मेरा पी-एच.डी. शोध-प्रबंध/Thesis

शोध-कार्य का शीर्षक :
‘पंडित छोटेलाल भारद्वाज के महाकाव्यों में सामाजिक-चेतना : नये आयामों का अनुशीलन’
शोध-निर्देशक :
डॉ. विष्णुकुमार अग्रवाल, प्राध्यापक एवं शोध-निर्देशक, हिन्दी विभाग,
शासकीय स्नातकोत्तर उत्कृष्टता महाविद्यालय, मुरैना (मध्यप्रदेश)

विश्वविद्यालय :
जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
उपाधि वर्ष : सन् 2009

मेरे शोध-प्रबंध का मूल्यांकन विद्वानद्वय – प्रो.(डॉ)नवीनचन्द्र लोहानी, विभागाध्यक्ष, चौधरी चरण सिंह विवि] मेरठ तथा डॉ एसएस चौहान एसोसियेट प्रोफेसर असम विवि के द्वारा किया गया। मौखिकी डॉ लोहानी द्वारा ली गई। अनेक राष्ट्रीय महत्व की संगोष्ठियां आयोजित कर चुके, सक्रिय पत्रकार रहे तथा विश्व हिन्दी सम्मेलन 2007 न्यूयार्क में सहभागिता दर्ज कर चुके प्रो लोहानी से संवाद एक महत्वपूर्ण दिवस था। मौखिकी वाले दिन ही श्री जयंत तोमर जी की प्रेरणा से फिजीकल कॉलेज डीम्ड यूनीवर्सिटी, ग्वालियर के पत्रकारिता विभाग में लोहानी जी द्वारा विद्यार्थिया को सम्बोधित किया गया।
विद्वानद्वय की राय इस प्रकार है, जो जीवाजी विवि द्वारा मुझे मांगे जाने पर हस्तलिखित की छायाप्रति के रूप में प्रदान की गई है। कौन सी राय किस विद्वान की है यह नाम गोपनीय रखा गया है –

एक –
”मूल्यांकन के लिए प्रस्तुत ‘पंडित छोटेलाल भारद्वाज के महाकाव्यों में सामाजिक चेतना: नये आयामों का अनुशीलन’ शीर्षक शोध-प्रबंध का मैने व्यापक और गंभीर अध्ययन किया। यह प्रबंध कुल आठ अध्यायों में विभक्त है जिनमें से प्रथम अध्याय परिचयात्मक है और अष्टम अध्याय उपसंहार का है। सर्वान्त में संदर्भ-सूची है।
प्रस्तुत शोध-प्रबंध में गृहीत विषय का केन्द्र है : पं छोटेलाल भारद्वाज के महाकाव्यों में सामाजिक-चेतना के नये आयामों की खोज करना। अपने इस केन्द्रीय कार्य को सिद्ध करने के लिए शोधार्थी ने प्रथम अध्याय में रचनाकार का संक्षिप्त परिचय और समीक्ष्य महाकाव्यों – ‘सीतायन’ तथा ‘परशुराम’ का कथानक, आख्यान व नवाचार की दृष्टि से विश्लेषण किया है। दूसने अध्याय में सामाजिक-चेतना का सैद्धांतिक निरूपण करते हुए समीक्ष्य महाकाव्यों में सामाजिक चेतना के नये आयामों का वर्गीकरण किया है। तृतीय अध्याय में इस महाकाव्यों में अभिव्यक्त स्त्री, दलित और वर्गगत विषयों से जुड़ी समाजिक-चेतना को विश्लेषित किया गया है। चतुर्थ अध्याय में समीक्ष्य महाकाव्यों में वर्णित संस्कृति संबंधी परंपरागत धारणाओं को खोला गया है। पंचम अध्याय में समीक्ष्य महाकाव्यों में अभिव्यक्त आर्थिक और राजनीतिक चेतना का परम्परागत विचारों के साथ साथ आधुनिक विचारकों यथा मार्क्स, गांधी और विनोबा के संदर्भ में विवेचन किया गया है। षष्ठ अध्याय में सामाजिक चेतना के नये आयामों के सापेक्ष आये काव्य-शिल्प का विश्लेषण है जबकि सप्तम अध्याय में समीक्ष्य महाकाव्यों की सामयिक उपादेयता पर विचार किया गया है।
इस प्राथमिक स्थापना के उपरांत मेरा यह निष्कर्ष है कि यह प्रबंध गंभीर, महत्वपूर्ण और मौलिक विषय पर केन्द्रित है। इसके सफल और मौलिक विश्लेषण के लिए शोधार्थी के पास विषय के तत्वतल को समझने की क्षमता, विश्लेषणात्मक शक्ति, आलोचकीय दृष्टि और अभिव्यंजक भाषा है। प्रबंध विषयवस्तु को मौलिक-दृष्टि से प्रस्तुत करता है।
प्रस्तुत शोध-प्रबंध अपने वर्तमान स्वरूप में सन्तुलित है। इसके किसी भाग में संशोधन या पुनर्लेखन की आवश्यकता नहीं है। इसे प्रकाशन प्रक्रिया में लाया जा सकता है। अतः मेरी यह संस्तुति है कि मौखिकी के उपरांत शोधार्थी को पीएचडी शोधोपाधि प्रदान की जा सकती है।”

दो-
”श्री रामकुमार सिंह सिकरवार के शोध-प्रबंध ‘पंडित छोटेलाल भारद्वाज के महाकाव्यों में सामाजिक-चेतना: नये आयामों का अनुशीलन की भाषा, प्रस्तुति, विषय की प्रासंगिकता के अनुरूप है। शोधार्थी ने काव्य में पं भारद्वाज के योगदान को न केवल उल्लेखनीय रूप में चिन्हित किया है अपितु उसके सामाजिक चेतना के विविध आयामों को प्रस्तुत किया है। ‘सीतायन’, ‘परशुराम’ महाकाव्यों में उनकी रचनाओ पर शोधार्थी ने महत्वपूर्ण बिन्दुओं को प्रस्तुत किया है। इन महाकाव्यों में सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू को भी शोधार्थी ने चिन्हित किया है। दलित चेतना, सांस्कृतिक चेतना, आर्थिक चेतना जैसे बिन्दुओं में शोधार्थी ने कवि की महत्वपूर्ण रचना-प्रक्रिया, विषयगत संवेदना तथा चेतना के आयामों को स्पष्ट किया है।
शोधार्थी ने उनके साहित्य पर वैचारिक प्रभावों में गांधीवाद तथा मार्क्सवाद का भी उल्लेख किया है। समीक्ष्य साहित्य में प्रकृति-प्रेमगत संवेदना को भी विस्तृत तथा गहन विमर्श के साथ प्रस्तुत किया गया है।
यह शोधप्रबंध पंडित छोटेलाल भारद्वाज के जीवन, रचनाधर्मिता तथा साहित्य में उनके योगदान को न केवल रेखांकित करता है, अपितु उन्हें अपने समय और समाज में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति तथा रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित भी करता है। इस शोध प्रबंध की उपादेयता इस रूप में भी है कि समकालीन चिन्ताओं, सरोकारों तथा पौराणिक चरित्रों की प्रस्तुति में कवि ने जिस भावना तथा गरिमा से निर्वहन किया है, शोधार्थी ने उसी गंभीरता से विषय के साथ न्याय किया है। इसके लिए शोधार्थी तथा निर्देशक दोनों बधाई के पात्र हैं।
यह शोध प्रबंध क्षेत्रीय साहित्य को समझने तथा समीक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है अतः वर्तमान रूप में प्रकाशन योग्य है। मैं शोधार्थी को मौखिकी के उपरांत पीएचडी की उपाधि प्रदान करने की सस्तृति करता हूं।”

‘पंडित छोटेलाल भारद्वाज के महाकाव्यों में
सामाजिक-चेतना : नये आयामों का अनुशीलन’

सार-संक्षेप :
सामाजिक समस्याओं का ‘परिदृश्य’ सामने रखने, उनके वस्तुनिष्ठ, दूरगामी व स्थायी-हल खोजने में हिन्दी-साहित्य ने अपनी भूमिका का न केवल जिम्मेदारी से निर्वहन किया है, अपितु अपनी ‘सार्थक’ उपस्थिति भी दर्ज कराई है। अन्य विषय-क्षेत्र जहाँ ऑंकड़ों के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को वरीयता देते हैं और सामाजिक समस्याओं के अध्ययन को सामने रखते हैं वहीं साहित्य, समाज में मानवीय मूल्यबोध, संवदेना, अनुभूति आदि के माध्यम से एक ऐसा विशिष्ट अध्ययन प्रस्तुत करता है जिसका विश्लेषण समाज का बाहरी परिदृश्य ही नहीं बल्कि सामाजिक-अंतर्दशाओं, मनोवृत्तियों और ग्रंथियों पर भी गहरा प्रकाश डालता है। समीक्ष्य-काव्य का प्रतिपादन और विश्लेषण भी इसी दिशा में प्रयास है।
साहित्य के कालजयी मूल्यांकन का प्राथमिक आधार उसकी सामाजिक-सम्बध्दता है और ‘समाज’ के प्रति ‘काव्य’ के चिंतन की अभिव्यक्ति के अनेक कोंण हैं। एक पैनी दृष्टि वाले समाज-चेता साहित्यकार द्वारा सृजित काव्य का सबसे प्राथमिक, धारदार व प्रखर चिंतन है-समाज में विषमताओं का अन्वेषण; समाज के विगत से खींचकर उसके मनोवैज्ञानिक पूर्वाग्रहों का दिग्दर्शन और उसके उन्मूलन हेतु आधुनिक समय की दशा के परिप्रेक्ष्य में सुदृढ़ स्थापना। यह विशेषता, कतिपय मौलिकता के साथ पंडित छोटेलाल भारद्वाज के महाकाव्यों में सामाजिक-चेतना के विविध आयामों से विहित होती है। इसे प्रबंध-दष्टि से समेकित करते हुए प्रस्तुत शोध-प्रबंध को आठ अध्यायों में विभक्त किया गया है।

प्रथम अध्याय : सार-संक्षेप
प्रथम अध्याय ‘परिचयात्मक’ है, इसके अलावा समीक्ष्य-महाकाव्यों के नवाचारों के संकलन का कार्य भी परिचय के लक्ष्य के साथ इसमें किया गया है।
इसमें कृतिकार एवं आलोच्य-कृतियों का परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है तथा आलोच्य-संदर्भ को ध्यान में रखते हुए कृतियों में सामाजिक-चेतना की परिधि के भीतर ही जोर अधिक दिया गया है।
इस अध्याय का विश्लेषण सामने लाता है कि नैसर्गिक प्रतिभा के धनी कृतिकार ने अपनी प्रतिभा का उपयोग सामाजिक-संदर्भ प्राप्त करने और उन्हें विकसित करने में किया है। सामाजिकता की ओर प्रस्थान होना उनकी प्रतिभा की सर्वोत्कृष्ट उपयोगिता है। कवि ने उच्च-अध्ययनशीलता को भी सामाजिक विचारधाराओं के अनुशीलन और समाज की समस्याओं में प्रत्यक्ष भागीदारी से अर्जित-अनुभव के रूप में विकसित किया। सामाजिक-आंदोलनों में भागीदारी तथा तत्कालीन भारत के श्रेष्ठ-विचारकों के सम्पर्क में आकर समाज और राजनीति मे पदार्पण भी वैचारिकता को लिये हुआ था, मात्र दलगत राजनीति का उदाहरण यह नहीं है। इसी कारण पं. भारद्वाज के जीवन और व्यक्तित्व की समीक्ष्य-परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक अनुप्रयोजन-मूलक अभिप्राप्ति यह है कि उनकी वैचारिकता और संवेदना का विकास साहित्यिक-कृतित्व में सामाजिकता-चेतना के विविध आयामों के रूप में हुआ। इसी विशिष्टता का यह भी एक भाग रहा है कि अपने पारिवारिक-परिवेश, जन्मस्थली के आसपास की घटनाओं, व्यक्तियों व स्थितियों के प्रति उनके तर्कपूर्ण, सामाजिक तथा विशिष्ट जागरुकता भरे दृष्टिकोंण ने आलोच्य-प्रतिपादन को सशक्त बनाने में योग दिया है। इनमें प्रमुख रूप से मानवीय-विषमता, शोषण, नारी-दशा आदि का दिग्दर्शन है। इसे अपने व्यक्तित्व का अंग बनाते हुए कृतिकार ने हिन्दी-साहित्तय के दैदीप्यमान नक्षत्रों का संसर्ग प्राप्त कर अपनी नैसर्गिक प्रतिभा, सामाजिक-जागरुकता आदि को विस्तारित किया। शीर्षस्थ समाजवादी विचारकों के निकट साहचर्य ने जो ‘लौह-वैचारिकता’ उन्हें दी वह उनके समाज-चेतस को अधिक मजबूत बनाने के काम आई। भारतीय स्वतंत्रता के समय उत्पन्न मोहभंग की व्यापकता का विशिष्ट प्रतिनिधित्व पं.भारद्वाज ने किया है। इस समय को उन्होंने न केवल देखा बल्कि इसका स्पंदन महसूस किया, जनभावनाओं को नैकटय के साथ समझा और भारतीय जनमानस की आशाओं-आकांक्षाओं को समेटते हुए इस युग-परिवर्तन के संक्रमण को अंकित किया।
आलोच्य महाकाव्यों ‘सीतायन’ और ‘परशुराम’ का परिचयात्मक विवरण यह दर्शाता है कि भारतीय समाज के ‘आज’ की जो बातें पूर्वाग्रह बनकर समकालीन-जीवन को प्रभावित कर रहीं हैं उनसे जुड़े मिथकीय-सत्यों की आधारभूमि को ही इसमें सँजोया गया है। सामान्य इतिहास से मिथेतिहास भारतीय परिप्रेक्ष्य में संभवत: अधिक उपयोगी विषयवस्तु प्रतीत होती है क्यों कि भारतीय-जनमानस इनसे परिचालित है। दोनों महाकाव्य भारतीय कालचक्र की धारणा ‘सतयुग’ से समकालीन युग तक की बात इस ढंग से करते हैं कि यह कथानक समय और समाज का अघोषित दृश्य बनकर खड़ा हो जाता है।
समाज-चेतना के नये आयामों की आधारभूत पृष्ठभूमि नवाचारों से प्रारम्भ होती है। समीक्ष्य-महाकाव्यो में जो नवाचार रचे गये हैं वे सामाजिक-चेतना की जरूरत के मुताबिक गढ़े गये हैं। पात्रों, संवादों, घटनाओं व विमर्श का नवीन आरोप सृजनात्मक, सार्थकता से युक्त व विद्रोही हैं। जो भी परिवर्तन किये गये हैं अथवा नवीनता स्थापित की गई है वह पहले विशिष्ट योजना बनाकर ही तय की गई है। समाज के प्रति जागरुकता को सामने रखने तथा सुधार के प्रति प्रबल-आग्रह ने ही ऐसा करने को विवश किया है।

द्वितीय अध्याय : सार-संक्षेप
इस अध्याय में ‘समाज’, ‘चेतना’, आदि के शास्त्रीय-विवेचन के साथ अंतिम रूप से ‘सामाजिक-चेतना’ के आशय, स्वरूप और वैशिष्टय आदि का सुस्पष्ट निर्धारण करने का उपक्रम किया गया है। इसके आलावा महत्वपूर्ण रूप से यह भी निर्धारित किया गया है कि समीक्ष्य-काव्य में सामाजिक-चेतना के नये आयाम के पटल कौन-से हैं तथा उनके पीछे कौन से पार्श्व-आधार हैं?
(कृपया संलग्न वृक्ष-चित्र का अवलोकन करें)
इस अध्याय का विश्लेषण सामने लाता है कि समीक्ष्य-काव्य ने बदले समय में भारतीय जरूरतों के मुताबिक समाज-चेतना के नये आयामों का अधिग्रहण किया है। समीक्ष्य-काव्य में जो वैचारिकता, संवेदना, व चेतना परिव्याप्त है उसके आयाम सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैल्पिक उपकरणों आदि के पटल पर अपनी अभिव्यक्ति के मार्ग धारण करते हैं। ये नये आयाम समीक्ष्य काव्य की अंतर्वस्तु एवं शिल्प दोनों के माध्यम से प्रस्फुटन का अवसर रखते हैं। नये आयामों का वर्गीकरण यह दर्शाता है कि समीक्ष्य काव्य की वास्तविक परख के लिए इन आयामों का अनुशीलन, इन पर विमर्श किया जाना निश्चित रूप से अनिवार्य है और इनके माध्यम से ही उस चिंतन-पध्दति का अनावरण हिन्दी साहित्तय में किया जा सकता है जिसके अनेक पक्ष उजागर होने की प्रक्रिया से जुड़ने को उतावले हैं। इन आयामों की सारणीकरण यह भी दर्शाता है कि समीक्ष्य काव्य का चिंतन सुव्यवस्थित है, शोधपरक है, तथा इसकी चिंतन-पध्दति विशिष्ट और विमर्श के योग्य है।
इन नये आयामों के पीछे चेतनात्मक-स्तर पर विशिष्ट-दर्शन, सामाजिकता की विचार-श्रेणी के रूप में पार्श्व-आधार भी उपस्थित हैं। इनका संक्षिप्त व मनीषियों से सम्मत विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि नवाचार-चेतना] नव्य-पुराण-चेतना, मिथकीय-चेतना] मानववादी-चेतना तथा मानवीय सारतत्व-चेतना आदि का प्रभाव व पृष्ठभूमि इन नवाचारों को प्राप्त है। इस प्रभाव को रेखांकित करना इसलिए भी समीचीन रहा कि नवाचार युगीन आवश्यकता है, तो पौराणिक-दृष्टि के प्रति भी नवीनता का संचार आज आवश्यक हो गया है।
यह प्रथम अवसर है, जबकि समीक्ष्य-काव्य में इन पार्श्व-आधारों को खोजकर विनम्र प्रस्तुति की गई है। इनको सामने रखना इसलिए भी आवश्यक था ताकि समीक्ष्य-काव्य में सामाजिक-चेतना के वैचारिक स्रोतों का स्पष्टीकरण किये जाने का नव-कार्य सम्पादित हो सके। इन्हीं के विशिष्ट-धरातल पर नवीन आयामों की अट्टालिका खड़ी है।
रचनाकार की इतिहास-दृष्टि भी इस प्रकार की है कि यह केवल इतिहास-बोध का कोरा प्रमाणीकरण न होते हुए भारतीय मिथेतिहास को मानवीय-विकास की परम्परा के रूप मे देखता है। यह समाज की विकसित दशाओं पर प्रसन्नता व्यक्त करने वाला तथा पतन पर आक्रोश दर्शाने वाला इतिहास-बोध है। इस प्रक्रिया से गुजरते हुए समाज को वैज्ञानिकता के साथ देखा गया है।
तृतीय अध्याय : सार-संक्षेप
तृतीय अध्याय में आलोच्य-परिप्रेक्ष्य के प्राणतत्व ‘सामाजिक-ंचिंतन’ के प्राथमिक आधार का विश्लेषण किया गया। समीक्ष्य-काव्य में उपलब्ध सामाजिक-चेतना के विविध पटलों में सर्वप्रमुख है-समीक्ष्य-काव्य की मूलभूत संकल्पना जो तीन प्रकार के वैषम्य को लेकर है। इस ‘विषमता-त्रयी’ को जितने सुस्पष्ट आधार के रूप में आलोच्य-महाकाव्य लेकर चलते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है, जोखिम-भरा भी। आलोच्य-काव्य का यह अपना वैशिष्टय है कि यह भारतीय वैचारिकता के समस्त साहित्य, संकल्पनाओं व समाज के मिथकों में नये सिरे से दूसरी परम्परा की खोज करता है। इस दूसरी परम्परा की खोज का निकष है ‘विषमता-त्रयी’। यह पहली बार किया गया साहस है जबकि समस्त विचार-सम्पदा को इस दर्पण में देखा गया है। इस विषमता का आधारभूत त्रिकोंण – स्त्री-पुरुष असमानता] वर्ण और जातिगत असमानता तथा आर्थिक व अन्य आधारों वाला वर्गभेद है। समीक्ष्य-काव्य में जो रचना-प्रक्रिया अपनाई गई उसका ढाँचा इसी त्रि-भेद की व्याख्या करते हुए बनाया गया है।
समीक्ष्य-काव्य के प्रधानतम आयामों मे है- नारी विषयक-चेतना। यह नारी की उस दशा को सामने रखती है जो उसकी मातृत्तव क्षमता बनाम सामाजिक-स्थिति के द्वंद्व को दर्शाने वाली है। नारी पीड़ा, सामाजिक-स्थिति व विवाह से जुड़े प्रश्न, दाम्पत्य के प्रश्न, नारी-सशक्तिकरण के मसले को समीक्ष्य-काव्य में विशिष्ट तरीके से अभिव्यक्ति मिली है। समीक्ष्य-काव्य की नारी-चेतना में जड़ता को तोड़ने की प्रवृत्ति, नारी की विद्र्रोही-चेतना आदि तो दिखाई देती है, साथ ही नारी-मूल्यों और आदर्शों को भी नयी दावेदारी के साथ स्मरण कराया गया है। नारी सम्मान, नर-नारी समता आदि के साथ, नारीत्तव के गुणों- सहनशीलता, कर्तव्य-भावना, नारी-स्वाभिमान, समर्पण, प्रेम, शील, प्रतिरोध-क्षमता, नेतृत्तव-गुण की चर्चा है। लेकिन इन गुणों का गायन केवल आदर्श-पध्दति पर नारी-गौरव गान नहीं है, बल्कि समीक्ष्य-काव्य इनकी चर्चा करके पुरुष से प्रतिदान की चाहने की बात बहुत ऊँचे स्वर से करता है, पुरुष के दोहरे चरित्र को भी इन मूल्यों के आलोक में सामने रख देता है।
समीक्ष्य-काव्य ने अस्सी और नब्बे के दशक के अपने अस्तित्व का युगीन साहचर्य प्रमाणित करते हुए समकालीन विमर्श में हिस्सा लिया है और दलित-चेतना को अत्यंत सटीक, धारदार और तीव्र ढंग से जगह दी है। समीक्ष्य-काव्य के सामाजिक-चिंतन का यह अनिवार्य हिस्सा है। वर्ण-व्यवस्था की गहरी जड़ों पर जहाँ समीक्ष्य-काव्य प्रहार करता है, वहीं जाति-सिध्दांत का जोरदार खण्डन भी। जन्मना जाति का सिध्दांत हो या अस्पृश्यता की बात, पौराणिक चर्चा के साथ मिलाकर इसके मूल को काटना जन-मानस के मनोवैज्ञानिक उपचार की अच्छी विधि सिध्द होती है। दलितों के सवाल पर क्रांति-सूचक विद्रोह भावना है, दालित्य और शोषण का विरोध है तो दूसरी तरफ वर्ण और जाति के निश्चयपूर्वक समापन का उद्धोष भी है।
आर्थिक, शोषण-आधृत, नस्लीय, व आधार वाले भेदभाव को समाप्त किये बगैर भारतीय समाज के वास्तविक और विकसित रूप की कल्पना नहीं की जा सकती यह चेतना भी इस भाग में परिव्याप्त है। वर्ग-वैषम्य की समाप्ति और समता की स्थापना सहचारी प्रक्रिया हैं, यह प्रतिपादन किया गया है।
अपने सामाजिक-चिंतन में समीक्ष्य-काव्य नवदृष्टि, नवीन संस्थापनायें, और युगबोध रखता है। स्त्री, दलित, उपभोक्तावाद, पूँजीवाद का बदलता स्वरूप, वैश्विक स्थितियाँ और भारतीय जड़तायें, सामाजिक-भेदभाव और विकास की समस्या को लेकर उपस्थित विभिन्न अवरोधों की बात की गई है। यह युगबोध नवीन स्थापनााओं के रूप में समीक्ष्य-काव्य के प्रतिपादन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चतुर्थ अध्याय : सार-संक्षेप
चतुर्थ अध्याय में विश्लेषण के लिए समीक्ष्य-काव्य में परिव्याप्त सांस्कृतिक-चेतना को चुना गया ।कवि चाहे शिव और विष्णु की बात करे या परशुराम अथवा राम की। इसे काल-विशेष की संस्कृति के साथ जोड़कर समाज-विकास का एक ऐसा चक्र प्रस्तुत किया जाता है जो समीक्ष्य-काव्य का एक नया आयाम है। व्यक्ति, घटना और काल-विशेष अपनी इसी विशेषता के कारण समीक्ष्य-परिप्रेक्ष्य में उपयोगी होकर चर्चा का विषय बनते हैं।
सांस्कृतिक-चेतना की अभिव्यक्ति करते समय समीक्ष्य-काव्य संस्कृति के दोनों पक्षों पर प्रकाश डालकर समाज की व्याख्या करता है। कहीं संस्कृति का दिव्य-चित्र है तो कहीं उसका कलुष भी। दरअसल समीक्ष्य-काव्य का लक्ष्य है संस्कृति के शुभ स्वरूप का गान और उसके छद्म मूल्यों की भर्त्सना। इसलिए ‘संस्कृति’ शब्द को उपबंध बनाकर दोनों प्रकार से उपयोग करता है। यदि वह अच्छी और उत्ताम संस्कृति को ‘सत-संस्कृति’ कहता है तो ‘जहरीली संस्कृति’ का आशय बुरी और कुत्सित संस्कृति के अर्थ में लेता है। ‘वरीयता-संस्कृति’ जैसा नवीन पद वह अभिजात्य-वर्ग द्वारा स्वयं को सिरमौर बनाये रखने के सदियों के प्रयासों के लिए प्रयोग करता है। इस प्रकार ये लाक्षणिक प्रकार के उपबंध संस्कृति के सकारात्मक व नकारात्मक दोनों पक्षों पर प्रकाश डालकर मनोवैज्ञानिक ढंग से व्याख्या भी करते हैं।
सांस्कृतिक-मूल्यों के प्रति समीक्ष्य-काव्य की सांस्कृतिक-चेतना में प्रबल आग्रह है। वह समाज की उस संस्कृति, सभ्यता या व्यवस्था-विकास को श्रेष्ठ मानता है जहाँ समता जैसे मूल्यों को वरीयता हो। शिव इत्यादि के नेतृत्व-वाली संस्कृति की चर्चा इसी बहाने की जाती है।
समीक्ष्य-काव्य का यह प्रतिपादन है कि संस्कृति परिवर्तनशील घटक है। यह स्थापना सिध्द करने के लिए समीक्ष्य-काव्य में मौलिक ढंग से ‘सांस्कृतिक-परिवर्तन-विषयक उत्ताराधिकारवाद’ प्रस्तुत किया गया है। संस्कृति की कुछ मान्यताओं के साथ जो निम्न स्तरीय प्रवृत्तिायाँ, अंधविश्वास, रूढ़िवादी दृष्टि, सामाजिक-कदाचार आदि चुपचाप प्रवेशकर गये हैं उन्हें तीव्र जाग्रति और जागरुकता के साथ सामने लाने का खतरा भी समीक्ष्य-काव्य में उठाया गया है।
पंचम अध्याय : सार-संक्षेप
पंचम अध्याय में विश्लेषण का हेतु समीक्ष्य-काव्य की राजनीतिक-आर्थिक चेतना को बनाया गया है।
राजनीतिक मूल्यों की गिरावट की बात हो या राजनीति में धन की प्रधानता के बढ़ते स्तर और भोगवाद की प्राथमिकता की, समीक्ष्य-काव्य वस्तु के बहाने इस पर चर्चा करता है। जनसामान्य के बनिस्बत शक्ति और सत्ताा के अधीश्वरों की आत्मघोषित दिव्यता आज का वह प्रश्न है जिसकी जड़ें विष्णु-सभ्यता के छद्म-अनुवाद के द्वारा अभिजात्य वर्ग ने खड़ी कर दी है। राजनीति, युध्द, निरंकुशता, न्याय, शोषण, आदि के प्रश्नों पर राजनीतिक-चेतना सामने आती है। विकेन्द्रीकरण, आदर्श व्यवस्था, जनहितकारी नीतियाँ, जन-चेतना-आधृत निर्णय, मानव-अधिकार आदि विषय भी प्रतिपादन में शामिल किये गये हैं।
आर्थिक-संवितरण की माँग, जनसामान्य की दीनता और गरीबी को दृष्टिगत रखते हुए संसाधनों के विसंगत दोहन पर सवालिया निशान, नेतृत्वकारी शक्तियों द्वारा अपने आर्थिक हितों के निर्धारण की चालाकी का खुलासा, जनसामान्य को शक्ति से वंचित रखते हुए कोरी अनुदान-प्रणाली का विरोध आदि अनेक ऐसे आर्थिक मसले हैं जो समकालीन तो हैं ही नये ढंग से विवेच्य-काव्य में प्रस्तुत किये गये हैं जो पाठकीय बौध्दिकता का नये तरीके से इजाफा करते हैं।
समीक्ष्य-काव्य ने विभिन्न राजनीतिक-आर्थिक विचारधाराओं का सम्यक् प्रभाव ग्रहण किया है। बदलते भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर स्वतंत्रता के छह दशकों की बहस इसमें शामिल है। माक्र्सवाद के भारतीय संस्करण की बात हो या भारतीय समाजवादी चिंतन-धारा की, गांधीवाद के प्रति प्रबल भारतीय आस्था हो या बिनोभा भावे के समता-मूलक कार्यक्रम, इन्हें समीक्ष्य प्रतिपादन ये जोड़कर पाठकीय रूप प्रदान किया गया है।
जहाँ आवश्यक हुआ है, युगीन यथार्थ, विद्रोह, शोषण का प्रतिकार, पूँजीवाद का विरोध, वर्गहीन समाज की स्थापना का प्रयास आदि वैचारिक प्रतिपादन किया गया है। समाजवादी-चिंतन का सर्वाधिक प्रभाव इस सम्बन्ध में परिलक्षित होता है। इसी के प्रभाव में क्रांति का स्वरूप वैचारिक हुआ है। जातिविहीन समाज की परिकल्पना के पीछे भी लोहिया आदि के दर्शन का प्रभाव स्पष्ट होता है। समतामूलक समाज की स्थापना का प्रबल प्रतिपादन है। इसे एक आंदोलन मानते हुए ही नवयुग के परशुराम आदि की परिकल्पना की गई है। गांधीवाद और उसके विशिष्ट भाग अपरिग्रह से सम्पूर्ण काव्य-मर्म प्रभावित है। गांधीवादी व्यवस्था, भारत के परिवेश का ध्यान और गाँधीवादी मूल्य, गाँधीजी के प्रति समीक्ष्य-काव्य की आस्था को प्रकट करते हैं।
गाँधीजी के असमय प्रयाण को समीक्ष्य-काव्य में भारतीयता की बहुत बड़ी हानि के रूप में रेखांकित किया गया है। उससे भी बड़ी हानि यह मानी गई कि स्वातंत्र्योत्तार भारत के नव-निर्माण में गाँधीवादी मूल्यों का ध्यान नहीं रखा गया और कलुषित राजनीति ने जनहित के स्थान पर सत्तााधारियों के हित को वरीयता दे दी। गाँधी के उत्तार-युग में विनोबा भावे द्वारा गाँधीजी के विचारों को व्यावहारिक समता में तब्दील करने के लिए किये गये प्रयासों में परशुराम का भूदान प्रस्तुत किया गया है। इस प्रभाव से परशुराम का उत्तारजीवन परिचालित होता है।

षष्ठ अध्याय : सार-संक्षेप
आलोच्य-संदर्भ में यह प्रथम परिघटना है जब शिल्प के कतिपय वैशिष्टय को मात्र काव्य-शास्त्रीय मर्म के साथ उल्लिखित न करते हुए उसकी रचना-प्रक्रिया, काव्य-भाषा, बिम्ब-प्रतीकों, रस-छन्द-अलंकारों के अनुप्रयोग में निहित सामाजिक-चेतना के आधार पर उकेरा गया है। इस अध्याय में प्रकृतिगत-प्रेमगत संवेदनाओं एवं वस्तु-स्थल-वर्णन में सामयिक-युगबोध को भी सामाजिक-विमर्श के पार्श्व-स्वर के रूप में ही चिन्हित किया गया है। समीक्ष्य-काव्य की भाषा के अलावा बिम्ब और प्रतीकों आदि काव्य-सम्बन्धी उपकरणों का भी सर्वथा समाज-चेतना से परिपूर्ण सागोंपांग उपयोग किया गया है जो यह दर्शाता है कि रचनाकार की समाज-चेतना अत्यंत प्रबल है। चाहे वह उपमा चुनने की बात हो या शब्दावली-चयन की। समीक्ष्य-काव्य में रस की सर्जना सहृदय को सामाजिक सत्य का दिग्दर्शन कराने के लिए की गई है। अलंकारों से सम्बन्धित पदावली व उपभाग भी समाज की धारणाओं से चुने गये हैं और समाज की परिस्थिति से जुड़े सत्यों का उद्धाटन करने के उद्देश्य से प्रयोग किये गये हैं। प्रकृति से जुड़ी संवेदनाएँ मानव के मन को इसलिए लेकर आयी हैं ताकि इनके माध्यम से समाज की बात की जा सके। समीक्ष्य-काव्य की प्रकृति भी रचनाकार के साथ मिलकर समाज का उद्धोष करती हुई नजर आती है। प्रेमगत संवेदनाओं में भी समाज को वरीयता है। व्यक्ति के हितों की सुरक्षा करते हुए समाज के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए प्रेम का निरूपण्ा है। किसी स्थल का दृश्य उपस्थित करते हुए भी जब रचनाकार वर्णन करता है तो शिल्प और काव्यात्मकता का उपयोग वैषम्य के दिग्दर्शन और समता की माँग को सामने रखते हुए किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में यह बात नये ढंग से सामने आती है कि शिल्प का उपयोग चेतना-विशेष के औजार और हथियार के रूप में सफलता से किया जा सकता है।
सप्तम अध्याय : सार-संक्षेप
सप्तम अध्याय में समीक्ष्य-काव्य की उपादेयता पर विचार किया गया है। सामाजिक-चेतना के धरातल पर वैचारिक अभिवृध्दि में समीक्ष्य-काव्य के योगदान पर इसमें विचार किया गया है। परिवेश के सत्य के प्रति सतर्क-दृष्टिकोंण सम्बन्धी नई संस्थापनाएँ इसमें सूचीबध्द की गईं तथा समकालीन सामाजिक-समस्याओं के संदर्भ में आलोच्य-काव्य की उपादेयता का मूल्यांकन किया गया। वैषम्य, लोक की रूढ़ियों और कुत्सित धारणाओं ने भारत के सांस्कृतिक स्वरूप को कुरूप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी स्थिति में भारतीय संस्कृति के पुनर्लेखन की महती आवश्यकता महसूस की जा रही है। नई पीढ़ी को इसकी अच्छाईयों से अवगत कराने और बुराईयों के प्रति सचेत करने के लिए ये नये आयाम सृजित करना नितांत अपरिहार्य हो गया है। इसी की पूर्ति समीक्ष्य-काव्य करता है। यह सांस्कृतिक-मूल्यों को बनाये रखते हुए गतिशीलता और विकास का स्वागत करता है। समाज और संस्कृति की त्रुटियों की ओर समीक्ष्य-काव्य द्वारा वाक्-लक्ष्य रखा जाना आलोचनात्मक या विद्रोहात्मक नहीं है बल्कि ध्येय यही है कि भारतीय रचनात्मक दृष्टिकोंण को रक्षित किया जा सके। समीक्ष्य-काव्य की वैचारिकता कुछ नया देखती है, नया बनाती है, नये स्वरूप में सामने लाती है। समीक्ष्य-काव्य ने जो मॉडल सामने रखा है वह समकालीन समस्याओं को समझने, उन पर विचार करने और हल करने के मानवीय-सामाजिक तरीके सुझाता है।
समीक्ष्य-काव्य इन सभी परिवेशगत समस्याओं के मद्देनजर समता आधारित मूल्यों की माँग तो करता ही है, समाज-चेतना के मसले पर वैचारिक अभिवृध्दि में भी उल्लेखनीय योगदान देता है। जो भी अशुभ सामने आता है उसका वैचारिक-स्तर पर हल खोजने का निर्देश यह काव्य समाज को देता है। अपने पूर्ववर्ती विचारों में यह सच्चे मन से योगदान करने की बात है तो दूसरी तरफ भारतीय समाज के शुभ और शिव भविष्य की आकाक्षा भी।
समीक्ष्य-काव्य भारतीय समाज को वैषम्य-त्रिकोंण के जरिये देखता है यह दलित, स्त्री और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की हिमायत करता है।
हम यह पाते हैं कि समीक्ष्य-महाकाव्य, चेतना के धरातल पर विषमताओं के विरुध्द संघर्ष को तीव्र करते हैं। इन महाकाव्यों में पौराणिक आख्यानों के जरिये आधुनिक समस्याओं को विवेचित किया गया है। विशेषत: जातिभेद, लिंगभेद तथा वर्गभेद की समस्या को बृहत् सांस्कृतिक-शोध से सुस्पष्ट वैचारिक आधार लेकर सामयिक-सन्दर्भों में उठाया गया है। इसके परिणामस्वरूप चिंतन की नवीन दिशायें व अभिनव आयाम सृजित हुए हैं। ये नये आयाम मिथक तोड़ते हैं, पूर्वाग्रहों का शमन करते है, मान्यताओं पर पुनर्विचार को विवश करते हैं, और सत्य के प्रति नवीन दृष्टिकोण की संस्थापना करते हैं। इनकी वैचारिक उपयोगिता निर्विवाद है। ये वे आयाम हैं जो समीक्ष्य-काव्य के परिप्रेक्ष्य में विमर्श की परिधि से अब तक बाहर रहे हैं।
अष्टम अध्याय उपसंहार से सम्बन्धित है तथा परिशिष्ट के रूप में संदर्भ-ग्रंथ ; इन्टरनेट-बेबसाइटों की सूची इत्यादि संलग्न की गई है
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6 responses to “मेरा पी-एच.डी. शोध-प्रबंध/Thesis

  1. पंडित छोटेलाल भारद्वाज के बारे में हिन्दी विकि पर कोई जानकारी नहीं है। खोजने पर अन्यत्र भी कुछ नहीं मिला।

    कृपया पंदित जी के बारे में हिन्दी विकि पर लिखें । आप जैसे विद्वान से यह भी अनुरोध है कि अपनी रुचि के अन्य विषयों पर भी हिन्दी में लिखकर हिन्दी को समर्थ बनाने के अभियान में योगदान दें।

  2. श्री रामकुमार सिंह जी, प्रस्तुत लेख और पंडित छोटेलाल भारद्वाज पर दी गई जानकारी के लिए आपको कोटिश: धन्यवाद। मेरा आपसे अनुरोध है कि ‘पण्डित जी’ के बारे में हिंदी ‘विकिपीडिया’ पर और अधिक जानकारी प्रदान करें ताकि हिंदी भाषा और अधिक समर्थ हो सके। हिंदी ‘विकिपीडिया’ पर ‘पंडित जी’ के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

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