कविता : मीडिया-विमर्श

लो-प्रोफाइल
वह
न तो ब्यूरो में जा पा रहा है
न सिटी-संस्करण में
खास ओहदे पर
यदा-कदा मिल जाती है
लूप लाइन – डेस्क
या फिर लिखते रहो
फीचर टाइप कुछ!
इसमें मुख्य-धारा नाम का
नहीं दिखता उसे कोई फ्यूचर
वह मेहनती है
तथ्यान्वेषी है
प्रभावित कर सकता है नीतियां
सत्ता-शासन के आवरण को
उघाड़कर
मगर पत्र-समूह -
जिसे अब ‘कम्पनी’ कहा जाने लगा है
उसमें वह
स्वत्वाधिकारी के
जन्मदिन, विवाह दिन इत्यादि
याद नहीं रख पाता
हाई-प्रोफाइल पार्टियों में
मैनेजिंग डायरेक्टर को
नहीं कर पाता रिसीव
वह गजब का पत्रकार है,
ऐसा उसे लगता है, औरों को भी
मगर,
‘कम्पनी’ की परिभाषा में
व्ह
‘लो-प्रोफाइल’ है………
वाकई …आज के हालातों के सच को बखूबी निभाती रचना.
आपकी कविता को समर्पित एक क्षणिका -
बाँट रख दिया
पलड़े पर,
जो भारी
वो भू पर
जो ‘हल्का’
वो “ऊपर” .