
डॉ. रामकुमार सिंह का हिन्दी साहित्यिक ब्लॉग है। डॉ. रामकुमार सिंह की त्वरित-टिप्पणियाँ, अग्रलेख, साहित्यिक समालोचना, चिंतन, कविता, कथा, शोध व सर्जना इस पर उपलब्ध है।
‘सर्जना’ पर पहली बार कलम रखते वक्त यह लिखा गया – ‘सर्जना’ मानव और उसकी रचनात्मक शक्ति की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। ‘सर्जना’ मात्र आनंद की वस्तु नहीं है। प्रत्येक काल में इसने समाज को एक नयी अनुभूति से ऊर्जस्वित किया है।
वर्तमान समय में ‘सर्जना’, जिसे हम यहाँ साहित्यिक सर्जना के अर्थ में प्रयुक्त कर रहे हैं, अपना रूप देहवादी या रीति-काल की पुन:प्रस्तुति के रूप में अधिकाधिक दिखाई पड़ती है। नवलेखन की मूल प्रवृत्तियों में इसे मान लिया जाये तो अधिक अनुचित नहीं होगा। यद्यपि इसके स्वरूप, भंगिमा, भाषा, तेवर और समकालीन समाज की दुरूहता को स्पष्ट किये बिना एक शब्द में इसे परिभाषित कर देना भी इसके साथ अन्याय होगा। ‘सर्जना’ पृष्ठ पर हम न केवल सर्जना को समेटेंगे बल्कि उन पर विचार भी करेगें। अतिथियों का भी स्वागत होगा…..विशेषकर नवलेखकों का और नवलेखन को एक सार्थन समालोचना-दृष्टि भी प्राप्त हो यह प्रयास रहेगा।’-डॉ. रामकुमार सिंह
सर्जना की पंच-लाइन है- ‘उपलब्धियां आकाश बनाती हैं /किन्तु बातें और भी हैं जो अवकाश बनाती हैं’
इसका विस्तृत परिचय इस प्रकार है -
ये पंक्तियां मेरे एक गीत का हिस्सा हैं – ये गीत एक नज्म की तरह है। गीत में ‘आकाश’ को दो श्लेष अर्थों में प्रयोग किया गया है – पहला ऊंचाई के अर्थ में और दूसरा रिक्तता के अर्थ में। वास्तव में ‘स्पेस’ अंतरिक्ष भी और खालीपन भी। इस तरह उपलब्धियों का आकाश वास्तव में खालीपन का ही विस्तार है । सर्जना का कैनवास बन जाये तो अलग बात है।
”उपलब्धियां आकाश बनाती हैं ।
किन्तु बातें और भी हैं जो अवकाश बनाती हैं ।।
अपने श्रेष्ठतम के साथ उपस्थित हूं मैं ।
यही कारण है कि व्यथित हूं मैं ।।
मेरी अतिरिक्त क्षमताएं मुझे अपना ग्रास बनाती हैं।।
उपलब्धियां…………
दबा ढंका मौन में है जो ।
चैन में आराम में है वो ।।
दायरों को तोड़ मुझे सक्रिय अनायास बनाती हैं।।
उपलब्िधयां….
दिन बीत जाते है सुहानी यादे बनकर !
बाते रह है जाती कहानी बन कर !
पर दोस्त तो हमेसा दिल के करीब रहेगे
कभी होटो की मुस्कान तो कभी आखों का पानी बनकरएक आप ही तो हैं जो दिल के करीब हैं
एक आपका प्यार हे मेरा अच्छा नसीब है जुदाई आपकी रुलाती रहेगी ,याद आपकी आती रहेगी ,पल पल जान जाती रहेगी जब तक जिस्म में है जान हर सांस ये रिश्ता निभाती रहेगी
Its Really a very good effort to spread the fragrance of our own language…… …… I wish I could be a part of this magazine……
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Geeta Sabharwal…….
TGT ( HIndi)
K V MUMBAI…..
अवश्य, आपकी रचनाओं का सर्जना पर स्वागत है।