मैं दूर था,
न कानों में रुई लगाई थी
दीवार आपने उठाई थी

भृकुटि

भृकुटि
बहुत उपयोगी है
विज्ञान की दृष्टि से
क्यों कि रोकती है पसीना
ऑंखों में जाने से
नायिका की भृकुटि
कालजयी विषय रहा है
कवियों के काव्य का
उस दिन रंगमंच पर
रंगकर्मियों के पचास फीसद भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम थी
केवल भृकुटि
भृकृटि का आपने खूब प्रयोग किया है
मौन रहकर
प्रश्नवाचक चिन्ह के स्थान पर
किन्तु इन सबके बीच
खो गयी वह भृकुटि
कि जिसके संकुचित करते ही
हिल जाता पर्वतों का जड़त्व
भृकुटि थी युवा की।
मात्र कुछ बालों की एक धनुषाकार आकृति
नहीं कही जा सकती
भृकुटि

हवा चल रही है

हवा चल रही है
बड़ी तेज।
जनसैलाब उमड़ पड़ा है
उधर ही,
जिधर की चल रही है हवा
मैं, नहीं जाऊँगा
हवा के साथ
क्यों कि जानता हूँ कि-
सही दिशा वह है
जिधर की नहीं चल रही हवा
अगर मैं नहीं जा सका
हवा के खिलाफ, तो-
खड़ा रहूँगा
पर नहीं जाऊँगा हवा के साथ
जो चल रहे हैं हवा के साथ
वे समझौता कर चुके हैं, या-
आत्मसमर्पण
सुविधाप्रिय हो चुके हैं, या-
आश्वासन-प्राप्त
पर मैं नहीं,
नहीं चलूँगा उस ओर
जिधर की
चल रही है हवा
—————-
कविता : रामकुमार सिंह

लाठी और मित्र – आनंद

बाँस की लाठी
तनी हुई, मजबूत और ‘आदम-कद’
एक आदमी घायल,
दूसरे की लाठी से –
अस्पताल में भर्ती है
खून से लथपथ
अभी तक।
घटनास्थल पर पड़ी है लाठी
खून से लथपथ
अभी तक।
बड़ी मजबूत है
टूटी नहीं
अच्छी लाठी की यही विशेषता है।
आइये, दूसरी बात करते हैं
‘आनंद’
मेरे परिचितों में से एक
स्वभाव से निष्ठुर
वाणी से कठोर
प्रकृति से पीड़ादायी
जहाँ तनकर खड़ा हो
वातावरण घटनापरक हो जाता है
संख्या में थोड़े ही
उसकी सभी परिचित त्रस्त हैं
बड़ा मजबूत है वह
कभी झुका नहीं
‘आनंद’ की यही विशेषता है।
खैर, एक लाठी –
जब पड़ी मिली कलाकार को
कद छोटा किया
छिद्र कर दिये
भीतर तक
बना दी बांस की बांसुरी
आज की शाम असंख्य श्रोताओं को
बांसुरी-वादन ने आनंदित कर दिया
बांसुरी बन गई साक्षात् आनंद
‘आज आनंद मिला’
कितना शांत हो गया है वह
वाणी जैसे सरगम
स्वभाव कितना निर्मल
चाहने वाले असंख्य हो गये उसके
आनंद बन गया सचमुच आनंद
और मेरा प्रिय मित्र भी
मैने गौर से झांककर देखा
उसकी ऑंखों में
कद छोटा हो गया था उसका
छलनी हुआ था हृदय
भीतर तक, पता नहीं क्यों?
क्या बांसुरी बनने के लिए
छलनी होना जरूरी है?
———————

दो कविताएँ : रामकुमार सिंह

अग्निशामक

आग
जला देती है मकानों को
और घरों को भी
मोबाइल फोन सेवा अच्छी है
दमकल को पुकारने में
जब आग ‘मकान’ में लगी हो
आप अकेले बच भी निकलें बाहर
और लपटें देखकर
आपके पड़ोसी भी दौड़ पडें
अनेक मतभेदों के बाद भी,
सहायता करने।
परन्तु ऐसी कसरत बेकार
और आप असमर्थ हो जाते हैं
जब आग लग चुकी हो-
‘घर’ में
जब आप थे सक्षम
तब यदा-कदा रहे तत्पर
आग को अपने हथकंडों से
दबाने में, ताकि-
पड़ोसी लपटें न देख सकें
क्यों कि स्व-मान रक्षा
थी आपकी प्राथमिकता
न कि आग का शमन
और
लापरवाही बन गयी अग्नि-कांड
घर का
सावधानी ही एकमात्र उपाय था
जो बरती जाती है रिश्तों में, भावों में
अब क्या देखते हो, जाओ
कबीर बुला रहा है
देखो
शायद किसी और ‘घर’ में
तुम्हें दिखाई दे
धीरे-धीरे सुलगने को तैयार आग
तुम अच्छा ‘अग्निशमन’ कर सकोगे।
——————–

विकल्प-चयन

तुम
तुम भी हो, और-
समग्र के प्रतिनिधि भी
तुम्हारा जीवन
तुम्हारा अपना भी है, और-
अखिल का प्रतिबिम्ब भी
इसलिए
तुम्हारी भूख
तुम्हारी अपनी है, पर-
भुखमरी का नेतृत्व भी
तुम्हारी बेकारी, बेबसी और असहायता
लाचारी, असंतुष्टि और साधनहीनता
असंख्य का दृष्टांत मात्र है
सवाल इस बात का है कि-
10:30 से 5:30 की मशीन बनकर तुम
अपने परिजनों का
मुँह बंद करना पसंद करोगे?
या फिर उन लाखों-करोड़ों की
आवाज बनना चाहोगे
जो तुम्हारे द्वारा मुखर होने की
आस लगाये बैठे हैं
——————-

बाज़ार-विमर्श : चार कविताएँ/रामकुमार सिंह

एक व्यावसायिक फोन-कॉल
‘बाज़ार’ के नाम

”हेलो! मि. बाज़ार
क्या आप ‘मंदी’ से उदास हैं?
मैं बनकर आया हूँ
खास आपके लिए- उपभोक्ता
अभी ‘सब्सक्राइब’ करने लिए
मेरा गला दबाइए”

बाजार-मूल्य

वाणिज्य के विद्यार्थी
पढ़ रहे हैं- ‘बाजार’ को
जान रहे हैं उसकी बारीकियों को
उन्हें याद करायी जा रही है
एक परिभाषा कि
‘मार्केट-वैल्यू’ होने पर ही
किसी का अस्तित्व स्वीकृत है
इसमें वस्तुआ के साथ-साथ
(माँ-बाप भी शामिल हैं)

सर्वोत्तम?

‘बिग-बाजार’-एक शॉपिंग मॉल
इसकी पंच-लाइन है-
एक ही जगह
सारी चीजें
‘सर्वोत्ताम’ दाम में
छुपी शर्तों की बात मानें तो
‘सवोत्ताम’ का अर्थ
‘सर्वाधिक’ भी हो सकता है
सूची-
ऊपर से शुरू होती है या
नीचे से
बाजार ही जाने

लाइफटाइम

तुम्हारा रेज्यूमे
तुम्हारी कम्पनी
तुम्हारा जॉब
और-
तुम्हारी छँटनी
तुमने ‘लाइफटाइम’ कार्ड पर ही
‘टिक’ किया था न?
जब कर रहे थे जॉब के लिए
कोर्स का चुनाव
तब कह रहे थे तुम्हीं तो
कि ‘बूम’ आया है
फिर भी-
तुम ‘मंदगति’ के शिकार
तुम ‘छद्म-प्रगति’ के शिकार
तुम ‘बाजार की शक्ति’ के शिकार
वाह री ‘छिपी-शर्तें’
‘जीवन-भर वैध’, या-
जीवन-भर कैद
तुम हर मामले क्यों-
समान अर्थ पाते हो?
———————–
कविता : रामकुमार सिंह

तुम डिजिटल नहीं
हो सकते पिता!

पिता! तुम्हारे पहाड़-से अस्तित्व में
मैंने खुद को
गर्म-गर्म महसूस किया
जब सर्दी की सुबह
मैं तुम्हारे चौड़े वक्ष से पीठ लगाये
गुड्डमुड्ड हो, बैठता था
तुम्हारी गोद मुझे
पर्वतीय खोह-सा अहसास देती रही
मेरे आकार के
बेवज़ह बढ़ने तक

अपने वितान का क्षेत्रफल
ऑंकने के लिए
मैं गलता गया
बहने लगा
तारों में – केबलों में
मैं फैल गया
साइबर-स्पेस में
मेरा तरलीकरण देखती
तुम्हारी ऑंखें कहती रहीं
”जैसा तुम चाहो”

पिता! मैं अंगुल-भर के
पिद्दी-से यंत्र से
बेतार होकर
तैर गया हवा में
तार-तार होकर
मेरी ऍंगुलियों की आखिरी पोर
तुम्हारे चौड़े – बहुत चौड़े
मजबूत पंजों की
आखिरी पोर को पकड़ने की
नाकाम कोशिश कर रही है

तुम घुटने मोड़कर
सिलकॉन में नहीं आ सकते
तुम्हारी स्वाभिमानी हठधर्मिता
मैं जानता हूँ
तुम डिजिटल नहीं हो सकते पिता!

मैं फैलकर आकार नहीं ले सका
तुम ग़लत नहीं हो सकते पिता!
———————-
कविता : रामकुमार सिंह

तुम बादल बन जाओ

बादल
आकाश में कुलाचें भरते
चंचल, आंदोलित और मस्त
कई टन वज़नी जल की निर्मिति
पर अस्तित्वबोध – किंचित् नहीं
मिथ्याभिमान को लेकर
नहीं किया प्रतिरोध
कभी – पवन से
टकराये नहीं किसी से
रहे पारगामी, सर्वदा
धरा के किसी भी कोने में
स्वीकार कर लिया
हरी-भरी ऑंखों का स्नेह-आमंत्रण
और बरस पड़े
मिटा दिया स्वयं को
हँसते रहे अंत तक
मुक्त और मस्त बादल
……..
सागर-
जिसे लेकर मैं
सदैव असमंजस में रहा
अथाह गहराई में अतुत जल-संग्रह
पर सर्वदा तत्पर
और समाविष्ट करने को
गंभीर ;?ध्द हृदय इतना विशाल, कि-
लोग नजदीक आने से घबराते रहें
अधिकतम स्थान अधिकृत किया,परन्तु-
तट-स्पर्श की ललक को
भुलावा नहीं दे सका
कोई भी कर लेगा कंठधार्य,तो-
सरल और सुलभ कहलाना होगा, और-
चोट लगेगी जटिल बड़प्पन को
सो – खारापन नहीं छोड़ा
सागर-साहब का गुणगान करते
और भारी उपमाएँ देते
नहीं अघाते लोग
कारण सिर्फ एक-
भयभीत रखता है सागरीय अस्तित्व
……
तुम
सागर बने रहे तो
विशालतम रहकर भी
असीमित नहीं कहला सकोगे
मुक्त होने की चेष्टा करो
सागर के उर का परिताप बन जाओ
तुम बादल बन जाओ

कृति


सादा कैनवास पर
यहाँ-वहाँ
आड़े-तिरछे ब्रश मारे
कुछ रंग फैलाये
कुछ फैल गये
कुछ पोंछे
कुछ धुल गये
सारा कुछ बेतरतीब
बेढब, विचित्र और-
बेकार!!
एक सरफिरे चित्रकार का
गैर-योजनाब( निर्माण
निरुद्देश्य, निष्प्रयोजन, और-
निरर्थक!!
जैसे मेरा जीवन
फिर भी भोले कलाप्रेमी
तू इसे ‘कृति’ कहता है
मेरे मूर्ख प्रशंसक
तुझे मेरा व्यक्तित्व
बहुमूल्य दिखाई देता है
क्यों?
तू ही जाने…..

कविता : रामकुमार सिंह
पत्थर पर घास -दो

तुम मृतप्राय: हो गये थे
लेकिन मृत नहीं, मुझे यकीन था
तुम्हारे अंत:स्थल के किसी कोने में
बीज की अंकुरण-ललक के समान
मानवीय संवेदनाएँ दफन थीं
वो जाग उठी हैं
तुम जान उठे हो-
मानव का अर्थ
उमड़ने लगी है सुषुप्त प्यास
औरों को लगा ऐसा, मानो-
उगने लगी हो
पत्थर पर घास………

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6 responses to “‘पत्थर पर घास’/कविता-संग्रह/डॉ. रामकुमार सिंह

  1. aap doni malai pahunch gaye hain lekin chambal ke bharkoon ka asar dikhayi deta hai.. is maiyne mein nahin ki aapka dimag bandook ki tarah hai balki is maiyne mein hai jis tarah chambal ki mitti ki oonchi-oonchi kararein….

  2. thease are the lines of life.this the authentic poetry of life-jone.welldone and godbless.

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