आखिर लौटना ही होगा ।

आचरण, संस्कार, जड़, ज़मी की ओर
आखिर लौटना ही होगा ।
कुत्सित मानसिकता, कुसंगति, कुप्रवृत्ति,
उद्दंडता को छोड़ना ही होगा ।
व्यर्थ दिखावा, पाश्चात्य संस्कृति, धनलिप्सा से
स्वयं को मोड़ना ही होगा ।
वर्ग-भेद, रूढ़िवादिता, भृष्टाचार व कुंठाओं
को तोड़ना ही होगा ।
भ्रातृत्व-भाव, परस्पर सहयोग, आदर-स्नेह
को ईमानदारी से जोड़ना ही होगा ।
बहुत हो चुकी व्यर्थ आधुनिकता
अब तो कुछ सोचना ही होगा ।
विश्व ज्ञान का दंभ छोड़कर, ‘पड़ोस-कल्चर’
अपनाना ही होगा ।
मत मोड़ो भावी-पीढ़ी को, केवल सुविधाओं की ओर
संघर्ष, अभाव, ज़िम्मेदारी का इनको पाठ ,
पढ़ाना ही होगा ।
कैसे समाज की हो रही है सर्जना, इस पर
विमर्श करना ही होगा ।
भटक गए हैं कहीं राह में , इसका ध्यान
दिलाना ही होगा ।
हे सुसंस्कृति के वाहक, तुमको कुसंस्कृति से
बचाना ही होगा ।
हे शिक्षक, शिक्षा, शिक्षालय अब उचित मार्ग
दिखलाना ही होगा ।
आचरण, संस्कार, जड़, ज़मी की ओर
आखिर लौटना ही होगा ।
डॉ. शेषकुमारी सिंह
केन्द्रीय विद्यालय
वायु सेना केंद्र, ओझर
मुंबई संभाग
अभिलेख
कविता : मीडिया-विमर्श …..’लो-प्रोफाइल’
कविता : मीडिया-विमर्श

लो-प्रोफाइल
वह
न तो ब्यूरो में जा पा रहा है
न सिटी-संस्करण में
खास ओहदे पर
यदा-कदा मिल जाती है
लूप लाइन – डेस्क
या फिर लिखते रहो
फीचर टाइप कुछ!
इसमें मुख्य-धारा नाम का
नहीं दिखता उसे कोई फ्यूचर
वह मेहनती है
तथ्यान्वेषी है
प्रभावित कर सकता है नीतियां
सत्ता-शासन के आवरण को
उघाड़कर
मगर पत्र-समूह -
जिसे अब ‘कम्पनी’ कहा जाने लगा है
उसमें वह
स्वत्वाधिकारी के
जन्मदिन, विवाह दिन इत्यादि
याद नहीं रख पाता
हाई-प्रोफाइल पार्टियों में
मैनेजिंग डायरेक्टर को
नहीं कर पाता रिसीव
वह गजब का पत्रकार है,
ऐसा उसे लगता है, औरों को भी
मगर,
‘कम्पनी’ की परिभाषा में
व्ह
‘लो-प्रोफाइल’ है………
‘पत्थर पर घास’/कविता-संग्रह/डॉ. रामकुमार सिंह
इस संग्रह के बारे में……..
18 साल पहले …..
चम्बल के मुख्यालय मुरैना की सड़क – एम.एस. रोड पर कक्षा-नवमीं का एक विद्यार्थी जा रहा है। उसके साथ उसका एक पड़ोसी……….मित्र भी। उसने पूछा कि ‘पत्थर पर घास’ मुहावरे का अर्थ क्या है। उस विद्यार्थी ने जबाब दिया….’असंभव को संभव बना देना’ । गलत!! ……….वह बोला….सही उत्तर है – मूर्खतापूर्ण प्रयास करना।
अब……….
‘पत्थर पर घास’ संग्रह को ‘सर्जना’ पर जारी करते हुए मुझे प्रसन्नता है। इस संग्रह की ज्यादातर कवितायें मेरे विद्यार्थी जीवन में लिखी गईं हैं। जिन कविताओं में विमर्श है वे बाद की हैं। उसी समय से मैं…..यानी वह विद्यार्थी यह सोचता रहा कि ‘पत्थर पर घास’ क्यों नहीं उग सकती। मुझे नहीं पता कि मैं सही था या वह । समकालीन जीवन को देखकर लगता है बदलाव के प्रयास मूर्खतापूर्ण ही तो नहीं। लेकिन मन कहता है कि पत्थर पर घास उग आयेगी ….शायद। यह संग्रह मेरे उसी बालसखा को समर्पित है। एक दुर्घटना में उसकी रीढ़ की हड्डी को क्षति हुई। जल्द ही उस मित्र का छायाचित्र व विवरण ‘सर्जना’ पर दूँगा। ————–
कविता : रामकुमार सिंह
पत्थर पर घास -एक
![4612648[1]](http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2010/02/46126481.jpg?w=199&h=300)
वह निर्लिप्त भाव से जुटा था
चाहता था पत्थर पर घास उगाना
एक गंभीर संतोष,
सतत उपक्रम
और मौन।
यथार्थ का बंजर धरातल
किस नमी में
किस प्रकाश से
किस हवा में
संभव हो सकेगा पत्थर पर घास उगाना
केवल वो बीज पर्याप्त नहीं
जो उसने छाती से लगा रखा था
उसे बँधाया गया था ढांढस
दिखाई गई थी एक आस
कि पहले भी जो कर चुके हैं प्रयास,
विचारों की शक्ति से
असंभव को संभव कर दिखाने का
वो सफल हो सके हैं
उगाने में
पत्थर पर घास
———————————-
चार कविताएँ : रामकुमार सिंह
मैंने खूब साधा
तुम्हें
कभी तुम्हारे हाथ थामता हूँ, तो-
चरण अदृश्य हो जाते हैं
कभी मस्तक टटोला, तो-
ज्ञात हुआ कि-
तुम्हारी बाँह हवा हो गयी है
मेरे मनोभावों की करते हुए अवहेलना
तुम्हारे अंग-उपांग
एक-एक करके
होते जा रहे हैं ओझल
कर रहा हूँ भरसक प्रयास, पर-
नहीं कर पा रहा हूँ पूर्ण
आकृति तुम्हारी
तुम हो
मेरी मेज पर
जल-बूँद की खींचातानी से बने
रेखाचित्र।
आप

आपकी उपस्थिति मात्र
मेरे लिए
भय का सरोकार है
निर्मूल आशंका है, या-
व्यक्तित्व का प्रकार है
या तो आप धन्य हैं,या-
मुझे धिक्कार है
नेपथ्य में दृष्टि
अनेक वस्तुएँ चिपकी हैं दीवार पर
शून्य में भी पर्याप्त आधार है
पर फिसलती है निरंतर
रुकेगी अवरोध से या अभीष्ट पर
यदि नहीं
तो फिर क्या है यह दृष्टि?
अर्धमृत ऑंखें
मृत दृश्यों में
जीवन खोज रही हैं
मैंने अपने दायरे नहीं बनाये
इसलिए, ताकि-
आपके दायरों में आ-जा सकूँ
इसलिए, ताकि-
मेरा दायराविहीन व्यक्तित्व
आपकी प्रेरणा(?) बन सके
और-
आप भी समझ सकें
सबकी जरूरतें, सबके दायरे
पर, मेरे प्रयास-
खोखले सिध्द हुए हैं
आप अपने दायरे
तय किये हुए हैं
————————–
मीडिया-विमर्श : छह कविताएँ /रामकुमार सिंह
तुम्हारी आधी से अधिक योग्यता
समाप्त हो चुकी है
इसलिए कि-
जिनकी तुमने अधीनता स्वीकार की है
अर्थात जो तुम्हारे प्रमुख हैं, और-
तुम जिनके कार्यालयीन हो
वे
उसी जमात के हैं
जिसके विरुध्द तुम
जंग छेड़ने की सोच रहे हो(!)
वह
सक्रिय, कर्तव्यनिष्ठ और ऊर्जावान
पत्रकार है, जिसमें क्षमता है-
सशक्त लेखन की
लेकिन अब तक
कुछ भी ऐसा लिखा नहीं
क्यों?
क्या वाकई ‘सत्य’ बाजार गया है
दरअसल-
उसकी कलम को आग उगलनी थी
जिनके सम्मुख, वे ही-
कलम के लिए
स्याही का प्रबंध कर रहे हैं
“केवल सच लिखना
उसकी खूबी है
सच्चाई का मुरब्बा बना देना
हमारी मजबूरी है
मीठे सच में वजन नहीं होता
कड़वा सच हजम नहीं होता
इसलिये-
सत्यशोधकों ने पढ़ना छोड़ दिया है
मेरे मित्र ने लिखना छोड़ दिया है”
ताबड़तोड़ गालियाँ
जी हाँ! मुझसे ही मुखातिब था
लेकिन मुझे याद नहीं कि
मैंने कभी उसे कोई हानि पहुँचाई हो
उसके जाने के बाद
मेरे नजदीक आकर
‘जानकारों’ ने मुझे बताया कि
इस आदमी को इसी काम के लिए
‘जिसने’ नियुक्त किया है
उसके विषय तुमने
दैनिक पत्र में
कुछ ऐसा लिख दिया
जो
गलत नहीं था
यह अंक

”वे बड़े ही स्वार्थी
धूर्त और राष्ट्रीय कलंक हैं”
इस माह के अंक में छपा है
शायद हाल ही में
विश्वस्त सूत्र
उजागर करके लाये होंगे?
नहीं, ये बात नहीं
इस अंक के लिए
उनसे तयशुदा
विज्ञापन प्राप्त नहीं हुआ
—————————–
लम्बी कविता : रामकुमार सिंह
नीड़ और धुँधलके की सड़क

पंछी बैचेन हो जाता है
आकाश में
यहाँ-वहाँ उद्यम करते
तब
वह लौट पड़ता है
नीड़ में, शाम के धुँधलके के साथ
अपूर्व आनंद का अनुभव होता है उसे
संभवत:
इसी क्षण के लिए
बनाया था नीड़
तिनके-तिनके जुटाकर
बड़े ही जतन से
जटिल श्रम से।
कई पंछी तो-
नीड़-निर्माण के उपक्रम में ही चल बसे
अब उन नीड़ों में रहते हैं
उनके कथित परिजन।
मेरे सभी परिचितों में से अधिकतर
विविधतापूर्ण संसार रचना चाहते हैं
अपने ‘नीड’ में ही।
बाहर निकलना तो मजबूरी
नीड़ को ‘मेंटेन’ जो रखना है
बैचेनी होती है मुझे
जब भी खुद को
‘घर’ में ही पाता हूँ
निकल पड़ता हूँ सड़क पर
रिक्शेवाले की आग्रहपूर्ण दृष्टि
हो जाती है निष्फल
विवश हूँ, क्या कि
हूँ, गंतव्यहीन भ्रमण पर
चाल में छलावा आवश्यक, ताकि
अवांछित न लगूँ
नीड़ों में दुबके पंछियों को
जो ‘बेकार’ से भय खाते हैं।
लगभग नगर परिक्रमा करनी है
सड़क से
अन्य रास्ते भी फूटे हैं इधर-उधर
पर सबका आमंत्रण बेकार
मुझ-से दिखने वाले
कुछ दिशाहीन लोग
मुड़ते गये इन रास्तों में-
धुँधलके के साथ
जो मुझसे कम सावधान थे
तकते रहे वे कि
मैं उन्हीं में से किसी का
हमराह बन जाऊँगा।
वे समझते नही कि
हर गंतव्यहीन भ्रमण
आवारगी नहीं होता
शहर की रंगीनियों का
निर्लिप्त दर्शक, मैं
चलता जाता हूँ, निरंतर
इसी बीच
अच्छा लगता है यह देखना, कि-
सारे पंछी नीड़ों में मगन हैं, अपने-अपने
गर्वीले, आवृत, परिबध्द और इठलाते
उन्हें ज्ञात नहीं कि-
मेरा अनुसंधान जारी है, उन पर
अन्यथा दुस्वार हो जाता
मेरा सरकारी सड़क पर निकलना।
‘मैं हाथ से निकलता जा रहा हूँ’
ऐसा कहते हुए सुना है मैंने
अपने परिजनों को
शायद इसीलिए
मेरा विलंब उनकी व्याकुलता है
आजकल, कभी भी प्रतिबंधित हो सकता है
मेरा घर से निकल पाना
रात गहराने लगी है
मुझे और अच्छी लगने लगी
धँधलके की सड़क
पर सक्रिय हो उठे हैं
मुझे सड़क से खदेड़ने वाले
मुझे सड़क पर खोजने वाले
घर लौटना अब मेरी मजबूरी है
सड़क पर रुकने नहीं देंगे
कुत्तो, सरकार और
चौबंद नीड़ों की सुरक्षा को लेकर
भयभीत रहने वाले पंछी।
आखिरकार मुझे
लौटना ही पड़ता है
घर की तरफ
मैं कभी ठीक से नहीं जान पाया
तिनकों से बनी गोल-गोल आकृति, और-
नीड़ का अंतर
चारदीवारी से बने मकानात, और-
घर का अंतर
दो कवितायें : रामकुमार सिंह
ऐसे ही न कहो

तस्वीर के दोनों रुख
तुम्हारे सामने हैं
विवेक ही निर्धारित करेगा
नीर क्या और क्षीर क्या
यूँ ही न कहो, कि-
अब वो वक्त नहीं लौटेगा
कोई कारण नहीं बनता,कि-
तुम्हारी संभावनाओं की अनदेखी-मात्र
पर्याप्त हो उत्साह के दुर्ग को
धराशायी करने में
कभी सम्मुख तो कभी पार्श्व में
रिक्तियाँ ढूँढते तुम्हारे खोखले प्रयास
अब तो इतर-मोहभंग हो जाने तो, ताकि-
वह मरीचिका जो नहीं रहने देती
तुम्हें अडिग
स्वतंत्र कर दे तुम्हें
आपाधापी में तुमने सदैव उपेक्षा की
तुम वही हो, यकीनन वही
जो तुम्हें होना चाहिए
बस, अपना दर्पण बदल दो
अप्रकट अंतर

उबलता जल और भाप
दोनों का परिताप समान, किन्तु-
दोनों की अवस्थायें भिन्न
ऐसा क्यों?
वह क्या है
जो उत्तारदायी है
इस भिन्नता के लिए
सामान्य यंत्रों की समझ से परे
वह अत्यल्प गुप्त-ऊर्जा
जिसके होने से
भाप पा गई ऊँचाई
और देखता रह गया
उबलता जल
उसे नाप सके
विशिष्ट यंत्र
विचार करना चाहिए
उबलते जल को
उस नगण्य ऊर्जा पर
जो उसे समतापीय भाप
बना सकती है
…….
‘एक अपेक्षा’ के लिए
समान योग्यताओं में से
कर देती है जो
‘चयनित’ और ‘वंचित’ का अंतर
वह कौन-सी अप्रकट योग्यता है
जिसे देख सकीं पारखी निगाहें
विचार करना चाहिए
‘वंचित’ योग्य को
क्या है वह नगण्य अप्रकट ऊर्जा
जो उसे ‘चयनित’ बना देगी
———————————-
चार कविताएँ : रामकुमार सिंह
गहन स्तब्धता
शून्य में अनंतबोध
अपने ही अस्तित्व में संदेह
अनुभव का वैचित्र्य
स्वतंत्र हृदय बोझिल मस्तिष्क
साँसों की सरसराहट-
कोलाहल सी प्रतीत होती है
सुदूर, किन्तु निकट ही-
विशाल निकुंज में
चिरपरिचित स्वर की
अपरिचित ध्वनि
अवाक्-सा कर जाती है
मुखर-विचार के तंतुओं को…
व्यस्तता से परिपूर्ण जीवन को
निर्जन एकांत का उपहार
हस्ताक्षर
तुम बार-बार कर रहे हो
अभ्यास
हस्ताक्षर करने का
ऐसे नहीं, ऐसे
यूँ नहीं, वैसे
गति, लय व ताल के साथ, पर-
हर बार कुछ कमी।
कभी प्रकार पर चिंतित, तो कभी-
‘स्मूद’ न होना खल जाता
संक्षिप्त-सुंदर ठीक रहेंगे, या-
गोल-मोल जटिल
कभी जान पड़े प्रभावशाली, तो-
पुन: वैसे ही न बन पड़े
उफ! कितने आकुल हो तुम
शायद बनना चाहते हो
‘समय के हस्ताक्षर’
कुंठा, ग्लानि, और-
उपेक्षा की पीड़ा ने
बना दिया उसे
क्षुब्ध, क्रुध्द और-
चिड़चिड़ा
तुमने उसकी
जाने किन ‘जरूरतों’ को ताड़ा, कि-
अम्बार लगा दिये
भारी-भरकम ‘पूर्तियों’ के
वो भी भौतिक
पर मुझे लगता है कि-
उसकी बीमारी और बढ़ती जा रही है
तुम्हार ‘क्षतिपूर्ति’
‘विकृति’ बनती जा रही है
आपके घर में

आपके घर में
बड़ी अज़ीब बात
सुख के लिए
निकटता की तलाश
और निकट लाने में
जो वस्तु एकमात्र सक्षम पाई
वह है दु:ख
जैसे-
संकट में एकता
और भय से श्रध्दा उपजे
बड़ी अजीब बात
आपके घर में
——————————-
चार कविताएँ : रामकुमार सिंह
वो क्या है?

न सम्बन्धित, न प्रभारी
न पुलिसिया, न अखबारी
न नौकरशाह, न जनता का आदमी
न आम आदमी, न व्यवस्था का आदमी
कोई नहीं सुन रहा तुम्हारी बात
आखिर क्यों?
जरा दिमाग पर जोर डालो
जिसकी रपट लिये घूम रहे हो तुम
जिसके सताये हुए हो तुम
वो कौन है? वो क्या है?
आलीशान इलाजगाह
लाइन लगवाता कीपर
निर्दयी चिकित्सक
निष्ठुर सहायक
स्वच्छता पर गर्व करते कर्मचारी
यहाँ-वहाँ मूक परिचारिकाएँ
और
दवाइयों की लम्बी सूची पर-
कैमिस्ट का भावशून्य चेहरा
इधर-
रिक्साचालन-आय से दारू पीता आदमी
दीपावली पर मिट्टी के दिये बेचकर
जुटाये थे जो रुपये
सारे स्वाहा प्रथम दृश्य पर
जाते-जाते दुत्कार मिली
वैल्यू-एडेड टैक्स की तरह
”हम सभी जानते हैं, कि-
तुम पर जुल्म हुआ है
तुम्हारा चीखना-चिल्लाना
बाजिब है
उसने तुम्हें इतनी जोर से रोने दिया
यह छूट काफी नहीं क्या?
अब
उसकी रपट दर्ज कराने की मजाल
मत कर देना!”
”क्यों ?
क्या वो-
धनुर्धारी है?
बंदूकधारी है?
या
टाडा-पोटा धारी है?”
”नहीं
सत्ताधारी है!!”
चार कविताएँ : रामकुमार सिंह
तिलमिलाहट
मैं सामान्य महसूस करता हूँ
जब देखता हूँ कि-
अच्छे लोग राजनीति में
कम ही जा रहे हैं
मैं चकित नहीं होता
जब पाता हँ कि-
एक अच्छे-से उम्मीदवार का
टिकिट काट दिया जाता है
मुझे खेद नहीं होता
जब मेरे सामने है कि-
सिर्फ बाहुबली ही
चुनाव लड़ रहे हैं
पर मैं
तिलमिला उठता हूँ
तब, जब-
प्रचार के दौरान
देशभक्ति-गीतों का उपयोग होता है
वह फिर भी देगा
ठीक पाँच बरस बाद
दोबारा मिले हैं
उससे आप
वह जो
अपनी दैनंदिन क्रियाओं
में ही रत है बरसों से
वह जो
हर संकट के समय
बीच सड़क पर गोबर कर देता है
वह फिर भी देगा
अपना मत
वह फिर भी देगा
हम लोग
नामदेव से रामदेव तक, श्रृ से-
हम झुके हुए लोग
‘नाच’ को ‘महारास’ कहते, रस में-
हम पके हुए लोग
××××××××
बिछायी जाती बिसातें
हम बिछे हुए लोग
उखाड़ी जाती पटरियाँ
हम उखडे हुए लोग
‘राष्ट्र’ में ‘महाराष्ट्र’ उचकाते
हम उचके हुए लोग
‘भारत’ में ‘महाभारत’ मनाते
हम युरत
हम आत्मध्वंसक
हम बिगड़े हुए लोग
माइक पर
माइक बोल रहा है-
आपका अपना
जाना पहँचाना
कतर्व्यनिष्ठ, जुझारू
संघर्षशील, और-
गरीब (?) प्रत्याशी
जिसका चुनाव-चिन्ह है
‘बँगला’
इन्हें वोट दें और..
(इनके चुनाव-चिन्ह को
साकार करें)
लाओ मास्टरजी!
तुम्हारा बैग मैं ले चलूँ
हरभजना बोला
नहीं भाई!
इसमें ठूँस-ठूँसकर भरी हैं
पत्रिकायें – किताबें
देख! कुछ तो बाहर झाँक रही हैं
अभी पानी चला है
भीगे खेत में तुझसे गिर पड़ेंगीं
झाँकने दो – गिरने दो मास्टरजी
ये किताबें भी तो देखें-
खेत कैसा होता है
——————–
दो कविताएँ : रामकुमार सिंह
तमाम आपाधापी
उधेड़बुन, और-
रस्साकस्सी के बीच
आश्वस्त था वह, कि-
चिर-भविष्य सानुकूल है
यह देगा, अवश्य ही
मूल्य
उसके परिश्रम, और-
त्याग का
वर-प्राप्ति हेतु तप नहीं किया
वह नितांत स्वार्थ होता
पर-
बहुत काल तक करता रहा ‘मजूरी’
क्या निरर्थक ही? जो-
निज अस्तित्व मात्र का
उत्तारदायित्व-निवर्हन थी ?
औरों के प्रति कर्तव्यबोध से
निरंतर बिंधे रहने का अहसास
‘सक्रिय-जिन्न’ की भाँति
चढ़ाता-उतारता रहा
खम्बे पर, बारबार-लगातार
भौंतरे वर्तमान से
भविष्य के गर्भ को कोलते हुए
समय रिसता रहा, चुपके से
आहिस्ता-आहिस्ता
रेत-भरी मुट्ठी से रेत की तरह
खुली मुट्ठी
खाक की!!
आप ‘स्तरीय’ हैं
‘आम’ में सम्मिलित गिना जाना
आपके लिए नागवार है
यही कारण है कि-
आजकल अपने परित:
कंक्रीट की मोटी-मोटी, ऊँची-ऊँची
दीवारों का निमार्ण करवा रहे हैं
और भीतर-
कर रहे हैं एकत्रित, उनको
जिन्हें आप मानते हैं-
अपना समस्तरीय, समस्थानिक, आदि-आदि
मैं इनमें नहीं
कतई नहीं
मगर
एक दिन आप
अपनी ही रची भूल-भुलैया में
सिहर उठेंगे
स्मरण हो आयेगा
विश्वसनीय स्नेह और सत्यनिष्ठा का
आप चीखेंगे, चिल्लायेंगे
पर
नहीं पहुँचेगी आपकी आवाज
मुझ तक
इतिहास मुझे सिध्द-दोष नहीं मानेगा
क्यों कि
न मैं दूर था,
न कानों में रुई लगाई थी
दीवार आपने उठाई थी
भृकुटि
बहुत उपयोगी है
विज्ञान की दृष्टि से
क्यों कि रोकती है पसीना
ऑंखों में जाने से
नायिका की भृकुटि
कालजयी विषय रहा है
कवियों के काव्य का
उस दिन रंगमंच पर
रंगकर्मियों के पचास फीसद भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम थी
केवल भृकुटि
भृकृटि का आपने खूब प्रयोग किया है
मौन रहकर
प्रश्नवाचक चिन्ह के स्थान पर
किन्तु इन सबके बीच
खो गयी वह भृकुटि
कि जिसके संकुचित करते ही
हिल जाता पर्वतों का जड़त्व
भृकुटि थी युवा की।
मात्र कुछ बालों की एक धनुषाकार आकृति
नहीं कही जा सकती
भृकुटि
हवा चल रही है
बड़ी तेज।
जनसैलाब उमड़ पड़ा है
उधर ही,
जिधर की चल रही है हवा
मैं, नहीं जाऊँगा
हवा के साथ
क्यों कि जानता हूँ कि-
सही दिशा वह है
जिधर की नहीं चल रही हवा
अगर मैं नहीं जा सका
हवा के खिलाफ, तो-
खड़ा रहूँगा
पर नहीं जाऊँगा हवा के साथ
जो चल रहे हैं हवा के साथ
वे समझौता कर चुके हैं, या-
आत्मसमर्पण
सुविधाप्रिय हो चुके हैं, या-
आश्वासन-प्राप्त
पर मैं नहीं,
नहीं चलूँगा उस ओर
जिधर की
चल रही है हवा
—————-
कविता : रामकुमार सिंह
बाँस की लाठी
तनी हुई, मजबूत और ‘आदम-कद’
एक आदमी घायल,
दूसरे की लाठी से -
अस्पताल में भर्ती है
खून से लथपथ
अभी तक।
घटनास्थल पर पड़ी है लाठी
खून से लथपथ
अभी तक।
बड़ी मजबूत है
टूटी नहीं
अच्छी लाठी की यही विशेषता है।
आइये, दूसरी बात करते हैं
‘आनंद’
मेरे परिचितों में से एक
स्वभाव से निष्ठुर
वाणी से कठोर
प्रकृति से पीड़ादायी
जहाँ तनकर खड़ा हो
वातावरण घटनापरक हो जाता है
संख्या में थोड़े ही
उसकी सभी परिचित त्रस्त हैं
बड़ा मजबूत है वह
कभी झुका नहीं
‘आनंद’ की यही विशेषता है।
खैर, एक लाठी -
जब पड़ी मिली कलाकार को
कद छोटा किया
छिद्र कर दिये
भीतर तक
बना दी बांस की बांसुरी
आज की शाम असंख्य श्रोताओं को
बांसुरी-वादन ने आनंदित कर दिया
बांसुरी बन गई साक्षात् आनंद
‘आज आनंद मिला’
कितना शांत हो गया है वह
वाणी जैसे सरगम
स्वभाव कितना निर्मल
चाहने वाले असंख्य हो गये उसके
आनंद बन गया सचमुच आनंद
और मेरा प्रिय मित्र भी
मैने गौर से झांककर देखा
उसकी ऑंखों में
कद छोटा हो गया था उसका
छलनी हुआ था हृदय
भीतर तक, पता नहीं क्यों?
क्या बांसुरी बनने के लिए
छलनी होना जरूरी है?
———————
दो कविताएँ : रामकुमार सिंह
अग्निशामक

आग
जला देती है मकानों को
और घरों को भी
मोबाइल फोन सेवा अच्छी है
दमकल को पुकारने में
जब आग ‘मकान’ में लगी हो
आप अकेले बच भी निकलें बाहर
और लपटें देखकर
आपके पड़ोसी भी दौड़ पडें
अनेक मतभेदों के बाद भी,
सहायता करने।
परन्तु ऐसी कसरत बेकार
और आप असमर्थ हो जाते हैं
जब आग लग चुकी हो-
‘घर’ में
जब आप थे सक्षम
तब यदा-कदा रहे तत्पर
आग को अपने हथकंडों से
दबाने में, ताकि-
पड़ोसी लपटें न देख सकें
क्यों कि स्व-मान रक्षा
थी आपकी प्राथमिकता
न कि आग का शमन
और
लापरवाही बन गयी अग्नि-कांड
घर का
सावधानी ही एकमात्र उपाय था
जो बरती जाती है रिश्तों में, भावों में
अब क्या देखते हो, जाओ
कबीर बुला रहा है
देखो
शायद किसी और ‘घर’ में
तुम्हें दिखाई दे
धीरे-धीरे सुलगने को तैयार आग
तुम अच्छा ‘अग्निशमन’ कर सकोगे।
——————–
तुम
तुम भी हो, और-
समग्र के प्रतिनिधि भी
तुम्हारा जीवन
तुम्हारा अपना भी है, और-
अखिल का प्रतिबिम्ब भी
इसलिए
तुम्हारी भूख
तुम्हारी अपनी है, पर-
भुखमरी का नेतृत्व भी
तुम्हारी बेकारी, बेबसी और असहायता
लाचारी, असंतुष्टि और साधनहीनता
असंख्य का दृष्टांत मात्र है
सवाल इस बात का है कि-
10:30 से 5:30 की मशीन बनकर तुम
अपने परिजनों का
मुँह बंद करना पसंद करोगे?
या फिर उन लाखों-करोड़ों की
आवाज बनना चाहोगे
जो तुम्हारे द्वारा मुखर होने की
आस लगाये बैठे हैं
——————-
बाज़ार-विमर्श : चार कविताएँ/रामकुमार सिंह

एक व्यावसायिक फोन-कॉल
‘बाज़ार’ के नाम
”हेलो! मि. बाज़ार
क्या आप ‘मंदी’ से उदास हैं?
मैं बनकर आया हूँ
खास आपके लिए- उपभोक्ता
अभी ‘सब्सक्राइब’ करने लिए
मेरा गला दबाइए”
वाणिज्य के विद्यार्थी
पढ़ रहे हैं- ‘बाजार’ को
जान रहे हैं उसकी बारीकियों को
उन्हें याद करायी जा रही है
एक परिभाषा कि
‘मार्केट-वैल्यू’ होने पर ही
किसी का अस्तित्व स्वीकृत है
इसमें वस्तुआ के साथ-साथ
(माँ-बाप भी शामिल हैं)
सर्वोत्तम?

‘बिग-बाजार’-एक शॉपिंग मॉल
इसकी पंच-लाइन है-
एक ही जगह
सारी चीजें
‘सर्वोत्ताम’ दाम में
छुपी शर्तों की बात मानें तो
‘सवोत्ताम’ का अर्थ
‘सर्वाधिक’ भी हो सकता है
सूची-
ऊपर से शुरू होती है या
नीचे से
बाजार ही जाने
तुम्हारा रेज्यूमे
तुम्हारी कम्पनी
तुम्हारा जॉब
और-
तुम्हारी छँटनी
तुमने ‘लाइफटाइम’ कार्ड पर ही
‘टिक’ किया था न?
जब कर रहे थे जॉब के लिए
कोर्स का चुनाव
तब कह रहे थे तुम्हीं तो
कि ‘बूम’ आया है
फिर भी-
तुम ‘मंदगति’ के शिकार
तुम ‘छद्म-प्रगति’ के शिकार
तुम ‘बाजार की शक्ति’ के शिकार
वाह री ‘छिपी-शर्तें’
‘जीवन-भर वैध’, या-
जीवन-भर कैद
तुम हर मामले क्यों-
समान अर्थ पाते हो?
———————–
कविता : रामकुमार सिंह
पिता! तुम्हारे पहाड़-से अस्तित्व में
मैंने खुद को
गर्म-गर्म महसूस किया
जब सर्दी की सुबह
मैं तुम्हारे चौड़े वक्ष से पीठ लगाये
गुड्डमुड्ड हो, बैठता था
तुम्हारी गोद मुझे
पर्वतीय खोह-सा अहसास देती रही
मेरे आकार के
बेवज़ह बढ़ने तक
अपने वितान का क्षेत्रफल
ऑंकने के लिए
मैं गलता गया
बहने लगा
तारों में – केबलों में
मैं फैल गया
साइबर-स्पेस में
मेरा तरलीकरण देखती
तुम्हारी ऑंखें कहती रहीं
”जैसा तुम चाहो”
पिता! मैं अंगुल-भर के
पिद्दी-से यंत्र से
बेतार होकर
तैर गया हवा में
तार-तार होकर
मेरी ऍंगुलियों की आखिरी पोर
तुम्हारे चौड़े – बहुत चौड़े
मजबूत पंजों की
आखिरी पोर को पकड़ने की
नाकाम कोशिश कर रही है
तुम घुटने मोड़कर
सिलकॉन में नहीं आ सकते
तुम्हारी स्वाभिमानी हठधर्मिता
मैं जानता हूँ
तुम डिजिटल नहीं हो सकते पिता!
मैं फैलकर आकार नहीं ले सका
तुम ग़लत नहीं हो सकते पिता!
———————-
कविता : रामकुमार सिंह
तुम बादल बन जाओ

बादल
आकाश में कुलाचें भरते
चंचल, आंदोलित और मस्त
कई टन वज़नी जल की निर्मिति
पर अस्तित्वबोध – किंचित् नहीं
मिथ्याभिमान को लेकर
नहीं किया प्रतिरोध
कभी – पवन से
टकराये नहीं किसी से
रहे पारगामी, सर्वदा
धरा के किसी भी कोने में
स्वीकार कर लिया
हरी-भरी ऑंखों का स्नेह-आमंत्रण
और बरस पड़े
मिटा दिया स्वयं को
हँसते रहे अंत तक
मुक्त और मस्त बादल
……..
सागर-
जिसे लेकर मैं
सदैव असमंजस में रहा
अथाह गहराई में अतुत जल-संग्रह
पर सर्वदा तत्पर
और समाविष्ट करने को
गंभीर ;?ध्द हृदय इतना विशाल, कि-
लोग नजदीक आने से घबराते रहें
अधिकतम स्थान अधिकृत किया,परन्तु-
तट-स्पर्श की ललक को
भुलावा नहीं दे सका
कोई भी कर लेगा कंठधार्य,तो-
सरल और सुलभ कहलाना होगा, और-
चोट लगेगी जटिल बड़प्पन को
सो – खारापन नहीं छोड़ा
सागर-साहब का गुणगान करते
और भारी उपमाएँ देते
नहीं अघाते लोग
कारण सिर्फ एक-
भयभीत रखता है सागरीय अस्तित्व
……
तुम
सागर बने रहे तो
विशालतम रहकर भी
असीमित नहीं कहला सकोगे
मुक्त होने की चेष्टा करो
सागर के उर का परिताप बन जाओ
तुम बादल बन जाओ
कृति

सादा कैनवास पर
यहाँ-वहाँ
आड़े-तिरछे ब्रश मारे
कुछ रंग फैलाये
कुछ फैल गये
कुछ पोंछे
कुछ धुल गये
सारा कुछ बेतरतीब
बेढब, विचित्र और-
बेकार!!
एक सरफिरे चित्रकार का
गैर-योजनाब( निर्माण
निरुद्देश्य, निष्प्रयोजन, और-
निरर्थक!!
जैसे मेरा जीवन
फिर भी भोले कलाप्रेमी
तू इसे ‘कृति’ कहता है
मेरे मूर्ख प्रशंसक
तुझे मेरा व्यक्तित्व
बहुमूल्य दिखाई देता है
क्यों?
तू ही जाने…..
कविता : रामकुमार सिंह
पत्थर पर घास -दो

तुम मृतप्राय: हो गये थे
लेकिन मृत नहीं, मुझे यकीन था
तुम्हारे अंत:स्थल के किसी कोने में
बीज की अंकुरण-ललक के समान
मानवीय संवेदनाएँ दफन थीं
वो जाग उठी हैं
तुम जान उठे हो-
मानव का अर्थ
उमड़ने लगी है सुषुप्त प्यास
औरों को लगा ऐसा, मानो-
उगने लगी हो
पत्थर पर घास………
‘डरती है दरियाबी’ / मोहम्मद इलियास की तेलुगु कविता/

‘डरती है दरियाबी’/कविता-संग्रह
मूल-रचनाकार : मो. इलियास
रेखाचित्र – अमित ‘मनोज’
हिन्दी-पुनर्सर्जना कार्य का संपादन एवं प्रस्तुति : डॉ. रामकुमार सिंह
मोहम्मद इलियास के बारे में कुछ……..

तेलुगु के युवा कवि मो. इलियास का हिन्दी जगत से परिचय कराते हुए मुझे हर्ष है। उनकी कविताओं में एक ओर भारतीय मानववाद और आध्यात्म की गहराई है तो दूसरी तरफ आम जनमानस, गरीब मुस्लिम, मुस्लिम स्त्री आदि के सम्बन्ध में गहरी सामाजिक यथार्थदृष्टि है। वे ज्ञानपीठ कवि सी. नारायण रेड्डी तथा आध्यात्मिक कवि वेमन आदि की कविताओं के गहरे अनुरागी हैं। मो. इलियास मूलत: आन्ध्रप्रदेश के सत्तोनापल्ली, गुन्टूर स्थल के निवासी हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से एमएससी-केमिस्ट्री श्री इलियास का जीवन एक अप्रतिम कविता है। उनकी पत्नी श्रीमती एन.वी. रमणकुमारी हैं। वे आंध्रप्रदेश में अंग्रेजी विषय की शिक्षिका होने के साथ ही उपप्राचार्या हैं। श्री इलियास केन्द्रीय विद्यालय संगठन में स्नातक शिक्षक विज्ञान हैं। धार्मिक समन्वय का उनके व्यक्तित्व पर प्रभाव है। साथ ही बहिन की दहेज-हत्या और विश्वज्ञान के अध्येता उनके मामा की मृत्यु ने उन्हें गहरे तक क्षोभ दिया है जिसका प्रभाव उनकी कविताओं पर देखा जा सकता है। अंतर्मुखी प्रकृति के इस युवा कवि की कुछ ही कवितायें तेलुगु समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई हैं। ढेरों अस्त-व्यस्त उनके कक्ष में पड़ी हैं। कवि के साथ कई दिनों तक बैठकर तेलुगु, संस्कृत व अंग्रेजी शब्दकोशों की सहायता से स्वयं कवि से चर्चा करते हुए हिन्दी पुनर्सर्जना का कार्य मैंने किया है। कवि को हिन्दी की अधिक जानकारी न होने का मलाल है परन्तु हिन्दी के प्रति अनुराग में कमी नहीं। मैं स्वयं तेलुगु-हिन्दी अनुवादक होने का कोई दावा नहीं करता। परिश्रम के द्वारा कवि के भावों का हिन्दी रूपांतरण करने का प्रयास जो कवि ने किया बस उसे उचित रूप दे दिया।
……..एक बात और प्रसिध्द युवा रेखाचित्रकार, श्री अमित ‘मनोज’ जो ‘पाखी’ इत्यादि पत्रिकाओं के लिए रेखाचित्र बनाकर चर्चित हैं, और आजकल हरियाणा में जेआरएफ कर रहे हैं, उन्होंने मेरे अल्प अनुरोध पर ही ‘डरती है दरियाबी’ के लिए सहर्ष रेखाचित्र बना दिये हैं. उनके प्रति हम दोनों की कृतज्ञता। ……..’डरती है दरियाबी’ पर बहुत कुछ विमर्र्श होना है। मैं प्रकाशकों से सम्पर्क की कोशिश कर रहा हूँ। इसका पुस्तकाकार प्रकाशन होना ही चाहिये। भारतीय साहित्य और युवाओं के नवलेखन, उत्तर और द्रविड, हिन्दू और मुस्लिम , हिन्दी और हिन्दीतर भाषी आदि के समन्वय और संवाद का कोई अवसर चूकना नहीं चाहिये।इलियास की कविता के अलावा कई और नवलेखक तेलुगु में विमर्श कर रहे हैं, उन चर्चा जरूर करने की कोशिश आगे करुंगा।डॉ. रामकुमार सिंह
डरती है दरियाबी

सर्पिलाकार कंकरीले रास्ते के
गाँव को छोड़कर ब्यारनी को जाने वाले मोड़ पर
गाँव से विसर्जित होकर फेंकी हुई-सी झोपड़ी में
गरीब दरियाबी
××××
इंसान को इंसान से डर
नमक का निर्मूलन होकर
विश्वास का वध करके
प्रेम को खदेड़ने वाला डर
××××
जन्मदाता को खोकर
दैन्य का ग्रास बनी है वह
××××
उसी झोंपड़ी के पिछवाड़े
उगी दरिद्रता से उत्पीड़न का डर
निशब्दता को अंतर्विष्ट कर
नंगे पैरों से चलता हुआ डर
काले रंग का लेप लगाये हुए
अंधेरे का डर
अंधेरे में गोदे गये कालेपन का डर
कालेपन से आवृत
चारों ओर का डर
हिंसक द्वारा छोड़े जाने वाले निशानों का डर
पीछा करने वाली ऑंखों का डर
चाँदनी की ठण्डक में……रीढ़ की हड्डी की ठिठुरन
शाबासी की थपकी देते हुए….
हल की नोक के मानिंद कुरेदता डर
हमेशा पीछे चिपककर रहने वाला डर
परिजनों के बिछुड़ जाने पर भी
छाया की तरह न बिछुड़ने वाला डर
श्वास में समाकर शासन करने वाला डर
साथ सोते हुए, सोने के बाद
सुषुप्त मस्तिष्क को घेरने वाला डर
अधेरे में चप्पलों की आवाज ……
सहमे हुए दिल का डर
श्वान-शिशु के भौकने पर -
उसके दाँतों की खिलखिलाहट में
खुश होने वाला डर
आहट से उल्लसित होकर जगने वाला डर
झींगुर की झिंग्-झिंग् को
पिशाच के विकट अट्टहास जैसा
मस्तिष्क में
अनुगूँजित करा देने वाला डर
नस-नस में तार की तरह लिपट जाने वाला डर
अपनी झोंपड़ी के बहिष्कृत हो चुकने का डर
अपरिचित को पाकर ….
परिचित की तरह मुस्कुराने वाला डर
जनारण्य में जानवरों का डर
खुद से बढ़ा हुआ डर
××××
कामन्दुओं की ऑंखों के इशारे में
निढाल हो रहे मुस्लिम जनमानस की प्रगति के प्रतीक जैसी
पताका है दरियाबी
××××
कीड़े से बामी से
जीव से निर्जीव से
दृश्य से अदृश्य से
तरु से तरस्वी से
पगलाई भोलीभाली दरयाबी
डरती किससे नहीं?
फिर मुझे एक मौका दो बताने का
मैं उसके मस्तिष्क को छूकर आता हूँ………..
——000—-
मेरी कलम

मेरी कलम जीती है
हृदय होकर
धड़कन, साँस, …..दृश्य बनकर
स्फूर्ति के रूप में है प्रतिबध्द
अश्रुबिन्दुओं को कलाकृतियों में
कर देती है रूपायित
मेरे ख्वाबों को उड़ाती है
कलहंस के पर लगाकर
मेरे अंतरंग में छुपे भावों को
तरुमूल की तरह अवशोषित कर
बना लेती है सांस
मेरे मन की परतों को उघाड़कर
चूम लेती है
ईश्वर का वरदान,
मातृ-आशीष, और-
सहचरी का स्फुरण बनकर
मेरी पुत्री की तरह प्यार बरसाती है
दिल के घुँघरू में
झनकार की कर देती है सृष्टि
हो सके तो लिखकर देखो
मुझे जो भाषायें नहीं आतीं
उनमें भी लिख सकती है
मेरी कलम…………………….
कलम में स्याही की तरह
मेरे हृदय में भाव
आकृतिहीन होकर
आकृति न ले पाकर
तरसते है आकृति के लिए
परन्तु……..
बहती हवा को
बरसती बारिश को
घूमती धरती को
प्रकाशित होते सूर्य-चन्द्र को
अंतत: समस्त ब्रह्माण्ड को
कहाँ है स्वच्छंदता ?
काल-रेखा पर ही कवायद …….
बाजू में भी न देखा जा सके,
बँधी-बंधायी चाल
तितली जैसे रंग-बिरंगे पंख लगाकर
भाव-वन में आनंद से
नियमरहित होकर करती विहार
क्रोञ्च का कंठ बनकर देती ध्वनि
मेरी कलम………
मेरी अंतरात्मा की गहराइयों को
आलोचनाओं के धागे बाँधकर
खींचती है
मेरे निशब्द मन के साथ अभ्यास कर
करती है अचरज भरी साधना
मुझमें जन्मे भावों का
अमृत-कलश बनकर
होती है प्रमुदित
मनोमस्तिष्क में डोलते मधुर विचारों का
नव बसंत बनकर विकसित हुई सृजनात्मकता को
देती है दिशा-निर्देश
मेरी कलम……..
अणु से लेकर अनंत विश्व तक संस्पर्श करती,
अंधेरी-जिंदगी रूपी आकाश में
आत्मस्थैर्य का धु्रव तारा बनकर
संस्थित
मेरी कलम ….हृदय होकर जीती है
—–000—-
पाप-जगत में एक जमाने का
फैला हुआ हरियाली-रूपी पुण्य ही है
आज का यह रेगिस्तान
उस समय नीतिधारक एक ही अकेली आत्मा
मानवजाति द्वारा भुला दिया गया यह तद्युगीन अस्तित्व।
बालू के ढेरों जैसा -
जहाँ तक जा सकती है निगाह
वहाँ तक -
विस्तीर्ण
निशब्द संदेश
××××
एकांतिक जीवन रूपी रेगिस्तान में
निस्तेज होकर – सब कुछ खोकर
एकाकी अवस्था में अंतरात्मावलोकन
कीजिये एक बार
स्वयंगोचर हुआ जा सकेगा !
××××
हृदय के भीतर की आशाओं-आकांक्षाओं के बीच के
प्रछन्न युध्द के जैसा
विपत्तिाकर-घर्षण ,
मानसिक-संघर्षण
का प्रतीक बनकर
जल में डूबकर उत्प्लावित हुए शव की तरह
अवनिहृदयांतर से ऊपर उठा
मनुष्य के शरीर पर सूखी हुई चमड़ी जैसा
भूमि पर विस्तीर्ण रेगिस्तान
शुष्क-गुल्मों से सुलगती रोमभूमि जैसा
मनुष्य से छूटे हुए आवास जैसा
मनुष्य को अपने लिये अयोग्य ठहराते निवास जैसा।
××××
मन में घुमड़ता है एक प्रश्न -
रेगिस्तान में कैसे नहीं जी सकेंगे …..?
आर्द्रताहीन हृदय वाले हैं हम
इसलिये
रेगिस्तान में नहीं जी सकेंगे!
उत्तार मिल गया है अंतर्मन को।
××××
आर्द्रता से परिपूर्ण, रसभरित पौधों जैसे,
रेगिस्तान में भी जी लेने वाले
मनुष्य, मनस्वी जाति में महोन्नत ,
प्रकट होकर प्रदीप्त हो, जो
उसकी कामना कर रहा है रेगिस्तान
××××
सजातीय आवेशों में होता है विकर्षण
यह कहता है विज्ञान
आद्रताहीन मनुष्य और रेगिस्तान?
××××
नदी के गर्भ में,
सागर के हृदय की गहराईयों के तल मे भी
फैला हुआ है रेगिस्तान
नदियों को अपने ऊपर से गुजारते हुए
सागर को ओढ़े हुए
बालू के ढेरों को ढकेलते हुए
मनुष्यों के बीच दुराशाभरी आत्माओं के अतृप्त लालच जैसा
सागर जैसे मनुष्य के हृदयांतराल के तले विस्तीर्ण
विश्रांति ले रहा है जो …….
कहीं वह रेगिस्तान तो नहीं ?
नहीं-नहीं कहते हुए
बार-बार अभ्यर्थना करती है मानवता
—-00—-
मेरा एक व्यक्तित्व होना था
यहीं-कहीं उतार दिया मैंने उसे
मैले परिधान की तरह
और धारण कर ली नई वर्दी
मेरी इस नयी वर्दी को देखकर अत्यधिक आनंदित हैं सभी
लेकिन मैं
इसके भीतर उमस की चिपचिपाहट से तिलमिला उठता हूँ
व्यवस्था ने जो तय कर दिया हमारे व्यक्तित्व का परिधान
शायद उसी को कहते हों – वर्दी
पर यह मेरी तो नहीं
फिर क्यों पहनाते हो मुझे
जैसा कि मैंने कहा न – मेरा परिधान मिले तो लौटा दो मुझे
मेरा उच्चाधिकारी मेरे व्यंक्तित्व से ज्यादा
अहमियत देता है मेरी वर्दी को
मेरे साथी इंसान भी पहचान लेते हैं मुझे दूर से
महज वर्दी की एकरूपता के आधार पर
मेरे अंतर्मन को कौन पूछता है?
बस देखा जाता है मेरी वर्दी की जेब में धड़कते धन को
वेमन योगी को भी पहचाना गया उतारे हुए वस्त्र से
योगी कौन है?
हँसने और रोने पर एक जैसे दाँत दिखें जिसके?
या फिर-
वस्त्रों को पहनने और उतारने पर भी
उतारे हुए वस्त्र के कारण ही जिसे मिलती है पहचान?
खैर ….जो भी हो……….मुझे इससे क्या?………
बस! मेरा खुद का परिधान आपको मिले कहीं
तो मुझे लौटा दो न!
एक ही आकांक्षा है मेरी
खोये हुए व्यक्तित्व को पा सकूँ दोबारा
मेरे उस परिधान में अगर हो गये होंगे सूराख
तो भी मैं रफू कर लूँगा उसे
वर्दी नहीं पहनूँगा तो व्यवस्था नहीं करेगी
आत्मसात मुझ.े….
ऊपर का आवरण ही न हो जिसमें वह व्यक्तित्व ही क्या (!)
वर्दी की एकरूपता में
भर दिया गया है ‘हम’ लोगों के ‘समान’ होने का अर्थ
कहीं ऐसा तो नहीं,कि-
खोते हुए व्यक्तित्वों के विलुप्त होने का अनुपात भी हो समान?
किसी भी पेड़ का फल
उसके बस से तो बाहर नहीं होता
शायद मुझ पर लगी हुई वर्दी के भी
यही मायने हैं !
अगर होता आदमी के बस में
तो आकाश के मरुस्थल में सूरज को भी
पहना देता वर्दी
और फिर लगाता उसे ‘डयूटी’ पर
तेज और कांति की रोशनी को चारों दिशाओं में फैलाने वाले
सूरज को पहनाई गई वर्दी
उसका तेज, मंद कर देगी क्या?
ज्ञात नहीं
वर्दी पहन लेने के बाद उस अम्बरीश को ही
खुद करना होगा आत्मावलोकन
खैर…..इस सबसे मुझे क्या…….
अगर किसी कचरे के ढेर में मेरा परिधान मिले
तो कृपा करके लौटा दीजिये मुझे!
—000–
कविता

कविता का आधार – शब्द
शब्दों का प्राण – भाव
मेरे पास भाषा हो, न हो
व्यक्त हो सकँ या न हो सकँ
मैं कविता हूँ – कवि की भावना हूँ,
××××
कवि के हृदय के गीलेपन से ढरककर
शुष्क रेगिस्तान में भी अपने अस्तित्व के लिए
परिताप बनकर उबलती हुई फुसफुसाहट हूँ
××××
माँ के गर्भ को विदीर्ण कर,
मेरे गुड्डमुड्ड स्वरूप का लिंग-अभिज्ञान करने के लिए
स्केनिंग की जाती है, तब-
यंत्र के बारे में और,-
यांत्रिकता के बारे में
कुछ न जानते हुए
भोलेपन की साँस लेते हुए
असली अस्तित्व हूँ
मैं कविता हूँ , कवि के भावों की साँस हूँ………..
××××
मुझे जन्म देकर
बहुत बड़ा कार्य कर लेने के मद से
परिहास करते वक्त, आपको-
बताने का सामर्थ्य नही
मुझ विगतजीवी में
कि-
मेरा अस्तित्व है आपसे भी पहले
मैं कविता हूँ, कवि के भावों की परिमल हूँ
××××
किये हुए पापों से – प्रदक्षिणा द्वारा
छुटकारा पाने का बना रहे होते हो मन
आपकी अंतरात्मा में लीन होकर
श्वांस में श्वांस होकर, शाश्वत -
आपके ही साथ रहते समय, मुझे नहीं पहचान कर
खोजते फिरते हो जब
आपको आवाज दे-देकर रुँध चुकी
मीठी कंठ-ध्वनि हूँ
मैं कविता हूँ, कवि भावों की स्वच्छ स्फटिक हूँ
××××
प्रसव-गंध के दौरान ही
कूड़ेदान में फेका गया
विरूपित अस्तित्व, तब
रद्दी बीनने वाले मासूमों के
छोटे हाथों पर
कचरे के डिब्बे से ही बढ़ा हुआ कोमल पुष्प हूँ
मैं कविता हूँ, कवि के हृदय की आर्द्रता हूँ
जीवन-नदी के प्रवाह में
उछलती हुई युव-तरंग का उत्साह हूँ
समुद्र में जाकर मिलने के बाबजूद
उत्तााल ज्वार बनकर अस्तित्व का ऐलान हूँ
मैं कविता हूँ, कवि भावावेश की हलचल हूँ
—–000—
धरती पर आने के
बहुत पहले, जब मैं
प्रेम की चाँदनी के पारावार में उल्लसित
नन्हीं स्वर्ण-आत्मा बनकर
नवनीत की तरह प्रदीप्त बादलों के बीच
विहार करता था
××××
जन्म लेता है मेघ
माँ के गर्भ में भू्रण की तरह
और शनै: शनै: बढ़ता जाता है
क्रमश:
××××
धरती पर आने के
बहुत पहले, जब मैं
घिरा होता था नन्हें-नन्हे मेघों से
मेरा संस्पर्श पाकर तन्मय हो जाते वे
मातृ-मेघ ले जाती दुलारते हुए उन नन्हे मेघो कों
मुझसे दूर
नन्ही मानवात्मा को देखकर मातृ-मेघ
चकित होकर क्यों डर जाती ?
मैं नही जान पाता था तब
अम्बर के विशाल परदे पर
मेघों की छायाकृतियाँ
मंत्रणा के लिए
इकट्ठी होतीं अक्सर,
और उसी बीच अचानक
बिखर जातीं
ये क्यों होती हैं एकत्र
और फिर क्यों जाती हैं बिखर
मेरा अविकसित मष्तिष्क
नहीं जान पाता था इसके मायने तब
××××
मेघ की तरह मैने भी जन्म लिया
मेघ की तरह शनै: शनै: बढ़ता हुआ
वयस पा गया
××××
एक खूबसूरत अरुणोदय के समय
असमिया चित्रकार कोश
हिमालय के आगोश में
काला-फुकरी के गगनतल पर
अपनी तूलिका से
प्रकाश-पुंज सरीखी मेघमाला का
चित्रांकन करते हैं
अहा! कितना कमनीय कलाखण्ड !
यह विस्मित हृदयंगम-दृश्य
क्या संदेश निवेदित कर रहा है
मानव-जाति को ?
मेरे अंतर्मन में उद्भूत होकर
उभर आया है यह प्रश्न।
‘नागासाकी-हिरोशिमा पर
आणविक-प्रलय के नर्तन से
आविष्कृत विलय-दृश्य
मनीषी की युध्द-पिपासा का
उबलता हुआ रुधिर-वाष्प
भव्य श्वेत-गृह के विश्वासघात से
बदरंग हुआ रणक्षेत्र’
धीरे-से, धाराप्रवाह मौन-रुदन की मूकवेदना लिये
खड़ा है स्तब्ध मेघ
खेद के साथ
मेरे प्रश्न का उत्तार बनकर ।
मुझे अभिज्ञात हुआ अब
मानव के अस्तित्व से
दूर क्यो खिसक जाते मेघ
अपनी आकृति को नहीं रख पाते हुए स्थिर
कवि के लालनहीन लालित्यपूर्ण भावों की तरह
क्यों बिखर जाते वे
—–000—
उत्साहित – वेगवती नदियों के प्रवाह को
सागर की तरह निरुत्साह
अपने में उड़ेल लेने जैसी
लालसा-पिपासा वाले समाज की ओर
एक छोटी-सी जलधारा बनकर
बढ़ रहा हूँ अभी मैं
युध्द को प्रस्थित सैनिक
लौटे बनकर पूर्ण-कर्तव्य मृत्युवार्ता
अंतरंग जैसी छोटी और निर्मल नदी
नहीं होती विलुप्त ……मूल्य की तरह
वाष्पित मेघ होकर आये फिर से
सूखकर काँटा हुए शिथिलांग
गरीब मुस्लिमों की जिंदगियाँ
किस रूप में लौटेंगीं
खोज बनकर बढ़ रहा हूँ मैं
पर…….
कहाँ-कहाँ बढूँ मैं
……..लुटे हुए श्रमिक के स्वेद में
बाधाओं को धोने वाले ऑंसुओं के खेद में
भयंकर तूफान के गुजर जाने पर
सुरक्षित बच जाने के अहसास से भरे
घास के तिनकों के मोद में
मुरझाये फूलों के चेहरे में
अधपेट पसलियों में
कॉफी के जूठे प्यालों में
काका होटल की खिचड़ी के दानों में
रक्तरंजित कबूतर के कंठ में
धर्मान्धता की आग में जलते मानवत्व की चिता में
स्वातंत्र्य के शुष्क फलों के रस में
लोकतंत्र को चलाने वाले प्रजापतियों के आश्वासनों में
सर्वधर्मसमभाव की दीवार पर बैठी बिल्लियों में
हरी-भरी जिंदगियों को
श्मशान भेजने वाले सीक्रेट-ऐजेण्डाओं में
कहाँ-कहाँ ढूँढूँ मैं?
कितनी जगह ढूँढॅू मैं?
इस खोज के दौरान
कटकर टपकते वाक्य पर
हर बार
समाप्ति समझना…….
फिर उगता है
कोई वाक्य
नुकीला बनकर ………..
—–000—
गृह-हिंसा

जलते दीपक में सोखा हुआ घी
समय का आहार बनी आयु
विद्वेष का ग्रास बना वात्सल्य
जीवन को खत्म करने वाली मृत्यु
सब ऑंखों के ऑंगन में हीे !
फिर भी
देखती हुई ऑंखों के लिए दृश्य बनकर
अदृश्य हो रहीं ये निगूढ़ताएँ
उससे ज्यादा निगूढ़ है स्त्री पर पुरुष का जुल्म
××××
समझ/पकड़ में आने जैसा ही
लगेगा यह , मगर ..
चाकू की नोंक से
रिस जाता है बूँद-बूँद …….
अधपेटू जिंदगी को उनींदा करने वाली
गोलियाँ मिलाकर
रखे गये भोजन का मद-होश
अनुभूत होकर भी मालूम न पड़ने वाला
सुनियोजित षड़यंत्र के अंधेरे में
सम्बन्धों की आकृति पर
आती हैं सिलवटें
अवश्य…….
चमकते काले साँप की त्वचा भी
होती है खूबसूरत…..
(पुरुष के कृत्य की तरह)
रूपसौन्दर्य के लिए चिपकाये गये चेहरों के पीछे
कुचलकर घोंट दी जाती है मानवत्व की दम
हत्या के लिए रची गई साजिशें
अत्याधुनिक बनकर
मुँह चिढ़ाती हुई – देती है चुनौती
फोरेन्सिक विशेषज्ञों की वैज्ञानिक दक्षताओं को
रेगिस्तानी जिंदगी में
मृगमरीचिका बनकर
चमकता है कानून
चाहें तो भाड़े पर मिल जाती हैं रुलाइयाँ
सक्षम नहीं तो
मुहैया कराती है सरकार*
(* सिफारिशें लागूं)
इंसानों में विश्वास रखकर
निश्चिंतता से सोती हुई
इंसानियत के मासूम चेहरे पर
तेज़ाब जैसा उन्माद
करता है तांडव
दहन से तड़पती है
जमीन पर मानवता
हत्या की साजिश में
दिखावटी घावों को
प्रदर्शित करते हुए कातिल के लिए
लगती हुई परामर्शों की लाइन
अपनी रक्तरंजित देह को बुझाने लिए
पश्चिम दिशा में अस्त हो जाता है सूर्य
अगले दिन……
और एक लड़की के चेहरे पर
उदित सूर्य हो उठता है पुन: प्रसरित
कुल-महजब नहीं आयेंगे
जातियाँ-नीतियाँ होंगी जानकर अन्जान
सिर्फ दो ही धु्रव मौजूद
एक धर्म और दूसरा अधर्म
किन्तु उनके बीच भी होगा असमंजस
कहीं भी होता है स्त्री पर अन्याय
धर्म से अधर्म को आच्छादित कर
कोहरे की पर्त की तरह बिछा दिया जायेगा
इंसाफ नहीं कर पाने वाले कानूनों में
ज्ञानशीर्ष को छू चुके मानवताहीन विषय-विशेषज्ञ
सब मिलकर
इस शैशव-विकृति का -
नामकरण करते हैं- ‘गृह-हिंसा’
स्त्री पर होने वाली हिंसा भी स्त्री की तरह ही
घर की चारदीवारी में रखी जाती है कैद
कानों-कान खबर न जा पाये बाहर
सीधे श्मशान तक साथ जाती है यह
अपनी मर्जी से
खुला घूमता है कातिल………………………..
—-000—-
मृत्युशैया पर वह

मृत्युशैया पर बिछायी गयी
आत्माभिमान की चादर वह
ज़नाज़े पर ही ज़माने को देख चुका
तजुर्बेकार
कीड़ों की तरह रेंगते गुनाहगारों को भी माफ करके
जिंदगी के गुनगुने कम्बल के नीचे
सर छुपाने की जगह देने वाला
उदात्ता प्रेमवादी वह
मात्र आदान है, प्रदान नहीं जिसे
जीवन-संध्याओं को अंधेरे के हाथ गिरवी रखने वाला
गरीबी छाने पर भी जिसके होठों पर नहीं होती शिकन
मुस्कुराहटें बिखेर देने वाला
सहनमूर्ति वह
सोचते हैं जिसे नहीं सीख पायेंगे
उसे उतनी ही आसानी से सीख कर दिखा देने वाला
हुनरमंद वह
बाबजूद इसकेष् जिंदगी के संघर्ष में
गरीबी बन गयी उसकी पहचानो-पता
आम हिन्दुस्तानी मुसलमान के बजूद का
छह फुट का प्रतीक है वह
असहायता को जीवन के एक विधान की तरह
स्वीकार करने पर भी
चार लोंगों की सहायता की प्रवृत्तिा
कभी न त्यागने वाला
गरीबी में पकने पर भी
मानव-सेवा धर्म से पल्ला झाड़ने वाला नहीं वह
पुरातन नागरिकताओं और
विश्व के देशों के इतिहास के मर्म को
घुट्टी की तरह पी चुका वह
बाहरी दुनियाँ को
उसकी गरीबी के सिवा,
दिल के पीछे छिपे हुए
इस देश के पीढ़ियों के इतिहास से
कोई मतलब नहीं जब,
गरीबी की बाधाओं में ही हो गये सारे अंग खराब
आखिर तक करते हुए जद्दोजेहद
मृत्युशैया पर प्रशांत लेटकर
मौत की पसरी हुई भुआओं को
गर्दन के हार में बदल देने वाला वह
पूरब की अल-सुबह के पंखों पर
सवार सूरज की तरह
बढ़कर आलोकित होना था जिसे
जिंदगी की मूसलाधार अश्रुधारा से
बुझ गया वह
मानवत्व के मनोफलक पर कीर्ति मुद्रित कर
सिखाकर हमें ‘मनुष्य’ का शब्दार्थ
महोन्नत भाषा बनकर
मौन अंगीकार कर गया वह
मनुष्य खो रहा जिसे,
उस मानवत्व-रथ का
सारथी वह
मृत्युशैया पर बिछायी गयी
आत्माभिमान की चादर वह
—000—
अंतरात्मा

भारी डम्पर के ऊपर
वजनदार कच्चे खनिज को
आसानी से ढोकर ले जाने जैसा
तब से हीे
जब कदम थे नन्हें
दुत्कारों के बीच से गुजरते हुए भी
उनसे अनजान बनकर
भारी-भरकम विचारों को
खाली दिमाग में
हल्केपन से ठूँसा गया
निरर्थक जीवन
भारी कदमों से ही
प्रगति की ओर प्रयाण
मनुष्यों का साँचा ही है यह गुरुत्वबल
फिर भी…
समाज की स्वार्थाग्नि पर
चलने के लिए अलवा का उत्साह…
नतीजा….
फफोले, और -
होठों से बाहर न आ सकने वाली पीड़ायें
मेरे स्व को आविष्कृत नही होने देगा
जिंदगी का यह रंगमंच
पात्र भी हैं संवाद भी हैं, किंतु-
अनभिव्यक्त वेदना की तरह
आतुरता है आर्द्रता भी, लेकिन-
अनूदित न हो सके गीत की तरह
समाज में अस्तित्व….
बधुँआ होकर खोया व्यक्तित्व
कलियुग की भट्टी की तरह
जलने वाली अंतरात्मा में झाँककर देखने से
समग्र-शून्यता मुँह चिढ़ाती है……….
मेरे अंतरंग के ऑंगन में
भटके हुए
एक अनाथ प्रेक्षक की तरह
क्रन्दन करती है
अंतरात्मा………
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मिट्टी का घर

आज वह
निर्मानुष सूनेपन से
नहीं हो पा रहा खड़ा
कराहते ममत्व की ध्वनियों के बीच
ढीली पड़ रहीं पुरानी दीवारें
बिखरी हुई मिट्टी के छोटे-छोटे ढेर
दूसरा पहलू दिखाते हुए
चूहों के बिल
सूखी चुकी नमी वाले
ऑंगन की छाती पर
चमेली की सूखी हुई टहनियाँ
जीर्ण हो चुके पुराने कपड़ों के पीछे
समा गई मधुर स्मृतियाँ
××××××
पहले वहाँ
हरियाती टहनियों पर खिली हुए चमेलियाँ
भरपूर विकसित गुलाबों से लदी डालियाँ
खिलखिलाती मुस्कुराहटें
ममता से ध्वनित मिट्टी की दीवारें
आनंदातिरेक से प्रमुदित कोलाहल
इस घर के लिए
धूप – बारिश की परवाह किये बगैर
छतरियों की मरम्मत कर
छतरी बनकर तना हुआ गफ्फार….
बीमारी से खाट पकड़कर
अक्षमता से समय पूरा कर गया जब
घने अंधेरे में जिंदगी के बोझ तले
अपने पति का अनुसरण कर गई
बशीरा…..
पति को पत्नी
पत्नी को पति
इंसान को इंसान
दे प्यार
पर…..
जिम्मेदारियों का क्या?
××××××
मासूम पसलियों को पकड़कर
मुट्ठी भर खाने के लिए
पराये कस्बे में
सगी फूफी का आश्रय लेकर
फुटपाथ पर अपनी जिंदगी जैसे
फूल बेचते हुए
गफ्फार के दो बच्चे
××××××
जीवितता खोकर
खड़ा है दुखित
अकेला
माटी का घर
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![images[13]](http://ramkumarsingh.files.wordpress.com/2010/02/images13.jpg?w=658)
























