आखिर लौटना ही होगा ।

आचरण, संस्कार, जड़, ज़मी की ओर
आखिर लौटना ही होगा ।
कुत्सित मानसिकता, कुसंगति, कुप्रवृत्ति,
उद्दंडता को छोड़ना ही होगा ।
व्यर्थ दिखावा, पाश्चात्य संस्कृति, धनलिप्सा से
स्वयं को मोड़ना ही होगा ।
वर्ग-भेद, रूढ़िवादिता, भृष्टाचार व कुंठाओं
को तोड़ना ही होगा ।
भ्रातृत्व-भाव, परस्पर सहयोग, आदर-स्नेह
को ईमानदारी से जोड़ना ही होगा ।
बहुत हो चुकी व्यर्थ आधुनिकता
अब तो कुछ सोचना ही होगा ।
विश्व ज्ञान का दंभ छोड़कर, ‘पड़ोस-कल्चर’
अपनाना ही होगा ।
मत मोड़ो भावी-पीढ़ी को, केवल सुविधाओं की ओर
संघर्ष, अभाव, ज़िम्मेदारी का इनको पाठ ,
पढ़ाना ही होगा ।
कैसे समाज की हो रही है सर्जना, इस पर
विमर्श करना ही होगा ।
भटक गए हैं कहीं राह में , इसका ध्यान
दिलाना ही होगा ।
हे सुसंस्कृति के वाहक, तुमको कुसंस्कृति से
बचाना ही होगा ।
हे शिक्षक, शिक्षा, शिक्षालय अब उचित मार्ग
दिखलाना ही होगा ।
आचरण, संस्कार, जड़, ज़मी की ओर
आखिर लौटना ही होगा ।
डॉ. शेषकुमारी सिंह
केन्द्रीय विद्यालय
वायु सेना केंद्र, ओझर
मुंबई संभाग
Archive | फ़रवरी 2012
हाथ हिलाता है स्कूल का पेड़ /नई पत्ती निकल आई है : Farewell special
बचपन की सुनहरी स्मृतियों को साथ लेकर जिस स्कूल में जीवन में एक बड़ा हिस्सा बीता हो वहॉं से जाते समय जो भावनाएं उमड़तीं हैं उन्हें शब्दबद्ध करना बहुत मुश्किल है। फिर भी ये विदाई गीत कक्षा 12 वीं के विद्यार्थी जो जा रहें हैं उनके लिए लिखा और संगीतबद्ध किया है। 11 वीं विद्यार्थी उनके लिए गा रहे हैं, ……….
विदाई गीत :

जाओगे तुम यहॉं से
सोचोगे हम कहॉं
सुनहरे पल जो आए थे
यहॉ तुमने बिताए थे
याद करोगे वहां।।।।।
नये जीवन की सौगातें
तुम्हें बाहर बुलाती हैं
ये स्कूल की दीवारें
नहीं तुमको भुलाती हैं
जाओ तुम चाहे जहां।।।।
तुम्हारे दोस्त ये सारे
नहीं तुमको सताएंगे
तुम्हें खुद ही वहां जाकर
ये इतने याद आएंगे
भूल न जाना वहां।।।।
go out to serve your country and Countrymen
हिन्दी गजल : पढ़े जाने को
इम्तिहान की घड़ी आई है।
आज वरिष्ठों की विदाई है।
मैं जिसे डांटता था वो लड़की
आखिरी हस्ताक्षर लेने आई है।
गुस्सा होते थे बड़े सर
उनकी भी आंख भर आई है।
जहां बैठता था वो बैंच
खाली-खाली नजर आई है।
बहुत बातूनी थी मेरा दोस्त
उसके दिल में भी रुलाई है।
हाथ हिलाता है स्कूल का पेड़
नई पत्ती निकल आई है।
बहुत छोटी है ये दुनियां
फिर मिलें – ये उम्मीद जताई है।
ये लड़की बिल्कुल सीधी चलती है /कभी फिसली तो संभल जायेगी।
एक
ये बैठक भी निकल जायेगी
एक घंटे की आफत है, टल जायेगी।
‘परिपत्र बहुत डराते हैं हमें’
जरा-सी बात मुंह से निकल जायेगी।
ये लड़की बिल्कुल सीधी चलती है
कभी फिसली तो संभल जायेगी।
हर तरफ पानी भर गया, फाइल-
भीगी तो अच्छा है, गल जायेगी।
दो-
फिर कोई सरसराहट दौड़ानी होगी।
बात बहुत जम रही है, हिलानी होगी।
कन्नड़ में ‘कुत्ते’ को ‘नाई’ कहते हैं
ये बात नाई से छुपानी होगी।
स्कूल के पिछवाड़े मिलते हैं दो दिल
ये बात प्राचार्य को बतानी होगी।
उस तरफ के लोग नहीं दिखते हैं
ये ऊंची दीवार गिरानी होगी।
तीन-
नया जाल बिछाना होगा
आदमी को सुलाना होगा।
निरीक्षक आ रहे हैं, कि-
ये सामान हटाना होगा।
स्वागत के बोल गूँजेंगे
बाजा भी बजाना होगा।
साहब ने बजा दी घंटी
प्रहरी को बुलाना होगा।
चलो कवितायें बंद करें।
आज तो नहाना होगा।
हिन्दी में कन्नड़ बोलेंगे, अम्मा से बतियायेंगे : संस्कृति-भूमि कर्नाटक से एक गीत
नवगीत : कर्नाटक की संस्कृति को यह नवगीत समर्पित है———

जिसके द्वारो चौक पुरा है, हम उसके घर जायेंगे।
बालों में जो फूल लगाती , उससे मिलकर आयेंगे।
बहुत दिनों तक रोटी खाई , अब हम चावल खायेंगे।
हिन्दी में कन्नड़ बोलेंगे, अम्मा से बतियायेंगे।
सांभर,उपमा, इडली, डोसा थाली में लगवायेंगे।
दीप जला जिसकी देहरी परए आसन वहीं जमायेंगे।
अब तो हम लुंगी पहनेंगेए माथे तिलक लगायेंगे
स्वामी शरणम् अइयप्पा का नारा खूब लगायेंगे।
इस तरह मकानात गिराने नहीं आते – एक गेय गजल : रामकुमार सिंह

गेय गजल – संगीतबद्ध पढ़ी जाने को
रिश्ता नहीं होता तो बुलाने नहीं आते
वो फिर से नई बात चलाने नहीं आते।
शब्दों को रोक लें तो आँसू निकल पड़ें
हम सबको अपने दर्द छुपाने नहीं आते।
‘बाजार‘ चला देता है खोटे हों खरे
मैं आदमी हूँ सिक्के चलाने नहीं आते।
‘निर्माण ‘का संकल्प जो लेकर चले होते
इस तरह मकानात गिराने नहीं आते।
हाथों पे भरोसा यदि होता नहीं हमको
लोहे का ये पहाड़ हिलाने नहीं आते।
तुम्हारा काम अब होगा/ वो परसों दिल्ली जायेंगे : हिन्दी गजल : डॉं. रामकुमार सिंह

(हिन्दी गजल : रिदम के साथ पढ़ी जाने को)
कि-
लीडर आज आयेंगे
हमें भाषण सुनायेंगे।
हमें रोटी का आश्वासन
दुबारा देके जायेंगे।
चलो हम लोग चलते हैं
पुराना गीत गायेंगे।
वहीं बैठे रहो सज्जन!
तुम्हें ऊपर बुलायेंगे।
सतह पर शांति होगी
भीतर कुलबुलायेंगे।
यहां पर फल नही मिलते
चलो लोहा चबायेंगे।
तुम्हारा काम अब होगा
वो परसों दिल्ली जायेंगे।
पुरानी बात बताते होंगे। तो किस तरह लजाते होंगे : कुछ गजलें/डॉ रामकुमार सिंह
छोटे मतलों की लम्बी गजल काफी पहले से लिखी जाती रहीं है। बाद में चुनिंदा शेर संकलित होते रहे हैं। कुछ इसी तरह की गजलें जारी कर रह रहा हूं। एक पुराने से रजिस्टर में कई महीनों पहले लिखीं थीं। आज मिल गई तो, पढ़ लीजिये। परिवेश कर्नाटक से मिला है……

लम्बी गजल – एक
फिर मशीन घरघराई है
पहाड़ की शामत आई है।
टुकडे हो गया कृपण पर्वत
लोहे की खेप उगलवाई है।
मिट्टी को सोने में बदल देंगे
सरकार से बात चलाई है।
लक्ष्य हो गया निर्धारित
खबर भी छपवाई है।
एक नाम मंगवाया था
पूरी सूची चली आई है।
कनिष्ठ बहुत खुश हैं
वरिष्ठों की विदाई है।
इडली खा ली वहीं पर
चटनी थैली में रखवाई है।
यहां लाल धूल बहुत है
कपडों से लिपट आई है।
अंगूर बिक गये अम्मा
कब से दुकान लगाई है।
नारियल ठीक से काटो
बड़ी नाजुक कलाई है।
खा लो, भेलपुरी खा लो
सौम्या ने बनाई है।
चांदी के सिक्के बटेंगे
परियोजना से कमाई है।
लम्बी गजल – दो
पुरानी बात बताते होंगे
तो किस तरह लजाते होंगे।
मैं बहुत छोटा था, वो बड़े
गोद में खिलाते होंगे।
कितने मांसल हैं ये पेड़
व्यायाम को जाते होंगे।
रात की पाली खत्म हुई
श्रमिक नीचे आते होंगे।
बहुत बदबू है, सीलन है
महीनों में नहाते होंगे।
वजनदार होती है मिट्टी
कैसे डम्पर में चढ़ाते होंगे।
रात भी बजता है सायरन
कौन लोग बजाते होंगे।
अभी चला गया हुड़गा
अप्पाजी बुलाते होंगे।
पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।
मध्यान्तर में खड़ी है बच्ची
पापा खाना लाते होंगे।
( कन्न्ड में हुडगा – लडका, अप्पाजी- पिताजी)
लम्बी गजल – तीन
एक ही श्रोता है
वह भी सोता है।
किसने मारा है
तू क्यों रोता है।
कल बैठक है
देखें क्या होता है।
मतदान होना है
सबका न्योता है।
सुपारी कट जायेगी
हाथ में सरोता है।
वो प्रेस करता है
कपडे नहीं धोता है।
स्कूल और डाकखाना
साथ बंद होता है।
जो जुटाता है-
वही खोता है।
गजल : चार (पढी जाने को)
हर घर में गाड़ी है
यहां का मजदूर अनाड़ी है।
सब कन्नड़ बोलते हैं
बच्चा भी जुगाड़ी है।
ऊपर चंदन है, लोहा है
नीचे रेलगाड़ी है।
मर्द के मूंछ है, लुंगी है
औरत के गजरा है, साड़ी है।
सांप निकल आते हैं
बंदर हैं, झाड़ी है।
छोटा-सा कस्बा है
लाल रंग की पहाड़ी है।
दो लघुकथाऍं: ‘सरकारी पेड़’ और ‘कम्मू की डुकरिया’
‘‘क्यों रे क्या कर रहा है !!!!!’’
सराय चौकी की पिछली दीवार के किनारे से झांकते हुए सिपाही ने तमककर कहा।
‘‘बेरि टोरि रओं ऐं’’
(बेर तोड़ रहा हूँ)
‘‘ये सरकारी बेर हैं रे!!!!’’
‘‘सिरकारू ऐं ?’’
(सरकारी हैं क्या ?)
‘‘हां’’
‘‘तो……..’’
‘‘तोड़ मत….!! और क्या!!!!’’
‘‘तईं …..जि …..का ……सिरकारू एँ’’
(तो…..ये…..क्या सरकारी हैं?)
‘‘और क्या बक रहा हूं ?’’
‘‘सिरकारू ऐं तोऊ रोकतो????????’’
(सरकारी हैं तो भी रोकते हो?)
……कहता हुआ ठेंगना-स, काला लड़का अपने अण्डरवियर का नाडा पकड़े हुए दूसरी तरफ कूदकर भाग गया।
कम्मू की डुकरिया मर गई। डुकरिया की आत्मशांति के लिए मृत्युभोज-परामर्शदात्री-अघोषित-समिति से निम्नलिखित परामर्श प्राप्त हुए-
एक- ‘‘घरघन्ना नई चूलि’’
(हर घर से एक आदमी का नहीं, सपरिवार निमंत्रण हो)
दो- ‘‘पन्द्रे बोरी गलाऊ’’
(15 बोरियां शक्कर के अनुपात में भोजन बने)
तीन – ‘‘नोन ते हिसाब लगाऊ, तीनि कट्टा नोन)
(नमक से अनुपात मिला लो, 3 कट्टे नमक से जितनी सब्जी बने उसी अनुपात से हर माल बने)
चार – ‘‘घलिमा मालपुआ, छुट्टा’’
(मालपुआ छककर, खूब, जितना चाहें)
………अंतिम फैसले की जानकारी नहीं। कम्मू के द्वार से साफा वाले, मूंछ वाले, अलग-अलग पुरा वाले ‘प्रतिष्ठित’ पंच मामला फायनल कर चले गये।
तेरहवीं निबट गई।
कम्मू भी निबट गया।
कविता : मीडिया-विमर्श …..’लो-प्रोफाइल’
कविता : मीडिया-विमर्श

लो-प्रोफाइल
वह
न तो ब्यूरो में जा पा रहा है
न सिटी-संस्करण में
खास ओहदे पर
यदा-कदा मिल जाती है
लूप लाइन – डेस्क
या फिर लिखते रहो
फीचर टाइप कुछ!
इसमें मुख्य-धारा नाम का
नहीं दिखता उसे कोई फ्यूचर
वह मेहनती है
तथ्यान्वेषी है
प्रभावित कर सकता है नीतियां
सत्ता-शासन के आवरण को
उघाड़कर
मगर पत्र-समूह -
जिसे अब ‘कम्पनी’ कहा जाने लगा है
उसमें वह
स्वत्वाधिकारी के
जन्मदिन, विवाह दिन इत्यादि
याद नहीं रख पाता
हाई-प्रोफाइल पार्टियों में
मैनेजिंग डायरेक्टर को
नहीं कर पाता रिसीव
वह गजब का पत्रकार है,
ऐसा उसे लगता है, औरों को भी
मगर,
‘कम्पनी’ की परिभाषा में
व्ह
‘लो-प्रोफाइल’ है………
ये बुढ़िया शबरी जैसी,राम भी आते होंगे………
”पंपा – सरोवर है
लोग तालाब बताते होंगे।
ये बुढ़िया शबरी जैसी
राम भी आते होंगे।
यहीं कहीं किष्किंधा है
पर्यटक जाते होंगे।”

कर्नाटक में बैल्लारी जिले के हास्पेट से हम्पी जाकर जब आप तुंगभद्रा पार करते हैं तो हनुमनहल्ली गॉंव की ओर जाते हुए आप पाते हैं शबरी की गुफा, पंपा सरोवर और वह स्थान जहाँ शबरी राम को बेर खिला रही है। आप पायेंगे कि बस यह घटित होने ही जा रहा है आपके सामने। मैं यहॉं पहुंचा तो पर्यटकों के बाहर मैदान में भोजन बन रहा था। पंपा सरोवर में असंख्य श्वेत कमल खिले थे। जीवन में पहली बार कमल को छूकर देखा था। एक व्यक्ित ने कुछ रूपये लेकर कमल और कमलगट्टा लाकर दिये, जो मैंने सहेज कर रख लिए। सामने मंदिर है। शबरी के घर में प्रवेश करता हूं। तो लगता है आज महाप्रभु पधारने वाले हैं कुछ हाथ बंटा लूं, अम्मा अकेली है। बगल में ही वह कक्ष भी है जहां के बारे में कहा जाता है कि यहीं बैठकर राम जी ने शबरी के हाथों बेर खाए।

अस्तु, हमारे पौराणिक चरित्रों में शबरी विशिष्ट है। दालित्य और स्त्रीत्व के दोहरे अभिशाप को भोगती। यहां तक कि त्यक्त। शबरी को ना तो समीक्षा करना आती है न परीक्षा करना। गुरू से कोई दार्शनिक बहस भी नहीं। अदभुत मायथॉलॉजीकल चरित्र है…… सुतीक्ष्ण के बाद। राम आयेंगे। तो खोज शुरू नहीं की। प्रतीक्षा शुरू कर दी। कोई समीक्षा नहीं, परीक्षा नहीं केवल प्रतीक्षा। प्रतीक्षा का परिणाम क्या हुआ। लार्ड हिमसेल्फ केम टु हर। सिर्फ आये ही नहीं, बेर खाने की कहानी भी विख्यात हो गई। ये प्रतीक्षा का परिणाम है। हमारी दुनियां में प्रतीक्षा सूची के परिणाम नहीं निकला करते। सत्य की दुनियां में प्रतीक्षा ही परिणाम है। इसका कारण क्या है…….प्रतीक्षा की अवधि, ध्यान की अवधि है, क्यों कि प्रतीक्षा की अवधि कुछ भी न करने की अवधि है, और न करने की अवधि की ध्यान की उपलब्िध है। कर्ममुक्ित की अवधि है। इसलिये प्रतीक्षा का परिणाम महाप्रभु के मुख से नवधाभक्ित का उपदेश है।


