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	<title>&#039;सर्जना&#039;  the creation</title>
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	<description>डॉ. रामकुमार सिंह का हिन्दी साहित्यिक पन्‍ना Hindi literary web-page by Dr. ramkumar singh</description>
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		<title>मंथन : दो, यानी कि एक बार फिर बैठे साथ-साथ &#8230;.बनारस में</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Jan 2012 02:33:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[यात्रा-प्रवास]]></category>

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		<description><![CDATA[यह बडे़ गौरव की बात है कि दस संभागों से आए 43 प्रतिभागियों का के.वि. डी. रे. का. वाराणसी में सेवाकालीन प्रशिक्षण का आयोजन 23.12.11 से 01.01.12 के मध्य सम्पन्न हुआ है। इस प्रकार के प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षा-जगत् में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु का विविध दृष्टिकोंणों से परिचय, आपसी विचार-विमर्श <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/29/%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a5%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%ac/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=666&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/img0173a.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/img0173a.jpg?w=150&#038;h=120" alt="" title="IMG0173A" width="150" height="120" class="alignnone size-thumbnail wp-image-697" /></a><br />
   <strong>यह</strong> बडे़ गौरव की बात है कि दस संभागों से आए 43 प्रतिभागियों का के.वि. डी. रे. का. वाराणसी में सेवाकालीन प्रशिक्षण का आयोजन 23.12.11 से 01.01.12 के मध्य सम्पन्न हुआ है। इस प्रकार के प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षा-जगत् में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु का विविध दृष्टिकोंणों से परिचय, आपसी विचार-विमर्श पाठ्यक्रम में आए पाठों से परिचय तथा अन्यान्य विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। इन उद्देश्यों में निदेशक, सह-निदेशक, संसाधक, अतिथि व्याख्याता तथा प्रतिभागी स्वयं सहायक होते हैं। प्रतिभागियों ने आशा एव ंअपेक्षा है कि उन्होंने अपने दस दिन के प्रवास में जो नया ज्ञान तथा शिक्षण की नवीनतम-तकनीक प्राप्त की है उसे अपने शिक्षण में शिक्षक जब प्रयोग में लाएँगे तभी इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों की उपादेयता व उपयोगिता सिद्ध होगी। मैं निदेशक के रूप में आशा करता हूँ कि इस प्रशिक्षण ने आपको नई ऊर्जा दी होगी, आपको एक नई समझ दी होगी, आपका नवीनीकरण किया होगा जो आपके शिक्षण में अवश्य झलकेगा।<br />
निदेशक के रूप में मैं, के.वि.सं. के अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने हमारे विद्यालय को इस कार्यक्रम के आयोजन के योग्य समझा व समय-समय पर दिशा-निर्देश दिए, जिनसे यह आयोजन सफल हो सका। </p>
<p><strong>शुभकामनाओं सहित,,<br />
(विजय कुमार)<br />
शिविर-निदेशक </strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf7005.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf7005.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF7005" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-689" /></a></p>
<p><strong>‘अद्भुत अंतविर्रोधों के बीच सृजन का तीर्थ है काशी’ &#8211; प्रो यादव</strong><br />
उद्घाटन : समाचार<strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6798.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6798.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6798" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-677" /></a><br />
       वाराणसी, 23 दिसम्बर।(सर्जना)</strong> सामाजिक आंदोलन किसी भी साहित्य धारा की जनचेतना का निर्माण करते हैं। काशी एक ऐसा नेतृत्वकारी स्थल है जहॉं अनेक अंतविर्रोधों के बीच सृजन की अनेक धाराएं पैदा हुई हैं। काशी ने विभिन्न साहित्यिक आंदोलनो की अगुआई है।<br />
उक्त उद्गार काशी हिन्दू विवि के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रो चौथीराम यादव ने केविसं के स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण के शुभारंभ अवसर पर बाजारवाद के युग में भक्तिकालीन साहित्य के सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन विषय पर अपने व्याख्यान के दौरान व्यक्त किये। उन्होनें कहा कि भक्तिकाल की अंतर्रात्मा सामाजिक न्याय की लड़ाई थी। इस आंदोलन का नेतृत्व हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के दलित वर्ग ने किया। उन्होने कहा यह भी गौरतलब है कि काशी और कांची, जहां ये आंदोलन मुख्य रूप से पनपे, वे दोनो ही सूती वस्त्रोद्योग के केन्द्र थे। उन्होने कहा कि भक्तिकालीन साहित्य का मूल्यांकन समाजशास्‍त्रीय ढंग से किया जाना ही उचित होगा। आज बाजारवाद, विज्ञापन और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सांस्कृतिक हमले का युग है जिसके बीच भक्तिकालीन आंदोलन के मूल्य ही रास्ता दिखा सकते हैं। </p>
<p><strong>दिनांक 23.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन</strong></p>
<p>       <a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6786.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6786.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6786" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-675" /></a><br />
      हिन्दी के स्नातकोत्तर शिक्षकोंका सेवाकालीन प्रशिक्षण 23.11.2012 को के.वि. डीरेका वाराणसी में सम्पन्न हुआ। उद्घाटन  काशी हिन्दू विवि के अवकाशप्राप्त प्रो. डॉ. चौथीराम यादव की अध्यक्षता में हुआ। सर्वप्रथम मुख्य अतिथि महोदय ने सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा अन्य अधिकारियों ने पुष्पार्पण किया। माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलन के समय विद्यालय के बच्चों ने सरस्वती वंदना की तथा मुख्य अतिथि के स्वागत में स्वागत-गीत प्रस्तुत किया।<br />
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. चौथीराम यादव ने प्राचीन साहित्य को समसामयिक दृष्टि से समझने का सुझाव देते हुए कहा कि भक्ति आंदोलन की दार्शनिक व्याख्या करने की आवश्यकता है तथा भक्ति आंदोलन को समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए। यदि प्रारम्भ में ही ऐसा किया गया होता तो संभवतः आज के दलित, स्त्री एवं आदिवासी आंदोलन उतनी त्वरा एवं उद्वेग के साथ खड़े नहीं होते। आज के दौर में नवउदारीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद एवं वैश्विक भूमण्डलीकरण के दौर में यूरो-वर्चस्व से बचने के लिए हमें अपनी मानवतावादी दृष्टि को नयी वैश्विक चुनौतियों के बीच पुनः मूल्यांकित करना होगा। वक्ता महोदय में नागार्जुन जी के साहित्य पर अपने विद्वतापूर्ण विचारों से सभा को लाभान्वित किया। शिविर-निदेशक एवं प्राचार्य श्री विजय कुमार जी ने मुख्य अतिथि तथा प्रतिभागियों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए शिविर के सह-निदेशक श्री एस.एन. शुक्ल जी ने मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच प्रतिभागियों की सक्रिय एवं उत्साही उपस्थिति की प्रशंसा तो की ही, साथ ही उन्होंने प्रतिभागियों को इस बात के लिए भी परामर्श दिया कि आपसी विचार- विमर्श एवं शिविर के मार्गदर्शन के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों को कुछ नवीन सीखकर अपने विद्यालय के अकादमिक तथा सह-अकादमिक माहौल को अधिक उन्नत एवं गौरवपूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्ता जी ने किया।<br />
शिविर निदेशक जी ने अगले कालांश में प्रतिभागियों से व्यक्तिगत उपलब्धियाँ व परिचय प्राप्त किया। प्रतिभागियों से प्रपत्र भरवाये गये जिनमें उनसे शिविर से उनकी अपेक्षाओं की जानकारी ली गई। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों की पूर्वज्ञानपरीक्षा ली गई।<br />
भोजनावकाश के पश्चात निदेशक महोदय ने शिविर की रूपरेखा व उद्देश्यों की विशद व्याख्या की, पुनः चाय के पश्चात संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने प्रतिभागियों का समूहविभाजन किया व समूह कार्य आबंटित किये। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कार्य स्तरीय हो तथा केन्द्रीय विद्यालय संगठन के मानक के अनुरूप हो।		// प्रतिवेदक समूह: पंत समूह// </p>
<p><strong>दिनांक 24.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन  </strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf7008.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf7008.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF7008" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-690" /></a><br />
      24.11.2012 के दिन का प्रारंभ योगाभ्यास कार्यक्रम से हुआ। प्रतिभागियों ने श्री शशिभूषण कुमार के निर्देशन में विद्यालय प्रांगण में प्राणायम तथा अनुलोम-विलोम के साथ अन्य विविध योग क्रियाओं का अभ्यास किया। प्रार्थना-सभा में प्रार्थना, समाचार, आदर्श-वाक्य, विशेष-कार्यक्रम तथा प्रतिवेदन की प्रभावी प्रस्तुति पंत सदन की ओर से की गई।<br />
 प्रथम कालांश में शिविर निदेशक श्री विजय कुमार जी ने पावर-प्वाइंट की सहायता से अलंकारों की विशद, व्यापक व प्रभावी प्रस्तुति से प्रतिभागियों को लाभान्वित किया। अतिथि व्याख्याता के रूप में पधारे प्रो. अवधेश प्रधान (हिन्दी विभाग, बनारस हिन्दू विवि) ने महाप्राण निराला जी की कविता ‘बादल राग’ के विविध बिन्दुओं पर विद्वतापूर्ण विचार प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण वक्ता महोदय ने तर्कपूर्ण ढंग से किया। कविता के काव्य-सौन्दर्यीय पक्ष पर भी विचार व्यक्त किये। प्रतिभागियों की मांग पर वक्ता महोदय ने फिराक गोरखपुरी की रूबाइयों व गज़ल की कक्षा में किस प्रकार सहज प्रस्तुति की जाये, इस पर अपने विचार प्रस्तुत किये।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6816.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6816.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6816" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-679" /></a><br />
चायकाल के पश्चात संसाधक श्री अनिल कुमार पाण्डेय ने गद्यशिक्षण को किस प्रकार रुचिकर बनाया जाये, इस पर अपना वक्तव्य दिया। प्रतिभागियों ने चर्चा में बढ़-चढ़कर भाग लेते हुए अपने-अपने विचारों से चर्चा को लाभकारी बनाया। अगले कालांश में संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्ता ने गजल विधा के विविध पक्षों पर चर्चा प्रारंभ की व विविध गजलों की प्रस्तुति से सदन को इस विधा की सहज व प्रभावी प्रस्तुति की कला से परिचित कराया। प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने विचार प्रस्तुत कर परिचर्चा को विशद व व्यापक रूप दिया।<br />
भोजनावकाश के पश्चात प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूह में बैठकर समूह-कार्य का निष्पादन किया। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों ने श्रीमती रेवती अय्यर के निर्देशन में थिंक-क्वेस्ट सम्बन्धी परियोजना की जानकारी प्राप्त की। संध्याकाल में कविता-पाठ के कार्यक्रम के साथ इस दिनांक के कार्य सम्पन्न हो गये।<br />
// प्रतिवेदक समूह: निराला समूह //</p>
<p><strong>दिनांक 25.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09084.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09084.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC09084" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-673" /></a><br />
       दिनांक 25.12.2011 को योगाभ्यास के पश्चात प्रातःकालीन प्रार्थना-सभा का आयोजन निराला समूह के प्रतिभागियों द्वारा किया गया। तत्पश्चात शिविर के निदेशक श्री विजय कुमार जी ने प्रतिभागियो का मागदर्शन करते हुए यह निर्देश दिया कि सम्पूर्ण व्याख्यान को आत्मसात करते हुए अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करें।<br />
प्रारंभ में शिविर के संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय  जी द्वारा पावर-प्वाइंट प्रस्तुतिकरण, सांस्कृतिक-संध्या का आयोजन तथा डिजिटल डायरी के बारे में उचित दिशा-निर्देश दिये। तत्पश्चात शिविर के सह-निदेशक श्री एस एन शुक्ला जी ने समस्त प्रतिभागियों को हिन्दी शिक्षण-विधि से परिचित कराते हुए भाषा की सम्प्रेषणीयता पर जोर दिया और इस बात के लिए सभी प्रतिभागियों को प्रेरित किया कि हिन्दी भाषा के माध्यम से देश की एकता, अखण्डता व धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को भी बचाए रखें। तदुपरांत हिन्दी का बहुभाषीय परिवेश और हिन्दी का पठन-पाठन विषय पर श्री धीरेन्द्र कुमार झा एवं श्री धर्मवीर सिंह ने विचार प्रस्तुत किये।<br />
प्रथम सत्र के प्रथम खण्ड में ही अतिथि व्याख्याता के रूप में काशी हिन्दू विवि के डॉ नीरज खरे ने ‘पत्रकारिता के विविध आयाम’ विषय पर  अत्यंत ही सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किये। इसके साथ ही मुद्रित माध्यमों की विशेषतायें, समाचार के प्रकार, समाचार के स्रोत, समाचार-लेखन की शैली, लेख, आलेख, फीचर, संपादकीय-लेखन व रिपोर्ट आदि के विशद रूपों से परिचित कराते हुए लेखन-प्रारूप से परिचय कराया, जो प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ही लाभकारी रहा। इसके बाद निराला समूह के प्रतिभागी डॉ रामकुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6841.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6841.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6841" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-681" /></a><br />
भोजनावकाश के पूर्व अगले कालांश में संसाधकद्वय डॉ अनिल कुमार पाण्डये व श्री व्ही सी गुप्ता ने ‘पाठ्यसहगामी क्रियाओं की केन्द्रीय विद्यालय में भूमिका तथा व्यक्तित्व विकास में सहायक’ विषय पर अपना गांभीर्यपूर्ण और सारगर्भित विचार रखें। भोजनावकाश के बाद श्री राजेन्द्र विश्वकर्मा  तथा डॉ रामकुमार सिह व दीपक कुमार के द्वारा क्रमशः ‘रूबाइयॉं, ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’, तथा ‘जनसंचार माध्यम’ पाठ का आदर्श पाठ प्रस्तुत किया गया। थिंक-क्वेस्ट तथा संगणक कार्य भी सम्पन्न हुआ।<br />
//प्रतिवेदक समूह: महादेवी वर्मा समूह//</p>
<p><strong>दिनांक 26.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन  </strong><br />
       केन्द्रीय विद्यालय डीरेका में स्नातकोत्तर शिक्षकों (हिन्दी) का सेवाकालीन प्रशिक्षण का चौथा दिन योगाभ्यास और तत्पश्चात महादेवी वर्मा सदन की ओर से प्रस्तुत आकर्षक प्रार्थना-सभा कार्यक्रम के साथ आरम्भ हुआ।<br />
शिविर निदेशक एवं विद्यालय प्राचार्य श्री विजय कुमार ने गीता के कर्मयोग के उपदेश को समकालीन परिप्रेक्ष्य के अनुरूप परिभाषित करते हुए ‘विपश्यना साधना’ विषय पर बीज व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि- ‘‘तालीम से तबीयत बेहतर होती है’ अर्थात कहने से करना अच्छा होता है। उनके मतानुसार विपश्यना सत्य की उपासना है, आत्मनिरीक्षण की साधना है, जीने का अभ्यास है &#8211; शील और सदाचार के साथ। ‘विपश्यना साधना’ केवल आडम्बर नहीं है वरन शिक्षा में नैतिक मूल्यों के विलयन की दृष्टि से भी यह अनिवार्य है। शिक्षा और नैतिकता का यह संयोग ही एक युग में भारत को विश्वगुरू के पद पर सुशोभित किया और मैक्समूलन जैसे जर्मन दार्शनिक को भारत की ओर देखने के लिए विवश किया गया। बकौल सुमित्रानंदन पंत  -<br />
<strong>‘‘ऐसे मरणोन्मुख जग को कहता मेरा मन<br />
और कौन दे सकता नवजीवन आश्वासन<br />
शान्ति, तृप्ति-निज अन्तर्जीवन के प्रवाह में<br />
भारत के अतिरिक्त आज-जो शाश्वत अक्षर<br />
अन्तर ऐश्वर्यों का ईश्वर है वसुधा पर<br />
कहता मेरा मन, भारत के ही मंगल में<br />
भू मंगल, जन मंगल, दोनों का मंगल है। ‘‘</strong><br />
  तत्पश्चात काशी हिन्दू विवि के शिक्षा विभाग की डिप्टी चीफ प्रोक्टर प्रो.(डॉ.) गीता राय ने ‘किशोरावस्था: युवाओं के लिए निर्देशन और परामर्श’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि किशोरावस्था मूलतः तनाव एवं तूफान की अवस्था है जिसमें किशोरों के भीतर शारीरिक, मानसिक एवं भावात्मक दृष्टि से अनेक परिवर्तन होते हैं यथा- शारीरिक व यौवन विकास, मानसिक विकास, इच्छाओं व कल्पनाओं का विकास, वस्त्र-चयन, शारीरिक सौष्ठव एवं बातचीत के लहजे में परिवर्तन तथा भावात्मक अस्थिरता और समूहबद्धता ऐसे परिवर्तन हैं &#8211; जो शिक्षक के शिक्षण कार्य के लिए आवश्यक है। वर्तमान वैश्विक एवं सामाजिक परिवर्तनों के चलते विद्यार्थी के मन में गुरू के प्रति वह परम्परागत सम्मान नहीं रह गया है जिसमें शिक्षक अपने को पूर्णतः स्वतंत्र समझता है। शिक्षक के लिए आवश्यक है। कि वह निर्देशन, परामर्श एवं अन्य मनोवैज्ञानिक पद्धतियों का सहारा लेते हुए न केवल अपने शिक्षण को रुचिकर बनायें वरन् विद्यार्थियों के जीवन-दर्शन को एक नवीन दिशा दे सके।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6924.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6924.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6924" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-685" /></a><br />
भोजनावकाश के पश्चात् आरम्भ द्वितीय सत्र में विभिन्न प्रतिभागियों द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। क्रमशः सर्वश्री तेजनारायण सिंह, चुम्मनप्रसाद श्रीवास्तव , डॉ ए के पाण्डेय, धर्मवीर सिंह  द्वारा प्रस्तुत की गई आदर्श पाठ की प्रस्तुति को अन्य प्रतिभागियों ने व्यापक विचार-विमर्श के द्वारा अधिक विस्तृत एवं नये आयामों से समृद्ध किया। कार्यक्रम के सह-निदेशक श्री एसएस शुक्ल (प्राचार्य, केवि 39 जीटीसी), श्री एसएस यादव (उपप्राचार्य, केविडीरेका) एवं सह संसाधक श्री व्ही सी गुप्ता ने तमाम प्रतिभागियों की आदर्श पाठ प्रस्तुति की कमियों को दूर करते हुए उसे और अधिक रुचिकर व संभावनापूर्ण बनाने पर बल दिया। तत्पश्चात द्वितीय सत्र में ही संसाधक डॉ ए के पाण्डेय ने हिन्दी भाषा-शिक्षण की चुनौतियाँ: और उसकी नवीन प्रविधियाँ’ विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए सदन के तमाम प्रतिभागियों को भाषा- शिक्षण की नवीन प्रविधियों एवं नवीन तकनीक से अवगत कराया गया। अगले कालांश में संसाधक श्री व्ही सी गुप्ता ने पद्य-शिक्षण कौशल के विविध आयामों की जानकारी दी। प्रतिदिन की तरह ही सांस्कृतिक-संध्या का आयोजन एवं तत्पश्चात् डॉ आशुतोष पाण्डेय के औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ शिविर निदेशक महोदय की अनुमति से कार्यक्रम के समापन की घोषणा की गई।<br />
//प्रतिवेदक समूह: प्रेमचंद समूह//</p>
<p>दिनांक 27.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन  </p>
<p>‘‘हो रहा मन विकल मन के तार खोलने दो।<br />
प्रशिक्षण शिविर के दौरान हुए कार्यक्रम की बात कहने दो।।<br />
उषा की नव-किरणों जोश सबका बढ़ाया।<br />
सरस्वती-वंदना से सबका मन पावन किया।।<br />
प्रेमचंद समूह में प्रार्थना-सभा का भार लिया।<br />
सोत्साह सभी कार्यक्रम प्रस्तुत कर उल्लसित किया।।<br />
हो रहा&#8230;&#8230;।<br />
शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी हुए हर्ष-तरंगों से उद्वेलित।<br />
किया सबका अभिवादन सानंद और प्रफल्लित।।<br />
नित्यम की तरह मुस्कान बिखरे बढ़े निदेशक हर्षित<br />
बढ़ाया ज्ञान प्रशिक्षणार्थियों का, हुए सभी तृप्त।।<br />
राजभाषा कार्यान्वयन एवं संवैधानिक उपबंधों को किया सरलीकृत।<br />
हिन्दी शिक्षक हो, शक्ति अपनी पहचानिए &#8211; कर दिया प्रेरित।।<br />
हो रहा&#8230;.<br />
बोले सह-निदेशक शुक्ल जी धीर गंभीर वाणी से।<br />
हुए प्रभावित सभी प्रशिक्षणार्थी उनके वक्तव्य से।।<br />
विद्यालय प्रबंधन के विविध आयामों के ज्ञान से।<br />
हुए लाभान्वित सभी शिक्षक उत्सुकता से।।<br />
हो रहा&#8230;.<br />
 काशी की धरती है पावन, आकर्षण हिन्दी प्रेमियों की।<br />
शब्दों की तरंगिणी, कविता-वाहिनी साहित्यप्रेमियों की।।<br />
हुए कृतकृत्य शिक्षार्थी, प्रतिभागी मनोजकुमार के सौहार्द से।<br />
अभिसिंचित हुए शिक्षण के विविध अंगों-उपांगों के ज्ञान से।।<br />
हो रहा&#8230;&#8230;<br />
बदल रहा है समय, बदले शिक्षा के विविध आयाम।<br />
शिक्षा बनी शिक्षार्थी-केन्द्रित, बदले जीवन के आयाम।<br />
सतत समग्र मूल्यांकन है आज की सर्वत्र माँग।<br />
निर्मित करती है नवाचार कार्यशैली में।।<br />
संसाधक हमारे विनोद-प्रिय और भाषा के धनी।<br />
दिया सारगर्भित ज्ञान सीसीई पर सभी ने सुनी।।<br />
हो रहा&#8230;<br />
शुरू हुई श्रृंखला आदर्श पाठों की अपरान्ह में।<br />
शिक्षक तय करेगा विधि &#8211; कहा केके पाण्डेय जी ने गंभीर वाणी में।।<br />
मिश्रा जी आये सोत्साह, प्रस्तुत किया आदर्श पाठ आत्मकथ्य में।<br />
चर्चा छिड़ी, मची हलचल, श्री झा व धर्मवीर के तर्कों से।।<br />
समाधान किया गुप्त जी अपने शेरो-शायरी से।<br />
हो रहा&#8230;<br />
फिर मंच पर बढ़े दोशी जी, डाला प्रकाश नवाचार  विधियों पर।<br />
पुरानी पद्धतियाँ, नये सिरे से सोचा तर्कवादियों ने सुनकर।।<br />
रामकुमार बड़े उत्साही, बढ़ाया ज्ञान रचनात्मक मूल्यांकन पर।<br />
दिया शिक्षक-हित चंद बातें रेवती ने जोड़कर।।<br />
धीर-गंभीर सत्यनारायण जी, आए किया आदर्श पाठ ‘यमराज की दिशा’ पर।<br />
ठाकुर जी  ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ के साथ आये, अगले सोपान पर।।<br />
हो रहा&#8230;&#8230;<br />
भोजनावकाश उपरांत संलग्न हुए शिक्षार्थी समूह-कार्य में।<br />
ज्ञान का भंडार लिए हम बैठे परीक्षा काल मे।।<br />
आशंका और कौतुहल के बीच पर्चे बँटे शिक्षार्थी में।<br />
मनोयोग से लिख डाला उत्तर हमने सीमित समय में।।<br />
हो रहा&#8230;.<br />
बनारस की रंगीन शाम में ढल गया प्रशिक्षण शिविर।<br />
महिला एवं पुरुष मंडल ने लिया रस डूबकर।।<br />
गीत एवं कविताओं में गोते लगाये सबने जी भरकर।।<br />
सम्पन्न हुआ पांचवा दिन धन्यवाद ज्ञापन पर।<br />
हो रहा मन&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
कलयुग का आह्वान है ओ प्रतिभाओ आगे आओ।<br />
ज्ञानदान दे, समय दान दे, जन-मंगल इतिहास रचाओ।<br />
अरे! स्वार्थ के सगे सभी हैं, कौन किसे याद रखता है।<br />
जो समाज के लिए समर्पित, उनकी ही चर्चा होनी है।।<br />
हो रहा&#8230;&#8230;<br />
//प्रतिवेदक समूह: भारतेन्दु समूह//<br />
दिनांक 28.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6943.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6943.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6943" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-686" /></a></p>
<p>दिन ने थोड़ी सिरहन के साथ मुस्कुराते हुए अपनी खुशनुमा आँखें खोलीं, दिवस का प्रारंभ आलसेच्छा को तोड़ते हुए योगाभ्यास से हुआ और शिविरार्थियों में नवप्राण व नवीन ऊर्जा का संचार हुआ।<br />
शिविर का शुभारंभ भारतेन्दु सदन द्वारा प्रार्थना-सभा की आकर्षक व अत्यंत सुंदर प्रस्तुति द्वारा हुआ। तत्पश्चात् निदेशक व प्राचार्य, एवं उप-प्राचार्य द्वारा राष्ट्रगान के गौरवशाली 100 वर्ष पूरे होने पर इसके इतिहास, प्रस्तुति-समय व शुद्ध उच्चारण पर तथ्यपूर्ण तथा तार्किक व्याख्यान दिया गया। इसके बाद श्री अमरनाथ द्वारा आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की गई।<br />
चायकाल के उपरांत काशी हिन्दू विवि से पधारे अतिथि वक्ता डॉ. प्रभाकर सिंह  ने कक्षा- 11वी, 12 वीं की पाठ्यपुस्तकों में चयनित कविताओं व पाठों को साहित्येतिहास के आईने मे देखते हुए अपना विद्वतापूर्ण एवं सारगर्भित व्याख्यान दिया। इस क्रम में उन्होंने कविताओं को लोक व भाषा के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों के आग्रह पर स्त्री-विमर्श पर सूक्ष्म एवं सारपूर्ण बात रखी। तदुपरांत संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय द्वारा शिक्षा-संहिता व लेखा-संहिता पर पर ज्ञानयुक्त व्याख्यान दिया।<br />
सत्र के उत्तरार्ध में शिक्षकों द्वारा आदर्श-पाठ के प्रस्तुति की गई जिसमें श्रीमती अमिता शर्मा, श्रीमती प्रणति सुबुद्धि और श्रीमती स्मिता कौल द्वारा आदर्श-पाठ की प्रेरक प्रस्तुति की गई। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों द्वारा समूहकार्य एवं संगणक कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न किये गए।<br />
सत्र के अवसान काल में मृदुभाषी व मितभाषी उपप्राचार्य श्री सदानंद सिंह यादव द्वारा अत्यंत सुंदर और मर्मस्पर्शी गीत की प्रस्तुति की गई।<br />
दिनांक 28.12.11 की सांध्य-बेला ने श्रीमती अनुराधा पाण्डेय के संचालन एवं नेतृत्व में भव्य-काव्य संध्या का अयोजन किया गया, जिसमें प्रमुख रूप से रामनारायण सिंह ने ‘कहानी एक जैसी है हमारी भी तुम्हारी भी’ तथा विश्वम्भर नाथ मिश्र द्वारा नरोत्तम दास के पद व रामचरित मानस का आरंभिक वंदना की प्रस्तुति की। इसके अतिरिक्त अन्य प्रशिक्षणार्थियों द्वारा भी विभिन्न काव्य-प्रस्तुतियाँ की गईं। अंत में श्रीमती रेवती अय्यर द्वारा औपचारिक धन्यवाद-ज्ञापन के साथ दिनांक 28.12.11 के कार्यक्रम सफल व सार्थक रूप में सम्पन्न हुए।<br />
//प्रतिवेदक समूह: पंत समूह//</p>
<p>दिनांक 29.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन  </p>
<p>इस दिन की प्रातःकालीन बेला में योगाभ्यास से प्रतिभागियों ने नवीन ऊर्जा प्राप्त की। स्वल्पाहार के पश्चात पंत सदन ने प्रार्थना-सभा के विविध कार्यक्रम प्रस्तुत किये। संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय ने नागार्जुन व त्रिलोचन के जीवन के संस्मरणों की प्रस्तुति से सभागार को साहित्यमय कर दिया। निदेशक महोदय ने पद-परिचय व कक्षा- 9 वीं, व 10 वीं के पाठ्यक्रम के आलोक में अन्य व्याकरणिक पक्षों पर प्रकाश डाला। काशी हिन्दू विवि से पधारे विषय-विशेषज्ञ महोदय ने हिन्दी साहित्य के इतिहास एवं गजल विधा के विकास पर प्रकाश डालते हुए उसकी प्रवृत्तियों की जानकारी दी। प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई शंकाओं का निराकरण किया गया। संसाधक श्री व्ही.सी. गुप्त ने यात्रा-संस्मरण पर अपने अनुभव के साथ समय की माँग की बताकर इसके विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रतिभागियों की ओर से परिचर्चा में सहभागिता दर्ज कराई गई। भोजनावकाश के पश्चात आदर्श-पाठ के क्रम में डॉ विनीता राय, डॉ पूनम चौधरी, रजनी त्रिवेदी, अश्विनी राय तथा राजेश त्रिपाठी ने आदर्श पाठ प्रस्तुत किये। प्रतिभागियों ने भी पाठों पर अपनी ओर से सुझाव दिये। सह-निदेशक श्री एस एस शुक्ल जी ने आदर्श-पाठ योजना पर सुझाव से युक्त टिप्पणी दी। पाठ-योजना की प्रस्तुतियों के पश्चात प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूहों में बैठकर समूह-कार्य निष्पादित किए। बचे समय में संगणक पर अभ्यास किया गया। अंत में सभागार मे पुनः एकत्र होने पर निदेशक महोदय ने सभी को निदेशक महोदय ने निर्देश दिया कि समूहकार्य मौलिक, प्रभावी व छात्रों को ध्यान में रखकर पूर्ण किये जाएँ।<br />
संध्याकाल में सांस्कृतिक-कार्यक्रम आयोजित किये गये जिसके अंतर्गत भोजपुरी गीत, एकल-अभिनय व गजलों की प्रस्तुति उल्लेखनीय है।<br />
//प्रतिवेदक समूह: निराला समूह//</p>
<p>दिनांक 30.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09054.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09054.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC09054" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-669" /></a></p>
<p>      इस दिन का प्रारंभ भी योगाभ्यास से हुआ। प्रतिभागियों ने सूर्योदय के साथ योगाभ्यास किया। प्रातःकालीन सभा की प्रस्तुति निराला सदन द्वारा की गई। प्रथम सत्र के प्रारंभ में शिविर के निदेशक श्री विजय कुमार ने एनसीएफ 2005 पर प्रकाश डाला। एनसीएफ को आधुनिक शिक्षा के लिए वरदानतुल्य बताया। इसी सत्र में स्काउट एवं गाइड के विषय में पधारे विषय-विशेषज्ञ श्री वी.वी दुबे, वरिष्ठ प्रशिक्षक डीरेका, सिविल डिफेन्स एवं श्री प्रमोद कुमार, जिला मुख्यालय आयुक्त, भारत स्काउट एवं गाइड, डीरेका, वाराणसी ने जानकारी दी गई। स्काउट सिर्फ संगठन ही नहीं, अपितु मानवसेवा का अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। स्काउट एवं गाइड की सीमा सम्पूर्ण विश्व तक फैली हुई है। बच्चों से लेकर युवाओं तक सभी जुड़े हैं।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09079.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09079.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC09079" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-671" /></a>चायकाल के पश्चात संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने प्राथमिक उपचार विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने प्राथमिक उपचार में न सिर्फ चोट व दुर्घटना के विषय में बताया, अपितु हड्डी टूटने से लेकर शरीर के किसी भी अंग तक की प्राथमिक चिकित्सा से जुड़ी बातें बताईं। भोजनावकाश के बाद प्रतिभागियों के द्वारा आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की गई। इसमें श्री संजय कुमार सिंह, डॉ के के पाण्डेय, श्रीमती प्रणति सुबुद्धि, श्रीमती टी. लेखा, श्री रवीन्द्र कुमार, श्री प्रमोद कुमार शर्मा, श्री रामनारायण  ने आदर्श-पाठ की प्रस्तुति की। प्रतिभागियों ने पावर-प्वाइंट द्वारा अपने आदर्श-पाठ की प्रस्तुति दी। चायकाल के पश्चात सभी प्रतिभागियों ने समूह के साथ बैठकर संगणक कार्य का निष्पादन किया। संगणक कार्य अभ्यास के पश्चात श्री व्ही.सी. गुप्ता ने आदर्श पाठ पर प्रकाश डालते हुए दिन भर की गतिविधियों की संक्षिप्त समीक्षा के साथ ही दिनांक 30.12.2011 के कार्य पूर्ण होने की घोषणा की।<br />
//प्रतिवेदक समूह: महादेवी समूह//</p>
<p>दिनांक 31.12.2011 की कार्यवाही का प्रतिवेदन  </p>
<p>प्रातःकालीन योगाभ्यास के साथ शिविर के नवें दिन का शुभारम्भ हुआ। प्रतिभागियों ने योग के विविध उपादानों से परिचय प्राप्त हुआ। प्रार्थना-सभा के विविध कार्यक्रमों &#8211; प्रार्थना, अध्यापक-प्रतिज्ञा, आदर्श वाक्य, विशेष कार्यक्रम, तथा प्रतिवेदन-वाचन की प्रभावशाली प्रस्तुति महादेवी सदन की ओर से की गई। निदेशक महोदय ने प्रतिभागियों का कुशल-क्षेम पूछा तथा अपठित शिक्षण के संदर्भ में विस्तृत जानकारी प्रदान की। महोदय ने स्पष्ट किया कि अपठित का निरंतर व सतत अभ्यास कक्षा में आवश्यक है। सह-निदेशक श्री एस एन शुक्ल जी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पद्य-शिक्षण के संदर्भ में आवश्यक जानकारी दी। अतिथि वक्ता के रूप में पधारे डॉ. तीरविजय सिंह, संपादक अमर उजाला, ने पत्रकारिता के व्यावहारिक पक्ष पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। पत्रकारों के जीवन में आने वाली कठिनाईयों तथा उनकों किन-किन सावधानियों को बरतने की आवश्यकता है। इस पर ध्यान आकृष्ट किया।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf7002.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf7002.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF7002" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-688" /></a><br />
     प्रतिभागियों ने तरह-तरह की शंकाएँ व्यक्त कीं, जिसका निराकरण उन्होंनंे सफलतापूर्वक किया। अगले कालांश में संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय जी ने केन्द्रीय विद्यालयों में पाठ्य-सहगामी क्रियाओं की स्थिति तथा उसके लाभों के संदर्भ में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई। अगले कालांश में श्री संतोष कुमार में ‘कविता के बहाने’ का आदर्श पाठ प्रस्तुत किया, जिसमें प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने सुझाव दिये। भोजनावकाश के बाद प्रतिभागियों ने आबंटित कार्य को पूरा किया। समूह कार्य के समय पर पूरा हो जाने पर संसाधक श्री व्ही सी गुप्त ने प्रतिभागियों व प्रभारियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। चायकाल के पश्चात प्रतिभागियों की उत्तर-परीक्षा के द्वितीय चरण को सम्पन्न कराया गया। संध्याकाल में प्रतिभागियों ने काव्य-संध्या का आयोजन किया जिसमें एकल अभिनय व लोकगीतों द्वारा इस व्यावाहारिक विधा की प्रस्तुति की गई।<br />
//प्रतिवेदक समूह: प्रेमचंद समूह//</p>
<p>दिनांक 01.01.2012 की कार्यवाही का प्रतिवेदन  </p>
<p>प्रातःकाल का शुभारम्भ योगाभ्यास से हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने योग की विविध मुद्राओं का अभ्यास किया। अल्पाहार के पश्चात प्रेमचंद सदन की ओर से प्रार्थना -सभा के सभी कार्यक्रम &#8211; प्रार्थना, प्रतिज्ञा, आदर्श वाक्य, विशेष कार्यक्रम, प्रतिवेदन तथा राष्ट्रगान की प्रस्तुति की गई। शिविर निदेशक एवं प्राचार्य श्री विजय कुमार ने प्रार्थना-सभा के कार्यक्रमों की गुणवत्ता तथा विद्यालयी जीवन में इसकी महत्ता व उपादेयता पर अपना सारगर्भित भाषण दिया। अतिथि के रूप में पधारे विषय-विशेषज्ञ ने गद्य-शिक्षण की विविध बारीकियों की विस्तार से चर्चा की। चर्चा को सह-निदेशक ने आगे बढ़ाते हुए वाचन-पक्ष पर विशेष ध्यान देने का संदेश दिया। प्रतिभागियों ने चर्चा में भाग लेते हुए अपनी-अपनी जिज्ञासाओं से तथा उनके सर्वमान्य निष्कर्ष से शिविर को लाभान्वित किया। संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्डेय तथा व्ही.सी. गुप्त ने संश्लेषित शिक्षा क्या है ? उससे लाभ तथा केन्द्रीय सरकार तथा केन्द्रीय मा.शि.मं. से निःशक्तजनों को दी जाने वाली विविध छूट की जानकारी से प्रतिभागियों को अवगत कराया। भोजनावकाश के पश्चात समापन समारोह का आयोजन किया गया। जिसके मुख्य अतिथि विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्री एल वी राय, मुख्य कार्मिक अधिकारी, डीरेका थे। समापन समारोह में शिविर निदेशक श्री विजय कुमार ने दस दिन के शिविर की उपलब्धियों से अवगत कराया। प्रतिभागियों की ओर से विभिन्न समूहों के प्रभारियों &#8211; श्रीमती शोभारानी, डॉ के के पाण्डेय, श्रीमती एन एस कौल, श्री चुम्मनप्रसाद श्रीवास्तव एवं डॉ विनीता राय ने शिविर के अनुभव व्यक्त किये। मुख्य अतिथि महोदय ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किये व अपने अध्यक्षीय भाषण में बताया कि शिविर में जिस प्रकार की शिक्षण-तकनीक व विषय-ज्ञान प्रतिभागियों ने अर्जित किया है यदि वे इसका प्रयोग अपने विद्यालयों ने निष्ठा से करेंगे तो निस्संदेह समाज व विद्यार्थियों का कल्याण होगा। उन्होंने प्राचार्य महोदय को इस सफल आयोजन पर बधाई दी व भविष्य में इसी उत्साह से कार्य करते रहने का संदेश दिया। सहनिदेशक श्री एस एन शुक्ल जी ने कार्य के सफल निष्पादन हेतु संसाधकद्वय, विद्यालयकर्मियों, भोजन तथा अन्य व्यवस्थाओं में लगे लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।        //प्रतिवेदक समूह: भारतेन्दु समूह//</p>
<p><strong>क्षणिकाएं<br />
</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6860.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6860.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6860" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-683" /></a><br />
(त्रयी : शिविर निदेशक, सह निदेशक एवं उपप्राचार्य)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/banaras-bhraman-2.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/banaras-bhraman-2.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="banaras bhraman 2" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-693" /></a><br />
(हे गंगा जीवन का दिशा बदल दो : उत्‍तरायणी गंगा शूलटंकेश्‍वर स्‍थल पर रात्रि समय हम साथ साथ, संसाधकद्वय, पूस्‍ताकलयाध्‍यक्ष एवं शिक्षक साथी)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09094.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc09094.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC09094" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-695" /></a><br />
(गंगा आरती के वैश्‍िवक आयोजन का आनंद लेते हुए साथी)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/img0169a.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/img0169a.jpg?w=120&#038;h=150" alt="" title="IMG0169A" width="120" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-696" /></a><br />
(बनारस की पुण्‍य देहरी पुनरागमन की कामना के साथ)</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/666/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/666/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=666&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>प्रेमचंद के घर में &#8230;&#8230;&#8230;</title>
		<link>http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/23/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
		<comments>http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/23/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 Jan 2012 15:19:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[यात्रा-प्रवास]]></category>

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		<description><![CDATA[गॉंव में एक ऊंचा प्रवेश द्वार। अगल-बगल खडे़ हैं पत्‍थर के बैल, होरी जैसे किसान और बूढ़ी काकी जैसी कुछ पथरीली मूर्तियाँ। जी हॉं आप प्रवेश कर रहे हैं लमही गॉंव में। जहॉं प्रेमचंद और उनके परिवार तो कोई नहीं, हॉं लहलाती पीली सरसों है, प्रेमचंद के नाम से पुस्‍तकालय, पैत्रक घर के बोर्ड और <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/23/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=597&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>    <a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc02723.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc02723.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC02723" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-608" /></a><br />
      <strong>गॉंव</strong> में एक ऊंचा प्रवेश द्वार। अगल-बगल खडे़ हैं पत्‍थर के बैल, होरी जैसे किसान और बूढ़ी काकी जैसी कुछ पथरीली मूर्तियाँ। जी हॉं आप प्रवेश कर रहे हैं लमही गॉंव में। जहॉं प्रेमचंद और उनके परिवार तो कोई नहीं, हॉं लहलाती पीली सरसों है, प्रेमचंद के नाम से पुस्‍तकालय, पैत्रक घर के बोर्ड और &#8230;&#8230;<br />
&#8230; स्‍वयंसेवक के बतौर प्रेमचंद स्‍मारक ट्रस्‍ट का काम देखने वाले दुबे जी।<br />
    एक कमरे में सजाई हुई हैं प्रेमचंद की अनेक प्रकाशित किताबें, उनकी तस्‍वीरें और तरह-तरह की चीजें जिससे माहौल पूरा म्‍यूजियम जैसा लगे।<br />
       बरहाल इतना तो है कि यहॉं आकर आप महसूस कर सकते हैं कि प्रेमचंद कितने आम आदमी रहे होंगे। महान लेखन आसमान से नहीं उतरते। कलाकार जितना आम आदमी के बीच से होगा उतना ही काल से होड़ करने वाला होगा।<br />
	पिछली बार बारह दिन बनारस में बिताए तो लमही तक आने की लालसा शेष रह गई थी। बनारस अजूबा इस मामले में है कि ये अनेक महानतम स्‍थानों, (जिनमें साहित्‍यिक मसले सर्वाधिक हैं ही) का ऐसा गुच्‍छ है कि क्‍य कहें। तो आखिरकार लगभग अर्धशतकीय शिक्षक साथियों के साथ आ धमके प्रेमचंद की स्‍मृतियों से रूबरू होने।<br />
        प्रांगण में प्रेमचंद की मूर्ति स्‍थापित है। जीर्णाद्धार के बाद यहां के कक्ष इत्‍यादि नये कलेवर में हैं। दो कमरे है जिनमें एक पुस्‍तकालय बना दिया गया है। प्रेमचंद को जो चीजें या जिस तरह की चीजें पसंद रहीं उनका नमूना रख दिया गया है। ट्रस्‍ट का काम देख रहे दुबे जी अपने हाथ प्रेमचंद के कागजातों और पाण्‍डुलिपियों की छायाप्रति जैसी अनेक चीजें रखते हैं और सैलानियों को दिखाते रहते हैं। मौका मिला तो सर्जना के लिए उनसे बातचीत रिकार्ड कर ली।<br />
       बरहाल, लमही के लम्‍हे&#8230;&#8230;बस इसलिए यादगार हैं कि जाते हुए साल 2011 को विदाई यहीं दी&#8230;..प्रेमचंद के घर में। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc026782.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc026782.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC02678" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-602" /></a><br />
<strong>(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc02682.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc02682.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC02682" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-604" /></a><br />
<strong>(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6952.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6952.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6952" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-612" /></a><br />
<strong>(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6953.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6953.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6953" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-614" /></a><br />
<strong>(लमही गॉंव का प्रवेश द्वार)</strong> </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6954.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6954.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6954" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-618" /></a><br />
<strong>(लमही गॉंव की सरसों &#8216;हो गई सबसे सयानी&#8217;)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6955.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6955.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6955" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-620" /></a><br />
<strong>(लमही गॉव के बीच लगा बोर्ड)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc02699.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc02699.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSC02699" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-606" /></a><br />
<strong>(मुंशी प्रेमचंद के पैत्रक घर के बोर्ड के पास श्री धीरेन्‍द्र कुमार झा व श्री टी एन सिंह के साथ)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6956.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6956.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6956" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-622" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के पैत्रक घर में स्‍थापित उनकी प्रतिमा)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6960.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6960.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6960" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-628" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद स्‍मारक ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष श्री दुबे जी से चर्चा)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6975.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6975.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6975" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-631" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6957.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6957.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6957" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-624" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6958.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6958.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6958" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-626" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc08966.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dsc08966.jpg?w=112&#038;h=150" alt="" title="DSC08966" width="112" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-610" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)<br />
</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6977.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6977.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6977" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-633" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6978.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/dscf6978.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="DSCF6978" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-635" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/premchanda-ke-ghar-3.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/premchanda-ke-ghar-3.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="premchanda ke ghar 3" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-637" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के निवास के भीतरी कक्ष की सामग्रियॉं)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/premchanda-ke-ghar-5.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/premchanda-ke-ghar-5.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="premchanda ke ghar 5" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-639" /></a><br />
<strong>(प्रेमचंद जी के पैतृक घर में श्री विजय कुमार, डॉ विनीता राय व अन्‍य साथी)</strong></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/597/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/597/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=597&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>पत्‍थरों पर इतिहास – हम्‍पी : द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन</title>
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		<pubDate>Thu, 19 Jan 2012 16:11:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[यात्रा-प्रवास]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ramkumarsingh.wordpress.com/?p=558</guid>
		<description><![CDATA[जब ठहरी निगाह&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;. बैंगलूर हवाई अड्डे पर उपरी तल्‍ले पर मंहगी सजी-दुकान पर एक किताब कांच में सजी है। आकार बडी रामायण सरीखा। निगाह ठहर जाती है। किताब पर एक चित्र है –पथरीला। अंग्रेजी की इस किताब का शीर्षक है – द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन। किताब हम्‍पी के बारे में है। किताब देखकर हम्‍पी के <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/19/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e2%80%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e2%80%8d/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=558&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/008.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/008.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="008" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-572" /></a></p>
<p><strong>जब ठहरी निगाह&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</strong><br />
बैंगलूर हवाई अड्डे पर उपरी तल्‍ले पर मंहगी सजी-दुकान पर एक किताब कांच में सजी है। आकार बडी रामायण सरीखा। निगाह ठहर जाती है। किताब पर एक चित्र है –पथरीला। अंग्रेजी की इस किताब का शीर्षक है – द हिस्‍ट्री ऑन स्‍टोन। किताब हम्‍पी के बारे में है।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/007.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/007.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="007" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-571" /></a></p>
<p> किताब देखकर हम्‍पी के प्रति आकर्षण बढ गया । लगा कि इतने दिनों से दोणिमलै में हूं। महज डेढ- दो घंटे के फासले पर हम्‍पी है। वहां तुंगभद्रा बांध के विद्यालय में भी कुछ अरसा पढा चुका हूं। मगर हम्‍पी जाने का योग न बना सका। आखिर एक दिन चलने का भूत सवार हुआ और निकल पडा पत्‍थरों पर इतिहास देखने। </p>
<p><strong>कॉमिक्‍स से इतिहास तक&#8230;&#8230;&#8230;.</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/005.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/005.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="005" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-569" /></a></p>
<p> बचपन से ही तेनालीराम की चतुराई सुनते रहे। और मनोमष्‍ितष्‍क के मिथकीय साहित्‍य में बीरबल के बगल तेनालीराम विराजते रहे। विजयनगर साम्राज्‍य के बारे में इतिहास की किताबें बताती हैं कि इस राज्‍य की स्‍थापना हरिहर और बुक्‍का  नाम के दो भाइयों ने की। ये दोनो भाई  वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरूद्रदेव की सेवा में थे। दक्षिण भारत पर मुस्‍िलम प्रभुत्‍व हो गया तो दोनों भाई वहां से कैद कर दिल्‍ली लाए गए, परन्‍तु जब दक्षिण में वहां शांति और सुव्‍यवस्‍था बनाए रखना कठिन हो गया तो तुगलक सुल्‍तान ने हरिहर और बुक्‍का को मुक्‍त कर उन्‍हें रायचुर  दोआब का सामन्‍त बनाकर भेज दिया(जब भी गुंतकल स्‍टेशन की प्रतीक्षा में रायचुर स्‍टेशन से ही ताकना शुरू करता हूं तो रायचुर रेलवे बोर्ड देखकर लगता है रायचुर के उस प्रभावशाली दोआब का ऐतिहासिक हिस्‍सा बन गया हूं तो राजाओं के शक्‍ति-प्रदर्शन का केन्‍द्र रहा) । कहा जाता है कि इन दोनों भाइयों का परम सहायक तथा नेता उस समय का प्रकाण्‍ड पंडित विद्यारण्‍ड था। जिसने इस वंश  की उसी प्रकार सहायता की जिस प्रकार आचार्य कौटिल्‍य ने चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य की की थी। अपने गुरू तथा सहायक के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे पर विद्यानगर अथवा विजयनगर नामक नगर की नींव डाली। मुहम्‍मद बिन तुगलक के शासन-काल के अंतिम भाग में हरिहर ने अपने को स्‍वतन्‍त्र शासक घोषित कर दिया। विजयनगर में सन् 1336 से 1416 तक चार राज्‍यवंशों ने शासन किया। इनमें सन् 1505 ई से 1570 ई के तृतीय राजवंश का सबसे अधिक योग्‍य तथा प्रतिभाशाली शासक कृष्‍णदेव राय था। उसे सम्‍भवत सन् 1509 ई से 1530 ई तक शासन किया। इतिहास विवरणों के अनुसार वह बड़ा ही वीर,साहसी तथा न्‍यायप्रिय शासक था। वह एक महान विजेता तथा सफल शासक था। उसने उड़ीसा के राय को युद्ध में परास्‍त कर वहाँ की राजकुमारी के साथ विवाह किया। 1520 ई में उसने बीजापुर के सुल्‍तान आदिलशाह पर भी विजय प्राप्‍त की और उसके राज्‍य को लूटा। पश्‍चिमी समुद्र तट पर बसे हुए पुर्तगालियों के साथ उसकी मैत्री थी। इस प्रकार कृष्‍णदेव राय ने अपने बाहुबल से अपने राज्‍य की सीमा से बड़ी वृद्धि की।  इससे पड़ोसी मुस्‍लिम शासकों को बड़ी ईर्ष्‍या उत्‍पन्‍न हुई और वे विजयनगर के विरूद्ध संगठित होने लगे। इतिहास यह भी बताता है कि कृष्‍णदेव राय की मृत्‍यु के उपरान्‍त सदाशिव के मंत्री राम राय ने पड़ोसी मुसलमान राज्‍यों के साथ युद्ध किया और मुसलमानों साथ बड़ा अत्‍याचार किया। मुसलमान राज्‍यों के लिए यह असह्य हो गया और अपने मतभेद भुलाकर बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्‍डा तथा बीदर ने विजयनगर के विरूद्ध एक संघ बनाया। केवल बरार का सुल्‍तान इस संघ से अलग रहा। </p>
<p><strong>और वो दिन जब दुनिया का एक महान सुव्‍यवस्‍िथत नगर अचानक धराशायी कर दिया गया&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/004.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/004.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="004" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-567" /></a></p>
<p>सन् 1564 ई के अंतिम सप्‍ताह में मुसलमानों ने विजयनगर राज्‍य पर आक्रमण कर दिया। तालीकोट नामक स्‍थान पर, जो कृष्‍णा नदी के किनारे पर स्‍िथत है, दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध आरम्‍भ हो गया। रामराय युद्ध में परास्‍त हो गया और उसका वध कर दिया गया। हिन्‍दुओं का बड़ी नृशंसतापूर्वक बध कर दिया गया। इसके बाद विजयी सेना ने विजयनगर की ओर कूच किया और नगर को खूब लूटा। शत्रु विजयनगर को नष्‍ट करने आये थे। अतएव उन्‍होंने यथाशक्‍ित उसका विनाश किया।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/003.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/003.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="003" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-564" /></a></p>
<p>कर्नाटक के सांस्‍कृतिक उत्‍सवों, राजकीय महोत्‍सवों और राज्‍य की स्‍थापना की वर्षगाँठ के अवसरों पर जो कार्यक्रम और गीत मैं सुना करता हूँ उनमें विजयनगर की सांस्‍कृतिक विरासत निवासियों के रग-रग में बसी है। वे अपनी अस्‍मिता और आत्‍मगौरव के साथ इसे सम्‍बद्ध करते हैं, खासकर जो सांस्‍कृतिक पहचान इसकी रही। </p>
<p><strong>फोटो &#8211; गैलरी / हम्‍पी और उसके आसपास</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/001.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/001.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="001" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-559" /></a><br />
(तुंगभद्रा तट पर विजयनगर, हम्‍पी)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/0021.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/0021.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="002" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-566" /></a><br />
(तुंगभद्रा तट)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250578.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250578.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-577" /></a><br />
(उग्र नरसिंह मंदिर)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250582.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250582.jpg?w=112&#038;h=150" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="112" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-580" /></a><br />
(मीनाक्षी मंदिर)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250601.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250601.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-582" /></a><br />
(तुंगभद्रा में स्‍नान करता राजकीय हाथी, जापानी बालक, सर्जना के कैमरे में)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250614.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250614.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-584" /></a><br />
(हम्‍पी का विश्‍व प्रसिद्ध पत्‍थर का रथ, स्‍टोन व्‍हील)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250625.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250625.jpg?w=150&#038;h=112" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="150" height="112" class="alignnone size-thumbnail wp-image-586" /></a><br />
(हम्‍पी के विटृठल मंदिर का प्रांगण)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250651.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/p8250651.jpg?w=112&#038;h=150" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="112" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-588" /></a><br />
(विटठल मंदिर का तोरण द्वार)</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/558/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/558/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=558&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>दो कविताएं मिलीं &#8211; &#8216;सर्जना&#8217; / &#8216; आओ जिंदगी को रिचार्ज करें</title>
		<link>http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/17/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be/</link>
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		<pubDate>Tue, 17 Jan 2012 16:04:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमंत्रित-सर्जनाकार/समीक्षक]]></category>

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		<description><![CDATA[सर्जना &#8211; सर्जना मन का घरौंदा है इसे बना लो सर्जना रचना का संसार है इसे बसा लो सर्जना भावों का ज्‍वार है इसे उमडने दो सर्जना मन की टीस है इसे निकलने दो सर्जना व्‍यथा और पीडा की अभिव्‍यक्‍ति है इसे बहने दो सर्जना परिवर्तन्‍ा का आह्वान है इसे होने दो सर्जना क्रांति का <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2012/01/17/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=545&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <strong>सर्जना &#8211; </strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/paintig.jpeg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/paintig.jpeg?w=112&#038;h=150" alt="" title="paintig" width="112" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-547" /></a><br />
सर्जना मन का घरौंदा है<br />
इसे बना लो<br />
सर्जना रचना का संसार है<br />
इसे बसा लो<br />
सर्जना भावों का ज्‍वार है<br />
इसे उमडने दो<br />
सर्जना मन की टीस है<br />
इसे निकलने दो<br />
सर्जना व्‍यथा और पीडा की अभिव्‍यक्‍ति है<br />
इसे बहने दो<br />
सर्जना परिवर्तन्‍ा का आह्वान है<br />
इसे होने दो<br />
सर्जना क्रांति का शंखनाद है<br />
इसे बजने दो<br />
सर्जना विरूदावली है<br />
सर्जना कोमलकांत पदावली है<br />
सर्जना मानवता का आराधन है<br />
सर्जना जोडने का एक साधन है<br />
सर्जना मूल्‍यों का संचार है<br />
सर्जना गुणों का आधार है<br />
 सर्जना एक सुंदर सा सपना है<br />
सर्जना एक संसार नितांत अपना है<br />
सर्जना शाम की सुरीली तान है<br />
सर्जना जीवन की मधुर जान है<br />
सर्जना इंसानियत की धरोहर है<br />
सर्जना हर युग के लिए मनोहर है<br />
सर्जना बिना संसार अधूरा है<br />
सर्जना से ही संसार पूरा है<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/amarnath.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/amarnath.jpg?w=114&#038;h=150" alt="" title="amarnath" width="114" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-552" /></a><br />
अमरनाथ, बिलागुडी छावनी </p>
<p><strong><br />
आओ जिंदगी को रिचार्ज करें &#8211; </strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/duaa.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/duaa.jpg?w=137&#038;h=150" alt="" title="duaa" width="137" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-548" /></a><br />
चुप क्‍यूं हो<br />
 कुछ तो बोलो<br />
आखिर अपना मुंह तो खोलो<br />
क्‍यूं हो ऐसे बेहाल<br />
बीत जायेगा ये काल<br />
गुस्‍सा छोडो, मत हो लाल<br />
आओ कुछ ऐसा काम करें<br />
किसी की जिंदगी में रंग भरें<br />
दें उसे खुशियां हजार<br />
ताकि हासिल हों दुआएं बार-बार<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/umar.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2012/01/umar.jpg?w=112&#038;h=150" alt="" title="umar" width="112" height="150" class="alignnone size-thumbnail wp-image-553" /></a><br />
उमर फारूख, दोणिमलै, कर्नाटक</p>
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		<title>हिन्दी शिक्षकों का संगम : श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास की त्रिस्तरीय ऊर्जा</title>
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		<pubDate>Sat, 03 Sep 2011 15:39:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमंत्रित-सर्जनाकार/समीक्षक]]></category>
		<category><![CDATA[यात्रा-प्रवास]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रस्तुति: डॉ. शेषकुमारी सिंह(स्‍नातक शिक्षिका,हिन्‍दी,केवि-वायुसेनाकेन्‍द्र, ओझर, मुम्‍बई संभाग) (केन्द्रीय विद्यालय ओल्ड कैंट इलाहाबाद में स्नातक हिन्दी शिक्षकों का प्रशिक्षण शिविर 8 जून से 19 जून 2011 तक आयोजित किया गया था। इस शिविर में हिन्दी शिक्षण के विविध आयामों पर कई अच्छे नतीजे सामने आये। शिक्षक दिवस आ रहा है। इसलिए एक और पोस्ट शिक्षा <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2011/09/03/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%ae-%e0%a4%b6/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=468&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रस्तुति: डॉ. शेषकुमारी सिंह(स्‍नातक शिक्षिका,हिन्‍दी,केवि-वायुसेनाकेन्‍द्र, ओझर, मुम्‍बई संभाग)</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5011.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5011.jpg?w=300&#038;h=224" alt="" title="DSCF5011" width="300" height="224" class="alignnone size-medium wp-image-422" /></a></p>
<p><strong>(केन्द्रीय विद्यालय ओल्ड कैंट इलाहाबाद में स्नातक हिन्दी शिक्षकों का प्रशिक्षण शिविर 8 जून से 19 जून 2011 तक आयोजित किया गया था। इस शिविर में हिन्दी शिक्षण के विविध आयामों पर कई अच्छे नतीजे सामने आये। शिक्षक दिवस आ रहा है। इसलिए एक और पोस्ट शिक्षा के बारे में जारी की जा रही है। शिविर के अकादमिक उपलब्धियों और छायाचित्र गैलरी यहां आमंत्रित सर्जनाकार डॉ. शेषकुमारी सिंह के सौजन्य से उपलब्ध है। आशा है सभी हिन्दी साथी इसका अवलोकन कर प्रतिक्रिया से अवगत करायेंगे &#8211; संपादक डॉ. रामकुमार सिंह)<br />
</strong></p>
<p>8 जून 2011 को सेवाकालीन हिन्दी स्नातकोत्तर शिक्षक प्रशिक्षण शिविर का शुभारम्भ मुख्य अतिथि माननीय डॉ पी के तिवारी, सेवानिवृत उपायुक्त केविसं, के करकमलों से विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप-प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर शिविर निदेशक श्री बी दयाल, सह-निदेशक श्री रामजी गिरि, संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला, श्रीमती अंजुम एवं श्रीमती इंदिरा सिंह के द्वारा भी मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर भावांजलि प्रस्तुत की गई।<br />
	शिविर निदेशक श्री बी दयाल प्राचार्य केवि ओल्ड कैंट इलाहाबाद ने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए शिविर के उद्देश्य एवं उसकी सार्थकता पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात शिविर के प्रतिभागियों के द्वारा अपना अपना परिचय प्रस्तुत किया गया।  माननीय मुख्य अतिथि डॉ पी के तिवारी ने प्रतिभागियों को आशीर्वचन देते हुए शिविर की सफलता की कामना की। कार्यक्रम के अंत में सह निदेशक श्री रामजी गिरि ने मुख्य अतिथि के प्रति आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती मधुश्री शुक्ला के द्वारा किया गया। स्वल्पाहार के पश्चात सभी प्रतिभागी पूर्व परीक्षा में सम्मिलित हुए।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf51911.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf51911.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5191" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-518" /></a><br />
	भोजनोपरांत द्वितीय सत्र में प्राचार्य श्री बी दयाल केवि ओल्ड कैंट ने पावर प्वांइट के माध्यम से दो रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारियां दीं, जिनका सार था कि हमें अपने विद्यार्थियों को प्रसन्न रहने और सकारात्मक सोच विकसित करने की प्रेरणा देनी चाहिए। इस उपयोगी जानकारी के उपरांत सांयकालीन चाय के उपरांत संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला ने प्रतिभागियों का समूह विभाजन किया। सत्य, निष्ठा, न्याय, ईमान, अहिंसा समूह में सात-सात प्रतिभागियों को बांटकर संसाधिका महोदया ने प्रत्येक समूह को कार्य आबंटित किये। &#8211; सत्य समूह का प्रतिवेदन।<br />
	9 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ सत्य समूह की प्रार्थना-सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत श्री राजीव कुमार सिंह जी ने लयबद्ध कवितावाचन किया जिसका शीर्षक था- दीवानों की हस्ती। प्रार्थना-सभ की समाप्ति श्री गंगाधार जी द्वारा दिनांक 8 जून के प्रतिवेदन वाचन के साथ हुई।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5195.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5195.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5195" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-514" /></a></p>
<p>     दिन के प्रथम सत्र में शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने &#8216;आओ सीखें&#8217; के अन्तर्गत सभी प्रतिभागियों को सफल अध्यापक बनने की प्रेरणा दी। श्री राजीव कुमार जी ने कबीर के पद पढ़ाये। तत्पश्चात सह निदेशक श्री राम जी गिरि ने वैयक्तिक भिन्नताओं के आधार पर शिक्षण विषय पर प्रकाश डालते हुए विभिन्न छात्रों के लिए अपनाई जाने वाली विभिन्न युक्तियां बताईं। मध्यान्ह भोजन के पश्चात दिवस के द्वितीय सत्र में शिविर की संसाधिका श्रीमती अंजुम जी ने आदर्श पाठ-योजना के रूप में &#8216;अलंकार&#8217; प्रकरण पढ़ाया। इस कक्षा में सभी प्रशिक्षणार्थियों ने पूर्ण सहभागिता का प्रदर्शन किया। जिससे कक्षा के बाद संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला ने सफल शिक्षक के गुण बताये तथा समय के साथ नवाचारी बनने की प्रेरणा दी। तत्पश्चात श्री माणिक कुमार जी, स्नातकोत्तर शिक्षक- संगणक विज्ञान, ने संगणक की मूलभूत अवधारणाओं से सभी को अवगत कराया तथा इसका व्यावहारिक अभ्यास भी कराया। सूचना एवं तकनीक के युग की ओर चरण बढ़ाने के उत्साह तथा रुचिकर संगणक शिक्षा के साथ दिवस के प्रशिक्षण को विराम मिला। &#8211; निष्ठा समूह का प्रतिवेदन</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5169.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5169.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5169" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-460" /></a><br />
(मार्गदर्शन)</p>
<p>11 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ निष्ठा समूह की प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत श्री एस एल पाण्डेय जी ने स्वरचित कविता के माध्यम से प्रयाग प्रशस्ति का सुमधुर स्वर में गायन किया। प्रतिवेदन श्रीमती गीता सबरवाल जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया। सभा का संचालन श्री एम ए नकवी के द्वारा किया गया।<br />
दिन के प्रथम सत्र  में शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने सर्वे के आधार पर पढ़ाये जाने वाले शिविर पाठ्यक्रम की चर्चा की एवं दो प्रेरणादायी कहानियों &#8211; &#8216;एक मेढ़क की कहानी’ और ‘मेरा कुत्ता पानी पर चलता है’ का बड़ा ही सुन्दर एवं प्रभावशाली वाचन किया। इसके पश्चात श्री माणिक कुमार जी ने बराह साफ्टवेयर के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां अत्यन्त सरल पद्धति से प्रदान की जिसकी सभी प्रतिभागियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5174.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5174.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5174" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-462" /></a><br />
(जिज्ञासा और अभिव्‍यक्‍ित)</p>
<p>भोजनावकाश के बाद दिन के दूसरे सत्र में निष्ठा समूह से श्रीमती गीता सबरवाल जी ने कविवर देव के पाठ सवैया और कवित्त पर अत्यन्त रुचिकर, आकर्षक व विद्वतापूर्ण शैली में आदर्श पाठ प्रस्तुत किया। तत्पश्चात संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ला जी ने आदर्श पाठ के रूप में शिल्प-सौन्दर्य के तत्वों पर प्रकाश डाला। इसी श्रंखला में संसाधिका श्रीमती अंजुम जी ने समास प्रकरण पर आदर्श पाठ प्रस्तुत किया। दिन के आखिरी चरण में विद्यालय के प्राचार्य व शिविर निदेशक जी ने वाच्य और पंचमाक्षरों के विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी बड़ी ही रोचक शैली में प्रदान की। &#8211; ईमान समूह का प्रतिवेदन</p>
<p>11 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ &#8216;ईमान&#8217; समूह की प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम  प्रस्तुत किया गया। प्रार्थनासभा में पश्चात शिविर के सहायक निदेशक श्री रामजी गिरि द्वारा रूपरेखा से अवगत कराया गया। तत्पश्चात शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने अपनी चिर परिचित शैली में प्रभावी शिक्षक के सामान्य गुणों की चर्चा की। इसके बाद सहायक निदेशक द्वारा गद्य की विभिन्न विधाऐं, गद्य रचनाओं के सोदाहरण प्रस्तुत की। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों ने संगणक कार्य किया। भोजनावकाश के बाद श्रीमती इंदिरा सिंह ने भाषा कौशल का विकास के विषय में प्रभावी विचार प्रकट किये। प्रतिभागियों को उत्साही बनाया। शिविर के प्रतिभागियों द्वारा आदर्श पाठ प्रस्तुत किये गये। उसमें सर्वश्री पीआर सिंह, डॉ वेदप्रकाश मिश्र तथा मनोज जी ने भाग लिया। अंत में शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने र के प्रयोग की सम्पूर्ण जानकारी दी।  &#8211; अहिंसा समूह का प्रतिवेदन<br />
12 जून को शिविरार्थी श्री राम जी गिरि के निर्देशन में प्रातःकाल इलाहाबाद दर्शन को बस द्वारा निकल पड़े। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5065.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5065.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5065" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-424" /></a><br />
(चलो इलाहाबाद दर्शन को&#8230;)</p>
<p>सर्वप्रथम प्रशिक्षणार्थी पवित्र संगम स्थल पहुंचे। संगम स्नान कर सभी श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास की त्रिस्तरीय ऊर्जा से परिपूर्ण होकर अक्षय वट, पातालपुरी पहुंचे। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5072.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5072.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5072" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-425" /></a><br />
(जाना था गंगा पार&#8230;&#8230;)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5102.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5102.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5102" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-427" /></a><br />
(प्रसीद&#8230;.प्रसीद प्रभो मन्‍मथारि)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5101.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5101.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5101" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-426" /></a><br />
(आस्‍था, धर्म और कला)</p>
<p>इसके बाद संगम से लगभग 55 किमी दूर सीतामढ़ी पहुंचे। वहां सीताजी की अत्यंत आकर्षक प्रतिमा तथा 108 फीट ऊंचे हनुमान जी की दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन किये। स्थल बड़ा ही मनोरम और पवित्र था। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5121.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5121.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5121" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-429" /></a><br />
(भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्‍द्र के काज संवारे)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5113.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5113.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5113" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-428" /></a><br />
(सत समा गया सत्‍ता के अंक विवर में /पर सीता की रवि की किरण अभेद तिमिर में //-&#8217;सीतायन&#8217; से, सीताजी के पाताल-प्रवेश की पंक्‍ितयां)</p>
<p>दोपहर बाद सभी प्रशिक्षणार्थी शिविर में वापस लौट आये। भोजनावकाश के बाद पुनः इलाहाबाद स्थित स्वराज भवन एवं आनंद भवन का भ्रमण किया। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5138.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5138.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5138" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-434" /></a><br />
(इलाहाबाद के ऐतिहासिक परिसर &#8211; अपने कैमरे में कैद&#8230;.एक)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf51341.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf51341.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5134" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-432" /></a><br />
(इलाहाबाद के ऐतिहासिक परिसर &#8211; अपने कैमरे में कैद&#8230;&#8230;दो)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf51281.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf51281.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5128" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-430" /></a><br />
(चित्र गवाह हैं इतिहास के)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5130.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5130.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5130" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-431" /></a><br />
(साथ-साथ बने एतिहासिक स्‍थलों के साक्षी्)</p>
<p>बहुत सारी स्मृतियां एवं छायाचित्रों साथ सभी शिक्षक- शिक्षिकाएं संसाधकगण सहित लौट आये और इस प्रकार एक और सफल दिवस का समापन हुआ। &#8211; न्याय समूह का प्रतिवेदन<br />
13 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ अहिंसा समूह की प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम  की प्रस्तुति में श्रीमती मधु मैडम ने अपने मधुर कंठ से एक कविता सुनाई जिसका विषय था- राष्ट्रीय एकता। सभा का संचालन श्री विनोद कुमार दुबे ने किया। तत्पश्चात शिविर निदेशक श्री बी दयाल ने अपनी चिरपरिचित शैली में प्रभावी शिक्षक के सामान्य गुणों की चर्चा की।<br />
इसके बाद श्री गंगाधर जी द्वारा आदर्श पाठ-योजना की रोचक प्रस्तुति की गई। इसका विषय था &#8211; उपभोक्तावाद की संस्कृति। इसी मध्य शिक्षाधिकारी श्री के एस यादव का आगमन हुआ और उनका स्वागत शिविर निदेशक बी दयाल जी के द्वारा किया गया। शिक्षाअधिकारी श्री यादव से सभी का संक्षिप्त परिचय कराया गया इसके बाद उन्होंने अपने वक्तव्य में सभी को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने उत्तम स्वास्थ्य और छात्रों के संतुलित विकास पर बल दिया। भोजनावकाश के बाद श्रीमती प्रमिला जैन ने मेघ आए, श्री नकवी जी ने सूरदास और राजीव सिंह द्वारा बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता पर आदर्श पाठ-योजना प्रस्तुत की। अंतिम सत्र में संगणक शिक्षक श्री माणिकजी द्वारा पावरप्वाइंट का सैद्धांतिक और व्यावहारिक ज्ञान दिया। तत्पश्चात सभी प्रतिभागी सीखे हुए ज्ञान को स्वयं कम्प्यूटर चलाकर प्रयोग करने में लग गये। &#8211; सत्य समूह का प्रतिवेदन</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5175.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5175.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5175" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-463" /></a><br />
(विद्वतजन की वाणी&#8230;)</p>
<p>14 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ न्याय समूह द्वारा प्रार्थना सभा से हुआ। इसके बाद प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों एवं विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। इसके बाद शिविर निदेशक श्री बी दयाल ने प्रमुख अतिथि डॉ सूर्य नारायण सिंह, प्रो. इलाहाबाद विवि, का स्वागत किया। मुख्य अतिथि प्रो सिंह ने  हिन्दी गद्य की नवीन प्रवृत्तियां विषय पर उत्कृष्ट एवं विस्तृत व्याख्या की। इसके बाद शिविर के सह-निदेशक श्री रामजी गिरि ने सोद्देश्य ग्रहकार्य एवं उसकी अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए संतुलित ग्रहकार्य देने की अनुशंसा की। इसी के साथ प्रथम सत्र समाप्त हुआ।<br />
अपरान्ह सत्र में श्रीमती मधुराज पल खन्ना, राजेश कुमार शुक्ल, नाहरसिंह मीणा, शेषकुमारी सिंह एवं हरिशंकर द्विवेदी जी द्वारा आदर्श पाठ-योजना की उत्कृष्ट प्रस्तुति की गई। इसके बाद संगणक शिक्षक श्री माणिक जी ने प्रतिभागियों के बीच दो समूह बनाकर बराह सॉफ्टवेयर के प्रयोग के संदर्भ में खेल विधि द्वारा प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतिभागियों ने बहुत ही उत्साह के साथ प्रतियोगिता में भाग लेते हुए अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया। दोनों समूहों के अंक बराबर रहे। इसके बाद उत्साहवर्धन के लिए सभी प्रतिभागियों के बीच शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी द्वारा मिष्ठान्न का वितरण किया गया। इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक दिवस की समाप्ति हुई। &#8211; निष्ठा समूह का प्रतिवेदन<br />
15 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ सत्य समूह द्वारा प्रार्थना-सभा से हुआ। समूह द्वारा प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों एवं विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई।<br />
प्रथम सत्र की शुरूआत संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ल ने जीवन में खुश रहने के उपाय के जीवंत व्याख्यान से किया। डॉ रामकिशोर, प्रो. इलाहाबाद विवि, ने विशेष अतिथि के रूप में भाषा, शब्द, ध्वनि बोली धातु लिंग तथा स्त्री विमर्श आंदोलन आदि दुरूह विषयों पर अपनी विशद चर्चा रूपी व्याख्यान से प्रतिभागियों को भाषा-विज्ञान की सुरसरिता में अवगाहन कराते हुए सबका ज्ञान संवर्धन किया। संसाधिका श्रीमती इंदिरा सिंह ने अपठित गद्यांश पर अपने ज्ञान को वितरित किया। अपरान्हकालीन बेला में विभिन्न प्रतिभागियों ने अपने-अपने आदर्श पाठों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। संगणक शिक्षक श्री माणिक कुमार जी ने सबको इंटरनेट की प्रारंभिक जानकारी दी।<br />
सांन्ध्यकालीन बेला में काव्यगोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से की गई। इसमें विभिन्न प्रतिभागियों के साथ संसाधिका श्रीमती मधुश्री शुक्ल, सह निदेशक श्री रामजीगिरि तथा निदेशक श्री बी दयाल जी ने अपनी काव्य-रचना कौशल का परिचय दिया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने की। इसका अद्भुत संचालन कर श्री वेदप्रकाश मिश्र जी ने विलक्षण काव्य-शक्ति का परिचय दिया। -ईमान समूह का प्रतिवेदन</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5176.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5176.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5176" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-464" /></a><br />
(विद्वतजन की वाणी&#8230;)</p>
<p>16 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ  निष्ठा समूह द्वारा प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना प्रतिज्ञा सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई जिसका विषय था &#8211; गांव की ओर लौटने की चाह। प्रतिवेदन की प्रस्तुति श्री एस एल पाण्डेय जी के द्वारा प्रस्तुत की गई।<br />
इसके बाद अतिथि वक्ता डॉ लालसा यादव, प्रवक्ता, इलाहाबाद विवि के द्वारा स्त्री-विमर्श विषय पर बहुत ही उत्कृष्ट व्याख्यान की प्रस्तुति की गई। उन्होंने आदिकाल से आधुनिक युग की नारी तक की यात्रा बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।<br />
तदुपरांत श्री ओ पी पाण्डेय द्वारा &#8216;हम पंछी उन्मुक्त गगन के&#8217; श्रीमती शेषकुमारी सिंह द्वारा सूरदास तथा डॉ गीताकुमारी द्वारा कृष्णभक्ति पर रसखान विषय की आदर्श पाठ योजना प्रस्तुत की गई। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5144.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5144.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5144" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-458" /></a><br />
(दुतरफा सम्‍प्रेषण &#8211; कभी प्रश्‍न तो कभी गीत के रूप में)</p>
<p>भोजनावकाश उपरांत शिविर के सह-निदेशक श्री रामजी गिरि ने छात्रों की परीक्षा संबंधी दबाब, उनके कारण, उनको दूर करने की युक्तियां आदि पर गहन विचार प्रस्तुत कर अनेक समस्याओं का समाधान किया। तदुपरांत संसाधिका श्रीमती अंजुम ने हिन्दी के प्रति उदासीनता तथा उसके प्रति रुचि जगाने के उपाय विषय पर श्रेष्ठ व्याख्यान प्रस्तुत किया। अंत में कम्पयूटर संसाधक श्री आरके चौहान जी के द्वारा थिंक-क्वेस्ट की व्यापक जानकारी द्वारा प्रतिभागियों की समस्याओं का सहज निवारण किया।   &#8211; अहिंसा समूह का प्रतिवेदन<br />
17 जून को प्रातःकालीन सभा का शुभारम्भ ईमान समूह द्वारा प्रार्थना सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के उपरांत विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। इसके बाद निदेशक श्री बी दयाल जी ने विद्यार्थियों के जीवन विकास व मार्गदर्शन कैसे करना चाहिए इस विषय पर अतिमहत्वपूर्ण सुझाव दिये। इसके बाद प्रशिक्षार्णियों के द्वारा आदर्श पाठ योजना प्रस्तुत की गई। इस क्रम में श्रीमती सीमा, श्रीमती विद्या पाण्डेय, श्री आर आर पाण्डेय, श्रीमती जी आर किशोरी, श्रीमती अरुणिमा वर्मा के द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। तदुपरांत शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने काव्य-शिक्षण के उद्देश्यों की विधि का स्पष्टीकरण किया। दूसरे सत्र में श्रीमती इंदिरा सिंह जी ने जीवन-कौशल के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। तदुपरांत श्री चौहान ने थिंक-क्वेस्ट प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी। </p>
<p>18 जून को प्रातःकालीन सभा शुभारम्भ अहिंसा समूह द्वारा प्रार्थना -सभा से हुआ। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, सुविचार और मुख्य समाचारों के बाद विशेष कार्यक्रम की प्रस्तुति की गई। प्रतिवेदन की प्रस्तुति श्री प्रमोद सिंह द्वारा की गई।<br />
निदेशक श्री बी दयाल जी ने विचार-गरल विषय पर महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। इसके बाद प्रशिक्षणार्थियों द्वारा आदर्श पाठयोजना प्रस्तुत की गई। श्रीमती रीना भट्टाचार्य, श्रीमती अरुणिमा वर्मा, श्रीमती पूनम शुक्ला के द्वारा आदर्श पाठ की प्रस्तुति की गई। तदुपरांत प्रशिक्षण के  दौरान पठित पाठों पर आधारित परीक्षा का आयोजन किया गया।<br />
दूसरे सत्र में निदेशक श्री बी दयाल ने वर्तनी एवं उच्चारण सम्बन्धी अशुद्धियों पर अभूतपूर्व व्याख्यान दिया। तदुपरांत श्री माणिक कुमार ने संगणक प्रयोग सम्बन्धी कठिनाईयों का निवारण किया। &#8211; सत्य समूह का प्रतिवेदन</p>
<p>19 जून को न्याय समूह द्वारा प्रार्थना-सभा का संचालन किया गया। प्रतिवेदन श्री ओमप्रकाश पाण्डे द्वारा प्रस्तुत किया गया। विशेष कार्यक्रम में श्रीमती शेषकुमारी सिंह द्वारा &#8216;इतनी शक्ति हमें देना दाता&#8217; गीत का सुमधुर गायन किया गया। प्रार्थना-सभा के सभी कार्यक्रम प्रभावशाली रहे। शिविर निदेशक श्री बी दयाल जी ने गुण नामकरण एवं प्रभाव शब्द शक्तियां एवं उनसे ध्वनित अर्थ, समास- अर्थ महत्व तथा पहचान एवं उपवाक्य तथा उनके भेदों पर प्रकाश डालते हुए सारगर्भित परिचर्चा प्रस्तुत की गई। इसके उपरांत सम्पूर्ण प्रशिक्षण शिविर के दौरान पढ़ाए गए विषयों का पुनरावलोकन किया गया। भोजनोपरांत संगणक शिक्षक श्री माणिकजी ने थिंकक्वेस्ट पर प्रतिभागियों को उपयोगी जानकारी दी। अपरान्ह सत्र में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किये गए। </p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5204.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5204.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5204" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-467" /></a><br />
(मनीषियों से प्राप्‍त किये प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र)</p>
<p>सभी प्रतिभागियों ने सुव्यवस्थित शिविर प्रबंधन एवं बारह दिवसीय अनवरत चलने वाले ज्ञान यज्ञ की प्रशंसा की। विभिन्न संभागों से आए हुए प्रतिभागियों ने शिविर निदेशक श्री बी दयाल, सह निदेशक श्री रामजीगिरि एवं संसाधक त्रय &#8211; श्रीमती मधु शुक्ल, श्रीमती इन्दिरा सिंह एवं श्रीमती अंजुम के प्रति आभार व्यक्त किया।</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5135.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5135.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5135" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-433" /></a><br />
( इलाहाबाद में, उद्यान में)</p>
<p>और चलते&#8230;..चलते&#8230;..<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5178.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/dscf5178.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5178" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-466" /></a><br />
(संगम &#8230;&#8230;इस रूप में)</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/468/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/468/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=468&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>&#8216;रोशनी की कोपलें&#8217; &#8211; हाथों से छूते हुए&#8230;&#8230;&#8230;.</title>
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		<pubDate>Wed, 31 Aug 2011 16:20:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[पुस्तक-समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[पुस्तक-समीक्षा &#8211; डॉ रामकुमार सिंह पुस्‍तक &#8211; &#8216;रोशनी की कोपलें(गजल-संग्रह) सर्जनाकार &#8211; डॉ वशिष्‍ठ अनूप प्रकाशक &#8211; उद्भावना प्रकाशन कहने को जो कोंपलें हैं वे कब अंगार बन जायें, कहा नहीं जा सकता। या इस तरह कहिये कि कब अंगारों की तासीर महज &#8216;कोंपल&#8217; के शीर्षक में रखकर हथेलियों में दे दी जाये&#8230;.. रोका नहीं <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2011/08/31/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=435&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पुस्तक-समीक्षा &#8211; डॉ रामकुमार सिंह<br />
पुस्‍तक &#8211; &#8216;रोशनी की कोपलें(गजल-संग्रह)<br />
सर्जनाकार &#8211; डॉ वशिष्‍ठ अनूप<br />
प्रकाशक &#8211; उद्भावना प्रकाशन</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/p8270689.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/p8270689.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-438" /></a><br />
<strong>क</strong>हने को जो कोंपलें हैं वे कब अंगार बन जायें, कहा नहीं जा सकता। या इस तरह कहिये कि कब अंगारों की तासीर महज &#8216;कोंपल&#8217; के शीर्षक में रखकर हथेलियों में दे दी जाये&#8230;.. रोका नहीं जा सकता है। ऐसी ही एक नजीर है वशिष्ठ अनूप का गजल संग्रह &#8211; <strong>&#8216;रोशनी की कोपलें&#8217;</strong>।<br />
	यह गजल-संग्रह उद्भावना से छपा है। इसमें कुल एक सैकड़ा जमा दो गजलें हैं। हिन्दी गजल की परम्परा में यह संग्रह एक और उपलब्धि है। दुष्यंत के बाद हिन्दी गजल में नई बुनावट को उसी प्रखरता और तल्खी के साथ बनाये रखने का अहसास &#8216;रोशनी की कोंपलें&#8217; से होता है।<br />
	&#8216;समय की पहचान&#8217; की जो बात अनूप वशिष्ठ के विषय में मानी गई है उसे इस तरह के कई शेर सामने लाते हैं &#8211; </p>
<p><strong>&#8221;हदों के पार होता जा रहा है<br />
समय खूंखार होता जा रहा है&#8221;</strong></p>
<p>समय का खूंखार हो जाना इसलिए नहीं कि अंधेरे के नुमांइदे ज्यादा हो गये हैं और रोशनी की कोपलें सूराख तलाशती हों, दरअसल मामला यह निकलता है कि अंधेरे और उजाले के फर्क का श्याम-श्वेत मानदंड समाप्त हो गया है। समय का खूंखार हो जाना जिस अंदाज में वशिष्ठ अनूप परिभाषित करते हैं वो इस दौर की शातिरी को पकडने और खंगालने की प्रक्रिया है -</p>
<p>&#8216;<strong>&#8216;समझना उसको मुश्किल है बड़ा शातिर शिकारी है<br />
वो खंजर बेचने वाला अहिंसा का पुजारी है&#8221;</strong></p>
<p>इस माहौल में केवल उदात्त कल्पनाओं वाले कवि के पास वे पैने औजार शायद न हों जो राजनीतिक-चेतना ये युक्त नये गजलकार के पास होते हैं। दुष्यंत ने जिस राजीनीतिक-चेतना का गजल से मजबूत परिचय कराया था वह उतनी ही शिद्दत के साथ अनूप वशिष्ठ के यहां मौजूद है। व्यंग्य की धार भी उसी तरह &#8211;   </p>
<p><strong>&#8221;ये नाले आजकल बनकर समन्दर बात करते हैं<br />
मसीहाओं के जैसे ये सितमगर बात करते हैं<br />
कभी कुर्सी के ऊपर से,  कभी टेबुल के नीचे से<br />
हमारे देश की संसद में बंदर बात करते हैं&#8221;</strong></p>
<p>इतना ही नहीं, हर स्तर पर शक्ति का केन्द्रीयकरण किस प्रकार लम्पटों के हाथों में है, अनूप इससे बाखबर हैं।  वे जानते हैं कि  न केवल ये &#8216;बंदर बात करते हैं&#8217; बल्‍िक &#8216;बंदरबांट भी करते हैं। अंधेरे के नुमाइंदों और सरमायेदारों के बीच कैसे घोषित-अघोषित अनुबंध हैं, इसकी भी वे खबर रखते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से<br />
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं<br />
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है<br />
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।&#8221;</strong></p>
<p>इस तरह के मकड़जाल में दुष्यंत सड़कों पर लिखे हजारों नारों को न  देखने की बात जो कहते है, कुछ उसी लहजे में निकम्माई वादों से सावधान हो जाने की बात या मोहभंग सरीखी कोई चीज अनूप के यहां भी है- </p>
<p><strong>&#8221;वादों पर विश्वास हो कैसे<br />
हर वादा इक नारा निकला&#8221;</strong></p>
<p>इस मोहभंग के बाजिब कारण भी हैं। नये प्रयासों को कुचलना व्यवस्था के लिए एक शगल से कम नहीं। जिस परकटे परिंद की कोशिश देखने के बीच दुष्यंत को एक मलाल भी था, उसे कुछ इस रूप में अनूप सीधा-सीधा कह देते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;भिनसार की आंखों में काली रात दीजिए<br />
पंछी जो उड़ना चाहे तो पर काट दीजिए<br />
इंसाफ की खातिर उठे आवाज अगर हो<br />
पिटवाइये लाठी से, हवालात दीजिये&#8221;</strong></p>
<p>इस खतरनाक समय में भी रोशनी की कोंपलों का अपनी तरह का वादा है। कोंपलों से जिस &#8216;मासूमियत&#8217; या &#8216;कोमलता&#8217; का अहसास होता है, यह लगता है कि इन कोपलों को खुद किसी &#8216;सुरक्षा-योजना&#8217; की आवश्यकता तो नहीं, लेकिन जब ये कोपलें फूटती हैं, इस तरह कि, जगत के जीर्ण पत्रों को झरातीं हैं। उजाले का पेड़ खुश होता है, जब ये घोषणा सुनता है-<br />
<strong>&#8221;उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां<br />
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें&#8221;</strong></p>
<p>स्मरण रहे कि इस प्रक्रिया जो जन्म देने वाले सर्जनाकार के लिये यह सहज नहीं है। बड़ी बात जो शेर में होती है उसके लिए उतना ही विप्लव रचनाकार सहता है। युवा गजल-गायक हुसैन बंधु गायकी से पहले एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करते हैं जो यहां प्रासंगिक हो उठता है- <strong>&#8221;हम गजल कहते हैं तो खून जलता है / लोग समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।&#8217;</strong>&#8216; ये मंचीय जुमला कुछ इस तरह साहित्यिक अंदाज में उतनी गहराई से &#8216;रोशनी की कोपलें&#8217; में नजर आता है-</p>
<p><strong>&#8221;उसके मन की पीड़ाओं को कौन समझता है<br />
दुनिया कहती कोयल कितना मीठा गाती है&#8221;</strong></p>
<p>आंदोलन, विप्लव-गान, और वैचारिक-क्रांति की सुगबुगाहट अपने सक्रिय-चेहरे से बहुत पहले की उपज होती है। शांति की तलहटी में उथल-पुथल का ज्वार निहित होता है-</p>
<p><strong>&#8221;बाहर से खामोश बहुत लगता लेकिन<br />
भीतर से हर वक्त सुलगता रहता है&#8221;</strong></p>
<p>इसी तलांतर को महसूस करते हुए अनूप वशिष्‍ठ साहित्य के उस खेल को अस्वीकार करते हैं जो बचाव की मुद्रा में है, वे आक्रमण में ही विजयश्री का वरण मानते हैं, वैचारिक-सर्जना-प्रक्रिया में&#8230;.</p>
<p><strong>&#8221;साहित्य फकत ढाल नहीं आक्रमण भी है<br />
यह आक्रमण हम तुम पे लगातार करेंगे&#8221;</strong></p>
<p>दुष्यंत ने इस जमीन पर जिस तपिश को महसूस किया था। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की रेत पर आम आदमी के पांव किस तरह जलते रहे, उसे आगे अनूप भी महसूस करते हैं, लेकिन नया यह जुड़ता है इस जलन के साथ कुछ आशा की ठंडक भी है। नये दौर में कुछ तो ऐसा घटने को है कि यह कहा जा सके-<br />
<strong>&#8221;रेत पर पांव जलते रहे देर तक<br />
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा&#8221;</strong></p>
<p>&#8216;रोशनी की कोपलें&#8217; के बारे यह अत्यंत जरूरी वक्तव्य हो जाता है कि इस किताब में मन-मस्तिष्क के बीच, समाज और भावनाओं के बीच, वैचारिकता और मन-बहलाव के बीच एक गजब का संतुलन है। दुष्यंत जब &#8216;साये में धूप&#8217; महसूस कर रहे थे तो &#8216;इश्क पर संजीदा गुफ्तगू&#8217; से ध्यान बखूबी हटाया था। वशिष्ठ अनूप ने राजनीतिक-सामाजिक विमर्श के बीच मन की कोमल भावनाओं को शिद्दत से जगह दी है। सौन्दर्य की उपासना जब वे करते हैं तो गजल अचानक गीत के माधुर्य से भर जाती है। उनकी सर्जना-प्रक्रिया में यह बात शायद इसलिए और समाई हुई है कि उन्हें गीत व गजलों की गेयता से न केवल प्रेम रहा है वरन उनके अध्ययन व विशेषज्ञता के केन्द्रबिन्दु में गीत और गजल दोनों का अकादमिक विस्तार है। एक गजल में वे लिखते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;एक अनुबंध कर लिया मन में<br />
जुड़ गये दिल के तार हैं चुप-चुप&#8221;</strong></p>
<p>सौन्दर्य के उनके प्रतिमान सादा हैं। कबीर की अक्खडता अगर कई गजलों में है तो सौन्दर्य <strong>के प्रति सहज आकर्षण-योग भी है-</p>
<p>&#8221;अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच<br />
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी&#8221;<br />
 </strong><br />
&#8221;&#8221;&#8221;&#8221;&#8221;&#8221;&#8221;<strong>वरिष्‍ठ समीक्षकों की नजर में </strong>&#8221;&#8221;&#8221;&#8221;</p>
<p>पुस्तक के फ्लैप पर टिप्पणीकार के रूप में हिन्दी विभाग, बीएचयू के प्रोफेसर <strong>डॉ अवधेश प्रधान </strong>लिखते हैं &#8211;  &#8221;वशिष्ठ अनूप की कविता ने गेय कल्पना के पंखों पर उड़ान भरते हुए अहर्निश प्रकृति, व्यक्ति और समाज के जीवंत जीवन का साक्षात्कार किया है। गजल को आशिक और माशूका, साकी और प्यालों के तंग दायरे से निकाल कर उसे खास हिंदी रूप-रंग देने की जो परंपरा चली उसमें वह अधिक से अधिक जीवन के विशेषतः सामाजिक जीवन के निकट आती गई और दुष्यंत कुमार के बाद से तो उसका किसान चेहरा, राजनीतिक चेहरा, क्रांतिकारी चेहरा और निखरता गया है और उसे निखारने वाले युवा गजलकारों में वशिष्ठ अनूप का खास योगदान है। उनकी गजलों में सत्ता की राजनीति के &#8216;शातिर शिकारियों&#8217; की पहचान है तो उनके खिलाफ असंतोष, विरोध, आंदोलन और क्रांति का आह्वान भी है। कहीं धार्मिक, सामाजिक पाखंडों के विखंडन का कबीराना अंदाज है तो कहीं पर्यावरण की गहरी चिंता है-</p>
<p><strong>&#8221;लाख हाथों जगत को जकड़े है<br />
जग को मिथ्या बता रहा है वो<br />
ये न समझो कि काटता जंगल<br />
सबकी सांसे चुरा रहा है वो&#8221;</strong></p>
<p>वशिष्ठ अनूप ने चिखलदरा अमरावती के नैसर्गिक सौन्दर्य पर लिखा है जो प्रेयसी के मानवीय सौन्दर्य पर भी। ऐकांतिक प्रेम की पुलक के साथ-साथ व्यापक मानव संबंधों की मिठास के चित्र भी उनकी गजलों में हैं। उनकी गजलों की एक बड़ी विशेषता है भाषा और भाव की सादगी &#8211; &#8216;<strong>&#8216;गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था, मां ने हंसकर दुलारा तो अच्छा लगा।&#8221;</strong> उनकी गजलों के बारे में उन्हीं के शेर पेश करता हूं &#8211; </p>
<p><strong>&#8221;एक मां की पुलक, एक कृषक की खुशी<br />
खेत में लहलहाती फसल है गजल<br />
कैसे जीवन से कविता जुड़ेगी पुनः<br />
प्रश्न का सीधा-सा हल है गजल&#8221;<br />
</strong></p>
<p>काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही <strong>प्रोफेसर डॉ बलराज पाण्डेय</strong> ने पुस्तकांरभ में 6 पृष्ठीय समालोचनात्मक टिप्पणी रचनाकार की सर्जना के विषय में इस तरह की है-</p>
<p>&#8221;अपनी रचनात्मक क्षमता के बल पर वशिष्ठ अनूप ने हिन्दी गजल के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी से छिपाने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनके पास सचेत वर्ग-दृष्टि है। यही वजह है कि उनकी गजलों में विषय की विविधता मिलती है। हम सभी जानते हैं कि दुष्यंत कुमार ने हिन्दी गजल को नयी भाषा दी, नया तेवर दिया, उसे नया आयाम दिया। दुष्यंत कुमार की उस पंरपरा को जिन लोगों ने विकसित किया, उनमें वशिष्ठ अनूप का नाम अग्रणी है। वे अपनी जमीन से जुडे़ हुए रचनाकार हैं। आज जबकि साहित्य भी बाजार की चमक-दमक के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहा है, वशिष्ठ अनूप उस चमक-दमक की वास्तविकता को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि साहित्य की दुनिया में प्रसिद्धि पाने के लिए किस प्रकार के संबंध काम करते हैं, लेकिन उन्होंने इन सभी चीजों से अपने को बचाया है और देश के आम जन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज के प्रभु वर्ग के विरुद्ध मोर्चा खोलते ही हैं, उन साहित्य समीक्षकों की भी खबर लेते हैं, जो गीत और गजल को साहित्य की मुख्यधारा से अलग करके देखते हैं। वे उन लोगों की भी खबर लेते हैं जो गजल विधा में संवेदनात्मक गहराई की संभावना नहीं देखते। गजल क्या होती है, इसे समझाते हुए वे लिखते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;हैं जडें इसकी कीचड़ के अंदर मगर<br />
रूप-रस-गंध पूरित कमल है गजल<br />
एक मां की पुलक एक कृषक की खुशी<br />
खेत में लहलहाती फसल है गजल&#8221;</strong></p>
<p>इससे स्पष्ट होता है कि वशिष्ठ अनूप की गजलों का आधार किसान की वह संस्कृति है जो कई प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना करती हुई मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित है। यदि हम कलात्मकता की दृष्टि से भी देखें तो विषय को स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ अनूप बिम्ब भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। गजल की पहचान के लिए &#8216;खेत में लहलहाती फसल&#8217; का बिम्ब अपने आप में कितना अनूठा है&#8217; यह बताने की जरूरत नहीं। अपनी गजल विधा के  प्रति वशिष्ठ अनूप इतने समर्पित हैं कि उन्हें यह कतई मंजूर नहीं कि इसे साहित्य की मुख्य-धारा से काट कर देखा जाये। वे गजल के इतिहास को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि इसे &#8216;राजमहलों में पाला गया, और &#8216;तबलों की थापों&#8217; पर महफिलों में ठुमके लगाने के लिए, कभी विवश किया गया था, लेकिन गजल की आज वह स्थिति नहीं है। वह अब ‘झोंपड़ी की दुलारी’ है तथा उसमें इतनी ताकत आ गई है कि किसानों-मजदूरों के हक के लिए हमलावर की भूमिका में भी अपने आप को प्रस्तुत कर सकती है। वशिष्ठ अनूप साहस के साथ यह घोषित करते हैं कि आज गजल विधा इतनी समृद्ध हो गई है कि उसमें हम आसानी से कबीर और निराला का दुःख देख सकते हैं, घनानंद के &#8216;प्रेम की पीर&#8217; देख सकते हैं, साथ ही मीरा और रसखान का प्यार भी देख सकते हैं। इस प्रकार हम निःसंकोच यह कह सकते हैं कि वशिष्ठ अनूप ने गजल विधा को संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर उसे इतना विस्तृत क्षेत्र दिया है, जिसमें वह खुलकर सांस ले सके, खिलखिला सके। वशिष्ठ अनूप उन गजल लिखने वालों को भी एक प्रकार की सीख देते हैं, जो गजल को सिर्फ मनोरंजन करने वाली विधा मानते हैं।<br />
वशिष्ठ अनूप की गजलों में एक और बात हमारा ध्यान खींचती है, वह है युगबोध। हम जानते हैं कि कोई भी रचनाकार तब तक कुछ सार्थक नहीं रच सकता, जब तक कि उसे अपने समय की पहचान न हो। आज जबकि हमारे समाज में सिर्फ पैसे का रिश्ता बचा हुआ है, लोग अपनों से भी नाता तोड़ते जा रहे हैं, हमें अपना घर अच्छा नहीं लगता, वशिष्ठ अनूप ऐसे में भारतीय पर्व त्यौहारों को सांकेतिक रूप से याद करते हैं-<br />
<strong><br />
पकवानों की खुशबू में रंगों की मस्ती में<br />
दुश्मन को भी गले लगाना अच्छा लगता है<br />
फास्ट फूड और चमक-दमक वाले इस युग में भी<br />
अम्मा के हाथों का खाना अच्छा लगता है<br />
</strong><br />
स्पष्ट है कि वशिष्ठ अनूप को बाजार की चमक-दमक में विश्वास नहीं। ऐसा वही रचनाकार कह सकता है जो बाजार की असलियत जानता हो। हम देखते हैं कि वस्तुओं की गुणवत्ता कम, विज्ञापन ज्यादा हमें प्रभावित कर रहे हैं। वशिष्ठ अनूप बाजार की असलियत इसलिए जान सके हैं क्यों कि उनके पास एक विचारधारा है। उस विचारधारा के आधार पर वस्तुओं का विश्लेषण करने की उनमें क्षमता है और जो रचनाकार ऐसा करने में समर्थ है, उन्हें बाजार की चमक-दमक धोखा नहीं दे सकती। आज सचमुच हमारे मानवीय संबंधों में जो रिक्तता आ गई है, उसमें मां के हाथों का खाना याद करना कितनी बड़ी बात है। ऐसी पंक्तियों को पढ़ते हुए किसे अपनी मां की याद नहीं आयेगी, किसकी  आंखें नहीं भर आएंगीं । बहुत सहजता के साथ संवेदना की गहराई में उतरना वशिष्ठ अनूप की अपनी विशेषता है। आपको लगेगा कि बात कितनी छोटी है, वह कितनी हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी है, लेकिन उसी को वशिष्ठ अनूप जब रचना में ढाल देते हैं तो छोटी बात बड़ी बन जाती है और कुछ देर के लिए हम उसकी अर्थवत्ता पर विचार करने के लिए विवश हो जाते हैं।<br />
	वशिष्ठ अनूप अपने समय के यथार्थ को पहचानने की भी क्षमता रखते हैं। आज की सत्ता व्यवस्था बहुसंख्यक जनता की मूल समस्याओं से हमारा ध्यान अलग करना चाहती है। वह ऐसे-ऐसे मुद्दों को उछाल देती है कि हम अपनी मूल समस्याएं भूल जाते हैं। सत्ता-व्यवस्था की इस साजिश को वशिष्ठ अनूप खूब पहचानते हैं। इसलिए उनकी गजलों में गरीबों की आवाज मुखर हो पायी है। इसके लिए वे चौराहों से, नुक्कड़ो से बिम्ब लाते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;भूख मदारी-सी डुगडुगी बजाती जब<br />
नंगा होकर पेट दिखाना पड़ता है<br />
शांति हमें भी अच्छी लगती है लेकिन<br />
हक की खातिर शोर मचाना पड़ता है।&#8221;</strong></p>
<p>जहां समस्याओं का चित्रण प्रमुख हो, वहां गजल की संरचना भले ही कमजोर पड़ जाये, वशिष्ठ अनूप इसकी परवाह नहीं करते, क्यों कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने देश की जनता, शोषित-पीड़ित जनता का यथार्थ चित्रण करना होता है। ऐसा नहीं है कि आम जनता का दुःख-दर्द उनके लिए अनचीन्हा, अनपहचाना हो। उसे वे दर्शक के रूप में देर से देखने के पक्षधर नहीं है। उसके वे स्वयं भोक्ता भी हैं। दुःख ही जैसे रचनाकार का दोस्त है। यहाँ प्रेमचंद की ये पंक्तियां याद आती हैं कि &#8216;दुःख ही कवि के लिए सुख है। प्रेमचंद का मानना है कि कोई भी रचनाकार जिस दिन सुख-वैभव से रिश्ता जोड़ लेगा, उस दिन वह जनता का रचनाकार नहीं रह जायेगा। वशिष्ठ अनूप भी अपनी गजलों में दुःख से रिश्ता जोड़ते हैं। वे कहते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;कदम-कदम पे दुखों का हुजूम मिलता यूं<br />
युगों के बाद कोई दोस्त ज्यों हहा के मिले&#8221;</strong></p>
<p>यहां दुःखों का ऐसा हुजूम है जो कदम-कदम पर मिलता है। हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अधिकतर लोगों के लिए दुःख ही ओढ़ना और बिछौना है। वास्तव में वशिष्ठ अनूप उन्हीं लोगों के दुःख की बात अपनी गजलों में करते हैं। दूसरों का दुःख भी कवि को जब तक अपना दुःख नहीं लगेगा, तब तक उसकी रचना सार्थक नहीं हो सकती।<br />
	साम्प्रदायिकता और जातिवाद ने हमारे देश को खोखला बनाया है। इधर क्षेत्रवाद ने भी आक्रामक रुख अख्तियार किया है। आश्चर्य तो यह है कि जो लोग ऐसी राजनीति करने वाली ताकतों को बढ़ावा देते हैं, वही राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के नारे भी उछालते हैं। वशिष्ठ अनूप अपनी गजलों के माध्यम से ऐसी ताकतों के प्रति हमें सावधान करते हैं। इसके लिए वे अपने समाज को भी जिम्मेदार मानते हैं। यह सही है कि यदि देश को तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ जनता उठ खड़ी हो जाये तो ऐसी ताकतें दुबारा सर न उठा सकें। देश और समाज की वर्तमान दुरवस्था के लिए हमारी भी जिम्मेदारी बनती है। वशिष्ठ अनूप का मानना है कि यदि दुनिया से जुल्म को मिटाना है तो सबसे पहले हमें अपने अंदर के डर को मिटाना पड़ेगा। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम दूसरों के भरोसे रहने के आदी हो गये हैं। अपनी समस्याओं को या तो हम नियति मान लेते हैं या इन्तजार करते रहते हैं कि कोई आएगा और हमें मुक्ति दिलाएगा। हम उन ताकतों को नहीं पहचान पाते जो जो हमें बांट रही हैं- कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। सत्ता का यह खेल कोई नया नहीं है, उसकी चाल जरूर नयी-नयी लगती हैं वशिष्ठ अनूप का मानना है कि हम पहले ही अगर नहीं चेत पाये तो भविष्य में किन भयावह परिस्थितियों से सामना करना पड़ेगा, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। वे लिखते हैं-<br />
<strong>&#8221;पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम<br />
प्यार में डूबी हुई निश्छल हंसी खतरे में है<br />
लोग अब करने लगे हैं अंधेरे को यूं नमन<br />
चांदनी सहमी हुई है रोशनी खतरे में है&#8221;</strong></p>
<p>इन पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें बरबस ये पंक्तियां याद आती हैं- &#8216;<strong>अंधेरा धूप को धमका रहा है और हम चुप हैं&#8217;</strong><br />
हमारे परिवार और समाज को पूंजीवादी व्यवस्था ने बहुत प्रभावित किया है। हमारे पारिवारिक रिश्तों में बहुत बड़ी दरार आयी है। माता-पिता, भाई-बहन के रिश्तों को भी हम नफा-नुकसान की दृष्टि से देखने लगे हैं। सबसे खराब स्थिति तो बूढे़ मां-बाप की है। जगह-जगह वृद्धाश्रम तो खोले ही जा रहे हैं, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बूढ़ों की देखभाल के लिए सरकार को कानून बनाना पढ़ रहा है। वशिष्ठ अनूप ने इस विकराल होती समस्या पर भी हमारा ध्यान खींचा है। वे लिखते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;दुःखी मां-बाप को करके इबादत हो नहीं सकती<br />
खुदा की ऐसे लोगों पर इनायत हो नहीं सकती<br />
बुजुर्गों को पटक देना अनाथालय में ले जाकर<br />
किसी की हो मगर अपनी रवायत हो नहीं सकती&#8221;<br />
</strong><br />
आज उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बाजारवाद का बोलबाला है। यह पूंजीवाद का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। कहीं-कहीं इसके विरुद्ध आवाजें भी उठी हैं, लेकिन उन्हें दबा दिया गया है। वशिष्ठ अनूप उदारीकरण के खतरों से वाकिफ हैं। &#8230;&#8230;.ऐसी शक्तियों पर वे सीधे प्रहार करते हैं &#8211; </p>
<p><strong>&#8221;लुटेरों की दुनियां के सरदार हैं वो<br />
हमारी हंसी के खरीदार हैं वो<br />
अमने के पुजारी उन्हें मत समझना<br />
चले बेचने अपने हथियार हैं वो&#8221;</strong></p>
<p>वशिष्ठ अनूप बाजारवाद के खतरों को पहचानते हैं। बाजार, जिसकी कोई नैतिकता नहीं होती, जहां आदमी की नहीं, वस्तुओं की महत्ता दिखाई पड़ती है, जहां खरीदने वाले और बेचने वाले की ही सत्ता दिखाई पड़ती है, वहां कविता, गीत और गजल को कौन पूछेगा, दूसरी कलाओं का क्या होगा, विचारहीन बनाने वाली इस व्यवस्था ने हमारे घर को ही बाजार बना दिया है। वशिष्ठ अनूप की बाजार पर यह टिप्पणी बहुत मारक है। वे इस व्यवस्था का विरोध करने वाली शक्तियों के पक्ष में खड़े होने वाले रचनाकार हैं। उनकी गजलों में उनका पक्ष स्पष्ट है। उन्होंने अपनी गजलों में जो सवाल उठाये हैं, उनका जवाब व्यवस्था के पास नहीं हैं। वे कहते हैं-</p>
<p><strong>&#8221;क्यों उठ रहीं हैं लपटें, क्यों हुआ है लाल जंगल<br />
देना पड़ेगा उत्तर, करता सवाल जंगल&#8221;</strong></p>
<p> वशिष्ठ अनूप के ये शब्द उस आदिवासी जनसमूह की ओर संकेत करते हैं, जहां वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिए सशस्त्र संघर्ष जारी है।<br />
ये गजलें अपने समय, समाज और समग्र वैश्विक संरचना से रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। &#8216;बन्जारे नयन&#8217; और &#8216;रोशनी खतरे में है’ के बाद &#8216;रोशनी की कोंपले&#8217; वशिष्ठ अनूप की गजलों का तीसरा संग्रह है तो तमाम निषेधों के बाबजूद प्रकाश की विजय के प्रति आश्वस्त करता है। </p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<strong>समीक्षा के इधर-उधर</strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<p><strong>सर्जनाकार के बारे में -</strong><br />
 डॉ वशिष्‍ठ अनूप, <a href="http://www.bhu.ac.in/index.html" target="_blank">काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी</a> के हिन्दी विभाग मे प्रोफेसर हैं। गोरखपुर जिले के बड़हलगंज अंतर्गत सहड़ौली दुबेपुरा गांव में जन्मे वशिष्ठ अनूप की प्रारंभिक शिक्षा गांव में तथा स्नातक शिक्षा बड़हलगंज में हुई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए और पी-एच.डी. की। वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर से &#8216;हिन्दी गजल: उपलब्धियां और संभावनायें&#8217; विषय पर डी.लिट्. उपाधि प्राप्त की। आपने कुछ दिनों तक नेशनल पी.जी. कॉलेज बड़हलगंज और गोरखपुर विवि में तथा 1994 से पूर्वान्चल विवि जौनपुर के अंतर्गत राज पी.जी. कालेज के हिन्दी विभाग में अध्यापन किया। राजा श्रीकृष्णदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हुए। बाद में काशी हिन्‍दू वि.वि. में आ गये।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/25.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/25.jpg?w=197&#038;h=300" alt="" title="25" width="197" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-448" /></a></p>
<p><strong>सर्जनाकार से रूबरू होना &#8211; डॉ वशिष्‍ठ अनूप को सुनने-समझने और कई जिज्ञासाओं के समाधान का मौका मुझे मिला वाराणसी में ही। इस बारे में &#8216;सर्जना&#8217; पर ही देखे-<a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/category/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8/" target="_blank">&#8216;बारह दिन बनारस में&#8217; शीर्षक से। </strong><em><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dsc00320.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dsc00320.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC00320" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-313" /></a></a><br />
<strong>वशिष्ठ अनूप जी के  प्रकाशन संसार में&#8230;.</strong><br />
&#8230;.बन्जारे नयन (2000), रोशनी खतरे में है (2006) गजल-संग्रह शामिल है। समालोचना ग्रंथो में हिन्दी की जनवादी कविता, जगदीश गुप्त का काव्य-संसार, हिन्दी गजल का स्वरूप और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी गजल की प्रवृत्तियां, हिन्दी गीत का विकास और प्रमुख गीतकार, हिन्दी साहित्य का अभिनव इतिहास, हिन्दी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास, &#8216;अंधेरे में: पुनर्मूल्यांकन&#8217; &#8216;असाध्यवीणा&#8217; की साधना साहित 22 पुस्तकों का लेखन व संपादन उनके द्वारा किया गया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीत, गजल, कविता, कहानी और समीक्षाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं।<br />
उनका सम्पर्क : <a href="http://www.bhu.ac.in/arts/Hindi/index.html" target="_blank">डॉ. वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, </a>वाराणसी &#8211; 221005, मोबाइल &#8211; 09415895812, ईमेल- vdwiwedi@gmail.com</p>
<p><strong>&#8212;&#8211; संग्रह से दो कोपलें&#8212;&#8212;-</strong></p>
<p><strong>एक -</strong></p>
<p><strong>जो मुजरिम हैं वही सब बनके पहरेदार बैठे हैं<br />
वहां संसद में कितने देश के गद्दार बैठे हैं।<br />
किसी अजगर-से ये हर ओर फेंटा मार बैठे हैं<br />
समूचे देश की छाती पे कुछ परिवार बैठे हैं।<br />
कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से<br />
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं।<br />
हमारे देश के कानून की महिमा निराली है<br />
जो काबिल लोग हैं वे इन दिनों बेकार बैठे हैं।<br />
नदी के घाट से पूजा घरों तक भेड़ियों के दल<br />
ये साधू-संत भी हाथों में ले हथियार बैठे हैं।<br />
बुराई नग्न तांडव कर रही दिन-रात सड़कों पर<br />
जो अच्छे लोग हैं सीने में ले अंगार बैठे हैं।<br />
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है<br />
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं। </strong></p>
<p><strong>दो-</strong><br />
<strong>सूखने लगतीं जहां पर हर खुशी की कोपलें<br />
फिर वहीं से फूटतीं हैं जिन्दगी की कोपलें।<br />
वक्त ने जिन पर उगा दी बेबसी की कोपलें<br />
चाहते हैं हम उगें उन पर हंसी की कोपलें।<br />
उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां<br />
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें।<br />
सारी नदियां एक सागर में सिमटती जा रहीं<br />
वह उगाता है लबों पर तिश्नगी की कोपलें।<br />
बस तुम्हारी इक झलक से सिन्धु में उठती लहर<br />
फूटने लगती है दिल में चांदनी की कोपलें।<br />
उनके हाथों पर नई तहरीर लिखनी है हमें<br />
जिनके माथे पर लिखीं बेचारगी की कोपलें।<br />
कुछ नये उद्योग पनपे हैं हमारे देश में<br />
अपहरण, हत्या, डकैती, तस्करी की कोपलें।<br />
भूख से मरते हैं बच्चे और संसद में वहां<br />
बैठकर नेता उगाते मस्करी की कोपलें।<br />
नर्म फूलों पर नहीं तलवार की होती परख<br />
फूटती संघर्ष में ही शायरी की कोपलें।</strong></p>
<p><strong>&#8212;&#8212; और, चलते-चलते &#8212;-</strong></p>
<p><strong>&#8216;सर्जना&#8217; पर बीएचयू के हिन्‍दी अध्‍यापकों के मौलिक व्‍याख्‍यान सहिए कई ऐसी जानाकारियां प्रस्‍तत की गई हैं जो &#8216;सर्जना&#8217; की खास निधि हैं। हिन्‍दी विभाग <a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=100002266303619" target="_blank">बीएचयू के यशस्‍वी विद्यार्थियों का सम्‍पर्क-अंतर्जाल</a> लोकप्रिय बेबसाइट &#8216;फेसबुक पर उपलब्‍ध है।<br />
<a href="http://www.facebook.com/profile.php?id=100002266303619&amp;ref=ts" target="_blank"><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/bhu-hindi-dep1.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/bhu-hindi-dep1.jpg?w=500" alt="" title="bhu hindi dep"   class="alignnone size-full wp-image-452" /></a></a><br />
हिन्‍दी विभाग के विद्यार्थियों से &#8216;सर्जना&#8217; की अपील है कि हिन्‍दी विभाग की बेबसाइट पर विभागीय जानकारी हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करने के लिए पहल करे। विवि की बेबसाइट पर अध्‍यापकों के नामों की सूची भी अंग्रेजी में दी गई है। &#8230;..साथ ही विवि में होने वाली गोष्‍िठयों आदि के समाचार &#8216;सर्जना&#8217; को ईमेल करें। छा्त्र-सम्‍पादकों के नाम सहित।<br />
</strong></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/435/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/435/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=435&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>एक ऐसा जीवन जो सिर्फ विद्यार्थियों के लिए लिख दिया गया</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Aug 2011 04:41:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रभावी-व्यक्तित्व]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रो. चन्द्रपाल सिंह (मेरा यह आलेख मध्‍यप्रदेश शासन, जनसम्‍पर्क विभाग की मुखपत्रिका &#8211; मध्‍यप्रदेश संदेश के जुलाई अंक में प्रमुखता से प्रकाशित है। ई-पत्रिका का प्रष्‍ठ क्रमांक 20-21 अवलोकनीय है।) एक आयोजन चल रहा है एक उन्नत भाल तपस्वी सरीखा व्यक्ति अंचल भर के मेधावी विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा के लिए वार्षिक राशि दे रहा <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2011/08/26/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ab-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=397&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/chandrapal_singh_sikarwar.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/chandrapal_singh_sikarwar.jpg?w=264&#038;h=300" alt="" title="Chandrapal_Singh_Sikarwar" width="264" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-398" /></a><br />
             <strong>प्रो. चन्द्रपाल सिंह </strong><br />
(मेरा यह आलेख <a href="http://www.mpinfo.org/mpinfonew/indexhindi.aspx" target="_blank">मध्‍यप्रदेश शासन, जनसम्‍पर्क विभाग</a> की मुखपत्रिका &#8211; <a href="http://e-sandesh.mpinfo.org/2011/July/index.html" target="_blank">मध्‍यप्रदेश संदेश के जुलाई अंक </a>में प्रमुखता से प्रकाशित है। ई-पत्रिका का प्रष्‍ठ क्रमांक 20-21 अवलोकनीय है।)</p>
<p>     एक आयोजन चल रहा है एक उन्नत भाल तपस्वी सरीखा व्यक्ति अंचल भर के मेधावी विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा के लिए वार्षिक राशि दे रहा है। राशि भी उसकी अपनी पेंशन से। जब तक वेतन मिला उसे बांट दिया, अब पेंशन है तो वह भी विद्यार्थिंयों के लिए। मंच पर प्रदेश के कुछ जाने पहचाने नाम है मंत्री, आएएस अफसर आदि-आदि। यह व्यक्ति अंचल भर के एक सैकडा से अधिक मेधावी विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के नाम सहित उनके अंकों का प्रतिशत दशमलव सहित बोल रहा है। हाथ में कोई सूची नहीं। शतावधानी व्यक्तियों के बारे में सुना करते थे। देखा तो रहा नहीं गया। कार्यक्रम के उपरांत अचानक मंच पर बैठे कोई प्रमुख अतिथि उठते हैं और इस व्यक्तित्व के चरण छूते हैं। पूरा टाउन हॉल भाव-विभोर है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ही वे अनोखे व्यक्तित्व है जिन्होंने अपने जीवन को अनुशासन का पर्याय बना दिया। हम बचपन में सुना करते थे कि शिवपुरी में एक ऐसे आदर्श शिक्षक है जिन्होंने शिक्षक प्रतिबद्ध पेशे के लिए विवाह नहीं किया, लोग उन्हें नियत स्थान पर देखकर अपनी घडी मिला लेते हैं, उन्हें दुनिया भर के देशों की ढेर सारी जानकारी कंठस्थ हैं। हिन्दी और अंग्रेजी व्याख्यान दें  तो श्रोता समय भूल जाते हैं। उस समय जब हम विवेकानंद जी के शिकागो भाषण के बारे में चकित होते तो हमारे शिक्षक प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह को साकार देखने की सलाह देते।  वर्ष 2003 में उनसे भेंट के लगभग 4 साल बाद जब उनसे ग्रहनगर मुरैना में ही भेंट हुई तो एक निमिष में नाम सहित मुझे पुकार लेना उनकी दिव्य स्मृति का प्रभाव मुझे कौंधा गया। उनकी इस अद्भुत स्मृति से दुनिया भर के उनके प्रशंसक अभिभूत है। उन्हें सेवानिवृत्ति के उपरांत चम्बल की धरा पर ही भेज दिया और आज उनकी दिनचर्या सैकडों विद्यार्थियों, जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा राज्य प्रशासनिक सेवा सहित देश-प्रदेश से अनगिनत प्रतिभाओं के समग्र गुरुत्व का प्रतीक बना दिया है। नियत समय से नियत समय उनकी एक-सी दिनचर्या तय है। कुछ वर्षों से  उनके नाम पर युवाओं ने प्रो. चन्द्रपाल सिंह सिकरवार मानव-मूल्य संवर्धन पुरस्कार भी शुरू किया है। उनका नाम पद्मश्री से नवाजे जाने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है।<br />
	आप कल्पना कीजिये ऐसे आदर्श शिक्षक की जिसने 47 वर्षों तक निर्बाध रूप से केवल और केवल ऐसा शिक्षण कार्य किया जो अनोखा कीर्तिमान बन गया। उनके कीर्तिमानों को उनके प्रशंसक और अनुयायी अलिखित विश्वकीर्तिमान का नाम देते है। क्यों प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ने सारे जीवन भर स्वयं को प्रशंसित करने वाले किसी कीर्तिमान के लिए कोई झोली नहीं फैलाई। यहाँ तक कि गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड से पत्र आने के बाबजूद प्रविष्टि नहीं की। उनके कीर्तिमानों में आठ कीर्तिमान तो एक शिक्षक की भूमिका के लिए हैं और दो कीर्तिमान साहित्यकार की भूमिका के लिए। ये कुछ इस तरह हैं-<br />
<strong>पहला कीर्तिमान: कर्तव्‍यनिष्ठा &#8211; </strong><br />
मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में प्रोफेसर के रूप में अपनी 41 वर्ष की शासकीय् सेवा में उन्होंने अपनी कक्षा का एक भी पीरियड नहीं छोडा। राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी को छोडकर उन्होंने अपनी कक्षाएं रविवार एवं अवकाश के दिनों में भी लीं। कक्षाएं न छूट जायें इसलिए वे अपने एकमात्र छोटे भाई की शादी में नहीं गये। इसका उन्हें कोई मलाल नहीं। पिता से कह दिया था कि मैने कर्तव्य को चुना है और मैं खुश हूँ।<br />
<strong>दूसरा कीर्तिमान: वेतन के अलावा कोई धन नहीं &#8211; </strong><br />
अपने 41 वर्ष के सेवाकाल में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपने वेतन के अलावा अन्य कोई राशि जीवन में भी नहीं ली। न तो कभी टीएडीए और न कभी मेडीकल बिल का भुगतान लिया। उन्होंने पीठीसीन अधिकारी तथा प्रशिक्षक के रूप में अनेक विधानसभा एवं लोकसभा के निर्वाचन में कार्य किया लेकिन पैसे के भुगतान हेतु बिल नहीं भरा।<br />
<strong>तीसरा कीर्तमान: अधिकतम विद्यार्थियों का अधिकतम हित -</strong><br />
अपने पूरे जीवनकाल में वे गरीब एवं जरूरत मंद विद्यार्थियों को प्रारंभ से अब तक आर्थिक सहायता देते रहे हैं जो कि प्रवेश शुल्क, पुस्तकों हेतु धन देना, परीक्षा शुल्क आदि के रूप में है। अनेक गरीब अभिभावकों को धन देते रहे हैं जिससे उनके बच्चे उच्च शिक्षा के अध्ययन हेतु बाहर जा सकें या वे रहने के लिये मकान बनवा सकें अथवा वे अपने पुत्र-पुत्रियों की शादी कर सकें। वे अपने वेतन का पचास प्रतिशन इन परिहित के कार्यों पर व्यय करते थे। अब पेंशन का पचास प्रतिशत गरीब विद्यार्थियों एंव जरूरतमंदरों पर खर्च करते हैं।<br />
<strong>चौथा कीर्तिमान: सदाचरण और समय की पाबंदी -</strong><br />
एक ऐसे युग में जबकि घोर अपशब्दों को साहित्य और सिनेमा तक में मान्यता दी जा रही है प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह एक ऐसा अप्रतिम उदाहरण हैं जिन्होने अपने सारे जीवन में एक भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया है। उनकी दिनचर्या का अनुशासन और सादा जीवन देखकर काई भी दंग रह सकता है। अच्छाई के माध्यम से बुराई पर जीत को उन्होंने अपना संकल्प बनाया ही नहीं अपने जीवन में सिद्ध कर दिखाया।शिवपुरी के लोग अपनी घडियां उनकी दिनचर्या से मिलाते थे। वे समय के इतने पाबंद है कि कुछ भी हो वे समय पर निर्धारित स्थान पर हमेशा उपस्थित रहते हैं। वे सिर्फ इसलिए ईश प्रार्थना करते रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य कभी खराब न हो ताकि वे जीवन में कभी भी कक्षा में अनुपस्थित नहीं हों और आश्चर्य नहीं है कि ईश्वर ने उन्हे इसके लिए तथास्तु कह दिया।<br />
<strong>पांचवा कीर्तिमान: इंग्लिश अशोसियेशन -</strong><br />
 धाराप्रवाह अंग्रेजी व्याख्यान के लिए युवाओं में खासे लोकप्रिय और आदरणीय प्रो चन्द्रपाल सिंह ने भारतीय विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास हेतु पीजी कॉलेज शिवपुरी में इंग्लिस अशोसियेशन प्रारंभ किया तथा व्यक्तित्व विकास की विभिन्न विधाओं में चालीस वर्ष तक लगातार और निर्बाध निःशुल्क शिक्षा देते रहे।<br />
<strong>छठवां कीर्तिमान: सामान्य ज्ञान की कक्षाएं -</strong><br />
 उनका सारा जीवन एक सी दिनचर्या के लिए कई दशकों से विख्यात है। वे पीजी कॉलेज शिवपुरी में शाम को चार से छहबजे तक सामान्य ज्ञान की निःशुल्क कक्षाएं लेते थे जिनमें पांच सौ से अधिक विद्यार्थी जमीन पर बैठते थे और प्रतियोगिता परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते थे।<br />
<strong>सातवां कीर्तिमान: शासकीय सेवा का रिकार्ड &#8211; </strong><br />
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार ने सन् 1964 से अंग्रेजी के व्याख्याता के रूप में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपनी शिक्षकीय यात्रा शुरू की। और लगातार 41 साल तक इसी महाविद्यालय में पढाते हुए सेवानिवृत हुए। इस दौरान वे नगर में अपार लोकप्रियता और श्रृद्धा का केन्द्र रहे। सेवानिवृत होने के बाद वे  मुरैना में प्रतिदिन निष्ठा एवं उत्साह के साथ 8 पीरियड रोज पढाते हैं &#8211; साक्षात्कार हेतु तैयारी कराते हैं एवं मार्ग दर्शन देते  है। उनके ये सभी कार्य पूर्ण रूपेण निःशुल्क हैं।<br />
<strong>आठवां कीर्तिमान: कर्मचारी एवं व्यावसायियों के लिए निःशुल्क कक्षाएं &#8211; </strong><br />
कर्मचारी एवं व्यावसायियों को प्रति रविवार निःशुल्क कक्षाएं 11 से 3 बजे तक 6 पीरियड लेते हैं। निःशुल्क अंग्रेजी पढाते हैं। ये कक्षाएं जनवरी से मई तक चलती है।  इस कक्षा में आप चम्बल संभागीय मुख्यालय के अनेक प्रशासनिक अधिकारियों को सहज विद्यार्थी के रूप में प्रो चन्द्रपाल सिंह की अपार मेधा और वात्सल्य का अमृतपान करते हुए देख सकते हैं।<br />
साहित्य के क्षेत्र में भी उनके कीर्तिमान अनूठे है। हर साल एक नियत तिथि को उनकी एक किताब वे खुद प्रकाशित करते है। वे स्वयं एक हजार प्रतियां अपने शिष्यों और प्रशंसकों को वितरित करते हैं। उन्होंने 27 साहित्‍यिक पुस्तके लिखी हैं जिनमें 25 हिन्दी में तथा 2 अंग्रेजी में। उनकी 27 पुस्तकों की 27 हजार प्रतियां छपी।  उन्होंने साहित्य की हर विधा पर लिखा है। जैसे कविता, नाटक, उपन्यास, निबंध, कहानी, खण्डकाव्य्, संस्मरण आदि।<br />
<strong>पहला अलिखित विश्व कीर्तिमान -</strong><br />
 उनकी हिन्दी की 25 साहित्यिक पुस्तकों में से एक है ’’सारा जहाँ हमारा ‘‘। इस  पुस्तक में 207 कविताएं हैं। विश्व में कुल देश 207 हैं। उन्होंने विश्व के प्रत्येक देश पर पूर्ण जानकारी देते हुए एक कविता लिखी है फलस्वरूप 207 कविताएं हैं। ये सारी जानकारी उन्हें कंठस्थ है।  पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस पुस्तक को सराहते हुए उन्हें पत्र भेजा जिसमें उन्होंने इस पुस्तक से बहुत प्रभावित होने की बात स्वीकारी है। खास बात यह कि के लिये गिनेज बुक ऑफ रिकार्डस से भी पत्र् आया है। याद्यपि उन्होंने प्रविष्टि नहीं की है यह कहते हुए कि गिनेज बुक ऑफ रिर्कास में विश्व में सबसे लम्बा या विश्व में सबसे छोटा आदि की तरह के बिन्दुओं पर विचार किया  जाता है।<br />
<strong>दूसरा अलिखित विश्वकीर्तिमान-</strong><br />
प्रो. सिकरवार का द्वितीय् अलिखित कीर्तिमान यह है कि उन्होंने अपनी 27 साहित्यिक पुस्तकों में किसी का भी कोई भौतिक मूल्य् नहीं रखा है। सभी 27 पुस्तकों का नैतिक मूल्य् है जैसे-कर्तव्यनिष्‍ठा, ईमानदारी, परहित, भाईचारा, देशभक्ति मेहनत आदि । प्रो. सिकरवार की साहित्‍ियक यात्रा सन् 1964 में प्रारंभ हुई। पहली पुस्तक जंगल के फूल 1982 में छपी। तब से उनका यह सृजन एक निश्चित गति से चल रहा है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह के जीवन और साहित्य को पूरे विश्व से प्रशंसा प्राप्त हुई है। दुनियां भर के अनेक राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों, पाश्चात्य देशों के पुस्तकालयों और विश्व के सर्वाधिक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से अनेक प्रशंसा-पत्र और साधुवाद पत्र प्राप्त हुए है। जो उनके कक्ष में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं। इनमें से अनेक पत्रों का मजमून पढने का सौभाग्य इस लेखक को भी प्राप्त हुए।<br />
<strong>प्रेरक कायर्क्रम की नियतता का कीर्तिमान &#8211; </strong><br />
प्रो. सिकरवार हर साल जुलाई के अंतिम रविवार को प्रतिभा समान समारोह का आयोजन करते हैं। इसमें मुरैना जिले के स्कूल, कॉलेज तथा यूनीवर्सिटी के टॉपर्स को एक हजार रूपये प्रति विद्यार्थी तथा 1 प्रमाण पत्र् प्रदान किया जाता है। वे स्वयं की इस आयोजन के आयोजक प्रायोजक आदि होते है। बिना किसी अन्य की आर्थिक सहायता से होने वाले उनके आयोजन में वे स्वयं ही मंच संचालक होते है। खास बात यह है सभी गणमान्य अतिथियों की तरह ही दर्शक वर्ग का स्थान आदि पहले से सुनिश्चित होता है। उनका आयोजन किसी अतिथि की बाट नहीं जोहता और नियत समय पर मिनिट और सेंकड के हिसाब से शुरू हो जाता है।  इसी कायर्क्रम में वे मध्‍यप्रदेश के शिक्षाविदो जैसे कुलपति, प्राचार्य, प्रोफेसर, डीलिट, पीएचडी, अभिभावकगण, मेडीकल, इंजीनियरिंग, यूपीएससी तथा पीएससी से चयनित व्‍यक्‍ितयों का अभिनंदन करते हैं। पूरे कार्यक्रम के खर्चे का वहन स्‍वयं करते हैं। इस कार्यक्रम को पिछले 6 वर्षों से टाउन हॉल, जीवाजी गंज मुरैना में करते हैं। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने किसी भी अत्याधुनिक सुविधा का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं किया। वे मोबाइल नहीं रखते है। उनक पते पर दूरभाष क्रमांक पर बातचीत या उनसे मिलने का समय भी नियत है। न उससे पहले और न उसके बाद। उनका पता है- श्रीराम कुटीर, टी.एस.एस. महाविद्यालय के समीप, गणेशपुरा मुरैना (म.प्र.) फोन नं. 07532-226639</p>
<p><strong>जीवन पर एक दृष्टि:</strong><br />
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार का जन्म 3 मई सन् 1943 को बागचीनी, जिला मुरैना में हुआ। उनकी हाईस्कूल तक शिक्षा मुरैना, भिण्ड एवं झाबुआ मध्‍यप्रदेश में हुई। प्री-यूनीवर्सिटी एवं बीए पीजी कॉलेज मुरैना से किया। एमए अंग्रेजी में एमएलबी कालेज ग्वालियर में टॉप किया। एमए राजनीति शास्त्र में उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये । सम्मान स्वरूप उन्हें जीवाजी विश्वविद्यालय  द्वारा 3 गोल्ड मेडल प्रदान किये गये। विश्व प्रसिद्ध्  अंग्रेजी साहित्यकार टॉमस हार्डी पर उन्होंने पीएचडी की तथा महानतम अंग्रेजी नाटककार, विलियम शैक्सपियर पर उन्होंने डीलिट की। प्रो. सिकरवार अंग्रेजी में डीलिट करने वाले चम्बल संभाग के पहले व्यक्ति रहे। उनके मार्गदर्शन में 11 शोधार्थी अंग्रेजी में पीएचडी कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में वे वर्ष 1964 से 2005 तक रहे। इस दौरान वे यूपीएससी, पीएससी तथा विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं हेतु वे निःशुल्क मार्गदर्शन देते रहे। निःशुल्क कैरियर गायडेंस देना उनका महत्वपूर्ण कार्य है। उनके द्वारा पढाए गये हजारों विद्यार्थी विभिन्न सेवाओं के लिये चयनित हुए हैं तथा हो रहे हैं। जीवाजी विश्वविद्यालय् की महासभा के प्रो. सिकरवार 2 बार सदस्य् कला संकाय् के एक बार डीन तथा कार्यपरिषद के एक बार सदस्य रहे हैं। अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष के रूप में वे सन् 2005 में लगभग 41 वर्ष की शासकीय् सेवा के बाद सेवा निवृत्त हुए। शिवपुरी के नागरिकों ने उनके सेवानिवृत्ति के दिन अत्यन्त गरिमामय तरीके से नागरिक अभिनन्दन किया,  । सेवानिवृत होने के बाद वे चम्बल संभाग के मुख्यालय मुरैना को गौरवान्वित करते हुए निःशुल्क अध्यापन कार्य कर रहे है।  वे प्रतिदिन साढे दस बजे से डेढ बजे तक 4 पीरियड लगातार अंग्रेजी तथा सामान्य् ज्ञान की कक्षा प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठ रहे विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क लेते हैं।  तथा शाम को 5 बजे से 8 बजे तक पीरियड प्रतिदिन साक्षात्कार की तैयारी कराते हैं और कैरियर गाइडेन्स देते हैं। इस तरह प्रतिदिन 8 पीडियड में पूर्ण निष्ठा के साथ निःशुल्क शिक्षण, साक्षात्कार की तैयारी तथा कैरियर गाइडेन्स का कार्य करते हैं। उनके सफल विद्यार्थियों की संख्या गिनना और सूची बनाना एक मुश्किल काम है। </p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/397/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/397/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=397&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">Chandrapal_Singh_Sikarwar</media:title>
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	</item>
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		<title>फिर दिल्ली में बात चली है &#8230;&#8230;&#8230;..</title>
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		<pubDate>Thu, 18 Aug 2011 02:07:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[नवगीत]]></category>

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		<description><![CDATA[यह नवगीत कुछ महीनों पहले लिखा था, जाने कौन-सी लहर में लिख दिया था। अभी तक केवल अभिन्न प्रेरक व मित्र हितेंद्र जी को फोन पर सुनाया था। लगता है आज इसे जारी करने का समय आ गया है.। बाबा नागार्जुन को समर्पित है&#8230;&#8230;. फिर दिल्ली में बात चली है सारा सिस्टम बदलेगा संविधान संसोधन <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2011/08/18/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=340&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>यह नवगीत कुछ महीनों पहले लिखा था, जाने कौन-सी लहर में लिख दिया था। अभी तक केवल अभिन्न प्रेरक व मित्र हितेंद्र जी को फोन पर सुनाया था। लगता है आज इसे जारी करने का समय आ गया है.। बाबा नागार्जुन को समर्पित है&#8230;&#8230;.<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/images.jpeg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/images.jpeg?w=500" alt="" title="images"   class="alignnone size-full wp-image-341" /></a><br />
<strong>फिर दिल्ली में बात चली है सारा सिस्टम बदलेगा<br />
संविधान संसोधन होगा औ‘ सरक्यूलर निकलेगा।<br />
फिर दिल्ली में&#8230;&#8230;&#8230;<br />
कोई अफसर नहीं हिलेगा, बाबूजी भी बैठेंगे<br />
कार्यालय के बाहर प्रहरी नहीं किसी से ऐंठेंगे।<br />
कोई खिड़की बंद न होगी, सारे काम फटाफट हों<br />
डण्डे वाला कोई न होगा, ना लोहे के फाटक हों।<br />
बंद लिफाफे नहीं चलेंगे, ना अब कोई बहकेगा<br />
संविधान संसोधन&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.<br />
फिर दिल्ली में&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
गांव-गांव में सड़क बनेगी, पहुंच मार्ग निर्मित होंगे<br />
फसल हाथ की हाथ बिकेगी, पूरे दाम निहित होंगे<br />
नाली डम्बर-रोड खरंजा सरपंचों का खेल नहीं<br />
ऑडीटर जनता ही होगी शिकवा थाना जेल नहीं।<br />
अब केवल प्रधान का बंगला नहीं गांव में चमकेगा<br />
संविधान संसोधन&#8230;&#8230;&#8230;..<br />
फिर दिल्ली में&#8230;&#8230;.<br />
सारे मंत्री ‘युवक’ होंगे दौड़भाग करने वाले<br />
मोटे-मोटे घर बैठेंगे पैसे पर मरने वाले।<br />
जिनके चेहरे कुटिल न होंगे जनता पढ़ लेगी जिनको<br />
आसंदी पर वही जमेंगे बत्ती-लाल मिले उनको।<br />
हथियारों से घिरे न होंगे ना बड़ा काफिला निकलेगा<br />
संविधान संसोधन&#8230;..<br />
फिर दिल्ली में&#8230;&#8230;<br />
कितना सुंदर सपना है ये कितनी बढ़िया है युक्ति<br />
लिखते-लिखते याद आ गई कवि प्रसाद की ये पंक्ति -<br />
मिला कहां वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया<br />
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया<br />
जल्दी सपना पूरा होगा शीघ्र सितारा चमकेगा<br />
संविधान संसोधन होगा&#8230;&#8230;..<br />
फिर दिल्ली में &#8230;&#8230;..<br />
</strong></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/340/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/340/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=340&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>बारह दिन बनारस में</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Jun 2011 11:14:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[यात्रा-प्रवास]]></category>

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		<description><![CDATA[सुदामा अंदर देखि डरे&#8230;&#8230; &#8216;सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो&#8230;&#8230;... &#8216;आदमी का डर&#8217; एक साहित्यिक जुमला हो सकता है। मगर जब ऐसी रेलगाड़ी के डिब्बे में चढ़ना हो जहाँ आदमी की &#8230;&#8230;और सिर्फ आदमी की मौजूदगी डर का कारण हो जाये तो जुमले का असली मतलब समझ आता है बनारस पहुँचना <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2011/06/15/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=280&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5197.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5197.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5197" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-300" /></a></p>
<p><strong>सुदामा अंदर देखि डरे&#8230;&#8230;<br />
&#8216;सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो&#8230;&#8230;.</strong>..</p>
<p>     	&#8216;आदमी का डर&#8217; एक साहित्यिक जुमला हो सकता है। मगर जब ऐसी रेलगाड़ी के डिब्बे में चढ़ना हो जहाँ  आदमी की &#8230;&#8230;और सिर्फ आदमी की मौजूदगी डर का कारण हो जाये तो जुमले का असली मतलब समझ आता है बनारस पहुँचना था 9 तारीख की सुबह । प्रशिक्षण शिविर में समय पर पहुँचने की जिद में बुन्देलखण्ड का आरक्षण उपेक्षित कर पहुंच गये आगरा से गांधीधाम एक्सप्रेस में बैठने। आरक्षण मिल गया था। सोचा सुबह जल्दी पहुंच जायेंगे। एक्सप्रेस के नियत डिब्बे में झाँके तो होश उड़ गयें पटनियां भाइयों से डिब्बा अटा पड़ा था। काहे का रिजर्वेशन साहब ! दोपहर दो बजे तीनों बर्थ खुली और एक एक बर्थडे पर आठ आठ आदमी। न घुसने का रास्ता न सीट तक पहुंचने का। पहुंच भी गये तो मिलना क्या था। घुस भी गये तो टायलेट तक आना पानीपत के युध्द से बड़ा। खास गंध से डिब्बा अटा पड़ा। खिड़की से ही देखकर बिफर पड़े &#8230;&#8230;डर&#8230;..क्रोध घबराहट और मानवीय निवेदन का मिला-जुला रूप देखकर भीतर के लोग सकते में आ गये। सारे लोगों ने मिलकर अंदर खींच लिया। </p>
<p><strong>ताजमहल तबेले और धोबीघाट&#8230;..</strong><br />
    यमुना के पुल से ताजमहल का नजारा &#8230;..आ हा! लगता है शाहेजहाँ की जिंदगी भर की कमाई लगी है मगर नीचे यमुना पर नजर जाते ही मन खट्टा हो गया यमुना को हमने गंदे नाले में तब्दील कर दिया है। जल में धोबीघाट चल रहा था और इस किनारे पर भैंसों के तबले दिख रहे है यह वही जगह है जहाँ स्लमडॉग को फेंका था। आखिरकार भीड़ में फसे हुए सुबहे-बनारस देखते न देखते काशीवासी हो जाने की स्थिति के साथ पहुँच गये। मौका था देश भर के हर हिस्से से आने वाले स्नातकोत्तर हिन्दी शिक्षकों के प्रशिक्षण व सेमीनार का।</p>
<p><strong><strong>कौन-कौन मिले सहभागी &#8230;&#8230;&#8230;..</strong><br />
&#8216;लोग मिलते गये कारवां बनता गया&#8217;</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dsc00295.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dsc00295.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC00295" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-303" /></a></p>
<p>    केन्द्रीय विद्यालय रेल कारखाना देश भर के कोने-कोने से आये हिन्दी शिक्षकों का जमावड़ा होता गया। अगले दिन तक सभी आपस में धीरे-धीरे परिचित हो चले। संख्या का अर्धशतक पूरा हो चला था। सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं के 8-8   9-9 में अकादमिक समूह बने जिनके नाम थे  &#8211; प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी, प्रेमचंद और भारतेन्दु। काशी बनारस की इस भूमि से जुड़े इन कालजयी साहित्यकारों के नाम के समूह का एक विशेष अपनापन यहाँ लगना स्वाभाविक ही था।  निदेशक श्री विजय कुमार जी, सहनिदेशक श्री एस एन शुक्ल, संसाधक डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय  और श्री विन्ध्याचल गुप्ता से परिचय हुआ।<br />
49 प्रतिभागी साथियों से मिलकर लगा कि सारे देश का एक छोटा सा रूप सामने है। कोलकाता संभाग से 5 साथी थे। डॉ. श्रीमती रंजना त्रिपाठी, श्रीमती अनुराधा पाण्डेय, श्री अमरनाथ, श्री ब्रजभूषण पाठक और श्री प्रमोद कुमार शर्मा। पटना संभाग से 2 प्रतिभागी डॉ. पूनम चौधरी और डॉ. विनीता राय, हैदराबाद संभाग से 4 प्रतिभागी श्री राजेन्द्र कुमार विश्‍वकर्मा, श्री सत्यनारायण सदानंद, श्री उमेश दोषी और डॉ. जी. मल्लेशम, लखनऊ संभाग से श्रीमती रजनी त्रिवेदी, श्री संतोष कुमार, श्रीमती गायत्रीदेवी,  ओर श्री कृष्णकुमार पाण्डेय, गुवाहाटी संभाग से श्री धीरेन्द्र कुमार झा श्रीमती डॉ. निर्मल स्मिता कौल, श्री चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव, श्री कैलाशचन्द्र रैगर, श्री शरीफ आलम, श्री अश्‍विनी कुमार राय, श्री दीपक और श्री रवीन्द्र कुमार, भोपाल संभाग से श्रीमती अमिता शर्मा, श्री विश्‍वम्भर नाथ मिश्र,श्री प्रदीप कुमार सिंह और श्री किशोर पांचाले, सिल्चर संभाग से श्री बी.एल.जे. सारण, श्री मनोज कुमार सिंह, श्री धर्मवीर सिंह, श्री राजेश कुमार त्रिपाठी, श्री शशिभूषण कुमार, और श्री रामनारायण सिंह, बैंगलुरू संभाग से श्री उदयकांत ठाकुर, श्रीमती रेवती अय्यर, श्रीमती एन.सत्यलक्ष्मी, श्रीमती आर. शोभारानी, श्री तेजनारायण सिंह, और डॉ. रामकुमार सिंह (मैं), भुवनेश्‍वर संभाग से श्रीमती प्रणति सुबध्दि, श्री माइकल बैंग, और डॉ. आशुतोष पाण्डेय, चैन्नई संभाग से श्री शत्रुघ्न सिंह, डॉ. उमापति जैन, श्रीमती शोभना पी.के., श्री रतनलाल, श्रीमती शहिनशा शेख और श्रीमती लेखा टी.एल.।</p>
<p><strong>&#8216;शिक्षक बनाये स्वयं को दक्ष और समर्पित : श्री बी एल राय</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5094.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5094.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5094" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-412" /></a><br />
   9 तारीख को पुस्तकालय-कक्ष में परिचय कार्यक्रम और शुभारम्भ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में  मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री एल बी राय, मुख्य कार्मिक अधिकारी डीजल रेल कारखाना एवं अध्यक्ष विद्यालय प्रबंधन समिति ने कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में केवि शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों  और सेमीनार का दक्षता विकास में बहुत योगदान है।<br />
पहले सत्र से ही नियमित गतिविधियाँ शुरू हो गयीं। शिविर के निदेशक और संसाधकद्वय ने रूपरेखा तय कर दी।<br />
भोजन के बाद दूसरे सत्र में तीन अक्षरों के उस डरावने शब्द से रचनात्मक सामना हो गया जिसे &#8216;परीक्षा&#8217; कहते हैं। सार्थक प्रश्‍नावली के रूप में सभी प्रतिभागियों ने पूर्वज्ञान परीक्षा दी।</p>
<p>दूसरा दिन&#8230;&#8230;..<br />
<strong>हिन्दी कविता ने तय किये हैं अनेक पड़ाव : डॉ. प्रभाकर सिंह<br />
</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5270.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5270.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" title="DSCF5270" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-305" /></a><br />
    काशी हिन्दू वि.वि. के हिन्दी विभाग के प्रवक्ता डॉ. प्रभाकर सिंह ने अपने व्याख्यान में धाराप्रवाह रूप से हिन्दी कविता की विकास यात्रा को न केवल सरलता से स्पष्ट किया बल्कि उतनी ही कुशलता से प्रवृत्तियों की विवेचना भी की। काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य तो लिये ही दार्शनिक और पाश्‍चात्य से दृष्टि को समुचित जगह देते हुए समकालीन कविता को समझने के लिए जरूरी दृष्टि को स्पष्ट किया। भारत भर में चलाये जा रहे हिन्दी पाठयक्रम में संकलित आधुनिक कवियों की कविताओं की भी उन्होंने व्याख्या की। खासकर मुक्तिबोध और कुंवर नारायण को समझने में एक नया विजन दिया।<br />
दूसरे सत्र में शिक्षकों की अकादमिक गतिविधियाँ सुचारू रहीं। इस बारे में शिविर पत्रिका में कुछ इस प्रकार वर्णित है- &#8221;भोजनोपरान्त श्रीमती रेवती अय्यर एवं अन्य साथियों द्वारा केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा प्रायोजित थिंक क्वेस्ट डॉट कॉम से संबंधित तमाम उपयोगी जानकारियों  एवं उसके विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। इसके पश्‍चात श्रीमती अय्यर द्वारा प्रसाद सदन के प्रतिभागियों को संगणक कक्ष में थिंक क्वेस्ट डॉट कॉम पर विभिन्न प्रायोगिक कार्यों का प्रशिक्षण दिया गया। डॉ. रामकुमार जी ने भी थिंक डॉट कॉम पर सारगर्भित जानकारी सदन को उपलब्ध कराई।&#8221; (पंत समूह का प्रतिवेदन पृष्ठ- 25)</p>
<p><strong>जीवन-कौशलों पर सार्थक बहस &#8230;&#8230;.</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5258.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5258.jpg?w=300&#038;h=293" alt="" title="DSCF5258" width="300" height="293" class="alignnone size-medium wp-image-310" /></a></p>
<p>    11 तारीख की उल्लेखनीय गतिविधियों में से एक है जीवन-कौशलों के बारे में सार्थक बहस । श्री विशम्भर नाथ मिश्र ने जहाँ अपने चिरपरिचित दार्शनिक अदांज में भारतीय ग्रंथों और अंग्रेजी में पाश्‍चात्य दर्शन की परिभाषाओं के साथ अपनी बात रखी। इसके बात एक ऐसे वक्ता से मेरा पहला परिचय हुआ जिसने अंतत: मुझे गहरे तक प्रभावित किया। ये हैं श्री धीरेन्द्र कुमार झा&#8230;.। यहाँ बोलते हुए श्री झा ने जीवन-कौशलों का एक शिक्षाविद शोधार्थी की तरह तकनीकी ढंग से परिचय दिया। जीवन-कौशलों पर उनका पेपर भी एनसीईआरटी में प्रस्तुत हुआ है ऐसी जानकारी उन्होंने दी।<br />
     चूँकि विषय था &#8211; जीवन-कौशल जिनमें प्रमुख रूप से हमारे विद्यार्थियों में सामाजिक कौशल, विचार कौशल और वार्ता कौशल विकसित करने का लक्ष्य सामने रखा गया था। ऐसी स्थिति में अपनी बारी आने पर मैंने हनुमान की प्रबंधन क्षमता और जीवन कौशल के माध्यम से विषय को स्पष्ट करने का प्रयास किया जो मित्रों को बहुत पसंद आया। इस बारे में अभिमत रहा &#8211; &#8221;डॉ. रामकुमार सिंह ने पाश्‍चात्य व भारतीय जीवन-मूल्यों के बीच सूक्ष्म अंतर स्पष्ट किये। महाबली हनुमान  तथा सुग्रीव आदि के माध्यम से अंतर्निहित जीवन-कौशल को स्पष्ट किया।&#8221;(स्मारिका पृष्ठ &#8211; 26 से साभार)</p>
<p><strong>एनसीएफ के व्यावहारिक पक्ष पर जोर देने की जरूरत : डॉ. निरंजन सहाय<br />
प्रश्‍न पूछना बच्चों का लोकतांत्रिक अधिकार</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5141.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5141.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5141" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-308" /></a><br />
       काशी विद्यापीठ के शिक्षाविद् प्रो. (डॉ.) निरंजन सहाय न केवल राष्ट्रीय पाठयचर्या के विशेषज्ञ हैं बल्कि वे इसकी विभिन्न समितियों तथा हिन्दी पाठयपुस्तक निर्माण कार्य समितियों के सदस्य रहें हैं इस नाते उनसे संवाद होना एक खास उपलब्धि है। 12 तारीख को वे सेमीनार में आये। एनसीएफ-2005 के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाष डालते हुए उन्होंने शिक्षण के क्षेत्र में व्यापक सामाजिक सरोकार की बात करते हुए, बच्चों द्वारा प्रश्‍न पूछने के जनतांत्रिक अधिकार का समर्थन किया। उन्होने रटने की अपेक्षा समझने की प्रक्रिया पर बल दिया। साथ ही ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ने की अनिवार्यता पर बिंदुवार विवेचना व विश्‍लेषण करते हुए यह कहा कि आज की शिक्षा प्रणाली शिक्षक केन्द्रित न होकर सामाजिक सरोकार, पर्यावरण, जैव विविधता,व तात्कालीन परिस्थितियों के प्रति भी केन्द्रित होना चाहिए। तथा आज के अध्यापकों को इस तरह का वातावरण निर्मित करना चाहिए जिससे बच्चे अपने ढंग से विचार व्यक्त कर सकें।<br />
     डॉ.निरंजन सहाय आ रहे हैं यह एक दो दिन पहले से चर्चा चल रही थी और मैं अनेक प्रश्‍न उनके सामने रखना चाहता था ताकि सार्थक संवाद के साथ अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सके। परंतु इस दिन  संगणक कक्ष में तैनाती होने से संवाद नहीं हो पाया । संसाधक श्री पाण्डेय जी ने बताया कि डॉक्टर साहब ने एक दिन और आने का वायदा किया है। </p>
<p><strong>&#8230;&#8230;और बनारस से रूबरू होने का वक्त</strong></p>
<p>     आखिर 14 तारीख को वह दिन आ गया जिसकी सभी को प्रतीक्षा थी। मौका था बनारस भ्रमण का। श्री प्रदीप कुमार सिंह के संयोजन में दल निकल पड़ा। बस सबसे पहले जाकर रूकी कबीर के द्वार पर। मेरे लिए यह अत्यंत हर्ष और भावुकता का विषय था जबकि मैं कबीर के प्राकट्य स्‍थल लहरतारा में खड़ा था। आज जबकि &#8216;सर्जना&#8217; के लिए यह आलेख लिख रहा हूँ तब कबीर की जयन्ती है। यह एक सुखद संयोग है।<br />
 <a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02049.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02049.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02049" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-391" /></a></p>
<p>(कबिरा तेरे द्वार पर&#8230;&#8230;-एक)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02044.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02044.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" title="DSC02044" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-389" /></a></p>
<p>(कबिरा तेरे द्वार पर&#8230;..-दो)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02045.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02045.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02045" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-390" /></a></p>
<p>(कबीर प्रतिमा, कबीर प्राकट्य स्‍थली, लहरतारा, काशी)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5158.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5158.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5158" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-418" /></a></p>
<p>( कबीर प्राकट्य स्‍थली, लहरतारा, काशी)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02042.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02042.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02042" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-387" /></a></p>
<p>     यहाँ से हम लोग सीधे सारनाथ रवाना हुए। खास बात यह है बुद्ध से जुड़े इस महान स्थल पर इन दिनों विशेष महोत्सव चल रहा था। सारनाथ में सबसे पहले श्री दिगम्बर जैन मन्दिर के दर्शन किये। यहाँ जैन धर्म के 11 वें तीर्थंकर श्री श्रेयांसनाथ की गर्भ-जन्म व तपोस्थली है। जो सिंहपुरी नाम से ख्यात है।<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02054.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02054.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02054" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-394" /></a></p>
<p>( श्रीलंका के श्री अंगारिका धर्मपाल की प्रतिमा)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5172.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5172.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5172" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-419" /></a></p>
<p>इसी मंदिर के पास स्थित बुद्ध का विशाल मंदिर और उसमें स्थापित भव्य प्रतिमा के दर्शन किये। मंदिर मे बुद्ध की प्रिय शांति बनाये रखने के विशेष निर्देश श्रृध्दालुओं को दिये गये। यहीं प्रांगण में तथागत ने अपने पाँच प्रिय शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया। इस स्थान पर उस वृक्ष के नीचे लगी बुद्ध की सभा को देखकर मैं उसी काल में पहुँच गया और लगा बुध्द मुझसे ही संबोधित हैं।</p>
<p>(बुद्धं शरणम् गच्‍छामि&#8230;&#8230;बुद्ध का प्रथम उपदेश)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02067.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02067.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02067" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-408" /></a></p>
<p>(बुद्ध का प्रथम उपदेश &#8211; वृक्ष)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02065.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02065.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" title="DSC02065" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-407" /></a></p>
<p>(मुख्‍य स्‍थल &#8211; ध्‍यानस्‍थ बुद्ध की प्रतिमा)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02060.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02060.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02060" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-406" /></a></p>
<p>(मुख्‍य स्‍थल &#8211; ध्‍यानस्‍थ बुद्ध मंदिर प्रवेश द्वार)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02059.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02059.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" title="DSC02059" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-405" /></a></p>
<p>(बुद्ध और बाजार&#8230;&#8230;.)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02057.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02057.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02057" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-404" /></a></p>
<p>(संघ शरणम् गच्‍छामि&#8230;.सारनाथ में शिक्षकों का दल)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5188.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5188.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5188" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-420" /></a></p>
<p>(हम पंखों से नहीं, हौसलों से उडान भरते हैं&#8230;तथागत से भेंट करने आये श्री विश्‍वकर्मा)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02056.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02056.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" title="DSC02056" width="225" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-403" /></a></p>
<p>     मेरे मन में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तम्भ को समक्ष में देखेने की बड़ी जिज्ञासा थी। बातचीत में पता चला कि स्तूप से स्तम्भ गिर गया था इसलिए आजकल संग्रहालय में रखा गया है। सभी लोग संग्रहालय की ओर बढ़े। भाई प्रदीप कुमार सिंह जी ने सभी प्रबंध किये। मोबाइल और कैमरे अंदर नहीं ले जा सके तो मुझे कुछ मायूसी हुई। मैं चाहता था कुछ खास फोटोग्राफ सर्जना पर जारी कर सकूँ।<br />
      संग्रहालय बड़ा भव्य और अंतर्राष्ट्रीय है। प्रवेश करते ही सामने भारतीय राजसी अस्मिता की पहचान आदमकद अशोक स्तम्भ रखा है ऊपर का चक्र अलग स्थापित है। बाकी संरचना कमोवेश अभी तक सुरक्षित है । संग्रहालय में आधा दर्जन से अधिक वातानुकूलित वीथिकाएँ हैं जहाँ शताब्दियों पार की छोटी बड़ी पाषाण प्रतिमाएं व दुर्लभ पुरातात्विक वस्तुएँ रखी गयीं हैं। खास बात यह है कि एटीएम मशीन की तरह लगे कम्प्यूटरों से किसी भी वीथिका और कृति की विस्तृत जानकारी यहाँ ऑनलाइन की गई है। दो जापानियों युवतियों से शिव की विशाल प्रतिमा के बारे में सांकेतिक बातचीत बड़ी रोचक रही। सभी वीथिकाओं में सर्वप्रधान आकर्षण है बुद्ध की केन्द्रीय विशाल प्रतिमा जो अपने निर्माण काल को ज्यों का त्यों उपस्थित कर देती है। मैं करीबन 30 मिनट पर इस पर सम्मोहित रहा। संसाधक श्री पाण्डेय जी ने झकझोरकर कहा कि अवधूत बनने से काम नहीं चलेगा, परीक्षा में इस यात्रा से सवाल पूछे जाने हैं&#8230;.सभी का ठहाका गूंज गया। मुझे दो तीन अन्य चीजों ने और आकर्षित किया। महाशिव की दिव्य और भव्य प्रतिमा ने बड़ औदात्य प्रदान किया। इसके अलावा देवनागरी के विभिन्न रूपों के विकासक्रम को प्रवेश वीथिका में ही बांयी ओर एक विशाल पेंटिग की तरह लगाया गया है इसका छायाचित्र नहीं ले पाने का बड़ा खेद है। मैं इसे अपने विद्यार्थियों को बताना चाहता था। संग्रहालय में कुछ मूर्तियों के स्थान रिक्त थे केवल फोटो लगे थे ओर लिखा था कि मूर्ति चीन में चल रही प्रदर्शनी के लिए गई हैं। मैंने गौर किया कि जो मूर्तियां चीन ने चयनित की हैं उन सभी में बुद्ध के चेहरे एन्थ्रोपोलोजिकल ढंग से चीन के मानवीय शक्लों से मिलते हैं। कैसे महामानव को अपने अपने दृष्टिकोंण से दुनियाँ ने देखा है।<br />
संग्रहालय को देख चुकने के बाद सभी चिड़ियाघर देखने गये। मेरी दिलचस्पी इसमें नहीं पुरास्थलों अधिक थी। मैं अपने कुछ साथियों श्री टी एन सिंह जी, श्री विश्‍वकर्मा जी, भाई प्रमोद जी, माइकल सर, और मनोज जी के साथ एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। यहां से निकलकर हम लोग चौखण्डी स्तूप पहुंचे जहां सभी ने भोजन ग्रहण किया। स्तूप पर ऊपर चढ़ने की होड़ शुरू हो गई।</p>
<p>(चौखण्‍डी स्‍तूप, जहां बुद्ध को प्रथम शिष्‍य मिले)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02076.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc02076.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC02076" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-409" /></a></p>
<p>      आगे एक स्थान पर बस रुकी। पाण्डेय जी ने बताया कि यह भारत माता का मंदिर है। देखा तो नयी अनुभूति हुई। सोच रहा कि हाथ में झण्डा लिये सिंहवाहिनी मां भारती की मूर्ति होगी। मगर ऐसा नहीं था। फर्श पर संगमरमर से सम्पूर्ण भारत का नक्शा दिव्य ढंग से उकेरा गया था। हिमालय से सागर तक हर स्थल के नाम उकेरे गये थे। यही है हमारी भारत माता। लगा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी  की बात यहाँ साकार है।<br />
	      मेरा और कुछ अन्य साथियों का विशेष मन प्रेमचंद के गाँव लमही में जाने का था। प्रसाद जी के घर जाने का था। लेकिन पता चला कि रास्ते में एक पुलिया का निर्माण होने से लमही जाने का रास्ता इस ओर से जाने का बंद है। अगर दूसरे रास्ते से जाते हैं तो तकरीबन 15 किमी से ज्यादा अतिरिक्त लगेगा और जाम भी हो सकता है। इस तरह बस वाले ने असमर्थता जाहिर कर दी। फिर फैसला हुआ कि अंतिम पड़ाव से पहले काशी नरेश के किले की सैर कर ली जाये।<br />
       रामनगर पहुंचने में लगभग आधा घंटा लगा। किले की ओर बढ़ते हुए दोनों ओर बने भवनों की संरचना को देखकर अनुमान हो गया कि किस तरह राजा की सवारी निकलती होगी। पता चला यहाँ की रामलीला भारतप्रसिध्द हुआ करती थी। बाद में मुरैना पहुंचने पर मुझे पता चला कि करह आश्रम के संत रामदास जी महाराज भी काशी की रामलीला में राम का पाठ अदा किया करते थे। मुझे बहुत खुशी हुई। अस्तु&#8230;&#8230;किले में अब उजड़ी हुई सल्तनत का ही आभास होता है। वर्तमान राजा श्री अनंत नारायणसिंह एक भाग में निवास करते हैं। शेष हिस्से की पुरानी चीजों जैसे बघ्घियाँ, वेषभूषा, संगीत का सामान, बंदूकें आदि। ज्योतिषी घड़ी अतिविशिष्ट लगी जो आधुनिक विज्ञान को भी बौना कर दे। यहां से भी लोग रेल कारखाना लौट पड़े। मेरे मन में गंगा दर्शन और बीएचयू परिसर में जाने की विशेष उत्कंठा थी जो किसी ओर दिन अकेले ही जाकर पूरा करने की ठानी। कुल मिलाकर यह बनारस दर्शन बड़ा ही रोचक और स्मरणीय रहा।<br />
     15 तारीख को भी रोज की तरह सुबह की गतिविधियाँ शुरू हो गई। आज का दिन इसलिए भी खास माना जा रहा था कि सहायक आयुक्त श्रीमती चित्रलेखा गुरुमूर्ति शिविर में आने वाली थीं।<br />
     पहले सत्र में मेरा पावर प्वाइंट प्रस्तुतीकरण था। मैंने अपनी प्रिय कविता रघुवीर सहाय की &#8216;कैमरे में बंद अपाहिज&#8217; को पढ़ाया। अप्रत्याशित रूप से साथियों ने सराहा और मुझे विशेष स्‍नेह प्राप्त हुआ ।<br />
हिन्दी शिक्षक स्वयं को नयी चुनौतियों में ढालें : शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत<br />
अगले सत्र में सहायक आयुक्त से पहले शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत का सम्बोधन मुझे अत्यंत प्रभावकारी लगा। उन्होंने कहा कि हिन्दी शिक्षकों को समकालीन जरूरत के मुताबिक खुद को ढालना पड़ेगा। हिन्दी भाषा शिक्षक स्वयं को अपडेट रखे। लगातार नयी पुस्तकें पढ़े। आधुनिक तकनीकी ज्ञान से भी लैस हों। श्री पंत ने यह भी कहा कि हिन्दी शिक्षण का क्या प्रयोजन है यह विद्यार्थी के सामने स्पष्ट करना होगा। नही तो हिन्दी धारा में विद्यार्थियों की घटती संख्या चिंताजनक हो जायेगी। श्री पंत ने जिस धाराप्रवाह ढंग से विचार व्यक्त किये वे निश्‍चय ही प्रभावित कर गये।  </p>
<p>	<strong>भाषा के भीतर रचनाप्रक्रिया तक जाने की जरूरत : सहायक आयुक्त श्रीमती चित्रलेखा गुरूमूर्ति</strong><br />
	     श्रीमती चित्रलेखा गुरूमूर्ति सादा जीवन उच्च विचार से युक्त शिक्षाविद् हैं। सहायक आयुक्त पद पर रहते हुए उनकी सादगी अनुकरणीय हैं हिन्दी के उनके ज्ञान पर साधुवाद है। भाषा शिक्षण की अनेक बारीकियां उन्होने सहज ही बता दीं। &#8216;मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या&#8217; इस कविता के उदाहरण से उन्होंने बताया कि कविता का शब्दार्थ भर मूल्यवान नहीं है उस स्थिति में जाकर यह समझना होगा जिस स्थिति में मजदूर धनाढयों के निर्माण् को अपने स्वाभिमान के सामने तुच्छ मानता है। उसकी रचनात्मक प्रक्रिया को समझना होगा। निष्चित रूप से श्रीमती गुरूमूर्ति द्वारा सुझायी गई भाषा शिक्षण तकनीक उपयोगी रहीं। </p>
<p><strong>हिन्दी गजल के प्रवर्तक हैं अमीर खुसरो : डॉ. वशिष्ठ अनूप</strong></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dsc00320.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dsc00320.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC00320" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-313" /></a><br />
16 तारीख को शिविर की मुख्य उपलब्धि रही काशी हिन्दू विवि के प्रोफेसर और हिन्दी गजल के विशेषज्ञ होने के साथ साथ गीत गजल के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. वशिष्ठ अनूप से रूबरू होना। अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान में डॉ. साहब ने हिन्दी गजल की जिस यात्रा का विस्तार से वर्णन किया उसने कई नये तथ्यों को उजागर किया। आमतौर से दुष्यंत तक सीमित जानकारी में इस व्याख्यान से बड़ा इजाफा हुआ। डॉ. अनूप की सबसे बड़ी विशेषता खुसरो से लेकर अब तक गजल की हिन्दी धारा की खास पहचान और उसको चिन्हित करने का तरीका। अमीर खुसरो को हिन्दी गजल का प्रवर्तक बताते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में भी भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र से लेकर प्रसाद, निराला, त्रिलोचन शास्त्री और शमशेर तक ने अच्छी गजलें लिखीं हैं। उन्होंने कहा कि इन कवियों का पठन-पाठन करते हुए इस दृष्टिकोंण को भी ध्यान में रखने की आवष्यकता है। डॉ. वषिष्ठ द्वारा दुष्यंत कुमार की गजल &#8216;कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए&#8217; का कृति केन्द्रित पाठ समालोचनात्मक दृष्टि के वैशिष्टय के साथ किया जिसकी नवीन व्याख्या अत्यंत मौलिक रही।<br />
   उनकी स्मृति भी खास है कि अनेक उद्दहरण जुबानी याद हैं। व्याख्यान उपरांत जिज्ञासाओं में डॉ. साहब से मैने निवेदन कि गीत-नवगीत और हिन्दी गजल पर किये जाने वाले शोध-समीक्षा कार्यों में अनेक उदाहरण दोनों हिस्सों में मिलते हैं कही उसी गीत को नवगीत कह दिया गया है तो कहीं गीत के तरह की रचना को हिन्दी गजल में गिना गया है। डॉ. साहब ने बहर (छन्द) के स्वरूप के अलावा गजल की कुछ खास पहचान से भी अवगत कराया और स्पष्ट किया कि यदि ऐसा किया जा रहा है तो यह गलत है। </p>
<p><strong>गद्य साहित्य के केन्द्र में आज अनेक  जरूरतें<br />
डॉ. निरंजन सहाय का व्याख्यान<br />
</strong><br />
        17 तारीख को काशी विद्या पीठ के प्रोफेसर डॉ. निरंजन सहाय एक बार फिर देश भर के कोने कोने से आये हिन्दी शिक्षकों से मुखातिब थे।  उन्होंने हिन्दी गद्य लेखन के इतिहास पर विस्तार से प्रकाष डाला। गद्य और कविता के सूक्ष्म अंतर और वर्तमान में गद्य साहित्य के केन्द्र में होने के अलावा इससे जुड़ी अनेक जरूरतों पर भी चर्चा की । डॉ. सहाय का शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोंण अधिक प्रभावी रहता है।<br />
    व्याख्यान उपरांत जिज्ञासाओं के क्रम में मैंने समूचे सदन की ओर से पाठयपुस्तकों में गद्य पाठों की कुछ अवधारणात्मक त्रुटियों पर निवेदन किया। दरअसल डॉ. सहाय पाठयपुस्तक निर्माण समिति और राष्ट्रीय पाठयचर्या से जुड़ी अनके परियोजनाओं से सक्रिय रूप से जुडे हैं।<br />
       मेरे संगीत अनुराग और वाद्ययंत्र-वादन क्षमता का समुचित उपयोग सुनिश्‍चत करने हेतु प्राचार्य श्री विजय कुमार ने हारमोनियम तबला और अन्य सामग्री मेरे नाम पर जारी कर दी थी। रोज प्रार्थना-सभा में मेरी तैनाती कर दी गई। कि चाहे किसी समूह का आयोजन हो मुझे संगीत अभ्यास कराना ही है। इस स्नेहमय आदेश से हुआ यह कि मेरा कमरा देर रात तक संगीत की स्वरलहरियों से गूँजता रहता था। एक विद्यार्थी और उसके भोजपुरी दल ने रोज समां बांधा। सहभागी शिक्षिकाओं ने भी रोजमर्रा मुझे स्नेह से सराबोर कर रखा था। मेरे मित्र चुहल करते और कहते कि कृष्ण गोपियों से घिरे हैं और ठहाका गूँज उठता। </p>
<p>.इससे पहले शिक्षा अधिकारी श्री अजय पंत का सम्बोधन सुनने को मिला। एक तेजतर्रार शख्सियत होने के साथ-साथ हिन्दी की दशा और दिशा के सम्बन्ध में भी उनकी अद्यतन जानकारी और तेवर निश्चित रूप से हिन्दी शिक्षक के व्यक्तित्व को अधुनातन बनाने में योग दे सकता है।<br />
	अगले दिन 17 मई को प्रोफेसर निरंजन सहाय द्वारा गद्य लेखन के इतिहास पर चर्चा हुई। आज प्रो. सहाय ने अपनी जिज्ञासाओं के अलावा पाठ्यपुस्तकों में गंभीर त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने का अवसर प्राप्त हुआ। अनेक तथ्यों को उन्होंनें सकारात्मक ढंग से लिया और सहमति भी व्यक्त की। इस विषय में स्वतंत्र रूप एक लेख लिखा जा सकता है।  इसी दिन विदिशा से आये प्राचार्य श्री जी पी यादव ने जिस अंदाज में प्रशासनिक और कार्यालयीन कार्य-व्यवहार से सम्बन्धित प्रश्नों के तार्किक जबाब दिये उस शैली ने निश्चित रूप प्रभाव छोड़ा।<br />
रोजाना गीत-गजल और काव्य-पाठ का दौर चलता ही रहा। अनेक वाकये स्मृति का हिस्सा बनते चले गये।</p>
<p><strong>जब झा बोलते हैं तो सिर्फ झा बोलते हैं&#8230;&#8230;.</strong><br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/23.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/23.jpg?w=300&#038;h=235" alt="" title="23" width="300" height="235" class="alignnone size-medium wp-image-321" /></a><br />
वरिष्ठ कवि स्व. पं. छोटेलाल भारद्वाज से एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने समय के उन रचनाकारों का उल्लेख किया जो &#8216;राम की शक्ति पूजा&#8217; कविता के कंठस्थ होने के कारण उस समय बडे ही प्रभावशाली माने जाते थे। मुझे नहीं पता था कि इस शिविर की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में एक ऐसी शख्सियत से भेंट होगी जिसके व्यक्तित्व में भगतसिंह और मुक्तिबोध सा आक्रोश और ओज है। श्री धीरेन्द्र झा उन व्यक्तियों में से जिनके मुंह से &#8216;राम की शक्ति-पूजा&#8217; कविता का ओजपूर्ण कंठस्थ पाठ सुनना मेरे जीवन की एक बड़ी उपलब्धि में मानता हूं।<br />
	रोज रात हरी घास पर घंटों बैठकर गीतों गजलों और कविताओं का दौर चलता रहा। मेरे साथी होते श्री झा, भाई प्रदीप जी, आशुतोष जी, सिंह साहब, चुम्मन प्रसाद जी, धर्मवीर जी, और शत्रुह्न जी सहित कुछ और साथी। महफिल का सबसे बड़ा आकर्षण मुझे लगता झा साहब से नीरज के गीत&#8230;.उसी अंदाज में &#8230;&#8230;जिसमें मैने कभी नीरज जी को आमने-सामने सुना था&#8230;&#8230;। अद्भुत । झा साहब तो बस नीरज में डूब जाते हैं।<br />
	और भाई प्रदीप के बारे में क्या कहें&#8230;&#8230;शुद्ध इलाहाबादी अंदाज । अपनी-अपनी प्रेमकथाओं का दौर चला तो रात भर पेट पकडे हंसते रहे। किस तरह भैंस खोने पर गायत्री मंत्र का जाप&#8230;&#8230;..खेत में से निकल कर सामने आ जाना&#8230;&#8230;पेड़ से कूदकर ठीक बीच में आना, एक बार पकडे़ जाने पर चाची का वह जुमला&#8230;..&#8217;ई का है हो&#8230;..&#8217; । और भाई आशुतोष का बचपन का वह प्रेम जो कभी भड़भूंजे पर परवान चढ़ा। लगता है ये सारी कथायें पिरोने पर एक उपन्यास का प्लाट तैयार हो जाये। अद्भुत &#8230;..सब।<br />
और चलते-चलते अश्‍िवनी भैया द्वारा पढी गई वो भोजपुरी कविता्&#8230;&#8230;.<strong>&#8216;पप्‍पू की दुलहिनि की चरचा कालोनी के घर-घर में&#8230;&#8230;&#8230;</strong><br />
बारह दिन बाद बापस चला तो लगा उस कमरे में कुछ छूटता जा रहा है। दुनियां कितनी छोटी है या बडी कुछ नहीं कह सकता । मगर मन के किसी कोने में एक बात है कि काश फिर वे क्षण दर्ज हो जायें&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</p>
<p>झलकियां &#8211; कैमरे के कैद क्षण</p>
<p>(केवि,डीरेका के प्राचार्य श्री विजय कुमार, सम्‍बोधित करते हुए)</p>
<p> (प्रात:कालीन सभा का दृश्‍य – डॉ के के पाण्‍डेय प्रतिवेदन का वाचन करते हुए)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5132.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5132.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5132" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-415" /></a></p>
<p>(संसाधक डॉ अनिल कुमार पाण्‍डेय, रूपरेखा बताते हुए)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5108.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dscf5108.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5108" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-413" /></a></p>
<p>(प्रार्थना सभा &#8211; तीन)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc00317.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc00317.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC00317" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-385" /></a></p>
<p>(कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक के &#8230;&#8230;हिन्‍दी शिक्षकों का समागम -एक)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc00306.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc00306.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC00306" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-383" /></a></p>
<p>(समागम &#8211; दो)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc00296.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/08/dsc00296.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSC00296" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-382" /></a></p>
<p>मालवीय जी की छाया में<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/24.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/24.jpg?w=200&#038;h=300" alt="" title="24" width="200" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-480" /></a></p>
<p>जैन मंदिर<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/22.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/22.jpg?w=300&#038;h=197" alt="" title="22" width="300" height="197" class="alignnone size-medium wp-image-479" /></a></p>
<p>रामनगर के किले में<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/20.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/20.jpg?w=300&#038;h=202" alt="" title="20" width="300" height="202" class="alignnone size-medium wp-image-477" /></a></p>
<p>बुद्ध का प्रागंण<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/19.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/19.jpg?w=196&#038;h=300" alt="" title="19" width="196" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-476" /></a></p>
<p>बीएचयू के बाबा विश्‍वनाथ<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/18.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/18.jpg?w=300&#038;h=196" alt="" title="18" width="300" height="196" class="alignnone size-medium wp-image-475" /></a></p>
<p>बुद्ध की पहली महापंचायत<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/17.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/17.jpg?w=300&#038;h=203" alt="" title="17" width="300" height="203" class="alignnone size-medium wp-image-474" /></a></p>
<p>उपदेश वृक्ष के नीचे<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/16.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/16.jpg?w=300&#038;h=201" alt="" title="16" width="300" height="201" class="alignnone size-medium wp-image-473" /></a></p>
<p>जहां मौन बन गया उपदेश, संबोधि ने रूप लिया अभिव्‍यक्‍ित का<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/14.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/14.jpg?w=246&#038;h=300" alt="" title="14" width="246" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-472" /></a></p>
<p>शांत हो वत्‍स। तथागत समाधि में है&#8230;&#8230;<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/13.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/13.jpg?w=196&#038;h=300" alt="" title="13" width="196" height="300" class="alignnone size-medium wp-image-471" /></a></p>
<p>रामनगर के किले का विहंगम दृश्‍य<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/06.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/09/06.jpg?w=300&#038;h=197" alt="" title="06" width="300" height="197" class="alignnone size-medium wp-image-470" /></a></p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5134.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5134.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5134" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-502" /></a><br />
(श्री विजय कुमार, प्राचार्य केवि,डीरेका, सेमीनार को सम्‍बोधित करते हुए)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5257.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5257.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5257" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-504" /></a><br />
(साथी डॉ आतुतोष पाण्‍डेय जी भाजपुरी लोक-संगीत गाते हुए)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5259.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5259.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5259" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-522" /></a><br />
(निराला जी पर शोधरत भाई सीपी श्रीवास्‍तव जी, महिलायें जिनका पूर्ण हिन्‍दी नाम लेते संकोच करती हैं)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5261.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5261.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5261" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-523" /></a><br />
(जेएनयू, पर्सियन स्‍टडीज विभाग के विद्वान सम्‍बोधित करते हुए)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5265.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5265.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5265" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-527" /></a><br />
(ससाधक श्री व्‍ही सी गुप्‍ता सबोधित करते हुए)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5296.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5296.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5296" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-529" /></a><br />
(हिन्‍दी विभाग बीएचयू के अध्‍यक्ष डॉ राधेश्‍याम दुबे भक्‍ितकालीन काव्‍य पर प्रकाश डालते हुए)</p>
<p><a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5302.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5302.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5302" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-531" /></a><br />
(साथी मनोज जी अपने विचार रखते हुए)<br />
<a href="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5308.jpg"><img src="http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2011/06/dscf5308.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="DSCF5308" width="300" height="225" class="alignnone size-medium wp-image-533" /></a><br />
(श्रीमती रेवती अय़यर के मार्गदर्शन में थिंकक्‍वेस्‍ट कार्य)</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/ramkumarsingh.wordpress.com/280/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/ramkumarsingh.wordpress.com/280/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=280&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>&#8221;नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो&#8221;/पुस्तक-समीक्षा/सरस्वती-पुत्र</title>
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		<pubDate>Sat, 20 Feb 2010 08:18:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ. रामकुमार सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमंत्रित-सर्जनाकार/समीक्षक]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक-समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[सरस्वती-पुत्र के बारे में ये युवा, कवि, कहानीकार और पत्रकारिता में डिग्रीधारी हैं। स्वभाव और रहन-सहन मुक्तिबोध की याद दिलाता है। कई वर्षों से जानता हूँ। इनकी कई रचनायें, कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। थोडे से लापरवाह हैं। मेरे आग्रह पर एक पुस्तक-समीक्षा कई महीनों पहले लिखी थी। &#8216;सर्जना&#8217; पर जारी कर रहा हूँ। &#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211; <a href="http://ramkumarsingh.wordpress.com/2010/02/20/%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%a8/" class="excerpt-more-link">[&#8230;]</a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=ramkumarsingh.wordpress.com&amp;blog=10981726&amp;post=266&amp;subd=ramkumarsingh&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सरस्वती-पुत्र के बारे में</strong><br />
ये युवा, कवि, कहानीकार और पत्रकारिता में डिग्रीधारी हैं। स्वभाव और रहन-सहन मुक्तिबोध की याद दिलाता है। कई वर्षों से जानता हूँ। इनकी कई रचनायें, कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। थोडे से लापरवाह हैं। मेरे आग्रह पर एक पुस्तक-समीक्षा कई महीनों पहले लिखी थी। &#8216;सर्जना&#8217; पर जारी कर रहा हूँ।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<strong>कुरुक्षेत्र : युध्द क़ी जटिल समस्याओं का मानवीय विवेचन</strong><br />
रामबरन &#8216;सरस्वती-पुत्र&#8217;</p>
<p><strong>पुस्तक :  &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217;<br />
कवि : रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217;<br />
प्रकाशक : राजपाल एण्ड संस्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली</strong><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; का प्रबंध-काव्य &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; एक विचार-प्रधान काव्य है। विचारों की सघनता में काव्य की पौराणिक या मिथकीय ऐतिहासिकता के महत्व का परीक्षण करने की आवश्यकता मंद हो जाती है। समूचे प्रबंध की एकता उसके विचारों को लेकर है। जो राष्ट्रीय महत्व के हैं।<br />
	दिनकर जी के &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; का सृजन उस समय हुआ जब द्वितीय विश्व-युध्द का काल  था। दुनियाँ के सामने युध्द क़े भीषण परिणाम उपस्थित थे।  इस महायुध्द के अमानवीय कृत्यों ने मानव-समाज को एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। &#8216;हिरोशिमा&#8217; और &#8216;नागासाकी&#8217; की आग अभी शांत नहीं हुई थी। संसार की महाशक्तियों में आणविक अस्त्र-शस्त्रों की होड़ बढ़ने लगी। ऐसे समय में युध्द के घातक परिणामों को बताने के लिए दिनकर के &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; का उदय हुआ। महाभारत में कौरवों का विनाश हुआ, किन्तु युध्दिष्ठिर को शांति नहीं मिली। पराजित मारे गये और विजेता जीतकर भी हार गया। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद भी ऐसा ही हुआ। जो हारे, वे राष्ट्र सामाजिक व आर्थिक रूप से कई सदी पीछे पहँच गये। जो विजेता थे वे भी संतुष्ट नहीं थे। इस तरह युध्द की जटिल समस्याओं का  मानवीय विवेचन &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; में मिलता है।<br />
	विश्व की महाशक्तिओं रूपी युध्दिष्ठिर को ऐसे भीष्म की आवश्यकता थी नव-विश्व के निर्माण में उसका मार्गदर्शन करे। उन्हें भीष्म मिला या न मिला कुछ नहीं कह सकते, किंतु महाभारत युध्द के बाद &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; प्रबंध काव्य के युध्दिष्ठिर को भीष्म अवश्य मिला और उसका मार्गदर्शन किया। भीष्म का वह चिंतन समाज के लिए आज भी श्रव्य और अनुकरणीय है।<br />
	समूचे प्रबंध में दो पात्र हैं &#8211; गंगापुत्र भीष्म और धर्मराज युध्दिष्ठिर। महाभारत की विजय युध्दिष्ठिर को संतोष नहीं दे सकी। उसके मन में कई शंकाएँ बस गईं। भीष्म अपने उपदेश के माध्यम से युध्दिष्ठिर को सांत्वना देते हैं। तब युधिष्ठिर राज-सिंहासन को स्वीकार करने को तैयार होते हैं। &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; की मूल कथा की संरचना यही है। किन्तु इसकी समकालीन वैचारिकता के अनेक आयाम हैं।<br />
	सम्पूर्ण &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; भीष्म के चिंतन से भरा पड़ा है। यह चिंतन आदि से अंत तक अनवरत चलता रहता रहा है। युध्द-शांति, राजा-प्रजा और भाग्य-कर्म जैसे द्वंद्वात्मक विषयों को यह अपने में समेटे है। दिनकर का उद्देश्य यही था कि वे अपने विचारों को मानव-समाज तक पहुचा सकें। महाभारत की घटना से जोड़कर तो मात्र काव्य का कलेवर गढ़ा गया है।<br />
	कवि के विचार &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; में युध्द-विरोधी रहे हैं। युध्द के दुष्परिणामों से सम्पूर्ण काव्य भरा पड़ा है। उन्होंने युध्द क़ो निन्दित और क्रूर कर्म माना है। किन्तु, सभी विकल्पो के असफल होने पर युध्द को नकारा नहीं जा सकता। जब अंतिम विकल्प के रूप में युध्द होता है तब शांति होती है। युध्द से सम्बन्धित ऐसे  ही विचार भीष्म ने धर्मराज को बताये-<br />
&#8221;युध्द को तुम निन्द्य कहते हो, मगर/जब तलक है उठ रही चिनगारियाँ<br />
भिन्न स्वार्थों से कुलिश-संघर्ष की/युध्द तब तक विश्व में अनिवार्य है&#8221;<br />
  युध्द का असली कारण समाज में &#8216;असमानता&#8217; है। वह चाहे किसी भी रूप की हो। जब तक समाज में &#8216;समानता&#8217; की स्थापना नहीं हो सकती, तब तक किसी न किसी रूप में युध्द चलता ही रहेगा।<br />
&#8221;शांति नहीं तब तक, जब तक /सुख-भाग न नर का सम हो<br />
नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो&#8221;<br />
सहज रूप में कोई किसी से लड़ना नहीं चाहता है। व्यक्ति शांति और प्रेम से अपना जीवन जीना चाहता है। ऐसी प्रकृति शांतिप्रिय लोगों में होती है। दुराचारी व्यक्ति सहज शिष्ट-मानव की इस स्वाभाविकता की अवहेलना करता है और युध्द की अनिवार्यता की परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।<br />
&#8221;किसी दिन तब महाविस्फोट कोई फूटता है<br />
मनुज ले जान हाथों में दनुज पर टूटता है।&#8221;<br />
दिनकर के &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; में &#8216;सप्तम सर्ग&#8217; का अपना विशिष्ट महत्व है। यह सर्ग प्रबंध का उपसंहार तो है ही, भारत की वर्तमान पीढ़ी को कई संदेश भी देता है। सन्मार्ग पर चलने का ही नाम जीवन है। संसार से पलायन कर जंगल जाने की प्रवृत्ति उचित नहीं है। यह तो जीवन से मुँह मोड़ लेना है। एक तरह की कायरता है, जीवन से निरंतर संघर्ष करते हैं, वे ही लोग समाज के लिए आदर्श हैं। पलायनवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए भीष्म कहते हैं-<br />
&#8221;धर्मराज, क्या यती भागता<br />
कभी गेह या वन से?<br />
सदा भागता फिरता है वह<br />
एकमात्र जीवन से&#8221;<br />
हिंसा, विनाश, युध्द, असमानता ये सभी व्यक्ति के &#8216;कर्म-पथ&#8217; से भटकने के परिणाम में घटित होते हैं। मात्र व्यक्तिगत सुखों को भोगने के कारण ही असमानता की जहरीली धारा फूटती है। सभी मनुष्य अपने कर्म में लीन रहें तो समाज से अराजकता को समाप्त किया जा सकता है। कवि ने स्वीकार किया है कि राजा-प्रजा कुछ नहीं होता, ये दोनों ही मनुष्य के रूप हैं। अत: सभी को अपने मानवोचित कर्म के माध्यम से इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में अपना योगदान देना होगा। तभी युध्द, अशांति और संघर्ष से बचा जा सकता है।<br />
	&#8216;भाग्यवाद&#8217; और &#8216;कर्मवाद&#8217; का कवि ने अपने विभिन्न तर्कों से खंडन किया है। &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; में भाग्य पर कर्म की विजय है। भाग्यवाद केवल प्रंपच और प्रताड़न है। वह पाप का आवरण है। जिससे एक व्यक्ति दूसरे के हिस्से को अतिक्रमित रखना चाहता है। भाग्यवाद का सहारा लेकर दुराचारी व्यक्ति श्रमिक के भाग को स्वयं हड़प जाते हैं। अपने कठोर परिश्रम से व्यक्ति असंभव को संभव कर सकता है। कर्म-पथ पर चलकर भाग्य को बदला जा सकता है। कवि के शब्दों में-<br />
&#8221;ब्रद्दमा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है<br />
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है<br />
ब्रद्दमा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी<br />
धोते वीर कु-अंकु भाल का बहा भ्रुवों से पानी&#8221;<br />
अपने कर्मानुसार जीवन जीकर ही संसार की विषमता को समाप्त किया जा सकता है। तभी समानता के आधार पर प्रकृति का कण-कण जन-जन का हो सकता है। तभी मानव के अधिकार सुरक्षित हो सकते हैं। अभावों को दूर किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में ही राजा-प्रजा का भेद मिट सकता है। न कोई पूँजीपति होगा न कोई मजदूर। संसार का एक नया रूप होगा। इस तरह दिनकर ने &#8216;कुरुक्षेत्र&#8217; में एक सुखमय और शांतियुक्त समाज की परिकल्पना है। </p>
<p>रामबरन &#8216;सरस्वती-पुत्र&#8217;<br />
पता : लिटिल ऐंजिल कान्वेन्ट स्कूल<br />
गांधी कॉलोनी, मुरैना- 476001<br />
मध्यप्रदेश</p>
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