Archive | अगस्त 2011

‘रोशनी की कोपलें’ – हाथों से छूते हुए……….

पुस्तक-समीक्षा – डॉ रामकुमार सिंह
पुस्‍तक – ‘रोशनी की कोपलें(गजल-संग्रह)
सर्जनाकार – डॉ वशिष्‍ठ अनूप
प्रकाशक – उद्भावना प्रकाशन


हने को जो कोंपलें हैं वे कब अंगार बन जायें, कहा नहीं जा सकता। या इस तरह कहिये कि कब अंगारों की तासीर महज ‘कोंपल’ के शीर्षक में रखकर हथेलियों में दे दी जाये….. रोका नहीं जा सकता है। ऐसी ही एक नजीर है वशिष्ठ अनूप का गजल संग्रह – ‘रोशनी की कोपलें’
यह गजल-संग्रह उद्भावना से छपा है। इसमें कुल एक सैकड़ा जमा दो गजलें हैं। हिन्दी गजल की परम्परा में यह संग्रह एक और उपलब्धि है। दुष्यंत के बाद हिन्दी गजल में नई बुनावट को उसी प्रखरता और तल्खी के साथ बनाये रखने का अहसास ‘रोशनी की कोंपलें’ से होता है।
‘समय की पहचान’ की जो बात अनूप वशिष्ठ के विषय में मानी गई है उसे इस तरह के कई शेर सामने लाते हैं –

”हदों के पार होता जा रहा है
समय खूंखार होता जा रहा है”

समय का खूंखार हो जाना इसलिए नहीं कि अंधेरे के नुमांइदे ज्यादा हो गये हैं और रोशनी की कोपलें सूराख तलाशती हों, दरअसल मामला यह निकलता है कि अंधेरे और उजाले के फर्क का श्याम-श्वेत मानदंड समाप्त हो गया है। समय का खूंखार हो जाना जिस अंदाज में वशिष्ठ अनूप परिभाषित करते हैं वो इस दौर की शातिरी को पकडने और खंगालने की प्रक्रिया है -

‘समझना उसको मुश्किल है बड़ा शातिर शिकारी है
वो खंजर बेचने वाला अहिंसा का पुजारी है”

इस माहौल में केवल उदात्त कल्पनाओं वाले कवि के पास वे पैने औजार शायद न हों जो राजनीतिक-चेतना ये युक्त नये गजलकार के पास होते हैं। दुष्यंत ने जिस राजीनीतिक-चेतना का गजल से मजबूत परिचय कराया था वह उतनी ही शिद्दत के साथ अनूप वशिष्ठ के यहां मौजूद है। व्यंग्य की धार भी उसी तरह –

”ये नाले आजकल बनकर समन्दर बात करते हैं
मसीहाओं के जैसे ये सितमगर बात करते हैं
कभी कुर्सी के ऊपर से, कभी टेबुल के नीचे से
हमारे देश की संसद में बंदर बात करते हैं”

इतना ही नहीं, हर स्तर पर शक्ति का केन्द्रीयकरण किस प्रकार लम्पटों के हाथों में है, अनूप इससे बाखबर हैं। वे जानते हैं कि न केवल ये ‘बंदर बात करते हैं’ बल्‍िक ‘बंदरबांट भी करते हैं। अंधेरे के नुमाइंदों और सरमायेदारों के बीच कैसे घोषित-अघोषित अनुबंध हैं, इसकी भी वे खबर रखते हैं-

”कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।”

इस तरह के मकड़जाल में दुष्यंत सड़कों पर लिखे हजारों नारों को न देखने की बात जो कहते है, कुछ उसी लहजे में निकम्माई वादों से सावधान हो जाने की बात या मोहभंग सरीखी कोई चीज अनूप के यहां भी है-

”वादों पर विश्वास हो कैसे
हर वादा इक नारा निकला”

इस मोहभंग के बाजिब कारण भी हैं। नये प्रयासों को कुचलना व्यवस्था के लिए एक शगल से कम नहीं। जिस परकटे परिंद की कोशिश देखने के बीच दुष्यंत को एक मलाल भी था, उसे कुछ इस रूप में अनूप सीधा-सीधा कह देते हैं-

”भिनसार की आंखों में काली रात दीजिए
पंछी जो उड़ना चाहे तो पर काट दीजिए
इंसाफ की खातिर उठे आवाज अगर हो
पिटवाइये लाठी से, हवालात दीजिये”

इस खतरनाक समय में भी रोशनी की कोंपलों का अपनी तरह का वादा है। कोंपलों से जिस ‘मासूमियत’ या ‘कोमलता’ का अहसास होता है, यह लगता है कि इन कोपलों को खुद किसी ‘सुरक्षा-योजना’ की आवश्यकता तो नहीं, लेकिन जब ये कोपलें फूटती हैं, इस तरह कि, जगत के जीर्ण पत्रों को झरातीं हैं। उजाले का पेड़ खुश होता है, जब ये घोषणा सुनता है-
”उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें”

स्मरण रहे कि इस प्रक्रिया जो जन्म देने वाले सर्जनाकार के लिये यह सहज नहीं है। बड़ी बात जो शेर में होती है उसके लिए उतना ही विप्लव रचनाकार सहता है। युवा गजल-गायक हुसैन बंधु गायकी से पहले एक जुमला अक्सर इस्तेमाल करते हैं जो यहां प्रासंगिक हो उठता है- ”हम गजल कहते हैं तो खून जलता है / लोग समझते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।’‘ ये मंचीय जुमला कुछ इस तरह साहित्यिक अंदाज में उतनी गहराई से ‘रोशनी की कोपलें’ में नजर आता है-

”उसके मन की पीड़ाओं को कौन समझता है
दुनिया कहती कोयल कितना मीठा गाती है”

आंदोलन, विप्लव-गान, और वैचारिक-क्रांति की सुगबुगाहट अपने सक्रिय-चेहरे से बहुत पहले की उपज होती है। शांति की तलहटी में उथल-पुथल का ज्वार निहित होता है-

”बाहर से खामोश बहुत लगता लेकिन
भीतर से हर वक्त सुलगता रहता है”

इसी तलांतर को महसूस करते हुए अनूप वशिष्‍ठ साहित्य के उस खेल को अस्वीकार करते हैं जो बचाव की मुद्रा में है, वे आक्रमण में ही विजयश्री का वरण मानते हैं, वैचारिक-सर्जना-प्रक्रिया में….

”साहित्य फकत ढाल नहीं आक्रमण भी है
यह आक्रमण हम तुम पे लगातार करेंगे”

दुष्यंत ने इस जमीन पर जिस तपिश को महसूस किया था। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की रेत पर आम आदमी के पांव किस तरह जलते रहे, उसे आगे अनूप भी महसूस करते हैं, लेकिन नया यह जुड़ता है इस जलन के साथ कुछ आशा की ठंडक भी है। नये दौर में कुछ तो ऐसा घटने को है कि यह कहा जा सके-
”रेत पर पांव जलते रहे देर तक
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा”

‘रोशनी की कोपलें’ के बारे यह अत्यंत जरूरी वक्तव्य हो जाता है कि इस किताब में मन-मस्तिष्क के बीच, समाज और भावनाओं के बीच, वैचारिकता और मन-बहलाव के बीच एक गजब का संतुलन है। दुष्यंत जब ‘साये में धूप’ महसूस कर रहे थे तो ‘इश्क पर संजीदा गुफ्तगू’ से ध्यान बखूबी हटाया था। वशिष्ठ अनूप ने राजनीतिक-सामाजिक विमर्श के बीच मन की कोमल भावनाओं को शिद्दत से जगह दी है। सौन्दर्य की उपासना जब वे करते हैं तो गजल अचानक गीत के माधुर्य से भर जाती है। उनकी सर्जना-प्रक्रिया में यह बात शायद इसलिए और समाई हुई है कि उन्हें गीत व गजलों की गेयता से न केवल प्रेम रहा है वरन उनके अध्ययन व विशेषज्ञता के केन्द्रबिन्दु में गीत और गजल दोनों का अकादमिक विस्तार है। एक गजल में वे लिखते हैं-

”एक अनुबंध कर लिया मन में
जुड़ गये दिल के तार हैं चुप-चुप”

सौन्दर्य के उनके प्रतिमान सादा हैं। कबीर की अक्खडता अगर कई गजलों में है तो सौन्दर्य के प्रति सहज आकर्षण-योग भी है-

”अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी”

”””””””वरिष्‍ठ समीक्षकों की नजर में ””””

पुस्तक के फ्लैप पर टिप्पणीकार के रूप में हिन्दी विभाग, बीएचयू के प्रोफेसर डॉ अवधेश प्रधान लिखते हैं – ”वशिष्ठ अनूप की कविता ने गेय कल्पना के पंखों पर उड़ान भरते हुए अहर्निश प्रकृति, व्यक्ति और समाज के जीवंत जीवन का साक्षात्कार किया है। गजल को आशिक और माशूका, साकी और प्यालों के तंग दायरे से निकाल कर उसे खास हिंदी रूप-रंग देने की जो परंपरा चली उसमें वह अधिक से अधिक जीवन के विशेषतः सामाजिक जीवन के निकट आती गई और दुष्यंत कुमार के बाद से तो उसका किसान चेहरा, राजनीतिक चेहरा, क्रांतिकारी चेहरा और निखरता गया है और उसे निखारने वाले युवा गजलकारों में वशिष्ठ अनूप का खास योगदान है। उनकी गजलों में सत्ता की राजनीति के ‘शातिर शिकारियों’ की पहचान है तो उनके खिलाफ असंतोष, विरोध, आंदोलन और क्रांति का आह्वान भी है। कहीं धार्मिक, सामाजिक पाखंडों के विखंडन का कबीराना अंदाज है तो कहीं पर्यावरण की गहरी चिंता है-

”लाख हाथों जगत को जकड़े है
जग को मिथ्या बता रहा है वो
ये न समझो कि काटता जंगल
सबकी सांसे चुरा रहा है वो”

वशिष्ठ अनूप ने चिखलदरा अमरावती के नैसर्गिक सौन्दर्य पर लिखा है जो प्रेयसी के मानवीय सौन्दर्य पर भी। ऐकांतिक प्रेम की पुलक के साथ-साथ व्यापक मानव संबंधों की मिठास के चित्र भी उनकी गजलों में हैं। उनकी गजलों की एक बड़ी विशेषता है भाषा और भाव की सादगी – ‘‘गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था, मां ने हंसकर दुलारा तो अच्छा लगा।” उनकी गजलों के बारे में उन्हीं के शेर पेश करता हूं –

”एक मां की पुलक, एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल
कैसे जीवन से कविता जुड़ेगी पुनः
प्रश्न का सीधा-सा हल है गजल”

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ही प्रोफेसर डॉ बलराज पाण्डेय ने पुस्तकांरभ में 6 पृष्ठीय समालोचनात्मक टिप्पणी रचनाकार की सर्जना के विषय में इस तरह की है-

”अपनी रचनात्मक क्षमता के बल पर वशिष्ठ अनूप ने हिन्दी गजल के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी से छिपाने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनके पास सचेत वर्ग-दृष्टि है। यही वजह है कि उनकी गजलों में विषय की विविधता मिलती है। हम सभी जानते हैं कि दुष्यंत कुमार ने हिन्दी गजल को नयी भाषा दी, नया तेवर दिया, उसे नया आयाम दिया। दुष्यंत कुमार की उस पंरपरा को जिन लोगों ने विकसित किया, उनमें वशिष्ठ अनूप का नाम अग्रणी है। वे अपनी जमीन से जुडे़ हुए रचनाकार हैं। आज जबकि साहित्य भी बाजार की चमक-दमक के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहा है, वशिष्ठ अनूप उस चमक-दमक की वास्तविकता को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि साहित्य की दुनिया में प्रसिद्धि पाने के लिए किस प्रकार के संबंध काम करते हैं, लेकिन उन्होंने इन सभी चीजों से अपने को बचाया है और देश के आम जन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज के प्रभु वर्ग के विरुद्ध मोर्चा खोलते ही हैं, उन साहित्य समीक्षकों की भी खबर लेते हैं, जो गीत और गजल को साहित्य की मुख्यधारा से अलग करके देखते हैं। वे उन लोगों की भी खबर लेते हैं जो गजल विधा में संवेदनात्मक गहराई की संभावना नहीं देखते। गजल क्या होती है, इसे समझाते हुए वे लिखते हैं-

”हैं जडें इसकी कीचड़ के अंदर मगर
रूप-रस-गंध पूरित कमल है गजल
एक मां की पुलक एक कृषक की खुशी
खेत में लहलहाती फसल है गजल”

इससे स्पष्ट होता है कि वशिष्ठ अनूप की गजलों का आधार किसान की वह संस्कृति है जो कई प्रकार की विपरीत परिस्थितियों का सामना करती हुई मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित है। यदि हम कलात्मकता की दृष्टि से भी देखें तो विषय को स्पष्ट करने के लिए वशिष्ठ अनूप बिम्ब भी किसान जीवन से ही चुनते हैं। गजल की पहचान के लिए ‘खेत में लहलहाती फसल’ का बिम्ब अपने आप में कितना अनूठा है’ यह बताने की जरूरत नहीं। अपनी गजल विधा के प्रति वशिष्ठ अनूप इतने समर्पित हैं कि उन्हें यह कतई मंजूर नहीं कि इसे साहित्य की मुख्य-धारा से काट कर देखा जाये। वे गजल के इतिहास को जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि इसे ‘राजमहलों में पाला गया, और ‘तबलों की थापों’ पर महफिलों में ठुमके लगाने के लिए, कभी विवश किया गया था, लेकिन गजल की आज वह स्थिति नहीं है। वह अब ‘झोंपड़ी की दुलारी’ है तथा उसमें इतनी ताकत आ गई है कि किसानों-मजदूरों के हक के लिए हमलावर की भूमिका में भी अपने आप को प्रस्तुत कर सकती है। वशिष्ठ अनूप साहस के साथ यह घोषित करते हैं कि आज गजल विधा इतनी समृद्ध हो गई है कि उसमें हम आसानी से कबीर और निराला का दुःख देख सकते हैं, घनानंद के ‘प्रेम की पीर’ देख सकते हैं, साथ ही मीरा और रसखान का प्यार भी देख सकते हैं। इस प्रकार हम निःसंकोच यह कह सकते हैं कि वशिष्ठ अनूप ने गजल विधा को संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर उसे इतना विस्तृत क्षेत्र दिया है, जिसमें वह खुलकर सांस ले सके, खिलखिला सके। वशिष्ठ अनूप उन गजल लिखने वालों को भी एक प्रकार की सीख देते हैं, जो गजल को सिर्फ मनोरंजन करने वाली विधा मानते हैं।
वशिष्ठ अनूप की गजलों में एक और बात हमारा ध्यान खींचती है, वह है युगबोध। हम जानते हैं कि कोई भी रचनाकार तब तक कुछ सार्थक नहीं रच सकता, जब तक कि उसे अपने समय की पहचान न हो। आज जबकि हमारे समाज में सिर्फ पैसे का रिश्ता बचा हुआ है, लोग अपनों से भी नाता तोड़ते जा रहे हैं, हमें अपना घर अच्छा नहीं लगता, वशिष्ठ अनूप ऐसे में भारतीय पर्व त्यौहारों को सांकेतिक रूप से याद करते हैं-

पकवानों की खुशबू में रंगों की मस्ती में
दुश्मन को भी गले लगाना अच्छा लगता है
फास्ट फूड और चमक-दमक वाले इस युग में भी
अम्मा के हाथों का खाना अच्छा लगता है

स्पष्ट है कि वशिष्ठ अनूप को बाजार की चमक-दमक में विश्वास नहीं। ऐसा वही रचनाकार कह सकता है जो बाजार की असलियत जानता हो। हम देखते हैं कि वस्तुओं की गुणवत्ता कम, विज्ञापन ज्यादा हमें प्रभावित कर रहे हैं। वशिष्ठ अनूप बाजार की असलियत इसलिए जान सके हैं क्यों कि उनके पास एक विचारधारा है। उस विचारधारा के आधार पर वस्तुओं का विश्लेषण करने की उनमें क्षमता है और जो रचनाकार ऐसा करने में समर्थ है, उन्हें बाजार की चमक-दमक धोखा नहीं दे सकती। आज सचमुच हमारे मानवीय संबंधों में जो रिक्तता आ गई है, उसमें मां के हाथों का खाना याद करना कितनी बड़ी बात है। ऐसी पंक्तियों को पढ़ते हुए किसे अपनी मां की याद नहीं आयेगी, किसकी आंखें नहीं भर आएंगीं । बहुत सहजता के साथ संवेदना की गहराई में उतरना वशिष्ठ अनूप की अपनी विशेषता है। आपको लगेगा कि बात कितनी छोटी है, वह कितनी हमारे दैनिक जीवन से जुड़ी है, लेकिन उसी को वशिष्ठ अनूप जब रचना में ढाल देते हैं तो छोटी बात बड़ी बन जाती है और कुछ देर के लिए हम उसकी अर्थवत्ता पर विचार करने के लिए विवश हो जाते हैं।
वशिष्ठ अनूप अपने समय के यथार्थ को पहचानने की भी क्षमता रखते हैं। आज की सत्ता व्यवस्था बहुसंख्यक जनता की मूल समस्याओं से हमारा ध्यान अलग करना चाहती है। वह ऐसे-ऐसे मुद्दों को उछाल देती है कि हम अपनी मूल समस्याएं भूल जाते हैं। सत्ता-व्यवस्था की इस साजिश को वशिष्ठ अनूप खूब पहचानते हैं। इसलिए उनकी गजलों में गरीबों की आवाज मुखर हो पायी है। इसके लिए वे चौराहों से, नुक्कड़ो से बिम्ब लाते हैं-

”भूख मदारी-सी डुगडुगी बजाती जब
नंगा होकर पेट दिखाना पड़ता है
शांति हमें भी अच्छी लगती है लेकिन
हक की खातिर शोर मचाना पड़ता है।”

जहां समस्याओं का चित्रण प्रमुख हो, वहां गजल की संरचना भले ही कमजोर पड़ जाये, वशिष्ठ अनूप इसकी परवाह नहीं करते, क्यों कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने देश की जनता, शोषित-पीड़ित जनता का यथार्थ चित्रण करना होता है। ऐसा नहीं है कि आम जनता का दुःख-दर्द उनके लिए अनचीन्हा, अनपहचाना हो। उसे वे दर्शक के रूप में देर से देखने के पक्षधर नहीं है। उसके वे स्वयं भोक्ता भी हैं। दुःख ही जैसे रचनाकार का दोस्त है। यहाँ प्रेमचंद की ये पंक्तियां याद आती हैं कि ‘दुःख ही कवि के लिए सुख है। प्रेमचंद का मानना है कि कोई भी रचनाकार जिस दिन सुख-वैभव से रिश्ता जोड़ लेगा, उस दिन वह जनता का रचनाकार नहीं रह जायेगा। वशिष्ठ अनूप भी अपनी गजलों में दुःख से रिश्ता जोड़ते हैं। वे कहते हैं-

”कदम-कदम पे दुखों का हुजूम मिलता यूं
युगों के बाद कोई दोस्त ज्यों हहा के मिले”

यहां दुःखों का ऐसा हुजूम है जो कदम-कदम पर मिलता है। हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां अधिकतर लोगों के लिए दुःख ही ओढ़ना और बिछौना है। वास्तव में वशिष्ठ अनूप उन्हीं लोगों के दुःख की बात अपनी गजलों में करते हैं। दूसरों का दुःख भी कवि को जब तक अपना दुःख नहीं लगेगा, तब तक उसकी रचना सार्थक नहीं हो सकती।
साम्प्रदायिकता और जातिवाद ने हमारे देश को खोखला बनाया है। इधर क्षेत्रवाद ने भी आक्रामक रुख अख्तियार किया है। आश्चर्य तो यह है कि जो लोग ऐसी राजनीति करने वाली ताकतों को बढ़ावा देते हैं, वही राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के नारे भी उछालते हैं। वशिष्ठ अनूप अपनी गजलों के माध्यम से ऐसी ताकतों के प्रति हमें सावधान करते हैं। इसके लिए वे अपने समाज को भी जिम्मेदार मानते हैं। यह सही है कि यदि देश को तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ जनता उठ खड़ी हो जाये तो ऐसी ताकतें दुबारा सर न उठा सकें। देश और समाज की वर्तमान दुरवस्था के लिए हमारी भी जिम्मेदारी बनती है। वशिष्ठ अनूप का मानना है कि यदि दुनिया से जुल्म को मिटाना है तो सबसे पहले हमें अपने अंदर के डर को मिटाना पड़ेगा। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम दूसरों के भरोसे रहने के आदी हो गये हैं। अपनी समस्याओं को या तो हम नियति मान लेते हैं या इन्तजार करते रहते हैं कि कोई आएगा और हमें मुक्ति दिलाएगा। हम उन ताकतों को नहीं पहचान पाते जो जो हमें बांट रही हैं- कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर। सत्ता का यह खेल कोई नया नहीं है, उसकी चाल जरूर नयी-नयी लगती हैं वशिष्ठ अनूप का मानना है कि हम पहले ही अगर नहीं चेत पाये तो भविष्य में किन भयावह परिस्थितियों से सामना करना पड़ेगा, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। वे लिखते हैं-
”पत्थरों के जंगलों में पल रहे विषधर तमाम
प्यार में डूबी हुई निश्छल हंसी खतरे में है
लोग अब करने लगे हैं अंधेरे को यूं नमन
चांदनी सहमी हुई है रोशनी खतरे में है”

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए हमें बरबस ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘अंधेरा धूप को धमका रहा है और हम चुप हैं’
हमारे परिवार और समाज को पूंजीवादी व्यवस्था ने बहुत प्रभावित किया है। हमारे पारिवारिक रिश्तों में बहुत बड़ी दरार आयी है। माता-पिता, भाई-बहन के रिश्तों को भी हम नफा-नुकसान की दृष्टि से देखने लगे हैं। सबसे खराब स्थिति तो बूढे़ मां-बाप की है। जगह-जगह वृद्धाश्रम तो खोले ही जा रहे हैं, सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बूढ़ों की देखभाल के लिए सरकार को कानून बनाना पढ़ रहा है। वशिष्ठ अनूप ने इस विकराल होती समस्या पर भी हमारा ध्यान खींचा है। वे लिखते हैं-

”दुःखी मां-बाप को करके इबादत हो नहीं सकती
खुदा की ऐसे लोगों पर इनायत हो नहीं सकती
बुजुर्गों को पटक देना अनाथालय में ले जाकर
किसी की हो मगर अपनी रवायत हो नहीं सकती”

आज उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बाजारवाद का बोलबाला है। यह पूंजीवाद का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। कहीं-कहीं इसके विरुद्ध आवाजें भी उठी हैं, लेकिन उन्हें दबा दिया गया है। वशिष्ठ अनूप उदारीकरण के खतरों से वाकिफ हैं। …….ऐसी शक्तियों पर वे सीधे प्रहार करते हैं –

”लुटेरों की दुनियां के सरदार हैं वो
हमारी हंसी के खरीदार हैं वो
अमने के पुजारी उन्हें मत समझना
चले बेचने अपने हथियार हैं वो”

वशिष्ठ अनूप बाजारवाद के खतरों को पहचानते हैं। बाजार, जिसकी कोई नैतिकता नहीं होती, जहां आदमी की नहीं, वस्तुओं की महत्ता दिखाई पड़ती है, जहां खरीदने वाले और बेचने वाले की ही सत्ता दिखाई पड़ती है, वहां कविता, गीत और गजल को कौन पूछेगा, दूसरी कलाओं का क्या होगा, विचारहीन बनाने वाली इस व्यवस्था ने हमारे घर को ही बाजार बना दिया है। वशिष्ठ अनूप की बाजार पर यह टिप्पणी बहुत मारक है। वे इस व्यवस्था का विरोध करने वाली शक्तियों के पक्ष में खड़े होने वाले रचनाकार हैं। उनकी गजलों में उनका पक्ष स्पष्ट है। उन्होंने अपनी गजलों में जो सवाल उठाये हैं, उनका जवाब व्यवस्था के पास नहीं हैं। वे कहते हैं-

”क्यों उठ रहीं हैं लपटें, क्यों हुआ है लाल जंगल
देना पड़ेगा उत्तर, करता सवाल जंगल”

वशिष्ठ अनूप के ये शब्द उस आदिवासी जनसमूह की ओर संकेत करते हैं, जहां वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिए सशस्त्र संघर्ष जारी है।
ये गजलें अपने समय, समाज और समग्र वैश्विक संरचना से रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं और उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। ‘बन्जारे नयन’ और ‘रोशनी खतरे में है’ के बाद ‘रोशनी की कोंपले’ वशिष्ठ अनूप की गजलों का तीसरा संग्रह है तो तमाम निषेधों के बाबजूद प्रकाश की विजय के प्रति आश्वस्त करता है।

—————–समीक्षा के इधर-उधर——————-

सर्जनाकार के बारे में -
डॉ वशिष्‍ठ अनूप, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग मे प्रोफेसर हैं। गोरखपुर जिले के बड़हलगंज अंतर्गत सहड़ौली दुबेपुरा गांव में जन्मे वशिष्ठ अनूप की प्रारंभिक शिक्षा गांव में तथा स्नातक शिक्षा बड़हलगंज में हुई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए और पी-एच.डी. की। वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर से ‘हिन्दी गजल: उपलब्धियां और संभावनायें’ विषय पर डी.लिट्. उपाधि प्राप्त की। आपने कुछ दिनों तक नेशनल पी.जी. कॉलेज बड़हलगंज और गोरखपुर विवि में तथा 1994 से पूर्वान्चल विवि जौनपुर के अंतर्गत राज पी.जी. कालेज के हिन्दी विभाग में अध्यापन किया। राजा श्रीकृष्णदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हुए। बाद में काशी हिन्‍दू वि.वि. में आ गये।

सर्जनाकार से रूबरू होना – डॉ वशिष्‍ठ अनूप को सुनने-समझने और कई जिज्ञासाओं के समाधान का मौका मुझे मिला वाराणसी में ही। इस बारे में ‘सर्जना’ पर ही देखे-‘बारह दिन बनारस में’ शीर्षक से।

वशिष्ठ अनूप जी के प्रकाशन संसार में….
….बन्जारे नयन (2000), रोशनी खतरे में है (2006) गजल-संग्रह शामिल है। समालोचना ग्रंथो में हिन्दी की जनवादी कविता, जगदीश गुप्त का काव्य-संसार, हिन्दी गजल का स्वरूप और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी गजल की प्रवृत्तियां, हिन्दी गीत का विकास और प्रमुख गीतकार, हिन्दी साहित्य का अभिनव इतिहास, हिन्दी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास, ‘अंधेरे में: पुनर्मूल्यांकन’ ‘असाध्यवीणा’ की साधना साहित 22 पुस्तकों का लेखन व संपादन उनके द्वारा किया गया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीत, गजल, कविता, कहानी और समीक्षाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं।
उनका सम्पर्क : डॉ. वशिष्ठ अनूप, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी – 221005, मोबाइल – 09415895812, ईमेल- vdwiwedi@gmail.com

—– संग्रह से दो कोपलें——-

एक -

जो मुजरिम हैं वही सब बनके पहरेदार बैठे हैं
वहां संसद में कितने देश के गद्दार बैठे हैं।
किसी अजगर-से ये हर ओर फेंटा मार बैठे हैं
समूचे देश की छाती पे कुछ परिवार बैठे हैं।
कहीं बंदूक के बल पर कहीं पैसे की महिमा से
बहुत सी कुर्सियों पर इन दिनों मक्कार बैठे हैं।
हमारे देश के कानून की महिमा निराली है
जो काबिल लोग हैं वे इन दिनों बेकार बैठे हैं।
नदी के घाट से पूजा घरों तक भेड़ियों के दल
ये साधू-संत भी हाथों में ले हथियार बैठे हैं।
बुराई नग्न तांडव कर रही दिन-रात सड़कों पर
जो अच्छे लोग हैं सीने में ले अंगार बैठे हैं।
इधर सड़कों पे चोरों, डाकुओं, गुण्डों का खतरा है
उधर थानों में इन सबके बड़े सरदार बैठे हैं।

दो-
सूखने लगतीं जहां पर हर खुशी की कोपलें
फिर वहीं से फूटतीं हैं जिन्दगी की कोपलें।
वक्त ने जिन पर उगा दी बेबसी की कोपलें
चाहते हैं हम उगें उन पर हंसी की कोपलें।
उनका दावा है कि अंधेरा खूब पनपेगा यहां
मेरा वादा है उगेंगीं रोशनी की कोपलें।
सारी नदियां एक सागर में सिमटती जा रहीं
वह उगाता है लबों पर तिश्नगी की कोपलें।
बस तुम्हारी इक झलक से सिन्धु में उठती लहर
फूटने लगती है दिल में चांदनी की कोपलें।
उनके हाथों पर नई तहरीर लिखनी है हमें
जिनके माथे पर लिखीं बेचारगी की कोपलें।
कुछ नये उद्योग पनपे हैं हमारे देश में
अपहरण, हत्या, डकैती, तस्करी की कोपलें।
भूख से मरते हैं बच्चे और संसद में वहां
बैठकर नेता उगाते मस्करी की कोपलें।
नर्म फूलों पर नहीं तलवार की होती परख
फूटती संघर्ष में ही शायरी की कोपलें।

—— और, चलते-चलते —-

‘सर्जना’ पर बीएचयू के हिन्‍दी अध्‍यापकों के मौलिक व्‍याख्‍यान सहिए कई ऐसी जानाकारियां प्रस्‍तत की गई हैं जो ‘सर्जना’ की खास निधि हैं। हिन्‍दी विभाग बीएचयू के यशस्‍वी विद्यार्थियों का सम्‍पर्क-अंतर्जाल लोकप्रिय बेबसाइट ‘फेसबुक पर उपलब्‍ध है।

हिन्‍दी विभाग के विद्यार्थियों से ‘सर्जना’ की अपील है कि हिन्‍दी विभाग की बेबसाइट पर विभागीय जानकारी हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करने के लिए पहल करे। विवि की बेबसाइट पर अध्‍यापकों के नामों की सूची भी अंग्रेजी में दी गई है। …..साथ ही विवि में होने वाली गोष्‍िठयों आदि के समाचार ‘सर्जना’ को ईमेल करें। छा्त्र-सम्‍पादकों के नाम सहित।

एक ऐसा जीवन जो सिर्फ विद्यार्थियों के लिए लिख दिया गया


प्रो. चन्द्रपाल सिंह
(मेरा यह आलेख मध्‍यप्रदेश शासन, जनसम्‍पर्क विभाग की मुखपत्रिका – मध्‍यप्रदेश संदेश के जुलाई अंक में प्रमुखता से प्रकाशित है। ई-पत्रिका का प्रष्‍ठ क्रमांक 20-21 अवलोकनीय है।)

एक आयोजन चल रहा है एक उन्नत भाल तपस्वी सरीखा व्यक्ति अंचल भर के मेधावी विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा के लिए वार्षिक राशि दे रहा है। राशि भी उसकी अपनी पेंशन से। जब तक वेतन मिला उसे बांट दिया, अब पेंशन है तो वह भी विद्यार्थिंयों के लिए। मंच पर प्रदेश के कुछ जाने पहचाने नाम है मंत्री, आएएस अफसर आदि-आदि। यह व्यक्ति अंचल भर के एक सैकडा से अधिक मेधावी विद्यार्थियों और उनके माता-पिता के नाम सहित उनके अंकों का प्रतिशत दशमलव सहित बोल रहा है। हाथ में कोई सूची नहीं। शतावधानी व्यक्तियों के बारे में सुना करते थे। देखा तो रहा नहीं गया। कार्यक्रम के उपरांत अचानक मंच पर बैठे कोई प्रमुख अतिथि उठते हैं और इस व्यक्तित्व के चरण छूते हैं। पूरा टाउन हॉल भाव-विभोर है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ही वे अनोखे व्यक्तित्व है जिन्होंने अपने जीवन को अनुशासन का पर्याय बना दिया। हम बचपन में सुना करते थे कि शिवपुरी में एक ऐसे आदर्श शिक्षक है जिन्होंने शिक्षक प्रतिबद्ध पेशे के लिए विवाह नहीं किया, लोग उन्हें नियत स्थान पर देखकर अपनी घडी मिला लेते हैं, उन्हें दुनिया भर के देशों की ढेर सारी जानकारी कंठस्थ हैं। हिन्दी और अंग्रेजी व्याख्यान दें तो श्रोता समय भूल जाते हैं। उस समय जब हम विवेकानंद जी के शिकागो भाषण के बारे में चकित होते तो हमारे शिक्षक प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह को साकार देखने की सलाह देते। वर्ष 2003 में उनसे भेंट के लगभग 4 साल बाद जब उनसे ग्रहनगर मुरैना में ही भेंट हुई तो एक निमिष में नाम सहित मुझे पुकार लेना उनकी दिव्य स्मृति का प्रभाव मुझे कौंधा गया। उनकी इस अद्भुत स्मृति से दुनिया भर के उनके प्रशंसक अभिभूत है। उन्हें सेवानिवृत्ति के उपरांत चम्बल की धरा पर ही भेज दिया और आज उनकी दिनचर्या सैकडों विद्यार्थियों, जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा राज्य प्रशासनिक सेवा सहित देश-प्रदेश से अनगिनत प्रतिभाओं के समग्र गुरुत्व का प्रतीक बना दिया है। नियत समय से नियत समय उनकी एक-सी दिनचर्या तय है। कुछ वर्षों से उनके नाम पर युवाओं ने प्रो. चन्द्रपाल सिंह सिकरवार मानव-मूल्य संवर्धन पुरस्कार भी शुरू किया है। उनका नाम पद्मश्री से नवाजे जाने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है।
आप कल्पना कीजिये ऐसे आदर्श शिक्षक की जिसने 47 वर्षों तक निर्बाध रूप से केवल और केवल ऐसा शिक्षण कार्य किया जो अनोखा कीर्तिमान बन गया। उनके कीर्तिमानों को उनके प्रशंसक और अनुयायी अलिखित विश्वकीर्तिमान का नाम देते है। क्यों प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह ने सारे जीवन भर स्वयं को प्रशंसित करने वाले किसी कीर्तिमान के लिए कोई झोली नहीं फैलाई। यहाँ तक कि गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड से पत्र आने के बाबजूद प्रविष्टि नहीं की। उनके कीर्तिमानों में आठ कीर्तिमान तो एक शिक्षक की भूमिका के लिए हैं और दो कीर्तिमान साहित्यकार की भूमिका के लिए। ये कुछ इस तरह हैं-
पहला कीर्तिमान: कर्तव्‍यनिष्ठा –
मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में प्रोफेसर के रूप में अपनी 41 वर्ष की शासकीय् सेवा में उन्होंने अपनी कक्षा का एक भी पीरियड नहीं छोडा। राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी को छोडकर उन्होंने अपनी कक्षाएं रविवार एवं अवकाश के दिनों में भी लीं। कक्षाएं न छूट जायें इसलिए वे अपने एकमात्र छोटे भाई की शादी में नहीं गये। इसका उन्हें कोई मलाल नहीं। पिता से कह दिया था कि मैने कर्तव्य को चुना है और मैं खुश हूँ।
दूसरा कीर्तिमान: वेतन के अलावा कोई धन नहीं –
अपने 41 वर्ष के सेवाकाल में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपने वेतन के अलावा अन्य कोई राशि जीवन में भी नहीं ली। न तो कभी टीएडीए और न कभी मेडीकल बिल का भुगतान लिया। उन्होंने पीठीसीन अधिकारी तथा प्रशिक्षक के रूप में अनेक विधानसभा एवं लोकसभा के निर्वाचन में कार्य किया लेकिन पैसे के भुगतान हेतु बिल नहीं भरा।
तीसरा कीर्तमान: अधिकतम विद्यार्थियों का अधिकतम हित -
अपने पूरे जीवनकाल में वे गरीब एवं जरूरत मंद विद्यार्थियों को प्रारंभ से अब तक आर्थिक सहायता देते रहे हैं जो कि प्रवेश शुल्क, पुस्तकों हेतु धन देना, परीक्षा शुल्क आदि के रूप में है। अनेक गरीब अभिभावकों को धन देते रहे हैं जिससे उनके बच्चे उच्च शिक्षा के अध्ययन हेतु बाहर जा सकें या वे रहने के लिये मकान बनवा सकें अथवा वे अपने पुत्र-पुत्रियों की शादी कर सकें। वे अपने वेतन का पचास प्रतिशन इन परिहित के कार्यों पर व्यय करते थे। अब पेंशन का पचास प्रतिशत गरीब विद्यार्थियों एंव जरूरतमंदरों पर खर्च करते हैं।
चौथा कीर्तिमान: सदाचरण और समय की पाबंदी -
एक ऐसे युग में जबकि घोर अपशब्दों को साहित्य और सिनेमा तक में मान्यता दी जा रही है प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह एक ऐसा अप्रतिम उदाहरण हैं जिन्होने अपने सारे जीवन में एक भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया है। उनकी दिनचर्या का अनुशासन और सादा जीवन देखकर काई भी दंग रह सकता है। अच्छाई के माध्यम से बुराई पर जीत को उन्होंने अपना संकल्प बनाया ही नहीं अपने जीवन में सिद्ध कर दिखाया।शिवपुरी के लोग अपनी घडियां उनकी दिनचर्या से मिलाते थे। वे समय के इतने पाबंद है कि कुछ भी हो वे समय पर निर्धारित स्थान पर हमेशा उपस्थित रहते हैं। वे सिर्फ इसलिए ईश प्रार्थना करते रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य कभी खराब न हो ताकि वे जीवन में कभी भी कक्षा में अनुपस्थित नहीं हों और आश्चर्य नहीं है कि ईश्वर ने उन्हे इसके लिए तथास्तु कह दिया।
पांचवा कीर्तिमान: इंग्लिश अशोसियेशन -
धाराप्रवाह अंग्रेजी व्याख्यान के लिए युवाओं में खासे लोकप्रिय और आदरणीय प्रो चन्द्रपाल सिंह ने भारतीय विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास हेतु पीजी कॉलेज शिवपुरी में इंग्लिस अशोसियेशन प्रारंभ किया तथा व्यक्तित्व विकास की विभिन्न विधाओं में चालीस वर्ष तक लगातार और निर्बाध निःशुल्क शिक्षा देते रहे।
छठवां कीर्तिमान: सामान्य ज्ञान की कक्षाएं -
उनका सारा जीवन एक सी दिनचर्या के लिए कई दशकों से विख्यात है। वे पीजी कॉलेज शिवपुरी में शाम को चार से छहबजे तक सामान्य ज्ञान की निःशुल्क कक्षाएं लेते थे जिनमें पांच सौ से अधिक विद्यार्थी जमीन पर बैठते थे और प्रतियोगिता परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते थे।
सातवां कीर्तिमान: शासकीय सेवा का रिकार्ड –
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार ने सन् 1964 से अंग्रेजी के व्याख्याता के रूप में शासकीय पीजी कॉलेज शिवपुरी से अपनी शिक्षकीय यात्रा शुरू की। और लगातार 41 साल तक इसी महाविद्यालय में पढाते हुए सेवानिवृत हुए। इस दौरान वे नगर में अपार लोकप्रियता और श्रृद्धा का केन्द्र रहे। सेवानिवृत होने के बाद वे मुरैना में प्रतिदिन निष्ठा एवं उत्साह के साथ 8 पीरियड रोज पढाते हैं – साक्षात्कार हेतु तैयारी कराते हैं एवं मार्ग दर्शन देते है। उनके ये सभी कार्य पूर्ण रूपेण निःशुल्क हैं।
आठवां कीर्तिमान: कर्मचारी एवं व्यावसायियों के लिए निःशुल्क कक्षाएं –
कर्मचारी एवं व्यावसायियों को प्रति रविवार निःशुल्क कक्षाएं 11 से 3 बजे तक 6 पीरियड लेते हैं। निःशुल्क अंग्रेजी पढाते हैं। ये कक्षाएं जनवरी से मई तक चलती है। इस कक्षा में आप चम्बल संभागीय मुख्यालय के अनेक प्रशासनिक अधिकारियों को सहज विद्यार्थी के रूप में प्रो चन्द्रपाल सिंह की अपार मेधा और वात्सल्य का अमृतपान करते हुए देख सकते हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी उनके कीर्तिमान अनूठे है। हर साल एक नियत तिथि को उनकी एक किताब वे खुद प्रकाशित करते है। वे स्वयं एक हजार प्रतियां अपने शिष्यों और प्रशंसकों को वितरित करते हैं। उन्होंने 27 साहित्‍यिक पुस्तके लिखी हैं जिनमें 25 हिन्दी में तथा 2 अंग्रेजी में। उनकी 27 पुस्तकों की 27 हजार प्रतियां छपी। उन्होंने साहित्य की हर विधा पर लिखा है। जैसे कविता, नाटक, उपन्यास, निबंध, कहानी, खण्डकाव्य्, संस्मरण आदि।
पहला अलिखित विश्व कीर्तिमान -
उनकी हिन्दी की 25 साहित्यिक पुस्तकों में से एक है ’’सारा जहाँ हमारा ‘‘। इस पुस्तक में 207 कविताएं हैं। विश्व में कुल देश 207 हैं। उन्होंने विश्व के प्रत्येक देश पर पूर्ण जानकारी देते हुए एक कविता लिखी है फलस्वरूप 207 कविताएं हैं। ये सारी जानकारी उन्हें कंठस्थ है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस पुस्तक को सराहते हुए उन्हें पत्र भेजा जिसमें उन्होंने इस पुस्तक से बहुत प्रभावित होने की बात स्वीकारी है। खास बात यह कि के लिये गिनेज बुक ऑफ रिकार्डस से भी पत्र् आया है। याद्यपि उन्होंने प्रविष्टि नहीं की है यह कहते हुए कि गिनेज बुक ऑफ रिर्कास में विश्व में सबसे लम्बा या विश्व में सबसे छोटा आदि की तरह के बिन्दुओं पर विचार किया जाता है।
दूसरा अलिखित विश्वकीर्तिमान-
प्रो. सिकरवार का द्वितीय् अलिखित कीर्तिमान यह है कि उन्होंने अपनी 27 साहित्यिक पुस्तकों में किसी का भी कोई भौतिक मूल्य् नहीं रखा है। सभी 27 पुस्तकों का नैतिक मूल्य् है जैसे-कर्तव्यनिष्‍ठा, ईमानदारी, परहित, भाईचारा, देशभक्ति मेहनत आदि । प्रो. सिकरवार की साहित्‍ियक यात्रा सन् 1964 में प्रारंभ हुई। पहली पुस्तक जंगल के फूल 1982 में छपी। तब से उनका यह सृजन एक निश्चित गति से चल रहा है। प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह के जीवन और साहित्य को पूरे विश्व से प्रशंसा प्राप्त हुई है। दुनियां भर के अनेक राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों, पाश्चात्य देशों के पुस्तकालयों और विश्व के सर्वाधिक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से अनेक प्रशंसा-पत्र और साधुवाद पत्र प्राप्त हुए है। जो उनके कक्ष में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं। इनमें से अनेक पत्रों का मजमून पढने का सौभाग्य इस लेखक को भी प्राप्त हुए।
प्रेरक कायर्क्रम की नियतता का कीर्तिमान –
प्रो. सिकरवार हर साल जुलाई के अंतिम रविवार को प्रतिभा समान समारोह का आयोजन करते हैं। इसमें मुरैना जिले के स्कूल, कॉलेज तथा यूनीवर्सिटी के टॉपर्स को एक हजार रूपये प्रति विद्यार्थी तथा 1 प्रमाण पत्र् प्रदान किया जाता है। वे स्वयं की इस आयोजन के आयोजक प्रायोजक आदि होते है। बिना किसी अन्य की आर्थिक सहायता से होने वाले उनके आयोजन में वे स्वयं ही मंच संचालक होते है। खास बात यह है सभी गणमान्य अतिथियों की तरह ही दर्शक वर्ग का स्थान आदि पहले से सुनिश्चित होता है। उनका आयोजन किसी अतिथि की बाट नहीं जोहता और नियत समय पर मिनिट और सेंकड के हिसाब से शुरू हो जाता है। इसी कायर्क्रम में वे मध्‍यप्रदेश के शिक्षाविदो जैसे कुलपति, प्राचार्य, प्रोफेसर, डीलिट, पीएचडी, अभिभावकगण, मेडीकल, इंजीनियरिंग, यूपीएससी तथा पीएससी से चयनित व्‍यक्‍ितयों का अभिनंदन करते हैं। पूरे कार्यक्रम के खर्चे का वहन स्‍वयं करते हैं। इस कार्यक्रम को पिछले 6 वर्षों से टाउन हॉल, जीवाजी गंज मुरैना में करते हैं। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने किसी भी अत्याधुनिक सुविधा का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं किया। वे मोबाइल नहीं रखते है। उनक पते पर दूरभाष क्रमांक पर बातचीत या उनसे मिलने का समय भी नियत है। न उससे पहले और न उसके बाद। उनका पता है- श्रीराम कुटीर, टी.एस.एस. महाविद्यालय के समीप, गणेशपुरा मुरैना (म.प्र.) फोन नं. 07532-226639

जीवन पर एक दृष्टि:
प्रोफेसर चन्द्रपाल सिंह सिकरवार का जन्म 3 मई सन् 1943 को बागचीनी, जिला मुरैना में हुआ। उनकी हाईस्कूल तक शिक्षा मुरैना, भिण्ड एवं झाबुआ मध्‍यप्रदेश में हुई। प्री-यूनीवर्सिटी एवं बीए पीजी कॉलेज मुरैना से किया। एमए अंग्रेजी में एमएलबी कालेज ग्वालियर में टॉप किया। एमए राजनीति शास्त्र में उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये । सम्मान स्वरूप उन्हें जीवाजी विश्वविद्यालय द्वारा 3 गोल्ड मेडल प्रदान किये गये। विश्व प्रसिद्ध् अंग्रेजी साहित्यकार टॉमस हार्डी पर उन्होंने पीएचडी की तथा महानतम अंग्रेजी नाटककार, विलियम शैक्सपियर पर उन्होंने डीलिट की। प्रो. सिकरवार अंग्रेजी में डीलिट करने वाले चम्बल संभाग के पहले व्यक्ति रहे। उनके मार्गदर्शन में 11 शोधार्थी अंग्रेजी में पीएचडी कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग में वे वर्ष 1964 से 2005 तक रहे। इस दौरान वे यूपीएससी, पीएससी तथा विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं हेतु वे निःशुल्क मार्गदर्शन देते रहे। निःशुल्क कैरियर गायडेंस देना उनका महत्वपूर्ण कार्य है। उनके द्वारा पढाए गये हजारों विद्यार्थी विभिन्न सेवाओं के लिये चयनित हुए हैं तथा हो रहे हैं। जीवाजी विश्वविद्यालय् की महासभा के प्रो. सिकरवार 2 बार सदस्य् कला संकाय् के एक बार डीन तथा कार्यपरिषद के एक बार सदस्य रहे हैं। अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष के रूप में वे सन् 2005 में लगभग 41 वर्ष की शासकीय् सेवा के बाद सेवा निवृत्त हुए। शिवपुरी के नागरिकों ने उनके सेवानिवृत्ति के दिन अत्यन्त गरिमामय तरीके से नागरिक अभिनन्दन किया, । सेवानिवृत होने के बाद वे चम्बल संभाग के मुख्यालय मुरैना को गौरवान्वित करते हुए निःशुल्क अध्यापन कार्य कर रहे है। वे प्रतिदिन साढे दस बजे से डेढ बजे तक 4 पीरियड लगातार अंग्रेजी तथा सामान्य् ज्ञान की कक्षा प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठ रहे विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क लेते हैं। तथा शाम को 5 बजे से 8 बजे तक पीरियड प्रतिदिन साक्षात्कार की तैयारी कराते हैं और कैरियर गाइडेन्स देते हैं। इस तरह प्रतिदिन 8 पीडियड में पूर्ण निष्ठा के साथ निःशुल्क शिक्षण, साक्षात्कार की तैयारी तथा कैरियर गाइडेन्स का कार्य करते हैं। उनके सफल विद्यार्थियों की संख्या गिनना और सूची बनाना एक मुश्किल काम है।

फिर दिल्ली में बात चली है ………..

यह नवगीत कुछ महीनों पहले लिखा था, जाने कौन-सी लहर में लिख दिया था। अभी तक केवल अभिन्न प्रेरक व मित्र हितेंद्र जी को फोन पर सुनाया था। लगता है आज इसे जारी करने का समय आ गया है.। बाबा नागार्जुन को समर्पित है…….

फिर दिल्ली में बात चली है सारा सिस्टम बदलेगा
संविधान संसोधन होगा औ‘ सरक्यूलर निकलेगा।
फिर दिल्ली में………
कोई अफसर नहीं हिलेगा, बाबूजी भी बैठेंगे
कार्यालय के बाहर प्रहरी नहीं किसी से ऐंठेंगे।
कोई खिड़की बंद न होगी, सारे काम फटाफट हों
डण्डे वाला कोई न होगा, ना लोहे के फाटक हों।
बंद लिफाफे नहीं चलेंगे, ना अब कोई बहकेगा
संविधान संसोधन…………….
फिर दिल्ली में………..
गांव-गांव में सड़क बनेगी, पहुंच मार्ग निर्मित होंगे
फसल हाथ की हाथ बिकेगी, पूरे दाम निहित होंगे
नाली डम्बर-रोड खरंजा सरपंचों का खेल नहीं
ऑडीटर जनता ही होगी शिकवा थाना जेल नहीं।
अब केवल प्रधान का बंगला नहीं गांव में चमकेगा
संविधान संसोधन………..
फिर दिल्ली में…….
सारे मंत्री ‘युवक’ होंगे दौड़भाग करने वाले
मोटे-मोटे घर बैठेंगे पैसे पर मरने वाले।
जिनके चेहरे कुटिल न होंगे जनता पढ़ लेगी जिनको
आसंदी पर वही जमेंगे बत्ती-लाल मिले उनको।
हथियारों से घिरे न होंगे ना बड़ा काफिला निकलेगा
संविधान संसोधन…..
फिर दिल्ली में……
कितना सुंदर सपना है ये कितनी बढ़िया है युक्ति
लिखते-लिखते याद आ गई कवि प्रसाद की ये पंक्ति -
मिला कहां वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया
जल्दी सपना पूरा होगा शीघ्र सितारा चमकेगा
संविधान संसोधन होगा……..
फिर दिल्ली में ……..