‘किसी को तो शिव बनना होगा’

‘किसी को तो शिव बनना होगा : एक चिंतनशील मन की भावुक ‘अपील’
– शेषकुमारी सिंह-

पुस्तक : ‘किसी को तो शिव बनना होगा (कविता-संग्रह)
कवयित्री : डॉ बिनय राजराम
प्रकाशक : अरविन्द प्रकाशन, आगरा

रचनाकार भौतिकवाद की प्रतिस्पर्धा में अकादमिक वातावरण में मूल्यों के लिये चिंतित हैं। शिष्यत्व और गुरुता की पुन:प्रतिष्ठा का प्रश्न है-
”राज-मोह-ग्रस्त द्रोणाचार्य नहीं
सांदीपनी या सुकरात बनना होगा (पृ.-17)
विचारशील की दृष्टि जब प्रकृति, जलचरों व वन्य-जीवों में भी सौहार्द्र देखती है तो मानव के पारस्परिक वैमनस्य पर खेद होता है। ‘मात्स्य-न्याय’ बहुत कुछ समझाता है-
”इन जल-जीवों को देखकर
समझने लगी हूँ अब
नहीं है सौहर्द्र तो
मानसिक ऊर्जा से भरपूर
मानुस में नही है” पृ.-30)

जीवन और परिवेश का यथार्थ विचारशील मन को सिसकाता है। बालक की भांति उजली जीवन-दृष्टि भीतर घुटन महसूस करती है। रचनाकार को लगता है कि चारों ओर एक उमस का मकड़जाल बुन दिया गया है। यहाँ संवेदनाओं की स्थिति ऐसी है जैसे किसी भुतहा खण्डहर महल में कोई बालक मन अनजाने में घुस आया हो। वह भटकता है सिसकता है और बाहर निकलने को तरसते हुए खोजता रास्ता-
”क्या है सच, / कौन बताएगा? / कौन दिखाएगा इस आत्मा को / परम आत्मा का मार्ग” (पृ.37)

जीवन के अनेक द्वंद्वों और प्रश्न-प्रतिप्रश्नों के बीच दार्शनिक तत्व भी पुस्तक की कविताओं में दिखाई देते हैं। सौरमण्डल की व्यवस्था में जीवन का हल खोजते हुए लिखा गया है कि- ”हाँ! है एक उपाय / शाश्वत राह / अपने अक्ष, अपनी धुरी पर / घूमते रहना / बढ़ते चलना / चलते रहना अपनी राह”(पृ.-43)। एक ढंग से कर्मवाद का प्रतिपादन इसमें दिखाई देता है।
धर्म-सम्प्रदाय और आस्था के प्रतीकों के आधार पर समाज को विभाजित करने की मानसिकता से कवियत्री पीड़ा अनुभव करती है। क्या भविष्य को ताक पर रखकर समन्वय का निवाला बनाकर भक्षण कर लिया जायेगा? क्या हम अपने धार्मिक महापुरुषों को बांटेंगे। ‘थम जा री ओ भविष्य-भक्षिणी’ (पृ.-45) कहकर कविता पीड़ा को व्यक्त करती हैं-
”टूटी आस्था ले कर कहाँ जाएगी?
ओ री भविष्य-भक्षिणी राजनीति?”(पृ.-45)
निश्चित रूप से , अलगाववादी राजनीति ने वर्तमान को निशाने पर लिया ही है भविष्य को भी संहेदाहस्पद बना दिया है। कवियत्री एक भावुक ‘अपील’ करती है कि सांस्कृतिक गौरव की रक्षा करने और मानव-समाज को भयानक त्रासदी से बचाने के लिए क्या यह संभव नहीं कि कुछ प्रयास किये जायें और भावी समय को समन्वय की सौगात विरासत में दे जायें।
कविताओं में मानव को सुरक्षित करने की वैश्विक-दृष्टि है। यह पूरी द ुनियाँ के मानव समाज की ही नहीं, बल्कि समूचे ब्रह्माण्ड के कण-कण को बचाने की मांग करती है। प्रकृति की रचनाधर्मिता को कोई सुनामी न निगल जाये-
”असमय की असमंजस-स्थिति से/ब्रह्माण्ड के कण-कणको / सायास बचाना होगा”(पृ.- 55)
मानवीय संवेदनाओं के साथ स्त्री-चेतना को अभिव्यक्त करने का तरीका भी इन कविताओं में विचारणीय है। पाषाण को प्रतीक बनाकर अहिल्या की पीड़ा और अहिल्या को प्रतीक बनाकर पत्थर की पीड़ा को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है-
”अहिल्या के सुन्दर रूप को / अपने भीतर कैद करने में / कितनी पीड़ा हुई होगी / पाषाण को?”(पृ.-50)
पीड़ा अजन्मा स्त्री से ही शुरू हो जाती है। मां से गुहार करता कन्या-भ्रूण कहता है अपनी मां से कि कुछ भी करो, पृथ्वी से लेकर आकाश तक या परिवार से लेकर ईश्वर तक किसी से भी लड़ो पर कृष्ण बनकर मुझ परीक्षित को बचा लो। जब वह उम्र पाती है तो विकृत मनुष्यों की कुदृष्टि का शिकार होती है। कवियत्री प्रश्न उठाती है कि स्त्री को लेकर विमर्श तो बेमानी है। अभी तक न तो नारी रक्षित है और ना ही आरक्षित। विकृत होते मनुष्य तो गिध्द कहलाने के लायक भी नहीं है। गिध्दराज ने तो सीता की अस्मिता की भरसक रक्षा के प्रयास में अपने प्राण दे दिये थे। लेखिका आह्वान करती है-
”अपनी नन्हीं सीताओं को / अभारतीय, असामाजिक / कुत्सित-कदर्य / ‘विकृत मनुष्य’ की / गिध्द-दृष्टि’ से बचाओ”(82)
छोटी-सी कविता ‘कामधेनु’ स्त्री के साथ हुए छलावे को बखूबी उकेर देती है। आधी आबादी सुबह से शाम तक कामधेनु की भांति केवल देना जानती है। उसका भ्रम टूटता है और वह अपने बंधनों को देखकर समझ जाती है कि कामधेनु का अर्थ बदल गया है-
”काम में पिसती / धेनु सी बँधी वह / धीरे-धीरे समझ गयी कि / कामधेनु का अर्थ बदल गया है”(पृ.-72)
अभियानों और वास्तविकता के भेद सालते हैं। आम आदमी जो ग्राम्य है। ग्रामीण बालक हो स्त्री, और गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करते लोग। इनसे जुड़े मसलों को किस तरह लें। आंकड़ों की सच-झूठ की कारगरता कितनी है। ऐसे कई प्रश्न रचनाशील को झकझोरते हैं-
”जागृति, साक्षरता अधिकार की कथा / आकाश चूमते / पंखों के सपने / या फिर / भरपेट भोजन की बात? / उसकी मासूम मासूम आखों के जलते हुए ठंडे सवाल”
भारतीयता और हिन्दू शब्दों के मायने कवियत्री के लिये व्यापक हैं। समग्र राष्ट्र और समाज की एकता से वे जुड़े हैं। जनजीवन को भावात्म और एकात्म दृष्टि देने के लिए जरूरी है कि कोई तो शिव बनकर प्रतिबध्द हो। स्वतंत्रता की लड़ाई की तरह ही भारतीय अस्मिता और एकता के लिए समर्पण की जरूरत आ पड़ी है। फिर से साख संचित करनी है-
”कैसे बचेगा यह ? / कौन बचाएगा कन्या कुमारी से गंगटोक तक / कच्छ से अरुणान्चल तक फेले / इस आर्यर्वत्त को?”(पृ.-99)
– शेषकुमारी सिंह-

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‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है।
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पुस्तक-समीक्षा
‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’
पुस्तक : ‘रामदरश मिश्र : सृजन संवाद’
लेखिका : डॉ. सविता मिश्र
प्रकाशक : विमला बुक्स, दिल्ली
मूल्य : तीन सौ रुपये (सजिल्द)
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अध्येता जब एकात्म होकर अपने अभीष्ट संदर्भ का अनुशीलन करता है तो अभिप्राप्त नतीजे रेखांकनीय हो जाते हैं। अध्येता जब स्वयं सर्जनात्मक प्रतिभा रखता हो तो ‘एकात्म होना’ अधिक घनीभूत होता है, साथ ही प्रतिप्रश्नों की द्वंद्वात्मकता के स्थान पर एक ललित-संवाद स्थापित होता है। ‘रामदरश मिश्र : सृजन-संवाद’ पुस्तक में मूल रूप से यही भावभूमि स्थापित होकर आयी है।
डॉ. सविता मिश्र ने रामदरश जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और रचना-संसार से परिचित होते हुए – उसे खंगालते हुए – फिर आत्मसात करते हुए …….और अंतत: विश्लेषित करते हुए जिस सर्जनात्मकता व लालित्यपूर्ण प्रस्तुतीकरण का परिचय दिया है वह नव-अनुसंधित्सुआें को अपने-अपने ‘समीक्ष्य’ संदर्भों के प्रति एकाकार-भाव से अनुशीलन किये जाने की अभिनव-प्रणाली का बोध कराता है।
हिन्दी साहित्य में रामदरश मिश्र किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। सर्जनाकार, चिंतक व मनीषी होने के साथ ही विभिन्न विधाओं में वे अपनी मौजूदगी भी रखते हैं। लोक-नैकटय को उन्होने विस्मृत नहीं होने दिया है। प्रत्येक सुपरिचित के प्रति नव-दृष्टि अपनी स्वयं की कुछ विशेषताएँ लेकर सामने आती है। प्रकृति की हर नई कोंपल ऑंखे फाड़ते हुए वटवृक्षों को देखती है – नवजिज्ञासु के तौर पर भोले प्रश्न भी करती है। हर जिज्ञासा की प्रतिपूर्ति और प्रत्येक प्रश्न का उत्तार अपने अभीष्ट से भावगत साम्यवस्था की ओर एक कदम होता है। सर्जना के वैराटय से जुड़ी विषयवस्तुओं और उनके ‘फिनेमिना’ पर जब एक अनुशीलनकर्ता संवाद करता है तो कुछ नया भी घटित होता है जो पूर्वकृत सर्जना से सम्बन्धित होते हुए भी कुछ नव्यतम बनकर सामने आता है। तब निर्विवाद रूप से यह कहना होता है कि संवादकर्ता के व्यक्तित्व की छाप ‘सृजन-संवाद’ को शब्दबध्द किये जाते समय आ पड़ती है।
पुस्तक में कुल 19 लेख हैं जो सतरंगी आभा लिये हुए हैं। इनमें भेंटवार्ता, यात्रा, संस्मरण, रेखाचित्र, व्यक्तित्वानुभूति, जीवनी आदि के तत्वों के अलावा रामदरश मिश्र जी के सर्जना-संसार पर चिंतन-मनन और विश्लेषण भी पूरी रचनात्मक प्रासंगिकता के साथ उपलब्ध है। अधिकतर लेख ‘अध्येता-समय’ की डायरी की तरह हैं जो अपने अलग-अलग अस्तित्व को समेटते हुए संकलन के रूप में यहाँ हैं। पहले ही लेख ‘वह दिन’ में लेखिका के स्वतंत्र भावास्फुरण की झलक मिल जाती है। रामदरश जी से भेंटवार्ता के प्रसंगोपरांत यह वर्णन देखें -”साढे ग्यारह वर्षीया अपूर्वा और दस वर्षीया गिन्नी के बाल-सुलभ प्रश्नों और कौतूहल के रंगों में डूबी भीगी-भीगी सी दोपहर ऑटो के साथ-साथ भाग रही थी। बादलों को देखकर मिश्र जी की ‘यायावर बादल’ कविता याद आ रही थी”
रामदरश जी के व्यक्तित्व से परिचित कराते ललित लेखों में – ‘साहित्य का विन्ध्याचल’, ‘ एक गँवई व्यक्तित्व’ आदि हैं। एक स्थान पर रामदरश जी के विषय में लिखा गया है कि- ”महानगर की दीवाली की जगमगाहट के बीच उन्हें याद आने लगती है गाँव की दीवाली और उनकी स्मृति में जगमगा उठते हैं मिट्टी के दीये। दीयों का उजास उनकी शिराओं से फूटने लगता है और स्मृति में उभर आते हैं पूजाभाव से तेल ढारते हुए माँ और भाभी के हाथ।” ‘जहाज का पंछी’ जैसे लेखों की विशेषता यह है कि अनेक कथा-पात्रों को रचने वाले रामदरश जी इसमें स्वयं पात्र बनकर पाठकों के सामने हैं। बालक रामदरश को चलचित्र के रूप में देखना सुहाता है- ”मेले में ‘डह-डह-डग-डग, डह-डह-डग-डग-हुडुक्क, झाल ओर मृदंग के ताल पर नाचते नचनिया, छनछनाती हुई कड़ाहियाँ, गाड़ी की सीटी सुनकर रेलगाड़ी देखने की ललक, उस पर चढ़ने की ललक…..। इसी वर्तुल जिंदगी की गंध समेटे मिश्र जी का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है” A इस दौरान लेखिका की सजग विश्लेषणात्मिका-बुध्दि अपने समीक्ष्य की सामाजिक-चेतना के उत्सों को भी खोजती चलती है- ”उन्होनें अपमान, झिड़की और आत्महीनता से पीड़ित लोगों को रोटी के सवाल से जूझते हुए देखा है। इतना ही नही, यातना का अनवरत सिलसिला उस परिवेश में चलता रहता था। मालगुजारी के लिए कुर्क अमीन का दौरा, दरोगा जी का आतंक, कर्ज की वसूली के लिए किए गए तकाजे…न जाने कितने दर्दों का साक्षी रहा है उनका मन।”
‘प्रकृति के उल्लास में डूबा कवि मन’, ‘कविता की बासंती आभा”, ‘खूशबू घर से आती खुशबुएँ’ आदि लेखों के माध्यम से रामदरश मिश्र जी की कविताओं के प्रकृति-प्रेम का वैशिष्टय और भावनात्मक सौंदर्य तो दृष्टिगोचर होता ही है, लेखिका के स्वयं के प्रकृति-सापेक्ष उल्लास, भाषायी-भंगिमाऐं आदि अनायास प्रकट हो जाते हैं। एकात्मकता के कारण भावस्थ दृष्टि स्वयं लेखिका में उतरती हुई जान पड़ती है जो अध्येताओं में परम्पराओं के विस्तार के लिहाज से शुभ संकेत हुआ करते हैं।
‘रामदरश मिश्र की नारी-मुक्ति सम्बन्धी अवधारणा’ तथा उनके ‘काव्य में जीवन-मूल्य’ आदि विचारप्रधान शोधात्मक लेख हैं, जिनमें लेखिका की विश्लेषणात्मक शैली का पता चलता है। एक स्थान पर लिखा गया है कि- ”मिश्र जी के उपन्यासों का मूल्यांकन करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे हाशिये पर खड़ी स्त्री को केन्द्र में लाये हैं। शोषण-तंत्रों की भली-भाँति पड़ताल करते हुए उन्होंने स्त्री-मुक्ति का मार्ग सही अथर्ाेंं में प्रशस्त किया है।”
उनके काव्य-संग्रहों की प्रकीर्ण समीक्षाओं से रूपाकार लेकर ”ऐसे में जब कभी’ में बहती रोशनी की नदी’, ‘ऊर्जस्वित बसंत……..जो कभी नहीं झरता (संदर्भ : आम के पत्तो)’, ”उस बच्चे की तलाश में’ – समय की आहटों से गूँजता कविता-संग्रह’, ‘तू ही बता ऐ जिन्दगी : जीवन की सघन गूँज में डूबी गज़लें’ आदि लेख हैं।
मिश्र जी की रचनाधर्मिता के उत्तारकाल (आयु के लिहाज से), उनके काव्य की अंतर्वस्तु, विषय-वैविध्य और संरचना पर ‘आज भी समय सत्य रचती है कलम’ व ‘संरचना-सौंदर्य’ शीर्षक से लेख हैं। मिश्र जी की शब्दावली और तकनीक पर पर्याप्त कोंणों से यहाँ प्रकाश डाला गया है। उनके आत्मकथांश पर ‘कच्चे रास्तों का सफर : जीवनानुभवों से अंतरंग साक्षात्कार’, ललित-निबंध-संग्रह पर ‘छोटे-छोटे सुख – उजास भरी यात्रा’, बारहवें उपन्यास ‘परिवार’ पर ‘परिवार : मानवीय जीवन-मूल्यों की उत्कर्ष यात्रा का दस्तावेज’ , डायरी पर ‘आते-जाते दिन : समय, साहित्य और जीवन से अंतरंग साक्षात्कार’ संग्रहित है।
पुस्तक के अंत में पाठकीय सर्जना-प्रतिभा के अनुरूप लेखिका की दस ऐसी कविताओं को जोड़ा गया है जो रामदरश जी के उपन्यासों को पढ़ते हुए रूपाकार ले चुकी थीं। लेखिका द्वारा किया गया यह विधांतरण औपन्यासिक समाज-चेतस का काव्यरूप तो है ही – रोचक भी है-
”कभी-कभी / पूरे का पूरा ‘पाण्डेपुरवा’ / जम जाता था मन के अन्दर /और दूभर हो उठता है / साँस के लिए रास्ता खोज पाना / पर तभी अचानक / तैरने लगते थे कुछ फाग, शिराओं में / चैत की पूनो खिलखिला उठती थी / और ढूँढ लेती थी तब एक साँस / चुपके से अपना रास्ता………” (‘पानी के प्राचीरों’ के साथ-साथ)
एक विशिष्ट व बहुआयामी रचनाकार, कथाकार व मनीषी – जिसका साहित्य मात्रात्मक व गुणात्मक, दोनों दृष्टियों से उल्लेखनीय है – उस पर कार्य करतें हुए अकादमिक उपाधि प्राप्त करना एक बिंदु है, तथा इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को आनंद, उल्लास व उमंग से भरी यात्रा का विषय बना लेना अध्येता की निजी सफलता है। यही निजी सफलता एक स्वतंत्र विधा का आस्वाद कराते हुए पाठकीय साधारणीकरण के साथ विस्तार पाती है।
‘माइन्ड द टारगेट बट एन्जॉय द जर्नी’ – रूपी तराजू के दोनों पलड़ों पर अपनी पकड़ बनाये रखते हुए लेखिका ने जो सृजन संवाद लिपिबध्द किया है उसमें एक ओर भावों व कल्पना की उड़ान है तो दूसरी तरफ उचित परिप्रेक्ष्य, उध्दरण व सन्दर्भों के लिए सर्तकता का वरण। प्रत्येक ललित लेख में रामदरश जी के सम्बन्ध में प्रतिष्ठित विचारकों के कथन, उनके उपन्यासों के पात्र, पात्रों की परिस्थितियाँ, कविताओं की पंक्तियाँ आदि को इस तरह पिरोया गया है कि कहीं जोड़ नहीं दीख पड़ता। क्या ही बात है कि यात्रा करते हुए मौसम के एक तेवर को देखकर अपने समीक्ष्य-कवि की एक पंक्ति याद आ जाये! पाठक को रामदरश जी के कई पहलुओं से अवगत कराने की ‘आयुर्वेदिक’ तरह की पध्दति इस पुस्तक में दृष्टिगत है।

-डॉ. रामकुमार सिंह

जरदान……..एक गंवई का इन्टरव्यू / कहानी


”जे मोड़ा भारी बदमाशएँ …..देखि लेऊ……मेई नेकरए धूरि में लपेटि कें झारि पे टांगि आयेएँ” जरदान दाँत पीसते हुए शिकायत करने उस तरफ आ ही रहा था, जहाँ हम चार लोग कुर्सियाँ डालकर बैठे थे, इतने में एक उपद्रवी लड़के ने उसकी पीठ पर धूल रगड़ दी। ‘मान जा’…..’मान जा’ की आवाज लगाता हुआ जरदान थोड़ी दूर तक उसके पीछे दौड़ा फिर आ बैठा हैंडपम्प के पास। काली नेकर में उघाड़-पुघाड़ जरदान गोरखनाथ परम्परा का पूरा अवधूत जैसा दिखाई देता है। मोटी तोंद आगे निकल रही है। अभी नहायेगा – जब सूयदेव भी ‘संध्या-हाउस’ की ओर प्रयाण करने का मन बना रहे हैं, फिर सूखे कुयें की पार पर जा टिकेगा या पीली सरसों के खेत के सिरहाने डली पटिया पर। कभी काले कुत्तो को दूर तक हाथ हिला हिला कर खदेड़ आता है …..कोई नहीं कहे तब भी। यह जाहिर करने का पूरा नकली प्रयास कि वह बड़ा कमेरा है, और कुत्तो को खदेड़ कर उसने कर्मण्य-संसार में एक विराट मिशाल कायम की है।
उसे किसान कहूँ या मजदूर। अब किसनई के लिए उसकी कोई जमीन रही नहीं और ना हीं कोई परिवार । कोई आगे-पीछे नहीं। चम्बल पार से इस तरफ आ गया है। मजदूर इसलिए नहीं …कि एक दबाब ओर बँधुआपन जो होता है वह उस पर कतई नहीं। हवेली वाले बोहरे जी के सानिध्य में टिक्करों का जुगाड़ हो जाता है या सामने वाले पुरा पर। पता नहीं ……..कहीं भी पा लेता है जरदान। एक दिन बोला – ”माड़साब! माड़साब! बा पेड़ पे नौता टँगोए” ”क्या बक रहा है रे ! पेड़ पर कहीं न्यौता टंगे होते हैं ?” मैंने चिढ़ते हुए कहा। ”अरे माड़साब सांची के रऊँ, नीम पे माइक कसौए, धुँआ उठि रओए, रामान बँचीए, नौता होगो जरूल।” जरदान ने न्यायसिध्दांत के आधार पर धुँआ, माइक, रामचरितमानस पाठ आदि संकेतों को न्यौता का पक्का आधार निरूपित करते हुए मुझे जबाब प्रस्तुत किया।
न्यौते का शौकीन और जुगाडू – जरदान। लेकिन स्वाभिमानी इतना कि बिना न्यौता के भोजन नहीं करता। स्व-स्मृति दिलाने का नायाब तरीका भी है जरदान के पास। न्यौता-स्थल से सिर पर साफी कसकर निकलेगा – हाथ का पंजा तानकर गंभीर मुद्रा में राम-राम करेगा – उसे देखकर किसी न किसी को ध्यान आ ही जायेगा…… और जरदान का न्यौता तैयार।
ऊँचा सुनता है जरदान। कान का मैल जीवन में साफ नहीं किया। भैंस की खाल जैसी पीठ तो हो ही गई है। ऐसे ही मैलाधिक्य के कारण कान का परदा कुंदे छोड़कर नीचे आ गया होगा, ऐसा जरदान के वर्षों पुराने सतत-दर्शियों का मानना है। कान पर गायकों के मानिंद हाथ रखकर जरदान बड़ी ही नजाकत से दूसरे की बात सुनता है। पक्का खबरिया। एमपी, यूपी, राजस्थान के बीहड़ी ग्रामों से गुजरते हुए अफवाहनुमा शंखकर्णी खबरें जरदान पर एकत्र हो जाती हैं। एक दिन सुनाने लगा – ”माड़साब! गूजरन पे बड़े भारी लट्ठ परेएँ राजिस्थान में। लाल गुलम्बर पे कारे मूड़ वाए करेण्ट को डण्डा लेकें फिरि रयेएँ। गूजर दीखे नईं …….के चटाक्!!”
जरदान खुद गुर्जर है। जब गुर्जरों का आंदोलन चल रहा था तो अखबार, रेडियो और शहर-आगत भद्रजनों से उसे एक ही प्रश्न के उत्तर की आशा रहती थी – ”कै मरि गए ? कै बचि गए?” जरदान की युध्द-वर्णन शैली मामले को ज्यादा भयावह बना देती। टीवी चैनलों के दर्शकों भी जब वही खबर जरदान के मुखारबिन्द से सुनवायी जाये तो श्रोता एक-दूसरे का हाथ पकड़कर घर तक जायें। कौन से नेता के दिमाग में क्या षडयंत्र चल रहा है और किसी घटना के वास्तविक निहितार्थ क्या हैं ये वेदप्रताप वैदिक और राजदीप सरदेसाई भी जरदान-व्याख्यानुसार सुने तो दाँतो तले ऍंगुली दबा जायें।
प्रथम भेंट में इस नवागत ‘माड़साब’ से पहला सवाल जरदान ने यह किया – ”तेई नौकई लगि गईए? बु डाड़ी बाओ सरदार सिग देस के मास्टरनए नौकई की तनखाए देतुए ? पूरे देस को बुइए………एकई मालिकुए? देश के प्रधानमंत्री के विषय में उसके गहन ज्ञान और दाड़ी के वाचिक रेखाचित्र का इशारों के साथ वर्णन सुनकर मैं अपनी अल्पज्ञता पर संकुचित हुआ।
एक दिन जरदान पटिया पर करवट लिये लेटा था। खेत की तरफ मुँह था और हम भलेमानुसों की तरफ पीठ। आज क्या बात है? ये बोल क्यों नहीं रहा? पता चला कि बुखार से तप रहा है। एक फोड़ा भी हो गया है। पूरा शनीचर है। नहाता है नहीं। बड़ी देर बाद जरदान के श्रीमुख से उद्गार निकले। प्रतीकात्मक शैली के अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी कवि की तरह स्थानीय बोल थे, जिसका आशय था कि गलगलिया (एक चिड़िया) को बुखार आ गया ….कौआ उसकी नब्ज जाँचने बैठा है। थोड़ी ही देर बाद गलगलिया का ‘ब्यॉय-फ्रेण्ड’ कबूतर आ गया ….खूब घुट-घुटकर बातें होने लगीं-
”गलगलियाए चढ़ी तिजाई / कौआ देखे नाड़ी
जाको यार कबूतर आयो / बु तो घुटि-घुटिकें बतरायो
खांसी औरु कफु जाये / दुख पावे रे जद्दान
ढोला मेरो चढ़ो करौली की घटिया / जाको बध्द बिचो ना नटिया
नरवर वारो सूप गांठि रओ / भूप चलाय रओ चाकी
नल देतु चाकी में टल्ले / चून के है रए रे गल्ले”

अप्रत्याशित कविता-योजना बुखार और कफ-सीरप से होते हुए पुरातत्ववेत्ता जरदान के दृष्टि-निक्षेप का माध्यम पाकर करौली के पर्यटन मार्ग और नरवरगढ़ के किले का वस्तु-स्थल वर्णन भी कर देगी, यह अनुमान नहीं था।
बीच-बीच में जरदान कई दिनों के लिए गायब हो जाता है। हम लोग पूछते रहते हैं…….भई जरदान नहीं दिखा आज। और बात आई – गई हो जाती है। एक बार की बात। खबर आई कि जरदान को ट्रेक्टर में डालकर ‘बजार के असपताल’ में ले गये हैं….इमरजेंसी है। उसकी हालत बहुत खराब है। हम सबके चेहरे फक्क हो गए। कैसा भी हो, आखिर रोज मिलता तो था। क्या हुआ? कैसे हुआ? सवालों की झड़ियाँ लग गईं। मुआमला यह नजर हुआ कि टिक्करों से उकता चुके जरदान साहब पहँच गये ‘झिन्ना बाबा के अस्थान’ पर। बीहड़ के इस सुरम्य धार्मिक स्थल पर ग्राम्य-श्रृध्दालुओं की भीड़ खूब होती ही है। जरदान पीली साफी बाँधकर आसन जमाकर बैठ गया। खीर, सूजी, बरफी, मालपुए……..एक दिन……दो दिन…….तीन दिन ……। झिन्ना बाबा के भोग की जय हो। खाते गये….खाते गए……। पेट नगाड़ा हो गया और गाड़ी-पछाड़। बेहोश जरदान के सम्बन्ध में अनुमानित डाक्टरी जाँचों से स्पष्ट हुआ कि ब्लड-शुगर ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये हैं और निरंतर भोजनाधिक्य से रक्तचाप, सभी चापों में मूर्धन्य हो गया है।
बहुत दिनों बाद स्वस्थ जरदान के दर्शन हुए। दूर से ही पंजा चौड़ा करके राम-राम कर रहा था। उसका इलाज ‘प्रतिष्ठित’ ग्राम्यजनों के सौजन्य से हुआ, जिनके मौजूद रहते जरदान का स्वर्गारोहण उनकी सामाजिक अस्मिता को चुनौती होता। बस इसी घटना के बाद से जरदान भोजन-भय से आक्रांत हो गया। अब खीर के नाम से जरदान लार जरूर टपकाता है मगर कान पकड़े रहता है, जिससे सीमा का ध्यान बना रहे। ‘अस्थान’ वाली घटना से पहले उसने ‘बमूर की लकईया की सुमिन्नी’ (बबूल की लकड़ी की छोटी माला) बनाई थी। पटिया पर बैठकर बाबा होने का पूर्वाभ्यास करता था। तब कुछ शक तो हुआ था। पटिया पर पीले अगोंछे में मासपूर्वस्नात (एक माह पूर्व स्नान किये हुए) जरदान दिव्य-संत जैसे अधखुले नेत्र और उलटी माला जपते हुए विराजता था। अब वह प्रक्रिया ठप्प है। बबूल की 24 कैरेट माला का कहीं अता-पता नहीं। जिसका एक-एक मनका कुएँ की गिर्री का ज्येष्ठ-पुत्र लगता था। तब तो वह कहता था – ”माड़साब मेएँ कोऊ आंगें-पीछें हत नानें। अब तो हूँ बाबाजी हे गओ”। कुछ दिनों में उकता कर जरदान ने अंतत: उस अभिनय-व्रत का अघोषित उद्यापन कर दिया।
चुनावों में जरदान की चाँदी। चारों तरफ लंगर चलते हैं। जरदान के बनाये नारों और तुकबंदियों की धूम। ऐसी ‘कपिता’ (कविता) कि ग्राम्य-जन लोटपोट। बड़ी पूछ-परख होती। उसका यह काम आज से नहीं। जरदान की स्मृतियों में इंदिरा-युग जमा बैठा है। उसकी तद्युगीन यात्रा पर ले जाने वाली तुकबंदियों से यह पता ही नहीं चलता है कि वह किस तरफ है। उसका ‘ढरकाऊपन’ उसकी रचना में भी यथावत् विद्यमान है। जो खिलाएगा उसी के ‘वाद’ की सेवा में तुकबंदी। खाना, तम्बाकू, और दाड़ी बनवाने के नाम पर दौ रुपैया। जरदान माँगता है….मगर ….पूरे स्वाभिमान से। हैसियत का भी हिसाब रखता है। ‘प्रेंसीफल’ से पाँच रूपये से कम नहीं लेगा। कहता है – ”बे तो अधिकारीएँ, बिनकी हेटी नहीं होगी का?”
आज जरदान को पकड़कर बैठा लिया गया। सारा स्टाफ जमा है – ‘जो पैसेंजर से आता है। हुड़दंगी लड़के भी दम साधकर बैठे हैं…….वे जो जरदान की आशुकविता के आस्वादग्रहीता हैं। हर समय जरदान को घूँसा देकर भाग जाने वाले उसकी कविता सुनते समय पूरा गौर करते हैं। आज खबर है कि ‘किताब-कोपिन के झोरा बाय माड़साब जिद्दान को इंटरवू लेंगे’। जरदान नहाकर आ गया है। तेल पोत लिया है। सिर पर साफी कस ली है। उसे ऊँची आवाज में बताया गया है कि ‘फोटू’ का कैमरा आने की भी पूरी आशंका है। बनियान से तोंद ढाँकते हुए जरदान पटिया पर आलथी-पालथी बैठाया गया है। नीम का पेड़ है, सरसों के पौधों ने आधी जीवन-यात्रा तय कर ली है और उसकी पीतवर्णी आभा ग्राम के स्वर्णसम्पन्न होने की उद्धोषणा कर रही है। आज जीवन में पहली बार जरदान के उद्गारों को पंजीबध्द किये जाने का ऐतिहासिक अवसर है। जरदान इस क्षण के लिए पूरी तरह तैयार है। लड़के उसकी पीठ और अगल-बगल में चढ़े बैठ रहे हैं। मैंने पटिया पर जगह बनाकर जरदान की द्रुत-पाठ-गति से समायोजन करने का मन बना लिया है। प्र्रस्तावना शुरू होती है। जरदान से संवाद हो रहा है। पहला प्रश्न उसी की तरफ से-
”मेई कपिता लिखेंगें?”
”हओ” जबाब ग्राम के उद्भट विद्वान दे रहे हैं। इंटरव्यू लेने वाले को बोलने की जरूरत नही।
”बि तो बैसी एँ…..!”
”बि तो अच्छी एँ, तू तो सुना”
”किताबनि में आवेंगीं”
”हओ, तू तो सुना”
”वा पुरा वाए इसकूल के मोड़ी-मोड़ा पढेंगें जि कपितनएँ”
”हओ, पहाडे में आवेंगीं, तू तो सुना”
एक लड़के ने ज्यादा ही उकसाया तब जरदान के कान पर हाथ रखा……सांस ऊपर खेंची और पहली तुकबंदी सभा में मिसाइल की तरह आकर गिरती है-
”देस बिगारो नेतन ने
बहू बिगारी बेटन ने
खेत बिगारो रेतन ने
सड़क बिगारी ठेलन ने
आम बिगारे तोतन ने”
जरदान ने सांस तोड़ी।
”हट्!! लड़कों में से आवाज आयी। औरि अच्छी वाई सुना।”
जरदान ने अपनी गरदन को कुकडूँकूं की तरह ऊपर उठाया। सांस खींची, कान पे हाथ रखा और दूसरी कविता छूटती है-
”डकैती मति डारे बलम
डकैती की बुरी कमाई ए
तोय पुलिस पकरि ले जायगी !
तू थाने अंदर जायगा!
दगरे में जाय रईं चारि गुईंयाँ !
जाको कैसोए सैंया?
नालिन में लेत डुबकैयां!
थाने में खात पनहैंयां !
डलिया बारे पोदीना देजा हरो-हरो
मेई सासुलिया रही मगाय
कहां जातुए सिपाई
तोय मारे लुगैंयां
गाम बड़ी दूरि दिन थोरो रे
दिनु छिपु जाय दूर नगरिया रे”।
जरदान ने सांस फिर तोड़ी। ”बस्सि माड़साब भोतुए?” गद्य में जरदान बोला। एक लड़के ने कोहनी जड़ दी जरदान मे- ”अबई क्हां भईएँ पूरी कपिता?
”पेली बाई सुनाय दऊँ”
”हओ सुनाय दे सपाटे ते”
जरदान ने एक दफा फिर कान से हाथ का जीवंत सम्पर्क कराया और कविता उसके कंठ-कमान से तीर की तरह छूटी-
”इंद्रा भोत रहि लई गादी पे, अब आजा गोबर-पानी पे”
”चल !!! मार परेगी तो पे………एक कांईयाँ भद्र-पुरुष ने बीच में टोक दिया………जि रिपोट करि देंगें तेई थाने में डरो रहेगो सारे!…लिखि सोऊ रहेएँ कांपी में….बेट्टा!!”
इतना सुनना था कि जरदान उचक कर दो फीट दूर। सभा से पलायन-वेग स्थापित कर लिया जरदान ने ” तो मैं ना लिखाय रओ, जा मास्टरए। जरदान मुड़ा ही था कि उसके पंचा की कांछि खोल दी एक ने। दो उसकी भीमकाय देह पर सवार हो गये बेताल की तरह। जरदान ने भीष्म-घोषणा कर दी की गड़बड़ी की आशंका वाली ‘कपिता’ लिखी जायेगी तो वह इंटरव्यू नहीं देगा। ‘सौ बक्का एक लिक्खा’। अनेक प्रकार के रंगे-पुते आश्वासनों के बाद उसे दुबारा तैयार किया गया। ब्रेक के बाद इंटरव्यू पुन: चालू होता है। जरदान पूछता है – ”काय माड़साब! जि सरदार नेता बनाओए ते इंदिरा के मोड़ा की बहूए? ग्राम-विश्लेषकों ने उत्तर दिया – ”हओ!। अब जरदान गाते हुए बोलता है-
”इंद्रा करि रई सहज सुधार, जनता के सुआरथ में
गाम-गाम इसकूल लगाय दये विसविद्यालय के सुआरथ में
इंद्रा करि रई सहज सुधार, फिरि रई जनता के सुआरथ में”

एक नेनो सेकण्ड के भीतर जरदान की भंगिमाएं बदलीं और कविता ऊपर कविता दे मारी-
”इंद्रा तेने गजब करो
तेने चलवाय दई नसबंदी
बलम गयो नसबंदी में
खेत गयो चकबंदी में”
”बस्सि-बसि भोतुए” एक ने रोका।
”एक किसनई की औरि सुनाऊँ? जरदान चालू –
”माह फागुन को जाड़ो रामा , करि गओ सत्यानासी ए
मेड़-मेड़ पे बोरिंग चलि गए, ढरगि चलो जाको पानी ए……………………….
बीच में जरदान का चैनल अनटयून हो गया और इसी कविता में खबरिया चैनल लग गया-
……फतेहाबाद में गाड़ी टूटी, मरी इक लाख असवारी ए
कंचनपुर में लगे मवेसी, बिक्री हे रई अति भारी ए”
जरदान उठा, फिर उसकी ‘घेंटी’ सुधी-श्रोताओं द्वारा पकड़ ली गई। पनहैंया की दम पे उसे बैठा लिया गया। जरदान छुटभैये नेताओं की खूब कविता उतारता है जो गाँव से शहर जाकर बगबगे कपड़े पहनकर नेताओं जैसी शैली अपनाने की कोशिश करते हैं। जरदान उसी कविता को अगले वार के रूप में इस्तेमाल करता है-

”जिनके बाप ना बैठे एक पड़न की गाड़ी में
ते बैठत डोलें कारन में
सूंत गांठि कैं मुण्डा पहिरें
करें कचेई राजनि में,
पीवे दूद ना मिले कमजोरी आय गई भारत में,
बहूबेटिन कों चाकी चलि गई
मरदन कों चले टेकटर फोरड खेतन में,
आजादी आय गई भारत में”।

अब जरदान रुका और मुझसे पूछा – ” काय माड़साब! मोड़ी-मोड़न के पहाड़े में मेई कपिता छपेगी। ”
”आ हाँ छपेगी, जरूर छपेगी”
”औरि फोटू आवेगो?” हाथ का पंजा सीधा तानकर फोटो जैसा बनाते हुए जरदान ने पूछा।
”आयेगा भैया जरूर आयेगा”
”तो पेलें मोय दो रुपैया दे। तू भारी चालाकु ए।”
मोरमुकुट बाबूजी ने उसे खुल्ले दो रुपये थमा दिये। जरदान ने अंटी में खोंस लिये। दो रुपये की उष्णता पाते ही इस बार मंचानुमति से पूर्व ही जरदान की कपिता का तूफान शुरु हो गया-
‘इक लक दो लक तीनि तिलंगा
हरीनाथ के पांचऊ पंडा
घोड़िन की घुड़सालन बोले
बड़ी पौद में सुन्दर बोले
लाल बछेरा पी-पी रे कदम को दूद!
बामन-बामन बांचि रे पोथी!
एक राजा की बेटी!
कबूतर हाथ में लेती!
तमाशो बाग में कत्ताी!
रुपैया रोज को लेती!
अठन्नी ब्याज की लेती!”

”काय रे ! जा कपिता को का अत्थए”
”माड़साब…….मोय……ना पतो…..जि तो मोड़ी-मोड़न कूँ बनाय दई ए”
जरदान की आशुकविताओं से लेकर नारों और तुकबंदियों, गुजरे वक्त की स्मृतियों से चिपकी कविताओं, गांव की मण्डलियों के गीत और प्रोग्राम, पातीराम की भजनावली – सब मिक्स होकर कविताकार हो गये हैं। इस गंवई का इंटरव्यू सकुशल निपट ही रहा था कि गांव के एक और उपद्रवी लड़के ने जरदान की टुण्डी में अंगुली कर ही दी –
”किसनदेई क्हां चली गई? नेक बऊए तो बताय दे”
जरदान को जैसे करंट लगा हो। उछल कर पत्थर उठाया और भागा उसके पीछे – ”सारे ! मारि डारेंगों…..बदमाश कंऊँ के!!”
काफी देर बाद यह मामला शांत हुआ। सभासद प्रस्थान कर गये। अकेले में जरदान को मैंने बिठाया। बाबूजी से तम्बाकू मंगवाकर खिलवाई। फिर धीरे से पूछा- ”जरदान! किसन्देई को है? जरदान का मुखमण्डल लालिमा और क्षोभ के मिश्रित भाव से भर गया, जैसे अतीत के कुहासे को स्मृति के तरलीकरण द्वारा शब्दों के ओस में ढालना चाहता हो- ”किसन्देई भारी सुन्दर हती। सिग मास्टरन की मास्टरनीउ ऐसी नईं होगी। मेई घरवाई हती। अब औरि कें चली गई। अपईं कोंपी में मति लिखिओ मास्टर! मेंए मोड़ी-मोड़ा कोऊ हति नईओ। जमीन भैया-भतीजेन नें …….औरन ने दाबि-दूबि लई। मास्टर! …..मैं राजा हतो……अब कछू नाने। तू जों मति जानिओ कै मैं डाड़ी बनवायवे कों पैसा मांगतों। …..किसन्देई भारी कर्री हती। अलीगढ़ के बदमाशन कों कमरा में मूँदि कें छक्क निकरि आई हती। …….काय मास्टर मेई कपिता आवेगी…..किताब में…? मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया, घड़ी देखी, बैग उठाया और स्टेशन की तरफ रवाना हो गया। खेत में सलीके से सिर उठा रहे पंक्तिबध्द पौधे ऑंखें फाड़कर मेरा बेग देख रहे थे जिसमें जरदान वांग्मय भरा था। – डॉ. रामकुमार सिंह