भूषण को किन परिस्थितियों, किस युग और किस प्रकार की काव्य-कला का कवि कहा जाये, इसके लिए जरूरी है उस युग की प्रवृत्तियों को जानना, जिस युग के जनमानस ने अंतत: अपने बीच से भूषण को तैयार कर लिया। आखिर क्या वजह रही कि तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें भारतीय राष्ट्रीयता का कवि कह दिया गया?
रीतिकाल में जब भारत का जनामानस औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त था तब भूषण ने जनता की भावनाओं को अपनी कविता की वाणी दी। नाजीवाद से त्रस्त यहूदी जनता के अनुभव जिस प्रकार कालांतर में सम्पूर्ण मानवता के अनुभव बनकर सामने आये हैं, इस काल में भूषण की कविता भी युगीन दस्तावेज से कम नहीं है। साहित्य, दरअसल इतिहास से अधिक प्रभावी भूमिका इसी कारण निभा पाता है। तो भूषण को यदि याद किया जाता है तो उनके युगबोध के लिये, उनके काव्य की अंतर्वस्तु के लिए और काव्य-कला के लिए। यहां कला-पक्ष की बात गौण कर दें और केवल उनकी कविता के राष्ट्रवादी ओज पर ही बात कर लें तो मैं समझता हूँ कि भूषण का मूल और प्रासंगिक तत्व सामने आ जाता है।
भूषण ने औरंगजेब के क्रूरतापूर्ण व्यवहार का उल्लेख करते हुए बताया है कि उस समय हिन्दुओं के देवस्थानों को गिराया जाता था, देवमूर्तियाँ तोड़ दी जाती थीं । हिन्दुओं के पूज्य पुरुषों , महात्माओं को सताया जाता था। इस इस रूप लें कि एक धर्मान्ध-व्यक्ति का आतंक किस हद तक मानवता को भयाक्रांत कर सकता है -
”देवल गिरावते फिरावते निसान अली
ऐसे समै राव-रानै सबै गए लबकी
गौरा गनपति आय, औरंग को देखि ताप
अपने मुकाम सब मारि गए दबकी”
ऐसे समय शिवाजी जैसे जननायक की आवश्यकता थी जो इन अत्याचारों पर अंकुश लगाये, या इस प्रकार कहें कि इस विषम परिस्थिति में जनता की आवाज की प्रतीक बन जाये। शिवाजी की प्रशंसा इसलिए भूषण ने की, क्यों कि वे एक समूची संस्कृति के लोकाचारों, मान्यताओं और परम्परा को विनष्ट करने के गैरलोकतांत्रिक कार्य के विरुध्द खड़े थे। शिवाजी द्वारा व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्थाओं की सुरक्षा और सैनिकों को भावनात्मक व रोजगार परक सहारा इस पूरी प्रक्रिया में भूषण की कविता से प्रकट होता है-
”वेद राखे विदित पुरान परसिध्द राखे
राम नाम राख्यो अति रसना सुघर में
हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन की
कांधे में जनेऊ राखो माला राखी गर में”
कोरे यशोगान के रीतिकालीन युग में भूषण को चारण क्यों न कहा जाये? कारण यही है कि रीतिकाल में ‘शिवराज भूषण’, ‘शिवा बावनी’,’ और ‘छत्रसाल दशक’ जैसे वीररस से परिपूर्ण काव्य ग्रंथों की रचना करने वाले भूषण का काव्य शिवाजी आदि जननायकों का कोरा यशोगान नहीं अपितु तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों का यथातथ्य चित्रण है। उनकी रचनाओं का ओजस युगबोध से अनुप्राणित है। ‘शिवराज भूषण’ में कवि ने शिवाजी के जन्म से लेकर ‘हिन्दू पद पदशाही’ की स्थापना तक……जितनी भी ऐतिहासिक घटनाएँ शिवाजी के जीवन सम्बन्धित हैं उनका ओजस्वी भाषा में निरूपण किया है। इन घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हुए कवि ने अपने युगबोध का परिचय दिया है किसी समुदाय की समूची संस्कृति पर हमले की स्थिति कितनी दुखद हो सकती है, यह भूषण की कविता कहती है-
”पीर पयगम्बरा दिगम्बरा दिखाई देत
सिध्द की सिधाई गई, रही बात रब की
काशी हू की कला गई मथुरा मसीत भई
शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी”
जबरन धर्मान्तरण विश्व के किसी भी कोने में हो आम जनमानस के लिए असह्य है। इसलिए जब भूषण यह कहते हैं कि- ‘शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी” तो इसे एक जघन्य-प्रवृत्ति के आशय में लिया जाना चाहिए, एक वर्ग-विशेष के लिए हर काल की बात नहीं है। यह उस समय की परिस्थितियों में सही-गलत के निर्णय के लिए एक जरूरी बात है।
भूषण ने अपने काव्य में कुछ ऐतिहासिकता से भरी घटनाओं का भी काव्य में चित्रण किया है। यह चित्रण रोम-रोम में स्फुरण जगा देता है और प्रत्येक भारतीय जनमानस को एक आताताई के विरुध्द खड़े लोकनायक शिवाजी से जोड़ देता है। शिवाजी का औरंगजेब के दरबार में जाना और उचित आसन न दिये जाने पर उनका क्रोध से तमक उठना, परिणामस्वरूप-
”तपक कें लाल मुख सिवा को निरखि भए
स्याह मुख औरंग सिपाह मुख पियरे”
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने टिप्पणी की है – ”वे आश्रयदाताओं की प्रशंसा की प्रथा के अनुसरण मात्र नहीं हैं, इन दो वीरों का जिस ? उत्साह से सारी हिन्दू जनता स्मरण करती है, उसी की व्यंजना भूषण ने की है”
भूषण का यह संकल्प कि किसी अन्य की सराहना नहीं करता – इसीलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, उनका चयन जनभावनाओं को चुनना है -
”और राव राजा एक मन में ल्याऊँ अब
साह कौं सराहौं के सराहौं छत्रसाल कौं”
…..यहाँ एक बात ध्यान में आती है कि अपने आश्रयदाताओं की वीरता के अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन का आक्षेप भूषण पर लगता है। साहित्य को जनभावनाओं की शीर्ष अभिव्यक्ति मानने में क्या समस्या है? आकाश को नाप लेना और तारे तोड लाना मानव की अदम्यता का ही तो प्रतीक है। फिर भूषण के काव्य में वीररस का पूर्ण परिपाक है तथा युध्द का सजीव व रोमांचित करने करने वाला वर्णन है। ‘शिववावनी’ में शिवाजी की सेना का युध्द के लिए प्रयाण करने से लेकर शिवाजी और छत्रसाल की युध्दकला का ब्यौरा उत्साह भरने वाला है। भूषण के सामने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा का प्रश्न था। धार्मिक स्थानों को सायास अपवित्र किया जाना, सांस्कृतिक मानदण्डों की समाप्ति आदि के प्रयास औरंगजेब के कारण हो रहे थे। अत: जनसामान्य का स्वर उकेरने तथा राष्ट्र की एकात्म वीरता की ओजपूर्ण ध्वनि को शब्दरूप प्रदान करने के लिए भूषण ने शिवाजी के यशोगान को अपना आदर्श मानकर जनता को जगाया। इसी कारण भूषण की विषवस्तु किसी जातीयता तक सीमित नहीं कही जा सकती। भूषण ने जिन दो राष्ट्रनायकों को अपने काव्य का मूलाधार बनाया है, वे दोनों- शिवाजी एवं छत्रसाल, भारत के त्रस्त एवं भयभीत राष्ट्र का पुननिर्माण कर रहे थे। यहाँ यह ध्यातव्य है कि भूषण मुस्लिम सभ्यता और संस्कृति का बलपूर्वक प्रचार-प्रसार देखकर उनका मन व्यग्र हो उठा और धर्मविरोधी मुस्लिम साम्राज्य के प्रति भूषण मुखर हो उठे। वस्तुत: उनका विरोध मुसलमानों के प्रति नहीं बल्कि उस अत्याचार के प्रति था। तत्कालीन सभी राजाओ और रावों ने घुटने टेक दिए थे परन्तु शिवाजी को उस चम्पा फूल की तरह भूषण ने माना जिस पर औरंगजेब रूपी भौंरा न बैठ सकने से अभिशापित है-
”सबही कौ रस लैकें बैठि न सकत आय
अलि अवरंगजेब चम्पा सिवराज हैं’
BAHUT BADIA
YAHA BHI RUKE
http://agmkgb88ptc.blogspot.com/
नमस्कार ।
तनिक विलम्ब से उत्तर दे पा रहा हूँ….क्षमा करें….।
मेरे अंतर्जाल पृष्ठ का अवलोकन करने एवं प्रतिक्रिया देने के लिये कृतज्ञता।
स्वस्थ विचार,भाषा और प्रस्तुति, धन्यवाद. कृपया मेरा सुधार संबंधी ब्लॉग भी देखें और ठीक समझें तो लिंक करें.
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Swagat hai..naye saal kee badhayi!
आदरणीया मैडम
प्रणाम।
तनिक विलम्ब से उत्तर दे पा रहा हूँ….क्षमा करें….।
मेरे अंतर्जाल पृष्ठ का अवलोकन करने एवं प्रतिक्रिया देने के लिये कृतज्ञता।
बिखरे सितारों की रोशनी जब कुछ पा लूँगा आपको अवश्य प्रतिक्रिया दूँगा।
-डॉ. रामकुमार सिंह
bhut sundr .aaj ki bhut bdi aavshykta hai yh . aap ne stuty kary kiya hai bdhai swikar kren
dr.ved vyathit
आदरणीय डॉ. साहब
प्रणाम। तनिक विलम्ब से उत्तर दे पा रहा हूँ….क्षमा करें….।
मेरे अंतर्जाल पृष्ठ का अवलोकन करने एवं प्रतिक्रिया देने के लिये कृतज्ञता।
-डॉ. रामकुमार सिंह
क्या आपके पास महाराणा प्रताप के विषय मे भूषण के द्वारा रचित काव्य के अंश हैं….
परमादरणीय समीर साहब
प्रणाम।
तनिक विलम्ब से उत्तर दे पा रहा हूँ….क्षमा करें….।
मेरे अंतर्जाल पृष्ठ का अवलोकन करने एवं प्रतिक्रिया देने के कृतज्ञता।
जैसा के आपने पूछा है । भूषण ने लिखा है कि
- ”शिवा को बखानों के बखानों छत्रसाल कों” अर्थात उन्होनें शिवाजी और बुंदेलखण्ड के महानायक छत्रसाल का ही वर्णन किया है। तथापि महाराणा प्रताप के सम्बन्ध में अवश्य आपसे चर्चा करुंगा। उड़नतस्तरी के द्वार का अवलोकन किया। आशा है पूरी सवारी करने के बाद विस्तृत चर्चा होगी। कनाडा में आपके दिन शुभ हों….धन्यवाद।
-डॉ. रामकुमार सिंह
बहुत सुन्दर …. परिस्थिति और काल किसी समाज की दिशा बदलने में सक्षम है …. पर ऐसे विपरीत समय में अपनी मौलिकता और सत्य की रक्षा कर सकना ही अपने आप में किसी क्रांति से कम नहीं होता … ये अदम्य साहस का कार्य है …. चाहे मनसा , वाचा, कर्मणा किसी प्रकार से किया गया सहयोग हो, समय उसे याद रखता है ……..आपका धन्यवाद
समादरणीय भाई पद्मसिंह जी
नमस्कार
तनिक विलम्ब से उत्तर दे पा रहा हूँ….क्षमा करें….।
मेरे अंतर्जाल पृष्ठ का अवलोकन करने एवं प्रतिक्रिया देने के लिये कृतज्ञता।
आपके पृष्ठ का अवलोकन किया। आपकी साहित्यिक शब्दावली आकर्षक है। आपकी रचनाओं पर प्रतिक्रिया शीघ्र…..।
-डॉ. रामकुमार सिंह
nice creation sir ….