*टिल्लू* बाल-कहानी (एक विद्यार्थी के आग्रह पर)

 

 टिल्लू ने अंडे को फोड़कर अपना सिर बाहर निकाला। नन्हीं – नन्हीं ऑंखें  उसने सबसे पहले एक बड़ी चिड़िया को देखा जिसकी आंखों में अपार ममता भरी थी। यह टिटहरी कोई और नहीं उसकी मां थी जो गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही थी – टि टी टि हुट् – टि टी टि हुट्। इस आवाज से टिल्लू के चिपके हुए कान पहली बार भीतर तक खुल गये।

टिल्लू सारी दुनियां को पहली-पहली बार देख रहा था। पेड़, घर और आकाश। तभी हवा का एक झोंका आया और उसके बदन में मीठी-सी गुदगुदी  दौड़ गई। तब उसे महसूस हुआ कि  एक छोटी-सी चॉकलेट जैसा उसका शरीर भी है। नन्हें पैरों को अंडे के मुंह से बाहर निकालकर उसने दुनियां में पहला कदम रखा…..जोर की अंगड़ाई ली। वह चौड़ी छाती किये दुनियों के बीचों-बीच खड़ा था।

टिटहरी ने लपककर टिल्लू को अपनी गोद में भर लिया। अपनी मां के मखमली आलिंगन में लिपटकर टिल्लू मगन हो गया। उसने पहली बार रेशमी रेशों की गर्माहट महसूस की। टिटहरी ने बैठकर अपने पंख फैला लिये। टिल्लू उसकी गोद में ऐसा समा बैठा था कि दूर से केवल टिटहरी नजर आती थी।

खण्डहर की जिस दीवार के ऊपर टिटहरी ने अण्डे दिये थे ठीक उसके सामने माइकल का घर था। माइकल तीसरी कक्षा में पढ़ता है। टिल्लू और माइकल के घर के बीच एक मैदान था जहां कई पशु-पक्षियों का डेरा सारे दिन जमा रहता।

माइकल को स्कूल के लिये तैयार करते वक्त उसकी मां याद करती है कि जब माइकल पैदा हुआ था तो नन्हें पक्षी की तरह था। बूढ़ी नर्स जैना ने बताया था कि हवा लगने के साथ-ही नन्हा बच्चा तेजी से बड़ा होता जाता है। वह हाथ-पैर फैलाता है….शरीर साधता है।

खण्डहर की दीवार पर टिटहरी चल रही थी। पीछे-पीछे टिल्लू भी अपनी माँ की नकल कर रहा था। उसके पैर लड़खड़ा  रहे हैं…जैसे सर्कस मे कोई कलाकार रस्सी पर चलना सीख रहा हो। ……अचानक तेज हवा का झोंका आया, टिल्लू के पैर दीवार का साथ छोड़ बैठे। नन्हा टिल्लू हवा में तैरता नीचे की तरफ जाने लगा। उसके पंखों ने अभी फैलना और फड़फड़ाना नहीं सीखा था। पर उसका शरीर इतना हल्का था जैसे पेराशूट लगा रखा हो। टिटहरी ने जोर-जोर से चीखना शुरू किया टि टी टि हुट्   टि टी टि हुट्। वह उसके पीछे ही उड़ी।

टिल्लू मैदान में गिरा। वह हड़बड़ाया हुआ था मगर उसे चोट नहीं आई थी। टिटहरी टिल्लू के चारों ओर सुरक्षा का घेरा बनाये चिल्लाती जा रही था, ताकि कोई पशु पक्षी टिल्लू के पास ना आये।

मैदान में बैठी बकरी, गाय और काली चिड़ियों के कान खड़े हो गये। टिटहरी ने चिल्ला चिल्लाकर सभी कोखदेड़ना शुरू कर दिया। कर्नल का लाल-भूरा डॉगी ललचायी नजरों से टिल्लू के नरम-नरम शरीर को देख रहा था मगर टिटहरी की जोरदार आवाज और तैयारी के सामने उसकी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। टिल्लू के आसपास का सारा मैदान खाली हो गया। टिटहरी चौकन्नी और पूरी तरह तैयार थी। इस समय उसकी चोंच तलवार की तरह लहरा रही थी। टिल्लू पर कोई आंच आने से पहले वह हमलावर पर आक्रमण कर देगी। उसने टिल्लू को अपने गुदगुदे आंचल में छुपा लिया। पंख फैलाये । वह चिल्लाये जा रही थी……टि टी टि हुट्   टि टी टि हुट्।

माइकल के दिल की धड़कन बढ़ गई। वह स्कूल के लिये निकलते वक्त यह सब देख रहा था। सभी कुछ इतनी जल्दी हुआ कि उसकी समझ में नहीं आ रहा था वह क्या करे। उधर स्कूल की घंटी बज गई थी। उसके पैर स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन उसका मन वहीं था। वह देखना चाहता था कि टिल्लू को उसकी माँ खतरों भरे मैदान से उठाकर दीवार के ऊपर कैसे ले जा पायेगी? वह बारबार कोशिश कर रही थी मगर टिल्लू को अपने साथ उठाकर ले जाने में कामयाब नहीं हो पा रही थी। माइकल मुड़-मुड़कर देखता जा रहा था।

छुट्टी के समय माइकल उदास मन और भारी  कदमों से घर की ओर लौट रहा था। उसे बार-बार कर्नल के भूरे लाल कुत्ते की की ललचाई आंखे और जीभ याद आ रही थी। पता नहीं टिल्लू का क्या हुआ होगा……?

घर के नजदीक आते-आते माइकल इतना खोया हुआ था कि उसे पता हीं नहीं चला कि कब स्कूल के एक बड़े लड़के ने तेज साइकल से उसे टक्कर मार दी। माइकल सड़क के किनारे गिर पड़ा। थोड़ी देर में उसे खुद को अपने घर में पाया उसके कानों में आवाज लगातार गूंज रही थी। क्या हुआ मेरे बेटे…..माइकल तुम ठीक तो हो….। उसे माँ की गोद पहली बार ज्यादा मखमली और गर्माहट वाली लगी। आज माँ का हाथ भी उसे माथे को ऐसे सहला रहा था जैसे आसमान से उसे कोई ताकत दे रहा हो। वह मां की गोद की उस गर्माहट में छुपता जा रहा था। उसे मीठी नींद आने लगी। अचानक उसे कुछ याद आया…….उसे मां की गोद से सिर निकालकर सामने वाले खण्डहर की दीवार पर देखा । दीवार के ऊपर टिल्लू आराम से अपनी मां की गोद में छुपा बैठा था। टिटहरी पंख फैलाये उसे सहला रही थी।

अगली सुबह माइकल बहुत ताजगी महसूस कर रहा था। वह जल्दी-जल्दी स्कूल के लिये तैयार हुआ आज स्कूल में मदर्स डे का प्रोग्राम होना था। मैदान से गुजरते वक्त कोई फुर्र उसके सिर से निकल गया माइकल ने आसमान की तरफ देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। नन्हा टिल्लू अपनी मां के साथ उड़ान भर रहा था।

                                                                                                           

 

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8 responses to “*टिल्लू* बाल-कहानी (एक विद्यार्थी के आग्रह पर)

    • समादरणीय भाई
      नमस्कार।
      तनिक विलम्ब से उत्तर दे पा रहा हूँ….क्षमा करें….।
      मेरे अंतर्जाल पृष्ठ का अवलोकन करने एवं प्रतिक्रिया देने के कृतज्ञता।
      आपको भी शुभकामनायें प्रेषित हैं….शीघ्र आपके विचार पढ़ूँगा।
      आपने जो जो अक्षर उल्लिखित किये हैं, उनमें प्रथम श्रृ तो प्रथमदृष्टया ही त्रुटिपूर्ण है, क्यों कि इसमें ‘र’ तथा ‘ऋ’ दोनों उच्चारण एक साथ उपलब्ध हैं। संस्कृत में सियार के लिए कहीं-कहीं शृ अक्षर युक्त शृगाल का उपयोग होता है। हिन्दी कुंजी पटल पर श्र के नीचे का र हटाकर ऋ अर्थात ृ को जोड़ने की सुविधा उपलब्ध नहीं है जो कि वस्तुत: सही लिपि है………..शेष अपने गुरुजन से परामर्श उपरांत लिखूँगा।
      -डॉ. रामकुमार सिंह

  1. बहुत प्यारी और मोहक कहानी है …. ममत्व से भरपूर …. मनोभाव आंदोलित होते हैं और एक गुदगुदी होती है अंतर्मन में …. मोहक कनानी के लिए आपका आभार

    • धन्यवाद। प्रतिक्रिया साहसी ही दे पाते हैं। शीघ्र….. आप ज्वलंत मसलों पर कहानी मेरे अंतर्जाल पृष्ठ पर पढेंगे, …..ऐसी आशा करता हँ।
      -डॉ. रामकुमार सिंह

  2. बहुत सुंदर व मार्मिक कहानी है दिल को छु गयी बहुत सुंदर रचना है श्रीमान

  3. बहुत सुंदर व मार्मिक कहानी है दिल को छु गयी बहुत सुंदर रचना है श्रीमान आपका बहुत बहुत आभार

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