‘किसी को तो शिव बनना होगा’

‘किसी को तो शिव बनना होगा : एक चिंतनशील मन की भावुक ‘अपील’
– शेषकुमारी सिंह-

पुस्तक : ‘किसी को तो शिव बनना होगा (कविता-संग्रह)
कवयित्री : डॉ बिनय राजराम
प्रकाशक : अरविन्द प्रकाशन, आगरा

रचनाकार भौतिकवाद की प्रतिस्पर्धा में अकादमिक वातावरण में मूल्यों के लिये चिंतित हैं। शिष्यत्व और गुरुता की पुन:प्रतिष्ठा का प्रश्न है-
”राज-मोह-ग्रस्त द्रोणाचार्य नहीं
सांदीपनी या सुकरात बनना होगा (पृ.-17)
विचारशील की दृष्टि जब प्रकृति, जलचरों व वन्य-जीवों में भी सौहार्द्र देखती है तो मानव के पारस्परिक वैमनस्य पर खेद होता है। ‘मात्स्य-न्याय’ बहुत कुछ समझाता है-
”इन जल-जीवों को देखकर
समझने लगी हूँ अब
नहीं है सौहर्द्र तो
मानसिक ऊर्जा से भरपूर
मानुस में नही है” पृ.-30)

जीवन और परिवेश का यथार्थ विचारशील मन को सिसकाता है। बालक की भांति उजली जीवन-दृष्टि भीतर घुटन महसूस करती है। रचनाकार को लगता है कि चारों ओर एक उमस का मकड़जाल बुन दिया गया है। यहाँ संवेदनाओं की स्थिति ऐसी है जैसे किसी भुतहा खण्डहर महल में कोई बालक मन अनजाने में घुस आया हो। वह भटकता है सिसकता है और बाहर निकलने को तरसते हुए खोजता रास्ता-
”क्या है सच, / कौन बताएगा? / कौन दिखाएगा इस आत्मा को / परम आत्मा का मार्ग” (पृ.37)

जीवन के अनेक द्वंद्वों और प्रश्न-प्रतिप्रश्नों के बीच दार्शनिक तत्व भी पुस्तक की कविताओं में दिखाई देते हैं। सौरमण्डल की व्यवस्था में जीवन का हल खोजते हुए लिखा गया है कि- ”हाँ! है एक उपाय / शाश्वत राह / अपने अक्ष, अपनी धुरी पर / घूमते रहना / बढ़ते चलना / चलते रहना अपनी राह”(पृ.-43)। एक ढंग से कर्मवाद का प्रतिपादन इसमें दिखाई देता है।
धर्म-सम्प्रदाय और आस्था के प्रतीकों के आधार पर समाज को विभाजित करने की मानसिकता से कवियत्री पीड़ा अनुभव करती है। क्या भविष्य को ताक पर रखकर समन्वय का निवाला बनाकर भक्षण कर लिया जायेगा? क्या हम अपने धार्मिक महापुरुषों को बांटेंगे। ‘थम जा री ओ भविष्य-भक्षिणी’ (पृ.-45) कहकर कविता पीड़ा को व्यक्त करती हैं-
”टूटी आस्था ले कर कहाँ जाएगी?
ओ री भविष्य-भक्षिणी राजनीति?”(पृ.-45)
निश्चित रूप से , अलगाववादी राजनीति ने वर्तमान को निशाने पर लिया ही है भविष्य को भी संहेदाहस्पद बना दिया है। कवियत्री एक भावुक ‘अपील’ करती है कि सांस्कृतिक गौरव की रक्षा करने और मानव-समाज को भयानक त्रासदी से बचाने के लिए क्या यह संभव नहीं कि कुछ प्रयास किये जायें और भावी समय को समन्वय की सौगात विरासत में दे जायें।
कविताओं में मानव को सुरक्षित करने की वैश्विक-दृष्टि है। यह पूरी द ुनियाँ के मानव समाज की ही नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्माण्ड के कण-कण को बचाने की मांग करती है। प्रकृति की रचनाधर्मिता को कोई सुनामी न निगल जाये-
”असमय की असमंजस-स्थिति से/ब्रह्माण्ड के कण-कणको / सायास बचाना होगा”(पृ.- 55)
मानवीय संवेदनाओं के साथ स्त्री-चेतना को अभिव्यक्त करने का तरीका भी इन कविताओं में विचारणीय है। पाषाण को प्रतीक बनाकर अहिल्या की पीड़ा और अहिल्या को प्रतीक बनाकर पत्थर की पीड़ा को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है-
”अहिल्या के सुन्दर रूप को / अपने भीतर कैद करने में / कितनी पीड़ा हुई होगी / पाषाण को?”(पृ.-50)
पीड़ा अजन्मा स्त्री से ही शुरू हो जाती है। मां से गुहार करता कन्या-भ्रूण कहता है अपनी मां से कि कुछ भी करो, पृथ्वी से लेकर आकाश तक या परिवार से लेकर ईश्वर तक किसी से भी लड़ो पर कृष्ण बनकर मुझ परीक्षित को बचा लो। जब वह उम्र पाती है तो विकृत मनुष्यों की कुदृष्टि का शिकार होती है। कवियत्री प्रश्न उठाती है कि स्त्री को लेकर विमर्श तो बेमानी है। अभी तक न तो नारी रक्षित है और ना ही आरक्षित। विकृत होते मनुष्य तो गिध्द कहलाने के लायक भी नहीं है। गिध्दराज ने तो सीता की अस्मिता की भरसक रक्षा के प्रयास में अपने प्राण दे दिये थे। लेखिका आह्वान करती है-
”अपनी नन्हीं सीताओं को / अभारतीय, असामाजिक / कुत्सित-कदर्य / ‘विकृत मनुष्य’ की / गिध्द-दृष्टि’ से बचाओ”(82)
छोटी-सी कविता ‘कामधेनु’ स्त्री के साथ हुए छलावे को बखूबी उकेर देती है। आधी आबादी सुबह से शाम तक कामधेनु की भांति केवल देना जानती है। उसका भ्रम टूटता है और वह अपने बंधनों को देखकर समझ जाती है कि कामधेनु का अर्थ बदल गया है-
”काम में पिसती / धेनु सी बँधी वह / धीरे-धीरे समझ गयी कि / कामधेनु का अर्थ बदल गया है”(पृ.-72)
अभियानों और वास्तविकता के भेद सालते हैं। आम आदमी जो ग्राम्य है। ग्रामीण बालक हो स्त्री, और गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करते लोग। इनसे जुड़े मसलों को किस तरह लें। आंकड़ों की सच-झूठ की कारगरता कितनी है। ऐसे कई प्रश्न रचनाशील को झकझोरते हैं-
”जागृति, साक्षरता अधिकार की कथा / आकाश चूमते / पंखों के सपने / या फिर / भरपेट भोजन की बात? / उसकी मासूम मासूम आखों के जलते हुए ठंडे सवाल”
भारतीयता और हिन्दू शब्दों के मायने कवियत्री के लिये व्यापक हैं। समग्र राष्ट्र और समाज की एकता से वे जुड़े हैं। जनजीवन को भावात्म और एकात्म दृष्टि देने के लिए जरूरी है कि कोई तो शिव बनकर प्रतिबध्द हो। स्वतंत्रता की लड़ाई की तरह ही भारतीय अस्मिता और एकता के लिए समर्पण की जरूरत आ पड़ी है। फिर से साख संचित करनी है-
”कैसे बचेगा यह ? / कौन बचाएगा कन्या कुमारी से गंगटोक तक / कच्छ से अरुणान्चल तक फेले / इस आर्यर्वत्त को?”(पृ.-99)
– शेषकुमारी सिंह-

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